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August 14, 2020

क्रिया क्या होती है व कितने प्रकार की होती है What Is Kriya???

क्रिया

क्रिया का अर्थ है करना

क्रिया के बिना कोई वाक्य पूर्ण नहीं होता किसी वाक्य में कर्ता कर्म तथा काल की जानकारी भी क्रियापद के माध्यम से ही होती है

तथा संस्कृत में क्रिया रूप को धातु कहते हैं जैसे :- खाना , नाचना , खेलना , पढना , मारना , पीना , जाना , सोना , लिखना , जागना , रहना , गाना , दौड़ना आदि।

धातु – हिंदीक्रिया पदों का मूल रूप ही धातु है धातु में ना जोड़ने से हिंदी के क्रियापद बनते हैं

परिभाषा – जिस शब्द से किसी कार्य के करने या होने का बोध होता है उसे क्रिया कहते हैं 

जैसे -लिखना,हँसना आदि

क्रिया के भेद ( Difference of action )

कर्मकाल के आधार तथा संरचना के आधार पर क्रिया के विभिन्न भेद किए जाते हैं

कर्म के आधार पर क्रिया के दो भेद हैं

  1. अकर्मकक्रिया
  2. सकर्मकक्रिया

1. सकर्मकक्रिया – जिस क्रिया का फल कर्ता को छोड़कर कर्म पर पड़े वह सकर्मकक्रिया कहलाती है 

जैसे -भूपेन्द्र दूध पी रहा है, नीतू खाना बना रही है ।

बच्चा चित्र बना रहा है, गीता सितार बजा रही है ।

सकर्मकक्रिया के दो उपभेद किये जाते हैं –

  • एक कर्मकक्रिया – जिस वाक्य में क्रिया के साथ एक कर्म प्रयुक्त हो उसे एक कर्मकक्रिया कहते हैं।
  • जैसे -मां पढ़ रही है।
  • द्विकर्मकक्रिया – जिस वाक्य में क्रिया के साथ दो कर्म प्रयुक्त हो उसे द्विकर्मकक्रिया कहते हैं।
  • जैसे – अध्यापक छात्रों को कंप्यूटर सिखा रहे हैं।

2. अकर्मकक्रिया – जिस वाक्य में क्रिया का प्रभाव या फल कर्ता पर पड़ता है क्योंकि कर्म प्रयुक्त नहीं होता उसे अकर्मकक्रिया कहते हैं जैसे -कुत्ता भौंकता है। कविता हँसती है। टीना होती है। आशा सोती है। मीना गाती है।

सकर्मक और अकर्मकक्रिया का पता कैसे चलता है

क्रियावाचक शब्द से पहले क्या शब्द से प्रश्न करने से, स्वतः संपादित क्रियाएं सदैव अकर्मक मानी जाती है, यदि आना जाना इत्यादि गत्यर्थक क्रियाओं वाले वाक्य में स्थान का नाम भी दिया हुआ हो त्रतो वहाँ सकर्मक नहीं तो अकर्मक मानी जाती है.

पेड़ से पत्ते गिर रहे हैं। अकर्मक
वह पेड़ से पत्ते गिरा रहा है। सकर्मक

सड़क पर पत्थर पड़ा है। अकर्मक

बच्चे गये। अकर्मक
बच्चे विद्यालय गये। सकर्मक

प्रयोग तथा संरचना के आधार

वाक्य में क्रियाओं का प्रयोग कहाँ किया जा रहा है किस रूप में किया जा रहा है इसके आधार पर भी क्रिया के निम्न भेद होते हैं –

  1. सामान्यक्रिया
  2. संयुक्तक्रिया
  3. प्रेरणार्थकक्रिया
  4. पूर्वकालिकक्रिया
  5. नाम धातुक्रिया
  6. कृदंतक्रिया
  7. सजातीयक्रिया
  8. सहायकक्रिया

संरचना के आधार पर

  • सयुक्तक्रिया
  • नामधातुक्रिया
  • प्रेरणार्थकक्रिया
  • पूर्वकालिकक्रिया
  • कृदंतक्रिया

संयुक्तक्रिया – जब दो या दो से अधिक के भिन्न अर्थ रखने वाली क्रियाओं का मेल हो उसे संयुक्तक्रिया कहते हैं 

1. मोहन नाचने लगा ,
2. प्रियंका ने दूध पी लिया
3. उसने कर लिया
4. वह खा चुका

इन वाक्यों में नाचने लगा, पी लिया, कर लिया, खा चुका इन शब्दों को संयुक्तक्रिया कहते है इनमे दो क्रियाएँ का योग है

इसमें पहलीक्रिया मुख्यक्रिया होती है और दूसरीक्रिया सहायकक्रिया के रूप में मुख्यक्रिया में विशेषता लाती है

नाम धातुक्रिया – संज्ञा सर्वनाम विशेषण शब्द जब धातु की तरह प्रयुक्त होते हैं उन्हें नामधातु कहते हैं और इन नामधातु शब्दों में जब भी प्रत्यय लगाकरक्रिया का निर्माण किया जाता है तब वह शब्द नामधातुक्रिया कहलाते हैं 

