August 13, 2022
Alwar, Rajasthan, India
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History of Mevad : मेवाड़ या गुहिल वंश का इतिहास जाने??

Mevad में गुहिल वंश की स्थापना

उधर Mevad में गुहिल वंश की स्थापना 566 ई. में गुहिलादित्य ने की थी।

गुहिलादित्य ने अपनी राजधानी नागदा (उदयपुर) को बनाया था।

गुहिलादित्य के सिक्के सांभर संग्रहालय में स्थित हैं।

गुहिलादित्य का वंशज महेन्द्र द्वितीय का पुत्र कालभोज/मालभोज था।

कालभोज हारित ऋषि की गायें चराता था। हारित ऋषि ने कालभोज को आशिर्वाद व बप्पारावल की उपाधि दी और कहा जा रे जा बप्पा रावल मानमोरी को हरा डाल।

हारित ऋषि एकलिंग जी की उपासना करते थे। एकलिंग को गुहिलवंश के शासक अपना कुलदेवता मानते हैं।

मुहणौत नैणसी ने गुहिलों की 24 शाखाओं का वर्णन किया हैं। गुहिल वंश के नागादित्य की हत्या कर भीलों ने ईडर का क्षेत्र छीन लिया था।

हारित ऋषि के आशिर्वाद से बप्पारावल ने 734 ई. में मौर्य वंश के शासक मानमोरी को हरा दिया था,

तथा Mevad में गुहिल साम्राज्य की स्थापना की थी। इस आक्रमण का उल्लेख अबुल- फजल ने आयने अकबरी में भी किया है।

Mevad के शासक एकलिंगजी को अपना दीवान मानकर राजधानी छोड़ने से पूर्व एकलिंग जी की स्वीकृति लेते थे वह आसकां लेना कहलाती थी।

बप्पारावल (734 – 753 ई.)

बप्पारावल Mevad में गुहिल साम्राज्य का संस्थापक था

Mevad में सर्वप्रथम सोने के सिक्के बप्पारावल ने ही चलाये थे।

  • बप्पारावल ने कैलाशपुरी (उदयपुर) में एकलिंग जी के मन्दिर का निर्माण करवाया था।
  • इसकी समाधि नागदा में हैं,

तथा बप्पा के बारे में कहा जाता है कि बप्पा 35 हाथ की धोती, 16 हाथ का दुपट्टा पहनता था तथा 32 मन का खड्ग हाथ में रखता था।

अल्लट (951- 954 ई.)

  • अल्लट के काल में Mevad में पहली बार नौकरशाही आरम्भ हुई थी।
  • अल्लट ने अपनी दूसरी राजधानी आहड़ (उदयपुर) को बनाया था।
  • इसे राजस्थान का प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय विवाह माना जाता हैं।
  • अल्लट ने हूणों की सहायता से ही अपने साम्राज्य का विस्तार किया था।

रण सिंह या कर्ण सिंह-

  • इसके काल में गुहिल वंश दो शाखाओं में विभाजित हो गया था।
  • इसके एक पुत्र राहप ने सिसोदा ग्राम बसाकर राणा शाखा की शुरूआत की थी
  • तथा दूसरे पुत्र क्षेमसिंह ने रावल शाखा की शुरूआत की थी
  • रण सिंह के बाद रावल शाखा ने ही मेवाड़ पर शासन किया था।

जैत्र सिंह (1213- 1253 ई.)

  • जैत्रसिंह की भी आरम्भ में राजधानी नागदा थी,
  • इसके समकालीन दिल्ली में गुलाम वंश का शासक 1210 से 1236 ई. तक इल्तुतमिष था।
  • इल्तुतमिष ने साम्राज्यवादी नीति के कारण नागदा पर बार – बार आक्रमण किया था
  • तथा नागदा को लूटा भी था। इल्तुतमिष द्वारा नागदा पर किये गये आक्रमण भूतला के युद्ध के नाम से जाने जाते हैं।
  • भूतला के युद्ध में विजय जैत्र सिंह की हुई थी, जिसकी जानकारी जयसिंह सूरी का ग्रन्थ ’’हम्मीर मदमर्दन’’ देता हैं।
  • इल्तुतमिष के आक्रमणों से परेशान होकर जैत्रसिंह ने अपनी राजधानी नागदा से चितौड़ स्थानान्तरित की थी।
  • जैत्रसिंह दिल्ली के गुलाम वंश के शासकों के समय मेवाड़ का सबसे बलवान शासक था,
  • तथा जैत्रसिंह ने मेवाड़ राज्य में नई शक्ति का संचार करने के लिए नाडोल (पाली) के चैहान वंशीय शासक उदयसिंह को हराया था।

तेजसिंह (1253- 1269 ई.)-

  • इसकी उपाधियां परमभट्टारक, महाराजाधिराज व परमेश्वmर थी।
  • इसके काल में बलबन ने मेवाड़ पर असफल आक्रमण किया था।
  • इसके काल में आहड़ (उदयपुर) से मेवाड़ का प्रथम चित्रित ग्रन्थ 1260 ई. का श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चर्णि मिला था।
  • इस ग्रन्थ को चित्रित कमलचन्द्र ने किया था।

