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September 2020

September 30, 2020

Currency मुद्रा की परिभाषा एवं कार्य क्या क्या है???

उपयोगिता उपभोक्ता का व्यवहार 

अर्थशास्त्र सामाजिक विज्ञान की वह शाखा है, जिसमे उपयोगिता ,उपभोग, उपभोक्ता का कार्यान्वयन होता हैं जिसके अन्तर्गत वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन, वितरण, विनिमय और उपभोग का अध्ययन किया जाता है।

‘अर्थशास्त्र’ शब्द संस्कृत शब्दों अर्थ (धन) और शास्त्र की संधि से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ है – ‘धन का अध्ययन’।

किसी विषय के संबंध में मनुष्यों के कार्यो के क्रमबद्ध ज्ञान को उस विषय का शास्त्र कहते हैं,  इसलिए अर्थशास्त्र में मनुष्यों के अर्थसंबंधी कायों का क्रमबद्ध ज्ञान होना आवश्यक है।

अर्थशास्त्र का प्रयोग यह समझने के लिये भी किया जाता है कि अर्थव्यवस्था किस तरह से कार्य करती है वह समाज में विभिन्न वर्गों का आर्थिक सम्बन्ध कैसा होता है

अर्थशास्त्रीय विवेचना का प्रयोग समाज से सम्बन्धित विभिन्न क्षेत्रों में किया जाता है, जैसे:- अपराध, शिक्षा, परिवार, स्वास्थ्य, कानून, राजनीति, धर्म, सामाजिक संस्थान और युद्ध व उपभोक्ता ओर समाज इत्यदि।

कुल उपयोगिता और सीमांत उपयोगिता में संबंध ( Relation in total utility and marginal utility )

  1. जब_कुल उपयोगिता बढ़ती है तब सीमांत उपयोगिता धनात्मक होती है
  2. जब_कुल उपयोगिता अधिकतम होती है तब सीमांत उपयोगिता शुन्य होती है
  3. जब कुल उपयोगिता घटती है तब सीमांत उपयोगिता ऋणात्मक होती है
  4. कुल उपयोगिता सीमांत उपयोगिता का + होती है।
  5. सीमांत उपयोगिता कुल उपयोगिता वक्र के डाल को मापती है।

कुल उपयोगिता और सीमांत उपयोगिता में संबंध की व्याख्या सर्वप्रथम जेवेन्स ने की.।

मुद्रा_की परिभाषा एवं कार्य 

मुद्रा_की परिभाषा Currency Definition

मुद्रा

मुद्रा_एक ऐसा मूल्यवान रिकॉर्ड है या आमतौर पर वस्तुओं और सेवाओं के लिए भुगतान के रूप में स्वीकार किया जाने वाला तथ्य है मुद्रा यह एक सामाजिक-आर्थिक संदर्भ के अनुसार ऋण के पुनर्भुगतान के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता हैं।

अंग्रेजी भाषा में मुद्रा को Money कहा जाता है अंग्रेजी भाषा के शब्द Money की उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द Moneta से हुई है रोम में पहली टकसाल देवी मोनेटा के मंदिर में स्थापित की गई थी

इस टकसाल से उत्पादित सिक्को का नाम देवी मोनेटा के नाम पर मनी पड़ गया था और धीरे-धीरे मुद्रा के लिए सामने रूप से मनी शब्द का उपयोग किया जाने लगा ऐसा माना जाता है कि सीन के साथ-साथ भारत में भी विश्व के प्रथम सिक्के जारी करने वाले देशों में से एक हैं भारतीय सिक्कों का इतिहास ईसा पूर्व से प्रारंभ हो जाता है

उत्खनन में मिले मौर्य काल के चांदी के सिक्के इस बात को सूचित करते हैं कि भारत में इससे पूर्व भी सिक्को का प्रयोग आरंभ हो गया था भारत में पहला रुपया शेरशाह सूरी द्वारा 1540-45 ईसवी में जारी किया गया था वर्तमान में भारत में 50 पैसे ₹1 ₹2 ₹5 ₹10 के मूल्य वर्गों के सिक्के जारी किए जा रहे हैं साथ ही भारत के केंद्रीय बैंक भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ₹10 ₹20 ₹50 500 रु तथा ₹2000 मूल्य वर्ग के बैंक नोट जारी किए जा रहे हैं

रुपए ₹1रू 5 के बैंक नोटों का उत्पादन वर्तमान में बंद कर दिया गया है लेकिन यह चलन में बने हुए हैं 8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेंद्र मोदी ने प्रचलित ₹500 तथा ₹1000के नोटों का विमुद्रीकरण की घोषणा कर दी

विमुद्रीकरण ( Demonetization )– प्रचलित मुद्रा की कानूनी वैधता समाप्त करके उसे प्रचलन से हटाना ही विमुद्रीकरण कहलाता है

मुद्रा की भूमिका-

विनिमय का माध्यम ( Medium of exchange )

  1. खाते की काया मूल्य का मापक
  2. विलंबित भुगतान की मानक
  3. मूल्य का भंडार

September 29, 2020

Wisdom शिक्षा मनोविज्ञान- बुद्धि और अधिगम पठार

Wisdom शिक्षा मनोविज्ञान- बुद्धि

बुद्धि की परिभाषा ( Definition of intelligence )

थार्नडाइक के अनुसार “उत्तम क्रिया करने तथा नई परिस्थितियों के साथ समायोजन करने की योग्यता को बुद्धि कहते हैं।”

थॉमसन के अनुसार- “बुद्धि वंशपरम्परागत प्राप्त विभिन्न गुणों का योग है।”

वेस्लर के मत में – “बुद्धि व्यक्ति की क्षमताओं का वह समुच्चय है जो उसकी ध्येयात्मक क्रिया, विवेकशील चिंतन तथा पर्यावरण के प्रभाव से समायोजन कराने में सहायक होती है।”

स्टोडार्ड के मतानुसार “बुद्धि (क) कठिनता (ख) जटिलता (ग) अमूर्तता (ड.) आर्थिकता (च) उद्देश्य प्राप्यता (छ) सामाजिक मूल्य तथा (ज) मौलिकता से सम्बंधित समस्याओं को समझने की योग्यता है।”

बुद्धि लब्धि का मान एवं अर्थ ( Meaning of wisdom )

  • 140 या उससे उपर प्रतिभाशाली
  • 120 से 139 अतिश्रेष्ठ
  • 110 से 119 श्रेष्ठ
  • 90 से 109  सामान्य
  • 80 से 89 मन्द
  • 70 से 79 सीमान्त मंदबुद्धि
  • 60 से 69 मंदबुद्धि
  • 20 से 59 हीनबुद्धि
  • 20 से कम जड़बुद्धि

बुद्धि_का मापन ( Measurement of intelligence )

बुद्धि परिक्षण के निर्माण का पहला प्रयास फ्रांसीसी मनोवैज्ञानिक अल्फ्रेड बिने ने 1905 में किया बिने को_बुद्धि लब्धि के विचार का जनक माना जाता है

1908 में बिने ने साइमन के सहयोग से बिने साइमन परीक्षण का विकास किया  स्टर्न ने 1912 में मानसिक लब्धि की बात कहीं,  

टरमन के अनुसार एक व्यक्ति गसी अनुपात में बुद्धिमान है जिस अनुपात में वह अमूर्त चिंतन करने योग्य है  टरमन ने बुद्धि लब्धि का ज्ञात करने के लिए सूत्र में 100 का गुणा कर दिया

बुद्धि_लब्धि =  ( मानसिक आयु / वास्तविक आयु ) X 100 

बुद्धि_के प्रकार ( Types of intelligence )

ई. एल. थार्नडाइक ने_बुद्धि के तीन प्रकार बतलाये है।

  1. सामाजिक_बुद्धि ( Social intelligence  )
  2. अमूर्त_बुद्धि ( Intangible intelligence )
  3. मूर्त_बुद्धि ( Tangible intelligence )

बुद्धि

अधिगम पठार

सीखते समय या अधिगम करते समय जब हमारी सीखने की गति अचानक रुक जाती है तो इसे अधिगम का पठार कहते है

जब अधिगम की दर में लंबे समय तक स्थिरता की स्थिति हो अर्थात ना तो अधिगम वक्र में चढ़ाव आ रहा है और ना अधिगम वक्र में उतारा रहा है इस स्थिरता को अधिगम पठार कहते हैं

यह अधिगम का पठार नई चीजों को सीखने में ; एक अवस्था से दूसरी अवस्था में सीखने पर ; काम की जटिलता होने पर ; रुचि का अभाव थकान कार्य की उदासीनता ; गलत आदतों से सीखने पर आदि कारणों से होता है

September 29, 2020

Psychology Introduction मनोविज्ञान का परिचय

मनोविज्ञान का परिचय

मनोविज्ञान का_परिचय

मनोविज्ञान_को शताब्दियों पूर्व ” दर्शन शास्त्र ” कि एक शाखा केरूप मे माना जाता था । मनोविज्ञान को स्वतंत्र विषय बनाने के लिए इसे परिभाषित करना शुरू किया ।

PSYCHOLOGY शब्द कि उत्पत्ति लैटिन भाषा के दो शब्दो PSYCHE+LOGOS से मिलकर हुई हैं, PSYCHE का अर्थ होता है ” आत्मा का” तथा LOGOS का अर्थ होता हैं “अध्ययन करना ” 

इस शाब्दिक अर्थ के आधार पर सर्वप्रथम प्लेटो, अरस्तु और डेकार्ट के द्वारा मनोविज्ञान को ” आत्मा का विज्ञान ” माना गया ।

आत्मा शब्द की स्पष्ट व्याख्या नहीं होने के कारण 16वीं शताब्दी के अंत मे यह परिभाषा अमान्य हो गई । 17वीं शताब्दी मे इटली के मनोवैज्ञानिक पॉम्पोनोजी ने मनोविज्ञान को ” मन या मस्तिष्क का विज्ञान ” माना । बाद मे यह परिभाषा भी अमान्य हो गई ।

19वीं शताब्दी में विलियम वुन्ट, विलियम जेम्स, वाइव्स और जेम्स सली आदि के द्वारा मनोविज्ञान को ” चेतना का विज्ञान ” माना गया था, अपूर्ण अर्थ होने के कारण यह परिभाषा भी अमान्य हो गई ।

20वीं शताब्दी में मनोविज्ञान को ” व्यवहार का विज्ञान ” माना हैं और आज तक यह परिभाषा प्रचलित हैं । 

व्यवहार का विज्ञान मानने वाले प्रमुख मनोवैज्ञानिक हैं – वाटसन, इसके अलावा वुडवर्थ , स्किनर , थॉर्नडॉइक और मैक्डुगल आदि मनोवैज्ञानिकों ने भी मनोविज्ञान को ” व्यवहार का विज्ञान ” माना है

विलियम वुन्ट ने जर्मनी के ” लिपजिग ” स्थान पर 1879 ई. में प्रथम ” मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला ” स्थापित की, इसलिए विलियम वुन्ट को ” प्रयोगात्मक मनोविज्ञान का जनक ” माना जाता हैं

विलियम मैक्डुगल ने अपनी पुस्तक ” आउट लाइन साइकोलॉजी ” के पृष्ट संख्या 16 पर ” चेतना शब्द ” की भरसक निन्दा की हैं ।

मनोविज्ञान व्यवहार का शुध्द विज्ञान हैं “- वाटसन ।

“तुम मुझे कोई भी बालक दे दो में उसे वैसा बनाउँगा जैसा मैं उसे बनाना चाहता हूँ ” – वाटसन ।

” मनोविज्ञान ने सर्वप्रथम अपनी आत्मा का त्याग किया ,फिर मन का त्याग किया ,फिर चेतना का त्याग किया और आज मनोविज्ञान व्यवहार के विधि के स्वरूप को स्वीकार करता हैं ” – वुड़वर्थ ।

मनोविज्ञान की मुख्य शाखाएँ या क्षेत्र ( Main branches or area of Psychology )

1. सामान्य मनोविज्ञान
2. असामान्य मनोविज्ञान
3. तुलनात्मक मनोविज्ञान
4. प्रयोगात्मक मनोविज्ञान
5. समाज मनोविज्ञान
6. औधोगिक मनोविज्ञान
7. बाल मनोविज्ञान
8. किशोर मनोविज्ञान
9. प्रोढ़ मनोविज्ञान
10. विकासात्मक मनोविज्ञान
11. शिक्षा मनोविज्ञान
12. निदानात्मक या उपचारात्मक या क्लिनिकल मनोविज्ञान
13. परा मनोविज्ञान ( आधुनिकतम शाखा )
14. पशु मनोविज्ञान 

मनोविज्ञान का परिचय मनोविज्ञान का परिचय मनोविज्ञान का परिचय

September 28, 2020

Structures and resources आधारभूत -सरंचना एवं संसाधन

सरंचना एवं संसाधन

संसाधन

आर्थिक विकास में आधारभूत संरचना की महत्वपूर्ण भूमिका होती है आधारभूत संरचना में जो क्षेत्र समृद्ध होते हैं उनका विकास तेज गति से होता है आधारभूत संरचना को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है

पहला भाग आधारभूत ढांचागत संरचना है इस में परिवहन विद्युत संचार को सम्मिलित किया जाता है इसके अलावा सिंचाई भी आधारभूत ढांचागत संरचना का भाग है क्योंकि कृषि विकास सिंचाई पर निर्भर है

आधारभूत संरचना का दूसरा भाग आधारभूत सामाजिक संरचना है इसमें प्रमुख रूप से मानव संसाधन विकास को सम्मिलित किया जाता है

राजस्थान का विकास के मामले में अग्रणी राज्य नहीं होने का कारण आधारभूत संरचना का अभाव है बिना आधारभूत संरचना के विकास का पहिया नहीं घूम सकता है राजस्थान सरकार आर्थिक विकास में आधारभूत संरचना की महत्ता को दृष्टिगत रखते हुए इसके विकास पर ध्यान केंद्रित किए हुए हैं राजस्थान की पंचवर्षीय योजनाओं में और वार्षिक योजनाओं में वित्तीय संसाधनों का बड़ा भाग आधारभूत संरचना पर खर्च किया जा रहा है जैसे जैसे राजस्थान में आधारभूत संरचना की स्थिति सुधर रही है वैसे वैसे राजस्थान आर्थिक विकास में आगे बढ़ रहा है राजस्थान में आधारभूत संरचना विशेष रूप से परिवहन ऊर्जा सिंचाई संचार और मानव संसाधन की स्थितियां निम्नलिखित है

1 परिवहन
2 ऊर्जा
3 सिंचाई
4 संचार
5 मानव संसाधन

1 परिवहन

आर्थिक विकास में परिवहन का महत्वपूर्ण स्थान है औद्योगिक विकास के लिए परिवहन आवश्यक है परिवहन के साधनों से सभी क्षेत्रों के विकास को गति मिलती हैं परिवहन की प्राकृतिक आपदाओं के समय में अत्यधिक उपयोगिता है युद्ध के समय परिवहन के साधनों की महत्व और अधिक बढ़ जाती है परिवहन का सांस्कृतिक महत्व है राजस्थान की योजनाबद्ध विकास में परिवहन विकास पर ध्यान दिया गया है राजस्थान में विगत कुछ वर्षों में परिवहन के क्षेत्र में प्रगति की है

परिवहन में मुख्यतः सड़क रेल और वायु यातायात को सम्मिलित किया जाता है

सड़क परिवहन

महानगर और बड़े शहर सामान्यतया रेल और वायु यातायात से जुड़े होते हैं किंतु गांव के परिवहन का साधन मुख्य रूप से सड़के ही है गांव में सड़कों का महत्व मानव शरीर में शिरा और धमनियों की भांति है राजस्थान में जनसंख्या का बड़ा भाग गांव में जीवन व्यतीत करता है राज्य के गांव में जहां-जहां सड़के पहुंची हैसमृद्धि स्वतः ही नजर आने लगी है सड़कों के विकास के बिना गांव अधूरे दिखते हैं सड़कों के अभाव में गांव का सामाजिक विकास गति नहीं पकड़ पाता है वर्तमान में राजस्थान के गांव में सड़कों का जाल बिछा नजर आने लगा है

राज्य में सड़क परिवहन की प्रकृति को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है

1 यातायात विकास परियोजना खर्च- राजस्थान की योजनाबद्ध विकास में यातायात विकास पर खर्च में वृद्धि की गई वर्तमान में सड़क परिवहन राज्य सरकार का महत्वपूर्ण प्राथमिकता वाला विकास शीर्ष है

2 सड़कों का विकास- योजनाबद्ध विकास में यातायात खर्च में वृद्धि से सड़क परिवहन का विकास हुआ है राजस्थान में डामर की सड़कों की लंबाई 1950- 51 में 17339 किलोमीटर थी जो बढ़कर मार्च 2016 तक सड़कों की लंबाई 2,17;707•25 किलोमीटर हो गई। इन सड़कों में राष्ट्रीय राजमार्ग राज्य राजमार्ग मुख्य जिला शहर के अन्य जिला सड़क एवं ग्रामीण सड़कें सम्मिलित हैं

3 राजस्थान राज्य सड़क परिवहन निगम- राजस्थान सरकार का सार्वजनिक क्षेत्र का प्रमुख प्रतिष्ठान है एक वैधानिक नियम के रूप में इसकी स्थापना सन 1 अक्टूम्बर1964(जयपुर ) में हुई यह निगम स्थापना के समय से ही यात्री यातायात के क्षेत्र में उल्लेखनीय भूमिका निभा रहा है।*

4 प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना-(PMGSY)- देश के सभी गांव को बारहमासी सड़कों से जोड़ने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री द्वारा 25 दिसंबर 2000 को प्रधानमंत्री “ग्राम सड़क योजना” घोषित की गई इसके अंतर्गत 1991 की जनगणना के अनुसार 1027 से अधिक आबादी वाले गांवों को वर्ष 2003 तक तथा 500 से 1000 आबादी वाले सभी गांव को 2007 तक सड़कों से जोड़ने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था जनजातीय क्षेत्रों में ढाई सौ की आबादी वाले गांव को सड़कों से जोड़ने की योजना है

5 राजस्थान रोड विजन-2025 

राजस्थान में सड़क तंत्र के कायापलट के लिए राजस्थान रोड विजन 2025 तैयार किया गया सार्वजनिक निर्माण विभाग द्वारा 21वी सदी के पहले 25 साल में राज्य में सड़कों के विकास के लिए यह दीर्धावधि “विजन” तैयार किया गया इसमें सड़कों के विकास के साथ-साथ सड़कों के रखरखाव और सड़कों की गुणवत्ता पर बल दिया गया रोड विजन 2025 में पहले 15 साल में सभी गांवों को सड़कों से जोड़ने के बाद अगले 10 साल में एक्सप्रेस में फ्लाईओवर 4 लेन के राजकीय मार्ग पर जोर दिया गया इस विषय में धार्मिक महत्व के स्थानों पर्यटन का नाम और औद्योगिक क्षेत्रों के लिए नए सड़क संपर्क विकसित करना जरूरी माना गया है

सड़क परिवहन के संबंध में राजस्थान को “मॉडल स्टेट” माना जाता है राजस्थान में परिवहन व्यवस्था कार्यविधि अनुकरणीय है

6 राजस्थान राज्य मार्ग अधिनियम 2016-  विधानसभा द्वारा पारित कर दिया गया जो 8 मई 2015 से लागू किया गया

7 राजस्थान राज्य राजमार्ग विकास परियोजना- राज्य में राज्य राजमार्गों को पीपीपी एन्यूटी के आधार पर विकसित करने हेतु इस परियोजना का निर्माण किया गया

8 मुख्यमंत्री सड़क योजना- यह योजना 7 अक्टूबर 2005 को शुरू की गई योजना में राज्य में प्रमुख धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों को जोड़ने हेतु 1000 किलोमीटर सड़कों का निर्माण हो रहा है प्रत्येक जिले में एक आदर्श सड़क मॉडल रोड का विकास किया गया है

