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August 14, 2020

क्रिया क्या होती है व कितने प्रकार की होती है What Is Kriya???

क्रिया

क्रिया का अर्थ है करना

क्रिया के बिना कोई वाक्य पूर्ण नहीं होता किसी वाक्य में कर्ता कर्म तथा काल की जानकारी भी क्रियापद के माध्यम से ही होती है

तथा संस्कृत में क्रिया रूप को धातु कहते हैं जैसे :- खाना , नाचना , खेलना , पढना , मारना , पीना , जाना , सोना , लिखना , जागना , रहना , गाना , दौड़ना आदि।

धातु – हिंदीक्रिया पदों का मूल रूप ही धातु है धातु में ना जोड़ने से हिंदी के क्रियापद बनते हैं

परिभाषा – जिस शब्द से किसी कार्य के करने या होने का बोध होता है उसे क्रिया कहते हैं 

जैसे -लिखना,हँसना आदि

क्रिया के भेद ( Difference of action )

कर्मकाल के आधार तथा संरचना के आधार पर क्रिया के विभिन्न भेद किए जाते हैं

कर्म के आधार पर क्रिया के दो भेद हैं

  1. अकर्मकक्रिया
  2. सकर्मकक्रिया

1. सकर्मकक्रिया – जिस क्रिया का फल कर्ता को छोड़कर कर्म पर पड़े वह सकर्मकक्रिया कहलाती है 

जैसे -भूपेन्द्र दूध पी रहा है, नीतू खाना बना रही है ।

बच्चा चित्र बना रहा है, गीता सितार बजा रही है ।

सकर्मकक्रिया के दो उपभेद किये जाते हैं –

  • एक कर्मकक्रिया – जिस वाक्य में क्रिया के साथ एक कर्म प्रयुक्त हो उसे एक कर्मकक्रिया कहते हैं।
  • जैसे -मां पढ़ रही है।
  • द्विकर्मकक्रिया – जिस वाक्य में क्रिया के साथ दो कर्म प्रयुक्त हो उसे द्विकर्मकक्रिया कहते हैं।
  • जैसे – अध्यापक छात्रों को कंप्यूटर सिखा रहे हैं।

2. अकर्मकक्रिया – जिस वाक्य में क्रिया का प्रभाव या फल कर्ता पर पड़ता है क्योंकि कर्म प्रयुक्त नहीं होता उसे अकर्मकक्रिया कहते हैं जैसे -कुत्ता भौंकता है। कविता हँसती है। टीना होती है। आशा सोती है। मीना गाती है।

सकर्मक और अकर्मकक्रिया का पता कैसे चलता है

क्रियावाचक शब्द से पहले क्या शब्द से प्रश्न करने से, स्वतः संपादित क्रियाएं सदैव अकर्मक मानी जाती है, यदि आना जाना इत्यादि गत्यर्थक क्रियाओं वाले वाक्य में स्थान का नाम भी दिया हुआ हो त्रतो वहाँ सकर्मक नहीं तो अकर्मक मानी जाती है.

पेड़ से पत्ते गिर रहे हैं। अकर्मक
वह पेड़ से पत्ते गिरा रहा है। सकर्मक

सड़क पर पत्थर पड़ा है। अकर्मक

बच्चे गये। अकर्मक
बच्चे विद्यालय गये। सकर्मक

प्रयोग तथा संरचना के आधार

वाक्य में क्रियाओं का प्रयोग कहाँ किया जा रहा है किस रूप में किया जा रहा है इसके आधार पर भी क्रिया के निम्न भेद होते हैं –

  1. सामान्यक्रिया
  2. संयुक्तक्रिया
  3. प्रेरणार्थकक्रिया
  4. पूर्वकालिकक्रिया
  5. नाम धातुक्रिया
  6. कृदंतक्रिया
  7. सजातीयक्रिया
  8. सहायकक्रिया

संरचना के आधार पर

  • सयुक्तक्रिया
  • नामधातुक्रिया
  • प्रेरणार्थकक्रिया
  • पूर्वकालिकक्रिया
  • कृदंतक्रिया

संयुक्तक्रिया – जब दो या दो से अधिक के भिन्न अर्थ रखने वाली क्रियाओं का मेल हो उसे संयुक्तक्रिया कहते हैं 

1. मोहन नाचने लगा ,
2. प्रियंका ने दूध पी लिया
3. उसने कर लिया
4. वह खा चुका

इन वाक्यों में नाचने लगा, पी लिया, कर लिया, खा चुका इन शब्दों को संयुक्तक्रिया कहते है इनमे दो क्रियाएँ का योग है

इसमें पहलीक्रिया मुख्यक्रिया होती है और दूसरीक्रिया सहायकक्रिया के रूप में मुख्यक्रिया में विशेषता लाती है

नाम धातुक्रिया – संज्ञा सर्वनाम विशेषण शब्द जब धातु की तरह प्रयुक्त होते हैं उन्हें नामधातु कहते हैं और इन नामधातु शब्दों में जब भी प्रत्यय लगाकरक्रिया का निर्माण किया जाता है तब वह शब्द नामधातुक्रिया कहलाते हैं 

जैसे – टकराना ,शरमाना ,ललचना ,सठियाना ,गरमाना ,अपनाना ,दोहराना ,चिकनापन आदि

जैसे – नरेश ने सुरेश का कमरा हथिया लिया।

प्रेरणार्थकक्रिया – जब कर्ता स्वयं कार्य का संपादन ना कर किसी दूसरे को करने के लिए प्रेरित करें या करवाएं उसे प्रेरणार्थकक्रिया कहते हैं

 जैसे –सुनना, लिखना, पढ़ाना, कराना

  1. अध्यापक बच्चे से पाठ पढवाता है
  2. रमेश अपने बेटे से काम करवाता है
  3. सरपंच ने गांव में तालाब का निर्माण करवाया

  • पूर्णकालिकक्रिया – जब किसी वाक्य में दो क्रियाएं प्रयुक्त हुई हो तथा उनमें से एकक्रिया दूसरीक्रिया से पहले संपन्न हुई हो तो पहले संपन्न होने वाली क्रिया पूर्वकालिकक्रिया कहलाती है 
  • इन क्रियाओं पर लिंग ,वचन ,पुरुष, काल आदि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। 
  • ये अव्यय तथा क्रिया विशेषण के रूप में प्रयुक्त होती है । मूल धातु में ‘कर’ लगाने से सामान्यक्रिया को पूर्वकालिकक्रिया का रुप दिया जा सकता है,

जैसे –
1. ख़िलाड़ी क्रिकेट खेलकर बैठ गए
2. श्याम पढ़कर सो गया
3. अनुज खाना खाकर स्कूल गया
4. बच्चा दूध पीते ही सो गया।

तात्कालिकक्रिया – यह क्रिया भी मुख्यक्रिया से पहले समाप्त हो जाती है ,पर इसमें और मुख्य क्रय में समय का अंतर नहीं होता ,केवल क्रम का अंतर होता है

जैसे –
1. वह आते ही सो गया
2. शेर को देखते ही वह बेहोश हो गया

कृदंतक्रिया – क्रिया शब्दों में जुड़ने वाले प्रत्यय कृत प्रत्यय कहलाते हैं तथा प्रत्यय के योग से बने शब्द कृदंत कहलाते हैं

क्रिया शब्दों के अंत में प्रत्यय योग से बनी क्रिया कृदंतलक्रिया कहलाती है क्रिया चल, कृदंतक्रिया चलना ,चलता ,चल कर

यौगिकक्रिया – जिस वाक्य में दो क्रियाएँ एक साथ आती हो और दोनों मिलकर मुख्यक्रिया का काम करती हो ,उसे यौगिकक्रिया कहते है

इसमें पहलीक्रिया पूर्णकालिक होती है जैसे –
1. वह समान रख गया
2. परीक्षा सिर पर आ पहुँची है
3. मैंने पत्र लिख भेजा

द्विकर्मकक्रिया– जिस सकर्मकक्रिया का फल दो कर्मों पर पड़े , उसे द्विकर्मकक्रिया कहते है जैसे –
1. रमेश ने साँप को डंडा मारा
2. सोहन दूध पी रहा है

काल के आधार

जिस काल में कोईक्रिया होती हैं उस काल के नाम के आधार पर क्रिया का भी नाम रख देते हैं।अत : काल के अनुसार क्रिया तीन प्रकार की होती है

भूतकालिकक्रिया –  क्रिया का वह रूप जिसके द्वारा बीते समय में कार्य के संपन्न होने का बोध होता है भूतकालिकक्रिया कहलाती है

वर्तमान कालिकक्रिया –  क्रिया का वह रूप जिससे वर्तमान समय में कार्य के संपन्न होने का बोध होता है वर्तमान कालक्रिया कहलाती है

भविष्यत कालीक्रिया –  क्रिया का वह रूप जिसके द्वारा आने वाले समय में कार्य के संपन्न होने का बोध होता है भविष्य काली क्रिया कहते हैं

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August 11, 2020

मेवाड़ (Mevad) या गुहिल वंश का इतिहास जाने??

मेवाड़ में गुहिल वंश की स्थापना

उधर मेवाड़ में गुहिल वंश की स्थापना 566 ई. में गुहिलादित्य ने की थी।

गुहिलादित्य ने अपनी राजधानी नागदा (उदयपुर) को बनाया था।

गुहिलादित्य के सिक्के सांभर संग्रहालय में स्थित हैं।

गुहिलादित्य का वंशज महेन्द्र द्वितीय का पुत्र कालभोज/मालभोज था।

कालभोज हारित ऋषि की गायें चराता था। हारित ऋषि ने कालभोज को आशिर्वाद व बप्पारावल की उपाधि दी और कहा जा रे जा बप्पा रावल मानमोरी को हरा डाल।

हारित ऋषि एकलिंग जी की उपासना करते थे। एकलिंग को गुहिलवंश के शासक अपना कुलदेवता मानते हैं।

मुहणौत नैणसी ने गुहिलों की 24 शाखाओं का वर्णन किया हैं। गुहिल वंश के नागादित्य की हत्या कर भीलों ने ईडर का क्षेत्र छीन लिया था।

हारित ऋषि के आशिर्वाद से बप्पारावल ने 734 ई. में मौर्य वंश के शासक मानमोरी को हरा दिया था,

तथा मेवाड़ में गुहिल साम्राज्य की स्थापना की थी। इस आक्रमण का उल्लेख अबुल- फजल ने आयने अकबरी में भी किया है।

मेवाड़ के शासक एकलिंगजी को अपना दीवान मानकर राजधानी छोड़ने से पूर्व एकलिंग जी की स्वीकृति लेते थे वह आसकां लेना कहलाती थी।

बप्पारावल (734 – 753 ई.)

बप्पारावल मेवाड़ में गुहिल साम्राज्य का संस्थापक था

मेवाड़ में सर्वप्रथम सोने के सिक्के बप्पारावल ने ही चलाये थे।

  • बप्पारावल ने कैलाशपुरी (उदयपुर) में एकलिंग जी के मन्दिर का निर्माण करवाया था।
  • इसकी समाधि नागदा में हैं,

तथा बप्पा के बारे में कहा जाता है कि बप्पा 35 हाथ की धोती, 16 हाथ का दुपट्टा पहनता था तथा 32 मन का खड्ग हाथ में रखता था।

अल्लट (951- 954 ई.)

  • अल्लट के काल में मेवाड़ में पहली बार नौकरशाही आरम्भ हुई थी।
  • अल्लट ने अपनी दूसरी राजधानी आहड़ (उदयपुर) को बनाया था।
  • इसे राजस्थान का प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय विवाह माना जाता हैं।
  • अल्लट ने हूणों की सहायता से ही अपने साम्राज्य का विस्तार किया था।

रण सिंह या कर्ण सिंह-

  • इसके काल में गुहिल वंश दो शाखाओं में विभाजित हो गया था।
  • इसके एक पुत्र राहप ने सिसोदा ग्राम बसाकर राणा शाखा की शुरूआत की थी
  • तथा दूसरे पुत्र क्षेमसिंह ने रावल शाखा की शुरूआत की थी
  • रण सिंह के बाद रावल शाखा ने ही मेवाड़ पर शासन किया था।

जैत्र सिंह (1213- 1253 ई.)