समरसिंह (1269- 1301 ई.)-

  • इसके काल में कुम्भकरण ने नेपाल में गुहिल वंश की स्थापना की थी।
  • समरसिंह को कुम्भलगढ़ प्रशि‍स्ति में ‘‘शत्रुओं की शक्ति का अपहर्ता’’ आबू शिलालेख में ‘‘ तुर्कों से गुजरात का उद्धारक‘‘ तथा चीरवे के लेख में ‘‘ शत्रुओं का संहार करने में सिंह सदृष और सूर‘‘ कहा गया हैं।
  • समरसिंह के बाद में मेवाड़ पर शासन रतनसिंह ने किया था।

रावल रतनसिंह (1301-1303 ई.)-

  • रावल रतनसिंह की जानकारी कुम्भलगढ़ प्रशस्ति व एकलिंग महात्म्य से मिलती हैं।
  • रतनसिंह के समकालीन 1296 से 1316 ई. तक दिल्ली का शासक खिलजी वंश का अलाउद्दीन खिलजी था।
  • अलाउद्दीन खिलजी साम्राज्यवादी नीति के तहत मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए 28 जनवरी 1303 को दिल्ली से रवाना हुआ।
  • अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने पड़ाव गंभीरी व बेड़च नदियों के बीच डाला था।
  • लेकिन अलाउद्दीन खिलजी स्वयं ने अपना पड़ाव चितौड़ी पहाड़ी पर डाला था।
  • लगभग 8 महिने के इस घेरे के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने 26 अगस्त 1303 को चितौड़दुर्ग पर रतनसिंह को मारकर अधिकार किया था।
  • इस युद्ध में रतनसिंह ने केसरिया तथा उसकी रानी पद्मिनी ने 1600 महिलाओं के साथ ऐतिहासिक जौहर किया था।
  • जहां पर जौहर किया था वहाँ पर जौहर मेला प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल दशमी को लगता हैं।
  • इस युद्ध में पद्मिनी के चाचा गौरा व भाई बादल (गौरा व बादल आपस में चाचा भतीजा थे)
  • रतनसिंह के सेनापति थे जो लड़ते हुए मारे गये थे। यह मेवाड़ का प्रथम जौहर था लेकिन राजस्थान के इतिहास का दूसरा जौहर इसे ही माना जाता हैं।
  • रतनसिंह की मृत्यु के साथ ही मेवाड़ से रावल शाखा की समाप्ति हो चुकी थी ।

विशेष-

  • शेरशांह सूरी के दरबारी कवि मलिक मौहम्मद जायसी के ग्रन्थ पद्मावत के अनुसार अलाउद्दीन खिलजी ने चितौड़ पर आक्रमण रतनसिंह की रूपवती रानी पद्मिनी को पाने के लिए किया था।
  • पद्मावत ग्रन्थ की रचना 1540 ई. में हुई थी तथा इस ग्रन्थ का दूसरा नाम छिताई चरित्र हैं।
  • अलाउद्दीन खिलजी के साथ उसका दरबारी कवि अमीर खुसरो था
  • जिसने चितौड़ युद्ध का सजीव वर्णन अपने ग्रन्थ खजाइन-उल- फुतुह/तारीख- ए – इलाही में किया था।
  • अलाउद्दीन खिलजी ने चितौड़ का शासन अपने बेटे खिज्र खां को सौंपा तथा चितौड़ का नाम खिज्राबाद रखा था।
  • खिज्रखां ने चितौड़ दुर्ग के आसपास मन्दिरों को तुड़वाया दिया था
  • तथा गम्भीरी नदी पर पुल बनवाया और चितौड़गढ़ की तलहटी में मकबरा बनवाया था।
  • खिज्रखां चितौड़ का शासन मालदेव चैहान को सौंपकर दिल्ली चला गया था।
  • चितौड़ का शासन 1326 ई. में मालदेव चैहान का बेटा जयसिंह/जैसा कर रहा था।
  • उधर सिसोदा ग्राम में राणा शाखा का जागीरदार हम्मीर सिसोदिया था,
  • जिसने 1326 ई. में जयसिंह पर आक्रमण कर उसको पराजित कर मेवाड़ में राणा शाखा का शासन आरम्भ किया था।

हम्मीर सिसोदिया (1326- 1364 ई.)-

  • हम्मीर सिसोदिया को भारत में छापामार युद्ध प्रणाली का जन्मदाता माना जाता हैं
  • तथा हम्मीर के बाद शिवाजी को भारत में छापामार युद्ध प्रणाली का जन्मदाता माना जाता हैं।
  • कीर्ति स्तम्भ प्रशि‍स्ति में हम्मीर की उपाधि विषमघाटी पंचानन तथा महाराणा कुम्भा की टीका रसिक प्रिया में हम्मीर को वीर राजा की उपाधि दी गई हैं।
  • हम्मीर की जानकारी जयसिंह सूरी का ग्रन्थ हम्मीर मदमर्दन देता हैं।
  • टॉड ने हम्मीर को अपने समय का प्रबल हिन्दूराजा कहा था।
  • हम्मीर ने चितौड़ में राणा शाखा आरम्भ की तथा इसके बाद के सारे Mevad के शासक महाराणा कहलाये थे।

