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PHILOSOPHY

June 18, 2020

Geeta ka Nishkaam Karm गीता का निष्काम कर्म

गीता का निष्काम कर्म

गीता

गीता_महाभारत_के भीष्म पर्व का एक भाग है इसे भगवद गीता के नाम से पुकारा गया है
गीता_ही एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें दर्शनशास्त्र धर्म और नीतिशास्त्र का संतुलित समन्वय हुआ है
गीता_में जीवन का एकमात्र उद्देश्य बताया गया है- ब्रम्ह में लीन होना अथवा ईश्वर की निकटता प्राप्त करना यही अवस्था मोक्ष है
गीता_के नैतिक विचारों में 3 विभागों का निर्माण होता है ज्ञान मार्ग, कर्म मार्ग और भक्ति मार्ग
गीता_का मुख्य विषय कर्म योग कहा जा सकता है
गीता_में सत्य की प्राप्ति के लिए कर्म करने का आदेश दिया गया है
गीता_के अनुसार अचेतन वस्तु भी अपना कार्य संपादित करते हैं
गीता_के अनुसार मानव की सबसे बड़ी दुर्बलता= कर्म के परिणामों के संबंध में चिंतनशील रहना
मानव कर्म का त्याग कर देता है= अशुभ परिणाम पाने की आशंका से
गीता ने मानव को अपने जीवन का आदर्श बनाने का निर्देश किया है= निष्काम कर्म को
निष्काम कर्म का अर्थ है= कर्म को बिना किसी फल की अभिलाषा से करना
गीता में वास्तविक त्यागी कहा है= जो कर्म फल को छोड़ देता है
कर्म करने में सफलता मिले या असफलता दोनों में समता की जो मनोवृति है उसे कहा है= कर्म योग
योग कर्मसु कौशलम् अर्थात समत्व बुद्धि योग ही कर्मों में चतुरता है
समत्व बुद्धि योग अर्थात कर्मबंधन से छूटने का उपाय

June 17, 2020

What Is Buddhist Philosophy बौद्ध दर्शन

बौद्ध दर्शन

बौद्ध दर्शन

छठी शताब्दी ईसा पूर्व के उत्तरार्ध में अनेक धार्मिक संप्रदायों का उदभव हुआ | इन सभी धार्मिक संप्रदायों के उदभव का कारण पुरानी रुढ़िवादी धार्मिक व्यवस्था थी | इस काल में लगभग 62 संप्रदायों का उदय हुआ था जिनमें सबसे महत्वपूर्ण बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म थे |

अन्य धार्मिक संप्रदाय जैसे एक अक्रियावाद (पूरण कश्यप), भौतिकवादी ( अजीत केशकंबली), अनिश्चय वादी ( संजय वेलट्ठिपुत्त), नियतिवादी ( मक्खलि गोशाल ) आदि प्रमुख थे |

बौद्ध धर्म के संस्थापक “गौतम बुद्ध” थे l इन्हे एशिया का ज्योति पुज्ज(Light Of Asia) कहा जाता है l बुद्ध का वास्तविक नाम सिद्धार्थ था शाक्य कुल के क्षत्रिय थे | गौतम बुद्ध का जन्म 563 ईसा पुर्व में कपिलवस्तु के “लुम्बिनी” नामक स्थान पर हुआ था l

इनके पिता शुद्वाेधन शाक्य गण के मुखिया थे l  इनकी माता मायादेवी की मृत्यु इनके जन्म के सातवे दिन ही हो गई थी l इनका लालन-पालन इनकी सौतेली माँ प्रजापति गौतमी ने किया था l

इनके बचपन का नाम सिद्वार्थ था l गौतम बुद्व का विवाह 16 वर्ष की अवस्था में यशोधरा के साथ हुआ l इनके पुत्र का नाम “राहुल” था l 29 वर्ष की आयु में बुद्ध ने अपना घर छोड़ दिया था यह घटना महाभिनिष्क्रमण कहलाती है

घर छोड़ने के पश्चात बुद्ध सर्वप्रथम सांख्य दर्शन के प्रणेता अलार कलाम के आश्रम में गए परंतु वहां से उन्हें ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई | उसके पश्चात उन्होंने ब्राह्मण कौंडिल्य और चार अन्य उपासकों के साथ ज्ञान की प्राप्ति के लिए घोर तपस्या आरंभ की परंतु वहां भी उन्हें ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई |

इसके पश्चात उन्होंने बोधगया में पीपल के वृक्ष के नीचे जीवन से संबंधित समस्याओं के बारे में चिंतन करना शुरु किया |

उनके इस चिंतन के 8 दिन पश्चात जब 35 वर्ष की आयु के थे वैशाली पूर्णिमा की रात्रि को निरंजना नदी के किनारे उन्हें सच्चे ज्ञान ( संबोधि ) की प्राप्ति हुई और वह “बुद्ध” कहलाए | गौतम बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में पांच ब्राह्मणों को दिया था अतः बुद्ध के आरंभिक शिष्य ब्राह्मण थे |

बुद्ध का यह पहला उपदेश ही धर्म चक्र प्रवर्तन कहलाता है |

गौतम बुद्ध ने श्रावस्ती नामक स्थान पर सबसे ज्यादा उपदेश दिए थे  उनके प्रिय शिष्य आनंद के कहने पर ही गौतम बुद्ध ने अपनी माता प्रजापति गौतमी को संघ में प्रवेश दिया था प्रजापति गौतमी पहली महिला थी जिनको संघ में प्रवेश दिया था |

गौतम बुद्ध की 80 वर्ष की आयु ( 483 ईसा पूर्व) में कुशीनगर में मृत्यु हो गई थी |

सिद्वार्थ जब कपिलवस्तु की सैर पर निकले तो उन्होंने निम्न चार दृश्यो को क्रमश: देखा- 

(i) बूढ़ा व्यक्ति
(ii) एक बीमार व्यक्ति
(iii) शव
(iv) एक सन्यासी

? बुद्ध के जीवन से सबंधित बौद्व धर्म के प्रतीक ?

          घटना              प्रतीक

  • जन्म                कलम एंव सांड
  • गृहत्याग          घोडा
  • ज्ञान                 पीपल (बोधि व्रक्ष)
  • निर्वाण             पद-चिन्ह
  • मृत्यु                 स्तूप

बुद्ध ने अपनी शिक्षाओं में चार आर्य सत्य नामक सकारात्मक विचार रखे थे |

  1. प्रतीत्यसमुत्पाद – कारणता सिद्धांत
  2. अनित्यवाद – दुनिया में कोई भी वस्तु नित्य नहीं है |
  3. क्षणिकवाद – हर क्षण दुनिया परिवर्तनशील है |
  4. निर्वाण – मोक्ष को निर्वाण कहा गया है |

बुद्ध के अनुसार मानव जीवन दुखों से परिपूर्ण है उनके समाधान के लिए बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग को सबसे उपयुक्त बताया है |

अष्टांगिक मार्ग में 8 बातें समाहित हैं |
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1.सम्यक दृष्टि, 2.सम्यक संकल्प, 3.सम्यक वाणी, 4.सम्यक कर्म, 5.सम्यक आजीव, 6.सम्यक व्यायाम, 7.सम्यक स्मृति, 8.सम्यक समाधि

बौद्ध धर्म में चार बौद्ध संगीतियां आयोजित की गई थी |
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समय             राजा      स्थान     अध्यक्ष       उद्देश्य
483 B.C. अजातशत्रु राजगृह महाकस्य्प सुत्तपिटक व विनयपिटक का संकलन किया गया
383 B.C. कालाशोक वैशाली सर्वकायी (सावरमीर) अनुशासन को लेकर मतभेद के समाधान के लिए बौद्ध धर्म स्थविर व महासंधिक दो भागों में बँट गया
252 B.C. अशोक पाटलिपुत्र मोग्लिपुत्ततिस्स तीसरा व अंतिम पिटक अभिधम्मपिटक जोड़ा गया
प्रथम शताब्दी अशोक कुण्डलवन (कश्मीर ) वसुमित्र बौद्ध धर्म का दो सम्प्रदायों में विभाजन – हीनयान व महायान

सुत्तपिटक में भगवान बुद्ध के उपदेश है | विनयपिटक में बौद्ध भिक्षुओं की आचार संहिता है | अभिधम्मपिटक में बौद्ध दर्शन है |

हीनयान महायान
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संकीर्ण विचारधारा ( रूढ़िवादी) सुधारवादी विचारधारा
बुद्ध के मूल उपदेशों को मानते हैं |
बुद्ध के मूल उद्देश्यों में कई सुधार किए|
यह पाली भाषा में उपदेश देते थे | कालांतर में संस्कृत को अपना लिया था|
इनका परमपद अर्हत कहलाता है | इनका परमपद बोधिसत्व कहलाता है |