जैसे – टकराना ,शरमाना ,ललचना ,सठियाना ,गरमाना ,अपनाना ,दोहराना ,चिकनापन आदि

जैसे – नरेश ने सुरेश का कमरा हथिया लिया।

प्रेरणार्थकक्रिया – जब कर्ता स्वयं कार्य का संपादन ना कर किसी दूसरे को करने के लिए प्रेरित करें या करवाएं उसे प्रेरणार्थकक्रिया कहते हैं

 जैसे –सुनना, लिखना, पढ़ाना, कराना

  1. अध्यापक बच्चे से पाठ पढवाता है
  2. रमेश अपने बेटे से काम करवाता है
  3. सरपंच ने गांव में तालाब का निर्माण करवाया

  • पूर्णकालिकक्रिया – जब किसी वाक्य में दो क्रियाएं प्रयुक्त हुई हो तथा उनमें से एकक्रिया दूसरीक्रिया से पहले संपन्न हुई हो तो पहले संपन्न होने वाली क्रिया पूर्वकालिकक्रिया कहलाती है 
  • इन क्रियाओं पर लिंग ,वचन ,पुरुष, काल आदि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। 
  • ये अव्यय तथा क्रिया विशेषण के रूप में प्रयुक्त होती है । मूल धातु में ‘कर’ लगाने से सामान्यक्रिया को पूर्वकालिकक्रिया का रुप दिया जा सकता है,

जैसे –
1. ख़िलाड़ी क्रिकेट खेलकर बैठ गए
2. श्याम पढ़कर सो गया
3. अनुज खाना खाकर स्कूल गया
4. बच्चा दूध पीते ही सो गया।

तात्कालिकक्रिया – यह क्रिया भी मुख्यक्रिया से पहले समाप्त हो जाती है ,पर इसमें और मुख्य क्रय में समय का अंतर नहीं होता ,केवल क्रम का अंतर होता है

जैसे –
1. वह आते ही सो गया
2. शेर को देखते ही वह बेहोश हो गया

कृदंतक्रिया – क्रिया शब्दों में जुड़ने वाले प्रत्यय कृत प्रत्यय कहलाते हैं तथा प्रत्यय के योग से बने शब्द कृदंत कहलाते हैं

क्रिया शब्दों के अंत में प्रत्यय योग से बनी क्रिया कृदंतलक्रिया कहलाती है क्रिया चल, कृदंतक्रिया चलना ,चलता ,चल कर

यौगिकक्रिया – जिस वाक्य में दो क्रियाएँ एक साथ आती हो और दोनों मिलकर मुख्यक्रिया का काम करती हो ,उसे यौगिकक्रिया कहते है

इसमें पहलीक्रिया पूर्णकालिक होती है जैसे –
1. वह समान रख गया
2. परीक्षा सिर पर आ पहुँची है
3. मैंने पत्र लिख भेजा

द्विकर्मकक्रिया– जिस सकर्मकक्रिया का फल दो कर्मों पर पड़े , उसे द्विकर्मकक्रिया कहते है जैसे –
1. रमेश ने साँप को डंडा मारा
2. सोहन दूध पी रहा है

काल के आधार

जिस काल में कोईक्रिया होती हैं उस काल के नाम के आधार पर क्रिया का भी नाम रख देते हैं।अत : काल के अनुसार क्रिया तीन प्रकार की होती है

भूतकालिकक्रिया –  क्रिया का वह रूप जिसके द्वारा बीते समय में कार्य के संपन्न होने का बोध होता है भूतकालिकक्रिया कहलाती है

वर्तमान कालिकक्रिया –  क्रिया का वह रूप जिससे वर्तमान समय में कार्य के संपन्न होने का बोध होता है वर्तमान कालक्रिया कहलाती है

भविष्यत कालीक्रिया –  क्रिया का वह रूप जिसके द्वारा आने वाले समय में कार्य के संपन्न होने का बोध होता है भविष्य काली क्रिया कहते हैं

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August 14, 2020

हिंदी वर्णमाला के बारे में जाने Hindi alphabet???

हिंदी वर्णमाला

भाषा की वह छोटी से छोटी इकाई जिसके टुकड़े नहीं किए जा सकते हो वर्ण कहलाते हैं वर्णों के मेल से शब्द बनते हैं शब्दों के मेल से वाक्य तथा वाक्यों के मेल से भाषा बनती है अतः वर्ण ही भाषा का मूल आधार है

हिंदी में वर्णों की संख्या 44 है मुंह से उच्चरित होने वाली ध्वनियों और लिखे जाने वाले इन वर्णो को दो भागों में बांटा जाता है
१- स्वर
२- व्यंजन

स्वर- जो बिना किसी स्वर (वर्ण)की सहायता के बोले जा सकते हैं वह स्वर कहलाते हैं यह 11 है

व्यंजन- जो स्वरों की सहायता से बोले जाते हैं वह व्यंजन कहलाते हैं मूल रूप से व्यंजन स्वर रहित होते हैं