  • जैत्रसिंह की भी आरम्भ में राजधानी नागदा थी,
  • इसके समकालीन दिल्ली में गुलाम वंश का शासक 1210 से 1236 ई. तक इल्तुतमिष था।
  • इल्तुतमिष ने साम्राज्यवादी नीति के कारण नागदा पर बार – बार आक्रमण किया था
  • तथा नागदा को लूटा भी था। इल्तुतमिष द्वारा नागदा पर किये गये आक्रमण भूतला के युद्ध के नाम से जाने जाते हैं।
  • भूतला के युद्ध में विजय जैत्र सिंह की हुई थी, जिसकी जानकारी जयसिंह सूरी का ग्रन्थ ’’हम्मीर मदमर्दन’’ देता हैं।
  • इल्तुतमिष के आक्रमणों से परेशान होकर जैत्रसिंह ने अपनी राजधानी नागदा से चितौड़ स्थानान्तरित की थी।
  • जैत्रसिंह दिल्ली के गुलाम वंश के शासकों के समय मेवाड़ का सबसे बलवान शासक था,
  • तथा जैत्रसिंह ने मेवाड़ राज्य में नई शक्ति का संचार करने के लिए नाडोल (पाली) के चैहान वंशीय शासक उदयसिंह को हराया था।

तेजसिंह (1253- 1269 ई.)-

  • इसकी उपाधियां परमभट्टारक, महाराजाधिराज व परमेश्वmर थी।
  • इसके काल में बलबन ने मेवाड़ पर असफल आक्रमण किया था।
  • इसके काल में आहड़ (उदयपुर) से मेवाड़ का प्रथम चित्रित ग्रन्थ 1260 ई. का श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चर्णि मिला था।
  • इस ग्रन्थ को चित्रित कमलचन्द्र ने किया था।

समरसिंह (1269- 1301 ई.)-

  • इसके काल में कुम्भकरण ने नेपाल में गुहिल वंश की स्थापना की थी।
  • समरसिंह को कुम्भलगढ़ प्रशि‍स्ति में ‘‘शत्रुओं की शक्ति का अपहर्ता’’ आबू शिलालेख में ‘‘ तुर्कों से गुजरात का उद्धारक‘‘ तथा चीरवे के लेख में ‘‘ शत्रुओं का संहार करने में सिंह सदृष और सूर‘‘ कहा गया हैं।
  • समरसिंह के बाद में मेवाड़ पर शासन रतनसिंह ने किया था।

रावल रतनसिंह (1301-1303 ई.)-

  • रावल रतनसिंह की जानकारी कुम्भलगढ़ प्रशस्ति व एकलिंग महात्म्य से मिलती हैं।
  • रतनसिंह के समकालीन 1296 से 1316 ई. तक दिल्ली का शासक खिलजी वंश का अलाउद्दीन खिलजी था।
  • अलाउद्दीन खिलजी साम्राज्यवादी नीति के तहत मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए 28 जनवरी 1303 को दिल्ली से रवाना हुआ।
  • अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने पड़ाव गंभीरी व बेड़च नदियों के बीच डाला था।
  • लेकिन अलाउद्दीन खिलजी स्वयं ने अपना पड़ाव चितौड़ी पहाड़ी पर डाला था।
  • लगभग 8 महिने के इस घेरे के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने 26 अगस्त 1303 को चितौड़दुर्ग पर रतनसिंह को मारकर अधिकार किया था।
  • इस युद्ध में रतनसिंह ने केसरिया तथा उसकी रानी पद्मिनी ने 1600 महिलाओं के साथ ऐतिहासिक जौहर किया था।
  • जहां पर जौहर किया था वहाँ पर जौहर मेला प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल दशमी को लगता हैं।
  • इस युद्ध में पद्मिनी के चाचा गौरा व भाई बादल (गौरा व बादल आपस में चाचा भतीजा थे)
  • रतनसिंह के सेनापति थे जो लड़ते हुए मारे गये थे। यह मेवाड़ का प्रथम जौहर था लेकिन राजस्थान के इतिहास का दूसरा जौहर इसे ही माना जाता हैं।
  • रतनसिंह की मृत्यु के साथ ही मेवाड़ से रावल शाखा की समाप्ति हो चुकी थी ।

विशेष-

  • शेरशांह सूरी के दरबारी कवि मलिक मौहम्मद जायसी के ग्रन्थ पद्मावत के अनुसार अलाउद्दीन खिलजी ने चितौड़ पर आक्रमण रतनसिंह की रूपवती रानी पद्मिनी को पाने के लिए किया था।
  • पद्मावत ग्रन्थ की रचना 1540 ई. में हुई थी तथा इस ग्रन्थ का दूसरा नाम छिताई चरित्र हैं।
  • अलाउद्दीन खिलजी के साथ उसका दरबारी कवि अमीर खुसरो था
  • जिसने चितौड़ युद्ध का सजीव वर्णन अपने ग्रन्थ खजाइन-उल- फुतुह/तारीख- ए – इलाही में किया था।
  • अलाउद्दीन खिलजी ने चितौड़ का शासन अपने बेटे खिज्र खां को सौंपा तथा चितौड़ का नाम खिज्राबाद रखा था।
  • खिज्रखां ने चितौड़ दुर्ग के आसपास मन्दिरों को तुड़वाया दिया था
  • तथा गम्भीरी नदी पर पुल बनवाया और चितौड़गढ़ की तलहटी में मकबरा बनवाया था।
  • खिज्रखां चितौड़ का शासन मालदेव चैहान को सौंपकर दिल्ली चला गया था।
  • चितौड़ का शासन 1326 ई. में मालदेव चैहान का बेटा जयसिंह/जैसा कर रहा था।
  • उधर सिसोदा ग्राम में राणा शाखा का जागीरदार हम्मीर सिसोदिया था,
  • जिसने 1326 ई. में जयसिंह पर आक्रमण कर उसको पराजित कर मेवाड़ में राणा शाखा का शासन आरम्भ किया था।

हम्मीर सिसोदिया (1326- 1364 ई.)-

  • हम्मीर सिसोदिया को भारत में छापामार युद्ध प्रणाली का जन्मदाता माना जाता हैं
  • तथा हम्मीर के बाद शिवाजी को भारत में छापामार युद्ध प्रणाली का जन्मदाता माना जाता हैं।
  • कीर्ति स्तम्भ प्रशि‍स्ति में हम्मीर की उपाधि विषमघाटी पंचानन तथा महाराणा कुम्भा की टीका रसिक प्रिया में हम्मीर को वीर राजा की उपाधि दी गई हैं।
  • हम्मीर की जानकारी जयसिंह सूरी का ग्रन्थ हम्मीर मदमर्दन देता हैं।
  • टॉड ने हम्मीर को अपने समय का प्रबल हिन्दूराजा कहा था।
  • हम्मीर ने चितौड़ में राणा शाखा आरम्भ की तथा इसके बाद के सारे मेवाड़़ के शासक महाराणा कहलाये थे।

क्षेत्रसिंह (1364- 1382 ई.)-

  • इसने मालवा के दिलावर खां गौरी को हराया था, तथा बूंदी के लाल सिंह हाड़ा को भी इसने ही हराया था।

लक्षसिंह/लाखा (1382- 1421 ई.)-

  • लाखा के काल में पिच्छू/छीतर बन्जारे ने उदयपुर में पिछोला झील का निर्माण करवाया था,
  • इस झील का निर्माण इसने अपने बैल की स्मृति में करवाया था।
  • इस झील के किनारे बीजारी नामक स्थान पर गलकी नटनी का चबूतरा बना हुआ हैं।
  • लाखा ने बदनौर के पास गयासुद्दीन तुगलक को हराया था तथा हिन्दुओं पर लगने वाला तीर्थकर बन्द करवाया था।
  • इसने गुजरात के जफर खां के आक्रमण को असफल किया था।
  • लाखा ने बूंदी के किले को जीतने का प्रण लिया था लेकिन बूंदी के किले को लाखा फतह नहीं कर सका था
  • अन्त में अपने प्रण को पूरा करने के लिए नकली मिट्टी का किला बनाकर उसको जीतकर अपना प्रण पूरा किया था।
  • लाखा के काल में उदयपुर के जावर में चांदी की खान निकली थी
  • जो उस समय की एशिया की सबसे बड़ी चांदी की खान थी।
  • जावर को उस समय योगिनीपट्टन के नाम से जाना जाता था।
  • लाखा के दरबार में झोटिंग भट्ट व धनेश्वर भट्ट नामक विद्वान रहते थे।

विशेष- 

मारवाड़ के राजकुमार रणमल राठौड़ ने लाखा की शादी सशर्त अपनी बहिन हंसाबाई से की थी और शर्त यह रखी कि जो भी हंसाबाई का पुत्र होगा वही मेवाड़ का अगला शासक होगा।

हंसाबाई की शादी से पहले ही लाखा का बड़ा पुत्र राणा चूड़ा था।

लाखा की शर्त पूरी करने के लिए चूड़ा ने मेवाड़ का अगला शासक नहीं बनना स्वीकार किया था।

राणा चूड़ा को मेवाड़ का भीष्मपितामह कहा जाता हैं।

मोकल (1421-1433 ई.)-

  • महाराणा मोकल लाखा व हंसाबाई का पुत्र था, लाखा ने मरते वक्त मोकल का संरक्षक राणा चूड़ा को बनाया था।
  • चूड़ा हंसाबाई का सौतेला पुत्र था जिसके कारण हंसा बाई चूड़ा को शक की दृष्टि से देखती थी।
  • हंसाबाई के शक से परेशान होकर चूड़ा माण्डू (मालवा- मध्यप्रदेश) चला गया था।
  • चूड़़ा के माण्डू जाने के बाद हंसाबाई ने मोकल का संरक्षक अपने भाई रणमल राठौड़ को बनाया था।
  • रणमल राठौड़ ने मेवाड़ में बड़े- बड़े पदों पर राठौड़ों की नियुक्ति आरम्भ कर दी तथा मेवाड़ी सरदार राघवदेव की हत्या करवा दी थी।
  • मोकल ने 1428 ई. में रामपुरा के युद्ध में नागौर के फिरोज खां को हराया था।
  • मोकल ने चितौड़ दुर्ग के समाधिश्वयर मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया था
  • इस मन्दिर का निर्माता राजा भोज (मालवा का परमार शासक) था तथा प्राचीन नाम त्रिभुवन था।
  • मोकल द्वारा इसका जीर्णोद्धार करवाने के कारण इस मन्दिर को मोकल जी का मन्दिर भी कहते हैं।
  • मोकल ने एकलिंगजी के मन्दिर के चारों ओर परकोटा बनवाया था
  • इसके दरबार में शिल्पी मना, फना तथा विसल थे। मोकल के दरबार में विद्वान योगेश्वर व भट्ट विष्णु थे
  • तथा मोकल ने वेदाध्ययन के प्रबन्ध की व्यवस्था की थी।

विशेष-

  1433 ई. में जीलवाड़ा के युद्ध में महपा पंवार के कहने पर चाचा व मेरा ने मोकल की हत्या कर दी थी।

मोकल की पत्नी का नाम सौभाग्यदेवी था तथा इनका पुत्र कुम्भा था।

महाराणा कुंभा (1433-66)

जन्म – 1403 में देवगढ़ के समीप

पिता   – मोकल

माता – सौभाग्यदेवी

उपाधियाँ- ‘महाराजाधिराज, रावराय, राणेराय, राजगुरू, हिंदू सुरताण अभिनवभरताचार्य, रणेरासो, हालगुरू (शासन कला का सर्वोच्च शासक), राजगुरू, 

दानगुरू, परमगुरू, नरपति, अखपति, गैनपति व छापगुरू (छापामार युद्ध पद्धति में निपुण) प्रमुख उपाधियाँ थी।

मुस्लिम शासकों ने हिंदू सुरताण  की उपाधि दी थी।

कुंभा के द्वारा लड़े गए प्रमुख युद्ध

अर्बली का युद्ध :- कुंभा व जोधा के मध्य लड़ा गया जिसमें जोधा पराजित हुआ।

सारंगपुर का युद्ध (1437) :- कुंभा व मालवा के शासक महमूद खिलजी व के मध्य लड़ा गया जिसमें महमूद खिलजी की हार हुई।

चम्पानेर की संधि (1453 .) :- गुजरात का सुल्तान कुतुबुद्दीन व मालवा का शासक महमूद ने कुंभा के विरूद्ध चम्पानेर की संधि की किन्तु कुंभा ने दोनों को पराजित कर दिया।

कुंभा की स्थापत्य कला को विशेष देन है

 कविराज श्यामलदास के अनुसार कुंभा ने मेवाड़ राज्य में 84 में से 32 दुर्गो का निर्माण करवाया।

कुंभा ने अपनी पत्नी कुंभलदेवी की स्मृति में कुंभलगढ़ का निर्माण किया इसे मछिन्दरपुर के नाम से भी जाना जाता है। इसमें बने कुंभा के महल को कटारगढ़ कहते है।