बोधिसत्व – निर्वाण के योग्य हो जाएं लेकिन निर्वाण को स्वीकार नहीं करें |

बौद्ध ईश्वर की सत्ता में विश्वास नहीं करते|

आत्मा को अमर नहीं मानते|

बौद्ध पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं|

बौद्ध धर्म के पतन के कारण

ईशा की बारहवीं शताब्दी तक बौद्ध धर्म भारत से लुप्त हो चुका था | शुरुआत में जिन अनुष्ठानों एवं विधानों का बौद्ध धर्म ने विरोध किया था कालांतर में उन्हीं को अपना लिया। बौद्ध धर्म की चुनौतियों का सामना करने के लिए ब्राह्मणों ने अपने धर्म में सुधार किया दूसरी और बौद्ध धर्म का पतन होता गया | उन्होंने आम जनता की भाषा पाली को त्याग दिया था और पंडितों की भाषा संस्कृत को अपनाया |

ईसा की पहली सदी से बौद्धों ने मूर्ति पूजा शुरू कर दी थी तथा उन्हें भारी मात्रा में दान मिलने लगा | सातवीं सदी तक बौद्ध विहार दुराचारों का केंद्र बन गया था |

ब्राह्मण शासक पुष्यमित्र शुंग तथा हूण शासक शैव मिहिरकुल ने बड़ी संख्या में बौद्धों की हत्या करवाई | गौड़ शासक शशांक (शिव उपासक) ने बोधगया के बोधि वृक्ष को काट डाला था जिसके नीचे बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था |

इस प्रकार 12 वीं शताब्दी तक बौद्ध धर्म भारत से लगभग विलुप्त हो चुका था।

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June 16, 2020

What Is Jain Darshan जैन दर्शन क्या है???

जैन दर्शन

प्रवर्तक:- महावीर स्वामी

जैन दर्शन बहुसत्तावादी तथा बहुतत्ववादी दार्शनिक संप्रदाय है इसमें अनेकांतवाद की प्रधानता है  अनेकांतवाद के अनुसार जगत में अनेक वस्तुओं का अस्तित्व है तथा प्रत्येक वस्तु अनेक धर्मों को धारण किए रहती है

अनंत धर्मांन्तकम् वस्तु

वस्तु को जैन दर्शन में द्रव्य कहा जाता है

द्रव्य का लक्षण

गुण पर्यायवत द्रव्यम

अर्थात जो गुण तथा पर्याय दोनों का मिश्रण होता है वह द्रव्य कहलाता है

गुण :- किसी भी वस्तु में पाए जाने वाले नित्य अपरिवर्तनशील धर्म गुण कहलाते हैं

पर्याय :- वस्तु में पाए जाने वाले अनित्य परिवर्तनशील धर्म पर्याय कहलाते हैं

जैन दर्शन में सत्ता/सत् का लक्षण निम्न रूप में प्रस्तुत करता है

उत्पात् व्यय धौव्य इति सत् लक्षणम्

अर्थात जो एक ही समय में उत्पन्न होता है खर्च अथवा नष्ट होता है और नित्य ही बना रहता है वह सत् कहलाता है

जैन दर्शन में द्रव्य दो प्रकार का माना जाता है

1. अस्तिकाय- जो काय अथवा शरीर के समान स्थान घेरता है अस्तिकाय कहलाता है अस्तिकाय दो प्रकार का होता है

  • अ) जीव
  • ब) अजीव

2. अनास्तिकाय (काल)- उत्पत्ति विनाश और अवस्था भेद इत्यादि का मूल कारण काल होता है

जीव:-

जैन दर्शन में आत्मा को जीव कहा जाता है  चेतना ही आत्मा अथवा जीव का लक्षण है  जीव अपने मूल स्वरुप में अनंत चतुष्टय होता है अर्थात जीव अथवा आत्मा में चार प्रकार की पूर्णताए पाई जाती है

  1. अनंत दर्शन
  2. अनंत ज्ञान
  3. अनंत शक्ति
  4. अनन्त आनंद

जीव शरीर परिमाणी होता है अर्थात जिस शरीर में यह है प्रवेश करता है उसी के समान आकार को भी ग्रहण कर लेता है जैसे चींटी के शरीर में चींटी कि सी आत्मा और हाथी के शरीर में हाथी जैसी आत्मा

गुण अथवा चेतना की दृष्टि से :-

सभी जीव अथवा आत्मा एक समान होते हैं किंतु परिमाण की दृष्टि से उनमें स्तर का भेद पाया जाता है

1. तीर्थंकर – पूर्ण चेतन
2. मानव
3. पशु
4. वन
5. जड़

अजीव :-

जिसकी चेतना लुप्त प्राय होती है वह अजीव कहलाता है

अजीव के लक्षण :-

  • धर्म – जो गतिशील पदार्थों की गति को बनाए रखने में सहायक कारण होता है धर्म कहलाता है जैसे मछली के तैरने में जल धर्म का कार्य करता है
  • अधर्म – स्थिर पदार्थों की स्थिरता को बनाए रखने में जो सहायक कारण होता है वह अधर्म कहलाता है जैसे राहगीर हेतु वृक्ष की घनघोर छाया
  • पुद्गल- जड़ द्रव्य को पुद्गल कहा जाता है (जिसका संयोग होता है और विभाग होता है पुद्गल कहलाता है) पूरयन्ति गमयंन्ती च पुद्गल
  • आकाश- जो रहने के लिए स्थान प्रदान करता है आकाश कहलाता है

पुद्गल दो भागों में बंटा होता है

  • 1. अणु- किसी भी तत्व का अंतिम सरलतम अविभाज्य भाग जिसका और विभाजन संभव नहीं होता अणु कहलाता है
  • 2. संघात- दो या दो से अधिक अणुओ का मिश्रण संघात कहलाता है

काल – एकमात्र अस्तिकाय द्रव्य उत्पत्ति, विनाश, अवस्था भेद इत्यादि का मूल कारण है

जैन दर्शन में स्यादवाद

जैन दर्शन के अंतर्गत साधारणजन पर लागू होने वाला सिद्धांत है जैन दर्शन के अनुसार साधारण जन का ज्ञान देश काल और परिस्थिति से बंधे होने के कारण आंशिक, अपूर्ण तथा सापेक्ष होता है स्यादवाद कहलाता है

इसकी अभिव्यक्ति सप्तभंगीनय से होती है अर्थात स्यादवाद की अभिव्यक्ति सात प्रकार के निर्णयो से होती है जिसे सप्तभंगी नय कहते हैं

1.स्यात् अस्ति
2. स्यात् नास्ति
3. स्यात् अस्ति च नास्ति
4. स्यात् अव्यक्तम्
5. स्यात् अस्ति च अव्यक्तम्
6. स्यात् नास्ति च अव्यक्तम्
7. स्यात् अस्ति च नास्ति अव्यक्तम्

जैन दर्शन में जिन (विजेता) से तात्पर्य :-

अर्थात जिसने अपनी राग द्वेष इत्यादि इंद्रियों पर विजय अर्जित कर ली है वह जिन कहलाता है

  • तीर्थंकर :- वह पूर्ण पुरुष जो संसार रूपी भवसागर से पार उतरता है
  • निग्रंथ :- जिसकी विषयवासना रूपी ग्रंथियां खुल जाती हैं वे निग्रंथ कहलाते हैं
  • केवली :- जो भूत, वर्तमान, भविष्य तीनों कालों का ज्ञाता होता है केवली कहलाता है

तीर्थंकर                      प्रतीक चिन्ह

ऋषभदेव                      व्रक्षभ
अजीत नाथ                   हाथी
संभव                            घोडा
शांति नाथ                     हिरण
पार्शवनाथ                    सर्प फण
नेमिनाथ                       शंख
महावीर स्वामी              सिंह

जैन दर्शन में सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान ,सम्यक चरित्र, को त्रिरतन के नाम से संबोधित किया यही मोक्ष का मार्ग है  भारत के अधिकांश प्रश्नों में मोक्ष के लिए 3 मार्गों में से किसी एक को आवश्यक माना गया है ,भारत में कुछ ऐसे दर्शन भी है या मोक्ष मार्ग को सम्यक चरित्र के रूप में अपनाया गया है ,

जैन दर्शन की खूबी रही है उसने तीनों एकांगी मार्गों का समन्वय किया है  इस दृष्टिकोण से जैन का मोक्ष का मार्ग अदित्य कहा जा सकता है

Jain Darshan important facts – 

? दूसरे दार्शनिक स्कूलों के प्रति जैन दर्शन जो आदर भाव रखता है इसका कारण हे- जैन सिद्धांत स्यादवाद
? जैन दर्शन नास्तिक दर्शन की श्रेणी में रखा जाता है क्योंकि यह ईश्वर को नहीं मानता और वेद के अधिकार को नहीं स्वीकारता
? जैन विद्वानों के दृष्टिकोण से संसार की प्रत्येक वस्तु के दो रूप होते हैं स्वभावत: विभा वत:
? जिन साधनों के द्वारा हम ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं उनके सम्मिलित रूप को कहा है – प्रमाण विचार
? जैन दर्शन की वह बातें जो आस्तिक दर्शनों से मिलती-जुलती पाई जाती हैं 1 प्रत्यक्ष 2 अनुमान 3 शब्द
? किसी द्रव्य या वस्तु के अनेक धर्मों में से जितने धर्मों को जानना संभव है – 7
? इन्हें जैन दर्शन में जिस नाम से जाना जाता है वह है- सप्तभंगी नय
? समूचे जैन दर्शन का मेरुदंड जिस सिद्धांत को माना जाता है वह है- स्यादवाद

June 15, 2020

Kant’s Ethics-Freedom of Resolutions कांट का नीतिशास्त्र

कांट का नीतिशास्त्र, संकल्प की स्वतंत्रता, और दण्ड के सिद्धान्त

नीतिशास्त्र

संकल्प की स्वतंत्रता ?