9 ग्रामीण गौरव पथ योजना- वर्ष 2014 15 मई योजना प्रारंभ की गई इस योजना के तहत आगामी 3 वर्षों में पंचायत मुख्यालय में 0•5 से 2 किलोमीटर की एक सड़क को ग्रामीण गौरव पथ के रूप में विकसित किया जाना है

10 सार्वजनिक निजी सहभागिता(PPP) बेल्ट ऑपरेट एंड ट्रांसफर(BOT)-

 आगामी 5 वर्षों में पीपीपी के माध्यम से 20,000 किलोमीटर राज्य उच्च मार्ग को विकसित किया जाएगा

निगम ने परिचालकों को स्वायत्तता देना तथा आय में वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए मेरी “बस मेरा रुठ योजना “लागू की जा रही है

11 राजस्थान सड़क क्षेत्र आधुनिकरण परियोजना- विश्व बैंक वर्ष 2013 14 में विश्व बैंक वित्त पोषित यह नवीन परियोजना प्रारंभ की गई थी

12 राजस्थान राज्य सड़क विकास एवं निर्माण निगम लिमिटेड(राजस्थान स्टेट रोड डेवलपमेंट एंड कंस्ट्रक्शन कारपोरेशन लिमिटेड-RSRDCC)- राजस्थान स्टेट ब्रिज लिमिटेड स्थापना एक सार्वजनिक कंपनी के रूप में 1979 को हुई थी 2001 को नाम परिवर्तित कर राजस्थान सड़क विकास एवं निर्माण निगम कर दिया गया इसकी स्थापना का मुख्य उद्देश्य आधुनिक पुलों सड़कों तथा भवनों के निर्माण को करना

रेल परिवहन

स्वतंत्रता से पूर्व राजस्थान में रेलमार्गों का विकास बहुत कम था थोड़ा-बहुत रेल मार्गों का विकास जयपुर रियासत बीकानेर रियासत जोधपुर रियासत तथा उदयपुर रियासत में हुआ था डूंगरपुर बांसवाड़ा जैसलमेर रियासत रेल मार्गों से जुड़ी हुई नहीं थी स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार ने रेल विकास का काम हाथ में लिया वर्तमान में रेल परिवहन भारत सरकार का सबसे बड़ा सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम है प्रत्येक वर्ष संसद में रेल मंत्री के द्वारा रेल बजट पेश किया जाता है राजस्थान में रेल विकास का दायित्व भारत सरकार पर है

  • रेलवे को हमारे संविधान में संघ सूची का विषय बनाया गया
  • राजस्थान में वर्तमान में दो रेलवे जोन व पांच मंडल कार्यालय भारत में 17 रेलवे जोन है
  • उत्तर पश्चिम रेलवे- 2002 को राजस्थान में बनाया गया नया रेलवे जोन इसका मुख्यालय जयपुर में स्थित है जिसमें राज्य के चार रेल मंडल जयपुर अजमेर बीकानेर जोधपुर शामिल किए गए
  • पश्चिमी मध्य रेलवे जोन- राज्य का कोटा मंडल इस जोन के अंतर्गत आता है पश्चिम मध्य रेलवे जोन का मुख्यालय जबलपुर में है
  • रेल मार्ग की लंबाई की दृष्टि से राजस्थान का भारत में 12 स्थान है
  • अप्रैल,1874 में राजस्थान में प्रथम रेल की शुरुआत जयपुर रियासत में आगरा फोर्ट से बांदीकुई के बीच में की गई
  • आजादी से पूर्व बीकानेर जोधपुर रियासत में सर्वप्रथम अपने निजी रेलमार्ग स्थापित किए
  • राजस्थान में मार्च 2015 तक रेल मार्ग की कुल लंबाई 5898 किलोमीटर हैं,जो देश की कुल लंबाई का 8•93 प्रतिशत है।
  • भारतीय रेल अनुसंधान एवं परीक्षण-इस केन्द्र का निर्माण पचपदरा बाड़मेर में किया जा रहा है जहां पर तेज गति से चलने वाली ट्रेनों का परीक्षण किया जाएगा

 जयपुर मेट्रो रेल परियोजना –

 जयपुर शहर में आवागमन सुविधा बढ़ाने हेतु मेट्रो रेल परियोजना की शुरुआत की गई, राज्य सरकार ने पूर्ण स्वामित्व वाली जयपुर मेट्रो रेल कारपोरेशन लिमिटेड का पंजीकरण 1 जनवरी 2010 को कंपनी अधिनियम 1956 के अंतर्गत किया गया

 शहरी विकास मंत्रालय भारत सरकार द्वारा 27 नवंबर 2015 को जयपुर मेट्रो रेल परियोजना (फेज-1ए) को बेस्ट अरबन मास ट्रांजिट प्रोजेक्ट केटेगरी में  “Commedable emerging initiative  रूप में विशेष अवार्ड प्रदान किया गया है

सौ साल बाद इतिहास बन गई मीटरगेज लाइन – जयपुर सीकर मीटर गेज की रेल लाइन अब इतिहास बन गई है मीटर गेज लाइन को 15 नवंबर 2016 से बंद कर दिया गया इस लाइन को ब्रॉडगेज लाइन में बदला जा रहा है जयपुर में सौ साल पहले 19 दिसंबर 1916 को यह लाइन शुरू की गई थी इसका उद्घाटन ?लॉर्ड चेम्सफोर्ड? ने किया था

वायु परिवहन

  • स्वतंत्रता से पहले राजस्थान में वायु परिवहन का विकास नहीं के बराबर था राजस्थान में केवल जोधपुर में हवाई अड्डे था जो दिल्ली और कराची से जुड़ा था
  • वर्ष 1947 में बीकानेर जोधपुर वायु सेवा प्रारंभ हुई स्वतंत्रता के बाद 1953 में वायु परिवहन का राष्ट्रीयकरण किया गया
  • देश में वायु परिवहन का संचालन नागर विमानन विभाग करता है देश में एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस की प्रमुख सेवाएं हैं
  • आर्थिक उदारीकरण के बाद वायु परिवहन में निजी सेवाओं की भूमिका भी बढ़ गई है पिछले कुछ दशकों में राजस्थान वायु परिवहन में पिछड़ा हुआ था किंतु वर्तमान में वायु परिवहन के क्षेत्र में राजस्थान की स्थिति में सुधार आ रहा है
  • भारतीय संविधान में वायु परिवहन को संघ सूची का विषय बनाया गया है

  • राजस्थान में वर्तमान में कुल 10 एयरपोर्ट एवं 27 हवाई पट्टी है
  • वायुमार्गों एवं आवश्यक सुविधाओं के विकास का दायित्व पूर्णता केंद्रीय सरकार के नियंत्रण में है
  • जैसलमेर में राज्य का पांचवा सिविल एयरपोर्ट बनाया जा रहा है
  • बाड़मेर में उत्तर लाई वायुसेना हवाई अड्डा एवं बीकानेर में लाल हवाई अड्डा है जो भूमिगत सैनिक हवाई अड्डा है
  • जयपुर में स्थित हवाई अड्डे को 29 दिसंबर 2005 को अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का दर्जा दिया गया है
  • यह देश का 14वाँ अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा हो गया।
  • 20 दिसंबर 2006 को नागर विमानन निगम की स्थापना राज्य में की गई
  • उड़े देश का आम नागरिक योजना- वसुंधरा राजे ने दिल्ली जोधपुर मुंबई एवं दिल्ली जयपुर उदयपुर औरंगाबाद मुंबई सेक्टर की बंद विमान सेवाओं को बहाल करने की मांग रखी

2 ऊर्जा

  • ऊर्जा महत्वपूर्ण आधारभूत संरचना है अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्र जैसे कृषि उद्योग परिवहन सामाजिक विकास आदि क्षेत्र विकास के लिए ऊर्जा पर निर्भर हैं क्षेत्र विशेष का विकास ऊर्जा बिना संभव नहीं है
  • ऊर्जा के लिए परंपरागत और गैर परंपरागत स्रोत होते हैं
  • परंपरागत स्रोतों में जल विद्युत थर्मल विद्युत एवं ऊर्जा सम्मिलित की जाती है
  • ऊर्जा के गैर परंपरागत स्रोतों में बायोगैस सौर ऊर्जा पवन ऊर्जा आदि प्रमुख है
  • राजस्थान_सरकार अर्थव्यवस्था में ऊर्जा की महत्ता और उदारीकरण के कारण औद्योगिक विकास में वृद्धि की संभावनाओं को दृष्टि में रखकर ऊर्जा विकास के लिए प्रयत्नशील है राजस्थान की गिनती हो जाए छेत्र में आर्थिक सुधारों को लागू करने के मामले में देश के अग्रणी राज्य में होती हैं
  • राजस्थान_में विद्युत क्षेत्र सुधार अधिनियम 1999 लागू किया गया। राजस्थान राज्य विद्युत मंडल घाटे से ग्रसित होने के कारण 1999 में समाप्त कर दिया गया
  • राजस्थान में सन 2000 में 5 स्वतंत्र कंपनियां गठित की गई नई कंपनियों में राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड राज्य में विद्युत उत्पादन योजनाओं क्रियान्वयन,संचालन एवं रखरखाव करती है
  • अन्य कंपनी राजस्थान राज्य विद्युत प्रसारण निगम लिमिटेड राज्य में प्रसारण तंत्र का निर्माण एवं संचालन करती है
  • बिजली वितरण के लिए तीन कंपनियां यथा जयपुर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड तथा जोधपुर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड है यह तीनों कंपनियां अपने अपने क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से विद्युत वितरण का कार्य संचालित करती है

विद्युत विकास पर योजना परिव्यव-

 राजस्थान में ऊर्जा की कमी और आर्थिक विकास में विद्युत की महत्ता को ध्यान में रखते हुए पंचवर्षीय योजनाओं में पूजा पर भारी वित्तीय संसाधन आवंटित किए गए पंचवर्षीय योजनाओं की प्राथमिकता में ऊर्जा विकास को सर्वोच्च स्थान दिया गया।

? पहली पंचवर्षीय योजना के कुल योजना विकास 2•3% प्रतिशत भाग ऊर्जा विकास पर खर्च किया गया,ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में कुल योजना वे का ऊर्जा विकास पर भी बढ़कर 36% हो गया

प्रमुख विद्युत परियोजनाएं-

 योजनाबद्ध विकास में राजस्थान में कई विद्युत परियोजना की स्थापना की गई राजस्थान में दो प्रकार की विद्युत परियोजनाएं हैं एक राज्य की स्वयं की स्वामित्व वाली परियोजना है इनमें सुपर थर्मल तापीय विद्युत परियोजना कोटा, सूरतगढ़ ताप बिजली परियोजना, छाबड़ा तापीय विद्युत परियोजना,माही जल विद्युत परियोजना है तथा अन्य आंशिक स्वामित्व वाली परियोजना हैं जिनसे राजस्थान को विद्युत प्राप्त होती हैं इनमें चंबल परियोजना,व्यास परियोजना,भांगड़ा परियोजना,सतपुड़ा परियोजना प्रमुख है

राजस्थान परमाणु शक्ति परियोजना एक महत्वपूर्ण परियोजना है? जिसके अंतर्गत रावतभाटा में परमाणु संयंत्र स्थापित किया गया अन्य ऊर्जा परियोजना में अन्ता विद्युत परियोजना (गैस आधारित) है। ऊर्जा उत्पादन के प्रति सरकार अत्यधिक प्रयत्नशील है।

  • राजस्थान में 12वीं पंचवर्षीय योजना के अनुसार ऊर्जा क्षेत्र का कुल व्यय 37•46%, 2वीं पंचवर्षीय योजना में कुल व्यय 72,723•25 करोड रुपए रहा है।
  • LED और ऊर्जा संरक्षण मिशन-2015
  • राजस्थान सौर ऊर्जा नीति 2014-उद्देश्य 25000 मेगावाट की सौर ऊर्जा क्षमता की स्थापना को मूर्त रूप प्रदान करने हेतु
  • अल्ट्रा सौर परियोजना-2014 सांभर, राजस्थान में 19000 एकड़ में फैला विश्व का सबसे बड़ा एकल स्थल सौर संयंत्र स्थापित किया जा रहा है 4000 मेगावाट का है
  • 18 जुलाई 2012 को राज्य सरकार ने नई पवन ऊर्जा नीति 2012 जारी की यह 18 जुलाई 2012 से लागू की गई
  • सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए 19 अप्रैल 2011 को राज्य की पहली सौर ऊर्जा नीति मंजूर की गई “राजस्थान सौर ऊर्जा नीति लागू करने वाला देश का पहला राज्य” बन गया।
  • राज्य में प्रथम सौर ऊर्जा पार्क भादला(जोधपुर) में स्थापित किया जा रहा है

ऊर्जा के स्रोत ऊर्जा प्राप्ति के स्रोतों को दो भागो में बांटा जा सकता है

1. परंपरागत स्रोत-

  • A. जल विद्युत
  • B. तापीय विद्युत-कोयला,गैस,तेल आदि
  • C. आणविक ऊर्जा

2. गैर परंपरागत ऊर्जा स्रोत-

  • A. सौर ऊर्जा-सूर्य की ऊर्जा से उत्पन्न ऊर्जा
  • B. पवन ऊर्जा तेज चलने वाली हवा से उत्पन्न ऊर्जा
  • C. बायोगैस जानवरों के मल मूत्र से वायु रहित अवस्था में अपघटन से प्राप्त ऊर्जा
  • D. ज्वारीय तरंग ऊर्जा समुद्री ज्वार भाटा एवं तरंगों से उत्पन्न ऊर्जा
  • E. भूतापीय ऊर्जा-पृथ्वी के निकलने वाले गरम स्त्रोतों की उष्मा से उत्पन्न ऊर्जा।

राज्य में गैर परंपरागत ऊर्जा के स्रोतों के विकास हेतु वर्तमान में राजस्थान अक्षय ऊर्जा निगम( राजस्थान रिन्यूएबल एनर्जी कारपोरेशन)कार्यरत हैं जिसका गठन 9 अगस्त 2002 को राजस्थान ऊर्जा विकास अभिकरण(REDA), राजस्थान स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड(RSPCL)को मिलाकर किया गया था जिसका मुख्यालय जयपुर में है

  • 1957 को राजस्थान राज्य विद्युत मंडल की स्थापना की गई
  • रेडा (REDA-Rajasthan energy Development Agency)- इसकी स्थापना 21 जनवरी 1985 को की गई,इसका प्रमुख उद्देश्य गैर परंपरागत ऊर्जा स्रोतों के विकास एवं गैर परंपरागत ऊर्जा उपकरणों को बढ़ावा देना है
  • राजस्थान स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड(RSPCL) – स्थापना 1995 में की गई परंपरागत ऊर्जा संसाधनों से ऊर्जा उत्पादन संयंत्रों की स्थापना इसका प्रमुख उद्देश्य हैं

राज्य की ताप विद्युत परियोजनाएं

 सूरतगढ़ सुपर थर्मल पावर स्टेशन-

(सूरतगढ़) गंगानगर के निकट ठुकराना गांव के समीप प्रभात नगर में स्थित है राज्य का पहला सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट है ढाई सौ मेगावाट की छोटी इकाई का शिलान्यास 9 जनवरी 2007 को किया गया सुपर थर्मल पावर प्लांट की क्षमता 15 मेगावाट है

  • कोटा सुपर थर्मल विद्युत परियोजना (राज्य का दूसरा सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट)
  • गिरील ताप विद्युत परियोजना-गिरिल (Barmer)
  • थुम्बली गांव, शिव,बाड़मेर राजस्थान राज्य का पहला लिग्नाइट गैस करण तकनीक पर आधारित विद्युत गृह।
  • छाबड़ा थर्मल पावर प्रोजेक्ट  -ग्राम चौकी मोतीपुरा छबड़ा बारां
  • बरसिंगसर थर्मल पावर प्रोजेक्ट  – (बरसिंगसर) बीकानेर
  • भादेसर(बाड़मेर) लिग्नाइट आधारित सुपर पावर प्रोजेक्ट 

राज्य की गैस व तरल ईंधन आधारित परियोजनाएं

 रामगढ़ गैस विद्युत परियोजना- रामगढ़,(जैसलमेर) यह परियोजना राज्य द्वारा संचालित प्रथम गैस आधारित विद्युत परियोजना है जिसकी क्षमता 113•5 मेगावाट है इस परियोजना को गैस आपूर्ति गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (GAIL)द्वारा की जाएगी

➡ झामरकोटड़ा(उदयपुर )

➡ गैस विद्युत परियोजना बारा राजस्थान यह राजस्थान में स्थअंताापित प्रथम किस विद्युत परियोजना है NTPC द्वारा संचालित

1 आणविक विद्युत परियोजना

  • राजस्थान परमाणु शक्ति गृह रावतभाटा चित्तौड़- स्थापना सन 11 अगस्त 1972 में कनाडा के सहयोग से राज्य का प्रथम बार देश का दूसरा परमाणु संयंत्र है
  • दूसरा परमाणु संयंत्र बांसवाड़ा में प्रस्तावित है
  • देश में कुल 21 परमाणु संयंत्र हैं
  • 21वां परमाणु संयंत्र कुडनकुलम तमिलनाडु में स्थित है
  • परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना 1948 में की गई

2 सौर ऊर्जा

  • राज्य_में सौर ऊर्जा संयंत्र- जैसलमेर
  • राज्य_का पहला गांव जहां संपूर्ण विद्युत सौर ऊर्जा से प्राप्त की जा रही है – नया गांव (जयपुर)
  • राज्य_का पहला सौर ऊर्जा से चलित रेफ्रीजिरेटर- बालेसर (जोधपुर)
  • राज्य का प्रथम सौर ऊर्जा आधारित विद्युत संयंत्र – मथानिया (जोधपुर)
  • राजस्थान सौर ऊर्जा नीति -19 अप्रैल 2011

3 पवन ऊर्जा

  • पवन ऊर्जा के उत्पादन के क्षेत्र में राज्य का चौथा स्थान है भारत में सर्वाधिक पवन ऊर्जा का उत्पादन तमिलनाडु में है
  • राज्य की पहली पवन ऊर्जा योजना-अमरसागर (जैसलमेर) स्थापना राजस्थान स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड प्रतापगढ़ द्वारा ।

4 बायो गैस/गोबर गैस

  • सर्वाधिक बायोगैस संयंत्र- उदयपुर
  • पशुओं की पर्याप्त मात्रा होने से अधिक संभावना

5 बायोमास ऊर्जा 

  • अपशिष्ट कचरा कृषि अपशिष्टों से विद्युत का उत्पादन किया जाता है बायोमास कहलाता है
  • राजस्थान में बायोमास ऊर्जा के महत्वपूर्ण स्रोत सरसों की तूड़ी या विलायती बबूल है
  • राज्य में पहला बायोमास ऊर्जा आधारित संयंत्र- पदमपुर गंगानगर

6 भू-तापीय ऊर्जा 

राज्य में माउंट आबू में अधिक संभावना है।

3 सिंचाई

?राजस्थान कृषि प्रधान राज्य है यहां के अधिकांश लोग जीवन स्तर के लिए कृषि पर निर्भर हैं कृषि विकास सिंचाई पर निर्भर करता है राजस्थान के पश्चिमी भाग में मरुस्थल है मानसून के आने के कारण “कृषि मानसून का जुआ है” जैसी बात कई बातें चरितार्थ होती है हरित क्रांति और कृषि क्षेत्र की आधुनिक प्रौद्योगिकी का लाभ सिंचाई द्वारा ही संभव है इसीलिए राजस्थान में सिंचाई के साधनों के विकास की महत्ती आवश्यकता है

सिंचाई के स्रोत 

  • राजस्थान की सिंचाई के प्रमुख साधनों में नहरें,तालाब कुऐं,नलकूप है कुऐं,नलकूप सिंचाई के सर्वोत्तम साधन है इनके द्वारा फसलों में आवश्यकतानुसार पानी दिया जा सकता है कुआं और नलकूप द्वारा सिंचाई के लिए पानी का मीठा होना,जल स्तर का गहरा नहीं होना तथा उपजाऊ भूमि का होना आवश्यक है
  • नहरों द्वारा जल का सबसे अधिक उपयोग होता है राज्य में सतत प्रवाही नदियों के अभाव में नहरों द्वारा सिंचित क्षेत्र कम है राज्य के दक्षिणी पूर्वी,पठारी एवं पथरीलें द्वारा तलाबों द्वारा सिंचाई की जाती है
  • राजस्थान की बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं को आधुनिक भारत के मंदिर संज्ञा दी गई है।