कीर्ति  स्तभ (विजय स्तंभ)-

  कीर्ति-स्तंभ के सूत्रधार जेता थे जिसकी सहायता इनके पुत्र नापा व पूंजा ने की थी।

यह स्तंभ 120 फुट ऊँचा तथा 30 फुट चौड़ा है। इसमें 157 सिढ़ियाँ है। यह नौ मंजिला है अतः इसे नौखण्डा महल भी कहते है।

इसे हिन्दू मूर्तिकला का विश्वकोष भी कहा जाता है। 

डॉ. उपेन्द्रनाथ डे ने इसे विष्णु-स्तंभ कहा है। क्योंकि इस स्तभ के मुख्य द्वारा पर भगवान विष्णु की मूर्ति है।

 फर्ग्यूसन ने लिखा है कि “ये रोम के टार्जन के समान है। लेकिन इसकी कला उसकी अपेक्षा अधिक उन्नत है।

यह रोमन कला कृतियों से कहीं अधिक’ उत्कृष्ठ कलाकृति है।” कीर्ति सतंभ की तीसरी मंजिल पर अरबी भाषा में नौ बार अल्लाह लिखा हुआ है

जो कृम्भा की धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीक है। इसे, हिन्दू देवी-देवताओं का अजायबघर भी कहते है।

कुंभा में चित्तौड़ में कुंभश्याम  वराह मंदिर का निर्माण करवाया तथा एकलिंग जी में मंदिर का जीर्णोद्वार करवाया।

 कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति की रचना अत्रि, कवि और महेश ने की थी। अत्रि की मृत्यु हो जाने पर महेश ने इसे पूर्ण किया।

मण्डन कुंभा का मुख्य वास्तुकार था जिसने कुंभलगढ़ दुर्ग ही रचना की।

वास्तुकार मण्डन गुजरात निवासी था, इसकी छतरी शिक्षा नदी के किनारे उन्जैन में बनी हुई है।

इसी स्थान पर दुर्गादास राठौड की छतरी भी है।

मण्डन ने राजवल्लभ, प्रसादमण्डन, वास्तु मण्डल, रूप मण्डल, व देवमूर्ति प्रकरण नामक ग्रंथ की रचना की।

मण्ड़न के भाई नाथा ने वास्तुमंजरी लिखी तथा उसके पुत्र गोविदं ने उद्धार धोरिणी, कलानिधि व द्वारदीपिका नामक ग्रंथ की रचना की।

      कुंभा ने संगीतराज, संगीत मीमांसा  सूडप्रबंध नामक संगीत ग्रंथों की रचना की।

चण्डीशतक की व्याख्या तथा गीत गोविंद पर रसिकप्रिया नाम की टीका लिखी।

संगीत रत्नाकर की टीका तथा कामराजरतिसार लिखा। कुंभा को नाट्यशास्त्र का अच्छा ज्ञान था

तथा वे वीणा बजाने में भी अति निपुण थे।

कान्ह व्यास :- एकलिंग महात्म्य का लेखक था तथा कुंभा का वैतनिक कवि था।

श्री सारंग व्यास :- कुंभा के संगीत गुरू थे।

रमाबाई 

 कुंभा की पुत्री, जो संगीतशास्त्र की ज्ञाता थी।

जावर में जोगिनीपुर मंदिर का निर्माण करवाया।

  कुंभा के समय प्रमुख जैन विद्वान :- 

सोम सुन्दर, मुनि सुन्दर, भुवन सुन्दर, जयचन्द्र सूरी तथा सोमदेव प्रमुख है।

 कुंभा के शासनकाल में 1439 ई. में जैन व्यापारी धरणक शाह ने रणकपुर के जैन मंदिर का निर्माण करवाया

इसे स्तंभों का मंदिर (1444 स्तंभ), चौमुखा मंदिर तथा वेश्याओं का मंदिर भी कहते है।

ये भगवान आदिनाथ का मंदिर है। इसका शिल्पी देपाक था।

      वृद्धा अवस्था में कुम्भा को उन्माद रोग हो गया था। कुम्भलगढ़ दुर्ग में कुम्भा की हत्या उसके पुत्र उदा ने कर दी थी।

जैन कीर्ति स्तंभ- 

11वीं सदी में निर्मित यह इमारत खवासन स्तंभ के नाम से जानी जाती है।

इसका निर्माण बघेर वंशीय शाह जीजा के द्वारा करवाया गया था। इसमें प्रमुख रूप से आदिनाथ की मूर्ति स्थापित है।

यह इमारत 7 मंजिल है, इसकी ऊँचाई 75 फुट है। यह इमारत चित्तौड़ में ठीक विजय स्तंभ के सामने स्थित है।

रायमल (1473-1509)

ऊदा के स्थान पर रायमल को शासक बनाया गया। कहा जाता है एकलिंग जी की वर्तमान चतुर्मूखी शिवलिंग की प्रतीक्षा इन्हीं के शासनकाल में स्थापित की गई।

रायमल के तीन थे- जयमल, पृथ्वीराज और सांगा।

पृथ्वीराज :- उडणा राजकुमार के नाम से प्रसिद्ध। इसी की पत्नी के नाम पर अजमेर दुर्ग का नाम तारागढ़ पड़ा।

इसकी छतरी कुंभलगढ़ दुर्ग में बनी हुई है।

सांगा (1509-1528 .)-

हिन्दूपत। हिंदूपति नाम से प्रसिद्ध था।

सांगा जब महाराणा बना तब दिल्ली का शासक सिकन्दर लोदी, गुजरात का महमूदशाह बेगड़ा तथा मालवा का नासिरशाह खिलजी था।

      सांगा अपने अज्ञातवास के दौरान श्रीनगर (अजमेर जिले में) के कर्मचंद पवार की सेवा में रहा था।

शासक बन कर कर्मचंद को रावत की पदवी दी।

तुजुक-ए-बाबरी

 में लिखता है कि बाबर के आक्रमण के समय भारत का सबसे शक्तिशाली शासक कृष्णदेवराय था तथा उत्तर का शासक राणा सांगा था।

बाबरनामा के अनुसार राणा सांगा ने भारत पर आक्रमण करने के लिए उसे आमंत्रित किया था।

      खानवा युद्ध से पूर्व बाबर ने तमगा नामक कर समाप्त कर दिया, युद्ध को जिहाद घोषित किया तथा स्वयं ने गाजी (धर्म योद्धा) उपाधि धारण की।

मुहम्मद शरीफ नामक ज्योतिष ने खानवा युद्ध में बाबर के हार की भविष्यवाणी की थी।

      बाबर अपनी आत्मकथा में कहता है कि चित्तौड़ में अत्यधिक गर्मी पड़ने व पानी की कमी होने से वह चित्तौड़ पर अधिकार नहीं करता है।

खानवा के युद्ध में सांगा का साथ देने वालों में मारवाड के राव गांगा की तरफ से मालदेव, मेड़ता के रायमल व रतन सिंह, बीकानेर से कल्याण आमेर का राजा पृथ्वीराज, डूँगरपुर का रावल उदयसिंह तथा काठियावाड़ से झाला अज्जा ने भाग लिया।

सांगा युद्ध मैदान में घायल हो गए तब इन्हीं झाला अज्जा ने सांगा का छत्र धारण कर सांगा का स्थान लिया।

हसनखाँ मेवाती तथा महमूद लोदी (इब्राहिम लोदी) ने भी सांगा की से युद्ध में भाग लिया था।

खानवा की हार के बाद सांगा के अधिकारियों द्वारा उसे कालपी में जहर दे दिया

जिससे 30 जनवरी 1528 ई. को इस लोक से विदा हो गये। माण्डलगढ़ में अंतिम संस्कार किया गया।

पाति पेरवन परम्परा-  

राजपूत कालीन एक प्राचीन परम्परा जिसे राजपूताना में पुनजीर्वित करने का श्रेय राणा सांगा को दिया जाता है।

राजपूताने का वह पहले शासक था जिसने अनेक राज्यों के राजपूत राजाओं को विदेशी जाति विरूद्ध संगठित कर उन्हें एक छत्र के नीचे लाया।

      खानवा युद्ध में हार का कारण सलहँदी तँवर द्वारा विश्वासघात बताया जाता है।

राणा रतन सिंह (1528-31 .)-

सांगा के बाद रत्नसिंह मेवाड़ के शासक बनें। हाड़ी रानी कर्मवती ने सांगा के जीवित रहते ही अपने पुत्र विक्रमादित्य तथा उदयसिंह के लिए रणथम्भौर का किला मांगा लिया

तथा स्वयं उनकी संरक्षिका बन गई। राणा रत्न सिंह व कर्मवती के भाई सुरजन हाड़ा का साथ में आखेट खेलते हुए ही किसी बात पर विवाद हो गया जिसमें रत्नसिंह की मृत्यु हो गई। 1531 ई. में।

राणा विक्रमादित्य

      1531 ई. में राणा रतनसिंह के स्थान पर शासक बना।

      1534 ई. में गुजरात का शासक बहादूरशाह मेवाड़ पर आक्रमण करता है तथा उदयसिंह व विक्रमादित्य को सुरक्षित बूंदी भेज दिया जाता है।

देवलिये के रावत बाघसिंह को महाराणा का प्रतिनिधि (सेना का नेतृत्व) नियुक्त किया जाता है और मेवाड़ का दूसरा शाका होता है।

राणा उदयसिंह

  • 1537 ई. में कुंभलगढ़ में उदयसिंह का राज्याभिषेक हुआ।
  • 1540 ई. में उदयसिंह व बनवीर के मध्य माहोली (मावली) गाँव में युद्ध हुआ
  • जिसमें उदयसिंह विजय रहें। 1540 में चित्तौड़ के स्वामी बन गये।
  • चित्तौड़ दुर्ग में बनवीर ने तुलजा भवानी के मंदिर का निर्माण कराया।
  • 1559 ई. में उदयसिंह ने उदयपुर शहर की नींव डाली तथा उदयसागर झील का निर्माण किया।
  • सितम्बर 1567 अकबर चित्तौड़ अभियान पर रवाना हुआ तथा उदयसिंह ने किले का भार जयमल व फत्ता पर छोड़कर ईडर चले गये।
  • जयमल-फत्ता वीरगति को प्राप्त हुए तथा फत्ता की रानी फूल कंवर ने चित्तौड़ दुर्ग में जौहर किया जिसे चित्तौड़ का तीसरा शाका कहते हैं।
  • अबुल फजल लिखता है कि चित्तौड़ विजय करने हेतु अकबर ने साबात का निर्माण करवाया जिसकी रक्षा में रहते हुए प्रतिदिन 200 आदमी मारे जाते थे।
  • 25 फरवरी 1568 को अकबर ने चित्तौड दुर्ग अधिकृत कर लिया।
  • 28 फरवरी 1572 को उदयसिंह का गोगुंदा में देहांत हो गया।
  • (होली के दिन) जयमल-फत्ता की मूर्तियाँ आगरा व बीकानेर के जूनागढ़ किले में लगाई गई थी।
  • 1557 ई. में उदयसिंह व अजमेर के हाजी खाँ के मध्य हरमाड़ा नामक स्थान पर युद्ध हुआ था।

राणा प्रताप (1540-1597 .)

