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September 5, 2020

September 5, 2020

शक्ति पृथक्करण, नियंत्रण एवं संतुलन PSCB

शक्ति पृथक्करण, नियंत्रण एवं संतुलन

शक्ति पृथक्करण सिद्धांत का अर्थ

सरकार के तीन अंग होते हैं व्यवस्थापिका जो कानून निर्माण का काम करती है कार्यपालिका दो विधियों को लागू करती हैं न्यायपालिका जो कानून की व्याख्या वह विवादों का निर्णय करती है
सरकार के तीनों अंगों में पारस्परिक संबंधों को निर्धारित करने के लिए मॉन्टेस्क्यू ने शक्ति पृथक्करण सिद्धांत का प्रतिपादन किया।

शक्ति पृथक्करण की आवश्यकता

विभिन्न राजनीतिक विद्वानों जैसे जॉन लॉक मॉन्टेस्क्यू Cf स्ट्रांग ला पांलोबरा आदि ने शक्ति पृथक्करण के महत्व को प्रतिपादित किया। इस सिद्धांत की उपयोगिता के निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं।

  • ?? नागरिक स्वतंत्रता के अधिकारों के संरक्षण के लिए
  • ?? राजनीतिक शक्ति के दुरुपयोग से बचने हेतु।
  • ?? कार्य विभाजन के विशेषीकरण वह कार्य कुशलता में वृद्धि हेतु।
  • ?? सरकार के विभिन्न अंगों का उत्तरदायित्व सुरक्षित करने हेतु।
  • ?? न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता कायम करने हेतु।
  • ?? शासन कार्यों को सरल व सुविधाजनक बनाने हेतु।
  • ?? शक्ति को शक्ति द्वारा नियंत्रित करने हेतु।

सिद्धांत का विकास

  • ?? शक्ति पृथक्करण सिद्धांत का विधिवत प्रतिपादन मॉन्टेस्क्यू के द्वारा किया गया।
  • ?? अरस्तु के काल में भी शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत देखा गया। क्योंकि अरस्तू ने सरकार को तीन भागों में बांटा था जैसे असेंबली मजिस्ट्रेट और जुडिशरी।
  • ?? फ्रांस के विचारक जीन बोंदा ने 16वी सदी में न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर बल दिया और इसे कार्यपालिका के नियंत्रण से मुक्त रखने की वकालत की।
  • ??‌ जॉन लॉक के द्वारा 17 वी सदी में अपनी पुस्तक “”शासन पर दो निबंध””” मैं शक्तियों के पृथक्करण सिद्धांत पर बल दिया और शासन को तीन भागों में विभाजित किया।

शक्ति पृथक्करण सिद्धांत पर मॉन्टेस्क्यू के विचार

  • ?? शक्ति पृथक्करण सिद्धांत की सर्वप्रथम वैज्ञानिक व स्पष्ट व्याख्या सर्वप्रथम मॉन्टेस्क्यू के द्वारा की गई थी । इसलिए उसे शक्ति_पृथक्करण सिद्धांत का जनक कहा जाता है।
  • ?? 18 वीं शताब्दी में मॉन्टेस्क्यू के समय फ्रांस के लुई 14 का शासन था। उसका कहना था कि “””मैं ही राज्यहू । इसके बाद मॉन्टेस्क्यू ने फ्रांस और इंग्लैंड की शासन व्यवस्था की तुलना की और वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि फ्रांस में शक्तियां राजा के पास केंद्रित हैं। जबकि ब्रिटेन में शक्तियों का पृथक्करण है।
  • ?? मॉन्टेस्क्यू ने 1748 में अपनी पुस्तक स्पीरिट आफ द लांज मैं शक्ति_पृथक्करण सिद्धांत का प्रतिपादन किया।

