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Political Science

November 8, 2020

भारतीय दंड संहिता Indian penal code 376

बलात्कार के अपराध के संबंध में पूर्व के आलेख में लात्कार के अपराध की परिभाषा प्रस्तुत की गई थी। इस आलेख में बलात्कार के संबंध में भारतीय दंड संहिता में दंड के उपबंध पर चर्चा की जा रही है।

बलात्कार भारतीय दंड संहिता का ऐसा अपराध है जिस पर अत्यंत विस्तृत उपबंध दंड संहिता के अंतर्गत किए गए हैं, जितनी विस्तृत इस अपराध की परिभाषा को रखा गया है, उतना ही विस्तृत अपराध के अधीन दंड दिए जाने का उपबंध किया गया है।

यह ऐसा विशेष अपराध है, जिस अपराध के घटित होने पर दंड भी अलग अलग प्रकार से अलग-अलग पद एवं परिस्थितियों के अनुरूप दिया जाता है।

दंड की अवधि अपराध की जघन्यता या विरलतम से विरल अपराध को देखते हुए तय की गई है तथा संपूर्ण समाज के भीतर जितनी भी भांति से जितने भी लोगों द्वारा बलात्कार के अपराध को कारित किया जाता है, उस परिस्थिति से निपटने के लिए संपूर्ण उपबंध इस दंड संहिता के अंतर्गत किए गए हैं।

भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के अंतर्गत बलात्कार के अपराध के लिए दंड रखा गया है। धारा 376, 376ए, 376बी, 376सी एवं 376डी, 376ई इन सभी धाराओं के अधीन बलात्कार के अपराध के लिए दंड की व्यवस्था रखी गई है।

धारा 376

धारा 376 में दो उपधाराएं दी गई हैं। पहली उपधारा के अंदर साधारण मामलों में बलात्कार के लिए दंड की अवधि बताई गई है। यदि कोई व्यक्ति साधारण मामलों में बलात्कार के अपराध का सिद्धदोष है तो वह कम से कम 7 वर्ष तक की अवधि का कारावास या फिर अधिकतम आजीवन कारावास तक दिया जा सकता है। दंड के मामले में दंड और जुर्माना दोनों दिया जा सकता है।

स्टेट ऑफ मध्यप्रदेश बनाम महेश भूमिया ए आई आर 2006 एस सी 763 के मामले में यह कहा गया है कि यदि किसी मामले में न्यूनतम से कम दंड दिया जाता है तो प्रथमदृष्टया यह विधि के विपरीत होगा। यदि इसके विशेष या पर्याप्त कारण नहीं बताए जाते हैं तो ऐसा दंडादेश अवैध माना जाएगा।

स्टेट ऑफ कर्नाटक बनाम राजू के मामले में अट्ठारह वर्षीय बालक द्वारा एक 10 वर्षीय बालिका के साथ बलात्कार किया गया था। बालक की आयु के कारण उसे न्यूनतम से कम सजा से दंडित किया गया था। उच्चतम न्यायालय ने इसे अनुचित माना।

साधारण बलात्कार के मामले में दोषसिद्धि पर न्यूनतम 7 वर्ष का कारावास तो किसी भी परिस्थिति में दिया ही जाएगा। अधिक से अधिक यह आजीवन कारावास तक हो सकता है।

बलात्कार के विशेष मामले

धारा 376 की उपधारा दो में बलात्कार के विशेष मामले दिए गए हैं। यदि बलात्कार का अपराध इन विशेष परिस्थितियों में कार्य किया जाता है तो उपधारा 2 के अधीन मुकदमा दर्ज किया जाता है। वे विशेष परिस्थितियां निम्न हैं-

पुलिस अधिकारी द्वारा बलात्कार

लोक सेवक द्वारा बलात्कार

सशस्त्र बलों के किसी सदस्य द्वारा बलात्कार

जेल,सुधार गृह,विधवा गृह,या फिर कोई इस तरह की अन्य संस्था इत्यादि में कर्मचारी रहते हुए बलात्कार

अस्पताल के प्रबंधकर्ता कर्मचारी होते हुए बलात्कार

रिश्तेदार संरक्षक या शिक्षक या फिर कोई ऐसा व्यक्ति जो उस महिला के प्रति न्यास की हैसियत रखता है उसके द्वारा बलात्कार

सांप्रदायिक या पंथीय हिंसा के दौरान बलात्कार

गर्भवती स्त्री से बलात्कार

सम्मति देने में असमर्थ स्त्री से बलात्कार

मानसिक या शारीरिक निःशक्तता से ग्रसित किसी स्त्री से बलात्कार

बलात्कार करते समय स्त्री को गंभीर शारीरिक हानि कारित करना या विकलांग बनाना

किसी स्त्री से बार-बार बलात्कार

यदि निम्न परिस्थितियों में किसी स्त्री से बलात्कार किया जाता है तो बलात्कार के दोषी को कम से कम 10 वर्ष का कारावास जो आजीवन कारावास तक हो सकेगा और आजीवन कारावास से भी शेष जीवन काल के लिए कारावास अभिप्रेत होगा,दिया जा सकेगा।

धारा 376 ए

पीड़िता की मृत्यु या लगातार विकृतशील दशा कारित करने के लिए दंड-

यदि कोई दोषी किसी स्त्री का बलात्कार करता है, वह बलात्कार करने में स्त्री की मृत्यु हो जाती है या फिर उसकी स्थिति विकृतशील हो जाती है तो ऐसी परिस्थिति में दोषी को धारा 376 ए के अंतर्गत न्यूनतम 20 वर्ष का कारावास और अधिकतम मृत्युदंड तक दिया जा सकेगा। आजीवन कारावास भी दिया जाएगा तो उसका अर्थ संपूर्ण शेष जीवन के कारावास से लगाया जाएगा।

धारा 376 बी

पति द्वारा अपनी पत्नी के साथ पृथक्करण के दौरान मैथुन

पति सहमति के बिना अपनी ऐसी पत्नी के साथ जो पृथक्करण की डिक्री के कारण अन्यथा पति से अलग रह रही है, उसके साथ मैथुन करता है तो ऐसी परिस्थिति में धारा 376 बी का अपराध कारित होगा।

इस अपराध में न्यूनतम 2 वर्ष का कारावास और अधिकतम 7 वर्ष तक के कारावास और उसके साथ जुर्माने से भी दंडित किया जा सकेगा।

हाल ही के कुछ मामलों में देखा गया कि पति के घर रह रही, पति के साथ रह रही पत्नी भी बलात्कार का मुकदमा पति पर दर्ज करवा सकती है, परन्तु बाद के प्रकरणों में उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय को पलट दिया।

धारा 376सी

प्राधिकार में किसी व्यक्ति द्वारा मैथुन

कोई व्यक्ति जिस की स्थिति किसी स्त्री के साथ में भरोसे के नाते की हो या फिर प्राधिकार का मामला हो ,जैसे किसी अस्पताल का प्रबंधतंत्र हो, कर्मचारी हो कोई लोकसेवक हो, किसी जेल सुधारगृह या विधवागृह इत्यादि का कोई प्रबंधक हो, किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा जो विश्वास के नाते को भंग कर देता है और स्त्री के साथ में बलात्कार किया जाता है तो धारा 376सी के अंतर्गत उसे न्यूनतम 5 वर्ष पर अधिकतम 10 वर्ष के कारावास से दंडित किया जा सकता है।