जन्म– 9 मई 1540 कुंभलगढ़ में हुआ।

माताजयवंता बाईपाली के सोनगरा अखैराज की पुत्री थी।

  • उदयसिंह ने भटियाणी रानी (धीरबाई) के प्रभाव में जगमाल को अपना उत्तराधिकारी बनाया जिसका सामंतों ने विरोध किया
  • प्रताप का प्रथम राज्याभिषेक 28 फरवरी 1572 को गोगुंदा में हुआ रावत कृष्णदास ने तलवार बांधी तथा दूसरा राज्याभिषेक 1572 में कुंभलगढ़ में हुआ जहॉ राव चन्द्रसेन भी उपस्थित थे।
  • जगमाल अकबर की सेवा में चला गया जहॉ उसे जहाजपुर का परगना जागीर के रूप में दिया गया।
  • 1583 के दत्ताणी के युद्ध में उसकी मृत्यु हो गई।
  • मुस्लिम इतिहासकारों ने अपने ग्रंथों में प्रताप के नाम के लिए कीका शब्द का प्रयोग किया है।
  • मुगल शासक अकबर ने प्रताप से सुलह वार्ता के लिए 1572-73 के मध्य चार शिष्ट मण्डल प्रताप के पास भेज-
  • 1572 – जलाल खॉ कोरची
  • 1573 – कुवर मानसिंह
  • इस दौरान ही मानसिह  डूंगरपुर के महारावल आसकरण के मध्य बिलपण नामक स्थान पर युद्ध हुआ जिसमें महारावल की पराजय हुई।
  • सितम्बर 1573 – भगवन्तदास
  • दिसम्बर 1573 – टोडरमल

हल्दीघाटी का युद्ध (18 जून 1576)

  • रणछोड कृत राजप्रशस्ति, अमरकाव्यम्, माला सांद (झूलणा महाराणा प्रताप जीरा), नैणसी री ख्यात, सगत रासौ तथा अबुल फजल ने इस युद्ध को खमनोर का युद्ध कहा है।
  • बँदायूनी ने इसे गोगुन्दा का युद्ध कहा वह इस युद्ध में सेना के साथ था।
  • जबकि जेम्स टॉड ने प्रथम बार इस युद्ध को हल्दीघाटी युद्ध के नाम से संबोधित किया।
  • टॉड ने हल्दीघाटी को मेवाड़ की थर्मोपल्ली कहा था।
  • झाला बीदा ने प्रताप के छत्र को धारणकर प्रताप को सकुंशल युद्ध भूमि से बाहर निकाला।
  • चेतक की समाधि बलीचा गाँव में बनी हुई है।
  • अकबर ने उदयपुर फतह करने के उपलक्ष में एक सोने का सिक्का ढलवाया जिस पर अंकित था
  • सिक्का ढाला गया मुहम्मदाबाद उर्फ उदयपुर में, जो जीता जा चुका है।” मई 1577 अकबर अपनी राजधानी लौट गया।
  • हल्दीघाटी के युद्ध के बाद प्रताप के खिलाफ अकबर ने क्रम से चार लागों को भेजा था :-

महाराणा

भगवान दास

शाहबाज खान 1577, 78, 79

अब्दुर रहीम खानखाना 1580-81

जगन्नाथ कछवाह दिसम्बर 1584

  • शाहबाज खान 1577 अपने प्रथम अभियान में कुंभलगढ़ के अजेय दुर्ग को जीतने में सफल रहता है।
  • कुंभलगढ़ के किलेदार प्रताप के मामा भाण सोनगरा थे जो काम आते है।
  • शाहबाज खाँ, गाजी खाँ बदख्शी को दूर्ग का किलेदार नियुक्त करता है।
  • प्रताप कुंभलगढ़ से ईडर तथा वहाँ से चूलिया ग्राम पहुंच जाते है।
  • यहीं चूलिया ग्राम में प्रताप को ताराचन्द व भामाशाह मालवा की लूट से प्राप्त 25 लाख रू. व दो हजार अशर्फियाँ भेंट किया।
  • इसी समय रामा महासहाणी जो प्रधान था उसके स्थान पर भामाशाह को नियुक्त किया जाता है।
  • प्रताप ने 1582 ई. में दिवेर के शाही थाने पर हमला कर शाही थाने के संरक्षक सुल्तान खाँ को पराजित कर दिया। टॉड ने दिवेर को मेवाड़ का मैराथन कहाँ है। दिवेर के बाद कुंभलगढ़ को भी जीत लिया।
  • 1585 ई. में प्रताप ने चावंड के लूणा राठौड़ को परास्त कर चावंड को अपनी राजधानी बनाया।
  • 1585 के बाद अकबर ने प्रताप के विरूद्ध कोई अभियान नहीं किया
  • प्रताप ने चावंड को अपनी राजधानी बनाया तथा वहाँ महल एवं चामुण्डा माता का मंदिर बनाया।
  • 1597 ई. में बाघ का शिकार करते समय धनुष की प्रत्यंचा खींचने के दौरान उनकी आंतों में अंदरूनी चोट आ गई
  • जिसकी वजह से 19, जनवरी 1597 को प्रताप का निधन हो गया। बाडोली गाँव में प्रताप की 8 खम्भो वाली छतरी बनी हुई है।
  • रामा सांदू व माला सांदू नामक वीरों ने भी हल्दीघाटी युद्ध में भाग लिया था।
  • चक्रपाणि मिश्र :- मथुरा का विद्वान, प्रताप के दरबार में तीन गं्रथों की रचना की थी- विश्ववल्लभ, मुर्हुतमाला एवं राज्याभिषेक पद्धति।
  • पृथ्वीराज राठौड :- बीकानेर के शासक रायसिंह का भाई, इसे डिंगल का है होरस कहते हैं।
  • इसकी प्रसिद्ध रचना ‘वेलीकिसन रूकमणी री’ इसने प्रताप की प्रशंसा में भी दोहे लिखे।

प्रताप के व्यक्तित्व के बताते ये कथन-

  • बदायूंनी :- “गोगुंदा से फतेहपुर सीकरी लौटते समय राणा की हार पर किसी ने विश्वास नहीं किया।”
  • खानखाना :- “तुर्की का पतन हो जावेगा पर प्रताप का वतन और धर्म शाश्वत रहेगा।”
  • अमरसिंह ने शेरपुर ठिकाने से खानखाना परिवार की स्त्रियों को बंदी बना लिया था
  • किंतु प्रताप के आदेश से पुनः सआदर भिजवा दिया। यह प्रताप के उच्च आदर्शों को बताते हैं।

अमरसिंह (1597-1615)

  • एकमात्र शासक जो चावंड में सिंहासन पर बैठा (राज्याभिषेक हुआ)
  • जहाँगीर शासक बनते ही मेवाड को अपनी प्राथमिकता में ला दिया तथा जहांगीर ने मेवाड़ी सामंतों में फूट डालने के लिए अमरसिंह के चाचा सगर को चित्तौड का महाराणा, घोषित कर दिया।
  • जहाँगीर ने मेवाड पर चार अभियान भेजे-
  • शहजादा परवेज – 1605
  • महाबत खाँ – 1608
  • अब्दुल्ला खाँ – 1609
  • राणपुर का युद्ध – अब्दुल्ला खाँ  मेवाड़ के मध्य
  • बादशाह खुर्रम – 1613 ने चावंड पर अधिकार कर लिया 
  • 1615 ई. में जहाँगीर  अमरसिंह के मेवाड़-मुगल संधि होती है। यह संधि गोगुदां में हुई जिसमें महाराणा की तरफ से शुभकर्ण  हरिदास झाला उपस्थित हुए थे।
  • आहाड के महासतियां में पहली छतरी अमरसिंह की है।
  • अमरसिंह राजपाट छोड़कर नौ-चोकी चला जाता है।

कर्ण सिंह (1620-1628 .)

  • कर्ण सिंह के समय खुर्रम जगमंदिर में शरण लेता है। जगमंदिर का निर्माण कार्य जगतसिंह के समय पूर्ण होता है।

जगतसिंह प्रथम (1628-1652 .)

  • जगदीश मंदिर का निर्माण करवाया। कहा जाता है कि भगवान जगन्नाथ ने स्वप्न में आकर मंदिर बनाने को कहा था।
  • यह मंदिर पंचायतन श्रेणी का है।
  • यह मंदिर अर्जुन की निगरानी में सूत्रधार भाणा व उसके पुत्र मुकुन्द की अध्यक्षता में बना।
  • मंदिर की विशाल जगन्नाथ राय प्रशस्ति की रचना कृष्णभट्ट ने की।
  • जगतसिंह का समय मेवाडी चित्रकला का स्वर्णकाल माना जाता है।
  • जगतसिंह की धाय माँ नौजु धाय ने एक मंदिर का निर्माण कराया जो धाय मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।

राजसिंह (1652-1650 )

  • औरंगजेब ने उत्तराधिकारी संघर्ष में राजसिंह से सहायता हेतु इन्द्रभट्ट को भेजा।
  • 1679 ई. में राजसिंह ने किशनगढ़ की राजकुमारी चारूमति से विवाह करने पर औरंगजेब से संबंध बिगड़ जाते है।
  • 1679 ई. में औंरगजेब ने जजिया कर लगाया तथा औरंगजेब ने जब मंदिरों को नष्ट करने के आदेश दिए तब मथुरा के गुस्साई जी दामोदर दास व गोविन्द दास जी ने राजसिंह की सहायता से सिहाड़ गॉव में श्रीनाथ जी की प्रतिमा को स्थापित किया।
  • औरंगजेब स्वयं 1679 को उदयपुर अभियान पर आया।
  • 1662 ई. में राजसमंद झील की नींव रखी जो 1668 में पूर्ण हुई।
  • वहाँ नौ-चौकी पर 25 शिलाओं पर शिलालेख खुदवाया जो विश्व का सबसे बड़ा शिलालेख है।
  • इसे रणछोड़ भट्ट तैलंग में उत्कीर्ण किया था। इसे जयसिंह ने निश्चित स्थान पर लगवाया।
  • राजसिंह ने अपनी माता जैनादे के नाम पर बड़ी गाँव में जैनासागर का निर्माण करवाया था।
  • मेवाड़ के महाराणाओं में राजसिंह को विजयकटकातु के नाम से जाना जाता है
  • राजसिंह ने सदैव अपनी प्रजा का ध्यान रखते हुए सैन्य व्यवस्था का संचालन किया, जिसके कारण इस उपाधि से नवाजा गया।

जयसिंह (1680-98 .)

  • शहजादे आजम से 1681 में संधि कर मेवाड़ में जजिया समाप्त् कर दिया।
  • इसके बदले माण्डलपुर और बदनोर के प्रमुख मुगल साम्राज्य को दे दिये
  • 1691 ई. में जयसमंद झील का निर्माण करवाया।

अमरसिंह द्वितीय (1698-1710)

  • प्रसिद्ध देबारी का समझौता :- अमरसिंह द्वितीय, सवाई जयसिंह व जोधपुर के मध्य हुआ था।
  • अजित सिंह राजा बनने में सहायता करने का वचन दिया था व अमरसिंह ने अपनी पुत्री चन्द्रकुँवरी का विवाह सवाई जयसिंह से करना निश्चित किया था
  • उससे उत्पन्न संतान ही जयपुर का शासक बनेगा ऐसा तय हुआ।
  • इन्ही के शासनकाल में रियासत के प्रबंध, जागीरदार व सामंतों से संबंधित नियम बनाकर मेवाड़ के प्रशासन को सुदृढ़ किया
    • यहाँ तीन प्रकार के सामंत होते थे- 16,32 व गोल।

संग्राम सिंह द्वितीय

  • 17 जुलाई 1734 को हुरड़ा सम्मेलन की अध्यक्षता करना निश्चित हुआ था।
  • नादिरशाह के आक्रमण के समय 1739 ई. मेवाड़ के शासक जगतसिंह थे।
  • उदयपुर में सहेलियों की बाड़ी का निर्माण करवाया। किंतु इसी दौरान इनकी मृत्यु होने से इनके पुत्र जगतसिंह द्वारा हुरड़ा सम्मेलन की अध्यक्षता की।

भीम सिंह

  • राजकुमारी कृष्ण कुमारी का विवाह जोधपुर शासक भीमसिंह से निश्चित हुआ किंतु उनकी मृत्यु होने से यह विवाह जयपुर शासक जगतसिंह से निश्चित हो जाता है
  • किंतु जोधपुर शासक मानसिंह विवाद शुरू कर देते हैं। जिसकी परिणति बड़ी दुःखद होती है
  • तथा अंजीत सिंह चुड़ावत व अमीर खाँ पिण्डारी के सुझाव पर कृष्णाकुमारी को जहर दे दिया जाता है।
  • गिंगोली का युद्ध (1807, नागौर) :- मेवाड़ व जयपुर की सम्मिलित सेना जोधपुर को पराजित कर देती है।
  • कर्नल टॉड पहले पॉलिटिकल एजेंट नियुक्त होते है।

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August 11, 2020

जयपुर का कच्छवाह वंश के इतिहास के बारे में जाने?

आमेर का कच्छवाह वंश (ढूंढाड़ राज्य)

आमेर के कच्छवाह स्वयं को श्रीराम के पुत्र कुश की सन्तान मानते है, आमेर से प्राप्त शिलालेख में भी इन्हें रघुकुल तिलक  के नाम से जाना गया है।

दूल्हेराय नामक व्यक्ति ने सर्वप्रथम कच्छवाह वंश की स्थापना की थी।

1137 ई. में बड़गूजरों को हराकर दूल्हेराय ने ढूंढाड राज्य को बसाया था,

दूल्हेराय ने सर्वप्रथम दौसा को अपनी राजधानी बनाया

जो इस राज्य की सबसे प्राचीन राजधानी थी,

दूल्हेराय ने इस राजधानी को मीणाओं से प्राप्त किया था.

दूल्हेराय ने रामगढ़ नामक स्थान पर जमुवामाता के मंदिर का निर्माण कराया

 जमूवा माता को कच्छवाह वंश की कुलदेवी के रूप में स्थापित भी किया था,

ढूंढाड़ में प्राचीन रामगढ़ गुलाब की खेती के लि प्रसिद्ध था, जिसके कारण “रामगढ़ को ढूंढास” का पुष्कर कहा गया.