हिंदी वर्णमाला

वर्णो के उच्चारित स्थान

          वर्ण.          उच्चारण स्थान
क वर्ग अआ(ः) ह–कंठ
च वर्ग इ ई य श——तालु
ट वर्ग ष र ड़ ढ़——मूर्द्धा
त वर्ग ल स————-दाँत
प वर्ग उ ऊ ————ओष्ट
ए ऐ—————–कंठतालु
व-_————–दन्तोष्ट
ओ औ————-कंठोष्ट
नासिक्य-ड ण ञ न म
अन्तस्थ–य र ल व
ऊष्म— श ष स ह
संयुक्त— क्ष त्र ज्ञ श्र

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हिंदी वर्णमाला हिंदी वर्णमाला

August 14, 2020

कारक के बारे में जाने What is Karak???

कारक

संज्ञा या सर्वनाम के जिस रुप से वाक्य के अन्य शब्दों के साथ उनका (संज्ञा या सर्वनाम का) संबंध सूचित हो उसे (उस रूप) को कारक कहते हैं।

अथवा

संज्ञा या सर्वनाम के जिस रुप से उनका (संज्ञा या सर्वनाम का) क्रिया से संबंध सूचित हो उसे कारक कहते हैं।

कारक के भेद

हिंदी में कारक आठ है और कारकों के बोध के लिए संज्ञा या सर्वनाम के आगे जो प्रत्येक चिन्ह लगाए जाते हैं उन्हें व्याकरण में विभक्तियां कहते हैं कुछ लोग इन्हें परसर्ग भी कहते हैं। लेखक कैसे बने शब्द रूप को विभक्त्यन्त शब्द या पद कहते हैं

हिंदी कारकों की विभक्तियो के चिन्ह इस प्रकार हैं-

  • कर्ता              –  ने
  • कर्म               –  को
  • करण             –  से
  • संप्रदान          – को, के लिए
  • अपादान        –  से
  • संबंध             – का,की,के,रा री,रे
  • अधिकरण     – में,पर
  • सम्बोधन        – हे, अजी, अहो, अरे

1. कर्ता कारक – वाक्य में जो शब्द काम करने वाले के अर्थ में आता है उसे कर्ता कहते हैं।
उदाहरण :-  मोहन खाता है।
उपरोक्त वाक्य में खाने का काम मोहन करता है अतः कर्ता मोहन है।

कर्ता कारक का प्रयोग :-
1. परसर्ग सहित
2. परसर्ग रहित

1. परसर्ग सहित :-

  • भूतकाल की सकर्मक क्रिया में कर्ता के साथ ने परसर्ग लगाया जाता है। जैसे :- राम ने पुस्तक पढ़ी।
  • प्रेरणार्थक क्रियाओं के साथ ने का प्रयोग किया जाता हैं। जैसे :- मैंने उसे पढ़ाया।
  • जब संयुक्त क्रिया के दोनों खण्ड सकर्मक होते हैं तो कर्ता के आगे ने का प्रयोग किया जाता है। जैसे :- श्याम ने उत्तर कह दिया।

2. परसर्ग रहित :-

  • भूतकाल की अकर्मक क्रिया में परसर्ग का प्रयोग नहीं किया जाता है। जैसे :- राम गिरा।
  • वर्तमान और भविष्यकाल में परसर्ग नहीं लगता। जैसे :- बालक लिखता है।
  • जिन वाक्यों में लगना , जाना , सकना , चूकना आदि आते हैं वहाँ पर ने का प्रयोग नहीं किया जाता हैं। जैसे :- उसे पटना जाना है।

कर्ता कारक में को का प्रयोग :- विधि क्रिया और संभाव्य बहुत में कर्ता प्राय: को के साथ आता है। जैसे:- राम को जाना चाहिए।

2. कर्मकारक – वाक्य में क्रिया का फल जिस शब्द पर पड़ता है उसे कर्म कहते हैं इसकी विभक्ति ‘को’है। कर्म कारक का प्रत्यय चिन्ह को है बिना प्रत्यय के या अप्रत्यय कर्म के कारक का भी प्रयोग होता है।

3. करण कारक – वाक्य में जिस शब्द से क्रिया के संबंध का बोध हो उसे करणकारक कहते हैं।

4. संप्रदान कारक  – जिसके लिए कुछ किया जाए या जिसको कुछ दिया जाए इस का बोध कराने वाले शब्द के रूप को संप्रदानकारक कहते हैं।

5. अपादानकारक – संज्ञा के जिस रुप से किसी वस्तु के अलग होने का भाव प्रकट होता है उसे अपादानकारक कहते हैं।

6. संबंध कारक – संज्ञा या सर्वनाम के जिस रुप से किसी अन्य शब्द के साथ संबंध या लगाव प्रतीत हो उसे संबंधकारक कहते हैं।

7. अधिकरण कारक – क्रिया या आधार को सूचित करने वाली संज्ञा या सर्वनाम के स्वरूप को अधिकरणकारक कहते हैं।

8. संबोधन कारक-  संज्ञा के जिस रुप से किसी के पुकारने यह संकेत करने का भाव पाया जाता है उसे संबोधनकारक कहते हैं। जैसे हे भगवान!