क्षेत्रसिंह (1364- 1382 ई.)-

  • इसने मालवा के दिलावर खां गौरी को हराया था, तथा बूंदी के लाल सिंह हाड़ा को भी इसने ही हराया था।

लक्षसिंह/लाखा (1382- 1421 ई.)-

  • लाखा के काल में पिच्छू/छीतर बन्जारे ने उदयपुर में पिछोला झील का निर्माण करवाया था,
  • इस झील का निर्माण इसने अपने बैल की स्मृति में करवाया था।
  • इस झील के किनारे बीजारी नामक स्थान पर गलकी नटनी का चबूतरा बना हुआ हैं।
  • लाखा ने बदनौर के पास गयासुद्दीन तुगलक को हराया था तथा हिन्दुओं पर लगने वाला तीर्थकर बन्द करवाया था।
  • इसने गुजरात के जफर खां के आक्रमण को असफल किया था।
  • लाखा ने बूंदी के किले को जीतने का प्रण लिया था लेकिन बूंदी के किले को लाखा फतह नहीं कर सका था
  • अन्त में अपने प्रण को पूरा करने के लिए नकली मिट्टी का किला बनाकर उसको जीतकर अपना प्रण पूरा किया था।
  • लाखा के काल में उदयपुर के जावर में चांदी की खान निकली थी
  • जो उस समय की एशिया की सबसे बड़ी चांदी की खान थी।
  • जावर को उस समय योगिनीपट्टन के नाम से जाना जाता था।
  • लाखा के दरबार में झोटिंग भट्ट व धनेश्वर भट्ट नामक विद्वान रहते थे।

विशेष- 

मारवाड़ के राजकुमार रणमल राठौड़ ने लाखा की शादी सशर्त अपनी बहिन हंसाबाई से की थी और शर्त यह रखी कि जो भी हंसाबाई का पुत्र होगा वही मेवाड़ का अगला शासक होगा।

हंसाबाई की शादी से पहले ही लाखा का बड़ा पुत्र राणा चूड़ा था।

लाखा की शर्त पूरी करने के लिए चूड़ा ने मेवाड़ का अगला शासक नहीं बनना स्वीकार किया था।

राणा चूड़ा को Mevad का भीष्मपितामह कहा जाता हैं।

मोकल (1421-1433 ई.)-

  • महाराणा मोकल लाखा व हंसाबाई का पुत्र था, लाखा ने मरते वक्त मोकल का संरक्षक राणा चूड़ा को बनाया था।
  • चूड़ा हंसाबाई का सौतेला पुत्र था जिसके कारण हंसा बाई चूड़ा को शक की दृष्टि से देखती थी।
  • हंसाबाई के शक से परेशान होकर चूड़ा माण्डू (मालवा- मध्यप्रदेश) चला गया था।
  • चूड़़ा के माण्डू जाने के बाद हंसाबाई ने मोकल का संरक्षक अपने भाई रणमल राठौड़ को बनाया था।
  • रणमल राठौड़ ने मेवाड़ में बड़े- बड़े पदों पर राठौड़ों की नियुक्ति आरम्भ कर दी तथा मेवाड़ी सरदार राघवदेव की हत्या करवा दी थी।
  • मोकल ने 1428 ई. में रामपुरा के युद्ध में नागौर के फिरोज खां को हराया था।
  • मोकल ने चितौड़ दुर्ग के समाधिश्वयर मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया था
  • इस मन्दिर का निर्माता राजा भोज (मालवा का परमार शासक) था तथा प्राचीन नाम त्रिभुवन था।
  • मोकल द्वारा इसका जीर्णोद्धार करवाने के कारण इस मन्दिर को मोकल जी का मन्दिर भी कहते हैं।
  • मोकल ने एकलिंगजी के मन्दिर के चारों ओर परकोटा बनवाया था
  • इसके दरबार में शिल्पी मना, फना तथा विसल थे। मोकल के दरबार में विद्वान योगेश्वर व भट्ट विष्णु थे
  • तथा मोकल ने वेदाध्ययन के प्रबन्ध की व्यवस्था की थी।

विशेष-

  1433 ई. में जीलवाड़ा के युद्ध में महपा पंवार के कहने पर चाचा व मेरा ने मोकल की हत्या कर दी थी।

मोकल की पत्नी का नाम सौभाग्यदेवी था तथा इनका पुत्र कुम्भा था।

महाराणा कुंभा (1433-66)

जन्म – 1403 में देवगढ़ के समीप

पिता   – मोकल

माता – सौभाग्यदेवी

उपाधियाँ- ‘महाराजाधिराज, रावराय, राणेराय, राजगुरू, हिंदू सुरताण अभिनवभरताचार्य, रणेरासो, हालगुरू (शासन कला का सर्वोच्च शासक), राजगुरू, 

दानगुरू, परमगुरू, नरपति, अखपति, गैनपति व छापगुरू (छापामार युद्ध पद्धति में निपुण) प्रमुख उपाधियाँ थी।