तात्पर्य:-  किसी भी कर्म को करने अथवा न करने, चुनने अथवा न चुनने की स्वतन्त्रता संकल्प की स्वतन्त्रता कहलाती हैं

इसकी तीन शर्ते है:-

1. कर्म को करने की क्षमता :- यदि व्यक्ति किसी भी कर्म को करने में शारीरिक और मानसिक रूप से समर्थ नहीं है तो उस कर्म को प्रति व्यक्ति को नैतिक रूप से उत्तरदायी नही माना जा सकता है

2. ज्ञान और उद्धेश्य : – यदि कर्म अज्ञानवश अथवा बिना उदेश्य के किया जाता हैं वहाँ व्यक्ति को उस कर्म के प्रति दोषी नही माना जा सकता

उदाहरण :- क्लेप्टोमेनिया अर्थात मनोविज्ञान का एक रोग जिसमे व्यक्ति बिना उद्धेश्य के चोरी करता है, उक्त रोग से ग्रसित व्यक्ति को उस कर्म के प्रति दोषी नही माना जा सकता है

3. विकल्पों की उपस्थिति :- किसी भी कर्म को करने मर एक से अधिक विकल्पों का होना अनिवार्य होता है

संकल्प की स्वतंत्रता के साथ तीन प्रमुख सिद्धान्त है :-

1. नियतत्त्ववाद :- यह कारण कार्य से सम्बंधित है यदि हमें घटना का ज्ञान हो जाता है तो हम घटना का होने का अनुमान लगा सकते हैं और चाहे तो उसे नियंत्रित भी कर सकते हैं

2. अनियतत्त्ववाद :-  यह आकस्मिकता से सम्बंधित है जिसमे ना तो कोई किसी भी का कारण है और न ही कार्य घटनाये अपने आप उत्पन्न होती है और अपने आप ही नष्ट हो जाती है

3. देववाद / भाग्यवाद :- इसके अनुसार सब कुछ भाग्य या ईश्वर / ईश्वर के अधीन है

नोट:- उपयुक्त तीनो सिद्धान्तों में से केवल नियतत्ववाद ही संकल्प की स्वतंत्रता के साथ संगत माना जा सकता है

पूर्ववर्ती गटना की जानकारी, संकल्प की स्वतन्त्रता की व्याख्या एयर उपयुक्त तीनो सिध्दान्तों में से सबसे संगत संकल्प की स्वत्न्त्रता का सिद्धान्त है

कान्ट का नैतिक दर्शन

कान्ट नैतिक नियमो को परिणाम निरपेक्ष मानते है समस्त नैतिक नियम बौद्धिक होते है देश काल परिस्थिति से रहित अर्थात स्वतन्त्र होते हैंइच्छा भावनाओ से मुक्त रहते है नैतिक नियम परम साध्य रूप होते है

1. शुभ संकल्प :-  विशुद्ध कर्तव्य चेतना से अभिप्रेरित हो कर्म करने का दृढ निश्चय शुभ संकल्प कहलाता है शुभ संकल्प परम् साध्य है शुभ संकल्प निरपेक्ष है

2. पवित्र संकल्प :-  शुभ संकल्प से ऊपर पवित्र संकल्प माना जाता हैं किन्तु वह ईश्वर में ही सम्भव हैं मनुष्यो में इसे सम्भव नही मन जा सकता है

3. कर्तव्य :-  कान्ट का कथन – कर्तव्य के लिए कर्तव्य ( ड्यूटी फॉर ड्यूटी) अर्थात व्यक्ति को अपने कर्तव्य का पालन कर्तव्य मानकर करना चाहिए उसके प्रति किसी प्रकार के परिणाम को ध्यान में नही रखना चाहिए

कर्म तीन प्रकार के होते है-

अ) स्वयं के प्रति कर्म
ब) दुसरो के प्रति कर्म
स) विशुद्ध कर्तव्य चेतना से अभिप्रेरित कर्म – (कान्ट इन पर विशेष बल देता हैं)

नोट :- नैतिक नियमो के प्रति सम्मान की भावना से अभिप्रेरित हो कर्म करने की अनिवार्यता कर्तव्य कहलाता हैं

4. निरपेक्ष आदेश :-  कान्ट के दर्शन में आदेश शब्द में भी एक प्रकार की बाध्यता है यह बाध्यता आंतरिक बाध्यता कहलाती हैं नैतिक नियमो को सर्वभौतिक मानते हुए उन्हें हमेशा साध्य बना रहने दे और प्रयास करे कि वो साध्य की प्राप्ति का साधन न बने

कान्ट सार्वभौमिक नियमो को महत्व देता हैं नैतिक नियमो को साध्य मानता है परिणाम निरपेक्ष स्वीकार करता हैं इच्छा भावनाओ से रहित मानता हैं

कान्ट नैतिकता की तीन शर्ते स्वीकार करता है:-

1. संकल्प की स्वतन्त्रता :- “मुझे करना चाहिए अतः मै करता हूँ” संकल्प की स्वतन्त्रता

2. आत्मा की अमरता :- व्यक्ति को अपने द्वारा किये गए कर्मो का परिणाम स्वयं ही भोगना है यह तभी संभव है जब आत्मा को अमर माना जाता हैं

3. ईश्वर का अस्तित्व – अच्छे कर्मो के लिए पुरस्कार तथा बुरे कर्मो के लिए दण्ड की प्राप्ति होती हैं यह तभी सम्भव हैं जब कुशल न्यायाधीश के रूप में ईश्वर का अस्तित्व स्वीकार किया जावे

कान्ट के नैतिक दर्शन के नैतिकता के चार सूत्र है –

1. सर्वभौतिक्ता का नियम
2. मनुष्यो को साध्य मानने का नियम
3. स्वाधीनता का नियम
4. साध्यो के राज्य का नियम

नोट:- उक्त तीनों सिद्धान्त स्वतः ही चौथे सिद्धान्त में निहित हो जाते हैं

दण्ड के सिद्धान्त ( कान्ट)

समाज विरुद्ध कार्य करने पर व्यक्ति को प्राप्त होने वाली शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना दण्ड कहलाती हैं दण्ड के प्रमुख रूप से तीन सिद्धान्त है- *

1. प्रतिरोधात्मक सिंद्धांत :- इसमें मृत्युदण्ड को उचित माना जाता हैं इसमे अपराधी को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है इसके अन्तर्गत दण्ड का उद्धेश्य अपराध को रोकना हैं “तुम्हे भेड़ चुराने के लिए मृत्युदण्ड नही दिया जा रहा हैं अपितु इसलिए दिया जा रहा हैं जिससे लोग चोरी न कर सके “

2. सुधारात्मक सिद्धान्त :- इसमे मानवतावाद को महत्व दिया 

समर्थक- महात्मा गाँधी

इसके अनुसार स्वीकार किया जाता हैं कि व्यक्ति जन्म से अपराधी नही है अपितु देशकाल और बाह्य परिस्थितया इसे अपराधी बनाते हैं इसमे मृत्युदण्ड को अनुचित माना जाता हैं

दण्ड का उद्धेश्य- व्यक्ति के चरित्र में सुधार करके उसे रचनात्मक कार्यो में लगाना हैं

3. प्रतिकारात्मक सिद्धान्त :-  समर्थक – हीगल, अरस्तु, कान्ट

इसमे मृत्युदण्ड को उचित माना जाता हैं इसके अंतर्गत स्वीकार किया जाता हैं जितने अनुपात में अपराध किया गया है उतने ही अनुपात में व्यक्ति को दण्ड की प्राप्ति होनी चाहिए अथात् Tit for tait जेसे को तैसा

आँख के बदले आँख, दाँत के बदले दाँत **

नोट:- अरस्तु प्रतिकारात्मक दण्ड को निषेधात्मक पुरस्कार के रूप में वर्णित करता हैं