Example –

मैं कलम से लिखता हूं –           करणकारक
जेब से सिक्का गिरा –              अपादान
बालक गेंद से खेल रहे हैं –       करण
सुनिता घोडे़ से गिर पडी़ –       अपादान
गंगा हिमालय से निकलती है-  अपादान

करण और अपादानकारक में अंतर :-

करण और अपादान दोनों ही कारकों में से चिन्ह का प्रयोग होता है। परन्तु अर्थ के आधार पर दोनों में अंतर होता है।

करणकारक में जहाँ पर से का प्रयोग साधन के लिए होता है वहीं पर अपादानकारक में अलग होने के लिए किया जाता है।

कर्ता कार्य करने के लिए जिस साधन का प्रयोग करता है उसे करण कारक कहते हैं।

लेकिन अपादान में अलगाव या दूर जाने का भाव निहित होता है। जैसे :-

  1. मैं कलम से लिखता हूँ।
  2. जेब से सिक्का गिरा।
  3. बालक गेंद से खेल रहे हैं।
  4. सुनीता घोड़े से गिर पड़ी।
  5. गंगा हिमालय से निकलती है।

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August 8, 2020

Krishna Janmashtami 2020: History

Janmashtami 2020

Lord Krishna was born at midnight, hence devotees observe a fast and sing devotional songs for him as the clock strikes twelve.

As a part of the ritual, statues of baby Krishna are washed and placed for worship.

Devotees then break their fast and share food and sweets.

The birth of Lord Krishna, Janmashtami, is celebrated with pomp and fervour throughout India.

Devotees usually observe fasts, sing devotional songs in praise of the lord, participate in Dahi Handi celebrations,

hold ceremonies in temples where Lord Krishna is welcomed each year and more.

The largest celebration of this

Hindu festival takes place in Mathura and Vrindavan respectively, where Lord Krishna is believed to have been born.

Since He was born at midnight, devotees observe a fast and sing devotional songs for him as the clock strikes twelve.

As a part of the ritual, statues of baby Krishna are washed and placed for worship.

Devotees then break their fast and share food and sweets.

Janmashtami

This year Janmashtami is on August 11, and the auspicious timings for prayers begin at 12.21 AM until 01.06 AM (on August 12). Dahi Handi celebrations (usually in the last afternoon or early evening hours) shall take place on August 12.

History of Janmashtami

Lord Krishna was born on the eighth (ashtami) day of the dark fortnight in the Bhadrapada month (August–September) in Mathura, ruled by the evil King Kansa, whose sister, Princess Devaki was Krishna’s birth mother.

Devaki and Vasudeva were married with a lot of fanfare, however, a prophecy said that the couple’s eighth son would cause Kansa’s downfall.

As expected, all hell broke loose when Kansa heard of this and imprisoned Devaki and Vasudeva instantly.

The evil king got their first six children killed, but at the time of the birth of the seventh child, Balram, the foetus is said to have been mystically transferred from Devaki’s womb to Princess Rohini’s.

When the couple’s eighth child, baby Krishna, was born, Vasudeva managed to rescue the baby and gave him to Nand Baba and Yashodha in Vrindavan.

Vasudeva returned to Mathura with a baby girl and handed her over to Kansa, however, when the king attempted to kill this baby too, she transformed into Goddess Durga, warning him about the impending doom that he was fated for.

History of Dahi Handi

Lord Krishna grew up in Vrindavan in the foster care of Nand and Yashodha and was a naughty child. Baby Krishna loved makkhan (white butter), curd and milk.

He, along with his friends, would often steal butter from their neighbour’s homes.

His mother Yashodha would often have to tie him up to stop his adorable antics.

Lord Krishna is also referred to as Maakhan Chor or Navneet Chor due to these events.

The women residing in Vrindavan had also begun storing freshly-churned butter at a height to prevent a young Krishna from reaching the pot of the delicious treat.

The young Lord had his ways though. His friends and he would form human pyramids to extract the butter from the pot hung at an elevation.

The Dahi Handi rituals every year on Janmashtami are thus an imitation of Lord Krishna’s efforts.

The human pyramid is usually made of 9-tiers by participants called Govinda and comprises a young boy who is the last one to climb atop this pyramid and break the earthen clay pot suspended at a height of over 20 feet.

Celebrations take place on a large scale in prominent locations, while there are small-scale ones too that take place in localities.

August 8, 2020

Know about the history of Kedarnath ??

Giriraj is situated on the top of the Himalayas called Kedar, the highest Kedareswara Jyotirlinga among the twelve Jyotirlingas of the country. Kedarnath Dham and temple are surrounded by mountains on three sides. On one side there is about 22 thousand feet high Kedarnath, on the other side there is 21 thousand 600 feet high Khetkund and on the third side is 22 thousand 700 feet high Bharatkund.