मुस्लिम शासकों ने हिंदू सुरताण  की उपाधि दी थी।

कुंभा के द्वारा लड़े गए प्रमुख युद्ध

अर्बली का युद्ध :- कुंभा व जोधा के मध्य लड़ा गया जिसमें जोधा पराजित हुआ।

सारंगपुर का युद्ध (1437) :- कुंभा व मालवा के शासक महमूद खिलजी व के मध्य लड़ा गया जिसमें महमूद खिलजी की हार हुई।

चम्पानेर की संधि (1453 .) :- गुजरात का सुल्तान कुतुबुद्दीन व मालवा का शासक महमूद ने कुंभा के विरूद्ध चम्पानेर की संधि की किन्तु कुंभा ने दोनों को पराजित कर दिया।

कुंभा की स्थापत्य कला को विशेष देन है

 कविराज श्यामलदास के अनुसार कुंभा ने मेवाड़ राज्य में 84 में से 32 दुर्गो का निर्माण करवाया।

कुंभा ने अपनी पत्नी कुंभलदेवी की स्मृति में कुंभलगढ़ का निर्माण किया इसे मछिन्दरपुर के नाम से भी जाना जाता है। इसमें बने कुंभा के महल को कटारगढ़ कहते है।

कीर्ति  स्तभ (विजय स्तंभ)-

  कीर्ति-स्तंभ के सूत्रधार जेता थे जिसकी सहायता इनके पुत्र नापा व पूंजा ने की थी।

यह स्तंभ 120 फुट ऊँचा तथा 30 फुट चौड़ा है। इसमें 157 सिढ़ियाँ है। यह नौ मंजिला है अतः इसे नौखण्डा महल भी कहते है।

इसे हिन्दू मूर्तिकला का विश्वकोष भी कहा जाता है। 

डॉ. उपेन्द्रनाथ डे ने इसे विष्णु-स्तंभ कहा है। क्योंकि इस स्तभ के मुख्य द्वारा पर भगवान विष्णु की मूर्ति है।

 फर्ग्यूसन ने लिखा है कि “ये रोम के टार्जन के समान है। लेकिन इसकी कला उसकी अपेक्षा अधिक उन्नत है।

यह रोमन कला कृतियों से कहीं अधिक’ उत्कृष्ठ कलाकृति है।” कीर्ति सतंभ की तीसरी मंजिल पर अरबी भाषा में नौ बार अल्लाह लिखा हुआ है

जो कृम्भा की धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीक है। इसे, हिन्दू देवी-देवताओं का अजायबघर भी कहते है।

कुंभा में चित्तौड़ में कुंभश्याम  वराह मंदिर का निर्माण करवाया तथा एकलिंग जी में मंदिर का जीर्णोद्वार करवाया।

 कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति की रचना अत्रि, कवि और महेश ने की थी। अत्रि की मृत्यु हो जाने पर महेश ने इसे पूर्ण किया।

मण्डन कुंभा का मुख्य वास्तुकार था जिसने कुंभलगढ़ दुर्ग ही रचना की।

वास्तुकार मण्डन गुजरात निवासी था, इसकी छतरी शिक्षा नदी के किनारे उन्जैन में बनी हुई है।

इसी स्थान पर दुर्गादास राठौड की छतरी भी है।

मण्डन ने राजवल्लभ, प्रसादमण्डन, वास्तु मण्डल, रूप मण्डल, व देवमूर्ति प्रकरण नामक ग्रंथ की रचना की।

मण्ड़न के भाई नाथा ने वास्तुमंजरी लिखी तथा उसके पुत्र गोविदं ने उद्धार धोरिणी, कलानिधि व द्वारदीपिका नामक ग्रंथ की रचना की।

      कुंभा ने संगीतराज, संगीत मीमांसा  सूडप्रबंध नामक संगीत ग्रंथों की रचना की।

चण्डीशतक की व्याख्या तथा गीत गोविंद पर रसिकप्रिया नाम की टीका लिखी।

संगीत रत्नाकर की टीका तथा कामराजरतिसार लिखा। कुंभा को नाट्यशास्त्र का अच्छा ज्ञान था

तथा वे वीणा बजाने में भी अति निपुण थे।

कान्ह व्यास :- एकलिंग महात्म्य का लेखक था तथा कुंभा का वैतनिक कवि था।

श्री सारंग व्यास :- कुंभा के संगीत गुरू थे।

रमाबाई 

 कुंभा की पुत्री, जो संगीतशास्त्र की ज्ञाता थी।

जावर में जोगिनीपुर मंदिर का निर्माण करवाया।

  कुंभा के समय प्रमुख जैन विद्वान :- 

सोम सुन्दर, मुनि सुन्दर, भुवन सुन्दर, जयचन्द्र सूरी तथा सोमदेव प्रमुख है।

 कुंभा के शासनकाल में 1439 ई. में जैन व्यापारी धरणक शाह ने रणकपुर के जैन मंदिर का निर्माण करवाया

इसे स्तंभों का मंदिर (1444 स्तंभ), चौमुखा मंदिर तथा वेश्याओं का मंदिर भी कहते है।