4 संचार

संचार आधारभूत संरचना का महत्वपूर्ण भाग है वर्तमान में आर्थिक विकास में संचार की भूमिका बढ़ गई है देश में डाक एवं दूरसंचार सेवाओं का तीव्र गति से विकास हुआ है सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वृद्धि और विकास में संचार क्षेत्र में क्रांति ला दी हैं संचार सुविधाओं के विकास में सार्वजनिक क्षेत्र के साथ निजी क्षेत्र उल्लेखनीय भूमिका निभा रहे हैं।

राजस्थान में डाक सेवा का पर्याप्त विकास हुआ है राज्य में औसतन 33 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में एक डाकघर स्थापित हैं इसके अलावा प्रति डाकघर औसतन 5404 व्यक्तियों को सेवाएं प्राप्त हो रही हैं राजस्थान में डाक एवं दूरसंचार सेवा में डाकघर,तार कार्यालय, टेलीफोन एक्सचेंज, लोकल पीसीओ, एसटीडी/पीसीओ, ग्रामीण पीटी,इंटरनेट सेवा आदि सम्मिलित है।संचार के अन्य साधनों में टेलीविजन रेडियो टेलीग्राफ टेलीग्राम टेलेक्स कंप्यूटर लैपटॉप आदि है।।

5 मानव संसाधन 

आर्थिक विकास में सामाजिक आधारभूत संरचना की भूमिका बढ़ गई है इसमें मानव संसाधन संरचना अधिक महत्वपूर्ण है इसके अलावा चिकित्सा एवं स्वास्थ्य परिवार कल्याण, जलापूर्ति, आवास, समाज कल्याण जनजाति, क्षेत्रीय विकास, महिला एवं बाल विकास और कल्याणकारी गतिविधियां भी सामाजिक आधारभूत संरचना के अंग है।

राजस्थान_में मानव संसाधन विकास की स्थिति सुधारवादी चरण में है राजस्थान में साक्षरता दर 1991 में 38•6% थी जो 2001 में बढ़कर 60•4% हो गई इस प्रकार 1991-2001 के दशक में राजस्थान की साक्षरता दर में 21•8 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

राजस्थान_के मानव संसाधन विकास में प्रारंभिक शिक्षा एवं साक्षरता, माध्यमिक शिक्षा,उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा ,औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान ,संस्कृत शिक्षा विभाग महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे है

राजस्थान_में 2005-06 में 56573 प्राथमिक स्कूल, 28955 उच्च प्राथमिक स्कूल, 11199 उच्च माध्यमिक विद्यालय थे, राज्य में 2006-07 में 1090 उच्च शैक्षणिक संस्थानों तथा 21 राष्ट्रीय महत्व के विश्वविद्यालय तथा डीम्ड विश्वविद्यालय थे।

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September 28, 2020

Programs and schemes कमजोर वर्गों के लिए कार्यक्रम व योजनाएं

कमजोर वर्गों के लिए कार्यक्रम व योजनाएं )

1. राजस्थान अन्नपूर्णा दूध योजना ( Rajasthan Annapoorna Milk Scheme )

योजनाएं

राजस्थान सरकार ने प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ रहे उन छात्रों के नामांकन में वृद्धि, ड्रॉप-आउट को रोकने, और पौष्टिक स्तर को बढ़ाने के लिए मध्य-भोजन भोजन योजना के लिए राजस्थान अन्नपूर्णा दूध योजना शुरू की है।

छात्रों का इसके लिए, मिड डे मील के आयुक्त प्रति छात्र एक लीटर दूध की मात्रा दी जाएगी और हर स्कूल में दूध के लिए डेयरी के अलावा जहां से भी हो निर्देश दिए जाएँगे।  शिक्षा विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, यह व्यवस्था जुलाई 2018 से शुरू होने वाले सत्र से लागू की जाएगी।

  • राजस्थान अन्नपूर्णा दूध योजना के तहत, सरकारी स्कूलों में –
  • कक्षा एक से पांच तक के बच्चों को 150 मिलीलीटर दूध दिया जाएगा।
  • कक्षा 6 से 8 के छात्रों को 200 एमएल स्कूलों में दूध प्रदान किया जाएगा।
  • यह योजना उन बच्चों को पोषण प्रदान करने के लिए है जो दूध नहीं ले सकते हैं।
  • दूध वितरण स्कूल प्रबंधन समितियों के मार्गदर्शन में किया जाएगा।

राजस्थान अन्नपूर्णा दूध योजना के तहत एक सप्ताह में 3 बार दूध प्रदान किया जाएगा  शहरी इलाकों में, गर्म दूध सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को और ग्रामीण क्षेत्रों में, मंगलवार, गुरुवार और शनिवार या शहरी क्षेत्रों के समान प्रदान किया जाएगा। प्रार्थना बैठक के बाद दूध दिया जाएगा।

अन्नपूर्णा दूध योजना के लाभ:-

  • राज्य सरकार इस योजना को समाज के गरीब वर्गों के छात्रों को दूध प्रदान करने के लिए शुरू करेगी जो दूध की आपूर्ति नहीं कर सकते हैं |
  • दूध एक आवश्यक भोजन है और इसके विभिन्न स्वास्थ्य लाभ हैं,  बच्चों के उचित पोषण को सुनिश्चित करेगी और इस प्रकार उन्हें स्वस्थ जीवन शैली प्रदान करने में मदद करेगी |
  • मानव शरीर के समग्र विकास और पुरानी बीमारियों की रोकथाम के लिए दूध आवश्यक है

2. ई- सखी योजना ( E- Sakhi scheme )

डिजिटल राजस्थान के संबंध में हर व्यक्ति में राज्य सरकार की सार्वजनिक कल्याण योजनाओं के बारे में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से ई-सखी योजना शुरू की गई है। इस योजना में, राज्य में ई-स्कूलों के रूप में लगभग 1.5 लाख महिलाएं चुनी जाएंगी।

ई-सखी योजना के लिए, हर आठवें व्यक्ति को प्रत्येक गांव से चार से पांच और शहरी उपनगरीय क्षेत्रों के हर वार्ड में चुना जाएगा। ई-सखी बनने की इच्छा रखने वाली महिलाएं Google Play Store पर उपलब्ध ई-सखी मोबाइल ऐप के माध्यम से अपना ऑनलाइन पंजीकरण कर सकती हैं। पंजीकरण करने से पहले, ई-सखी के पास एसएसओ होना चाहिए।

http://sso.rajasthan.gov.in/register वेब पोर्टल पर जाकर उपलब्ध विकल्पों के आधार पर एक एसएसओ बना सकता है।

3. मुख्यमंत्री उच्च शिक्षा छात्रवृति योजना ( Chief Minister’s Higher Education Scholarship Scheme )

राजस्थान सरकार ने राज्य के मेधावी छात्रों के लिए राजस्थान मुख्यमंत्री उच्च शिक्षा छात्रवृत्ति योजना का शुभारंभ किया है। इस छात्रवृत्ति योजना का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भविष्य में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले हर छात्र को छात्रवृत्ति दी जानी चाहिए ताकि वह स्वयं निर्भर हो सके।

राज्य सरकार प्रमुख छात्र छात्रावास योजना के तहत छात्रों को छात्रवृत्ति प्रदान की जाएगी। केवल राजस्थान के स्थायी निवासी इस छात्रवृत्ति योजना का लाभ उठा सकते हैं।

आवेदक के परिवार की वार्षिक आय 2.5 लाख से अधिक नहीं होनी चाहिए। जो छात्र अजमेर के राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की 12 वीं परीक्षा उत्तीर्ण की है, इस वर्ष में न्यूनतम 60 प्रतिशत और बोर्ड की प्राथमिकता सूची में पहले एक लाख में एक जगह हासिल करनी होगी।

जिन छात्रों ने सरकार द्वारा किसी अन्य छात्रवृत्ति का लाभ उठाया है, वे इस योजना का लाभ नहीं उठा सकते हैं। इस योजना के लिए, छात्र का किसी भी बैंक में खाता होना चाहिए।

4. राजस्थान पद्माक्षी पुरस्कार योजना ( Rajasthan Padmakshi Award Scheme )

इस_राजस्थान_पद्माक्षी पुरस्कार_योजना के तहत लाभ 8 वीं, 10 वीं और 12 वीं कक्षा की मेधावी लड़कियों को प्रदान किए जाएंगे।

इस योजना_के तहत, एक पुरस्कार राशि के रूप में 8 वीं कक्षा की मेधावी छात्राओं के लिए 40 हजार रूपये और कक्षा 10 में सबसे जयादा अंक अर्जित करने वाली छात्राओं के लिए 75 हजार रूपये तथा कक्षा 12 में सबसे जयादा अंक अर्जित करने वाली छात्राओं के लिए 1 लाख रूपये की राशी का वितरण किया जाएगा।

इस योजना के तहत, 10 वीं और 12 वीं की मेधावी छात्राओं को राज्य द्वारा पुरस्कृत किया जाएगा।  इस पुरस्कार योजना के अंतर्गत, 4 छात्राओं को 31 सौ रुपये का प्रोत्साहन दिया जाएगा।

5. राजश्री योजना ( Rajshri Yojana )

1 जून, 2016 से शुरू मुख्यमंत्री “शुभ लक्ष्मी योजना “का परिवर्तन “राजश्री योजना” नाम कर दिया गया है । बालिका कल्याण की इस महत्वकांक्षी योजना में अभ्यर्थियों को जन्म से लेकर उच्च शिक्षा तक आर्थिक प्रोत्साहन दिया जायेगा ।

मुख्यमंत्री राजश्री योजना के जन्म से लेकर 12वीं कक्षा उत्तीर्ण करने तक अलग-अलग किस्तों में ₹50000 की राशि दी जाएगी ।

मुख्यमंत्री राजश्री योजना के तहत जिले के सभी शिक्षा संस्थानों तथा जेएसवाई में अधिस्वीकृत निजी शिक्षण संस्थानों पर बालिका के जीवित जन्म का प्रथम किस्त के रूप में देय राशि 2500 रुपये ,बालिका 1 वर्ष की आयु पूर्ण करने के बाद तथा टीकाकरण की शर्त के रूप में देय राशि 2500 रुपये मिलेगी ।

इसके बाद बालिका स्कूल में पहली कक्षा में प्रवेश पर 5000 रुपये , 10 वीं कक्षा में प्रवेश पर 11,000 रुपये और राजकीय विद्यालय से 12 वी कक्षा उतीर्ण करने पर ₹25000 की राशि दी जाएगी ।

इस योजना में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए योजना को भामाशाह कार्ड से भी जोड़ा जाएगा ।

6. श्रमिक कल्याण कार्यक्रम ( Labor welfare program )

अटल पेंशन योजना:- 1 जून 2005 मे

इसके तहत 60 साल की उम्र के बाद 5000 रुपए तक पेशन मिलेगी। स्वावलंबन योजना के मौजूद अंशधारक अगर इससे बाहर निकलने का विकल्प नहीं चुनते है तो वे स्वत: एपीवाई पेंशन योजना मे आ जाएंगे। बयान के अनुसार एपीवाई के लिए न्यूनतम उम्र 18 साल तथा अधिकतम उम्र 40 साल हैं ।

राष्ट्रीय बाल श्रमिक परियोजना ( National child labor project ) :-

बाल श्रमिकों को जोखिमपूर्ण कार्यो/ व्यवसायों से मुक्त कराकर शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ना।

कर्मचारी राज्य बीमा योजना ( Employee state insurance scheme ):-

दिनांक 2 दिसम्बर,1956 मे क्रियाशील यह योजना एक विशिष्ट प्रकार की सामाजिक सुरक्षा योजना हैं। इसका प्रमुख उद्देश्य विभिन्न उधोगों एवं कल कारखानों मे कार्यरत बीमित श्रमिकों एवं उनके परिवारजनों को उत्कृष्ट चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करवाया जाना हैं।

इस योजना मे चार चिकित्सालय- : कोटा,जोधपुर, भीलवाड़ा, व पाली मे।

श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा के उद्देश्य से केंद्र सरकार द्रारा मुख्य रूप से निम्नलिखित श्रम अधिनियम बनाए गए हैं:-

  • कर्मकार क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923
  • मातृत्व हितलाभ अधिनियम,1961
  • उपादान भुगतान अधिनियम, 1972
  • कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम,1948
  • कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम, 1952

असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम 2008:- केन्द्र सरकार द्रारा असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम,2008 दिनांक 31 दिसंबर,2008 को अधिसूचित किया गया। जिसे 16 मई, 2009 से प्रभावी किया गया था।

7. प्रधानमंत्री आवास योजना ( Prime minister housing scheme )

18 मार्च ,2017 को मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण का शुभारंभ बांसवाड़ा से किया गया। प्रधानमंत्री आवास योजना ( Prime minister housing scheme ) का शुभारंभ श्रीमती वसुंधरा राजे ने केंद्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री नरेंद्र तोमर एवं पंचायती राज मंत्री राजेंद्र राठौड़ के साथ किया ।

योजना की शुरुआत मुख्यमंत्री व केंद्रीय मंत्री ने 5 महिलाओं को स्वीकृति पत्र देकर की । प्रधानमंत्री आवास योजना के तहतराज्य में 6.75 लाख परिवारों को 2 वर्षों में रहने के लिए अपना स्वयं का मकान मिलेगा ।

ये आवास 2 साल में बनेंगे । इन पर 8425 करोड़ रु खर्च होंगे । इस योजना के तहत 2022 तक हर गरीब व्यक्ति को अपना घर मुहैया कराने का लक्ष्य रखा गया है ।प्रत्येक व्यक्ति को अपना घर बनाने के लिए करीब डेढ़ लाख रूपय दिए जाएंगे ।

इनमें से 1.20 लाख रुपए नगद, महानरेगा से मजदूरी के रूप में 17,280 तथा शौचालय निर्माण के लिए ₹12000 दिए जाएंगे । इस योजना में 60% राशि केंद्र तथा 40% राशि राज्य सरकार देगी ।

1 लाख 50 हजार आवासों की स्वीकृति जारी भी हो चुकी है तथा 4 लाख लाभार्थियों के रजिस्ट्रेशन हो चुके है । गरीबों को आश्रय देने की योजना में जनजातीय क्षेत्र पर विशेष फोकस रखा गया है ।

2 वर्षों में 2746 करोड़ रुपए की लागत से इस क्षेत्र में 2.20 लाख मकान बनेंगे । इस योजना में अपने घर का डिजाइन व्यक्ति खुद तय कर सकता है ।

8. अन्नपूर्णा भंडार योजना ( Annapurna store )

जनसाधारण को उच्च गुणवत्ता की मल्टी ब्रांड उपभोक्ता वस्तुएं प्रतिस्पर्धी दरों पर उचित मूल्य की दुकान के माध्यम से उपलब्ध करवाना सार्वजनिक एवं निजी सहभागिता के अंतर्गत सार्वजनिक वितरण प्रणाली के आधुनिकरण की एक अनूठी योजना है

योजना 31 अक्टूबर 2015 को मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे द्वारा जयपुर जिले के भम्भोरी ग्राम से अन्नपूर्णा भंडार योजना का शुभारंभ किया गयायह देश की पहली आधुनिक पीडीएस योजना है

अन्नपूर्णा भंडार योजना लागू करने वाला राजस्थान का देश का प्रथम व एकमात्र राज्य है

9. अन्नपूर्णा रसोई योजना ( Annapurna Rasoi Scheme )

मुख्यमंत्री राजस्थान द्वारा दिनांक 15 दिसंबर 2016 को अन्नपूर्णा रसोई योजना का जयपुर में शुभारंभ किया गया प्रथम चरण में 12 शहरों जयपुर, जोधपुर, अजमेर, बीकानेर, कोटा, भरतपुर, उदयपुर, झालावाड़, प्रतापगढ़, डूंगरपुर, बारां, बांसवाड़ा मैं 80 रसाई वैनों का संचालन किया

इस योजना का संचालन जीवन संभल चैरिटेबल ट्रस्ट ( Life saving charitable trust ) संस्था द्वारा किया जा रहा है 15 अगस्त 2017 को इस योजना को प्रदेश के सभी शहरी क्षेत्रों में 500 स्मार्ट फूड वैन के माध्यम से शुरू करने की घोषणा की गई

16 अक्टूबर, 2017 को अन्नपूर्णा रसोई योजना की दूसरे चरण की शुरुआत अजमेर में की गई । मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने विश्व खाद्य दिवस के मौके पर गरीबों और जरूरतमंदों को सस्ता भोजन उपलब्ध कराने के लिए अन्नपूर्णा रसोई योजना की दूसरे चरण की अजमेर से शुरुआत की ।

उन्होंने 51 स्मार्ट मोबाइल वेनो को हरी झंडी दिखाकर अलग-अलग शहरों के लिए रवाना किया

अन्नपूर्णा रसोई योजना की कार्यकारी एजेंसी निदेशालय स्थानीय विभाग है उद्देश्य राज्य के नागरिकों को अच्छी गुणवत्ता का पौष्टिक एवं स्वच्छता के साथ नाश्ता एवं भोजन सस्ती और यात्री दरों पर उपलब्ध करवाना

  • नाश्ता ₹5 प्रति प्लेट व भोजन ₹8 प्रति थाली
  • सरकार द्वारा सेवा प्रदाता हेतु अनुमोदित दर नाश्ता 21.70₹ और भोजन 23.70 ₹
  • सरकारी अनुदान नाश्ता ₹16.70 पैसे प्रति प्लेट एवं भोजन ₹15. 70 पैसे प्रति थाली कि दर से
  • नाश्ता 300 ग्राम प्रति प्लेट वह भोजन 425 ग्राम प्रति थाली दिया जाता था जिसे अब बढ़ाकर क्रमशः 350 में 450 ग्राम किया गया है

सभी जरूरतमंदों को पौष्टिक भोजन एंव सस्ता भोजन उपलब्ध कराने के लिए देश की पहली और अनूठी योजना को हरियाणा ,मध्य प्रदेश ,गुजरात महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्य में लागू कर रहे है ।

Note अब इसे राज्य सरकार ने इंदिरा भोजन के नाम से लागू किया हे

10. भामाशाह रोजगार सृजन योजना ( Bamashah employment generation scheme )

13 दिसंबर 2015 से लागू की गई योजना शिक्षित बेरोजगार युवाओं महिलाओं अनुसूचित जाति एवं जनजाति एवं विशेष योग्यजनों को स्वयं का उद्यम प्रारंभ करने हेतु कम ब्याज दर पर बैंकों से ऋण उपलब्ध कराने की योजना

योजना की अवधि 13 दिसंबर 2015 से 31 मार्च 2020 तक है अधिकतम ₹500000 तक सेवा व्यापार क्षेत्र में तथा अधिकतम 1000000 रुपए उद्योग लगाने हेतु ऋण सुविधा दी जाएगी इन ऋण पत्रों पर 4% का ब्याज अनुदान दिया जा रहा है

योजना हेतु आयु 18 से 50 वर्ष तथा राजस्थान के मूल निवासी होने चाहिए आवेदक के परिवार की आय ₹600000 वार्षिक से अधिक नहीं होनी चाहिए

गत 5 वर्षों से राजकीय रोजगारमूलक अनुदान योजना से लाभान्वित नहीं होना चाहिए राजस्थान भामाशाह (लोक कल्याणकारी प्रसुविधाओ का सीधा अंतरण और सेवाओं का परिदान ) विधेयक 2017 राज्य विधानसभा द्वारा 24 अप्रैल 2017 को पारित किया गया

11. मुख्यमंत्री कौशल अनुदान योजना ( Mukhyamantri Kaushal Anudaan Yojana  )