दूल्हेराय ने बाद में रामगढ़ को जीतकर इसे राजधानी बनाया इस प्रकार दूल्हेराय के शासन की दो राजधानियां अस्तित्व में आयी,

दूल्हेराय के पश्चात् कोकिलदेव ने आमेर के मीणाओं को पराजित कर इस सम्पन्न भू-भाग को कच्छवाह वंश का एक अंग बनाया,

बाद में कोकिलदेव ने आमेर राज्य को राजधानी के रूप में सथापित किया.

राजा कोकिलदेव पश्चात् राजदेव नामक व्यक्ति ने आमेर के महलों का निर्माण कराया, जिन्हें कदमीमहल कहा जाता था

ये महल आमेर राज्य का कच्छवाह वंश के प्राचीन महल माने जाते थे।

इन महलों में कच्छवाह वंश के नवीन शासकों का राज्याभिषेक सम्पन्न होता था।

पृथ्वीराज

  • कच्छवाह शासक पृथ्वीराज ने खानवा के युद्ध में सांगा का साथ दिया था।
  • पृथ्वीराज ने रामानुज सम्प्रदाय की पीठ निर्माण कराया, क्योकि पृथ्वीराज संत कृष्णदास पयहारी से प्रभावित हुए थे,
  • रामानुज सम्प्रदाय की पीठ गलता जी (जयपुर) में स्थित है। गलता जी को मंकी वैली के नाम से जाना जाता है।
  • पृथ्वीराज के पुत्र सांगा ने सांगानेर नामक कस्बा बसाया था, आमेर के इस शासक ने बारह कोटरी नामक व्यवस्था का निर्माण किया
  • इस व्यवस्था के अन्तर्गत पृथ्वीराज ने आमेर को बारह भागों में विभाजित कर दिया तथा इसी विभाजन को पृथ्वीराज ने अपने 12 पुत्रों में बांट दिया
  • जिसके कारण यह बारह कोटरी व्यवस्था कहलाई।
  • पृथ्वीराज की पत्नी बालाबाई ने आमेर में लक्ष्मीनारायण मंदिर निर्माण कराया।
  • पृथ्वीराज की मृत्यु के बाद उसका छोटा लड़का पूर्णमल आमेर का शासक बना किन्तु  बाद में भीमदेव ने उसे गद्दी से उतार दिया 
  • जिससे कच्छावाहों में गृहयुद्ध आरम्भ हो गया। इससे कच्छावाहों के राज्य में पहले अफगानों का फिर मुगलों का प्रभाव बढ़ा।
  • भीमदेव के बाद उसका पुत्र  रत्नसिंह गद्दी पर बैठा। रत्नसिंह को उसके छोटे भाई भारमल ने जहर पिला कर मार ड़ाला और स्वयं राजा बन गया।

भारमल

  • राजपुतानों का यह एकमात्र शासक, जिसमें सर्वप्रथम मुगलें की अधीनता को स्वीकार कर मुगलों के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किए थे
  • भारमल उसी पृथ्वीराज का पुत्र था, जिसने खानवा के युद्ध में राणा सांगा की सेना का नेतृत्व कर बाबर के विरूद्ध युद्ध किया
  • लेकिन भारमल ने उसी मुगल वंश में अपनी पुत्री का विवाह किया था।
  • 1562 ई. में चंगुलाई खां के नेतृत्व में सांगानेर नामक स्थान पर भारमल की मुगल सम्राट अकबर से मुलाकात हुई तथा सांभर नामक स्थान पर भारमल ने अपनी पुत्री हरकाबाई का विवाह अकबर के साथ किया था
  • मुगल सम्राट अकबर ने हरकाबाई को मरियम उज्जमानी उपाधि से सम्मानित किया था।
  • मुगल सम्राट अकबर ने राजा भारमल को अमीर-उल-उमरा की उपाधि से सम्मानित किया, राजा भारमल ने आमेर में निर्माण कार्य प्रारम्भ किया।

राजा भगवन्तदास (1573-1589 ई.)

भारमल की मृत्यु के पुत्र भगवन्तदास आमेर की सिंहासन पर बैठा और इन्होंने अपनी पुत्री का विवाह सहजादा सलीम के साथ किया।

जहाँगीर ने इसे सुल्तान–ए–निशा की उपाधि दी। इससे खुसरों का जन्म हुआ।

भगवन्तदास को 5000 का मनसब एवं अमीर-उल-उमरा की उपाधि दी।

मानसिंह प्रथम (1589-1614 ई.)

  • आमेर कच्छवाह शासकों में अकबर के लिए सबसे विश्वसनीय राजा मानसिंह थे
  • जिन्होनें अपनी छोटी सी उम्र से ही अकबर के सैन्य अभियानों का कुशल नेतृत्व किया था, राजा मानसिंह का विधिवत तरीके से राज्यभिषेक 1589 ई. को हुआ।
  • राजा मानसिंह अकबर के दरबार में प्रसिद्ध नवरत्नों में शामिल थे।
  • राजा मानसिंह प्रथम को ऐतिहासिक इमारतों तथा अकबर कही महत्वपूर्ण विजयों के लिए याद किया जाता है
  • राजा मानसिंह के अकबर के काबुल अभियान, बिहार विजय, उड़ीसा विजय तथा बंगाल पर विजय प्राप्त की थी
  • राजा मानसिंह ने अकबर की ओर से राणा प्रताप के विरूद्ध हल्दीघाटी के युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व किया था।
  • जिसे मुगल सम्राट अकबर ने सात हजारी मनसब का पद प्रदान किया तथा फर्जन्द की उपाधि से भी सम्मानित किया था।
  • बैराठ के समीप पंचमहल राजा मानसिंह ने मुगल सम्राट अकबर ने आराम पसन्दगी के लिए तैयार करवाया था
  • जब अकबर ख्वाजा साहब की दरगाह (अजमेर) के लिए जाते थे तब विश्राम हेतु अकबर का पड़ाव यहाँ डाला जाता था
  • मुगल सम्राट अकबर ने पुत्र प्राप्ति के लिए एक बार दिल्ली से पैदल यात्रा करते हुए इसी पंचमहला में विश्राम किया
  • इसी यात्रा के दौरान अकबर को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसे मुगल वंश में सलीम के नाम से जाना गया।

जगत शिरामणि का मन्दिर

  • आमेर में इस मंदिर का निर्माण राजा मानसिंह प्रथम की रानी कनकावती ने अपने पुत्र जगतसिंह की स्मृति में कराया था
  • जगतसिंह ने भी मुगल सम्राट अकबर के लिए कांगड़ा (हिमाचल) की विजय में मुगल सेना का नेतृत्व किया था।
  • इस कारण मुगल सम्राट ने जगत सिंह को रायजादा की उपाधि से सम्मानित किया, राजा मानसिंह के शासनकाल में जगतसिंह को बंगाल में नियुक्त किया था
  • जहां जगतसिंह की अधिक शराब पीने के कारण मृत्यु हो जाती है।
  • आमेर कच्छवाह वंश की इष्ट देवी के रूप में इस मंदिर का निर्माण राजा मानसिंह प्रथम बंगाल शैली में काले संगमरमर के पत्थरों से कराया

  • राजा मानसिंह ने इस देवी की प्रतिमा को ढाका के राजा केदारराय को परास्त कर प्राप्त कि थी। इस मंदिर की देवी की अर्चना में जल व मदिरा का भोग लगाया जाता है।
  • राजा मानसिंह ने पुष्कर में एक भव्य एवं कलात्मक मानमहल का निर्माण कराया था
  • जो आज राज्य सरकार के सहयोग से एक पैलेस के रूम में (होटल) संचालित है, मानसिंह ने आमेर के महलों का भी निर्माण कराया तथा आमेर दुर्ग का पुननिर्माण कराया था।
  • राजा मानसिंह के शासनकाल में उसका दरबारी लेखक कवि मुरारीदान ने मानप्रकाश नामक ऐतिहासिक ग्रन्थ की रचना की इसी प्रकार जगन्नाथ ने मानसिंह कीर्ति मुक्तावली नाम से ग्रन्थ लिखा।
  • राजा मानसिंह के दरबारी राजकवि हाया बारहठ थे।
  • सन्त दादूदयाल मानिंसंह प्रथम के समकालीन थे तथा यह भी माना जाता है कि तुलसी दास जी के साथ उनकी घनिष्ठ मित्रता थी।
  • 1614 ई. में मानसिंह का एलीचपुर में देहान्त हुआ।

मिर्जा राजा जयसिंह (1621 ई.-1667 ई.)

  • आमेर के कच्छवाह शासकों में सबसे महत्वपूर्ण एवं योग्य शासकों में इन्हें याद किया जाता है, आमेर का सर्वाधिक विकास इन्हीं के शासनकाल में हुआ
  • जबकि सवाई जयसिंह के शासनकाल में जयपुर का विकास हुआ
  • 1621 ई. में मात्र 11 वर्ष की आयु में ये आमेर के शासक बने।
  • आमेर के कच्छवाह इतिहास में मिर्जा राजा जयसिंह ने सर्वाधिक 46 वर्ष तक शासन किया

  • इन्होनें अपनी सेवाएँ तीन मुगल शासकों को प्रदान की : जहाँगीर, शाहजहाँ व औरंगजेब।
  • मुगल सम्राट शाहजहाँ ने जयसिंह को ‘मिर्जा‘ राजा‘ की उपाधि कन्धार अभियान के उपरान्त प्रदान की, क्योंकि जयसिंह ने शाहजहाँ के लिए कन्धार पर विजय प्राप्त की थी।
  • मुगल सम्राट औरंगजेब ने शिवाजी के विरूद्ध अभियान पर मिर्जा राजा जयसिंह को भेजा, जिन्होंने शिवाजी को मुगल सम्राट से संधि हेतु विवश किया।
  • 11 जून 1665 को दोनों के मध्य संधि हो गई, जिसे पुरंदर की संधि कहते हैं।
  • मिर्जा राजा जयसिंह ने जयपुर में जयगढ़ किले के किले का निर्माण कराया
  • इस महल मे एक मनोरंजन घर भी था, जिसे कठपुतली घर कहा जाता है।
  • मिर्जा राजा जयसिंह ने नाहरगढ़ दुर्ग की नींव रखी जिसे सवाई जयसिंह ने पूरा कराया।
  • आमेर के कच्छवाह शासकों में मिर्जा राजा जयसिंह एक विद्धान शासक थे
  • जिन्होनें संस्कृत भाषा को लोकप्रिय बनाया तथा बनारस में संस्कृत विद्यालय का निर्माण कराया।
  • मिर्जा राजा जयसिंह के दरबारी कवियों में बिहारी को संरक्षण प्राप्त था
  • जिसने ‘बिहारी सतसई‘ नामक ग्रन्थ की रचना की, इसी प्रकार राज्य कवियों में कुलपति मिश्र व रामकवि को भी संरक्षण प्राप्त था।
  • औरंगजेब के दक्षिण अभियान के समय 1667 ई. में बुरहानपुर में मिर्जा राजा जयसिंह का देहान्त हो गया
    • इस शासक की मृत्यु के पश्चात रामसिंह प्रथम व विशनसिंह एक कमजोर शासक हुए।

जयपुर

सवाई जयसिंह

  • कच्छवाह वंश के शासकों में सवाई जयिंसंह का वास्तविक नाम विजयसिंह था
  • सवाई जयसिंह ने आमेर से शासन न चलाकर जयपुर से नयी राजधानी के रूप में शासन को क्रियान्वित किया।
  • मुगल सम्राट औरंगजेब ने जयसिंह को सवाई की उपाधि से सम्मानित किया
  • इस राजवंश में यह प्रथम शासक था, जिसे सवाई की उपाधि से नवाजा गया था
  • जबकि राजपूताने में सवाई की उपाधि सूरसिंह को (जोधपुर राठौड़ वंश) अकबर प्रदान की थी।
  • 1700 ई. में विशनसिंह की मृत्यु के पश्चात पुत्र के रूप में जयसिंह कच्छवाह वंश का शासक बना
  • जयसिंह के शासनकाल में मुगल साम्राज्य में पुनः उत्तराधिकार के लिए संघर्ष छिड़ गया
  • जिसमें सवाई जयसिंह ने आजम का पक्ष लिया इस बात से मुअज्जम सवाई जयसिंह से नाराज हो गया
  • तब मुअज्जम ने आमेर पर आक्रमण कर अधिकार कर लिया
  • मुअज्जम को ही बहादुरशाह प्रथम के नाम से जाना जाता है
  • ने आमेर का नाम परिवर्तित कर मोमिनाबाद रखा, इसी राज्य को इस्लामाबाद के नाम से भी जाना जाता था।
  • सवाई जयसिंह के शासन काल में भरतपुर के जाट राजा बदनसिंह ने इस शासक के साथ मिलकर अनेक भू-भागों पर विजय प्राप्त की
  • जिसके उपराज्त सवाई जयसिंह ने जाट राजा बदनसिंह को ब्रजराज की उपाधि तथा डीग का परगना प्रदान किया था।
  • सवाई जयिंसंह ने राजपूताना के अनेक राज्यों के शासकों को एकत्रित कर मराठों के विरूद्ध एक सम्मेलन का आयोजन कराया
  • जिसे हुरड़ा सम्मेलन कहा गया, यह सम्मेलन मेवाड़ के भीलवाड़ा के निकट हुरड़ा नामक गांव में आयोजित हुआ