ये भगवान आदिनाथ का मंदिर है। इसका शिल्पी देपाक था।

      वृद्धा अवस्था में कुम्भा को उन्माद रोग हो गया था। कुम्भलगढ़ दुर्ग में कुम्भा की हत्या उसके पुत्र उदा ने कर दी थी।

जैन कीर्ति स्तंभ- 

11वीं सदी में निर्मित यह इमारत खवासन स्तंभ के नाम से जानी जाती है।

इसका निर्माण बघेर वंशीय शाह जीजा के द्वारा करवाया गया था। इसमें प्रमुख रूप से आदिनाथ की मूर्ति स्थापित है।

यह इमारत 7 मंजिल है, इसकी ऊँचाई 75 फुट है। यह इमारत चित्तौड़ में ठीक विजय स्तंभ के सामने स्थित है।

रायमल (1473-1509)

ऊदा के स्थान पर रायमल को शासक बनाया गया। कहा जाता है एकलिंग जी की वर्तमान चतुर्मूखी शिवलिंग की प्रतीक्षा इन्हीं के शासनकाल में स्थापित की गई।

रायमल के तीन थे- जयमल, पृथ्वीराज और सांगा।

पृथ्वीराज :- उडणा राजकुमार के नाम से प्रसिद्ध। इसी की पत्नी के नाम पर अजमेर दुर्ग का नाम तारागढ़ पड़ा।

इसकी छतरी कुंभलगढ़ दुर्ग में बनी हुई है।

सांगा (1509-1528 .)-

हिन्दूपत। हिंदूपति नाम से प्रसिद्ध था।

सांगा जब महाराणा बना तब दिल्ली का शासक सिकन्दर लोदी, गुजरात का महमूदशाह बेगड़ा तथा मालवा का नासिरशाह खिलजी था।

      सांगा अपने अज्ञातवास के दौरान श्रीनगर (अजमेर जिले में) के कर्मचंद पवार की सेवा में रहा था।

शासक बन कर कर्मचंद को रावत की पदवी दी।

तुजुक-ए-बाबरी

 में लिखता है कि बाबर के आक्रमण के समय भारत का सबसे शक्तिशाली शासक कृष्णदेवराय था तथा उत्तर का शासक राणा सांगा था।

बाबरनामा के अनुसार राणा सांगा ने भारत पर आक्रमण करने के लिए उसे आमंत्रित किया था।

      खानवा युद्ध से पूर्व बाबर ने तमगा नामक कर समाप्त कर दिया, युद्ध को जिहाद घोषित किया तथा स्वयं ने गाजी (धर्म योद्धा) उपाधि धारण की।

मुहम्मद शरीफ नामक ज्योतिष ने खानवा युद्ध में बाबर के हार की भविष्यवाणी की थी।

      बाबर अपनी आत्मकथा में कहता है कि चित्तौड़ में अत्यधिक गर्मी पड़ने व पानी की कमी होने से वह चित्तौड़ पर अधिकार नहीं करता है।

खानवा के युद्ध में सांगा का साथ देने वालों में मारवाड के राव गांगा की तरफ से मालदेव, मेड़ता के रायमल व रतन सिंह, बीकानेर से कल्याण आमेर का राजा पृथ्वीराज, डूँगरपुर का रावल उदयसिंह तथा काठियावाड़ से झाला अज्जा ने भाग लिया।

सांगा युद्ध मैदान में घायल हो गए तब इन्हीं झाला अज्जा ने सांगा का छत्र धारण कर सांगा का स्थान लिया।

हसनखाँ मेवाती तथा महमूद लोदी (इब्राहिम लोदी) ने भी सांगा की से युद्ध में भाग लिया था।

खानवा की हार के बाद सांगा के अधिकारियों द्वारा उसे कालपी में जहर दे दिया

जिससे 30 जनवरी 1528 ई. को इस लोक से विदा हो गये। माण्डलगढ़ में अंतिम संस्कार किया गया।

पाति पेरवन परम्परा-  

राजपूत कालीन एक प्राचीन परम्परा जिसे राजपूताना में पुनजीर्वित करने का श्रेय राणा सांगा को दिया जाता है।

राजपूताने का वह पहले शासक था जिसने अनेक राज्यों के राजपूत राजाओं को विदेशी जाति विरूद्ध संगठित कर उन्हें एक छत्र के नीचे लाया।

      खानवा युद्ध में हार का कारण सलहँदी तँवर द्वारा विश्वासघात बताया जाता है।

राणा रतन सिंह (1528-31 .)-

सांगा के बाद रत्नसिंह Mevad के शासक बनें। हाड़ी रानी कर्मवती ने सांगा के जीवित रहते ही अपने पुत्र विक्रमादित्य तथा उदयसिंह के लिए रणथम्भौर का किला मांगा लिया

तथा स्वयं उनकी संरक्षिका बन गई। राणा रत्न सिंह व कर्मवती के भाई सुरजन हाड़ा का साथ में आखेट खेलते हुए ही किसी बात पर विवाद हो गया जिसमें रत्नसिंह की मृत्यु हो गई। 1531 ई. में।

राणा विक्रमादित्य

      1531 ई. में राणा रतनसिंह के स्थान पर शासक बना।

      1534 ई. में गुजरात का शासक बहादूरशाह मेवाड़ पर आक्रमण करता है तथा उदयसिंह व विक्रमादित्य को सुरक्षित बूंदी भेज दिया जाता है।