उक्त तीनो दण्ड सिंद्धान्तो में से मानवतावाद के साथ केवल सुधारत्मक सिद्धान्त संगत माना जा सकता है क्यों कि बाकि दो सिद्धान्तों में तो सुदजर का अवसर ही प्राप्त नही हो सकता

Kant’s Ethics-Freedom of Resolutions important facts- 

1-संकल्प स्वतंत्रता नैतिकता का आधार है यह कथन है -D.आर्की
2-स्वतंत्रता वादियों के अनुसार व्यक्ति का संकल्प निर्भर करता है – उसकी स्वतंत्र इच्छा पर
3- स्वतंत्रता वाद के अनुसार मानव का संकल्प -भौतिक घटनाओं की भांति कारण कार्य संबंध से नियंत्रित नहीं होता है
4-नियतिवाद के अनुसार मानव का संकल्प निर्धारित होता है -प्रयोजनों से
5- संकल्प की स्वतंत्रता किसे अस्वीकार करता है -मानव कर्म की पूर्व अनुमति से संगत विकल्प स्वतंत्रता को
6- मनुष्य को सजा दी गई है कि वह स्वतंत्र है – अनियतत्वो का समर्थन करता है
7-हेडोनिज्म का अर्थ है – सुखवाद
8-प्रकृति ने मनुष्य को सुख व दुख के साम्राज्य में रखा है यह कथन है -बेंथम
9- नैतिक सुखवाद का कथन है कि -हमें सदा सुख की खोज करनी चाहिए
10-सुखवाद अनुसार मानव जीवन का चरम उद्देश्य सुख है जो सर्वोच्च शुभ है यह दो मान्यताओं पर आधारित है तथा वह है -तात्विक एवं मनोवैज्ञानिक

नीतिशास्त्र नीतिशास्त्र नीतिशास्त्र नीतिशास्त्र नीतिशास्त्र नीतिशास्त्र नीतिशास्त्र नीतिशास्त्र नीतिशास्त्र

June 14, 2020

What Is Utilitarianism उपयोगितावाद क्या है???

उपयोगितावाद

उपयोगितावाद

सुखवाद ( Suicidal )

सुख प्राप्ति से तात्पर्य किसी भी कर्म / नियम को अपनाने के स्वरूप व्यक्ति को सुख की प्राप्ति होनी चाहिए दार्शनिक जे एस मिल सुख तथा आनंद को एक ही अर्थ में प्रयुक्त करता हैं अपिक्युरस शारीरिक तथा मानसिक कष्टो के अभाव को सुख कहता है

सिजविक सुख को एक मानसिक अनुभूति मानता है  ऐसी अनुभूति जिसकी हमको इच्छा करनी चाहिए

सुखवाद दो प्रकार का होता हैं :-

  1. नेतिक सुखवाद
  2. मनोवेज्ञानिक सुखवाद

1. नेतिक सुखवाद :- यह दो प्रकार का होता है

(अ) स्वार्थमूलक
(ब) परार्थ/ सरवार्थ मूलक :- इसे उपयोगितावाद भी कहते है

नोट:- नैतिक सुखवाद में चाहिये शब्द की व्याख्या होती हैं

इसके अनुसार सुख परम् साध्य है और हमे समस्त कर्म सुख प्राप्ति के लिए करने चाहिये

2 मनोवेज्ञानिक सुखवाद :- यह ‘है’ शब्द की व्याख्या करता है

इसके अनुसार व्यक्ति अपने स्वभाव, गुण, और प्रवर्तीयो से सुख प्राप्ति की इच्छा करता है

नोट :- सरवार्थ(परार्थ) मुलक नैतिक सुखवाद ही उपयोगितावाद कहलाता है

उपयोगितावाद ( Utilitarianism )

तात्पर्य :- किसी भी कर्म अथवा नियम को अपनाने के परिणाम स्वरूप अधिकतम व्यक्तियो को अधिकतम सुख की प्राप्ति होनी चाहिए

कर्म सम्बंधी उपयोगितावाद – करने योग्य बहुत से कर्मो में से उसी कर्म का महत्व है जिसे करके अधिकतम व्यक्तियो को अधिकतम सुख की प्राप्ति होती है यह नैतिक नियमो को लेश मात्र भी महत्व नही देता

नियम सम्बंधी उपयोगितावाद :- इसमे केवल नैतिक नियमो को महत्व दिया जाता है जैसे- सत्य बोलना

सुखमूलक उपयोगितावाद –  समर्थक बेन्थम, जे एस मिल, सिजविक
इसके अंतर्गत केवल सुखो के औचित्य को महत्व दिया जाता है

आदर्श मूलक उपयोगितावाद :- समर्थक हेनरी रेशगेल
इसके अनुसार केवल सुख ही जीवन का मापदण्ड नही है अपितु ज्ञान, चरित्र, जीवन की श्रेष्ठता, सदगुण आदि भी इसमे शामिल है

बेन्थम का उपयोगितावाद ( Utilitarianism of bentham )

1. सुखमूलक उपयोगितावाद – बेन्थम के अनुसार किसी भी कर्म अथवा नियम को अपनाने के परिणामस्वरूप अधिकतम व्यक्तियो को अधिकतम सुख की प्राप्ति होनी चाहिए

2. मनोवैज्ञानिक सुखवाद – बेन्थम के शब्दों में प्रकृति ने मनुष्य को सुख तथा दुःख दो शक्तियो के अधीन किया है व्यक्ति अपने स्वभाव से सुख की इच्छा करता ह और दुःख से निवर्ति की कामना करता है

3. सुखो में केवल मात्रात्मक (परिमाणात्मक) भेद :- बेन्थम गुण की द्रष्टी से सभी सुखो को एक समान मानता ह किन्तु मात्रा अथवा परिमाण की दृष्टि से उनमे भेद स्वीकार करता है

4. सुखकलन का सिद्धान्त :-  सुखो के मध्य परिमाण को मापने के लिए बेन्थम सुखकलन का सिद्धान्त प्रतिपादित करता है सुखकलन में सात मापदण्ड है :- अवधि, तीव्रता, निश्चितता, निकटता, विशुद्धता, उत्पादकता, और व्यापकता

नोट:- व्यापकता का मापदण्ड बेन्थम को स्वार्थमूलक सुखवाद की अपेक्षा सरवार्थमूलक (उपयोगितावाद) की और ले जाता है

5. नैतिकता के पालन में चार बाह्यिय अथवा भौतिक दबाव :-

अ) भौतिक दबाव :- शारीरिक सुरक्षा से सम्बंदित
ब) राजनेतिक दबाव – कानून से सम्बंधित
स) सामाजिक दबाव – समाज के नियमो से सम्बंधित
द) धार्मिक दबाव – ईश्वर के नियमो से सम्बंधित

जे एस मिल का उपयोगितावाद ( JIS Mill’s Utilitarianism )

1. सुखमूलक उपयोगिता :-  जिसके अनुसार कर्म अथवा नियम को अपनाने के परिणाम स्वरूप अधिकतम व्यक्तियो को अधिकतम सुख की प्राप्ति होनी चाहिए

2. नैतिक सुखवाद की व्याख्या मनोवैज्ञानिक सुखवाद के आधार पर :- मिल के अनुसार श्रवणिय शब्द का अर्थ ह वास्तव में उसे लोग सुनते है  दर्शनीय शब्द का अर्थ है – वास्तव में लोग उसे देखते है
वांछनीय शब्द का अर्थ है :- की वास्तव में लोग उसकी इच्छा करते है या रखते है

3. सुखो के मध्य परिमाण ( मात्रात्मक) के साथ – साथ गुणात्मक भेद भी :-  जे एस मिल परिमाणात्मक भेद के साथ साथ सुखो के मध्य गुणात्मक भेद भी स्वीकार करता है

4. इंद्रियपरक भौतिक सुख की अपेक्षा बौद्धिक सुख अधिक श्रेष्ठ होता है :-  मिल के शब्दों में एक सन्तुष्ट शुकर (सूअर) होने की अपेक्षा असन्तुष्ट मनुष्य होना अधिक अच्छा है  एक सन्तुष्ट पागल होने की अपेक्षा असन्तुष्ट सुकरात होना अधिक अच्छा है  अर्थात इंद्रियपरक भौतिक सुख की अपेक्षा बौद्धिक सुख अधिक श्रेष्ट होता है

5. नैतिकता के पालन में पाँच दबाव :-

अ) भौतिक दबाव
ब) राजनैतिक दबाव
स) सामाजिक दबाव
द) धार्मिक दबाव
य) आंतरिक दबाव :- इसे मिल अंतरात्मा की आवाज कहता है