Not only three mountains but also a confluence of five rivers is here – Mandakini, Madhuganga, Kshirganga, Saraswati and Swarnagouri. Some of these rivers no longer exist, but Mandakini, a tributary of Alaknanda, is still present today. Kedareshwar Dham is on its banks. There is heavy snow in winter and tremendous water in rain.

It is the largest Shiva temple in Uttarakhand, built by connecting huge rock cut stones. These rocks are brown in color. The temple is built on a platform about 6 feet high. Its sanctum sanctorum is relatively ancient, believed to be around the 80th century.

In the sanctum sanctorum of the temple, Ardha has four strong stone pillars at the four corners, through which the pradakshina passes through. Ardha, which is square, is polished from the inside and is relatively new. The sabhamandapa is huge and magnificent. Its roof rests on four huge stone pillars. The huge roof is made of a single stone. There are eight male proof sculptures in the obsolescence, which are extremely artistic.

Kedarnath

Kedarnath Temple is 85 feet high, 187 feet long and 80 feet wide. Its walls are 12 feet thick and made of extremely strong stones. The temple stands on a 6-foot-high platform. It is a wonder how the temple would have been carved by bringing such heavy stones at such a height. Especially how this giant roof was placed on the pillars. Interlocking techniques have been used to connect stones to each other. It is this strength and technology that has managed to keep the temple standing in the middle of the river.

Construction history of the temple

: According to the Puranic story, on the Kedar Shringa of the Himalayas, the great sage Mahatapasvi Nara and Narayana Rishi used to do penance. Pleased with his worship, Lord Shankar appeared and according to his request provided the bride to live forever as a Jyotirlinga. This place is located on the Kedarnath mountain Raja called Kedar in the Himalayas.

This temple was first built by the Pandavas behind the existing temple, but due to the beating of time, this temple disappeared. Later in the 8th century, Adishankaracharya built a new temple, which was buried in snow for 400 years.

According to Rahul Sankrityayan, this temple dates back to 12-13th century. Historian Dr. Shiva Prasad Dabral believes that Shaivites have been visiting Kedarnath before Adi Shankaracharya, even then this temple was present. It is believed that pilgrimage to Kedarnath has been going on for a thousand years. It is said that the ancient temple of Kedareshwar Jyotirlinga was built by the Pandavas. Later, it was renovated by Janmejaya, grandson of Abhimanyu.

Time to open the doors of the temple

: The temple gates are closed during the winter season on the second day (Padwa) of Deepavali Mahaparva. The lamp keeps on burning for 6 months. The priests close the honors boards and take the Deity of God and the punishment to Ukhimath under the mountain for 6 months. After 6 months, the doors of Kedarnath open in May, then the journey to http://Uttarakhand begins.

No one stays in and around the temple for 6 months, but for the 6 months of wonder, the lamp also keeps on burning and there is constant worship. After the opening of the valve, it is also a matter of surprise that the same cleanliness is found as they left.

August 8, 2020

जानिए केदारनाथ के इतिहास के बारे में ??

गिरिराज हिमालय की केदार नामक चोटी पर स्थित है देश के बारह ज्योतिर्लिंगों में सर्वोच्च केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग। केदारनाथ धाम और मंदिर तीन तरफ पहाड़ों से घिरा है। एक तरफ है

करीब 22 हजार फुट ऊंचा केदारनाथ, दूसरी तरफ है 21 हजार 600 फुट ऊंचा खर्चकुंड और तीसरी तरफ है 22 हजार 700 फुट ऊंचा भरतकुंड।

न सिर्फ तीन पहाड़ बल्कि पांच ‍नदियों का संगम भी है यहां- मं‍दाकिनी, मधुगंगा, क्षीरगंगा, सरस्वती और स्वर्णगौरी।

इन नदियों में से कुछ का अब अस्तित्व नहीं रहा लेकिन अलकनंदा की सहायक मंदाकिनी आज भी मौजूद है। इसी के किनारे है केदारेश्वर धाम।

यहां सर्दियों में भारी बर्फ और बारिश में जबरदस्त पानी रहता है।
यह उत्तराखंड का सबसे विशाल शिव मंदिर है, जो कटवां पत्थरों के विशाल शिलाखंडों को जोड़कर बनाया गया है। ये शिलाखंड भूरे रंग के हैं।

मंदिर लगभग 6 फुट ऊंचे चबूतरे पर बना है। इसका गर्भगृह अपेक्षाकृत प्राचीन है जिसे 80वीं शताब्दी के लगभग का माना जाता है।

मंदिर के गर्भगृह में अर्धा के पास चारों कोनों पर चार सुदृढ़ पाषाण स्तंभ हैं, जहां से होकर प्रदक्षिणा होती है। अर्धा, जो चौकोर है, अंदर से पोली है और अपेक्षाकृत नवीन बनी है। सभामंडप विशाल एवं भव्य है।

उसकी छत चार विशाल पाषाण स्तंभों पर टिकी है। विशालकाय छत एक ही पत्थर की बनी है। गवाक्षों में आठ पुरुष प्रमाण मूर्तियां हैं, जो अत्यंत कलात्मक हैं।