राजस्थान सरकार द्वारा कौशल विकास प्रशिक्षण के लिए युवाओं को रियायति ब्याज दरों पर ऋण उपलब्ध कराने के उद्देश्य से ” मुख्यमंत्री कौशल अनुदान योजना” की शुरुआत 1 जनवरी, 2017 को की ।

इस योजना में सरकार युवाओं को उनके कौशल विकास के लिए ₹100000 का ऋण प्रदान करती है। मुख्यमंत्री कौशल अनुदान योजना का मुख्य उद्देश्य युवाओं को रोजगार के लिए आवश्यक कौशल के साथ आत्मनिर्भर बनाना है।

राज्य सरकार ₹100000 की राशि तक की ऋण राशि पर 4 से 6% की सब्सिडी प्रदान करती है । इस योजना के दिशा निर्देश केंद्र के राष्ट्रीय कौशल विकास एजेंसी द्वारा निर्धारित है जो विशेष रूप से युवाओं को प्रशिक्षित करने के लिए और उनके कौशल को विकसित करने के लिए डिजाइन किया गया है ।

12 . मुख्यमंत्री स्वच्छ ग्राम योजना का शुभारंभ ( Mukhyamantri Svachchh Gram Yojana )

मुख्यमंत्री स्वच्छ ग्राम योजना का राज्यस्तरीय शुभारंभ 6 जनवरी ,2017 झालावाड़ की पंचायत समिति खानपुर की ग्राम पंचायत कंवरपुरा मंडवालान में राज्य जन अभाव अभियोग निराकरण समिति के अध्यक्ष श्री कृष्ण पाटीदार ,संसदीय सचिव नरेंद्र नागर ,जिला प्रमुख टीना कुमारी भील ,जिला कलेक्टर जितेंद्र कुमार सोनी द्वारा किया गया ।

मुख्यमंत्री स्वच्छ ग्राम योजना गांव को स्वच्छ ,स्वस्थ एवं सुंदर बनाने के लिए प्रारंभ की गई राज्य सरकार की महति योजना है ।यह योजना राज्य की उन ग्राम पंचायतों में लागू की जा रही है जो कि खुले में शौच जाने के अभिशाप से मुक्त( ओडीएफ) हो चुकी है ।

इस योजना के अंतर्गत प्रतिदिन घर-घर जाकर रिक्शा ट्रॉली के माध्यम से कचरा संग्रहण किया जाएगा । ट्रॉली के दो भाग हैं जिनमें से हरे भाग में सड़नशील कचरा बायो( बायोडिग्रेडेबल ) तथा लाल भाग में न सड़ने वाला( नॉन बायोडिग्रेडेबल) कचरा संग्रह किया जाता है

ग्राम ग्राम पंचायत प्रत्येक ग्राम में लगभग 150 घरों का क्लस्टर बनाया जाएगा। क्लस्टर के इन घरों तथा सामुदायिक संगठन एवं परिवहन के लिए महात्मा गांधी नरेगा योजना के तहत 2 श्रमिकों का नियोजन 100 दिवसों के लिए किया जाएगा ।

इसमें ग्राम पंचायत के करीब 30 लोगों का न सिर्फ रोजगार प्राप्त होगा बल्कि कचरा प्रबंधन से ग्राम पंचायत को वार्षिक आय भी प्राप्त होगी ।

13. मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान ( Mukhyamantri Jal Svavalamban Abhiyan )

9 दिसंबर , 2017 से “मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान” का तीसरा चरण प्रारंभ हुआ । मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान का तीसरा चरण का शुभारंभ 9 दिसंबर ,2017 को हुआ ।

अभियान के प्रथम चरण में 3,529 गांव का चयन कर 95,192 कार्य 1,270 करोड रुपए की लागत से किए गए ।  अभियान के द्वितीय चरण की शुरुआत 9 दिसंबर, 2016 से की गई थी इस में 4,213 गांव में 1,525 करोड़ रुपए की लागत से 28000 कार्य पूर्ण किए गए ।

इस प्रकार योजनाबद्ध तरीके से अब तक 7,742 गांव में 2,795 करोड़ की लागत के 2 लाख 23 हजार जल संरक्षण के कार्य पूर्ण किये जा चुके है । अभियान का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की न्यूनतम आवश्यकता की पूर्ति ,जल उपलब्धता एंव अकाल के दौरान उत्पन्न समस्याओं का निराकरण करना है ।

14. अमृत ,हृदय एंव स्मार्ट सिटी मिशन की द्वितीय वर्षगांठ (25 जून ,2017 )

अमृत मिशन- जयपुर ,जोधपुर, कोटा ,अजमेर, बीकानेर उदयपुर भरतपुर, भीलवाड़ा ,पाली, हनुमानगढ़ ,अलवर, सीकर, धौलपुर, सवाई माधोपुर, चूरु ,बारां, चित्तौड़गढ़ ,नागौर मंडी, श्रीगंगानगर,टोंक , झुंझुनूं ,भिवाड़ी , ब्यावर, गंगापुर सिटी ,हिंडौन सिटी, सुजानगढ़, किशनगढ़, झालावाड़ में 3,224 करोड रुपए की परियोजनाएं स्वीकृत ।

योजना में पेयजल आपूर्ति, सीवरेज ,ड्रेनेज,उद्यान व शहरी परिवहन के कार्य स्वीकृत । परियोजना में 61 प्रतिशत कार्य प्रारंभ । सभी परियोजनाएं दिसंबर, 2018 तक पूर्ण करने का लक्ष्य रखा गया था।

स्मार्ट सिटी मिशन-  

  • जयपुर:- 16.4 करोड रुपए की लागत से ऐतिहासिक बाजारों में फसाड सुधार एवं राजस्थान कला विद्यालय का जीर्णोद्वार प्रारंभ ।
  • उदयपुर:- 7.22 करोड़ों रुपए की लागत से कमांड एंव कंट्रोल केंद्र का निर्माण एंव ऐतिहासिक बाजारों की विरासत सरंक्षण का कार्य प्रारंभ ।
  • कोटा:- 225 करोड़ रुपए की लागत से दशहरा मैदान पुनरोद्धार एवं तट-पर्यटन सर्किट का कार्य आरंभ ।
  • अजमेर:-12.13 करोड़ रुपए की लागत से सुभाष उद्यान एवं अजमेर जयपुर रोड पूर्ववर्ती उन्नयन की परियोजना प्रारम्भ ।

ह्रदय परियोजना

अजमेर :- 33.37 करोड़ रुपए की लागत से 5 विरासत संरक्षण परियोजना प्रारंभ।  नया बाजार में 14.02 करोड़ रुपए की लागत से विरासत संरक्षण एंव सुभाष उद्यान विकास का कार्य प्रारम्भ । आनासागर झील उन्नयन एंव अजमेर रोड पुरवर्ती उन्नयन कार्यो की 15.23 करोड़ रुपये की परियोजना प्रारम्भ ।

पुष्कर में विरासत संरक्षण कार्यों की ₹6.16 की परियोजनाएं प्रारम्भ । सभी परियोजनाए अक्टूबर, 2017 तक पूर्ण करने का लक्ष्य रखा गया था 

15. भामाशाह योजना ( Bamashah scheme ):-

भामाशाह योजना, महिलाओं को वित्तीय सशक्तिकरण ओर स्वतंत्रता की दिशा मे एक बड़ा कदम हैं इस योजना का शुभारंभ ( उदयपुर) माननीया मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे द्रारा 15 अगस्त, 2014 को किया।

उदयपुर की शांता बाई को पहला कार्ड सोंपा। यह योजना महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा मे एक नई शुरुआत हैं।

समग्र वितीय समावेशन की प्राप्ति के लिए राज्य मे उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक बुनियादी ढांचे का लाभ लेते हुए केन्द्रीयकृत ई- शासन प्लेटफॉर्म के माध्यम से सरकार की प्रायोजित योजनाओं का परिवार और व्यक्ति आधारित लाभो के अन्तिम रुप से वितरण के लिए राज्य के सभी परिवारो के कोर-बैंकिंग समर्थित बैक खाते खोले जाकर उनके घर के नजदीक या बैक खाते मे निर्बाध रूप से सीधे लाभ हस्तांतरित किए जायेंगे।

इस योजना के तहत दिसम्बर,2014 तक 9,821 भामाशाह नांमाकन कैम्प आयोजित कर राज्य के 51.70 लाख परिवारों के 1.59 करोड़ व्यक्तियों का नामांकन किया जा चुका है।

भामाशाह योजना के मुख्य बिन्दु:-

  • परिवार का बैक खाता परिवार की महिला मुखिया के नाम पर होगा ओर परिवार को मिलाने वाले सभी सरकारी लाभ इस खाते मे जमा होगै।
  • भामाशाह योजना को प्रधानमंत्री जनधन योजना से जोड़कर बैको द्रारा ‘ रुपे कार्ड’ भी जारी किया जाएगा।
  • परिवार के सदस्य नकद लाभ प्राप्ति ई-मित्र, कियोस्क, राजस्थान सम्पर्क, आईटी केन्द्र व एटीएम से कट करेंगे।
  • भामाशाह कार्ड मे सूचना संशोधन की सुविधा की सुविधा ई- मित्र पर प्रारंभ की जाएगी।
  • महिला के नाम से बैक खाता खोले जाने पर सरकार द्रारा बतौर प्रोत्साहन 1500/-प्रति परिवार जमा कराए जाएंगे।
  • इस योजना के तहत चयनित परिवारो को ‘ भामाशाह कार्ड’ दिए जाएंगे।
  • कार्ड का परिचालन बायोमैट्रिक पहचान से होगा।

मुख्य उद्देश्य:-

  • ग्रामीण क्षेत्रो के सभी बीपीएल, लघु व सीमांत कृषक तथा चिह्नित एस.सी.-एस.टी. परिवारों को बैकिंग सुविधाओं से जोड़ना।
  • योजना मे निम्न योजनाएं शामिल होगी:- मनरेगा जाॅब कार्ड, राशन कार्ड, जननी सुरक्षा, इंदिरा आवास योजना, खाद्य सुरक्षा योजना, जन श्री बीमा योजना, राजस्थान सामाजिक सुरक्षा योजना ओर छात्रवृति योजनाएं

Note – अब इसे राज्य सरकाार ने

16. सुकन्या समृद्धि योजना ( Sukanya Samriddhi Account ):- 

इस योजना के तहत 0 से 10 वर्ष की आयु तक की कन्याओं के खाते सरकारी बैक या डाकघर मे न्यूनतम 1000 रुपय मे खोले जाएंगे। इस पर 9.1 %का सालाना ब्याज मिलेगा।

इसके तहत अभिभावकों को 1000 रुपया प्रतिमाह 14 वर्ष तक जमा कराना होगा। खाता 21 वे साल मे परिपक्व होगा वैसे बेटी के 18 वर्ष पूरे होने पर 50% धनराशि निकालने का प्रावधान भी है।

एक परिवार की अधिकतम दो लड़कियों का ही अकाउंट इस स्कीम के तहत खुलवाया जा सकता हैं। आवेदन पत्र के साथ कन्या का जन्म प्रमाण पत्र लगाना अनिवार्य हैं। इसके साथ ही पिता या माँ का पहचान पत्र भी जरूरी है।

राजस्थान मे यह योजना 4 फरवरी,2015 से शुरू हुई है। इस योजना मे एक वित्तीय वर्ष मे 1000 से लेकर अधिकतम एक लाख 50 हजार रुपय तक राशि जमा की जा सकेगी।

17. प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना ( Pradhan Mantri Jeevan Jyoti Bima Yojana )-

इस योजना की घोषणा केन्द्रीय बजट 2015-16 मे की गई। इस योजना के तहत केन्द्र सरकार ने 18 से 50 वर्ष तक के लोगों का 330 रुपय के सालाना प्रीमियम पर बीमाधारक की मौत होने पर आश्रित को दो लाख रुपय का जीवन बीमा कवर देने का प्रस्ताव किया हैं 50 वर्ष की उम्र मे पहले पाॅलिसी लेने वाले इसे 55 तक जारी रख सकेंगे।

इस योजना का लाभ उठा सकेंगे जिनका बैक मे खाता होगा। इसके लिए आधार नंबर होना भी जरूरी है। इस योजना के तहत लोग एक साल के लिए या दीर्घावधि के लिए भी पाॅलिसी ले सकेंगे।

प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना 1अप्रैल 2015 से लागू-: प्रदेश मे 70लाख परिवारों के लिए स्वास्थ्य बीमा योजना एक अप्रैल, 2015 से लागू।

18. चिराली योजना ( Chirali scheme )

प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में महिला सुरक्षा के लिए राज्य सरकार द्वारा 26 सितंबर 2017 को चिराली योजना का शुभारंभ किया गया। महिला व बाल विकास विभाग द्वारा जवाहर कला केंद्र में योजना का लोकार्पण किया गया।

चिराली योजना के तहत गावों में महिला सु3के लिए वॉलीन्टियर्स लगाए जायेंगे। महिलाओं के प्रेशर ग्रुप बनाए जाएंगे।

  • योजना की शुरुआत सबसे पहले 7 जिलों में की जा रही है- बांसवाड़ा, भीलवाड़ा, बूंदी, जालौर, झालावाड, नागौर, प्रतापगढ़
  • मुख्य उद्देश्य – महिला हिंसा की रोकथाम तथा समाज में स्थिति बेहतर करना।

19. राष्ट्रीय पोषण मिशन ( National nutrition mission )

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अंतरास्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च,2018 को राजस्थान के झुँझुनू में ‘राष्ट्रीय पोषण मिशन’ का सुभारम्भ किया। वर्ष 2017-18 से शुरू इस मिशन का गठन 9046.17 करोड़ रुपये के 3 साल के बजट से किया गया।

यह मिशन देश मे पोषण के स्तर को युद्ध स्तर पर बढ़ाने का एक समग्र प्रस्ताव है राष्ट्रीय पोषण मिसन का लक्ष्य बच्चो को बौनेपन,आवश्यकता से कम पोषण,खून की कमी ,जन्म के वक़्त बच्चो के कम वजन को क्रमशः 2%,2%,3%और 2%कम करना है। ।

इस मिशन के तहत2022 तक बौनेपन को 38.4 से घटाकर 25% तक लाना है इस कार्यक्रम में सभी राज्यो और जिलो की चरणबद्ध तरीके से यानी 2017-18में 315 जिलो ,2018-19 में 235 जिलो और 2019-20में शेष जिलो को शामिल किया जाएगा

20. अनुप्रति योजना ( Anuprati Yojana )

राजस्थान सरकार ने 2005 में राज्य के अनुसूचित जाति और जन जाति/ अल्प आय (2 लाख से कम)/ BPL परिवारों के लिए अनुप्रति योजना की शुरुआत की। यह योजना राज्य के समाज कल्याण विभाग द्वारा चलाई जाएगी।

इस योजना को तीन भागो में बांटा गया है:

  • अनुप्रति_योजना-1: UPSC ने द्वारा आयोजित_सिविल सेवा परीक्षा हेतु)।
  • अनुप्रति_योजना-2: RPSC द्वारा आयोजित राज्य एवं अधीनस्थ सेवा (सीधी भर्ती) परीक्षा हेतु।
  • अनुप्रति_योजना-3: IITs, IIMs एवं राष्ट्रीय स्तर के मेडीकल कॉलेजों में प्रवेश हेतु अनुदान राशि।

अनुप्रति_योजना का लक्ष्य ( Goal of Anuprati Yojana Goal )- गरीब और अल्प आय वाले विद्यार्थियों को बड़ी नौकरी के लिए प्रोत्साहित करना।

अनुप्रति_योजना का  उद्देश्य ( Purpose of Anuprati Yojana) :

  • अल्प आय वाले को बड़ी नौकरी लिए उत्साह देना।
  • प्रारम्भिक, मुख्य और अंतिम चयन के हिसाब से छात्रवर्ती देना।
  • अनुसूचित जाति वर्ग को आर्थिक सहयोग देना।

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September 28, 2020

Rajasthan Economic प्रमुख विकास परियोजनाएं

प्रमुख विकास परियोजनाएं

विकास परियोजनाएं

क्षेत्रीय एवं जनजाति विकास कार्यक्रम ( Regional and tribal development program )

सूखा संभाव्य (सूखा प्रभावित) क्षेत्र कार्यक्रम (DPAP)- यह कार्यक्रम 1974 -75 में केंद्र प्रवर्तित स्कीम के रूप में प्रारंभ किया गयाmइसकी वित्तीय व्यवस्था में केंद्र व राज्यों का 75: 25 रखा गया इस कार्यक्रम का उद्देश्य सूखे की संभावना वाले क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था में सुधार करना

इसके लिए भूमि व जल के उपलब्ध साधनों का सर्वोत्तम उपयोग किया जाता है ताकि इन क्षेत्रों में अकाल व सूखे के प्रतिकूल प्रभाव कम किए जा सके निम्न कार्यक्रमों पर बल दिया जाता है

  • मिट्टी में नमी का संरक्षण करना
  • जल संसाधनों का विकास
  • वृक्षारोपण करना

1982 -83 में इस कार्यक्रम के दायरे से वे खंड हटा दिए गए जो पहले मरू विकास कार्यक्रम के अंतर्गत शामिल थे वर्तमान में यह कार्यक्रम 11 जिलों अजमेर ,बांसवाड़ा ,बारा भरतपुर, डूंगरपुर, झालावाड़, करौली ,कोटा ,सवाई माधोपुर, टोंक,व उदयपुर के विभिन्न 32 खंडों में संचालित किया जा रहा है

1995 -96 इस कार्यक्रम के अंतर्गत भरतपुर जिले का डीग अजमेर जिले का भिनाय खंड शामिल करने का प्रस्ताव किया गया था इस कार्यक्रम के अंतर्गत जनजाति जिलों में डूंगरपुर बांसवाड़ा जिले के समस्त खंड शामिल किए गए लेकिन अन्य जिलों से कुछ चुने हुए खंड ही शामिल किए गए हैं DPAP के माध्यम से भू संरक्षण नई संरक्षण सिंचाई विकास वृक्षारोपण के कार्यों पर प्रतिवर्ष धनराशि की जाती है

मरू विकास कार्यक्रम ( Desert Development Programme- DDP )

यह केंद्र चालित स्कीम है और वर्ष 1985 -86 से इसका संपूर्ण व्यय भारत सरकार वहन करने लगी है यह कार्यक्रम 1977 -78 में राष्ट्रीय कृषि आयोग की सिफारिशों के आधार पर चालू किया गया था इसका उद्देश्य मरुस्थल को आगे बढ़ने से रोकना एवं इन क्षेत्रों के लोगों की आर्थिक दशा को सुधारना है

1 अप्रैल 1995 से यह कार्यक्रम निम्न 16 मरू जिलों के 85 खंडों में संचालित किया जा रहा है  अजमेर ,जयपुर ,सिरोही, राजसमंद ,उदयपुर, बीकानेर, बाड़मेर ,जोधपुर, जालौर’ नागौर, चुरू, पाली ,गंगानगर, जैसलमेर, सीकर ,झुंझुनू

वर्ष 1995 -96 से यह कार्यक्रम जल ग्रहण क्षेत्र /क्लस्टर /इंडेक्स कैचमेंट आधार पर संचालित किया जा रहा है । और 500 हेक्टेयर के एक माइक्रो जल ग्रहण प्रोजेक्ट पर प्रति हेक्टेयर ₹5000 की लागत आंकी गई है जिसे 4 वर्ष में पूरा करने पर बल दिया गया है इस योजना के अंतर्गत कृषि वानिकी (चारा व चराई साधनों) का विकास

  • पशुपालन में भेड़ पालन का विकास
  • पशुओं के लिए पेयजल की पूर्ति की व्यवस्था
  • लघु सिंचाई (भूजल के विकास सहित)
  • ग्रामीण विद्युतीकरण

वर्तमान में काफी वाटर सेट प्रोजेक्ट का कार्य प्रगति पर है (जल ग्रहण परियोजनाएं)

जनजाति क्षेत्रीय विकास कार्यक्रम ( Tribal Area development program- TADP)

