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PHILOSOPHY

June 18, 2020

Geeta ka Nishkaam Karm गीता का निष्काम कर्म

गीता का निष्काम कर्म

गीता

गीता_महाभारत_के भीष्म पर्व का एक भाग है इसे भगवद गीता के नाम से पुकारा गया है
गीता_ही एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें दर्शनशास्त्र धर्म और नीतिशास्त्र का संतुलित समन्वय हुआ है
गीता_में जीवन का एकमात्र उद्देश्य बताया गया है- ब्रम्ह में लीन होना अथवा ईश्वर की निकटता प्राप्त करना यही अवस्था मोक्ष है
गीता_के नैतिक विचारों में 3 विभागों का निर्माण होता है ज्ञान मार्ग, कर्म मार्ग और भक्ति मार्ग
गीता_का मुख्य विषय कर्म योग कहा जा सकता है
गीता_में सत्य की प्राप्ति के लिए कर्म करने का आदेश दिया गया है
गीता_के अनुसार अचेतन …

June 17, 2020

Buddhist Darshan: बौद्ध दर्शन क्या है जाने?

Buddhist Darshan

Buddhist Darshan (बौद्ध दर्शन)

छठी शताब्दी ईसा पूर्व के उत्तरार्ध में अनेक धार्मिक संप्रदायों का उदभव हुआ | इन सभी धार्मिक संप्रदायों के उदभव का कारण पुरानी रुढ़िवादी धार्मिक व्यवस्था थी | इस काल में लगभग 62 संप्रदायों का उदय हुआ था जिनमें सबसे महत्वपूर्ण बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म थे |

अन्य धार्मिक संप्रदाय जैसे एक अक्रियावाद (पूरण कश्यप), भौतिकवादी ( अजीत केशकंबली), अनिश्चय वादी ( संजय वेलट्ठिपुत्त), नियतिवादी ( मक्खलि गोशाल ) आदि प्रमुख थे |

बौद्ध धर्म के संस्थापक “गौतम बुद्ध” थे l इन्हे एशिया का ज्योति पुज्ज(Light Of Asia) कहा जाता है l बुद्ध …

June 16, 2020

Jain Darshan: जैन दर्शन क्या है इसके बारे में जाने?

Jain Darshan

Jain Darshan (जैन दर्शन)

प्रवर्तक:- महावीर स्वामी

Jain Darshan बहुसत्तावादी तथा बहुतत्ववादी दार्शनिक संप्रदाय है इसमें अनेकांतवाद की प्रधानता है  अनेकांतवाद के अनुसार जगत में अनेक वस्तुओं का अस्तित्व है तथा प्रत्येक वस्तु अनेक धर्मों को धारण किए रहती है

अनंत धर्मांन्तकम् वस्तु

वस्तु को जैन दर्शन में द्रव्य कहा जाता है

द्रव्य का लक्षण

गुण पर्यायवत द्रव्यम

अर्थात जो गुण तथा पर्याय दोनों का मिश्रण होता है वह द्रव्य कहलाता है

गुण :- किसी भी वस्तु में पाए जाने वाले नित्य अपरिवर्तनशील धर्म गुण कहलाते हैं

पर्याय :- वस्तु में पाए जाने वाले अनित्य परिवर्तनशील धर्म पर्याय …

June 15, 2020

Kant’s Ethics-Freedom of Resolutions कांट का नीतिशास्त्र

कांट का नीतिशास्त्र, संकल्प की स्वतंत्रता, और दण्ड के सिद्धान्त

नीतिशास्त्र

संकल्प की स्वतंत्रता ?

तात्पर्य:-  किसी भी कर्म को करने अथवा न करने, चुनने अथवा न चुनने की स्वतन्त्रता संकल्प की स्वतन्त्रता कहलाती हैं

इसकी तीन शर्ते है:-

1. कर्म को करने की क्षमता :- यदि व्यक्ति किसी भी कर्म को करने में शारीरिक और मानसिक रूप से समर्थ नहीं है तो उस कर्म को प्रति व्यक्ति को नैतिक रूप से उत्तरदायी नही माना जा सकता है

2. ज्ञान और उद्धेश्य : – यदि कर्म अज्ञानवश अथवा बिना उदेश्य के किया जाता हैं वहाँ व्यक्ति को उस कर्म के …

June 14, 2020

What Is Utilitarianism उपयोगितावाद क्या है???

उपयोगितावाद

उपयोगितावाद

सुखवाद ( Suicidal )

सुख प्राप्ति से तात्पर्य किसी भी कर्म / नियम को अपनाने के स्वरूप व्यक्ति को सुख की प्राप्ति होनी चाहिए दार्शनिक जे एस मिल सुख तथा आनंद को एक ही अर्थ में प्रयुक्त करता हैं अपिक्युरस शारीरिक तथा मानसिक कष्टो के अभाव को सुख कहता है

सिजविक सुख को एक मानसिक अनुभूति मानता है  ऐसी अनुभूति जिसकी हमको इच्छा करनी चाहिए

सुखवाद दो प्रकार का होता हैं :-

  1. नेतिक सुखवाद
  2. मनोवेज्ञानिक सुखवाद

1. नेतिक सुखवाद :- यह दो प्रकार का होता है

(अ) स्वार्थमूलक
(ब) परार्थ/ सरवार्थ मूलक :- इसे उपयोगितावाद भी कहते है…

June 13, 2020

Aristotle’s Ethics अरस्तु का नीतिशास्त्र क्या है???