  • इस सम्मेलन को आयोजित करने का श्रेय सवाई जयसिंह को दिया जाता है
  • सम्मेलन 17 जुलाई, 1734 ई. को आयोजित हुआ
  • लेकिन अपने निजी स्वार्थों के कारण यह सम्मेलन सफल नहीं हो सका, इस सम्मेलन की अध्यक्षता मेवाड़ के महाराजा जगतसिंह द्वितीय ने की थी।
  • सवाई जयसिंह ने गंगवाना के युद्ध में मारवाड़ के जोधपुर के अभयसिंह तथा नागौर के तख्तसिंह की एक संयुक्त सेना को पराजित किया।
  • वर्तमान में गंगवाना/मंगवाना नामक स्थान जोधपुर जिले में स्थित है, गंगवाना युद्ध का मुख्य कारण राज्यों की सीमा निर्धारण था।
  • जयपुर के कच्छवाह शासकों में सवाई जयसिंह एक विद्यानुरागी शासक होनें के साथ-साथ वास्तुशास्त्र में भी विशेष रूचि रखते थे
  • पं. जगन्नाथ को जयपुर की नींव रखने का श्रेय दिया जाता है
  •  जयसिंह ने बंगाल के प्रसिद्ध वास्तुकार पं. विद्याधर भट्टाचार्य के द्वारा जयपुर शहर का डिजाइन तैयार करवाया,

  • इस प्रकार सवाई जयसिंह के शासनकाल में 18 नवम्बर, 1727 को आधुनिक जयपुर शहर का निर्माण हुआ
  • इसके बाद जयिंसंह ने जयपुर को ही अपनी स्थाई राजधानी बनाया।
  • सवाई जयसिंह ने जयपुर के सिटी पैलेस में चन्द्रमहल का निर्माण कराया इस महल में कुल सात मंजिले थीं
  • जिसमें 7वीं मंजिल को मुकुट मन्दिर के नाम से जाना गया, इस चन्द्रमहल की दीवारां पर आदमकद चित्र अंकित है।
  • राजपुताने में सवाई जयसिंह के शासनकाल में ही सर्वप्रथम आदमकद चित्रों की नींव डाली गई थी।
  • सवाई जयसिंह की ज्योतिष ने भी रूचि थी अतः भारत में 5 वेधशालाओं का निर्माण कराया, जिन्हें जन्तर-मन्तर कहा जाता था
  • जयपुर, दिल्ली, बनारस, उज्जैन तथा मथुरा मुख्य थी
  • इन पांच वेदशालाओं में प्रथम व प्राचीन वेदशाला दिल्ली की थी। सबसे बड़ी व नवीन वेदशाला जयपुर की थी।
  • सवाई जयसिंह ने ग्रह नक्षत्रों की खोज के लिए ‘जीज मोहम्मद शाही’ ग्रंथ की रचना की।
  • सवाई जयसिंह ने जयपुर की वेधशाला में ऊंचाई नापने के लिए रामयंत्र नामक उपकरण तथा समय जाने के लिए सम्राट यंत्र लगाए थे
  • सम्राट यंत्र (सूर्य घड़ी) को दुनिया की सबसे बड़ी घड़ी का दर्जा प्राप्त था।
  • जयपुर के कच्छवाह शासकों में यह अंतिम शासक था, जिनसे अश्वमेध यज्ञ को सम्पन्न कराया
  • इस यज्ञ का मुख्य पुरोहित पुण्डरीक रत्नाकर थे
  • पुण्डरीक रत्नाकार ने एक प्रसिद्ध ग्रन्थ की रचना की जिसे जयसिंह कल्पद्रुम के नाम से जाना जाता है।
  • सवाई जयसिंह प्रथम शासक था, जिसनें विदेशी जाति पुर्तगालियों से सम्बन्ध स्थापित किए थे
  • सवाई जयसिंह ने अपने एक दल को राजा एमानुअल के दरबार में भेजा जहां उन्होनें अनेक ग्रन्थों का अध्ययन किया
    • उन ग्रन्थों को जयपुर मंगवाया, पुर्तगाल के राजा एमानुअल ने भी जेवियर डिसिल्वा को सवाई जयसिंह के दरबार में भेजा
    • जिसने जयपुर में पोथीखाना के अनेक ग्रन्थों का अध्ययन किया

सवाई ईश्वरसिंह

  • सवाई जयसिंह की मृत्यु के पश्चात सवाई ईश्वरसिंह को मराठों के वैमनस्य का सामना करना पड़ा
  • क्योंकि जयसिंह ने बूंदी के उत्तराधिकार के प्रश्न पर हस्तक्षेप करना प्रारम्भ कर दिया
  • बूंदी के शासकों ने मराठों की सहायता से सवाई ईश्वरसिंह पर आक्रमण करने की योजना बनाई
  • 1747 ई. को जयपुर के शासक सवाई ईश्वर सिंह ने अपने भाई माधोसिंह प्रथम तथा कोटा, बूंदी, मेवाड़ व मराठों की संयुक्त सेना को परिजत किया।
  • यह विजय राजमहल (टोंक) की विजय के रूप में जानी गई।
    • इस विजय के उपलक्ष्य में सवाई ईश्वरसिंह ने जयपुर के त्रिपोलया बाजार में एक मीनार का निर्माण कराया, जिसे ईसरलाट या सरगासूली कहा गया।

बगरू का युद्ध

  • पराजित माधोंसंह प्रथम ने मल्हार राव होल्कर की सहायता से जयपुर के समीप बगरू नामक स्थान पर ईश्वरसिंह को पराजित किया
  • राज्य पर अधिकार करने के पश्चात ईश्वरसिंह पर यह शर्त लगा दी गई कि ईश्वरसिंह 30 लाख रूपये हर्जाने के रूप में मराठों को देगा
  • इस शर्त पर सवाई ईश्वरसिंह को जयपुर का शासक मान लिया गया
  • सवाई ईश्वरसिंह ने यह बड़ी धनराशि देने के लिए अपनी असमर्थता प्रकट की
  • 1750 ई. में सवाई ईश्वरसिंह ने सरगासूली से कूदकर आत्महत्या कर ली।

सवाई माधोसिंह प्रथम

  • सवाई ईश्वरसिंह के आत्महत्या कर लेने के बाद उसका भाई माधोसिंह प्रथम जयपुर का शासक बना
  • यह मल्हार राव होल्कर की मदद से जयपुर का शासक बना था।
  • माधोसिंह के राजा बनने के बाद मराठा सरदार मल्हार राव होल्कर एवं जय अप्पा सिंधिया ने इससे भारी रकम की माँग की,
  • जिसके न चुकाने रप मराठा सैनिकों ने जयपुर ने उपद्रव मचाया, फलस्वरूप नागरिकों ने विद्रोह कर मराठा सैनिकों का कत्लेआम कर दिया।
  • महाराजा माधोसिंह ने मुगल बादशाह अहमदशाह एवं जाट महाराजा सूरजमल (भरतपुर) एवं अवध नवाब सफदरजंग के मध्य समझौता करवाया।

  • इसके परिणामस्वरूप बादशाह ने रणथम्भौर किला माधोसिंह को दे दिया।
  • इससे नाराज़ हो कोटा महाराजा शत्रुसाल ने जयपुर पर आक्रमण कर नवम्बर 1761 ई. में भटवाड़ा के युद्ध में जयपुर की सेना को हराया।
  • 1763 ई. में सवाई माधोसिंह ने रणथम्भौर दुर्ग के पास सवाई माधोपुर नगर बसाया।
  • 1768 ई. में इनकी मृत्यु को गई। इन्होंने जयपुर में मोती डूँगरी पर महलों का निर्माण करवाया।
  • सवाई माधोसिंह प्रथम ने नाहरगढ़ दुर्ग में अपनी नौ प्रेंयसियों के लिए एक जैसे महलों का निर्माण विक्टोरिया शैली में कराया था।
  • माधोसिंह प्रथम का दरबारी कवि द्वारिकानाथ भट्ट था, जिसने बारी वैराग्य‘ नामक ग्रंथ की रचना की थी
  • सवाई माधोसिंह प्रथम के पश्चात 1768-1778 ई. के मध्य एक कमजोर शासक पृथ्वीसिंह का शासन रहा,
  • लेकिन 1780 ई. में पृथ्वीसिंह की मृत्यु के पश्चात प्रतापसिंह जयुपर का शासक बना।

सवाई प्रतापसिंह

प्रतापसिंह महान कवियों, विद्वानों व प्रसिद्ध लेखकों का आश्रयदाता था

सवाई प्रतापसिंह स्वयं ब्रजनिधि नाम से कविताएं लिखते थे, जिसके कारण इन्हें ब्रजनिधि शासक भी कहा जाता था

इनका सम्पूर्ण वर्णन ब्रजनिधि ग्रन्थावली में मिलता है।

सवाई प्रतापसिंह के शासनकाल में विभिन्न क्षेत्रों के 22 विद्वान दरबार की शोभा बढ़ातें थे

जिन्हें बाईसी या गुणीजन खान के नाम से जाना जाता था

इनमें देवर्षि ब्रजपाल भट्ट, गणपति भारति, चांद खां, द्वारिकानाथ भट्ट आदि प्रमुख थे

प्रतापसिंह ने चांद खां को बुद्ध प्रकाश की उपाधि से सम्मानित किया था।

सवाई प्रतापसिंह ने अपने शासनकाल में कला व संगीत के लिए एक विशाल सम्मेलन का आयोजन कराया

इस सम्मेलन का समस्त लेखन कार्य प्रतापसिंह ने अपने दरबारी कवि देवर्षि ब्रजपाल भट्ट को सौंपा तथा

संगीत के प्रसिद्ध ग्रंथ राधा गोविन्द संगीत सार की रचना देवर्षि ब्रजपाल भट्ट ने की।

सवाई प्रतापसिंह ने 1799 ई. में एक ऐतिहासिक इमारत हवामहल का निर्माण जयपुर में कराया

इस इमारत को राजस्थान का एयरफोर्ट कहते हैं, इस इमारत के वास्तुकार लालचन्द उस्ता थे

जिन्होने भगवान श्री कृष्ण के मुकुट के समान इसकी आकृति तैयार की

इस इमारत में कुल पांच मंजिले थीं, इसमें कुल 953 खिड़कियाँ है।

जयपुर के इस कच्छवाह शासक के शासनकाल में एक अंग्रेज अधिकारी जार्ज थॉमस ने आक्रमण किया

जिसका मुकाबला प्रतापसिंह से हुआ।

सवाई जगतसिंह

जयपुर के कच्छवाह राजवंश में जयपुर के शासक के नाम से प्रचलित इस शासक को जयपुर की बदनामी का ताज मिला,

इसका शासन काल 1803-1818 के बीच रहा,

सवाई जगतसिंह का संबंध रसकपुर नामक वेश्या से था, जिसका प्रभाव जयपुर के प्रशासन में बढ़ा चला जा रहा था,

जगतसिंह ने रसकपुर नामक सिक्कों का भी प्रचलन करवा दिया था

इस घटना के कारण जगतसिंह को जयपुर के प्रजा के सामने बदनाम होना पड़ा

बाद में रसकपुर को नाहरगढ़ के दुर्ग में बन्दी बनाकर रखा गया।

सवाई जगतसिंह के शासन काल की सबसे महत्वपूर्ण घटना यह थी

कि इसने अपने राज्य को मराठों व पिण्डारियों के आक्रमणों से बचाने के लिए ब्रिटिश सरकार से 1818 ई में संधि कर ली थी।

जयपुर में ब्रजबिहारीजी के मंदिर का निर्माण सवाई जगतसिंह ने करवाया था।

सवाई जगतसिंह ने 1807 ई में गिंगोली नामक युद्ध में जोधपुर के शासक मानसिंह की सेना को पराजित किया