संयुक्त राज्य अमेरिका में शक्ति पृथक्करण सिद्धांत।

  • ?? संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान निर्माताओं पर मॉन्टेस्क्यू के शक्ति_पृथक्करण सिद्धांत का अत्यधिक प्रभाव पड़ा अतःअमेरिका में शक्ति_पृथक्करण तथा नियंत्रण में संतुलन की प्रणाली है।
  • ?? अमेरिका के प्रसिद्ध संविधान निर्माता जेम्स मैडिसन का मत था कि””James medicine का मत था कि वैधानिक कार्यकारी तथा न्यायिक शक्तियों का एक ही हाथ में केंद्रीकरण चाहे वह 1 व्यक्तियों अथवा कुछ व्यक्तियों अथवा बहुत से व्यक्ति हो चाहे वह वंशानुगत हो स्वत्व नियुक्त हो अथवा निर्वाचित अत्याचारी शासन की सही परिभाषा कही जा सकती है”””!
  • ?? अमेरिकी संविधान सरकार के तीनों अंगों को अलग-अलग तथा एक दूसरे से स्वतंत्र रखना चाहते थे राष्ट्रपति जिन का चुनाव जनता द्वारा प्रत्यक्ष होता है कार्यपालिका का प्रमुख होता है वह अपनी शक्तियों के लिए कांग्रेस के प्रति उत्तरदाई नहीं है सामान्यतया कांग्रेस राष्ट्रपति को समय से पूर्व नहीं हटा सकती उसके मंत्री केवल उसी के प्रति उत्तरदाई होते हैं।
  • ?? अमेरिका में कांग्रेस भी राष्ट्रपति के नियंत्रण से स्वतंत्र है राष्ट्रपति कांग्रेस को भंग नहीं कर सकता वह या उसके मंत्री कांग्रेस सदस्य नहीं बन सकते नहीं उसकी कार्रवाई में भाग ले सकते हैं।
  • ?? सर्वोच्च न्यायालय भी इसी प्रकार स्वतंत्र है न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति सीनेट की स्वीकृति से करता है। इन्हें केवल महाभियोग के द्वारा हटाया जा सकता है।

शक्तिके पृथक्करण का सिद्धांत

सिद्धांत की पृष्ठभूमि राजनीति शास्त्र के जनक अरस्तु ने सरकार को 3 विभागों में बांटा है

  1. असेंबली ,
  2. मजिस्ट्रेट,
  3. जुडिशरी 

उसने आधुनिक व्यवस्थापन शासन तथा न्याय विभागों का ही बोध होता है

शक्ति पृथक्करण का विधिवत प्रतिपादन सर्वप्रथम फ्रांसीसी विचारक मॉन्टेस्क्यू ने किया अपनी पुस्तक “the spirit of the law’s” मैं किया

September 5, 2020

सरकार के प्रकार Types of Government

सरकार के प्रकार

लोकतंत्र, अधिनायकतंत्र, संसदात्मक, अध्यक्षात्मक, एकात्मक एव संघात्मक

सरकार के प्रकार

1. लोकतंत्र(Democracy)

डेमोक्रेसी सब्द की उतपति ,ग्रीक भाषा के शब्द डेमोस ओर क्रेशिया से हुई है। डेमोस का अर्थ है, लोग तथा क्रेशिया का अर्थ ,शासन से है।अतः लोकतंत्र का आशय लोगो के शासन से है। अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने अपने ‘गेटिसबर्ग’भाषण में लोकतंत्र को “जनता का शासन ,जनता के द्वारा,जनता के लिए “रूप में परिभाषित किया ।

लोकतंत्र की परिभाषा

  • सिले के अनुसार,‘लोकतंत्र, ऐसी सरकार है, जिसमे सभी का हिस्सा होता है।’
  • ब्राइस के अनुसार, ‘लोकतंत्र, लोगो का शासन है, जिसमे लोग संप्रभु इच्छा को वोट के रूप में व्यक्त करते है। ‘
  • डायसी के अनुसार, ‘लोकतंत्र ,इस शासन है, जिसमे देश का बड़ा भाग शासन करता है ।’