केदारनाथ

85 फुट ऊंचा, 187 फुट लंबा और 80 फुट चौड़ा है केदारनाथ मंदिर। इसकी दीवारें 12 फुट मोटी हैं और बेहद मजबूत पत्थरों से बनाई गई है। मंदिर को 6 फुट ऊंचे चबूतरे पर खड़ा किया गया है। यह आश्चर्य ही है कि इतने भारी पत्थरों को इतनी ऊंचाई पर लाकर तराशकर कैसे मंदिर की शक्ल ‍दी गई होगी। खासकर यह विशालकाय छत कैसे खंभों पर रखी गई। पत्थरों को एक-दूसरे में जोड़ने के लिए इंटरलॉकिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। यह मजबूती और तकनीक ही मंदिर को नदी के बीचोबीच खड़े रखने में कामयाब हुई है।

मंदिर का निर्माण इतिहास

पुराण कथा अनुसार हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे।

उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया।

यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित है।

यह मंदिर मौजूदा मंदिर के पीछे सर्वप्रथम पांडवों ने बनवाया था, लेकिन वक्त के थपेड़ों की मार के चलते यह मंदिर लुप्त हो गया।

बाद में 8वीं शताब्दी में आदिशंकराचार्य ने एक नए मंदिर का निर्माण कराया, जो 400 वर्ष तक बर्फ में दबा रहा।

राहुल सांकृत्यायन के अनुसार ये मंदिर 12-13वीं शताब्दी का है। इतिहासकार डॉ. शिव प्रसाद डबराल मानते हैं कि शैव लोग आदि शंकराचार्य से पहले से ही केदारनाथ जाते रहे हैं, तब भी यह मंदिर मौजूद था।

माना जाता है कि एक हजार वर्षों से केदारनाथ पर तीर्थयात्रा जारी है। कहते हैं कि केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग के प्राचीन मंदिर का निर्माण पांडवों ने कराया था। बाद में अभिमन्यु के पौत्र जनमेजय ने इसका जीर्णोद्धार किया था।

मंदिर के कपाट खुलने का समय

दीपावली महापर्व के दूसरे दिन (पड़वा) के दिन शीत ऋतु में मंदिर के द्वार बंद कर दिए जाते हैं।

6 माह तक दीपक जलता रहता है।

पुरोहित ससम्मान पट बंद कर भगवान के विग्रह एवं दंडी को 6 माह तक पहाड़ के नीचे ऊखीमठ में ले जाते हैं।

6 माह बाद मई माह में http://केदारनाथ के कपाट खुलते हैं तब उत्तराखंड की यात्रा आरंभ होती है।

6 माह मंदिर और उसके आसपास कोई नहीं रहता है,

लेकिन आश्चर्य की 6 माह तक दीपक भी जलता रहता और निरंतर पूजा भी होती रहती है।

कपाट खुलने के बाद यह भी आश्चर्य का विषय है कि वैसी ही साफ-सफाई मिलती है जैसे छोड़कर गए थे।

केदारनाथ केदारनाथ

August 8, 2020

The philosophy of Mahakaleshwar mahakal Jyotirlinga?

If you are going to visit Baba Mahakaleshwar, one of the 12 Jyotirlingas built in the 6th century BCE, located near the holy Salila Shipra beach in Ujjain, the pilgrimage of Madhya Pradesh, then know something important.

* Kaal has two meanings – time and death. Mahakal is called ‘Mahakal’ because in ancient times, the standard time of the entire world was determined from here.

That is why this Jyotirlinga is named ‘Mahakaleshwar’. According to the legend, the establishment of this Shivling is associated with the legend of King Chandrasen and Gop-Balak.

Alusubah Bhasma Aarti is performed daily during the Mahakal period of Kaalas. The specialty of this aarti is that it is made up of Lord Mahakal with the help of fresh dead. Booking is done in advance to attend this Aarti.

After seeing Mahakal, Juna must definitely visit Mahakal. According to some people, when there was a possibility of ruining this Shivling during the Mughal period, the priests had hidden it and replaced it with another Shivling and started worshiping it.

Later, he installed that Shivling in the same place as , which is today called ‘Juna Mahakal’. However, according to some, this was done to protect the original Shivling from erosion.

Of the 12 Jyotirlingas, Mahakal is the only best Shivalinga. It is said that ‘Akash Tarakan Lingam Pataale Hatkeswaram’. Bhlokke ma mahakalo lindgatraya namostu te. ”That is, Taraka Shivling in the sky, Hatkeshwar Shivling in Patal and Mahakaleshwar on earth is the only accepted Shivling. The Mahakaleshwar Jyotirlinga presently is divided into 3 sections.

There is Mahakaleshwar in the lower section, Omkareshwar in the middle section and Sri Nagachandreshwar Temple in the upper section. Visions of Nagachandreshwar Shivling are allowed once a year on the day of Nagpanchami.