धारा 376डी

सामूहिक बलात्कार

सामूहिक बलात्कार इस समय भारत में नासूर के सामान सामने आया है। पूरे समाज के लिए अत्यंत भयानक परिस्थिति है। इस परिस्थिति से निपटने के इंतजाम भारतीय दंड संहिता की धारा 376डी के अंतर्गत किए गए हैं।

जहां किसी स्त्री से एक या अधिक व्यक्तियों द्वारा एक समूह गठित करके सामान आशय से बलात्कार किया जाता है, वहां पर कठोर अवधि के कारावास, जिसकी अवधि कम से कम 20 वर्ष की होगी और जो आजीवन कारावास जिसे शेष जीवन का कारावास अभिप्रेत हो वह भी दिया जा सकता है।

व्यक्तियों के सामूहिक बलात्कार का दोषी होने के परिणाम स्वरूप उन्हें न्यूनतम 20 वर्ष का कारावास दिए जाने का अधिकार सक्षम न्यायालय को भारतीय दंड संहिता की धारा के अंतर्गत प्राप्त है।

धारा 376ई

धारा 376AB

12 वर्ष से कम की उम्र की स्त्री से बलात्कार-

बारह वर्ष से कम की स्त्री से बलात्कार के दोषी को कम से कम 20 वर्ष और अधिकतम अंतिम सांस तक कारावास दिया जा सकता है।

धारा 376DA

16 वर्ष से कम आयु की स्त्री से सामुहिक बलात्कार

16 वर्ष से कम आयु की स्त्री से सामुहिक बलात्कार के दोषियों को केवल अंतिम सांस तक का कारावास और जुर्माना दिए जाने का प्रावधान किया गया है या फिर मृत्युदंड इस मामले में दिया जाएगा।

धारा 376DB

12 वर्ष से कम उम्र की स्त्री से सामुहिक बलात्कार के मामले में दोषियों को कम से कम अंतिम सांस तक कारावास या फिर मृत्युदंड का प्रावधान रखा गया है।

जुर्माना स्त्री को दिए जाने का प्रावधान है।

दोबारा बलात्कार करना

यदि किसी व्यक्ति द्वारा एक बार बलात्कार किया गया और उसे दोष सिद्ध कर दिया गया परंतु वही व्यक्ति पुनः बलात्कार करता है तो ऐसी परिस्थिति में दोषी को आजीवन कारावास जिसका अर्थ उस दोषी के शेष जीवन का कारावास माना जाएगा या फिर मृत्युदंड से दंडित किया जा सकेगा। 

October 2, 2020

What is article 16 constitution of India

Article 16

(1) There shall be equality of opportunity for all citizens in matters relating to employment or appointment to any office under the State.

(2) No citizen shall, on grounds only of religion, race, caste, sex, descent, place of birth, residence or any of them, be ineligible for, or discriminated against in respect of, any employment or office under the State.

(3) Nothing in this article shall prevent Parliament from making any law prescribing, in regard to a class or classes of employment or appointment to an office under the Government of,

or any local or other authority within, a State or Union territory, any requirement as to residence ,

within that State or Union territory] prior to such employment or appointment.

  • (4) Nothing in this article shall prevent the State from making any provision for the reservation of appointments or posts in favour of any backward class of citizens which,
  • in the opinion of the State, is not adequately represented in the services under the State.
  • (4A) Nothing in this article shall prevent the State from making any provision for reservation in matters of promotion,
  • with consequential seniority,
  • to any class] or classes of posts in the services under the State in favour of the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes which,
  • in the opinion of the State

  • (4B) Nothing in this article shall prevent the State from considering any
  • unfilled vacancies of a year which are reserved for being filled up in that year in accordance with
  • any provision for reservation made under clause (4) or clause
  • (4A) as a separate class of vacancies to be filled up in any succeeding year
  • or years and such class of _vacancies_ shall not be considered together with the _vacancies,
  • of the year in which they are being filled up for determining the ceiling of fifty per cent.
  • reservation on total number of vacancies of that year.

(5) Nothing in this article shall affect the operation of any law which provides that the incumbent of an office in connection with the affairs of any religious or denominational institution or any member of the governing body thereof shall be a person professing a particular religion or belonging to a particular denomination.

(6) Nothing in this article shall prevent the State from making any provision for the reservation of appointments or posts in favour of any economically,

weaker sections of citizens other than the classes mentioned in clause (4),

in addition to the existing reservation and subject to a maximum of ten per cent. of the posts in each category.

article 16

Debate Summary

Article 10, Draft Constitution, 1948

(1) There shall be equality of opportunity for all citizens in matters of employment under the State.

(2) No citizen shall, on grounds only of religion, race, caste, sex, descent, place of birth or any of them, be ineligible for any office under the State.

  • (3) Nothing in this article shall prevent the State from making any provision for the reservation of appointments or posts in favour of any backward class of citizens who, in the opinion of the State

(4) Nothing in this article shall affect the operation of any law which provides that the incumbent of an office in connection with the affairs of any religious or denominational institution or any member of the governing body thereof shall be a person professing a particular religion or belonging to a particular denomination.

Draft Article 10 (Article 16) was debated on 30th November 1948.

It provided for equality of opportunity in all government employment.

While some members wanted a residence criterion for employment in a state government, others didn’t want any such restrictions.

Arguments in favour of the residence criteria claimed that only natives of a particular state could efficiently discharge their duties as officers of the state government. The responses to these arguments invoked the idea of common citizenship in the constitution which would be undermined by the residence criteria.

The Assembly also discussed the use of the term ‘backward class’ in the Draft Article.

While some preferred the term due to its generality and ability to encompass a wider range of communities, others argued that the generality of term introduced a sense of vagueness;

specific terms like ‘Scheduled Caste’ were better.

article 16 article 16 article 16 article 16

October 1, 2020

what is Article 15 constitution of India

Article 15 Prohibition of discrimination on grounds of religion, race, caste, sex or place of birth.

(1) The State shall not discriminate against any citizen on grounds only of religion, race, caste, sex, place of birth or any of them.

(2) No citizen shall, on grounds only of religion, race, caste, sex, place of birth or any of them, be subject to any disability, liability, restriction or condition with regard to—

     (a) access to shops, public restaurants, hotels and places of public entertainment; or

     (b) the use of wells, tanks, bathing ghats, roads and places of public resort maintained wholly or partly out of State funds or dedicated to the use of the general public.

(3) Nothing in this article shall prevent the State from making any special provision for women and children.

(4) Nothing in this article or in clause (2) of article 29 shall prevent the State from making any special provision for the advancement of any socially and educationally backward classes of citizens or for the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes.

(5) Nothing in this article or in sub-clause (g) of clause (1) of article 19 shall prevent the State from making any special provision, by law, for the advancement of any socially and educationally backward classes of citizens or for the Scheduled Castes or the Scheduled Tribes in so far as such special provisions relate to their admission to educational institutions including private educational institutions, whether aided or unaided by the State, other than the minority educational institutions referred to in clause (1) of article 30.

(6) Nothing in this article or sub-clause (g) of clause (1) of article 19 or clause (2) of article 29 shall prevent the State from making,—

     (a) any special provision for the advancement of any economically weaker sections of citizens other than the classes mentioned in clauses (4) and (5); and

     (b) any special provision for the advancement of any economically weaker sections of citizens other than the classes mentioned in clauses (4) and (5) in so far as such special provisions relate to their admission to educational institutions including private educational institutions,

whether aided or unaided by the State, other than the minority educational institutions referred to in clause (1) of article 30, which in the case of reservation would be in addition to the existing reservations and subject to a maximum of ten per cent. of the total seats in each category.