2011 की जनगणना के अनुसार राजस्थान में 12 . 4 लाख जनजाति के लोग थे जो राज्य की कुल जनसंख्या का 13.5% अंश था जनजाति के व्यक्तियों को निम्न कार्यक्रमों के माध्यम से लाभान्वित किया जा रहा है

जनजाति उपयोजना

इसके अंतर्गत बांसवाड़ा, डूंगरपुर ,चित्तौड़गढ़, उदयपुर व सिरोही जिलों की 23 पंचायत समिति आती है राज्य की कुल जनजाति खबर 94 . 4 लाख लोगों में से काफी लोग जनजाति उपयोजना क्षेत्र में आते हैं इसमें 4409 गांव शामिल है

जनजाति उपयोजना 1974- 75 से आरंभ की गई मुख्य कार्यक्रम इस प्रकार है सिंचाई ,विद्युत ,फल विकास, बेर बेडिंग, डीजल पंपिंग से सामुदायिक सिंचाई, बीज व उर्वरक वितरण ,फार्म वानिकी आदि

जनजाति के व्यक्तियों के लिए व्यवसायिक प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई है  विद्यार्थियों को स्टाइपेंड भी दिया जाता है  भविष्य में छात्रावास के निर्माण पर विशेष बल दिया जाएगा

1999 -2000 से राज्य में जनजाति विकास की महाराष्ट्र प्रणाली लागू करने का निर्णय लिया गया था प्रारंभ में 13 विभागों की राज्य योजना मद की 8% राशि का एक जनजाति विकास कोष बनाया गया

2013 -14 के बजट में अनुसूचित जनजाति छात्रावास आश्रम छात्रावास एवं आवासीय विद्यालयों में रह रहे छात्रों का मैस भत्ता1750 रुपए मासिक किया गया था

परिवर्तित क्षेत्र विकास दृष्टिकोण MADA

इसमें 13 जिलों के 2939 गांव में 44 समूहों के जनजाति के लोग शामिल है अलवर धौलपुर भीलवाड़ा बूंदी चित्तौड़गढ़ उदयपुर झालावाड़ कोटा पाली सवाई माधोपुर सिरोही टोंक जयपुर इस कार्यक्रम के लिए विशेष केंद्रीय सहायता प्राप्त होती है

यह कार्यक्रम 1978 -79 से प्रारंभ किया गया है इसमें व्यक्तिगत लाभ पहुंचाने वाली स्कीम में शामिल की गई है माडा में शैक्षणिक विकास पर भी ध्यान दिया जाता है

सहरिया विकास कार्यक्रम ( Sahria Development Program )

1977 से आरंभ किया गया इसमें बारा जिले की शाहाबाद व किशनगंज पंचायत समितियों के 50000 लोग शामिल है जो 435 गांव में फैले हुए हैं कार्यक्रम के लिए केंद्रीय सहायता मिलती है राज्य की योजना में भी इसके लिए प्रावधान किया जाता है

कृषि पशुपालन कुटीर उद्योग वानिकी शिक्षा पोषण पेयजल ग्रामीण विकास आदि पर धनराशि दी जाती है 2011 में सहरिया परिवार के बच्चों के लिए आवासीय विद्यालय का निर्माण करवाने और 50 नए मां बाडी शिक्षा केंद्र स्थापित करने का कार्यक्रम प्रस्तावित किया गया

एक ITI की स्थापना करने महिलाओं के स्वयं सहायता समूह को ब्याज अनुदान देने रीको द्वारा कृषि प्रसंस्करण, विशेष उत्पादों के लिए एक नया औद्योगिक क्षेत्र स्थापित करने पर बल दिया गया था

वर्ष 2011 में उदयपुर जिले की कथोड़ी जनजाति के लिए 200 आवासीय भवनों के निर्माण की योजना प्रारंभ की गई थी, कथोड़ी बस्तियों में मां बाड़ी केंद्र स्थापित करना प्रस्तावित है

जनजाति युवाओं को स्वरोजगार हेतु ₹10000 का अनुदान दिया गया, राजीव गांधी ट्राइबल विश्वविद्यालय उदयपुर में स्थापित किया जाएगा

मानगढ़ धाम में शहीद स्मारक बनाया जाएगा, कृषकों को ट्राइबल सब प्लान के तहत उन्नत बीज उर्वरक आरक्षण हेतु दवाइयां उपलब्ध करवाई जाएगी इस कार्यक्रम पर ₹27 करोड़ के व्यय का अनुमान है

बिखरी जनजाति के लिए विकास कार्यक्रम

यह 1979 से प्रारंभ किया गया था इसका संचालन जनजाति क्षेत्र विकास विभाग द्वारा किया जाता है विभिन्न जिलों में इसकी संख्या 14. 3लाख आंकी गई है इसके लिए शिक्षा स्वास्थ्य आवास हॉस्टल विशेषतया लड़कियों के लिए निशुल्क पोशाके पुस्तकें छात्रवृत्ति परीक्षा पूर्व प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना आदि कार्य किए जाते हैं

पेंशन योजनाएं ( Pension plans )

राजस्थान की राज्य सरकार ने प्रदेश के वरिष्ठ नागरिको के लिए मुख्यमंत्री पेंशन योजना (Chief Minister Pensions Scheme) की शुरुआत की है | यह योजना सभी वर्ग आयु के व्यक्ति के लिए शुरू की गई है |

इस योजना को विभिन्न वर्गों में बांटा गया है | सरकार द्वारा योजना को जारी करने का उद्देश्य यह है “सबका रखा ध्यान, किया सबका सम्मान, राजस्थान सरकार कि यही पहचान” |

 इन पेंशन योजना में पेंशन को बढ़ा दिया गया है | इस योजना को राज्य में 1 जुलाई, 2017 से लागू किया गया |

राजस्थान में जारी विभिन्न पेंशन योजना :-
  • मुख्यमंत्री एकल नारी सम्मान पेंशन योजना ( Chief Minister Ekal Nari Samman Pension Scheme)
  • मुख्यमंत्री विशेष योग्यजन सम्मान पेंशन योजना ( Chief Minister Special Salvation Pensions Scheme )
  • मुख्यमंत्री वृद्धजन सम्मान पेंशन योजना ( Chief Minister’s Old Age Honor Pension Scheme )

मुख्यमंत्री एकल नारी सम्मान पेंशन योजना ( Chief Minister Ekal Nari Samman Pension Scheme):- 

यह पेंशन योजना राजस्थान सरकार ने राज्य की विधवा, परित्यक्त एवं तलाकशुदा पेंशनर्स को लाभ देने के लिए शुरु की | इस योजना में सभी को आयुवर्ग अनुसार लाभ दिया जाएगा | इस योजना में चयनित लोगो को आयु के मुताबिक दो दो वर्गों में बांटा गया है |

आयु पेंशन प्रति माह पेंशन में बढ़ोत्तरी
  • 60 वर्ष से अधिक आयु और 75 से कम आयु 500 रुपये 1000 रुपये
  • 75 वर्ष या अधिक 750 रुपये 1500 रुपये

मुख्यमंत्री विशेष योग्यजन सम्मान पेंशन योजना ( Chief Minister Special Salvation Pensions Scheme ) :

यह योजना सरकार में जन्म से 75 वर्ष आयु तक के लोगो के लिए शुरू की है | इस योजना में जन्म से 8 वर्ष तक की आयु वाले बच्चो के लिए पेंशन शुरू की है | आयु पेंशन प्रति माह पेंशन में बढ़ोत्तरी

  • 8 से 75 वर्ष आयु 500 रुपये 750 रुपये
  • जन्म से 8 वर्ष तक 250 रुपये 750 रुपये
मुख्यमंत्री वृद्धजन सम्मान पेंशन योजना( Chief Minister’s Old Age Honor Pension Scheme ) :

सरकार ने यह पेंशन योजना केवल वरिष्ठ नागरिको के लिए शुरू की गई है | यह योजना में 75 वर्ष के बुज़ुर्गो के लिए है |आयु पेंशन प्रति माह

  • 75 वर्ष से कम 500 रुपये
  • 75 वर्ष से अधिक आयु 750 रुपये

ग्रामीण व नगरीय विकास योजनाएं ( Rural and Urban Development Schemes)

भौगोलिक एवं प्राकृतिक भू-भाग को समाज वैज्ञानिकों ने विविध आधारों पर बाँटा हैं-: महाद्वीप एवं महादेशीय आधार पर वर्गीकरण, राष्ट्र-राज्यों के आधार पर वर्गीकरण, सामाजिक-आर्थिक प्रणालियों के आधार पर वर्गीकरण, इत्यादि।

समाज ऐतिहासिक विकास की प्रक्रिया को आधार बनाकर विश्व के भू-भागों को दो श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है ग्रामीण क्षेत्र एवं नगरीय क्षेत्र। नगर, नगरीयता एवं नगरीकरण की अवधारणा आज वैष्विक स्तर पर दुनिया की लगभग आधी आबादी नगरीय क्षेत्रों में निवास कर रही है।

लेकिन विश्व के नगरीय रुपान्रतण का प्रतिमान अलग-अलग राष्ट्रों में समरुपीय नहीं है। एक ओर जहाँ विकसित देश- अमेरिका, यूरोप की भाँति लैटिन अमरीका एवं कैरिबियन द्वीप समूह में लगभग तीन चौथार्इ आबादी नगरीय क्षेत्रों में रह रही है।

वहीं दूसरी ओर भारत, चीन, इंडोनेशिया एवं अफ्रीका में लगभग दो-तिहार्इ आबादी अभी ग्रामीण क्षेत्रों में ही रह रही है। अरब राष्ट्रों की लगभग आधी आबादी ग्रामीण एवं शेष आधी नगरीय आबादी का प्रतिमान अलग-अलग क्षेत्रोंमें भिन्न-भिन्न है।

नगर : ‘नगरीय क्षेत्र‘ या ‘नगर’ कया है? इस शब्द का प्रयोग दो अर्थ में होता है-जन सांख्यिकीय रुप में और समाजशास्त्रीय रुप में। पहले अर्थ में जनसंख्या के आकार, जनसंख्या की सघनता, और दूसरे अर्थ में विशमता, अवैयक्तिकता, अन्योन्याश्रय, और जीवन की गुणवत्ता पर ध्यान केन्द्रित रहता है।  जर्मन समाजशास्त्री टोनीज (1957) ने ग्रामीण और नगरीय समुदायों में भिन्नता सामाजिक संबंधो और मूल्यों के द्वारा बतार्इ है।

ग्रामीण – 

गेमिनषेफ्ट समुदाय वह है जिसमें सामाजिक बन्धन कुटुम्ब और मित्रता के निकट के व्यक्तिगत बंधनोंपर आघारित होते हैं और परम्परा, सामंजस्य और अनौपचारिकता पर बल दिया जाता है जबकि नगरीय गैसिलशेफ्ट समाज में अवैयक्तिक और द्वितीयक संबंध-प्रधान होते हैं और व्यक्तियों में विचारों का आदान-प्रदान औपचारिक, अनुबन्धित और विशेष कार्य या नौकरी जो वे करते हैं

उन पर आधारित होते हैं। गैसिलशेफ्ट समाज में उपयोगतावादी लक्ष्यों और सामाजिक संबंधों के प्रतिस्पर्द्धा के स्वरुपपर बल दिया जाता है।

मैक्स वेबर (1961:381) और जार्ज सिमल (1950) जैसे अन्य समाजषास्त्रियों ने नगरीय वातावरण में सघन आवासीय परिस्थितियों, परिवर्तन में तेजी, और अवैयक्तिक अन्त:क्रिया पर बल दिया है।

लुर्इस वर्थ ने कहा है कि समाजशास्त्रीय उद्देश्यों के लिये एक नगर की यह कह कर परिभाषा की जा सकती है कि वह सामाजिक रुप से पंचमेल/विशमरुप व्यक्तियों की अपेक्षाकृत बड़ी, सघन, और अस्थार्इ बस्ती है। रुथ ग्लास (1956) जैसे विद्वानों ने नगर को जिन कारकों द्वारा परिभाशित किया है

वे हैं जनसंख्या का आकार, जनसंख्या की सघनता, प्रमुख आर्थिक व्यवस्था, प्रशासन की सामान्य रचना, और कुछ सामाजिक विशेषतायें।भारत में ‘कस्बे’ की जनगणना की परिभाषा1950-51 तक लगभग एक ही रही, परन्तु 1961 में एक नर्इ परिभाषा अपनार्इ गर्इ।

1951 तक, ‘कस्बे’ में सम्मिलित थे:

  • मकानों का संग्रह जिनमें कम सेकम 5000 व्यक्ति स्थार्इ रुप से निवास करते हैं
  • प्रत्येक म्युनिसिपेलिटि/ कार्पोरेषन/किसी भी आकार का अधिसूचित क्षेत्र,
  • सब सिविल लाइनें जो म्यूनिसिपल इकार्इयों में सम्मिलित नहीं हैं।

इस प्रकार कस्बे की परिभाषा में प्रमुख फोकस जनसंख्या के आकार पर न होकर प्रशासनिक व्यवस्था पर अधिक था। 1961 में किसी स्थान को कस्बा कहने के लिये कुछ मापदण्ड लगाये गये।ये थे:

  • कम से कम 5000 की जनसंख्या
  • 1000 व्यक्ति प्रति वर्ग मील से कम की सघनता नहीं
  • उसकी कार्यरत जनसंख्या का तीन-चौथार्इ गैर-कृषिक गतिविधियों में होनी चाहिये
  • उस स्थान की कुछ अपनी विशेषतायें होनी चाहिये और यातायात और संचार, बैंकें, स्कूलों, बाज़ारों, मनोरंजन केन्द्रों, अस्पतालों, बिजली, और अखबारों आदि की नागरिक सुख सुविधायें होनी चाहिये।

परिभाषा में इस परिवर्तन के फलस्वरुप 812 क्षेत्र (44 लाख व्यक्तियों के) जो 1951 की जनगणना में कस्बे घोषित किये गये थे  उन्हें 1961 की जनगणना में कस्बा नहीं माना गया।

1961 का आधार 1971, 1981, 1991 की जनगणनाओं में भी कस्बे की परिभाषा करते समय अपनाया गया अब जनसांख्यिकीय रुप में उन क्षेत्रों को जिनकी जनसंख्या 5000 और 20000 के बीच है छोटा कस्बा माना जाता है, जिनकी 20000 और 50000 के बीच है उन्हे बड़ा कस्बा माना जाता है।

जिनकी जनसंख्या 50000 और एक लाख के बीच है, उन्हें शहर कहा जाता है, जिनकीएक लाख और 10 लाख के बीच उन्हे बड़ा “शहर कहा जाता है,

नगरीयता: लुर्इस वर्थ (1938:49) ने नगरीयता की चार विशेषतायें बतलार्इ हैं:

  • स्थायित्व: एक नगर निवासी अपने परिचितों को भूलता रहता है और नये व्यक्तियों से संबन्ध बनाता रहता है। उसके पड़ोसियों से एवं क्लब आदि जैसे समूहों के सदस्यों से अधिक मैत्रीपूर्ण संबन्ध नहीं होते इसलिये उनके चले जाने से उसे कोर्इ चिन्ता नहीं होती
  • सतहीपन: एक नागरिक कुछ ही व्यक्तियों से बातचीत करता है और उनसे भी उसके संबन्ध अवैयक्तिक और अनौपचारिक होते हैं।

ग्रामीण विकास कार्यक्रम एवं उनका श्रेणीगत विभाजन कार्य क्रम लागू वर्ष:-

प्रथम पंचवर्षीय योजना ( First five year plan )

  • सामुदायिक विकास कार्यक्रम 1952.
  • राष्ट्रीय विस्तार सेवा1953

द्वितीय पंचवर्षीय योजना ( Second Five Year Plan ):-

  • खादी एवं ग्राम उद्योग आयोग 1957
  • बहुद्देशीय जनजातीय विकास प्रखण्ड 1959
  • पंचायती राज संस्था 1959
  • पैकेज कार्यक्रम 1960
  • गहन कृषि विकास कार्यक्रम 1960

तृतीय पंचवर्षीय योजना ( Third Five Year Plan )

  • व्यावहारिक पोशाहार कार्यक्रम 1960
  • गहन चौपाया पशु विकास कार्यक्रम 1964
  • गहन कृषि क्षेत्र कार्यक्रम 1964
  • उन्नत बीज किस्म योजना 1966
  • राष्ट्रीय प्रदर्शन कार्यक्रम  1966 वार्शिक योजना
  • कृषक प्रशिक्षण एवं शिक्षा कार्यक्रम 1966
  • कुँआ निर्माण योजना 1966
  • वाणिज्यिक अनाज विशेष कार्यक्रम 1966
  • ग्रामीण कार्य योजना 1967
  • अनेक फसल योजना 1967
  • जनजातीय विकास कार्यक्रम 1968
  • ग्रामीण जनषक्ति कार्यक्रम 1969
  • महिला एवं विद्यालय पूर्व शिक्षण हेतु समन्वित योजना 1969

चतुर्थ पंचवर्षीय योजना ( fourth five year plan ):

  •  ग्रामीण नियोजन हेतु कार्यक्रम 1971
  • लघु कृशक विकास एजेन्सी 1971
  • सीमान्त कृषक एवं भूमिहीन मजदूर परियोजना एजेन्सी 1971
  • जनजातीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम 1972
  • जनजातीय विकास पायलट परियोजना 1972
  • पायलट गहन ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम 1972
  • न्यूनतम आवष्यक कार्यक्रम 1972
  • सूखा उन्मुख क्षेत्र कार्यक्रम 1973
  • कमाण्ड क्षेत्र विकास कार्यक्रम 1974

पंचम पंचवर्षीय योजना ( 5th Five Year Plan):

  • समन्वित बाल विकास सेवा 1975
  • पर्वतीय क्षेत्र विकास एजेन्सी 1975
  • बीस सूत्रीय आर्थिक कार्यक्रम 1975
  • विशेष पशु समूह उत्पादन कार्यक्रम 1975
  • जिला ग्रामीण विकास एजेन्सी 1976
  • कार्य हेतु अन्य येाजना 1977
  • मरुस्थल क्षेत्र विकास कार्यक्रम 1977
  • सम्पूर्ण ग्राम विकास योजना 1979
  •  ग्रामीण युवा स्वरोजगार प्रशिक्षण कार्यक्रम 1979

षष्ठम पंचवर्षीय योजना (Sixth Five Year Plan):

  • समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम1980
  • राष्ट्रीय ग्रामीण नियोजन कार्यक्रम1980
  • ग्रामीण महिला एवं शिशु विकास कार्यक्रम 1983
  • ग्रामीण भूमिहीन नियोजन प्रतिभू कार्यक्रम 1983
  • इन्दिरा आवास योजना1985

सप्तम पंचवर्षीय योजना ( Seventh year plan )

  • मातृत्व एवं षिषु स्वास्थ्य कार्यक्रम1985
  • सार्वभौमिक टीकारण कार्यक्रम

राजस्थान सरकार की सभी महत्वपूर्ण योजना ( All important plans of Rajasthan government )

  • देवनारायण गुरुकुल योजना – एससीएसटी व विशेष पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थियों के निजी विद्यालय में पढ़ने के लिए
  • मुख्यमंत्री शहरी जन कल्याण योजना – शहरी क्षेत्रों में घरो का निर्माण
  • प्रथम गौ सखी गौ पुत्री योजना – गोसेवा गोरक्षा से महिला वर्ग को जोड़ने के लिए
  • श्रमिक कार्ड योजना –  श्रमिकों को कार्ड बनाने के लिए
  • दक्षता विकास प्रशिक्षण योजना – अनुसूचित जाति के बीपीएल परिवार के लिए
  • वरिष्ठ उपाध्याय योजना – महिलाओं की शिक्षा में सुधार के लिए
  • छात्रवृति योजना – जनजाति वर्ग के विद्यार्थियों को शिक्षा के प्रति प्रोत्साहित करने के लिए
  • छात्रगृह किराया योजना – राजकीय महाविद्यालय, विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं करने के लिए
  • मोटरयान प्रदूषण जांच केन्द्र योजना – वाहनों की प्रदूषण जांच नहीं कराने पर विभाग ने पैनल्टी वसूलने के लिए