Aristotle’s Ethics अरस्तु का नीतिशास्त्र

अरस्तु

पाश्चात्य नीतिशास्त्र का प्रथम लिखित ग्रंथ अरस्तु रचना निकोमेकियन एथिक्स है

अरस्तु द्वारा सद्गुणों का विभाजन :-

  • बौद्धिक :- विवेक
  • नैतिक :- मैत्री, साहस, संयम, न्याय, दया, सहानुभूति, ममता

अरस्तु_के अनुसार विवेक एकमात्र बोद्धिक सदगुण है जबकि साहस संयम न्याय नैतिक सद्गुण के अंतर्गत आते हैं मैत्री (मित्रता) एक नैतिक सद्गुण है इसके अतिरिक्त सहानुभूति, दया, ममता इत्यादि बोद्धिक सदगुण के अंतर्गत माने जाते हैं अरस्तु_का सद्गुण विषय सिद्धांत मध्यम मार्ग (गोल्डन मीन) कहलाता है

जिसके अनुसार प्रत्येक नैतिक सद्गुण एकांतिक मतों की मध्य की अवस्था है अर्थात ना तो पूर्णतः अपना सर्वस्व त्याग …

June 12, 2020

Greek Ethics General ग्रीक एथिक्स सामान्य परिचय

ग्रीक एथिक्स सामान्य परिचय

ग्रीक एथिक्स / पाश्चात्य नितिशात्र

ग्रीक एथिक्स

एथिक्स शब्द की उत्पत्ति यूनानी / ग्रीक भाषा के एथोस शब्द से हुई ह जिसका अर्थ है परंपरा /रीति रिवाज

एथिक्स(नितिशात्र) का संबंध मानवीय आचरण से माना जाता है नीतिशास्त्र एक आदर्श मूलक विज्ञान है नीतिशास्त्र चाहिए शब्द की व्याख्या करता है नीतिशास्त्र (एथिक्स) ऐच्छिक कर्मो का मूल्यांकन करता है

कर्म दो प्रकार के होते हैं

  1. ऐच्छिक कर्म- जिन पर मनुष्यों का नियंत्रण रहता है
  2. अनैच्छिक कर्म- वे कर्म जिन पर मनुष्य का कोई नियंत्रण नहीं रहता जैस ह्रदय गति श्वास आदि

नीतिशास्त्र मानवीय कर्मों का मूल्यांकन करता है …

June 11, 2020

Rene Descartes-Cartesian System: रेने देकार्ते-कार्टिशियन पद्दति क्या है?

Rene Descartes-Cartesian System

Rene Descartes-Cartesian System (रेने देकार्ते-कार्टिशियन पद्दति)

Rene Descartes फ्रांस के तुरेन शहर के निवासी थे रेने देकार्ते को बुद्धिवाद और आधुनिक दर्शन का जनक कहा जाता है देकार्त के दर्शन में यथार्थ ज्ञान प्राप्ति का माध्यम सुस्पष्टता तथा सुभिन्नता दिखाई देता है

डेकार्ट बुध्दिवादी, वस्तुवादी, उग्रदैतवादी, सन्देहवादी, ईश्वरवादी, सकल्पस्वत्रंतवादि, अनेकतावादी अन्तक्रियावादी दार्शनिक माना जाता है

डेकार्ट की प्रणाली को संश्यात्मक प्रणाली के नाम से जाना जाता है  डेकार्ट ने गणित विषय के आधार पर अपने दर्शन का निर्माण किया

देकार्त यथार्थ ज्ञान प्राप्ति के दो साधन स्वीकार करते हैं

  • प्रतिभान- हमारी आत्मा में अवस्थित सुस्पष्ट तथा सुभिन्न

June 10, 2020

Socrates Method सुकरात पद्धति क्या हे???

सुकरात की शिक्षण-पद्धति भी निराली थी । उसकी पद्धति का उद्देश्य सत्य को प्रस्तुत करना न होकर, सत्य का अन्वेषण करना था। सुकरात की शिक्षण-पद्धति वार्तालाप पर आधारित थी। सुकराती शिक्षण-विधि में यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सभी अच्छे कार्यों के मूल में ज्ञान है।

सुकरात के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान की प्राप्ति होना चाहिए। सुकरात की दृष्टि में जीवन का उद्देश्य- भद्र आचरण करना है। भद्र का आचरण तब तक सम्भव नही, जब तक ज्ञान न हो-अतः ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है। यह ज्ञान आत्म-परीक्षण से सम्भव होगा, अतः हर व्यक्ति में सोचने-विचारने की शक्ति का …

June 9, 2020

Vedas Upanishad Concept वेद और उपनिषद की अवधारणा

वेद और_उपनिषद की अवधारणा

वेद ( Vedas )  

वेद_शब्द विद धातु से बना है जिसका अर्थ है जानना वेद का सामान्य अर्थ है -ज्ञान

वेंदो को श्रुति ग्रन्थ भी कहा जाता हे वेदिक ज्ञान को साक्षात् तपोबल के आधार पर ऋषिमुनियों के द्वारा सुना गया व इसी ज्ञान को प्रारम्भ में मौखिक रूप से ऋषिमुनियों ने अपने शिष्यो को दिया था।

वेदों को अपौरुषेय भी कहा गया क्योकि वेदों की रचना इसवरिय प्रेरणा के आधार पर ऋषि मुनियो ने की । वेदों को सहिता ग्रन्थ भी कहा जाता हे । वेदों में अलग -अलग काल में रचे …