     Explanation.—For the purposes of this article and article 16, “economically weaker sections” shall be such as may be notified by the State from time to time on the basis of family income and other indicators of economic disadvantage.

Debate Summary

Article 9, Draft Constitution, 1948

(1) The State shall not discriminate against any citizen on grounds only of religion, race, caste, sex or any of them. In particular, no citizen shall, on grounds only of religion, race, caste, sex or any of them, be subject to any disability, liability, restriction or condition with regard to-

(a) Access to shops, public restaurants, hotels and places of public entertainment, or

(b) The use of wells, tanks 3, roads and places of public resort maintained wholly or partly out of the revenues of the State or dedicated to the use of the general public.

(2) Nothing in this article shall prevent the State from making any special provision for women and children.

Draft Article 9 (Article 15) was debated on the 29th of November 1948.

It prohibited discrimination on five grounds: religion, race, caste, sex or place of birth.

Some members argued that the Draft Article did not engage with discrimination based on family and descent. Others wanted a specific mention of gardens, roads and tramways as potential public spaces where people should not face discrimination.

In response to these points, it was clarified that while the Draft Article specifically mentions some spaces, the general nature of the language used in the Article was sufficient to cover a wide range of public spaces including those that were not specified in the Article’s text.There was a proposal to add a similar clause for Scheduled Castes and Tribes as well.

This was not adopted – it was argued that this approach would perpetuate the segregation of Scheduled Castes and Tribes.

Article 15 Article 15 Article 15 Article 15

October 1, 2020

Article 1 (One)?? constitution of India

(1) India, that is Bharat, shall be a Union of States.

(2) The States and the territories thereof shall be as specified in the First Schedule.

(3) The territory of India shall comprise —

(a) the territories of the States;

(b) the Union territories specified in the First Schedule; and

(c) such other territories as may be acquired.

Constitution

Debate Summary

Article 1, Draft Constitution, 1948

(1)India shall be a Union of States.

(2) The States shall mean the States for the time being specified in Parts I, II and III of the First Schedule.

(3)The territory of India shall comprise-

(a) The territories of the States;

(b)The territories for the time being specified in Part IV of the First Schedule; and

(c) Such other territories as may be acquired.


Draft Article 1 (Article 1) was debated on 15th and 17th November 1948, and 17th and 18th September 1949. It defines the name and territory of India.

A member of the Drafting Committee clarified the object of using the term ‘Union of States’: it was to make it explicit that India was a federation of states. The federation was an indestructible unit and not a result of an agreement between states.

Another member proposed to add ‘Secular, Federal, Socialist’ to ‘Union of States’. He argued that, as the Preamble of the Constitution was not yet adopted, Draft Article 1 should embody ‘aspirations’ that the Constitution seeks to achieve.  The Chairman of the Drafting Committee opposed this amendment. He noted that the social and economic policy decisions were to be taken by elected parliamentarians.

To encode the form of society would destroy ‘democracy altogether’. He further pointed out several Directive Principles of the State Policy including the right to livelihood, redistribution of material resources and equal pay for equal work were socialistic. There was no need to include ‘socialist’ in Draft Article 1.

Some members suggested alternative names to India. One wanted ‘Bharat’ or ‘Hind’ to gain more prominence and to be placed before ‘India’. Another suggested ‘Union of Indian Socialistic republics U. I. S. R.’ on the lines of the U. S. S. R.

When all the proposals were put to vote, they were negatived. The Assembly adopted Draft Article 1 on 18 September 1949.

September 7, 2020

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति- शीतयुद्ध International Politics-Cold war

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति- शीतयुद्ध

शीत युद्ध का इतिहास,उत्पत्ति के कारण, और राजनीतिक प्रभाव

शीतयुद्ध

शीतयुद्ध नामक शब्द का प्रयोग ‘बर्नार्ड बारूच’ ने किया, जिसे वॉल्टर लिपमैन’ ने लोकप्रिय बनाया।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दो महाशक्तियों अमेरिका और सोवियत संघ का उदय हुआ। इन दोनों महाशक्तियों के आपसी सम्बन्धो को अभिव्यक्त करने वाला सबसे अधिक उपयुक्त शब्द है-शीत युद्ध

शीत युद्ध एक व्यापारीक संघर्ष था जिसमे दो विरोधी जीवन पद्धतिया उदारवादी लोकतंत्र तथा सर्वाधिकार्रवादी साम्यवाद -सर्वोच्चता प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रही थी। यथार्थवादी सिद्धान्त के प्रमुख प्रवक्ता हंस जे.मॉरगेन्थाऊ के अनुसार “शीत युद्ध पुरानी शक्ति राजनीति का नवीनीकरण है।

जोसेफ फ्रेकले के शब्दों में “शीत युद्ध दो बड़े राज्यों के बीच विद्यमान गहरी प्रतियोगिता अर्थात चालो तथा प्रतिचलो का सिलसिला माना जा सकता है।”

इस प्रकार शीत युद्ध दो महाशक्तियों अमेरिका और सोवियत संघ, दो विचारधाराओ(पूंजीवाद, साम्यवाद) औऱ दो सैनिक गुटों (नाटो औऱ वारसा ) के मध्य वैचारिक द्वंद्व था। यह एक ऐसा युद्ध था जिसका रणक्षेत्र मानव का मस्तिष्क था। यह मनुषयो के मानो में लड़ा जाने वाला युद्ध था।इसे स्नायु युद्ध भी कहा जाता है।

शीतयुद्ध – शीत युद्ध जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है कि यह अस्त्र-शस्त्रों का युद्ध न होकर धमकियों तक ही सीमित युद्ध है। इस युद्ध में कोई वास्तविक युद्ध नहीं लगा गया। शीत युद्ध एक प्रकार का वाक युद्ध था जो कागज के गोलों, पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो तथा प्रचार साधनों तक ही लड़ा गया।

इस युद्ध में न तो कोई गोली चली और न कोई घायल हुआ। इसमें दोनों महाशक्तियों ने अपना सर्वस्व कायम रखने के लिए विश्व के अधिकांश हिस्सों में परोक्ष युद्ध लड़े। युद्ध को शस्त्रायुद्ध में बदलने से रोकने के सभी उपायों का भी प्रयोग किया गया, यह केवल कूटनीतिक उपयों द्वारा लगा जाने वाला युद्ध था जिसमें दोनों महाशक्तियां एक दूसरे को नीचा दिखाने के सभी उपायों का सहारा लेती रही।

शीतयुद्ध का चरम बिंदु क्यूबा मिसाइल संकट (1962) था। शीत युद्ध के प्रारंभिक समय में अमेरिका के नेतृत्व में उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन नाटो की स्थापना 4 अप्रैल, 1949 में हुई। सोवियत संघ नेतृत्व में बने पूर्वी गठबंधन का नाम वारसा संधि था, जो 1955 में स्थापित हुआ नाटो के विरोध में।

इस युद्ध का उद्देश्य अपने-अपने गुटों में मित्रा राष्ट्रों को शामिल करके अपनी स्थिति मजबूत बनाना था ताकि भविष्य में प्रत्येक अपने अपने विरोधी गुट की चालों को आसानी से काट सके। यह युद्ध द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका और सोवियत संघ के मध्य पैदा हुआ अविश्वास व शंका की अन्तिम परिणति था

शीतयुद्ध की उत्पत्ति के कारण:

बर्लिन संकट (1961) के समय संयुक्त राज्य अमेरिका एवं सोवियत रूस के टैंक आमने सामने शीतयुद्ध के लक्षण द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ही प्रकट होने लगे थे। दोनों महाशक्तियां अपने-अपने संकीर्ण स्वार्थों को ही ध्यान में रखकर युद्ध लड़ रही थी और परस्पर सहयोग की भावना का दिखावा कर रही थी।

जो सहयोग की भावना युद्ध के दौरान दिखाई दे रही थी, वह युद्ध के बाद समाप्त होने लगी थी और शीतयुद्ध के लक्षण स्पष्ट तौर पर उभरने लग गए थे, दोनों गुटों में ही एक दूसरे की शिकायत करने की भावना बलवती हो गई थी। इन शिकायतों के कुछ सुदृढ़ आधार थे। ये पारस्परिक मतभेद ही शीत युद्ध के प्रमुख कारण थे,

शीतयुद्ध की उत्पत्ति के प्रमुख कारण निम्नलिखित

  1. पूंजीवादी और साम्यवादी विचारधारा का प्रसार ( साम्यवाद का उदय 1917 )
  2. सोवियत संघ द्वारा याल्टा समझौते का पालन न किया जाना।
  3. सोवियत संघ और अमेरिका के वैचारिक मतभेद।सोवियत संघ का एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभरना।
  4. ईरान में सोवियत हस्तक्षेप।टर्की में सोवियत हस्तक्षेप।यूनान में साम्यवादी प्रसार।द्वितीय मोर्चे सम्बन्धी विवाद।तुष्टिकरण की नीति।
  5. सोवियत संघ द्वारा बाल्कान समझौते की उपेक्षा।अमेरिका का परमाणु कार्यक्रम।परस्पर विरोधी प्रचार।
  6. लैंड-लीज समझौते का समापन।फासीवादी ताकतों को अमेरिकी सहयोग।बर्लिन विवाद।सोवियत संघ द्वारा वीटो पावर का बार-बार प्रयोग किया जाना
  7. संकीर्ण राष्ट्रवाद पर आधारित संकीर्ण राष्ट्रीय हित
  8. युक्त राज्य अमेरिका का कम्युनिस्ट भय
  9. अमेरिका द्वारा परमाणु बम की गोपनीयता
  10. जर्मनी के खिलाफ दूसरा मोर्चा खोलने में अमेरिका द्वारा देरी

शीतयुद्ध की शुरुआत 

फुल्टन भाषण- फुल्टन भाषण (वर्ष 1945) को शीत युद्ध का औपचारिक आरंभ माना जाता है। इस भाषण में चर्चित ने कहा कि बाल्टिक से लेकर एड्रियाटिक तक यूरोप में ‘एक लोहे की दीवार’ (सोवियत संघ) खड़ी हो चुकी है।

शीत युद्ध के दौरान गुटनिरपेक्ष आंदोलन जोसेफ ब्रोज टीटो ( यूगोस्लाविया), पंडित जवाहरलाल नेहरु (भारत), गमाल अब्दुल नासिर (मिश्र), सुकर्णो (इंडोनेशिया) तथा वामे एनक्रोमा (घाना) के नेतृत्व में स्थापित हुआ। शीत युद्ध का कारण विश्व में प्रचलित दो प्रमुख विरोधी विचारधाराएं – पूंजीवादी और साम्यवादी ।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर शीत युद्ध का प्रभाव-

  1. विश्व का दो गुटों में विभाजित होना।
  2. आण्विक युद्ध की सम्भावना का भय।
  3. आतंक ओर अविश्वास के दायरे में विस्तार
  4. सैनिक संधियों एवं सैनिक गठबंधनो का बाहुल्य।
  5. सयुक्त राष्ट्र को पंगु करना।

भारत और शीत युद्ध-

गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नेता के रूप में शीतयुद्ध के दौर में भारत में जो स्तरों पर अपनी भूमिका निभाई एक स्तर पर भारत में सजग और सचेत रूप से अपने को दोनों महाशक्तियों की खेमेबंदी से अलग रखा दूसरे भारत में उपनिवेशों के चंगुल से मुक्त हुए नव स्वतंत्र देशों के महाशक्तियों के खेमे में जाने का पुरजोर विरोध किया।

भारत की नीति मैं ना तो नकारात्मक थी और ना ही निष्क्रियता की नेहरू ने विश्व को याद दिलाया कि गुटनिरपेक्षता कोई पलायन की नीति नहीं है इसके विपरीत भारत शीत युद्ध कालीन प्रतिद्वंदिता की जकड़ ढीली करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मामलों में सक्रिय रुप से हस्तक्षेप करने के पक्ष में था भारत में दोनों गुटों के बीच मौजूद मतभेदों को कम करने की कोशिश की और इस तरह उसने इन मतभेदों को पूर्ण व्यापी युद्ध का रूप लेने से रोका।

भारत नें शीत युद्ध के दौर में प्रतिद्वंदियों के बीच संवाद कायम करने तथा मध्यस्ता करने के लिए प्रयास किए उदाहरण के तौर पर 1950 के दशक के शुरुआती सालों में कोरियाई युद्ध के दौरान। शीत युद्ध के दौरान भारत में लगातार उन क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को सक्रिय बनाए रखने की कोशिश की जो अमेरिका अथवा सोवियत संघ के खेमे में से नहीं जुड़े थे ।

नेहरु जी ने स्वतंत्र और परस्पर सहयोगी राष्ट्रों के एक सच्चे राष्ट्र कुुल के ऊपर गहरा विश्वास जताया जो शीत युद्ध को खत्म करने में न सही पर उसकी जगह ढीली करने में ही सकारात्मक भूमिका निभाएं।

महत्वपूर्ण संधि-

1.सीमित परमाणु परीक्षण संधि (LTBT)  – वायुमंडल बाहरी अंतरिक्ष तथा पानी के अंदर परमाणु हथियारों के परीक्षण पर प्रतिबंध लगाने वाली इस संधि पर ब्रिटेन तथा सोवियत संघ ने मास्को में 5 अगस्त 1963 को हस्ताक्षर किए यह संदेश 10 अक्टूबर 1963 से प्रभावी हो गई।

2. परमाणु अप्रसार संधि ( NTP )- यह संधि केवल परमाणु शक्ति संपन्न देशों को एटमी हथियार रखने की अनुमति देती है तथा बाकी देशों को रोकती है।

Note—यह संदेश उन देशों को परमाणु शक्ति से संपन्न देश मानती है जिन्होंने 1 जनवरी 1967 से पहले किसी परमाणु हथियार या परमाणु स्फोटक सामग्रियों का निर्माण और विस्फोट किया हो। इसके तहत 5 देशों जिनमें अमेरिका सोवियत संघ बाद में रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन को परमाणु शक्ति संपन्न माना गया।

एनपीटी संधि पर 1 जुलाई 1968 को वाशिंगटन लंदन और मास्को में हस्ताक्षर हुए जो 5 मार्च 1970 से प्रभावी हुई।

3. सामरिक अस्त्र परिसीमन वार्ता फर्स्ट (salt first)

सामरिक अस्त्र परिसीमन वार्ता का पहला चरण 1969 के नवंबर से आरंभ हुआ इसके तहत अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन ने मास्को में 26 मई 1972 को सोवियत संघ के नेता लियोनेड बरेझनेव के साथ समझौते पर दस्तखत किए।