लोकतंत्र का दार्शनिक आधार(मूल्यों के रूप में लोकतंत्र)

1.व्यक्ति को एक ईकाई मानना ।
2.व्यक्ति की गरिमा में विश्वास।
3.लोगो को स्वतंत्रता व अधिकार प्रदान करना।

लोकतंत्र, समाज के रूप में

1.जाती,लिंग व धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नही करना।

2. समाज मे विशेसधिकारो को समाप्त करना ।

2. एकात्मक शासन

एकात्मक शासन में शासन की सभी शक्तियों का केंद्रीकरण केंद्र सरकार के पास होता है।

लक्षण- शक्तियों का केंद्रीकरण इकाइयां केंद्र सरकार के प्रतिनिधि एवं लचीला संविधान।

गुण

  • प्रशासन में एकरूपता।
  • सरल शासन व्यवस्था।
  • संघर्ष रहित शासन व्यवस्था।
  • कुशल एवं प्रशासन दृढ़।
  • मितव्यता।
  • लचीलापन।
  • राष्ट्रीय एकता।
  • संकट काल में अधिक उपयुक्त।
  • सुदृढ़ विदेश नीति।

दोष

  • केंद्रीय सरकार के निरंकुश होने का भय ।
  • प्रशासनिक दक्षता का अभाव।
  • नौकरशाही का शासन।
  • लोकतंत्र विरोधी।
  • विशाल राज्यों के लिए उपयुक्त नहीं।
  • जनता की उदासीनता।
  • स्थानीय स्वशासन की उपेक्षा।

3. संघात्मक शासन

इसमें शासन की शक्तियों का केंद्र और राज्यों के बीच विभाजन पाया जाता है।

प्रमुख लक्षण- लिखित कठोर एवं सर्वोच्च संविधान शक्तियों का विभाजन और स्वतंत्र न्यायपालिका।

संघात्मक शासन के गौण लक्षण

दोहरी नागरिकता ,द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका ,संप्रभुता का दौहरा प्रयोग ।

गुण

  • राष्ट्रीय एकता एवं स्थानीय स्वायत्तता।
  • केंद्रीयकरण और विकेंद्रीकरण का समन्वय।
  • प्रशासनिक दक्षता।
  • विशाल राज्यों के लिए नितांत अनुपयुक्त।
  • निर्मल राज्यों को शक्तिशाली बनाने की पद्धति।
  • राजनीतिक चेतना।
  • शासन निरंकुश नहीं होता।
  • समय और धन की बचत।
  • अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में प्रतिष्ठा।
  • लोकतांत्रिक शासन के अनुकूल व्यवस्था।

संघात्मक शासन के दोष

  • कमजोर शासन।
  • देश की एकता को खतरा।
  • संकट काल के समय उपयुक्त नहीं।
  • अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कमजोर व्यवस्था।
  • राज्यों के अलग होने की आशंका।
  • न्यायपालिका का रूढ़िवादी होना।

अर्ध संघात्मक व्यवस्था

ऐसी व्यवस्था जिसमें संघात्मक शासन के साथ-साथ एकात्मक शासन के लक्षणों का भी होना पाया जाता है। जैसे भारत

4. संसदात्मक शासन प्रणाली

संसदीय शासन प्रणाली की परिभाषा – संसदात्मक शासन वह शासन प्रणाली है जिसमें कार्यपालिका पर व्यवस्थापिका का नियंत्रण होता है। इस प्रणाली में कार्यपालिका व्यवस्थापिका की एक ऐसी समिति होती है जो उसी में से ली जाती है और उसी के प्रति उत्तरदाई होती है।

इसके अतिरिक्त क्योंकि इसके अंतर्गत कार्यपालिका की शक्ति एक व्यक्ति मैं निहित न होकर एक समिति में निहित होती है और राज्य का मुख्य कार्यपालक केवल नाममात्र का शासक होता है। संसदीय प्रणाली को उत्तरदाई शासन का प्रकार भी कहते हैं क्योंकि इसके अंतर्गत कार्यपालिका व्यवस्थापिका व जनता के प्रति उसी प्रकार उत्तरदाई होती है जिस प्रकार एक एजेंट अपने मालिक के प्रति अथवा कर्मचारी अपने स्वामी के प्रति उत्तरदाई होता है।