यह युद्ध मेवाड की रानी कृष्णाकुमारी को लेकर लड़ा गया।

सवाई रामसिंह द्वितीय

जयपुर राज्य के सामाजिक परिवर्तनों के लिए रामसिंह को याद किया जाता है

सवाई रामसिंह से पूर्व 1813-35 के बीच जयपुर का एक कमजोर शासक सवाई जयसिंह तृतीय का शासनकाल रहा

लेकिन प्रशासन पर एजेन्ट टु गर्वनर जनरल का आधिपत्य होने के कारण जयसिंह तृतीय की कोई विशेष उपलब्धि नही रही।

1835 ई. जब रामसिंह जयपुर के सिंहासन पर बैठे तब वे नाबालिग थे

अतः ब्रिटिश सकार की ओर से कौंसिल बनाई गई, जिसके द्वारा जयपुर का शासन क्रियान्वित किया गया

रामसिंह के शासनकाल में ही 1844 ई. में एक अंग्रेज अधिकारी जॉन लुडलो को जयपुर का प्रशासक बनाया गया

इसी के शासन काल में समस्त सामाजिक परिवर्तन हुए,

मानव के क्रय-विक्रय एवं सती प्रथा पर रोक इसी के प्रयासों से लगी।

सवाई रामसिंह द्वितीय के शसनकाल में ही भारत में 1857 की क्रांति घटित हुई,

इस क्रांति का प्रभाव राजपूताने के अनेक राज्यों में देखा गया

सवाई रामसिंह ने भी 1857 की क्रांति में अप्रत्यक्ष रूप से ब्रिटिश सरकार का सहयोग किया

जिसके कारण ब्रिटिश सरकार रामसिंह द्वितीय को कोटपुतली का परगना जागीर के रूप में प्रदान किया तथा 

सितार–ए–हिन्द की उपाधि से सम्मानित किया गया।

सवाई रामसिंह द्वितीय के शासनकाल में ब्रिटेन के राजकुमार एडवर्ड पंचम के आगमन के समय जयपुर शहर को 1868 ई. में गुलाबी रंग से रंगवाया गया

जिसके कारण इसे गुलाबी शहर (पिंकसिटी) के नाम से जाना गया।

रामसिंह द्वितीय के शासनकाल में जयपुर के लिए पिंक सिटी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग

ब्रिटिश पत्रकार स्टेनलेरीड ने अपनी पुस्तक रॉयल टूर टू इण्डिया किया

भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक सी.वी रमन ने जयपुर को रंगश्री द्वीप की संज्ञा प्रदान की।

सवाई रामसिंह द्वितीय के शासनकाल में ही वैल्स के राजकुमार जॉन अल्बर्ट जयपुर की यात्रा की

1876 ई. में इन्हीं के द्वारा जयपुर के अल्बर्ट हॉल की नीवं रखी गई,

अल्बर्ट हॉल का वास्तुकार सर जैकफ था इस इमारत के अलावा रामनिवास बाग, महाराजा कॉलेज, संस्कृत कॉलेज

हुनरी मदरसा (राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट) का निर्माण हुआ।

हुनरी मदरसा में रामसिंह द्वितीय ने कला को संरक्षण प्रदान करने के लिए अनेक कुशल कारीगरों को सरंक्षण दिया।

सवाई माधोसिंह द्वितीय

1880 ई. में सवाई रामसिंह द्वितीय की मृत्यु के पश्चात इसका पुत्र माधोसिंह द्वितीय का शासन 1880-1922 तक रहा

माधोसिंह द्वितीय के शासन काल में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक पं. मदन मोहन मालवीय का आगमन जयपुर में हुआ

माधोंसंह द्वितीय ने इनके आगमन पर इनका भव्य स्वागत किया

बनारस हिन्दू विश्वद्यिालय के लिए 5 लाख रूपए प्रदान किए।

राजपूताना में सर्वप्रथम पोस्टकार्ड एवं डाक टिकटों का प्रचलन 1904 में जयपुर रियासत में ही हुआ।

भारत की आजादी के समय तथा राजस्थान के एकीकरण के समय (30 मार्च,1949) जयपुर के शासक मानसिंह द्वितीय थे

मानिंसंह द्वितीय के शासन काल में ही जयपुर के आधुनिक निर्माता के रूप में मिर्जा स्माइल को याद किया जाता है,

जो महाराजा मानसिंह द्वितीय के शासनकाल में प्रधानमंत्री थे।

कच्छवाह वंश कच्छवाह वंश कच्छवाह वंश कच्छवाह वंश

August 11, 2020

जाने मारवाड़ Marwad का इतिहास के बारे में??

जानकारी के श्रोत

उमा के अनुसार राठौड़ शब्द राष्ट्रकूट से बना है अतः यह राष्ट्रकूट कुटो वंशज थे

गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने इनको बदायूं का राठौड़ों का वंशज बताया है

राज रत्नाकर नामक ग्रंथ में राठौड़ों को हिरण्यकश्यप की संतान बताया है

कर्नल जेम्स टॉड ने इनका संबंध कन्नौज के गढ़वाल वंश से बताया है

जेमस टॉड ने राव सिया को जयचंद गढ़वाल का पोत्र बताया है

जोधपुर राज्य की ख्यात के अनुसार इनको विश्वत मान के पुत्र बृहद वल की संतान माना गया है

रास्ट्रोड वंश महाकाव्य के अनुसार शेत राम का पुत्र और बरदाई सेन का पोता माना है

1 राव सिहा – 1240-1273

राव सिहा ने पाली में अपना राज्य स्थापित किया

धोला चोतरा या लाखा झबर के युद्ध में मुस्लिम शासक से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ

इस समय इस की रानी पार्वती सोलंकी इस पर सती हुई

2 आसनाथ – 1273-91

यह सीहा का पुत्र था इसमें गुंदोज पाली को अपना केंद्र बनाया

इसी के काल में भादियो व शाखलाओ से राठौड़ों का संघर्ष प्रारंभ हुआ

यह दिल्ली के सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय वीरगति को प्राप्त हुआ

3 धुहड़

यह आसानाथ का पुत्र था

इसने खेड को अपनी केंद्र बनाया

इसमें कर्नाटक से चक्रेश्वरी देवी की मूर्ति लाकर नागाणा गांव में स्थापित करवाई नागणेची माता के नाम से जानी गई जो राठौड़ों की कुलदेवी भी मानी जाती है

यह भाटियों साखलाओ के साथ संघर्ष में मारा गया

4 मल्लीनाथ

इन्हें लोक देवता के रूप में भी जाना जाता है

पशु मेला तिलवाड़ा बाड़मेर चैत्र कृष्ण एकादशी से चैत्र शुक्ल एकादशी तक

5 राव चुंडा

इसमें इंदा प्रतिहार की पुत्री किशोर कवरी से विवाह किया

इंदा प्रतिहार ने चुंडा राठौड़ को मंडोर का दुर्ग दहेज में दिया

चुंडा राठौड़ ने अपनी पुत्री हसा बाई का विवाह मेवाड़ के महाराणा लाखा से किया

राव चुंडा ने रानी किशोर गवरी के कहने पर बड़े पुत्र रणमल के स्थान पर छोटे पुत्र कान्हा को उत्तराधिकारी घोषित किया अतः रणमल महाराणा लाखा की सेवा में चला गया

चुंडा ने चूड़ा सर तालाब बनवाया और इसकी रानी चांद कंवर ने चांद बावड़ी का निर्माण करवाया

चुंडा राठौड़ के समय ही मारवाड़ में सामंती प्रथा का कारण माना जाता है

6 कान्हा

अपनी माता किशोरी देवी के प्रभाव से कान्हा का राजवंश प्राप्त हुआ

शाखला और भाटियो से युद्ध करता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ मारवाड़

7 रनमल राठौड़ 1427-1438

 राव सीहा के वंशज वीरमदेव का पुत्र राव चुंडा इस वंश का प्रथम प्रतापी शासक हुआ,

जिसने मांडू के सूबेदार से मंडोर दुर्ग छीनकर उसे अपनी राजधानी बनाया।

उसने अपना राज्य विस्तार नाडोल, डीडवाना, नागौर आदि क्षेत्रों तक कर लिया।

राव चूंडा द्वारा अपने ज्येष्ठ पुत्र को अपना उत्तराधिकारी न बनाए जाने पर उनका ज्येष्ठ पुत्र रणमल मेवाङ नरेश महाराणा लाखा की सेवा में चला गया।

वहां उसने अपनी बहन हंसाबाई का विवाह राणा लाखा से इस शर्त पर किया कि उससे उत्पन्न पुत्र ही मेवाङ का उत्तराधिकारी होगा।

कुछ समय पश्चात् रणमल ने मेवाङ की सेना लेकर मंडोर पर आक्रमण किया और सन् 1426 में उसे अपने अधिकार में ले लिया।

महाराणा लाखा के बाद उनके पुत्र मोकल तथा उनके बाद महाराणा कुंभा के अल्पवयस्क काल तक मेवाङ के शासन की देखरेख रखमल के हाथों में ही रही

राव जोधा (1438-89)-

अपने पिता रणमल की हत्या हो जाने के बाद उनके पुत्र राव जोधा मेवाङ से भाग निकले पंरतु मेवाङ की सेना ने उनका पीछा किया

और मंडोर के किले पर मेवाङ की सेना ने अधिकार कर लिया।

राव जोधा ने 1453 ई. में पुनः मंडोर के किले पर मेवाङ की सेना ने अधिकार कर लिया।

सन् 1459 में उन्होंने चिङियाटूक पहाङी पर जोधपुर दुर्ग (मेहरानगढ़) का निर्माण करवाया और इसके पास वर्तमान जोधपुर शहर बसाया।

उनके समय जोधपुर राज्य अत्यधिक विस्तार हो चुका था। इसी समय इनकी एक रानी हाङी जसमा देवी ने किले के पास ’रानीसर’ तालाब बनवाया।

जोधा की दूसरी रानी सोनगरी (चैहान) चांदकुंवरी ने एक बावङी बनवाई जो चांदबावङी के नाम से प्रसिद्ध है।

किले के पास जोधा ने ’पदमसर’ तालाब बनवाया। 1489 में राव जोधा की मृत्यु हो गई।

राव गंगा –

इन्होंने 1527 ई. के खानवा के युद्ध में अपने पुत्र मालदेव के साथ सांगा की सहायता की थी।

इनके पुत्र मालदेव ने इनको महल की खिङकी से गिराकर इनकी हत्या कर दी।

अतः मालदेव मारवाङ का पितृहन्ता कहलाता है।

राव मालदेव (1531-62)

यह राव गंगा का पुत्र था। इसे फरिश्ता ने ’’ हसमत वाला शासक’’ कहा जाता है।

जो 5 जून, 1531 को जोधपुर की गद्दी पर बैठा था। इसका राज्यभिषेक सोजत में सम्पन्न हुआ।

राव मालदेव राठौङ वंश का सबसे योग्य व प्रतापी शासक हुआ।

इनका विवाह जैसलमेर के शासक रावल लूणकरण की पुत्री उमादे से हुआ।

जो विवाह की पहली रात से ही अपने पति से रूठ गई।

जो आजीवन ’रूठी रानी’ के नाम कसे प्रसिद्ध रही और तारागढ़ अजमेर में अपना जीवन बिताया।

मारवाड़

सुमेलगिरी का युद्ध

1544 ई. में अफगान बादशाह शेरशाह सूरी और मालदेव की सेनाओं के बीच सुमेलगिरी मैदान (पाली) में हुुआ।

जिसमें शेरशाह सूरी की बङी कठिनाइयों से विजय हुई।

तब उसने कहा था कि ’मुट्ठी भर बाजरे के लिए मैं हिन्दुस्तान की बादशाहत खो देता।

इस युद्ध में मालदेव के वीर सेनानायक जेता एवं कूँपा मारे गए।

इसके बाद शेरशाह ने जोधपुर के दुर्ग पर आक्रमण कर अपना अधिकार कर लिया तथा वहां का प्रबंध खवास खाँ को संभला दिया।

मालदेव ने कुछ समय बाद पुनः समस्त क्षेत्र पर अपना अधिकार कर लिया।

हरमाङे का युद्ध

सुमेल युद्ध के बाद अजमेर पर भी शेहशाह का अधिकार हो गया था। इस समय वहां हाजी खाँ नामक अमीर नियुक्त था।

शेरशाह की मृत्यु के बाद जब हुमायूँ ने पुनः दिल्ली-आगरा पर अधिकार कर लिया तो परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए मेवाङ के महाराणा उदयसिंह ने अजमेर को जीत लिया।

इस अवसर पर हाली खाँ अलवर-मेवात में ंथा। हुमायूँ की मृत्यु के बाद सम्राट अकबर ने मेवाङ के लिए मुगल सेना भेज दी।