4. सामरिक अस्त्र परिसीमन वार्ता -2 (salt -2)

वार्ता का दूसरा चरण 1972 के नवंबर महीने में शुरू हुआ। अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने सोवियत संघ के नेता लियोनेड ब्रिझनेव के साथ वियना में 18 जून 1972 को सामूहिक रुप से घातक हथियारों के परिसीमन से संबंधित संधि पर हस्ताक्षर किए।

5. सामरिक अस्त्र न्यूनीकरण संधि फर्स्ट (स्टारट -1)

अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और सोवियत संघ के राष्ट्रपति गोर्बाचोव मैं 31 जुलाई 1991 को किस संधि पर हस्ताक्षर किए।

6. सामरिक अस्त्र न्यूनीकरण संधि –2(स्टारट_2)

इस संधि पर रूसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन तथा अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश मैं मास्को में 3 जनवरी 1993 को हस्ताक्षर किए।

महत्वपूर्ण संगठन – 

1. नॉटो {NATO} 

  • नॉटो की वर्ष 1949 में ब्रुसेल्स संधि के द्वारा स्थापना हुई।
  • शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने साम्यवाद का परिरोधन करने के लिए नॉटो जैसे सैन्य संगठन की स्थापना की, जिसका उद्देश्य था, अमेरिकी सुरक्षा को प्रभावी बनाना। साथ ही पूर्वी जर्मनी को पीछे ढ़केलना और सोवियत संघ को बाहर करना था।
  • इसके संस्थापकों में, अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, लक्जमबर्ग, नीदरलैंड, बेल्जियम और नार्वे सम्मिलित थे। शीतयुद्ध के समापन (1991) के बाद भी नॉटो बना हुआ है।

2. सियटो (SEATO)

  • सियटो का निर्माण वर्ष 1954 में नॉटो की ऐशियाई संस्करण के रूप में हुआ। इसका मूल उद्देश्य, ‘डोमिनो सिद्धांत’ (साम्यवाद के प्रसार को रोकना) को प्रभावी रूप में लागू करना था। इस के संस्थापकों में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, ब्रिटेन, थाईलैंड फिलीपींस और पाकिस्तान थे।

3. सेंट्रल ट्रीटी आर्गेनाईजेशन (CENTO) बगदाद संधि-1955

  • नॉटो का पश्चिमी ऐशियाई संस्करण जिसकी स्थापना साम्यवाद के प्रसार को पश्चिम एशिया में रोकने के लिए हुई।
  • इसके सदस्यों में ब्रिटेन, ईरान, तुर्की और पाकिस्तान थे। क्योंकि पश्चिमी एशिया में अमेरिका ने सेंटो(CENTO) के माध्यम से इस क्षेत्र के प्रभावशाली देशो को साथ लेने का प्रयत्न किया। यह उल्लेखनीय है कि इजरायल, अमेरिका का पहले से ही प्रभावशाली मित्र था।

4. अंजुस (ANZUS)

  • एशिया प्रशांत क्षेत्र में नॉटो का संस्करण, शीतयुद्ध के दौरान इसकी स्थापना अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड द्वारा मिलकर की गयी। यह उल्लेखनीय है कि चीन के साम्यवादी होने और कोरियाई संकट (1950) के बाद अमेरिका साम्यवाद के प्रसार को रोकने के लिए प्रतिबद्ध था।

नव शीत युद्ध

( शीत युद्ध का तिसरा चरण, 1979-1990)

  • नव शीत युद्ध विचारधाराओ के मध्य न होकर ,सोवियत संघ और अमेरिका के मध्य था।
  • पहले चरण की शुरुआत यूरोप से हुई ।जबकि नव शीत युद्ध की शुरुआत अफगानिस्तान से हुई ।
  • पहला शीत युद्ध मूलतः अमेरिका द्वारा शुरू किया गया था।जबकी नव शीत युद्ध का आरंभ सोवियत संघ द्वारा किया गया।
  • पहले चरण में सैन्य गठबंधन एकीकृत और शक्तिशाली थे।जबकि नव शीत युद्ध के समय सैन्य गठबंधन सिथिल पड़ गए थे।

नई सोच की विदेश नीति

गोरवाच्योब(सोवियत संघ) ने सयुक्त राष्ट्र महासभा को सम्बोधित(1985) करते हुये कहा कि-

  1. परमाणु हथियारों के युग मे हथियारों से सुरक्षा सम्भव नहीं है।
  2. सुरक्षा राजनीतिक होनी चाहिये।
  3. मानव का हित,वर्ग विशेष के हितों से ज्यादा महत्वपूर्ण है।
  4. दुनिया में अंतर्निर्भरता का विकाश होरहा है।इसलिए परस्पर सहयोग की आवश्यकता है।
  5. यदि विश्व का एक भाग असुरक्षित और अशांत है, तो दूसरा भाग सुरक्षित और शांत नही हो सकता।

September 7, 2020

लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण Democratic Decentralization

लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण

विकेन्द्रीकरण

भारत में स्वायत शासन का उल्लेख सबसे पहले प्राचीन भारत में मौर्यकाल एवं पुन: पुरात्तवीय प्रमाण के चोल काल में उत्तरमेरू अभिलेख (परांतक प्रथम 919 से 921 ई0 के) में मिलता है
आधुनिक भारत में प्रथम भारत सरकार के एक प्रस्ताव से 1864 में मिलता है जिसमें स्थानीय स्वशासन मान्यता दी गयी। एवं 1870 में मेयो ने पंचायतों को कार्यात्मक रूप में वित्तीय स्वायत्ता दी गयी। रिपन ने 1882 में एक प्रस्ताव से स्थानीय स्वशासन को मान्यता दी जिसे स्थानीय स्वशासन का मैग्नाकार्टा कहा जाता है। जिसमें उपखंड व जिला बोर्ड बनाने का सुझाव दिया गया।

स्थानीय स्वशासन की स्थिति की जांच हेतु 1907 में CEH हॉबहाउस की अध्यक्षता में जांच के लिए राजकीय विकेन्द्रीकरण आयोग/ शाही आयोग की नियुक्ति की गयी। जिसने 1909 में रिपोर्ट दी जिसमें स्वायत्तशासी संस्थाओं के विकास पर बल दिया गया। 1919 के मांटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार में या अधिनियम में स्थानीय स्वशासन के बारे में स्पष्ट प्रावधान थे। इस प्रणाली में द्वैध शासन प्रणाली में स्थानीय स्वशासन को हस्तान्तरित विषय बना दिया गया।

हस्तान्तरित विषय:- का शासन गवर्नर अपने भारतीय मंत्रियों की सलाह से करता था। जो प्रान्तीय विधानसभा के प्रति उत्तरदायी थे। 1920 में संयुक्त प्रांत, असम,बंगाल, बिहार, मद्रास और पंजाब में पंचायतों की स्थापना की गयी। 1935 के अधिनियम द्वारा स्थानीय स्वशासन को पूर्णतया राज्य का विषय बना दिया गया।

स्वतंत्रता के बाद हमारे संविधान में पंचायती राज्य व्यवस्था

भाग 9, अनुच्छेद 243, 243D, 243E, 243… अनुच्छेद 40, 11 वीं अनुसूची, 73 वां 1992 लागू हुआ (संक्षिप्त में) 24 अप्रैल 1993 को प्रभावी हुआ।

पंचायती राज्य व्यवस्था का विकास:-

आजादी के पंचायती राज एवं सामुदायिक विकास मंत्रालय बनाया गया जिसके मंत्री एस.के.डे को बनाया गया। 2 अक्टूबर 1952 को प्रधानमंत्री नेहरू की पहल पर सामुदायिक विकास कार्यक्रम (Community Development Programe) शुरू किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य आर्थिक विकास एवं सामाजिक विकास का पुनरुद्धार करना था।

लेकिन जनता को अधिकार नहीं दिया गया, जिस कारण से यह सरकारी अधिकारियों तक सीमित रह गया असफल हो गया। असफलता का कारण जनता में अशिक्षा का होना था इस प्रकार पंचायती राज व्यवस्था में सुधार हेतु समय समय पर समितियों का गठन किया गया जिनमें….