Mahakal

There is an ancient pool in the temple complex. In the sanctum sanctorum there is a huge Dakshinamukhi Shivling of Lord Mahakaleshwar.

Along with this, the sanctum sanctorum has enticing idols of Goddess Parvati, Lord Ganesha and Karthikeya.

The Nandi lamp is installed in the sanctum sanctorum, which is always burning. In the huge room in front of the sanctum sanctorum, Nandi’s statue stands.

There is only one king of Ujjain and that is Mahakal Baba. Since Vikramaditya’s rule, no king can stay here at night. Whoever has this audacity,

He was surrounded by crises and killed. According to the legend and legend of throne Battisi, no king stops here since the time of King Bhoja.

Even today, no king, chief minister and prime minister etc. can stay here at night. Raja http://Mahakal visits the city every Monday in the month of Shravan.

#Mahakaleshwar #Mahakaleshwar #Mahakaleshwar #Mahakaleshwar

August 8, 2020

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के महत्व क्या क्या है जाने ?

यदि आप मध्यप्रदेश की तीर्थनगरी उज्जैन में पुण्य सलिला शिप्रा तट के निकट स्थित 6ठी शताब्दी ईसा पूर्व में निर्मित 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक बाबा महाकालेश्वर के दर्शन करने जा रहे हैं तो कुछ जरूरी बात अवश्य जान लें।  

*काल के दो अर्थ होते हैं- एक समय और दूसरा मृत्यु। महाकाल को ‘महाकाल’ इसलिए कहा जाता है कि प्राचीन समय में यहीं से संपूर्ण विश्व का मानक समय निर्धारित होता था

इसीलिए इस ज्योतिर्लिंग का नाम ‘महाकालेश्वर’ रखा गया है। पौराणिक कथा के अनुसार इस शिवलिंग की स्थापना राजा चन्द्रसेन और गोप-बालक की कथा से जुड़ी है।

कालों के काल महाकाल के यहां प्रतिदिन अलसुबह भस्म आरती होती है। इस आरती की खासियत यह है कि इसमें ताजा मुर्दे की भस्म से भगवान महाकाल का श्रृंगार किया जाता है। इस आरती में शामिल होने के लिए पहले से बुकिंग की जाती है।

महाकाल के दर्शन करने के बाद जूना महाकाल के दर्शन जरूर करना चाहिए। कुछ लोगों के अनुसार जब मुगलकाल में इस शिवलिंग को खंडित करने की आशंका बढ़ी तो पुजारियों ने इसे छुपा दिया था और इसकी जगह दूसरा शिवलिंग रखकर उसकी पूजा करने लगे थे।

बाद में उन्होंने उस शिवलिंग को वहीं महाकाल के प्रांगण में अन्य जगह स्थापित कर दिया जिसे आज ‘जूना महाकाल’ कहा जाता है। हालांकि कुछ लोगों के अनुसार असली शिवलिंग को क्षरण से बचाने के लिए ऐसा किया गया।  

12 ज्योतिर्लिंगों में से महाकाल ही एकमात्र सर्वोत्तम शिवलिंग है। कहते हैं कि ‘आकाशे तारकं लिंगं पाताले हाटकेश्वरम्। भूलोके च महाकालो लिंड्गत्रय नमोस्तु ते।।’ अर्थात आकाश में तारक शिवलिंग, पाताल में हाटकेश्वर शिवलिंग तथा पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग है। 
 वर्तमान में जो महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग है, वह 3 खंडों में विभाजित है।

निचले खंड में महाकालेश्वर, मध्य खंड में ओंकारेश्वर तथा ऊपरी खंड में श्री नागचन्द्रेश्वर मंदिर स्थित है। नागचन्द्रेश्वर शिवलिंग के दर्शन वर्ष में एक बार नागपंचमी के दिन ही करने दिए जाते हैं।

महाकाल

मंदिर परिसर में एक प्राचीन कुंड है।   *गर्भगृह में विराजित भगवान महाकालेश्वर का विशाल दक्षिणमुखी शिवलिंग है।

इसी के साथ ही गर्भगृह में माता पार्वती, भगवान गणेश व कार्तिकेय की मोहक प्रतिमाएं हैं।

गर्भगृह में नंदी दीप स्थापित है, जो सदैव प्रज्वलित होता रहता है। गर्भगृह के सामने विशाल कक्ष में नंदी की प्रतिमा विराजित है।
 उज्जैन का एक ही राजा है और वह है महाकाल बाबा। विक्रमादित्य के शासन के बाद से यहां कोई भी राजा रात में नहीं रुक सकता। जिसने भी यह दुस्साहस किया है,

वह संकटों से घिरकर मारा गया। पौराणिक तथा और सिंहासन बत्तीसी की कथा के अनुसार राजा भोज के काल से ही यहां कोई राजा नहीं रुकता है।

वर्तमान में भी कोई भी राजा, मुख्‍यमंत्री और प्रधानमंत्री आदि यहां रात नहीं रुक सकता। राजा http://महाकाल श्रावण मास में प्रति सोमवार नगर भ्रमण करते हैं।

July 26, 2020

Where is the world’s largest temple located?