नोट :- उपरोक्त पाँच दबावों में बेन्थम और मिल के चार दबाव समान है

6. न्याय की व्याख्या :-
मिल के अनुसार व्यक्तित्व का सम्मान ही न्याय है मिल के शब्दों में जो व्यवहार आप दुसरो के द्वारा अपने प्रति चाहते है वही व्यवहार अपने पड़ोसियों से कीजिये अर्थात हमे सभी के व्यक्तित्व का सम्मान करना चाहिये

बेन्थम और मिल में अंतर

  • बेन्थम स्थूल सुखवादी है जबकि मिल परिष्कृत सुखवादी ह
  • बेन्थम सुखो में केवल मात्रात्मक ( परिमाणात्मक) भेद स्वीकार करता है जबकि मिल मात्रात्मक के साथ साथ गुणात्मक भेद भी स्वीकार करता है
  • बेन्थम नैतिकता के चार दबाव स्वीकार करता है जबकि। मिल पाँच दबाव स्वीकार करता है

सुखवाद का विरोधाभाष

प्रतिपादक :- सिजविक

इनके अनुसार व्यक्ति वास्तव में सुख की इच्छा नही करता है अपितु वस्तु की इच्छा करता है  अर्थात भूख लगने पर भोजन की इच्छा की जाती ह उससे प्राप्त होने वाले सुख अथवा आनंद की नही  सुख को प्राप्त करने के लिए सुख को भूलना ही अत्यंत आवश्यक हैं

Utilitarianism ( उपयोगितावाद ) important facts- 

1- उपयोगितावाद के अनुसार अपराधी को जो दंड दिया जाता है वह वैसा अपराध करने वालों को रोकता है
2- अपराध विज्ञान कहता है मानसिक अथवा शारीरिक विकार के कारण व्यक्ति स्वता ही अपराध हो जाते हैं
3- फ्राइड का मानना है मानव मन के अचेतन भाग में दबी हुई इच्छाओं के कारण अपराध होते हैं
4- प्रतिकार वाद का सिद्धांत का आधार है – न्याय
5- स्वतंत्रता वाद के अनुसार कर्म का दायित्व करता पर होता है क्योंकि कर्म करने के लिए स्वतंत्र होता है
6- मनुष्य स्वतंत्र होने के लिए अभिशप्त है –
7- सुखवाद का आदि संस्थापक कौन था – हेराक्लीटस
8-नैतिक सुखवाद के कितने प्रकार हैं – 4
9-सभी सुखी हों सभी निरोगी हो सभी शुभ दर्शन करें और कोई दुखी ना हो यह शांति पाठ किस वेद में उद्धृत है -यजुर्वेद
10- सब पदार्थ संख्या मात्र है एवं संगीत मानसिक दोष को दूर करने का साधन है -पाइथोगोरस

June 13, 2020

Aristotle’s Ethics अरस्तु का नीतिशास्त्र क्या है???

Aristotle’s Ethics अरस्तु का नीतिशास्त्र

अरस्तु

पाश्चात्य नीतिशास्त्र का प्रथम लिखित ग्रंथ अरस्तु रचना निकोमेकियन एथिक्स है

अरस्तु द्वारा सद्गुणों का विभाजन :-

  • बौद्धिक :- विवेक
  • नैतिक :- मैत्री, साहस, संयम, न्याय, दया, सहानुभूति, ममता

अरस्तु_के अनुसार विवेक एकमात्र बोद्धिक सदगुण है जबकि साहस संयम न्याय नैतिक सद्गुण के अंतर्गत आते हैं मैत्री (मित्रता) एक नैतिक सद्गुण है इसके अतिरिक्त सहानुभूति, दया, ममता इत्यादि बोद्धिक सदगुण के अंतर्गत माने जाते हैं अरस्तु_का सद्गुण विषय सिद्धांत मध्यम मार्ग (गोल्डन मीन) कहलाता है

जिसके अनुसार प्रत्येक नैतिक सद्गुण एकांतिक मतों की मध्य की अवस्था है अर्थात ना तो पूर्णतः अपना सर्वस्व त्याग करना अथवा वैरागी होना, ना ही पूर्णतः भोग इत्यादी मैं लिप्त रहना उक्त दोनों के मध्य की अवस्था संयम कहलाता है

अरस्तु_न्याय को समान वितरणात्मक प्रणाली के रूप में स्वीकार करता है जिसके अनुसार समाज का जो वर्ग जितना असहाय और कमजोर है उसे उन्नति और विकास के उतने ही अधिक अवसर प्राप्त होने चाहिए यही कारण है_अरस्तु दंड को निषेधात्मक पुरस्कार के रुप में स्वीकार करता है

प्लेटो_व अरस्तु के नीति शास्त्र में अंतर

  • प्लेटो_ने मुख्य सद्गुण का सिद्धांत दिया जबकि अरस्तू ने मध्यमार्ग का सिद्धांत दिया
  • प्लेटो_ने सद्गुणों का विभाजन बौद्धिक और अबौद्धिक आधार पर किया जबकि अरस्तू ने सद्गुण का विभाजन बौद्धिक और नैतिक आधार पर किया
  • प्लेटो_न्याय को हस्तक्षेप की नीति के रुप में दर्शाता है जबकि_अरस्तु का न्याय समान वितरणात्मक प्रणाली है
  • प्लेटो_के अनुसार सद्गुण केवल चार होते हैं विवेक, साहस, संयम और न्याय जबकि अरस्तु ने मैत्री, सहानुभूति, दया, ममता आदि नैतिक सद्गुण भी माने हैं

q w e r t y u i o p l k j h g f d s a z x c v b n m l k j h g f d s z x c v b n m mn b v c h g f h h I I kg s d

June 12, 2020

Greek Ethics General ग्रीक एथिक्स सामान्य परिचय

ग्रीक एथिक्स सामान्य परिचय

ग्रीक एथिक्स / पाश्चात्य नितिशात्र

ग्रीक एथिक्स

एथिक्स शब्द की उत्पत्ति यूनानी / ग्रीक भाषा के एथोस शब्द से हुई ह जिसका अर्थ है परंपरा /रीति रिवाज

एथिक्स(नितिशात्र) का संबंध मानवीय आचरण से माना जाता है नीतिशास्त्र एक आदर्श मूलक विज्ञान है नीतिशास्त्र चाहिए शब्द की व्याख्या करता है नीतिशास्त्र (एथिक्स) ऐच्छिक कर्मो का मूल्यांकन करता है

कर्म दो प्रकार के होते हैं

  1. ऐच्छिक कर्म- जिन पर मनुष्यों का नियंत्रण रहता है
  2. अनैच्छिक कर्म- वे कर्म जिन पर मनुष्य का कोई नियंत्रण नहीं रहता जैस ह्रदय गति श्वास आदि

नीतिशास्त्र मानवीय कर्मों का मूल्यांकन करता है नीतिशास्त्र सामान्य मनुष्य के कर्मों का मूल्यांकन करता है पागल तथा बच्चों के कर्मों का नीतिशास्त्र मूल्यांकन नहीं करता है

नीतिशास्त्र कर्म अथवा चरित्र का मूल्यांकन करता है नीतिशास्त्र को दो भागों में विभाजित किया गया है

1. आदर्श मूलक नीतिशास्त्र – समर्थक सुकरात प्लेटो अरस्तु

इसके अनुसार नीतिशास्त्र का कार्य केवल नैतिक मापदंडों की स्थापना करना है

2. अधिनीतिशास्त्र या आधुनिक नीतिशास्त्र- 

यह आधुनिक विद्या है जिसके अनुसार नीतिशास्त्र का कार्य नैतिक शब्दों का विश्लेषण करना है

प्लेटो 427 -347 B. C.