संसदीय शासन प्रणाली की मुख्य विशेषताएं-

1- वास्तविक व नाममात्र कार्यपालिका का भेद – इस शासन में कानूनी रूप से मुख्य कार्यपालक केवल नाम मात्र की कार्यपालिका होती है जब की वास्तविक कार्यपालक कैबिनेट अर्थात मंत्री मंडल होता है। उदाहरण के लिए इंग्लैंड के राजा भारत के राष्ट्रपति नाममात्र कार्यपालिका है व मंत्रिमंडल वास्तविक कार्यपालिका।

2 – कार्यपालिका व्यवस्थापिका के संबंध में घनिष्ठता – संसदीय शासन प्रणाली में कार्यपालिका और व्यवस्थापिका एक दूसरे से पृथक न होकर परस्पर घनिष्ठ रूप से संबंधित होती है। वास्तविक कार्यपालिका की नियुक्ति नाममात्र के कार्यपालक द्वारा व्यवस्थापिका के सदस्य में से की जाती है और वह व्यस्थापिका के प्रति अपने कार्य एवं नीतियों के प्रति उत्तरदाई होती है।

3 – कार्यपालिका का कार्य कार्यकाल अनिश्चित।

4 – कार्यपालिका व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदाई।

5 – मंत्री परिषद का व्यवस्थापिका के निम्न सदन के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व।

6 – प्रधानमंत्री का नेतृत्व ( मंत्री परिषद सहित प्रधानमंत्री वास्तविक कार्यपालिका )।

5. अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली

परिभाषा – अध्यक्षीय शासन पद्धति में कार्यपालिका वैधानिक रूप से व्यवस्थापिका से पृथक होती है। मैं तो वह उसमें से ली जाती है और ना ही उसके प्रति उत्तरदाई होती है। इस शासन प्रणाली में कार्यपालिका प्रमुख नाममात्र का शासक ने होकर वास्तविक शासक होता है अर्थात इसमें वास्तविक और नाममात्र वाला भेद नहीं पाया जाता।

कार्यपालिका का प्रमुख जो वास्तविक शासक होता है वही संविधान द्वारा कि हुई शासन की संपूर्ण शक्तियों का प्रयोग करता है। इस प्रकार की शासन प्रणाली में भी मुख्य कार्यपालक द्वारा नामित एक मंत्रिपरिषद होती है जो मुख्य कार्यपालक हो उसके कार्यों में सहायता देती है किंतु उसकी व्यक्ति व्यस्थापिका में से लिए हुए नहीं होते हैं

और वे व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदाई भी नहीं होते वे सिर्फ मुख्य कार्यपालक के प्रति उत्तरदाई होते हैं। इसके अतिरिक्त मुख्य कार्यपालक का कार्यकाल संविधान द्वारा निश्चित होता है और व्यवस्थापिका से उसका कोई संबंध नहीं होता। मंत्री परिषद के सदस्यों का कार्यकाल मुख्य कार्यपालक की मर्जी पर निर्भर करता है।

डॉक्टर गार्नर के अनुसार – “अध्यक्षीय शासन वह शासन होता है, जिसमें कार्यपालिका अर्थात राज्य का अध्यक्ष तथा उसके मंत्री संविधानिक रूप से अपनी अवधि के विषय में विधानमंडल से स्वतंत्र होते हैं और अपनी राजनीतिक नीतियों के बारे में भी उसके प्रति उत्तरदाई नहीं होते हैं”।

अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली की विशेषताएं –

1 – इसशासन प्रणाली में कार्यपालिका और व्यवस्थापिका में घनिष्ठ संबंध न होकर दोनों के बीच में पृथक्करण पाया जाता है।
2 – कार्यपालिका की वास्तविक शक्ति राज्य के अध्यक्ष के पास होती है। इसमें नाममात्र व वास्तविक कार्यपालिका का भेद नहीं पाया जाता।
3 – इस शासन प्रणाली में कार्यपालिका का कार्यकाल निश्चित होता है।
4 – मंत्री परिषद के सदस्य मुख्य कार्यपालक के केवल सचिव होते हैं, व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदाई नहीं होकर मुख्य कार्यपालक के प्रति उत्तरदाई होते हैं।

September 5, 2020

राजस्थान लोक सेवा आयोग Rasthan Public SC

राजस्थान लोक सेवा आयोग

Rpsc
RPSC

राजस्थान लोक सेवा आयोग का एक इतिहास रहा है यू तो सर्वप्रथम 1923 में ली आयोग ने केन्द्र में एक लोक सेवा आयोग की सिफारिश की लेकिन उसमें राज्यों के लिए अलग से आयोग की कोई सिफारिश नहीं थी स्वतंत्रता के समय जयपुर, जोधपुर व बीकानेर जिलों में लोक सेवाओं की भर्ती संस्थाएं कार्यरत थी
भारत शासन अधिनियम 1935 के प्रारूपानुसार वह संविधान के अनुच्छेद -315 के तहत अगस्त 1949 में जयपुर में आर.पी.एस.सी. की स्थापना की गई

राजस्थान के तत्कालीन राजप्रमुख सवाई मान सिंह द्वितीय ने राजस्थान लोक सेवा आयोग की स्थापना हेतु 16 अगस्त 1949 को 23वां अध्यादेश जारी करते हुए संविधान के अनुच्छेद 315(1)के तहत RPSC की स्थापना 20 अगस्त,1949 को जयपुर में की गयी

1956 में गठित सत्यनारायण राव समिति के आधार पर राजस्थान_लोक सेवा आयोग को जयपुर से अजमेर स्थान्तरित किया गया.

वर्तमान में राजस्थान_लोक सेवा आयोग का मुख्यालय अजमेर में घूघरा घाटी में स्थित है

राजस्थान_लोक सेवा आयोग के गठन के समय सदस्यों की संख्या 3 (1अध्यक्ष +2 सदस्य ),1974 में 4 (1अध्यक्ष +3सदस्य ) जिसे 1981 में 5 (1+4),वर्तमान में इनकी सदस्य संख्या 8 (1अध्यक्ष +7सदस्य) हो गयी है.

राजस्थान_लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एंव सदस्य राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष शपथ ग्रहण करते है.

सदस्यो की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है जबकी कार्यकाल से पुर्व हटाने का अधिकार राष्ट्रपति को है

संविधान के अनुच्छेद 316(2)के तहत राजस्थान_लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एंव सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष या 62 वर्ष(जो भी हो पहले ) की आयु तक होता है.

राजस्थान_लोक_सेवा_आयोग के अध्यक्ष एंव सदस्यों के वेतन भतो का निर्धारण राज्य सरकार करती है

28 जुलाई 1950 को राजस्थान_लोक सेवा आयोग के प्रथम अध्यक्ष एन.सी.त्रिपाठी थे ,तो इससे पूर्व अस्थाई व्यवस्था के तहत 1,अप्रैल 1949 को प्रथम अध्यक्ष एस.के.घोष को बनाया गया.

राजस्थान लोक सेवा आयोग के वर्तमान अध्यक्ष दीपक उत्प्रेती है.

राजस्थान लोक सेवा आयोग( Rajasthan Public Service Commission ) के कार्य

1- भर्ती संबंधी कार्यक्रम
2- परीक्षा का आयोजन
3- साक्षात्कार करना
4- पदोन्नति का कार्य
5- अनुशंसा करना
6- अनुशासनात्मक कार्यवाही
7- परामर्श संबंधी कार्य

आयोग के सचिव का कार्यकाल 5 वर्ष निर्धारित किया गया है