World’s largest Hindu temple

The world’s largest Hindu temple complex and the world’s largest religious monument are located in Cambodia.

It is in Ankor, Cambodia, whose old name was ”Yashodharpur”.

##It was built during the reign of Emperor Suryavarman II (1112–53 CE).

http://Cambodia has a large number of Hindu and Buddhist temples, which testify that Hinduism was at its peak here at some point. Mythological period Cambodia yesterday’s Kampuchea and today’s http://Cambodia.

First he was a Hindu and then a Buddhist 27 kings ruled over centuries.

Some stayed Hindu, some Buddhists.

This is the reason why idols of deities of both ##religions are scattered all over the country.


Lord Buddha is everywhere, but there is hardly any special place where Brahma, Vishnu and Mahesh are not there and then Angkor Wat is unique.

It is the largest Vishnu temple in the world.

The Angkor Wat temple complex included in the World Heritage was built by King Suryavarman II of Angkor in the twelfth century.

When the influence of Buddhism increased in the fourteenth century, the rulers gave it a Buddhist form.

A French archaeologist discovered it. The Archaeological Survey of India has contributed a lot in the form that this temple is today.

From 1986 to 93, ASI did conservation work here. The walls of Angkor Wat tell the stories of Ramayana and Mahabharata.

How many square miles spread in area

This temple is spread over an area of ​​about 1 square mile.

The paintings and sculptures on the walls here tell the story of the glorious history of Hinduism. Many scenes like Sitaharan, Hanuman’s entry into the Ashoka Vatika, Angad episode, Ram-Ravana war, Mahabharata have been engraved very closely.

Temple


Temple Many ancient temples and their ruins are present around Angkor Wat.

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July 26, 2020

विश्व का सबसे बड़ा मंदिर कहां स्थित है???

विश्व का सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर

विश्व का सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर परिसर तथा विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक स्मारक कंबोडिया में स्थित है। यह कंबोडिया के अंकोर में है जिसका पुराना नाम ‘यशोधरपुर’ था।

इसका निर्माण सम्राट सूर्यवर्मन द्वितीय (1112-53ई.) के शासनकाल में हुआ था। यह विष्णु मन्दिर है जबकि इसके पूर्ववर्ती शासकों ने प्रायः शिवमंदिरों का निर्माण किया था।

http://कंबोडिया में बड़ी संख्या में हिन्दू और बौद्ध मंदिर हैं, जो इस बात की गवाही देते हैं कि कभी यहां भी हिन्दू धर्म अपने चरम पर था। पौराणिक काल का कंबोजदेश कल का कंपूचिया और आज का http://कंबोडिया

पहले हिंदू रहा और फिर बौद्ध हो गया। सदियों के काल खंड में 27 राजाओं ने राज किया। कोई हिंदू रहा, कोई बौद्ध। यही वजह है कि पूरे देश में दोनों धर्मों के देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बिखरी पड़ी हैं।

भगवान बुद्ध तो हर जगह हैं ही, लेकिन शायद ही कोई ऐसी खास जगह हो, जहाँ ब्रह्मा, विष्णु, महेश में से कोई न हो और फिर अंगकोर वाट की बात ही निराली है। ये दुनिया का सबसे बड़ा विष्णु मंदिर है।

विश्व विरासत में शामिल अंगकोर वाट मंदिर-समूह को अंगकोर के राजा सूर्यवर्मन द्वितीय ने बारहवीं सदी में बनवाया था।

चौदहवीं सदी में बौद्ध धर्म का प्रभाव बढ़ने पर शासकों ने इसे बौद्ध स्वरूप दे दिया।

बाद की सदियों में यह गुमनामी के अंधेरे में खो गया। एक फ्रांसिसी पुरातत्वविद ने इसे खोज निकाला। आज यह मंदिर जिस रूप में है, उसमें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का बहुत योगदान है।

सन् 1986 से 93 तक एएसआई ने यहाँ संरक्षण का काम किया था। अंगकोर वाट की दीवारें रामायण और महाभारत की कहानियाँ कहती हैं। 

कितने स्क्वेयर मील क्षेत्रफल में फैला

यह मंदिर लगभग 1 स्क्वेयर मील क्षेत्रफल में फैला हुआ है। यहां की दीवारों पर पर छपे चित्र और उकेरी गई मूर्तियां हिन्दू धर्म के गौरवशाली इतिहास की कहानी को बयां करती हैं।

सीताहरण, हनुमान का अशोक वाटिका में प्रवेश, अंगद प्रसंग, राम-रावण युद्ध, महाभारत जैसे अनेक दृश्य बेहद बारीकी से उकेरे गए हैं।

मंदिर

अंगकोर वाट के आसपास कई प्राचीन मंदिर और उनके भग्नावशेष मौजूद हैं।

इस क्षेत्र को अंगकोर पार्क कहा जाता है। सियाम रीप क्षेत्र अपने आगोश में सवा तीन सौ से ज्यादा मंदिर समेटे हुए है।