  • मुख्यमंत्री उच्च शिक्षा छात्रवृत्ति योजना – स्कूली छात्राओं को शिक्षा के प्रति प्रोत्साहित करने के लिए
  • उत्तर मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना – विद्यार्थियों को आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए
  • भामाशाह रोजगार सृजन योजना – बेरोजगार नवयुवकों, महिलाओं अनुसूचित जाति जनजाति वर्ग के लोगों के लिए
  • दिशारी योजना – विद्यार्थियों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने और क्षमता संवर्धन के लिए
  • पंडित दीनदयाल उपाध्याय वरिष्ठ नागरिक तीर्थ यात्रा योजना – बुज़ुर्गो के लिए
  • देवनारायण छात्रा स्कूटी वितरण योजना – 12वीं कक्षा की अनुसूचित जाति/ जनजाति व विशेष पिछड़ा वर्ग की छात्राओं के लिए
  • वृद्धावस्‍था पेंशन योजना –  बुज़ुर्गो आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए
  • विद्यार्थी सुरक्षा दुर्घटना बीमा योजना – विद्यार्थियों को दुर्घटना में मृत्यु एवं शारीरिक क्षति होने पर माता- पिता व अभिभाव को बीमा राशि उपलब्ध

  • मुख्यमंत्री हमारी बेटी योजना – मेधावी विद्यार्थियों को फ्री शिक्षा का लाभ प्रदान करने के लिए
  • श्रमिक योजना – श्रमिकों के बच्चों को छात्रवृति प्रदान करने के लिए
  • पं. दीनदयाल उपाध्याय विशेष योग्यजन पंजीयन अभियान – प्रत्येक विशेष योग्यजन को निःशुल्क ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करने के लिए
  • मुख्यमंत्री विद्यादान कोष योजना राजस्थान – विद्या के लिए अधिक से अधिक राशि दान करने के लिए
  • निःशुल्क स्कूटी वितरण योजना – अनुसूचित जनजाति के छात्राओं के लिए निःशुल्क स्कूटी प्रदान करने के लिए
  • सोलर पम्प कृषि कनेक्शन योजना – किसानों को पर्याप्त बिजली प्रदान करने के लिए
  • मुख्यमंत्री विद्यादान कोष योजना – स्कूलों में भामाशाह द्वारा दान के लिए जागरूकता अभियान
  • सहकार जीवन सुरक्षा बीमा योजना – 79 वर्ष तक के किसानो के लिए
  • शिक्षा स्वरोजगार लोन योजना – अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति सहित स्वच्छकार वर्ग को स्वरोजगार के लिए
  • राजस्थान में मासिक नाट्य प्रदर्शन योजना – प्रति माह चतुर्थ शनिवार और रविवार को नाटक का नियमित रूप से प्रदर्शन करने के लिए

  • ई-ग्राम डिजिटल योजना – इनेबल्ड सेवाओं को आसान और उपयोगी बनाने के लिए
  • मुख्यमंत्री पेंशन योजना – सभी वर्ग आयु के व्यक्ति के लिए
  • ट्रांसपोर्ट वाउचर योजना – विद्यार्थियों को आर्थिक रूप से सहायता कर शिक्षा के प्रति प्रोत्साहन प्रदान करने के लिए
  • एमनेस्टी योजना – घरेलू श्रेणी के उपभोक्ताओं के लिए
  • उद्योग रत्न प्रोत्साहन योजना – सर्वश्रेष्ठ बुनकर एवं हस्तशिल्पियों को पुरस्कृत करने के लिए
  • सहयोग उपहार योजना – बीपीएल श्रेणी के परिवारों की बेटी की शादी के लिए
  • सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना – राज्य के नागरिकों के लिए
  • डोर-टू-डोर योजना – कचरा संग्रह करने के लिए
  • आपणां टाबर निःशुल्क योजना – शिक्षित बेरोज़गारो के लिए निःशुल्क शिक्षा देने के लिए
  • मुख्यमंत्री निःशुल्क कोचिंग योजना – मेधावी छात्रों के लिए मुफ्त कोचिंग
  • उपहार योजना – विधवा महिलाओ पुत्री की शादी के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए
  • स्वदेश दर्शन योजना – देश प्रमुख धार्मिक स्थलों पर यात्रा के लिए
  • साइकिल साझा योजना – छुट्टियां मनाने आए पर्यटकों को मुफ्त ने साइकिल प्रदान करने के लिए
  • भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना – सम्बन्धी सुविधाएं फ्री प्रदान करने के लिए
  • दीनदयाल उपाध्याय वरिष्ठ नागरिक तीर्थयात्रा योजना – वरिष्ठ नागरिकों के लिए
  • आम आदमी बीमा योजना – परिवार के सदस्यो की मदद के लिए
  • मुख्यमंत्री जन आवास योजना – गरीब और जरूरतमंद लोगों के लिए सस्ते घरों का वितरण
  • स्मार्ट सिटी योजना – आना सागर झील को आकर्षिक बनाने के लिए
  • स्वेच्छिक भार वृद्धि घोषणा योजना – किसानों को कृषि करने के लिए
  • बीपीएल परिवार छात्रवृत्ति योजना – 10वीं और 12वीं के मेधावी छात्रों को वित्तिय सहायता प्रदान करने के लिए

  • कन्या शादी सहयोग योजना – गरीब परिवारों की लड़कियों की शादी में मदद करने के लिए
  • मुख्यमंत्री कौशल विकास योजना – युवाओ में कौशल विकसित करने के लिए
  • निःशुल्क कोचिंग कक्षाएँ योजना – 12वी बोर्ड विज्ञान वर्ग के विद्यार्थियों के लिए
  • राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम – किशोर स्वास्थ से सम्बंधित चिकित्सा परामर्श के लिए
  • सरस सुरक्षा कवच बीमा योजना – दुग्ध उत्पादकों को बीमा लाभ देने के लिए
  • क्लिक योजना – शिक्षा के स्तर में सुधार के लिए
  • अन्नपूर्णा रसोई योजना – कम व सस्ती दरों पर खाना उपलब्ध करने के लिए
  • अकृषि उद्यम ऋण योजना – फर्नीचर एवं फिक्सचर तथा कार्यशील पुंजि हेतु ऋण सुविधा करने के लिए
  • अम्बेडकर अंतर्राष्‍ट्रीय स्कॉलरशिप योजना – अनुसूचित जाति वर्ग के प्रतिभावान विधार्थियों को आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए
  • भामाशाह सृजन योजना – बेरोज़गारो को लोन प्रदान करने के लिए
  • किस्मत योजना – किसानों को समृद्ध और उन्नत बनाने के लिए

  • शुभ शक्ति योजना – श्रमिकों के हितों की रक्षा और अविवाहित महिलाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए
  • लैपटॉप वितरण योजना – मेधावी छात्रों को निशुल्क लैपटॉप वितरण करने के लिए
  • मुख्यमंत्री राजश्री योजना – शिक्षा के प्रति प्रोत्साहित करने हेतु एवं बालिका के शैक्षणिक स्तर में सुधार के लिए
  • मुख्यमंत्री जनजाति जलधारा योजना – जनजाति क्षेत्रों में कृषकों को ऋण उपलब्ध करने के लिए
  • मुख्यमंत्री नि:शुल्क दवा योजना – पेंशनर्स को नि:शुल्क दवाइयाँ वितरण करने के लिए

विकास परियोजनाएं विकास परियोजनाएं विकास परियोजनाएं विकास परियोजनाएं विकास परियोजनाएं विकास परियोजनाएं विकास परियोजनाएं विकास परियोजनाएं विकास परियोजनाएं विकास परियोजनाएं विकास परियोजनाएं विकास परियोजनाएं

September 27, 2020

Rajasthan Economy आधारभूत-संरचना एवं संसाधन

राजस्थान की आधारभूत-संरचना एवं संसाधन

संसाधन

संसाधन ( Resources) :-

हमारे पर्यावरण में उपलब्ध हर वह वस्तु जो हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये इस्तेमाल की जा सकती है जिसे बनाने के लिए हमारे पास प्रौद्योगिकी है और जिसका इस्तेमाल सांस्कृतिक रूप से मान्य है., उसे संसाधन कहते हैं।

संसाधन के प्रकार ( Types of resources ):- 

संसाधन को विभिन्न आधारों पर विभिन्न प्रकारों में बाँटा जा सकता है; जो नीचे दिये गये हैं

A.उत्पत्ति के आधार पर ( On the basis of origin )-: जैव और अजैव संसाधन ( Bio and Abiotic Resources )

B.समाप्यता के आधार पर ( On the basis of termination )-: नवीकरण योग्य और अनवीकरण योग्य संसाधन ( Renewable and non-renewable resources)

C.स्वामित्व के आधार पर( On the basis of ownership)-: व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संसाधन

D.विकास के स्तर के आधार पर:- संभावी, विकसित भंडार और संचित कोष

उत्पत्ति के आधार पर संसाधन के प्रकार ( Types of Resources based on Origin ):-

  • जैव संसाधन:-जो संसाधन जैव मंडल से आते हैं उन्हें जैव संसाधन कहते हैं  उदाहरण:- मनुष्य, वनस्पति, मछलियाँ, प्राणिजात, पशुधन, आदि।
  • अजैव संसाधन: जो संसाधन निर्जीव पदार्थों से आते हैं उन्हें अजैव संसाधन कहते हैं। उदाहरण: मिट्टी, हवा, पानी, धातु, पत्थर, आदि।

ऊर्जा ( Energy )

किसी भी देश के आर्थिक विकास में ऊर्जा ( Energy) एक महत्वपूर्ण संसाधन है। भारत में विद्युत का विकास उन्नीसवीं सदी के अंत में शुरू हुआ।

  • जब देश का पहला जल विद्युत गृह 1897 में दार्जिलिग में सिदापोंग में स्थापित किया गया।
  • 1909 में कर्नाटक में शिव समुद्रम में पनबिजली केंद्र ने कार्य प्रारंभ किया।
  • बिजली आपूर्ति अधिनियम 1948 में पारित किया गया।
  • संविधान में विद्युत को समवर्ती सूची में स्थान दिया गया है।

राजस्थान निर्माण के समय 15 छोटे विद्युत गृह थे जिनकी कुल स्थापित विद्युत क्षमता मात्र 13.27 मेगावाट थी।

राजस्थान_में विद्युत विकास हेतु 1 जुलाई 1957 को राजस्थान राज्य विद्युत मंडल की स्थापना के साथ प्रारंभ हुए।

राजस्थान देश का पहला राज्य है जिसने अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगी निविदा के आधार पर विद्युत उत्पादन के क्षेत्र में विभिन्न राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों को आशय पत्र जारी किए।

देश में ऊर्जा क्षेत्र सुधार कार्यक्रम के लिए केंद्र सरकार द्वारा विद्युत नियामक आयोग अधिनियम 1998 बनाया गया।

राजस्थान_विद्युत नियामक आयोग( Rajasthan Electricity regulatory Commission) का गठन 2 जनवरी 2000 को किया गया। जिस के प्रथम अध्यक्ष श्री अरुण कुमार थे।

राजस्थान_सरकार ने राजस्थान विद्युत क्षेत्र सुधार अधिनियम 1999 पारित करवाया जो 1 जून 2000 से लागू किया गया। राज्य सरकार द्वारा राज्य में विद्युत तंत्र के सुधार एवं उपभोक्ता को विद्युत आपूर्ति उपलब्ध कराने के उद्देश्य से दिनांक 19 जून 2000 को 5 विद्युत कंपनियों का गठन किया गया था।

अक्षय ऊर्जा ( Akshay Energy )

माह दिसम्बर 2017 की स्थिति निम्न है-

  • सौर ऊर्जा – 2258.50 मेगावॉट के सौर ऊर्जा संयंत्र अधिष्ठापित हो चुके है।
  • पवन ऊर्जा- 4292.5 मेगावाट के पवन ऊर्जा संयंत्र स्थापित हो चुके है।
  • बायोमास ऊर्जा – 120. 45 मेगावाट के 13 जैविक द्रव्य ऊर्जा संयंत्र स्थापित हो चुके है।

विद्युतीकृत गांवों की संख्या- 43264

विद्युत (Electricity )–

राज्य में दिसम्बर 2017 तक विद्युत की अधिष्ठापित क्षमता 19536. 77 मेगावाट होगयी है। मार्च 2012 में विद्युत की उपलब्धता 5005.38 करोड युनिट थी जो कि बढकर मार्च 2017 तक 6922.10 करोड युनिट हो गयी।

2011 – 12 से 2016-17 तक कुल ऊर्जा उपलब्धता में 38.29%की वृद्धि हुई जबकि कुल शुद्ध ऊर्जा उपभोग में भी 49.33%की वृद्धि हुई।

नवगठित 5 कंपनियां:-

  • राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड। (RVUNL). मुख्यालय: जयपुर।
  • राजस्थान राज्य विद्युत प्रसारण निगम लिमिटेड (RVPNL)।
  • जयपुर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड(JVVNL) मुख्यालय: जयपुर ।
  • अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (AVVNL) मुख्यालय: अजमेर
  • जोधपुर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (JVVNL) मुख्यालय: जोधपुर।

जयपुर, अजमेर एवं जोधपुर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड की परियोजनाएं

1. उज्वल डिस्कॉम एश्योरेंस योजना ( उदय) –

भारत सरकार द्वारा राज्य की विद्युत वितरण कंपनियों के परिचालन और वित्तीय रूप से दक्षता में सुधार लाने के उद्देश्य से उज्वल डिस्कॉम एश्योरेंस योजना को आरंभ किया गया औसत तकनीकी व वाणिज्य की हानि के आधार पर डिस्कॉम के संचालन व वित्तीय भार को कम करने एवं प्रति यूनिट खर्च व राजस्व प्राप्ति के अंतर को कम करने के उद्देश्य से ऊर्जा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 20 नवंबर 2015 को उदय योजना अधिसूचित की गई

राजस्थान सरकार द्वारा उदय योजना के अंतर्गत 27 जनवरी 2016 को किए गए एम ओ यू के अनुसार 30 सितंबर 2015 को बकाया ॠण राशि के 75%भार का 2 वर्षों के लिए 50% वित्तीय वर्ष 2015 -16 एवं 25% 2016-17 में वहन किया जाना है

2. दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना

दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्र के लिए प्रस्तावित प्रमुख योजनाएं हैं

  • 3000 से अधिक एवं 4000 से कम आबादी वाले गांवों के लिए अलग से 3 फेज फीडर लगाना
  • उप हस्तानांतरण एवं वितरण प्रणाली का सुदृढ़ीकरण करना
  • दोषपूर्ण सीटर मीटरिंग उपकरणों का प्रतिस्थापन
  • ग्रामीण विद्युतीकरण कार्य -राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना का को दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना में सम्मिलित कर दिया गया है

3. बिजली सबके लिए योजना

सभी ग्रामीण घरेलू उपभोक्ता जो कि दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना में शामिल नहीं है उनके लिए प्रत्येक ग्रामीण उपखंड पर 19 जून 2016 के बाद( प्रत्येक माह के पहले और तीसरे रविवार को) विद्युत कनेक्शन उपलब्ध करवाने के लिए शिविर आयोजित किए गए हैं

इस योजना के अंतर्गत 24147 BPL और 49488 एपीएल घरेलू कनेक्शन जारी किए जा चुके हैं

4. मुख्यमंत्री ग्रामीण घरेलू कनेक्शन योजना

गैर आबाद एवं छितराई हुई ढाणियों में घरेलू उपभोक्ताओं को विद्युत उपलब्ध करवाने हेतु अक्टूबर 2016 से मुख्यमंत्री ग्रामीण घरेलू कनेक्शन योजना आरंभ की गई इसके प्रथम चरण में नवंबर 2016 तक इच्छुक ग्रामीणों से सो रुपए पंजीकरण राशि जमा करके उनको इस योजना में शामिल किया गया है

5. मुख्यमंत्री विद्युत सुधार अभियान

राज्य में मुख्यमंत्री विद्युत सुधार अभियान योजना क्रमशः ग्रामीण एवं कृषि उपभोक्ताओं को भरोसेमंद, गुणवत्ता एवं व्यवधान रहित बिजली उपलब्ध कराने के साथ विद्युत संबंधी समस्याओं का त्वरित समाधान करने हेतु एवं सुरक्षित बिजली देने एवं विद्युत दरों पर नियंत्रण रखते हुए और तकनीकी एवं वाणिज्य हानि के स्तर को 15% तक लाने के उद्देश्य से प्रारंभ की गई है

6 उन्नति ज्योति अफोर्डेबल LED फॉर ऑल (उजाला) योजना

देश में ऊर्जा दक्षता का संदेश प्रसारित करने के प्रयास में भारत सरकार ऊर्जा सक्षम उपकरणों यथा LED, बल्ब यू ट्यूब लाइट और पंखे के उपयोग को बढ़ावा दे रही है योजना के प्रथम चरण में 7 वाट LED आधारित ऊर्जा सक्षम कार्यक्रम जोकि घरेलू सक्षम प्रकाश कार्यक्रम के नाम से जाना जाता है

को जनवरी 2015 में प्रारंभ किया गया था राजस्थान में इस कार्यक्रम के अंतर्गत मई 2015 से मई 2016 की अवधि में राज्य के सभी जिलों की 21लाख से अधिक उपभोक्ताओं को 1.16 करोड़ 7 वाट LED का वितरण किया गया है

7. एलईडी लाइट प्रोजेक्ट

राजस्थान में स्ट्रीट लाइट के क्षेत्र में ऊर्जा बचत करने के लिए एनर्जी सेविंग प्रोजेक्ट तैयार किया गया इसका मुख्य उद्देश्य सड़कों पर प्रकाश की मात्रा में वृद्धि करना व विद्युत उपयोग उपभोग में कमी करना है

66 निकायों में कार्य लगभग पूर्ण हो चुका है एवं 23 निकायों में कार्य प्रगति पर है राजस्थान में दिसंबर 2016 तक 5, 88,264 LED लाइट लगाई गई है भारत में सर्वाधिक LED स्ट्रीट लाइट लगाने में राजस्थान प्रथम स्थान पर है

ऊर्जा पुरस्कार ( Energy awards )

1. राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण पुरस्कार 2016 –भारत सरकार द्वारा राजस्थान को राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण पुरस्कार 2016 का प्रथम पुरस्कार LED लाइट प्रोजेक्ट के लिए दिनांक 14 दिसंबर 2016 को ऊर्जा संरक्षण दिवस के समारोह के दौरान नई दिल्ली में दिया गया

2. ऊर्जा संरक्षण में जयपुर डिस्कॉम को राष्ट्रीय पुरस्कार- एनर्जी सेविंग परियोजना में देश में प्रथम स्थान प्राप्त करने पर राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण पुरस्कार( नेशनल ऊर्जा कंजर्वेशन अवार्ड 2016) दिल्ली में केंद्रीय ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल ने प्रदान किया ऊर्जा संरक्षण दिवस पर नई दिल्ली में ऊर्जा मंत्रालय की ओर से 14 दिसंबर 2016 को भी समारोह में जयपुर डिस्कॉम को सामान्य श्रेणी में राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण दिया गया एनर्जी सेविंग परियोजना के तहत देश में प्रथम स्थान प्राप्त करने पर राज्य स्तरीय ऊर्जा संरक्षण 2016पुरस्कार स्वायत शासन विभाग को जयपुर में प्रदान किया गया

3. जयपुर में उत्तर पश्चिमी रेलवे को मिले चार पुरस्कार-  14 दिसंबर 2016 को ऊर्जा मंत्रालय राजस्थान सरकार द्वारा आयोजित ऊर्जा संरक्षण पुरस्कार 2016 में उत्तर पश्चिमी रेलवे को चार पुरस्कार प्राप्त हुए हैं