यह ऐन्थेस का नागरिक था  इसने अफलातून कहा गया है  प्लेटो ने ऐकेडमी नामक विद्यालय की स्थापना की 

प्लेटो के तीन ग्रंथ बहुत प्रसिद्ध हुए :- यूटोपिया, रिपब्लिक, व लाॅज
यूटोपिया मे प्लेटो ने आदर्श राज्य रिपब्लिक मे दार्शनिक राज्य व लाॅज मे कानून की बात कही है

प्लेटो_के अनुसार राज्य को अपने नागरिको पर नियंत्रण रखना चाहिए  प्लेटो संसार को भौतिक न मानकर आध्यात्मिक बताता है किन्तु उसने जगत को मिथ्या बताया है प्लेटो स्त्रियो को अधिकार देने की बात भी करता है

प्लेटो_का सद्गुण संबंधि मत प्लेटो के अनुसार जिससे आत्मा को श्रेष्ठता प्राप्त होती है वह सद्गुण माने जायेगे

प्लेटो_के अनुसार प्रत्ययों का जगत:- यह सिद्धांत निति शास्त्र से सम्बंधित नहीं हे। यह तत्व मीमांषा से सम्बंधित हे ।प्लेटो ने वास्तविक ज्ञान का स्वरूप समझने के लिए प्रत्ययों का सिद्धान्त दिया।

✍ प्लेटो कहता हे की भौतिक जगत व मानसिक जगत के आलावा प्रत्ययों का जगत भी हे प्लेटो कहता हे की भौतिक जगत व मानसिक वास्तव में प्रत्ययों की छाया मात्र हे। उसके अनुसार प्रत्ययो के जगत के बारे में जान पाना प्रत्येक व्यक्ति के लिए सम्भव नहीं ,इस दुनिया में कुछ प्रतिभावान व्यक्ति व निरंतर परिश्रम करने वाले व्यक्ति ही प्रत्ययों के जगत के बारे में जान सकते हे।

प्लेटो मुख्यतः चार सद्गुण स्वीकार करता है

  1. विवेक
  2. साहस
  3. संयम
  4. न्याय

प्लेटो_के दर्शन में सर्वोच्च सदगुण न्याय है न्याय अहस्तक्षेप की नीति है  अर्थात समाज में रहकर अपने किए नियत सद्गुणों का समुचित रुप से पालन करना और दूसरों के कार्यों में हस्तक्षेप न करना ही न्याय है

प्लेटो_की उक्त अवधारणा भारतीय दर्शन में गीता के स्वधर्म से समानता रखती है न्याय की अवधारणा ब्रैडले के सिद्धांत मेरा स्थान और उसके कर्तव्य से समानता रखता है

प्लेटो_न्याय के दो भागों में विभाजित करता है

  • 1. सामाजिक न्याय का सिद्धांत
  • 2. व्यक्तिगत न्याय का सिद्धांत

प्लेटो संपूर्ण समाज को प्रमुख रूप से तीन वर्गों में विभाजित करता है

प्लेटो के दर्शन में राज्य व समाज को एक ही बताया गया हे। प्लेटो राज्य व समाज में व्यक्तियो की तिन श्रेणियां बताता हे इन श्रेणियों को प्लेटो ने कृत्रिम न बताकर प्राकृतिक बताया हे-

  • 1. प्रशासक वर्ग में विवेक रूपी सदगुण होना चाहिए
  • 2. सैनिक / योद्धा वर्ग में साहस
  • 3. कृषक/ मजदूर/ सर्वहारा वर्ग में संयम

A- राज्य व समाज में प्रथम श्रेणी के वे लोग होते हे जिनकी विवेक मूलक आत्मा सर्वाधिक विकसित होती हे ऐसे लोग राजा का कार्य करते हे(प्लेटो ने राजा को दार्शनिक राजा गार्जियन कहा हे)

B- राज्य व समाज में दूसरी श्रेणी के वे लोग होते हे जिनकी भावना मूलक आत्मा सर्वाधिक विकसित होती हे , वे लोग सेनिक का कार्य करते हे।

C- राज्य व समाज में तीसरी श्रेणी के वे लोग होते हे जिनकी इच्छामुल्क आत्मा सर्वाधिक विकसित होती हे ये लोग नागरिक का जीवन व्यतीत करते हे।

✍ प्लेटो के अनुसार जिस राज्य में विवेक वान लोग शाशक हो और शाहसि लोक सेनिक हो व नागरिक संयम का जीवन व्यतीत करते हो उस राज्य को न्याय का एक अतिरिक्त सद्गुण प्राप्त हो जाता हे।

उक्त तीनों वर्ग जब अपने लिए नियत कर्तव्यों का समुचित रुप से पालन करते हैं तब समाज में स्वतः ही न्याय की उत्पत्ति होती है न्याय सर्वोपरि है क्योंकि यह अन्य सभी सद्गुणों के मध्य संतुलन तथा सामंजस्य की स्थापना बनाए रखता है

प्लेटो मानवीय आत्मा को प्रमुख रूप से तीन भागों में विभाजित करता है

(A) बौद्विक

(B) अबौद्विक

(1) भावनात्मक

(2) वासनात्मक

अर्थात मानवीय आत्मा (1) बौद्विक, (2) भावनात्मक, (3) वासनात्मक तीन भागों में विभाजित है

प्लेटो के दर्शन में न्याय विधिगत नहीं है अपितु यह नैतिक है क्योंकि विधि में न्याय बाह्य आरोपित शक्तियों से बाधित रहता है जबकि प्लेटो के दर्शन में यह है अंतरात्मा की आवाज है न्याय की अवधारणा विशेषीकरण का सिद्धांत है

प्रसिद्ध रचना – रिपब्लिक

प्लेटो की पुष्तक:-

  1. यूटोपिया
  2. रिपब्लिक
  3. लॉज

प्लेटो का सद्गुण विषयक सिद्धांत मुख्य सदगुण के नाम से जाना जाता है

ग्रीक एथिक्स ग्रीक एथिक्स

June 11, 2020

Rene Descartes-Cartesian System रेने देकार्ते-कार्टिशियन पद्दति

रेने देकार्ते-कार्टिशियन पद्दति

रेने देकार्ते

रेने देकार्ते फ्रांस के तुरेन शहर के निवासी थे रेने देकार्ते को बुद्धिवाद और आधुनिक दर्शन का जनक कहा जाता है देकार्त के दर्शन में यथार्थ ज्ञान प्राप्ति का माध्यम सुस्पष्टता तथा सुभिन्नता दिखाई देता है

डेकार्ट बुध्दिवादी, वस्तुवादी, उग्रदैतवादी, सन्देहवादी, ईश्वरवादी, सकल्पस्वत्रंतवादि, अनेकतावादी अन्तक्रियावादी दार्शनिक माना जाता है

डेकार्ट की प्रणाली को संश्यात्मक प्रणाली के नाम से जाना जाता है  डेकार्ट ने गणित विषय के आधार पर अपने दर्शन का निर्माण किया

देकार्त यथार्थ ज्ञान प्राप्ति के दो साधन स्वीकार करते हैं

  • प्रतिभान- हमारी आत्मा में अवस्थित सुस्पष्ट तथा सुभिन्न सार्वभौमिक यथार्थ ज्ञान प्रतिभान कहलाता है अर्थात आत्मा में अवस्थित स्वतः सिद्ध ज्ञान
  • निगमन- प्रतिभान को अभिव्यक्त करने का साधन मार्ग निगमन कहलाता है

रेने देकार्ते की दार्शनिक पद्धति कार्टिशियन पद्धति के नाम से जानी जाती है व इसे संदेह की पद्धति भी कहा जाता है

कार्टिशियन पद्धति (संदेह पद्धति )में देकार्त चार सुत्रों की सहायता लेता है

  1. लक्षण सूत्र – किसी भी समस्या पर तब तक संदेह करते जाना चाहिए जब तक की संदेह रहीता की प्राप्ति नहीं हो जाती है
  2. विश्लेषण सूत्र- समस्या को छोटे-छोटे सरल भागों में विभाजित करना विश्लेषण सूत्र कहलाता है
  3. संश्लेषण सूत्र- सरल से जटिल की ओर जाना संश्लेषण सूत्र कहलाता है
  4. समाहार सूत्र- समस्या को सिद्धांत से पहले पुनः अवलोकन करना कि कहीं उसका कोई भाग छूट तो नहीं गया है समाहार सूत्र कहलाता है

देकार्त का प्रसिद्ध कथन

मैं संदेह करता हूं अतः मैं हूं फ्रांसीसी भाषा में  cogito ergo sum

देकार्त कार्टिशियन पद्धति से संदेह रहित आत्मा की स्थापना करते हैं जिसे डेकार्ट बुद्धि भी कहता है

देकार्त के अनुसार आत्मा :-

सरल अथवा अविभाज्य है अभौतिक तथा अविस्तारित है चेतन द्रव्य है आत्मा का निवास मस्तिष्क में विद्यमान पीनियल ग्रंथि में है

देकार्त तीन प्रकार के जन्मजात प्रत्यय स्वीकार करता है :-

  • ईश्वर
  • आत्मा
  • जड़ (जगत)

जन्मजात प्रत्यय की परिभाषा :-

जन्मजात प्रत्यय वह कहलाता है जिसमें कुछ ज्ञान हमारी आत्मा / बुद्धि में जन्म से ही सिद्ध रहता है जिसे सिद्ध करने के लिए बाह्य तथ्यों और अनुभवों की आवश्यकता नहीं होती है

ईश्वर के अस्तित्व हेतु देकार्त 4 प्रमाण प्रस्तुत करता है:-

  1. सत्तामूलक प्रमाण- उक्त प्रमाण में ईश्वर के प्रत्यक्ष अथवा विचार नहीं ईश्वर का अस्तित्व भी सिद्ध मान लिया जाता है
  2. कारण मुलक युक्ति का प्रमाण- ईश्वर के प्रत्यय का कारण स्वयं ईश्वर को ही स्वीकार किया जाता है
  3. विश्व मुलक प्रमाण- उक्त प्रमाण में ईश्वर को विश्व का रचयिता माना जाता है
  4. उद्देश्य मूलक प्रमाण- उक्त प्रमाण जगत में संगठन संतुलन तथा व्यवस्था का आधार ईश्वर को ही मानता है