1. बलवंत राय मेहता समिति 1957
2. अशोक मेहता समिति 1977
3. डॉ. पी.वी.के. राव समिति 1985
4. डॉ. एल.एम.सिंघवी समिति 1986
5. पी.के.थुंगन समिति 1988

September 7, 2020

राजनीतिक सिद्धान्त Political theories Traditional and Modern

Political theories ( Traditional and Modern ) राजनीतिक सिद्धान्त

राजनीति के विविध पक्षों के अस्तित्व एवं वैज्ञानिक अध्ययन को राजनीतिक सिद्धांत कहा जाता है। 

राजनीति के लिए प्रयुक्त अंग्रेजी शब्द पॉलिटिक्स (politics) की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के तीन शब्दों ‘Polis'(नगर-राज्य), ‘Polity'(शासन) तथा ‘Politia'(संविधान) से हुई है। इस अर्थ में राजनीति नगर-राज्य तथा उसके प्रशासन का व्यवहारिक एवं दार्शनिक धरातल पर अध्ययन प्रस्तुत करती है।राजनीति को Polis नाम प्रसिद्ध ग्रीक विचारक “अरस्तू” द्वारा दिया गया है। अतः उन्हें ‘राजनीति विज्ञान का पिता’ कहा जाता है।

आधुनिक अर्थों में राजनीति शब्द को इन व्यापक अर्थों में प्रयुक्त नहीं किया जाता। आधुनिक समय में इसका संबंध राज्य ,सरकार, प्रशासन, व्यवस्था के तहत समाज के विविध संदर्भों व संबधों के व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध ज्ञान एवं अध्ययन से है।

प्लेटो, अरस्तू, सिसरो, ऑगस्टाइन व एक्वीनास राजनीति विज्ञान की परम्परागत विचारधारा के विचारक है। आधुनिक राजनीतिक विचारकों में चार्ल्स मेरियम, रॉबर्ट डहल, लासवेल, कैटलिन, मैक्सवेबर, लास्की, मैकाइवर का नाम उल्लेखनीय है।

राजनीतिक सिद्धांत में ‘सिद्धांत’ के लिए अंग्रेजी शब्द Theory की उत्पत्ति यूनानी शब्द ‘Theoria'(थ्योरिया) से हुई है, जिसका अर्थ है- “समझने का विशिष्ट दृष्टिकोण”। यह वही समझ है जिससे किसी घटनाक्रम को तार्किक विवेचन द्वारा स्पष्ट किया जाए अर्थात किसी अवधारणा की व्याख्या कर उसे ‘सामान्यीकरण’ की ओर अग्रसर करना।  

इस प्रकार, राजनीतिक सिद्धांत का अभिप्राय राजनीति और उससे संबंधित समस्याओं का विभिन्न तथ्यों के आधार पर व्याख्या प्रस्तुत करने से है।

जॉर्ज एच. सेबाइन की चर्चित कृति राजनीतिक सिद्धांत का इतिहास व डब्ल्यू.ए.डनिंग के राजनीतिक सिद्धांत का इतिहास के अंतर्गत प्राचीन काल से आधुनिक काल तक के राजनीतिक विचारों के इतिहास पर प्रकाश डाला गया है।

राजनीतिक सिद्धांत हमें सरकार की जरूरत क्यों है ? सरकार का सर्वश्रेष्ठ रूप कौन सा है ? क्या कानून हमारी स्वतंत्रता को सीमित करता है ? राजसत्ता कि अपने नागरिकों के प्रति क्या देनदारी होती है ? नागरिक के रूप में हमारे क्या दायित्व है ? आदि प्रश्नों की पड़ताल करता है और राजनीतिक जीवन को अनुप्रमाणित करने वाली स्वतंत्रता, समानता और न्याय जैसे मूल्यों के बारे में सुव्यवस्थित रूप से विचार करता है।

राजनीतिक सिद्धांत का उद्देश्य—

राजनीतिक सिद्धांत का उद्देश्य नागरिकों को राजनीतिक प्रश्नो के बारे में तर्कसंगत ढंग से सोचने और सामयिक राजनीतिक घटनाओं को सही तरीके से आँकने का प्रशिक्षण देना है।

राजनीति क्या है

लोग राजनीति के बारे में अलग-अलग राय रखते हैं। यथा—

(1) राजनेता और चुनाव लड़ने वाले लोग अथवा राजनीतिक पदाधिकारी राजनीति को एक प्रकार की जनसेवा बताते हैं। राजनीति से जुड़े अन्य लोग राजनीति को दांव–पेच से जोड़ते हैं।

(2)क‌ई अन्य के लिए राजनीति वही है जो राजनेता कहते हैं और जब वे राजनेताओं को दल-बदल करते हुए झूठे वादे करते हैं विभिन्न तबकौं से जोड़-तोड़ करते और निजी या सामूहिक स्वार्थ साधने के रूप में देखते हैं तो उसकी दृष्टि में राजनीति का संबंध किसी भी तरह से निजी स्वार्थ साधना के धंधे से जुड़ गया है।

लेकिन राजनीति के ये अर्थ त्रुटिपरक है।

राजनीतिक सिद्धांत का अर्थ एवं प्रकृति

राजनीतिक सिद्धांत ज्ञान की वह शाखा है जो राजनीति के अध्ययन का सामान्य ढांचा प्रस्तुत करती हैंऔर राजनीतिक मनुष्यों के सार्वजनिक जीवन से सम्बधित है। राजनीतिक सिद्धांत के तीन भाग होते है_

  • समालोचना
  • पुनर्निर्माण
  • व्याख्या

पहले दो कृत्य राजनीतिक दर्शन से संबंधित है जो मूल्यों पर बल देते हैं जबकि तीसरा करते राजनीतिक विज्ञान से संबंधित है जो तथ्यों पर बल देता है।

एंड्र्यू हैकर ने अपनी पुस्तक पोलिटिकल थ्योरी में राजनीतिक सिद्धांत के दो अर्थ बताएं है। परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत में अपने विचारों का इतिहास सम्मिलित है।  आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत से राजनीतिक व्यवहार का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है।

बल्हम ने अपनी पुस्तक Theories of political system में बताया है कि राजनीतिक सिद्धांत राजनीतिक व्यवस्था के लिए अमृत प्रतिमान प्रस्तुत करता है। राजनीतिक तथ्यों के आकलन एवं विश्लेषण के लिए एक निर्देशक का काम करता है।

1⃣ परम्परागत दृष्टिकोण

छठी सदी से बीसवीं सदी में प्राय द्वितीय विश्व युद्ध से पहले तक जिस राजनीतिक दृष्टिकोण का प्रचलन रहा है उसे परंपरागत राजनीतिक दृष्टिकोण कहा जाता है। परंपरागत राजनीतिक दृष्टिकोण को शास्त्रीय राजनीतिक सिद्धांत आदर्शात्मक राजनीतिक सिद्धांत भी कहा जाता है।