देवलिये के रावत बाघसिंह को महाराणा का प्रतिनिधि (सेना का नेतृत्व) नियुक्त किया जाता है और Mevad का दूसरा शाका होता है।

राणा उदयसिंह

  • 1537 ई. में कुंभलगढ़ में उदयसिंह का राज्याभिषेक हुआ।
  • 1540 ई. में उदयसिंह व बनवीर के मध्य माहोली (मावली) गाँव में युद्ध हुआ
  • जिसमें उदयसिंह विजय रहें। 1540 में चित्तौड़ के स्वामी बन गये।
  • चित्तौड़ दुर्ग में बनवीर ने तुलजा भवानी के मंदिर का निर्माण कराया।
  • 1559 ई. में उदयसिंह ने उदयपुर शहर की नींव डाली तथा उदयसागर झील का निर्माण किया।
  • सितम्बर 1567 अकबर चित्तौड़ अभियान पर रवाना हुआ तथा उदयसिंह ने किले का भार जयमल व फत्ता पर छोड़कर ईडर चले गये।
  • जयमल-फत्ता वीरगति को प्राप्त हुए तथा फत्ता की रानी फूल कंवर ने चित्तौड़ दुर्ग में जौहर किया जिसे चित्तौड़ का तीसरा शाका कहते हैं।
  • अबुल फजल लिखता है कि चित्तौड़ विजय करने हेतु अकबर ने साबात का निर्माण करवाया जिसकी रक्षा में रहते हुए प्रतिदिन 200 आदमी मारे जाते थे।
  • 25 फरवरी 1568 को अकबर ने चित्तौड दुर्ग अधिकृत कर लिया।
  • 28 फरवरी 1572 को उदयसिंह का गोगुंदा में देहांत हो गया।
  • (होली के दिन) जयमल-फत्ता की मूर्तियाँ आगरा व बीकानेर के जूनागढ़ किले में लगाई गई थी।
  • 1557 ई. में उदयसिंह व अजमेर के हाजी खाँ के मध्य हरमाड़ा नामक स्थान पर युद्ध हुआ था।

राणा प्रताप (1540-1597 .)

जन्म– 9 मई 1540 कुंभलगढ़ में हुआ।

माताजयवंता बाईपाली के सोनगरा अखैराज की पुत्री थी।

  • उदयसिंह ने भटियाणी रानी (धीरबाई) के प्रभाव में जगमाल को अपना उत्तराधिकारी बनाया जिसका सामंतों ने विरोध किया
  • प्रताप का प्रथम राज्याभिषेक 28 फरवरी 1572 को गोगुंदा में हुआ रावत कृष्णदास ने तलवार बांधी तथा दूसरा राज्याभिषेक 1572 में कुंभलगढ़ में हुआ जहॉ राव चन्द्रसेन भी उपस्थित थे।
  • जगमाल अकबर की सेवा में चला गया जहॉ उसे जहाजपुर का परगना जागीर के रूप में दिया गया।
  • 1583 के दत्ताणी के युद्ध में उसकी मृत्यु हो गई।
  • मुस्लिम इतिहासकारों ने अपने ग्रंथों में प्रताप के नाम के लिए कीका शब्द का प्रयोग किया है।
  • मुगल शासक अकबर ने प्रताप से सुलह वार्ता के लिए 1572-73 के मध्य चार शिष्ट मण्डल प्रताप के पास भेज-
  • 1572 – जलाल खॉ कोरची
  • 1573 – कुवर मानसिंह
  • इस दौरान ही मानसिह  डूंगरपुर के महारावल आसकरण के मध्य बिलपण नामक स्थान पर युद्ध हुआ जिसमें महारावल की पराजय हुई।
  • सितम्बर 1573 – भगवन्तदास
  • दिसम्बर 1573 – टोडरमल

हल्दीघाटी का युद्ध (18 जून 1576)

  • रणछोड कृत राजप्रशस्ति, अमरकाव्यम्, माला सांद (झूलणा महाराणा प्रताप जीरा), नैणसी री ख्यात, सगत रासौ तथा अबुल फजल ने इस युद्ध को खमनोर का युद्ध कहा है।
  • बँदायूनी ने इसे गोगुन्दा का युद्ध कहा वह इस युद्ध में सेना के साथ था।
  • जबकि जेम्स टॉड ने प्रथम बार इस युद्ध को हल्दीघाटी युद्ध के नाम से संबोधित किया।
  • टॉड ने हल्दीघाटी को मेवाड़ की थर्मोपल्ली कहा था।
  • झाला बीदा ने प्रताप के छत्र को धारणकर प्रताप को सकुंशल युद्ध भूमि से बाहर निकाला।
  • चेतक की समाधि बलीचा गाँव में बनी हुई है।
  • अकबर ने उदयपुर फतह करने के उपलक्ष में एक सोने का सिक्का ढलवाया जिस पर अंकित था
  • सिक्का ढाला गया मुहम्मदाबाद उर्फ उदयपुर में, जो जीता जा चुका है।” मई 1577 अकबर अपनी राजधानी लौट गया।
  • हल्दीघाटी के युद्ध के बाद प्रताप के खिलाफ अकबर ने क्रम से चार लागों को भेजा था :-