देकार्त द्वेतवादी है जो जगत की उत्पत्ति में 2 मूलभूत स्वतंत्र तत्वों के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं

  1. आत्मा / चित्त
  2. शरीर / अचित

अर्थात चित्त – अचित्त या जड़ पदार्थ

मन और शरीर की समस्या के समाधान में देकार्त क्रिया-प्रतिक्रियावाद अथवा अंतः क्रियावाद के सिद्धांत को स्वीकार करता है जिसके अनुसार मस्तिष्क में विद्यमान पीनियल ग्रंथि में हमारी आत्मा निवास करती है और यही से पूरे शरीर से विस्तारित होती है
परिणामस्वरुप शारीरिक क्रियाएं मन को और मानसिक क्रियाए शरीर को प्रभावित करती हैं

बुद्धिवाद :-

  1. इसमें ज्ञान प्राप्ति का साधन हमारी आत्मा अथवा बुद्धि को माना जाता है
  2. इसमें ज्ञान सार्वभौमिक रूप से स्वीकार किया जाता है
  3. इसके अंतर्गत ज्ञान को आत्मा के अंतर्गत जन्मजात रुप से स्वीकार किया जाता है
  4. बुद्धिवाद में गणित को आदर्श विषय के रूप में स्वीकार किया जाता है

देकार्त दर्शन का उद्देश्य

सार्वभौमिकता, सुस्पष्टता, सुभिन्नता तथा संदेहरहिता की प्राप्ति करना था, देकार्ते जगत, तथ्य, जगत की वस्तुएं, इंद्रिय, शरीर आदि सभी पर संदेह करता है, संदेह के लिए संदेह करना की आवश्यकता होती है, संदेह कर्ता के रूप में जिस तत्व का अस्तित्व सिद्ध होता है वह तत्व मैं अथवा आत्मा कहलाता है

देकार्त के दर्शन में संदेह की पद्धति संदेह रहित जिस तत्व की स्थापना करती है वह तत्व चेतन द्रव्य के रूप में आत्मा माना जाता है देकार्त के दर्शन में संदेह केवल प्रारंभ है अंत नहीं है संदेह को देकार्त केवल साधन के रुप में अपनाता है इसे साध्य नहीं माना जा सकता

देकार्त की रचनाएं

  1. डायरेक्शन ऑफ माइंड (बुद्धि के निर्देश)
  2. डिस्कोर्स ऑन मेथड्स
  3. ली मोडे (LE MONDE)
  4. मैडिटेशन ऑफ़ फर्स्ट फिलॉस्फी
  5. दर्शन के मूलभूत सिध्दांत

Note :- डेकार्ट की दार्शनिक प्रणाली का उल्लेख ” बुध्दि के निर्देश नियम ” मे मिलता है

Cartisian method ( कार्टिशियन पद्दति )

दर्शन के क्षेत्र में सर्वप्रथम देकार्ते ने हीं वैज्ञानिक प्रणाली को जन्म दिया देकार्ते के पूर्व दर्शन अंधविश्वास रूढ़िग्रस्त परंपराओं से ग्रसित था दर्शन पर धर्म का आधिपत्य होने से दर्शन का सही मूल्यांकन नहीं हो पाता जनता की चित्र शक्तियां स्वतंत्र नहीं थी

देकार्ते ने स्वयं कहा है हम प्लेटो तथास्तु को पढ़कर दर्शन नहीं हो सकते यदि हम स्वतंत्र निर्णय नहीं कर सकते , बेकन के समान देकार्ते ने भी अनुभव किया है कि पुराने ग्रंथियों को हटाकर नए सिरे से दर्शन की न्यू डालनी चाहिए

गणित में निश्चयात्मक है उसके सिद्धांत निर्माताओं ने संदेश सत्य है, दर्शन का लक्ष्य सत्य की खोज सत्य दो रूप होते हैं स्वयं सिद्ध तथा प्रमाण जनय़, दार्शनिक पद्धति है संध्या की किंतु देकार्ते संदेहवादी नहीं है बुद्धिवादी

जब तक किसी बात को मैं जान ले तब तक हमें उसे सत्य स्वीकार नहीं करना चाहिए  व्यवहार के संबंध में देकार्ते ने निम्न नियमों को बताया है

1- स्वदेश और धर्म के नियमों को परंपराओं द्वारा प्रचलित मध्यमार्ग को अपनाना
2 एक

डेकार्ट के चार दार्शनिक नियम 

1 किसी चीज को तब तक सत्य नही मानना चाहिए जब तक उनका स्पष्ट एव परिस्षिट ज्ञान न हो जाय
2 समस्या का सरलतम टुकडो मे विश्लेषण करना चाहिए
3 सबसे पहले समस्या के सरल एव मूल तत्वो को ध्यान करते हुए आगे बढना चाहिए
4 निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सर्वांगीण एव परीक्षण आवश्यक है

June 10, 2020

Socrates Method सुकरात पद्धति क्या हे???

सुकरात पद्धति

सुकरात 469-399 B.C – आज से करीब 2300 साल पहले एथेंस के बहुत ही गरीब परिवार में सुकरात का जन्म हुआ ये युनान के ऐन्थेस का नागरिक था , ये दार्शनिक के अलावा एक शूरवीर सैनिक भी था, इन्होंने प्रश्नोत्तर विधि द्वारा शिक्षा देने का काम किया सुकरात वास्तविक विशेष सामान्य को मानते थे 

सामान्य- एक ही जाति की अलग अलग वस्तु विशेषो में निहित सार गुणों को सामान्य कहा जाता है  सुकरात ने सामान्य को संप्रत्यय कहा है

सुकरात के दर्शन का मूलमंत्र है :- अपने आप को पहचानो 

संसार की सारी बातो के लिए सुकरात ने कहा :- मै कुछ नही जानता

सुकरात सभी मनुष्यों में सर्वाधिक बुद्धिमान है यह धर्म वाणी हुई थी, सुकरात द्वारा कोई पुस्तकें नहीं लिखी गई है इसका ज्ञान प्लेटो की रचनाओ से पता चलता है

गौतम बुद्ध की तरह सुकरात ने भी किसी ग्रंथ की रचना नहीं की बुद्ध के शिष्यों ने उनके जीवन काल में ही उद्देश्यों को कंठस्थ करना प्रारंभ किया था जिससे हम उनके उद्देश्यों को बहुत खुशी दे तो तो जान सकते हैं किंतु सुकरात के उद्देश्यों के बारे में यह भी सुविधा उपलब्ध नहीं है

सुकरात का दर्शन दो भागों में विभक्त किया जा सकता है पहला सुकरात का गुरु शिष्य यथार्थवाद तथा दूसरा अरस्तु का प्रयोगवाद

“”सच्चा ज्ञान संभव है बशर्ते उसके लिए ठीक तौर पर प्रयत्न किया जाए; जो बातें हमारी समझ में आती हैं या हमारे सामने आई हैं, उन्हें तत्संबंधी घटनाओं पर हम परखें, इस तरह अनेक परखों के बाद हम एक सचाई पर पहुँच सकते हैं। ज्ञान के समान पवित्रतम कोई वस्तु नहीं हैं

सुकरात के प्रमुख कथन

  • मुझे अपने अज्ञान का ज्ञान है
  • मैं कुछ नहीं जानता
  • ज्ञान ही सद्गुण है
  • ज्ञान ही सद्गुण है और सद्गुण ही ज्ञान है

सुकरात_की दार्शनिक पद्धति वार्तालाप की पद्धति कहलाती है इसे प्रसाविका अथवा धात्री विधि भी कहा जाता है प्रसाविका जिसके द्वारा सब कुछ उत्पन्न होता है धात्रि अर्थात धारण करने वाली

सुकरात_के अनुसार सद्गुण पहलासद्गुण है ज्ञान परन्तु यहा ज्ञान से तात्पर्य आत्मज्ञान से है अर्थात ऐसा ज्ञान जिसे आत्मा को सन्तुष्टी मिले न की इन्द्रियो को

सुकरात की सॉक्रेटिक पद्धति

1- सॉक्रेटीस पद्धति एक संदेह की पद्धति है
2- सॉक्रेटीस पद्धति प्रश्न उत्तर पद्धति थी जिसका शिक्षात्मक महत्व था
3- सॉक्रेटीस पद्धति प्रत्यात्मक अथवा परिभाषा आत्मक है
4- इस पद्धति के मुख्य विशेषता हमारे प्रतिदिन के अनुभव से है
5- सॉक्रेटीस पद्धति आगमनात्मक के साथ निगमनात्मक भी है