परंपरागत _राजनीतिक चिंतकों में sukrat, Plato, arastu, मान्टेस्कयू, हीगल, काण्ट तथा ग्रीन का नाम सम्मिलित है। आधुनिक युगीन विचारक जिन्होंने परंपरागत _राजनीतिक सिद्धांत का समर्थन किया। अल्फ्रेड कोबन, हन्ना, आरेण्ट, लियो स्टरास,  आदि हैं।

परंपरागत _राजनीतिक दृष्टिकोण में _राजनीतिक सिद्धांत के निर्माण के लिए जिलाध्यक्ष पत्तियों को अपनाया उसमें दार्शनिक तार्किक नैतिक ऐतिहासिक आदि हैं।

परम्परागत दृष्टिकोण में राजनीति शास्त्र को चार अर्थों में परिभाषित किया जाता हैं-

  1. राज्य के अध्ययन के रुप में
  2. सरकार के अध्ययन के रूप में
  3. राज्य और सरकार के अध्ययन के रूप में
  4. राज्य, सरकार और व्यक्ति के अध्ययन के रुप में

परंपरागत राजनीति विज्ञान एवं _राजनीतिक सिद्धांत की प्रमुख विशेषताएं—–

  • दर्शनशास्त्र से प्रभावित अध्ययन।
  • निगमनात्मक अध्ययन पद्धतियां।
  • मुल्य प्रधान अध्ययन ।
  • व्यक्तिनिष्ठ अध्ययन।
  • अध्ययन विषय में निरंतरता।
  • मुख्यतः संकुचित अध्ययन।

परंपरागत दृष्टिकोण के अनुसार राजनीति विज्ञान का अध्ययन क्षेत्र??

  • राजनीति_विज्ञान राज्य एवं सरकार दोनों का अध्यन है।
  • राजनीति_विज्ञान मानव तत्व के संदर्भ में अध्ययन है।

1⃣ राज्य के अध्ययन के रुप में-

ब्लंटसलि,गेरीस, गार्नर, तथा गेटल आदि लेखको ने राजनीति विज्ञान को राज्य के अध्ययन के रूप में परिभाषित किया हैं।

1- ब्लंटसलि के सब्दो में – “राजनीति शास्त्र वह शास्त्र है जिसका सम्बन्द्ध राज्य से है, जोरजी की आधारभूत स्थितियो ,उसकी प्रकृति, तथा विविध स्वरूपों एवं विकास को समझने का प्रयत्न करता हैं।”
2- गैरिस के शब्दों में- “राजनीति शास्त्र राज्य को एक शक्ति शास्त्र के रूप में मानता है जो राज्य के समस्त संबंधो, उसकी उत्पत्ति, उसके स्थान, उसके उद्देश्य उसके नैतिक महत्व,उसकी आर्थिक समस्याओं, उसके वितिय पहलू आदि का विवेचन करता हैं।”
3- गार्नर के अनुसार – “राजनीति शास्त्र का आरंभ और अंत राज्य के साथ होता है।”
4- गैटल के शब्दों में- राजनीति शास्त्र राज्य के भूत ,भविष्य व वर्तमान का,राजनीति संग़ठन तथा राजनीति कार्यों का,राजनीती संस्थाओं का तथा राजनीति सिद्धान्तों का अध्ययन करता हैं।”

Political theories important facts –

  • गिल्ड तथा पांपर –  राजनीति ,शक्ति एवं सता के संबंधो मे अच्छी प्रकार की जा सकती है
  • शक्ति का सिद्बात सम्पूणं राजनीति प्रक्रियाशाली के वितरण,प्रयोग एवं प्रभाव क अध्ययन है- लावेल
  • राजनीतिविज्ञान सम्पूणं राजनीति व्यवस्था का अध्ययन है – ईस्टन व आमंड
  • राजनीति_विज्ञान को निणंय निर्माण का विज्ञान मानते है- हबंर्ट साइमन
  • राज नीति विज्ञान मूलतः एक नीति विज्ञान है – लांसवेल
  • राज नीति विज्ञान महानतम विज्ञान – गिलक्राइस्ट
  • राजनीति_विज्ञान सवौच्च विज्ञान – अरस्तु 
  • राजनीति_को विज्ञान नही मानने वाले विचारक – बक्ल काम्टे ,मेटलेंड,एमास ,बीयडं ब्रोजन व बकं
  • राजनीति_विज्ञान को मानने वाले विचारक – बोदा, हाँब्स , मास्टेस्क्यु, ब्राइस, ब्लंटशली जेलिनेक, फाईनर व लांस्की
  • जिस प्रकार हम सौदंर्य शास्त्र को विज्ञान की संज्ञा नही दे सकते उसी प्रकार राजनीति शास्त्र को विज्ञान नही कहा जा सकता है – बर्क 
  • जबमै राजनीति विज्ञान शीर्षक के अंतर्गत परीक्षा प्रशनो को देखता तो मुझे पप्रशनो पर नही अपितु शीर्षक के लिए खेद होता है- मैटलेंड
  • प्रत्येक नये कानून का निर्माण प्रत्येक नही संस्था की स्थापना ओर प्रत्येक नही नीति की शुरुवात एक प्रयोग है – गार्नर
  • राजनीति_विज्ञान के आधुनिक दृष्टिकोण के समर्थक – केटलिन, लासवेल, डहल तथा फ्रोमेन
  • राज.वि. एक व्यहारवादी विषय के रुप मे शक्ति को संवारने तथा मिल बांटकर प्रयोग करने का अध्ययन है- लासवेल एंव केटलिन
  • ज्ञान की वर्तमिन अवस्था मे राज.वि .विज्ञान मानना तो दुर वह कलाओ मे भी सबसे पिछडी कला है- बक्ल
  • राज.वि मे वैज्ञानिक तकनीक ओर प्रविधियो का विकास समय की सबसे बडी आवशयकता है–  मेरियम
  • राज. वा. मूलतः एक वाज्ञान.है और इसका संबंध राजनीतिक संस्थाऔ के वै ज्ञानिक विशलेषण से है – केटलिनन व लावेल

September 7, 2020

राज्य की उत्पत्ति के सिद्धांत State Origin Principles

राज्य की उत्पत्ति के सिद्धान्त

राज्य की उत्पत्ति के विषय में व्यक्त किए गए मुख्य सिद्धांत निम्न है ।देवी उत्पत्ति का सिद्धांत ?? 

इस सिद्धांत के अनुसार राज्य की उत्पत्ति ईश्वर के द्वारा की गई है राधा को ईश्वर द्वारा राज्य को संचालित करने के लिए भेजा गया है। प्रजा का कर्तव्य है कि राजा का विरोध ना करें क्योंकि वह ईश्वर का प्रतिनिधि है।

मातृ एवं पितृ प्रधान सिद्धांत??

मातृ सत्तात्मक सिद्धांत राज्य की उत्पत्ति का कारण स्थाई वैवाहिक संबंधों के अभाव को मानता है परिवार का मुखिया पिता न होकर माता को मानता है संतानों को मां के नाम से जाना जाता था। जबकि पितृ सत्तात्मक सिद्धांत राज्य की उत्पत्ति का कारण पिता को मानता है जिसका मुखिया पिता होता है।कुूलों से कबीला और कबीलों से राज्य का विकास हुआ ।

शक्ति सिद्धांत ?? 