महाराणा Mevad

भगवान दास

शाहबाज खान 1577, 78, 79

अब्दुर रहीम खानखाना 1580-81

जगन्नाथ कछवाह दिसम्बर 1584

  • शाहबाज खान 1577 अपने प्रथम अभियान में कुंभलगढ़ के अजेय दुर्ग को जीतने में सफल रहता है।
  • कुंभलगढ़ के किलेदार प्रताप के मामा भाण सोनगरा थे जो काम आते है।
  • शाहबाज खाँ, गाजी खाँ बदख्शी को दूर्ग का किलेदार नियुक्त करता है।
  • प्रताप कुंभलगढ़ से ईडर तथा वहाँ से चूलिया ग्राम पहुंच जाते है।
  • यहीं चूलिया ग्राम में प्रताप को ताराचन्द व भामाशाह मालवा की लूट से प्राप्त 25 लाख रू. व दो हजार अशर्फियाँ भेंट किया।
  • इसी समय रामा महासहाणी जो प्रधान था उसके स्थान पर भामाशाह को नियुक्त किया जाता है।
  • प्रताप ने 1582 ई. में दिवेर के शाही थाने पर हमला कर शाही थाने के संरक्षक सुल्तान खाँ को पराजित कर दिया। टॉड ने दिवेर को मेवाड़ का मैराथन कहाँ है। दिवेर के बाद कुंभलगढ़ को भी जीत लिया।
  • 1585 ई. में प्रताप ने चावंड के लूणा राठौड़ को परास्त कर चावंड को अपनी राजधानी बनाया।
  • 1585 के बाद अकबर ने प्रताप के विरूद्ध कोई अभियान नहीं किया
  • प्रताप ने चावंड को अपनी राजधानी बनाया तथा वहाँ महल एवं चामुण्डा माता का मंदिर बनाया।
  • 1597 ई. में बाघ का शिकार करते समय धनुष की प्रत्यंचा खींचने के दौरान उनकी आंतों में अंदरूनी चोट आ गई
  • जिसकी वजह से 19, जनवरी 1597 को प्रताप का निधन हो गया। बाडोली गाँव में प्रताप की 8 खम्भो वाली छतरी बनी हुई है।
  • रामा सांदू व माला सांदू नामक वीरों ने भी हल्दीघाटी युद्ध में भाग लिया था।
  • चक्रपाणि मिश्र :- मथुरा का विद्वान, प्रताप के दरबार में तीन गं्रथों की रचना की थी- विश्ववल्लभ, मुर्हुतमाला एवं राज्याभिषेक पद्धति।
  • पृथ्वीराज राठौड :- बीकानेर के शासक रायसिंह का भाई, इसे डिंगल का है होरस कहते हैं।
  • इसकी प्रसिद्ध रचना ‘वेलीकिसन रूकमणी री’ इसने प्रताप की प्रशंसा में भी दोहे लिखे।

प्रताप के व्यक्तित्व के बताते ये कथन-

  • बदायूंनी :- “गोगुंदा से फतेहपुर सीकरी लौटते समय राणा की हार पर किसी ने विश्वास नहीं किया।”
  • खानखाना :- “तुर्की का पतन हो जावेगा पर प्रताप का वतन और धर्म शाश्वत रहेगा।”
  • अमरसिंह ने शेरपुर ठिकाने से खानखाना परिवार की स्त्रियों को बंदी बना लिया था
  • किंतु प्रताप के आदेश से पुनः सआदर भिजवा दिया। यह प्रताप के उच्च आदर्शों को बताते हैं।

अमरसिंह (1597-1615)

  • एकमात्र शासक जो चावंड में सिंहासन पर बैठा (राज्याभिषेक हुआ)
  • जहाँगीर शासक बनते ही Mevad को अपनी प्राथमिकता में ला दिया तथा जहांगीर ने मेवाड़ी सामंतों में फूट डालने के लिए अमरसिंह के चाचा सगर को चित्तौड का महाराणा, घोषित कर दिया।
  • जहाँगीर ने Mevad पर चार अभियान भेजे-
  • शहजादा परवेज – 1605
  • महाबत खाँ – 1608
  • अब्दुल्ला खाँ – 1609
  • राणपुर का युद्ध – अब्दुल्ला खाँ  मेवाड़ के मध्य
  • बादशाह खुर्रम – 1613 ने चावंड पर अधिकार कर लिया 
  • 1615 ई. में जहाँगीर  अमरसिंह के मेवाड़-मुगल संधि होती है। यह संधि गोगुदां में हुई जिसमें महाराणा की तरफ से शुभकर्ण  हरिदास झाला उपस्थित हुए थे।
  • आहाड के महासतियां में पहली छतरी अमरसिंह की है।
  • अमरसिंह राजपाट छोड़कर नौ-चोकी चला जाता है।

कर्ण सिंह (1620-1628 .)

  • कर्ण सिंह के समय खुर्रम जगमंदिर में शरण लेता है। जगमंदिर का निर्माण कार्य जगतसिंह के समय पूर्ण होता है।

जगतसिंह प्रथम (1628-1652 .)