सुकरात पद्धति के प्रमुख तत्व

  • संदेह की पद्धति
  • बातचीत / वार्तालाप की पद्धति
  • द्वंद्वात्मक पद्धति
  • निगमनात्मक पद्धति
  • आगमनात्मक पद्धति
  • परिभाषात्मक / धारणानात्मक पद्धति

1. संदेह की पद्धति

सुकरात अपने दर्शन का प्रारंभिक संदेह से करता था  प्रत्येक तथ्य पर सुकरात के द्वारा संदेह किया जाता था कहा जाता है सुकरात के दर्शन का प्रारंभिक संदेह ऐसे होता है किंतु समाधान दिखलाई देता है

2 बातचीत / वार्तालाप पद्धति

सुकरात बातचीत / वार्तालाप की पद्धति को अपनाते हुए सही निष्कर्ष पर पहुंचते थे

3. द्वंदात्मक पद्धति

सुकरात की पद्धति वाद-विवाद समन्वय के रूप में अर्थात पक्ष प्रतिपक्ष तथा समन्वय के रूप में दिखाई देती है

4. निगमनात्मक पद्धति

सामान्य से विशेष का निष्कर्ष निकालना निगमनात्मक पद्धति कहलाती है जैसे सभी मनुष्य मरणशील है क्योंकि सुकरात एक मनुष्य है या राम एक मनुष्य है राम मरणशील है अतः सुकरात भी मरणशील है

5. आगमनात्मक पद्धति

विशेष से सामान्य की ओर निष्कर्ष निकालना आगमनात्मक पद्धति कहलाती है जेसे:- एक कौवा दो… तीन कौवा काले हैं अतः सभी को काले हैं

6. परिभाषात्मक/ धारणानात्मक पद्धति

सार्वभौमिक वस्तुनिष्ठ ज्ञान की प्राप्ति धारणात्मक अथवा परिभाषात्मक पद्धति के नाम से जानी जाती है इसी के आधार पर नैतिक पदों की रचना की जाती थी सुकरात सौंदर्य, न्याय, मनुष्यता इत्यादि सभी को परिभाषा या धरणा मानता था

उदाहरण – दया, सहानुभूति, न्याय आदि की सर्वप्रथम एक निरपेक्ष तथा सार्वभौमिक ज्ञान की प्राप्ति हेतु सर्वमान्य परिभाषा का प्रयोग किया जाता था सुकरात ज्ञान को सर्वोच्च सद्गुण मानते हैं और ज्ञान का अर्थ सार्वभौमिक निरपेक्ष वस्तुनिष्ठ ज्ञान के रूप में स्वीकार करते हैं

नोट:- ज्ञान की शिक्षा ली जा सकती है और ज्ञान से सदगुण प्राप्त किया जा सकता ह अतः ज्ञान और सदगुण दोनों प्राप्य ह

ज्ञान से तात्पर्य

बुद्धि का वह व्यापार है जो शुभ को अशुभ से उचित को अनुचित से यथार्थ को अयथार्थ से भेद कराता है_सुकरात दर्शन का उद्देश्य तत्व ज्ञान की प्राप्ति था सुकरात_नैतिक तथा व्यवहारिक जीवन को प्रयोजनमूलक बनाना चाहते थे

सुकरात_का दर्शन सैद्धांतिक पक्ष की अपेक्षा व्यवहारिक पक्ष को अधिक महत्व देता है सुकरात_सामान्य ज्ञान को अधिक महत्वपूर्ण स्वीकार करता है अर्थात विशेषो के मध्य से उसकी जाति अथवा सार्वभौतिक धर्म को स्वीकार करना सामान्य कहलाता है

उदाहरण :- मनुष्यों में मनुष्यत्व का ज्ञान प्राप्त करना

नोट:- सदगुणो की एकता का सिध्दान्त_सुकरात ने दिया था

Note :- अरस्तू के अनुसार सुकरात_का सद्गुण संबंधि मत अर्धसत्य है

विज्ञान वाद का सिद्धांत अपने मूल रूप से सॉक्रेटीस का है और प्लेटो ने इसका विकास करके इसे विशेष रूप दिया

1- सुकरात_के अधूरे कार्य को उसके शिष्य अफलातून अरस्तु ने पूरा किया
2- सुकरात_के दर्शन को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है
3- सुकरात_का विज्ञान वाद का सिद्धांत प्लेटो का फिडो से मिलता है
4- प्लेटो इंद्रिय जगत को विज्ञान जगत की अभिव्यक्ति कहना उचित समझते थे
5- सुकरात_तरुणों को बिगाड़ने का ,देव निंदा करने का, नास्तिक होने का आरोप लगा था
6- सुकरात_को जहर पीने की सजा दी गई थी
7- सुकरात_के समसामयिक से सूफी समझते थे
8- सुकरात_का कथन है ज्ञान के समान पवित्र तम कोई वस्तु नहीं है
9- सुकरात_के अनुसार जीवन का उद्देश्य है शुभ की खोज
10- सुकरात_के दर्शन का उद्देश्य था नैतिक पक्ष और वैज्ञानिक पक्ष

June 9, 2020

Vedas Upanishad Concept वेद और उपनिषद की अवधारणा

वेद और_उपनिषद की अवधारणा

वेद ( Vedas )  

वेद_शब्द विद धातु से बना है जिसका अर्थ है जानना वेद का सामान्य अर्थ है -ज्ञान

वेंदो को श्रुति ग्रन्थ भी कहा जाता हे वेदिक ज्ञान को साक्षात् तपोबल के आधार पर ऋषिमुनियों के द्वारा सुना गया व इसी ज्ञान को प्रारम्भ में मौखिक रूप से ऋषिमुनियों ने अपने शिष्यो को दिया था।

वेदों को अपौरुषेय भी कहा गया क्योकि वेदों की रचना इसवरिय प्रेरणा के आधार पर ऋषि मुनियो ने की । वेदों को सहिता ग्रन्थ भी कहा जाता हे । वेदों में अलग -अलग काल में रचे गए ऋषि मुनियो के मंत्रो का संकलन हे इस कारण वे संहिता ग्रन्थ कहलाते हे।

वेदों के भाष्यकार याष्क थे शायण के अनुसार:- वेद् वह हे जो अभीष्ट की प्राप्ति व अनिष्ट को दूर करने के अलौकिक उपाय का ज्ञान देते हे।

ओल्डेन बर्ग के अनुसार “वेद भारतीय साहित्य व धर्म के प्राचीनतम अभिलेख हे”।

मनुस्मरती में लिखा हे:- ‘ नास्तिको वेद् निन्दक’ अर्थात वदो की निंदा करने वाले नाश्तिक हे।

मनुश्मृति में धर्म की चार आधार स्रोत बताये गए हे।
1. वेद्
2.स्मृति ग्रंध
3. सदाचार व
4.आत्मतुष्टि

प्रमुख वेद चार है

  1. ऋग्वेद-मंत्र इत्यादि से सम्बन्धित
  2. यजुर्वेद-यज्ञ,कर्मकांड से
  3. सामवेद-गायन,संगीत से
  4. अथर्ववेद-जादू टोने (भूतप्रेत)

1. ऋग्वेद- रचना काल (1500-1000BC)

रचना क्षेत्र:- सप्त सेंधव क्षेत्र
ऋग्वेद में 10 मंडल व 1028 सूत्र हे
दृष्टा:- वेदों के मंत्रो को रचने वाले को रचियता नहीं कहकर दृष्टा कहा जाता हे। इसी कारण भी वेद अपौरुषेय कहलाते हे।

ऋत्विज:- यज्ञ के द्वारा मंत्रो को पढ़ने वालो को या उच्चारण करने वालो को ऋत्विज कहा जाता हे।

नोट:- ऋग्वेद में ऋत्विज होता या होतृ कहलाते हे।

2. सामवेद(संगीत का वेद्)- सामवेद के ऋत्विज उदगाता कहलाते हे

3.यजुर्वेद(यज्ञ विधियों का उलेख) – यजुर्वेद के ऋत्विज अर्धव्यू कहलाते हे

त्रय ऋण

  1. पितृ ऋण-इसे संतानोत्पत्ति द्वारा चुकाया जाता हैं
  2. देव ऋण-इसे यज्ञ के द्वारा चुकाया जाता हैं
  3. ऋषि ऋण-इसे शिक्षा इत्यादि के द्वारा चुकाया जाता है

वेद अपौरुषेय होते हैं- क्योंकि वेदों का रचयिता ना तो कोई लौकिक पुरुष(ऋषि-मुनि) ना ही कोई अलौकिक पुरुष हैं (ईश्वर)अपितु वेद नित्य तथा शाश्वत अनादि अनंत होते है

वेद के तीन भाग है-

  1. संहिता -ऋचाओं से संबंधित है
  2. ब्राह्मण- गध् से संबंधित है
  3. आरण्यक- उपनिषद मुल्क दार्शनिक बातों से संबंधित है