इस _सिद्धांत के अनुसार राज्य की उत्पत्ति का एकमात्र कारण शक्तिह।ै इसके अलावा युद्ध को राज्य की उत्पत्ति का कारण यह _सिद्धांत मानता है जैसा कि वाल्टेयर ने कहा है प्रथम राजा एक भाग्यशाली योद्धा था। इस _सिद्धांत के अनुसार शक्ति राज्य की उत्पत्ति का एकमात्र आधार है शक्ति का आशय भौतिक और सैनिक शक्ति से है। प्रभुत्व की लालसा और आक्रमकता मानव स्वभाव का अनिवार्य घटक है। प्रत्येक राज्य में अल्पसंख्यक शक्तिशाली शासन करते हैं और बहुसंख्यक शक्तिहीन अनुकरण करते हैं। वर्तमान राज्यों का अस्तित्व शक्ति पर ही केंद्रित है।

सामाजिक समझौता सिद्धांत?? 

सामाजिक समझौता _सिद्धांत को मानने वालों में थांमस हाब्स, जॉन लॉक, जीन जैक रूसो आदि का प्रमुख योगदान रहा। इन विचारकों के अनुसार आदिम अवस्था को छोड़कर नागरिकों ने विभिन्न समझौते किए और समझौतों के परिणाम स्वरुप राज्य की उत्पत्ति हुई।

विकासवादी सिद्धांत?? 

यह _सिद्धांत मनोवैज्ञानिक ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय प्रमाणों पर आधारित है इसके अनुसार राज्य न कृत्रिम संस्था है न ही देवीय संस्था है ।यह सामाजिक जीवन का धीरे-धीरे किया गया विकास है इसके अनुसार राज्य के विकास में कई तत्व जैसे कि रक्त संबंध धर्म शक्ति राजनीतिक चेतना आर्थिक आधार का योगदान है पर आज सबके हित साधन के रूप में विकसित हुआ।

सिद्धान्त सिद्धान्त

September 6, 2020

सम्प्रभुता क्या है??? What is Sovereignty

Sovereignty सम्प्रभुता

सम्प्रभुता

प्रभुसत्ता को अंग्रेजी में (sovereignty) कहते हैं soveregnty शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा के superanus शब्द से हुई है । जिसका अर्थ है सर्वोच्च सत्ता।

जैसा कि डॉ.गारनर मैं संप्रभुता को राज्य का महत्वपूर्ण तत्व माना है । संप्रभुता किसी राज्य की सर्वोच्च सत्ता को कहा जाता है।

संप्रभुता शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग फ्रांसीसी विचारक बोंदा ने 1756 में अपनी पुस्तक six book concerning republicमे किया

अतः इसका उद्भव 16 शताब्दी में माना जाता है।

संप्रभुता के इतिहास पर नजर डालें तो सोलहवीं सदी में बोदा 17 सदी में ग्रेसियस और हाब्स 18 वीं शताब्दी में रूसो

19वीं शताब्दी में ऑस्टिन ने स्पष्ट रूप से इसका प्रतिपादन किया ।

संप्रभुता कीमहत्वपूर्ण परिभाषा

विल्सन -“ प्रभुसत्ता कानूनों का निर्माण करने तथा उन्हें लागू करने वाली प्रतिदिन क्रियाशील सकती है”

लास्की – ” राज्य की प्रभुसत्ता अपने क्षेत्र के भीतर सभी व्यक्तियों एवं समय को आदेश देती है यह उनमें से किसी से आदेश नहीं लेती इसकी इच्छा किसी प्रकार की वैधानिक सीमाओं के अधीन नहीं है””

बोदा –“संप्रभुता नागरिकों और प्रजाजनों पर वह सर्वोच्च शक्ति है जो विधि द्वारा नियंत्रित नहीं है””।

जैसा की विलोबी भी ने कहा है –“संप्रभुता राज्य की सर्वोच्च इच्छा है””!

बरगेस के अनुसार–“” संप्रभुता राज्य के व्यक्तियों और समुदायों पर भौतिक निरंकुश और असीमित शक्ति है”!

रुसो के अनुसार-” सार्वजनिक संकल्प ही संप्रभु है”!

लास्की –“राजनीतिक शास्त्र के लिए यह अस्थाई रूप से लाभदायक होगा यदि संपूर्णता के सिद्धांत को इस से निकाल दिया जाए”

सम्प्रभुता क्या है??? What is Sovereignty सम्प्रभुता

Q w e r t y u i o p a s d f g h j k l m n b v c x z q w e r t y u i o p a s d f g h j k l m n b v c x z z x c v b n m l k j h g f d s a

September 6, 2020

बहुलवाद क्या है व इसके कार्य?? Pluralism

Pluralism बहुलवाद

20 वी शताब्दी में बहुलवाद का उदय सम्प्रभुता के एकलवादी सिद्धान्त के विरूद्ध प्रतिक्रियास्वरूप हुआ। बहुलवाद एक प्रतिकियास्वरूप सिद्धान्त है। बहुलवाद वह सिद्धान्त है जिसके अनुसार समाज मे आज्ञापालन कराने की शक्ति एक ही जगह केंद्रित नही होती,बल्कि वह अनेक समूहों में बिखर जाती है।ये समूह मानव की भिन्न भिन्न आवश्यकताए पूरी करने का दावा करते हैं।

बहुलवाद को विचारधारा के रूप में स्थापित करने का श्रेय जर्मन समाजशास्त्री गीयर्क तथा बिर्टिश विद्वान मेटलेंड को है, जिन्हें आधुनिक राजनीतिक बहुलवाद का जनक कहा जाता है।

सम्प्रभुता के बहुलवादी सिद्धान्त के मुख्य समर्थक लास्की, बार्कर, लिंडसे, क्रेब, डीगवी, मिस फॉलेट आदि है।

बहुलवाद_ इस तथ्य में विश्वास करता है कि मनुष्य के सर्वागीण विकास में सामाजिक स्तर पर विकसित अनेक प्रकार के संघो का अपना विशेष योगदान होता है।ये संघ समान रूप से प्रभावशाली तथा एक दूसरे से स्वतंत्र होते है तथा इनमे कोई भी संघ दूसरों से अधिक महत्वपूर्ण या सर्वोच्च नही होता ।बहुलवादी राज्य को भी अन्य सामाजिक संघो की तरह एक संघ मानते है।

लास्की के शब्दों में- चूँकि समाज का स्वरूप संघीय है, अतः सत्ता का स्वरूप भी संघीय होना चाहिये

एक राजनीतिक मान्यता के रुप में:- समाज में किसी एक मूल्य,साध्य या ध्येय को सर्वोपरि मानकर सब मनुष्यों को उसके अनुरूप ढालने का प्रयत्न उचित नही है,बल्कि भिन्न-2 मूल्यों और हितों के आधार पर स्वायत्त समूहों के गठन की पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिये और सब व्यक्तियों को अपने-2 विवेक के अनुसार इनमें से किसी भी मूल्य या ध्येय के साथ जुड़कर उसे बढावा देने की पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए । यह बहुलवाद_ का दार्शनिक आधार है ।

राजनीतिक बहुलवाद:- बहुलवाद_ समाज ऐसा समाज है जिसमें शक्ति एवं सत्ता एक ही जगह केन्द्रित नही होती है,बल्कि सामाजिक जीवन के अनेक केन्द्रों में फ़ैली हुई होती है ।

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