  • जगदीश मंदिर का निर्माण करवाया। कहा जाता है कि भगवान जगन्नाथ ने स्वप्न में आकर मंदिर बनाने को कहा था।
  • यह मंदिर पंचायतन श्रेणी का है।
  • यह मंदिर अर्जुन की निगरानी में सूत्रधार भाणा व उसके पुत्र मुकुन्द की अध्यक्षता में बना।
  • मंदिर की विशाल जगन्नाथ राय प्रशस्ति की रचना कृष्णभट्ट ने की।
  • जगतसिंह का समय मेवाडी चित्रकला का स्वर्णकाल माना जाता है।
  • जगतसिंह की धाय माँ नौजु धाय ने एक मंदिर का निर्माण कराया जो धाय मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।

राजसिंह (1652-1650 )

  • औरंगजेब ने उत्तराधिकारी संघर्ष में राजसिंह से सहायता हेतु इन्द्रभट्ट को भेजा।
  • 1679 ई. में राजसिंह ने किशनगढ़ की राजकुमारी चारूमति से विवाह करने पर औरंगजेब से संबंध बिगड़ जाते है।
  • 1679 ई. में औंरगजेब ने जजिया कर लगाया तथा औरंगजेब ने जब मंदिरों को नष्ट करने के आदेश दिए तब मथुरा के गुस्साई जी दामोदर दास व गोविन्द दास जी ने राजसिंह की सहायता से सिहाड़ गॉव में श्रीनाथ जी की प्रतिमा को स्थापित किया।
  • औरंगजेब स्वयं 1679 को उदयपुर अभियान पर आया।
  • 1662 ई. में राजसमंद झील की नींव रखी जो 1668 में पूर्ण हुई।
  • वहाँ नौ-चौकी पर 25 शिलाओं पर शिलालेख खुदवाया जो विश्व का सबसे बड़ा शिलालेख है।
  • इसे रणछोड़ भट्ट तैलंग में उत्कीर्ण किया था। इसे जयसिंह ने निश्चित स्थान पर लगवाया।
  • राजसिंह ने अपनी माता जैनादे के नाम पर बड़ी गाँव में जैनासागर का निर्माण करवाया था।
  • मेवाड़ के महाराणाओं में राजसिंह को विजयकटकातु के नाम से जाना जाता है
  • राजसिंह ने सदैव अपनी प्रजा का ध्यान रखते हुए सैन्य व्यवस्था का संचालन किया, जिसके कारण इस उपाधि से नवाजा गया।

जयसिंह (1680-98 .)

  • शहजादे आजम से 1681 में संधि कर Mevad में जजिया समाप्त् कर दिया।
  • इसके बदले माण्डलपुर और बदनोर के प्रमुख मुगल साम्राज्य को दे दिये
  • 1691 ई. में जयसमंद झील का निर्माण करवाया।

अमरसिंह द्वितीय (1698-1710)

  • प्रसिद्ध देबारी का समझौता :- अमरसिंह द्वितीय, सवाई जयसिंह व जोधपुर के मध्य हुआ था।
  • अजित सिंह राजा बनने में सहायता करने का वचन दिया था व अमरसिंह ने अपनी पुत्री चन्द्रकुँवरी का विवाह सवाई जयसिंह से करना निश्चित किया था
  • उससे उत्पन्न संतान ही जयपुर का शासक बनेगा ऐसा तय हुआ।
  • इन्ही के शासनकाल में रियासत के प्रबंध, जागीरदार व सामंतों से संबंधित नियम बनाकर Mevad के प्रशासन को सुदृढ़ किया
    • यहाँ तीन प्रकार के सामंत होते थे- 16,32 व गोल।

संग्राम सिंह द्वितीय

  • 17 जुलाई 1734 को हुरड़ा सम्मेलन की अध्यक्षता करना निश्चित हुआ था।
  • नादिरशाह के आक्रमण के समय 1739 ई. Mevad के शासक जगतसिंह थे।
  • उदयपुर में सहेलियों की बाड़ी का निर्माण करवाया। किंतु इसी दौरान इनकी मृत्यु होने से इनके पुत्र जगतसिंह द्वारा हुरड़ा सम्मेलन की अध्यक्षता की।

भीम सिंह

  • राजकुमारी कृष्ण कुमारी का विवाह जोधपुर शासक भीमसिंह से निश्चित हुआ किंतु उनकी मृत्यु होने से यह विवाह जयपुर शासक जगतसिंह से निश्चित हो जाता है
  • किंतु जोधपुर शासक मानसिंह विवाद शुरू कर देते हैं। जिसकी परिणति बड़ी दुःखद होती है
  • तथा अंजीत सिंह चुड़ावत व अमीर खाँ पिण्डारी के सुझाव पर कृष्णाकुमारी को जहर दे दिया जाता है।
  • गिंगोली का युद्ध (1807, नागौर) :- Mevad व जयपुर की सम्मिलित सेना जोधपुर को पराजित कर देती है।
  • कर्नल टॉड पहले पॉलिटिकल एजेंट नियुक्त होते है।

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