हाजी खाँ वहां से भागकर महाराणा की शरण में उदयसिंह और बीकानेर के कल्याणमलन ने मालदेव के विरुद्ध उसकी सहायता के लिए सैनिक दस्ते भेज दिए।

अतः मालदेव की सेना बिना युद्ध किए ही वापस लौट गई। उसके कुछ दिनों बाद ही ’रंगराय’ नामक वेश्या को लेकर महाराणा उदयसिंह और हाजी खाँ के आपसी संबंध बिगङ गए और महाराणा ने हाजी खाँ को दंड देने का निश्चय किया।

अब हाजी खाँ ने मालदेव से सहायता की याचना की।

मालदेव तो पहले ही महाराणा से खिन्न था और वह मेवाङ की बढ़ती हुई शक्ति को भी नियंत्रित करना चाहता था।

अतः उसने तत्काल हाजी खाँ की सहायता के लिए सेना भेज दी।

उधर, मेवाङ की सेना भी हरमाङे नामक स्थान पर जा पहुंची। हाजी खाँ और मालदेव की सेना ने भी हरमाङे में मोर्चा जमा लिया।

हरमाङे के इस युद्ध में मेवाङ की सेना बुरी तरह पराजित हुई। इससे राजस्थान में मालदेव की प्रतिष्ठा पुनः स्थापित हो गई।

राव चन्द्रसेन (1562-81)-

इन्हें मारवाङ का राणा प्रताप, प्रताप का अग्रगामी, भूला-बिसरा राजा आदि नामों से जाना जाता है।

राव चन्द्रसेन मारवाङ नरेश राव मालदेव के छठे पुत्र थे।

राव मालदेव के देहांत के बाद उनके कनिष्ठ पुत्र राव चन्द्रसेन 1562 में जोधपुर की गद्दी पर बैठे।

उस समय राव चन्द्रसेन के तीनों बङे भाइयों में कलह पैदा हो गया था।

इस दौरान राव चन्द्रसेन परिवार सहित भाद्राजूण की तरफ चले गए।

मौके का लाभ उठाकर 1564 ई. में जोधपुर किले पर मुगल सेना का अधिकार हो गया था।

राव चन्द्रसेन प्रथम राजपूत शासक थे जिन्होंने अपनी रणनीति में दुर्ग के स्थान पर जंगल और पहाङी क्षेत्र को अधिक महत्व दिया।

इन्होंने जीवन भर अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की।

जब नवम्बर 1570 ई. में अकबर हुआ था वहां कई राजपूत राजाओं ने उपस्थित होकर उपस्थित होकर अकबर की अधीनता स्वीकार की थी।

वहां राव चन्द्रसेन भी भाद्राजूण से नागौर दरबार में आए थे परंतु अन्य राजाओं की तरह उन्होंने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की एवं चुपचाप वहां से भाद्राजूण चले गए।

मोटा राजा उदयसिंह (1583-95)

उदयसिंह मारवाङ का प्रथम शासक था, जिसने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर उनसे वैवाहिक संबंध स्थापित किए।

राव उदयसिंह ने अपनी पुत्री मानीबाई (जगत गसाई) का विवाह शहजादा सलीम (जहांगीर) से कर मुगलों से वैवाहिक संबंध स्थापित किए।

जसवंतसिंह प्रथम (1638-78)

इनका राज्यभिषेक आगरा में हुआ। मुगल बादशाह शाहजहां ने इन्हें ’’महाराजा’’ की उपाधि देकर सम्मानित किया था।

1656 ई. में शाहजहां के बीमार हो जाने पर उसके चारों पुत्रों में उत्तराधिकार का संघर्ष हुआ।

महाराजा जसवंतसिंह ने शाहजहां के बङे पुत्र दाराशिकोह का साथ दिया।

और औरंगजेब को हराने के लिए उज्जैन की तरफ सेना लेकर गए।

धरमत का युद्ध – 1658ः

औरंगजेब एवं दाराशिकोह के मध्य उत्तराधिकार युद्ध, जो उज्जैन के पास धरमत में लङा गया। शाही फौज ने औरंगजेब को हरा दिया।

मारवाङ शासक महाराजा जसवंत सिंह प्रथम ने इस युद्ध में दाराशिकोह की शाही सेना का नेतृत्व किया था।

दौराई का युद्ध

11 मार्च से 15 मार्च 1659 में अजमेर के निकट दौराई स्थान पर पुनः दाराशिकोह एवं औरंगजेब की सेना के मध्य युद्ध हुआ।

जिसमें दाराशिकोह की सेना पराजित हुई और जसवंत सिंह प्रथम औरंगजेब की शरण में चले गए।

28 नवम्बर 1678 ई. में महाराजा का जमरूद (अफगानिस्तान) में इनका देहांत हो गया।

जसवंत सिंह प्रथम के मंत्री मुहणोत नैणसी ने ’ नैणसी की ख्यात’ एवं ’मारवाङ रा परगाना री विगत’ नामक दो ऐतिहासिक ग्रंथ लिखे थे

परंतु अंतिम दिनों में महाराजा जसवंत सिंह प्रथम से अनबन हो जाने के कारण नैणसी को कैदखाने में डाल दिया।

जहां उसने आत्महत्या कर ली।

महाराजा जसंवत की मृत्यु के समय इनकी रानी गर्भवती थी

परंतु जीवित उत्तराधिकारी के अभाव में औरंगजेब ने जोधपुर राज्य को मुगल साम्राज्य में मिला लिया।

जसंवत सिंह की मृत्यु पर औरंगजेब ने कहा था ’आज कुफ्र (धर्म विरोध) का दरवाजा टूट गया है।’

महाराजा अजीत सिंह

महाराजा जसंवत सिंह की गर्भवती रानी के राजकुमार अजीतसिंह को 19 फरवरी, 1679 को लाहौर में जन्म दिया।

जोधपुर के राठौङ सरदार वीर दुर्गादास एवं अन्य सरदारों ने मिलकर औरंगजेब से राजकुमार अजीतसिंह को जोधपुर का शासक घोषित करने की मांग की थी प

रन्तु औरंगजेब ने इसे टाल दिया एवं कहा कि राजकुमारी के बङा हो जाने पर उन्हें राजा बना दिया जाएगा।

इसके बाद औरंगजेब ने राजकुमार एवं रानियों को परवरिश हेतु दिल्ली अपने पास बुला लिया। इन्हें वहां रूपसिंह राठौङ की हवेली में रखा गया।

उसके मन मे पाप आ गया था और वह राजकुमार को समाप्त कर जोधपुर राज्य को हमेशा के लिए हङपना चाहता था।

वीर दुर्गादास औरंगजेब की चालाकी से राजकुमार अजीतसिंह एवं रानियों को ’बाघेली’ नामक महिला की मदद से औरंगजेब के चंगुल से बाहर निकल लाए

और गुप्त रूप से सिरोही के कालिन्दी स्थान पर जयदेव नामक ब्राह्मण के घर पर उनकी परवरिश्ज्ञ की।

दिल्ली में एक अन्य बालक को नकली अजीतसिंह के रूप में रखा।

बादशाह औरंगजेब ने बालक को असली अजीतसिंह समझते हुए उसका नाम मोहम्मदीराज रखा।

मारवाङ में भी अजीतसिंह को सुरक्षित न देखकर वीर राठौङ दुर्गादास ने मेवाङ में शरण ली।

मेवाङ महाराणा राजसिंह ने अजीतसिंह के निर्वाह के लिए दुर्गादास को की जागीर प्रदान की।

औरंगजेब की मृत्यु के बाद महाराजा अजीतसिंह ने वीर दुर्गादास व अन्य सैनिकों की मदद से जोधपुर पर अधिकार कर लिया और

12 मार्च ,1707 केा उन्होंने अपने पैतृक शहर जोधपुर में प्रवेश किया।

बाद में गलत लोगों के बहकावे में आकर महाराजा अजीतसिंह ने वीर दुर्गादास जैसे स्वामीभक्त वीर को अपने राज्य से निर्वासित कर दिया,

जहां वे वीर दुर्गादास दुःखी मन से मेवाङ की सेवा में चले गए।

महाराजा अजीतसिंह ने मुगल बादशाह फर्रुखशियर के साथ संधि कर ली और लङकी इन्द्र कुँवरी का विवाह बादशाह से कर दिया।

23 जून, 1724 को महाराजा अजीतसिंह की इनके छोटे पुत्र बख्तसिंह ने सोते हुए हत्या कर दी।

अतः बख्तसिंह मारवाङ का दूसरा पितृहन्ता कहालाता है।

महाराजा मानसिंह (1803-43)-

1803 में उत्तराधिकार युद्ध के बाद मानसिंह जोधपुर के सिंहासन पर बैठे। तब मानसिंह जालौर में मारवाङ की सेना से घिरे हुए थे।

तब गोरखनाथ सम्प्रदाय के गुरु आयम देवनाथ ने भविष्यवाणी की, कि मानसिंह शीघ्र ही जोधपुर के राजा बनेंगे।

अतः राजा बनते ही मानसिंह ने देवनाथ का जोधपुर बुलाकर अपना गुरु बनाया तथा वहां नाथ सम्प्रदाय के महामंदिर का निर्माण करवाया।

इन्होंने 1818 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ आश्रित पार्थक्य की संधि की।

मानसिंह व जगतसिंह द्वितीय के मध्य कृष्णा कुमारी के कारण गिंगोली का युद्ध हुआ।

दोस्तो आज की पोस्ट में आपने  मारवाड़ का इतिहास के बारें में पढ़ा ,आपको ये जानकारी कैसे लगी ,नीचे दिये कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें 

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August 10, 2020

राजस्थान का एकीकरण-Rajasthan ka Ekikaran

राजस्थान का एकीकरण (Rajasthan ka Ekikaran)

  • राजस्थान का एकीकरण की शुरुआत 18 मार्च 1948 ईसवी से शुरू हुआ जो 1 नवंबर 1956 ईस्वी को समाप्त हुआ। राजस्थान का एकीकरण 7 चरणों में पूरा हुआ। इसको पूरा होने में 8 वर्ष 7 महीना 14 दिन का समय लगा। उस समय राजस्थान में 19 रियासत व 3 ठिकाने और 1 केंद्र शासित प्रदेश था।
  • 3 ठिकाने :- 1. नीमराणा (अलवर) 2. लावा (टोंक) 3. कुशलगढ़ (बांसवाड़ा)
  • केंद्र शासित प्रदेश :- 1 (अजमेर मेरवाड़ा)
  • राजस्थान में एकीकरण का श्रेय सरदार बल्लभ भाई पटेल को दिया जाता है।

राजस्थान का एकीकरण से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य ( Rajasthan ka Ekikaran related fact )

• राजस्थान का एकीकरण से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य और बातें हैं जिन्हें आपको जानना बहुत ही आवश्यक है। तो चलिए हम आपको राजस्थान के एकीकरण से संबंधित महत्वपूर्ण बातें बताते हैं। :-

  1. क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान की सबसे बड़ी रियासत – मारवाड़ रियासत
  2. जनसंख्या की दृष्टि से राजस्थान की सबसे बड़ी रियासत – जयपुर रियासत
  3. क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान की सबसे छोटी रियासत – शाहपुरा
  4. जनसंख्या की दृष्टि से राजस्थान की सबसे छोटी रियासत – शाहपुरा
  5. राजस्थान की सबसे प्राचीन रियासत – मेवाड़
  6. राजस्थान की सबसे नवीन रियासत – झालावाड़
  7. राजस्थान में जाटों की रियासत – भारतपुर, धौलपुर
  8. एकमात्र मुस्लिम रियासत – टोंक
  9. राजस्थान का एकीकरण कितने चरणों में पूरा हुआ – 7 चरणों में
  10. राजस्थान के एकी करण में कितना समय लगा – 8 वर्ष 7 माह 14 दिन
  11. राजस्थान में एकी करण का श्रेय – सरदार बल्लभ भाई पटेल
  12. आजादी के समय राजस्थान में रियासत – 19 रियासत, 3 ठिकाने, 1 केंद्र शासित प्रदेश
  13. एकी करण में शामिल होने वाली पहली रियासत – अलवर
  14. एकी करण में शामिल होने वाली अंतिम रियासत – सिरोही- अजमेर मेरवाड़ा

राजस्थान का एकीकरण : एक नजर में।

  • जून 1946 में मेवाड़ महाराणा भुपालसिंह ने समस्त राजपूताना के राजाओं का सम्मेलन उदयपुर में बुलवाया तथा राजस्थान यूनियन के निर्माण की अपील की।
  • इसी प्रकार कोटा महाराव भीमसिंह ने हाडोती सघ तथा डूंगरपुर महारावल के बागड़ संघ बनाने का प्रयास किया था।

राजस्थान का