4. मेट्रो को राजस्थान ऊर्जा संरक्षण पुरस्कार- जयपुर मेट्रो रेल कॉरपोरेशन को राजकीय विभाग श्रेणी में बिजली बचत के नए प्रयोग के लिए राजस्थान ऊर्जा संरक्षण पुरस्कार 2016 मिला

सडक परिवहन ( Road transport )

राज्य में 1949 में मात्र 13553 किमी लम्बाई की सडकें थी जो मार्च 2017 तक बढकर 226853. 86 किमी हो गयी। राज्य में सडकों का घनत्व मार्च 2017 तक 66.29 प्रति 100 वर्ग किमी है। राज्य में दिसंबर 2017 तक 159.31 लाख मोटर वाहन पंजीकृत है जो पिछले वर्ष से 6.91% ज्यादा है।

2017- 18 मे 4050 करोड राजस्व लक्ष्य के विरुद्ध दिसम्बर 2017 तक 2839.34 करोड का राजस्व अर्जिक किया गया जो लक्ष्य का 70.11% है।

रेलवे ( Railway )

मार्च 2015 में रेलवे मार्ग की कुल लम्बाई 5898 किलोमीटर थी जो कि मार्च 2016 तक 5893 किलोमीटर हो गयी। भारतीय रेल मार्ग का 8.84% रेलमार्ग राजस्थान में है।

डाक एवं दूरसंचार सेवाएं ( Postal and telecommunication services )

मार्च 2017 तक राज्य में कुल डाकघरों की संख्या 10311 और टेलीफोन एक्सचेंजों की संख्या 2057 है।

मानवसं साधन ( Human Resource )

कोई भी व्यक्ति और उसकी विशेष क्षमताओं और कौशल जो संगठन के लिए सबसे बड़ा और सबसे लंबा स्थाई लाभ बनाता है| इसीलिए इसे सबसे महत्वपूर्ण संस्था माना जाता है|

मानव संसाधन ( human resource) वह अवधारणा है जो जनसंख्या को अर्थव्यवस्था पर दायित्व से अधिक परि संपत्ति के रूप में देखती है। शिक्षा प्रशिक्षण और चिकित्सा सेवाओं में निवेश के परिणाम स्वरूप जनसंख्या मानव संसाधन के रूप में बदल जाती है।

मानव संसाधन ( human resource ) उत्पादन में प्रयुक्त हो सकने वाली पूँजी है। यह मानव पूँजी कौशल और उन्में निहित उत्पादन के ज्ञान का भंडार है। यह प्रतिभाशाली और काम पर लगे हुए लोगों और संगठनात्मक सफलता के बीच की कड़ी को पहचानने का सूत्र है।

 यह उद्योग/संगठनात्मक मनोविज्ञान और सिद्धांत प्रणाली संबंधित अवधारणाओं से संबद्ध है। मानव संसाधन की संदर्भ के आधार पर दो व्याख्याएं मिलती हैं।

इसका मूल अर्थराजनीतिक अर्थव्यवस्था और अर्थशास्त्र से लिया गया है जहां पर इसे पारंपरिक रूप से उत्पादन के चार कारको में से एक श्रमिक कहा जाता था यद्धपि यह दृष्टिकोण राष्ट्रीय स्तर पर नए और योजनाबद्ध तरीकों में अनुसन्धान के चलते बदल रहा है।

[1] पहला तरीका अधिकतर ‘मानव संसाधन विकास (Human Resource Development )‘ शब्द के रूप में प्रयुक्त होता है और यह सिर्फ संगठनों से शुरू हो कर राष्ट्रीय स्तर तक हो सकता है।

पारम्परिक रूप से यह कारपोरेशन व व्यापार के क्षेत्र में व्यक्ति विशेष (जो उस फर्म या एजेन्सी में कार्य करता है) के लिए, तथा कंपनी के उस हिस्से को जो नियुक्ति करने, निकालने, प्रशिक्षण देने तथा दूसरे व्यक्तिगत मुद्दों से सम्बंधित है

जिसे साधारणतयाः “मानव संसाधन प्रबंधन” के नाम से जाना जाता है, के लिए होता प्रयुक्त होता है। यह लेख दोनों परिभाषाओं से सम्बंधित है।

विकास :- मानव संसाधनों के विकास का उद्देश्य मानव संसाधन संपन्नता को प्रबुद्ध और एकजुट नीतियों के माध्यमसे शिक्षा, प्रशिक्षण, स्वास्थ्य और रोजगार के सभीस्तरों को कॉर्पोरेट से ले कर राष्ट्रीय स्तर तक बढ़ावा देना है।

प्रबंधन :- मानव संसाधन प्रबंधन का मुख्य उद्देश्य कंपनी के कर्मचारियों पर हुए निवेश से अधिकाधिक लाभ सुनिश्चित करना तथा वित्तीय जोखिम को कम करना है। एक कंपनी के संदर्भ में मानव संसाधन प्रबंधकों की यह जिम्मेदारी है कि वे इन गतिविधियों का संचालन एक प्रभावशाली, वैधानिक, न्यायिक तथा तर्कपूर्ण ढंग से करें।

मुख्य कार्यमानव संसाधन प्रबंधन निम्न महत्वपूर्ण कार्य करता है:

  • नियुक्ति व चयन
  • प्रशिक्षण और विकास (लोग अथवा संगठन)
  • प्रदर्शन का मूल्यांकन तथा प्रबंधन
  • पदोन्नति/ स्थानांतरण
  • फालतू कर्मचारियों को हटाना
  • औद्योगिक और कर्मचारी संबंध
  • सभी व्यक्तिगत आंकड़ों का रिकार्ड रखना
  • वेतन तथा उस से संबंधित मुआवजा, पेंशन, बोनस इत्यादि
  • कार्य से सम्बंधित समस्याओं के बारे में ‘आंतरिक कर्मचारियों’ को गोपनीय सलाह देना
  • कैरियर का विकास
  • योग्यता परखना
  • मानव संसाधन क्रियाओं से संबंधित समय की गति का अध्ययन करना।
  • प्रदर्शन मूल्यांकन आधुनिक विश्लेषण आधुनिक विश्लेषण इस बात पर जोर देता है कि मनुष्य”वस्तु अथवा “संसाधन” नहीं हैं, बल्कि एक उत्पादन संस्था में रचनात्मक और सामाजिक प्राणी हैं।

आईएसओ 9001के 2000 संस्करण का उद्देश्य प्रक्रियाओं के क्रम तथा उनके बीच के संबंधों को पहचानना और उत्तरदायित्वों तथा अधिकारों को परिभाषित करना और बताना है।  सामान्यतया, अधिकतर संघीय देशों जैसे फ्रांस Germany और जर्मनी ने इसे अपनाया और ऐसे कार्य विवरणों को विशेष रूप से ट्रेड यूनिअनों में बढ़ावा दिया।

अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने भी 2001 में फिर से मिलना और मानव संसाधन विकास पर 1975 में धारा 150 को संशोधित करना तय किया

[2] इन प्रवृत्तियों का एक नज़रिया राजनीतिक अर्थ- 

व्यवस्था पर एक मजबूत सामाजिक आम सहमति कायम करना है और एक अच्छी सामाजिक कल्याण प्रणाली,श्रमिकों की गतिशीलता को सुविधाजनक बनाती है और पूरी अर्थव्यवस्था को और अधिक फलदायक बना देती है

क्योंकि इसकी सहायता से श्रमिक कौशल और अनुभव को विभिन्न रूपों में विकसित कर सकते हैं और उन्हें एक इकाई से दूसरी इकाई में जाने अथवा खुद को माहौल के अनुकूल ढालने में कम दिक्कत या परेशानी का सामना करना पड़ता है।

एक और नज़रिया है कि सरकारों को सभी क्षेत्रों में मानव संसाधन विकास को सुविधाजनक बनाने में अपनी राष्ट्रीय भूमिका के प्रति अधिक जागरूक होना चाहिए।

शिक्षा ( Education )

प्रारम्भिक शिक्षा ( Elementary education)– राज्य में 35664 राजकीय प्रारम्भिक विद्यालय, 20744 राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय और 13983 प्रारम्भिक कक्षाओं वाले माध्यमिक या उच्च माध्यमिक विद्यालय है जिनमे डाइस रिपोर्ट 2016 – 17 के अनुसार 62. 89 लाख विद्यार्थी नामांकित है।

बालिका शिक्षा को बढावा देने के लिए कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय, मीना मंच, अध्यापिका मंच, शैक्षणिक किशौरी मेले व बालिका शिक्षा हेतु कई नवाचार किये जा रहे है। वर्तमान में 9569 उत्कृष्ट विद्यालय संचालित है।

माध्यमिक शिक्षा (Secondary education )– वर्तमान में 13551 माध्यमिक या उच्च माध्यमिक विद्यालय एवं 134 स्वामी विवेकानंद राजकीय मॉडल स्कूल राज्य में संचालित है। 14388 माध्यमिक या उच्च माध्यमिक विद्यालय निजी क्षेत्र में संचालित है। जिनमे (राजकीय व निजी) 41.31 लाख विद्यार्थी नामांकित है।

उच्च शिक्षा ( Higher education )– वर्तमान में राज्य में 1850 महाविद्यालय है। जिनमे 209 राजकीय महाविद्यालय, 15 राजकीय विधि महाविद्यालय, 1626 निजी महाविद्यालय, 7 स्ववितपोषित संस्थाएं और 6 निजी सहभागिता से स्थापित महाविद्यालय है। तकनीकी शिक्षा में अभियांत्रिकी हेतु 112 संस्थाएं है जो 12 राजकीय व 100 निजी है।

राज्य में पॉलीटेक्निक शिक्षा हेतु 42 राजकीय व 140 निजी कुल 182 महाविद्यालय स्थापित है। चिकित्सा शिक्षा में 16 महाविद्यालय जिनमे 8 राजकीय व 8 निजी क्षेत्र में है। दंत चिकित्सा में 16 महाविद्यालय जिनमें 1 राजकीय व 15 निजी क्षेत्र में है।

September 27, 2020

Rajput History राजस्थान में राजपूत वंशों का उदय 7-12 वीं सदी

राजस्थान में राजपूत वंशों का उदय 7-12 वीं सदी

राजपूत

सूर्यवंशी, चंद्रवंशी, यदुवंशी, अग्निवंशी।

“राजपूत” शब्द की व्युत्पत्ति राजपूतों की उत्पत्ति के विभिन्न मत और उनकी समीक्षा

  • अग्निवंशीय मत
  • सूर्य तथा चंद्रवंशीय मत
  • विदेशी वंश का मत
  • गुर्जर वंश का मत
  • ब्राह्मणवंशीय मत
  • वैदिक आर्य वंश का मत

राजपूतों की विदेशी उत्पत्ति का सिद्धांत ( Rajput Origin )

(1) विदेशी सिद्धान्त ( Foreign principle )

राजस्थान के इतिहास को लिखने का श्रेय कर्नल जेम्स टॉड को दिया जाता है, कर्नल टॉड को हम राजस्थान इतिहास का जनक व राजस्थान इतिहास के पितामह भी कहते हैं कर्नल टॉड ने अपने ग्रंथ ‘दे एनल्स एंड एंटिक्विटी ऑफ राजस्थान’ में राजपूत को विदेशी जातियों से उत्पन्न होना बताया, कर्नल टॉड ने विदेशी जातियों में शक, कुषाण, सिर्थियन, आदि विदेशी जातियों के सम्मिश्रण से राजपूतों की उत्पत्ति हुई,

उनका मानना था कि जिस प्रकार यह विदेशी जातियां आक्रमण व युद्ध में विश्वास रखती थी, ठीक उसी प्रकार राजस्थान के राजपूत शासक भी युद्ध में विश्वास रखते थे इस कारण इस कारण कर्नल टॉड ने राजपूतों को विदेशियों की संतान कहा, इस मत का समर्थन इतिहासकार क्रुक महोदय ने भी किया!!!

(2) अग्निकुंड का सिद्धांत

लेखक चंद्रवरदाई ने अपने ग्रंथ पृथ्वीराज रासो में राजपूतों की उत्पत्ति का अग्नि कुंड का सिद्धांत प्रतिपादित किया  इनकी उत्पत्ति के बारे में उन्होंने बताया कि माउंट आबू पर गुरु वशिष्ट का आश्रम था, गुरु वशिष्ठ जब यज्ञ करते थे तब कुछ दैत्यो द्वारा उस यज्ञ को असफल कर दिया जाता था!  तथा उस यज्ञ में अनावश्यक वस्तुओं को डाल दिया जाता था

जिसके कारण यज्ञ दूषित हो जाता था गुरु वशिष्ठ ने इस समस्या से निजात पाने के लिए अग्निकुंड अग्नि से 3 योद्धाओं को प्रकट किया इन योद्धाओं में परमार, गुर्जर, प्रतिहार, तथा चालुक्य( सोलंकी) पैदा हुए, लेकिन समस्या का निराकरण नहीं हो पाया इस प्रकार गुरु वशिष्ठ ने पुनः एक बार यज्ञ किया और उस यज्ञ में एक वीर योद्धा अग्नि में प्रकट किया यही अंतिम योद्धा ,चौहान, कहलाया इस प्रकार चंद्रवरदाई ने राजपूतों की उत्पत्ति अग्निकुंड से बताई

नोट-  माउंट आबू सिरोही में वशिष्ठ कुण्ड व ग्ररू वशिष्ठ आश्रम स्थित है

राजपूतों की उत्पत्ति ( Rajput Origin )

अग्निवंशी मत ( Agnostic vote )

  • राजपूताना के इतिहास के सन्दर्भ में राजपूतों की उत्पत्ति के विभिन्न सिद्धान्तों का अध्ययन बड़ा महत्त्व का है। राजपूतों का विशुद्ध जाति से उत्पन्न होने के मत को बल देने के लिए उनको अग्निवंशीय बताया गया है।
  • इस मत का प्रथम सूत्रपात चन्दबरदाई के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘पृथ्वीराजरासो’ से होता है। उसके अनुसार राजपूतों के चार वंश प्रतिहार, परमार, चालुक्य और चौहान ऋषि वशिष्ठ के यज्ञ कुण्ड से राक्षसों के संहार के लिए उत्पन्न किये गये।
  • इस कथानक का प्रचार 16 वीं से 18वीं सदी तक भाटों द्वारा खूब होता रहा। मुहणोत नैणसी और सूर्यमल्ल मिसण ने इस आधार को लेकर उसको और बढ़ावे के साथ लिखा।
  • परन्तु इतिहासकारों के अनुसार ‘अग्निवंशीय सिद्धान्त’ पर विश्वास करना उचित नहीं है क्योंकि सम्पूर्ण कथानक बनावटी व अव्यावहारिक है। ऐसा प्रतीत होता है कि चन्दबरदाई ऋषि वशिष्ठ द्वारा अग्नि से इन वंशों की उत्पत्ति से यह अभिव्यक्त करता है कि जब विदेशी सत्ता से संघर्ष करने की आवश्यकता हुई तो इन चार वंश के राजपूतों ने शत्रुओं से मुकाबले हेतु स्वयं को सजग कर लिया।
  • गौरीशकंर हीराचन्द ओझा, सी.वी.वैद्य, दशरथ शर्मा, ईश्वरी प्रसाद इत्यादि इतिहासकारों ने इस मत को निराधार बताया है।
  • गौरीशंकर हीराचन्द ओझा राजपूतों को सूर्यवंशीय और चन्द्रवंशीय बताते हैं। अपने मत की पुष्टि के लिए उन्होंने कई शिलालेखों और साहित्यिक ग्रंथों के प्रमाण दिये हैं, जिनके आधार पर उनकी मान्यता है कि राजपूत प्राचीन क्षत्रियों के वंशज हैं।
  • राजपूतों की उत्पत्ति से सम्बन्धित यही मत सर्वाधिक लोकप्रिय है।
  • राजपूताना के प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने राजपूतों को शक और सीथियन बताया है। इसके प्रमाण में उनके बहुत से प्रचलित रीति-रिवाजों का, जो शक जाति के रिवाजों से समानता रखते थे, उल्लेख किया है। ऐसे रिवाजों में सूर्य पूजा, सती प्रथा प्रचलन, अश्वमेध यज्ञ, मद्यपान, शस्त्रों और घोड़ों की पूजा इत्यादि हैं।
  •  टॉड की पुस्तक के सम्पादक विलियम क्रुक ने भी इसी मत का समर्थन किया है
  • परन्तु इस विदेशी वंशीय मत का गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने खण्डन किया है। ओझा का कहना है कि राजपूतों तथा विदेशियों के रस्मों-रिवाजों में जो समानता कनर्ल टॉड ने बताई है, वह समानता विदेशियों से राजपूतों ने प्राप्त नहीं की है, वरन् उनकी सत्यता वैदिक तथा पौराणिक समाज और संस्कृति से की जा सकती है। अतः उनका कहना है कि शक, कुषाण या हूणों के जिन-जिन रस्मो-रिवाजों व परम्पराओं का उल्लेख समानता बताने के लिए जेम्स टॉड ने किया है, वे भारतवर्ष में अतीत काल से ही प्रचलित थीं। उनका सम्बन्ध इन विदेशी जातियों से जोड़ना निराधार है।
  •  डॉ. डी. आर. भण्डारकर राजपूतों को गुर्जर मानकर उनका संबंध श्वेत-हूणों के स्थापित करके विदेशी वंशीय उत्पत्ति को और बल देते हैं। इसकी पुष्टि में वे बताते हैं कि पुराणों में गुर्जर और हूणों का वर्णन विदेशियों के सन्दर्भ में मिलता है। इसी प्रकार उनका कहना है कि अग्निवंशीय प्रतिहार, परमार, चालुक्य और चौहान भी गुर्जर थे, क्योंकि राजोर अभिलेख में प्रतिहारों को गुर्जर कहा गया है।
  •  इनके अतिरिक्त भण्डारकर ने बिजौलिया शिलालेख के आधार पर कुछ राजपूत वंशों को ब्राह्मणों से उत्पन्न माना है। वे चौहानों को वत्स गोत्रीय ब्राह्मण बताते हैं और गुहिल राजपूतों की उत्पत्ति नागर ब्राह्मणों से मानते हैं।
  • डॉ. ओझा एवं वैद्य ने भण्डराकर की मान्यता को अस्वीकृत करते हुए लिखा है कि प्रतिहारों को गुर्जर कहा जाना जाति विशेष की संज्ञा नहीं है वरन् उनका प्रदेश विशेष गुजरात पर अधिकार होने के कारण है।
  • जहाँ तक राजपूतों की ब्राह्मणों से उत्पत्ति का प्रश्न है, वह भी निराधार है क्योंकि इस मत के समर्थन में उनके साक्ष्य कतिपय शब्दों का प्रयोग राजपूतों के साथ होने मात्र से है।
  • इस प्रकार राजपूतों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में उपर्युक्त मतों में मतैक्य नहीं है। फिर भी डॉ. ओझा के मत को सामान्यतः मान्यता मिली हुई है।
  • निःसन्देह राजपूतों को भारतीय मानना उचित है।

राजपूतों की शाखाएं ( Rajput caste history )

सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी, अग्निवंशीय 

सूर्य वंश की शाखायें ( Suryavansh )

1.कछवाह
2.राठौड
3.बडगूजर
4.सिकरवार
5.सिसोदिया
6.गहलोत
7.गौर
8.गहलबार
9.रेकबार
10 .जुनने
11. बैस
12. रघुवशी

चन्द्र वंश की शाखायें ( Chandravansh )

1.जादौन
2.भाटी
3.तोमर
4.चन्देल
5.छोंकर
6.होंड
7.पुण्डीर
8.कटैरिया
9 .दहिया

अग्निवंश की चार शाखायें ( Agnivansh )

1.चौहान
2.सोलंकी
3.परिहार
4.परमार

कर्नल जेम्स टॉड ( James Tod )

राजस्थान में रेजीडेंट 1817 से 1822 तक।  नियुक्ति- पश्चिमी राजपूताना क्षेत्र में। 28 तारीख को सामंतवादी की स्थापना करने का श्रेय कर्नल जेम्स टॉड को जाता है।

संज्ञा- घोड़े वाले बाबा राजस्थानी इतिहास के पितामह

पुस्तकों का संपादन विलियम क्रुक ने करवाया, पुस्तकों का हिंदी अनुवाद गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने किया

कर्नल जेम्स टॉड की पुस्तक ( James Tod’s book )

  • Vol.1:- एनाल्स एण्ड एण्टीक्वीटीज आॅफ राजस्थान 1829
  • Vol.2:- the central and western Rajputana states of India 1832
  • travels in western India (1839)

September 27, 2020

Medieval Rajasthan मध्यकालीन राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था

मध्यकालीन राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था

प्रशासनिक

मध्यकाल में राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था से तात्पर्य मुगलों से संपर्क के बाद से लेकर 1818 ईसवी में अंग्रेजों के साथ हुई संधियों की काल अवधि के अध्ययन से है।  इस काल अवधि में राजस्थान में 22 छोटी बड़ी रियासतें थी और अजमेर मुगल सूबा था।

इन सभी रियासतों का अपना प्रशासनिक तंत्र था लेकिन, कुछ मौलिक विशेषताएं एकरूपता लिए हुए भी थी। रियासतें मुगल सूबे के अंतर्गत होने के कारण मुगल प्रभाव भी था।

राजस्थान की मध्यकालीन प्रशासनिक व्यवस्था के मूलत 3 आधार थे —

  • सामान्य एवं सैनिक प्रशासन।
  • न्याय प्रशासन।
  • भू राजस्व प्रशासन।

संपूर्ण शासन तंत्र राजा और सामंत व्यवस्था पर आधारित था। राजस्थान की सामंत व्यवस्था रक्त संबंध और कुलीय भावना पर आधारित थी।सर्वप्रथम कर्नल जेम्स टॉड ने यहां की सामंत व्यवस्था के लिए इंग्लैंड की फ्यूडल व्यवस्था के समान मानते हुए उल्लेख किया है।

राजस्थान की सामंत व्यवस्था पर व्यापक शोध कार्य के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि यहां की सामंत व्यवस्था कर्नल टॉड द्वारा उल्लेखित पश्चिम के फ्यूडल व्यवस्था के समान स्वामी (राजा) और सेवक (सामंत) पर आधारित नहीं थी।

राजस्थान के सामंत व्यवस्था रक्त संबंध एवं कुलीय भावना पर आधारित प्रशासनिक और सैनिक व्यवस्था थी।

केन्द्रीय शासन ( Central Government )

राजा – सम्पूर्ण शक्ति का सर्वोच्च केंद्र

प्रधान – राजा के बाद प्रमुख। अलग अलग रियासतों में अलग अलग नाम – कोटा और में दीवान, जैसलमेर, मारवाड मेवाड में प्रधान, जयपुर में मुसाहिब, बीकानेर में मुख्त्यार।

बक्षी – सेना विभाग का प्रमुख। जोधपुर में फौजबक्षी होता था।

नायब बक्षी – सैनिको व किलों पर होने वाले खर्च और सामन्तों की रेख का हिसाब रखता था

नोट – रेख = एक जागीरदार की जागीर की वार्षिक आय

शिकदार- मुगल प्रशासन के कोतवाल के समान। गैर सैनिक कर्मचारियों के रोजगार सम्बंधी कार्य।

सामन्ती श्रेणियां ( Feudal System )

कर्नल टॉड ने सामन्ती व्यवस्था को इग्लैण्ड में चलने वाली फ्यूडवल व्यवस्था के समान माना है।

सामन्त श्रेणिया –

  • मारवाड- चार प्रकार की राजवी, सरदार, गनायत, मुत्सद्दी
  • मेवाड – तीन श्रेणियां , जिन्हे उमराव कहा जाता था। सलूम्बर के सामन्त का विशेष स्थान।
  • जयपुर – पृथ्वीसिंह के समय श्रेणी विभाजन। 12 पुत्रों के नाम से 12 स्थायी जागीरे चलीजिन्हे कोटडी कहा जाता था।
  • कोटा- में राजवी कहलाते थे।
  • बीकानेर – में सामन्तों की तीन श्रेणियां थी।
  • जैसलमेर में दो श्रेणियां थी।
  • अन्य श्रेणियां – भौमिया सामन्त, ग्रासिया सामन्त

सामन्त व्यवस्था ( Feudal system )

राजस्थान में परम्परागत शासन में राजा -सामन्त का संबंध भाई-बंधु का था।  मुगल काल में सामन्त व्यवस्था में परिवर्तन। अब स्थिति स्वामी – सेवक की स्थिति।

सेवाओं के साथ कर व्यवस्था –

परम्परागत शासन में सामन्त केवल सेवाएं देता था। लेकिन मुगल काल से कर व्यवस्था भी निर्धारित की गयी।

सामन्त अब

  • पट्टा रेख – राजा द्वारा जागीर के पट्टे में उल्लेखित अनुमानित राजस्व।
  • भरत रेख – राजा द्वारा सामन्त को प्रदत जागीर के पट्टे में उल्लेखित रेख के अनुसार राजस्व।
  • उत्तराधिकार शुल्क – जागीर के नये उत्तराधिकारी कर से वसूल किया जाने वाला कर। अलग अलग रियासतों में इसके नाम-मारवाड – पहले पेशकशी फिर हुक्मनामा. मेवाड और जयपुर में नजराना, अन्य रियासतों मे कैद खालसा या तलवार बंधाई नाम था।, जैसलमेर एकमात्र रियासत जहां उत्तराधिकारी शुल्क नहीं लिया जाता था।
  • नजराना कर- राजाके बडे पुत्र के विवाह पर दिया जाने वाला कर।
  • न्योत कर
  • तीर्थ यात्रा कर

भूमि और भू स्वामित्व ( Land and Land Ownership )

भूमि दो भागों में विभाजित थी –

  1. खालसा भूमि ( Khalsa land )- जो कि सीधे शासक के नियंत्रण में होती थी जिसे केंद्रीय भूमि भी कह सकते हैं।
  2. जागीर भूमि – यह चार प्रकार की थी।

सामंत जागीर ( Feudal Estate ) – यह जागीर भूमि जन्मजात जागीर थी जिसका लगान सामन्त द्वारा वसूल किया जाता था।

हुकूमत जागीर – यह मुत्सदद्धियों को दी जाती थी।

भौम जागीर – राज्य को निश्चित सेवाए व कर देते थे।

शासण जागीर – यह माफी जागीर भी कहलाती थी। यह करमुक्त जागीर थी। धर्मार्थ, शिक्षण कार्य, साहित्य लेखन कार्य, चारण व भाट आदि को अनुदान स्वरूप दी जाती थी।

इसके अलावा भूमि को ओर दो भागों में बांटा गया-

  • कृषि भूमि ( Agricultural land ) – खेती योग्य भूमि।
  • चरनोता भूमि ( Charnote land )- पशुओं के लिए चारा उगाया जाता था।

किसान- दो प्रकार के थे-

  • बापीदार – खुदकाश्तकार और भूमि का स्थाई स्वामी
  • गैरबापीदार – शिकमी काश्तकार और भूमि पर वंशानुगत अधिकार नहीं। ये खेतीहर मजदूर थे।

दाखला – किसानों को दी जाने वाली भूमि का पट्टा जो जागीरदार के रजिस्टर में दर्ज रहता था।

लगान वसूली की विधि ( Tax collection method )

लगान वसूली की तीन विधि अपनाते थे-

लाटा या बटाई विधि- फसल कटने योग्य होने पर लगान वसूली के लिए नियुक्त अधिकारी की देखरेख में कटाई तथा धान साफ होने पर राज्य का भाग अलग किया जाता था।

कून्ता विधि- खडी फसल को देखकर अनुमानित लगान निर्धारिढ करना।

अन्य विधि – इसे तीन भागों में – मुकाता, डोरी और घूघरी

डोरी और मुकाता में कर निर्धारण एक मुश्त होता था। नकद कर भी लिया जाता था। डोरी कर निर्धारण में नापे गये भू भाग का निर्धारण करके वसूल करना।

घूघरी कर विधि के अनुसार शासक, सामन्त एवं जागीरदार किसान को जितनी घूघरी (बीज) देता था उतना ही अनाज के रूप में लेता था।दूसरी घूघरी विधि में प्रति कुआं या खेत की पैदावार पर निर्भर था।

मध्यकाल में राजस्थान में प्रचलित विभिन्न लाग-बाग

भू राजस्व के अतिरिक्त कृषकों से कई अन्य प्रकार के कर वसूल किए जाते थे उन्हें लाग बाग कहा जाता था लाग-बाग दो प्रकार के थे–

  • नियमित
  • अनियमित

नियमित लाग– की रकम निश्चित होती थी और उसकी वसूली प्रतिवर्ष या 2-3 वर्ष में एक बार की जाती थी

अनियमित लाग- की रकम निश्चित नहीं थी उपज के साथ-साथ यह कम या ज्यादा होती रहती थी इन लागों के निर्धारण का कोई निश्चित आधार नहीं था

  • नल बट एवं नहर वास- यह लाग सिंचित भूमि पर ली जाती थी
  • जाजम लाग- भूमि के विक्रय पर वसूली जाने वाली लाभ
  • सिंगोटी- मवेशी के विक्रय के समय वसूली जाने वाली लाग
  • मलबा और चौधर बाब- मारवाड़ में मालगुजारी के अतिरिक्त किसान से यह कर वसूल करने की व्यवस्था थी मलबा की आय से फसल की रक्षा संबंधी किए गए खर्च की पूर्ति की जाती थी और उन व्यक्तियों को पारिश्रमिक देने की व्यवस्था रहती थी जिन्होंने बटाई की प्रक्रिया में भाग लिया था

मारवाड़ में जागीर क्षेत्र में खारखार,कांसा,शुकराना (खिड़की या बारी खुलाई) हासा, माचा, हल, मवाली, आदि प्रमुख लागें थी

  • धूँआ भाछ- बीकानेर राज्य में यह कर वसूल किया जाता था
  • घर की बिछोती- जयपुर राज्य में इस कर की वसूली की जाती थी
  • घास मरी- विभिन्न प्रकार के चऱाई करो का सामूहिक नाम था
  • अंगाकर- मारवाड़ में प्रति व्यक्ति ₹1 की दर से महाराजा मानसिंह के समय इस कर की वसूली की गई थी
  • खेड़ खर्च-राज्य में सेना के खर्च के नाम से जो कर लिया जाता था उसे खेड़ खर्च या फौज खर्च की संज्ञा दी गई थी
  • गनीम बराड़- मेवाड़ में युद्ध के समय गनीम बराड़ कर वसूल किया जाता था
  • कागली या नाता कर- विधवा के पुनर्विवाह के अवसर पर प्रतिभा ₹1 की दर से यह कर वसूल किया जाता था ।

मेवाड़ में नाता बराड़, कोटा राज्य में नाता कागली, बीकानेर राज्य में नाता और जयपुर राज्य में छैली राशि के नाम से यह कर लिया जाता था

  • जकात कर- बीकानेर राज्य में सीमा शुल्क आयात निर्यात और चुंगी कर का सामूहिक नाम जकात था

जोधपुर और जयपुर राज्य में पारिवारिक भाषा में इसे सायर की संज्ञा दी थी

  • दाण कर- मेवाड़ और जैसलमेर राज्यों में माल के आयात निर्यात पर लगाया जाने वाला कर दाण कहलाता था
  • मापा ,बारुता कर- मेवाड़ में 1 गांव से दूसरे गांव में माल लाने ले जाने पर यह कर वसूल किया जाता था

जबकि बीकानेर राज्य में विक्रीकर को मापा के नाम से पुकारते थे

  • लाकड़ कर- जंगलात की लकड़ियों पर लाकड़ कर लिया जाता था।

इस कर को बीकानेर में काठ जयपुर में दरख्त की बिछोती मेवाड़ में खड़लाकड़ और मारवाड़ में कबाड़ा बाब के नाम से पुकारते थे

राली लाग- प्रतिवर्ष काश्तकार अपने कपड़ों में से एक गद्दा या राली बना कर देता था जो जागीदार या उसकी कर्मचारियों के काम आती थी

दस्तूर- भू राजस्व कर्मचारी पटेल पटवारी कानूनगो तहसीलदार और चौधरी जो अवैध रकम किसानों से वसूल करते थे उसे दस्तूर कहा जाता था

नजराना- यह लाग प्रतिवर्ष किसानों से जागीरदार और पटेल वसूल करते थे जागीरदार राजा को और पटेल तहसीलदार को नजराना देता था जिसकी रकम किसानों से वसूल की जाती थी

बकरा लाग- प्रत्येक काश्तकार से जागीरदार एक बकरा स्वयं के खाने के लिए लेता था उस जागीरदार बकरे के बदले प्रति परिवार से ₹2 वार्षिक लेते थे

न्योता लाग- यह लाग जागीरदार पटेल और चौधरी अपने लड़के लड़की की शादी के अवसर पर किसानों से वसूल करते थे

चवरी लाग- किसानों के पुत्र या पुत्री के विवाह पर एक से ₹25 तक चवरी लाग के नाम पर लिए जाते थे

कुंवर जी का घोड़ा- कुंवर के बड़े होने पर घोड़े की सवारी करना सिखाया जाता था तब घोड़ा खरीदने के लिए प्रति घर से ₹1 कर के रूप में लिया जाता था

खरगढी़- सार्वजनिक निर्माण या दुर्गों के भीतर निर्माण कार्यों के लिए गांव से बेगार में गधों को मंगवाया जाता था परंतु बाद में गधों के बदले खर गढी़ लाग वसूल की जाने लगी

खिचड़ी लाग- जागीरदार द्वारा अपने प्रत्येक गांव से उनकी आर्थिक स्थिति के अनुसार ली जाने वाली लाग राज्य की सेना जब किसी गांव के पास पडा़व डालती है तब उसके भोजन के लिए गांव के लोगों से वसूली जाने वाली लाग खिचड़ी लाग कहलाती थी

अंग लाग- प्रत्येक किसान के परिवार के प्रत्येक सदस्य से जो 5 वर्ष से ज्यादा आयु का होता था प्रति सदस्य ₹1 लिया जाता

मुगलों की राजपूत नीति ( Rajput policy of the Mughals )

अकबर की राजपूत नीति

अकबर ने मुगल-राजपूत सम्बन्धो की जो बुनियाद रखी थी वह कमोबेश आखिर तक चलती रही। आर.पी. त्रिपाठी के अनुसार अकबर शाही संघ के प्रति राजपूतों की केवल निष्ठा चाहता था।यह नीति “सुलह-ए-कुल”(सभी के साथ शांति एवं सुलह) पर आधारित थी। सुलह न किए जाने वाले शासकों को शक्ति के बल पर जीता, जैसे-मेवाड़, रणथंभौर आदि

अधीनस्थ शासक को उनकी “वतन जागीर” दी गई। उसको आंतरिक मामलों में पूर्ण स्वंतत्रता प्रदान की गई तथा बाहरी आक्रमणों से पूर्ण सुरक्षा की गारंटी दी गई। प्रशासन संचालन एवं युद्ध अभियानों में सम्मिलित किया एवं योग्यता अनुरूप उन्हें “मनसब” प्रदान किया।

“टीका प्रथा” शुरू की। राज्य के नए उत्तराधिकारी की वैधता “टीका प्रथा” द्वारा की जाती थी। जब कोई राजपूत शासक अपना उत्तराधिकारी चुनता था तो मुग़ल सम्राट उसे (नवनियुक्त) को “टीका” लगाता था, तब उसे मान्यता मिलती थी।

सभी राजपूत शासकों की टकसालों की जगह मुगली प्रभाव की मुद्रा शुरू की गई। सभी राजपूत राज्य अजमेर सुबे के अंतर्गत रखे गए

सैनिक व्यवस्था ( Military system )

मध्यकालीन राजस्थान की सैन्य व्यवस्था पर मुगल सैन्य व्यवस्था का प्रभाव दृष्टिगोचर होता हैं। सेना मुख्यत: दो.भागों मे बंटी हुई होती थी। एक राजा की सेना, जो ‘अहदी’ कहलाती थी तथा दूसरी सामन्तों की सेना, जो, ‘जमीयत’ कहलाती थी।

अहदी सैनिको की भर्ती, प्रशिक्षण, वेतन आदि कार्य दीवान व मीरबक्शी के अधीन होता था। ‘दाखिली’ सैनिकों की भर्ती यद्दपि राजा की ओर से होती थी किन्तु इनको सामन्तों की कमान या सेवा मे रख दिया जाता था। इन्हें वेतन सामन्तों की ओर से दिया जाता था। ‘जमीयत’ के लिए ये कार्य संबंधित सामतं करता था।

सेना मे भी अफगानों, रोहिलों,मराठों, सिन्धियों, अहमद-नगरियों आदि को स्थान दिये जाने जिन्हें ‘परदेशी’ कहा जाता था। घोडों को दागने की प्रथा चल गई थी। जिनके पास बन्दूकें होती थी वे बन्दूकची कहलाते थे।सेना के मुख्य रुप से दो भाग होते थे- प्यादे (पैदल) और सवार।

1. प्यादे (पैदल सैनिक):- यह राजपूतों की सेना की सबसे बड़ी शाखा थी। राजपूतों की पैदल सेैना म दो प्रकार के सैनिक होते थे- अहशमा सैनिक, सेहबन्दी सैनिक

2. सवार :- इसमे घुडसवार एवं शुतरसवार (ऊँट) सम्मिलित थे जो ‘राजपूत सेना के प्राण‘ मानी जाती थी। घुडसवारों मे दो प्रकार घुड़सवार होते थे बारगीर, सिलेदार।

  • निम अस्पा :- दो घुड़सवारों के पास एक घोडा़ होता था।
  • यक अस्पा :- वह घुड़सवार जिसके पास एक घोडा़ हो।
  • दअस्पा :- वह घुड़सवार जिसके पास दो घोड़े हो।
  • सिह अस्पा :- वह घुड़सवार जिसके पास तीन घोड़े हो।

तोपखाने के अधिकारियों मे ‘बक्शी-तोपखाना‘, ‘दरोगा- तोपखाना’ व मुशरिफ- तोपखाना’ के उल्लेख मिलता हैं। तोपचियों को ‘गोलन्दाज‘ कहा जाता था।

सैन्य विभाग को ‘सिलेहखाना’ कहा जाता था। सिलेहखाना शब्द हथियार डिपो के लिए भी प्रयुक्त हुआ है। घोड़े सहित सभी घुड़सवारों ‘दीवान-ए-अर्ज’ मे लाया जाता था।

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September 26, 2020

Historical Period Maurya ऐतिहासिक काल मौर्य काल

ऐतिहासिक काल मौर्य काल

मौर्य काल ( Maurya Empire )

चंद्रगुप्त मौर्य के समय से ही मौर्यों की सत्ता इस क्षेत्र में फैल गई। कोटा जिले के कणसावा गांव से मिले शिलालेख से यह पता चलता है कि वहां मौर्य वंश के राजा धवल का राज्य था बैराठ से अशोक के दो अभिलेख मिले हैं मौर्य काल में राजस्थान सिंध, गुजरात तथा कोकण का क्षेत्र अपर जनपद अथवा पश्चिमी जनपद कहलाता था

अशोक का बैराठ का शिलालेख तथा उसके उतराधिकारी कुणाल के पुत्र सम्प्रति द्वारा बनवाये गये मन्दिर मौर्यों के प्रभाव की पुष्टि करते हैं कुमारपाल प्रबंध अन्य जैन ग्रंथ से अनुमानित है कि चित्तौड़ का किला व चित्रांग तालाब मौर्य राजा चित्रांग द्वारा बनवाया हुआ है चित्तौड़ से कुछ दूर मानसरोवर नामक तालाब पर राजा मान का जो मौर्यवंशी माना जाता हैं

विक्रम संवत 770 का शिलालेख कर्नल टॉड को मिला जिसमें माहेश्वर, भीमभोज और मानचार नाम क्रमशः दिये है इन प्रमाणों से मौर्यों का राजस्थान में अधिकार और प्रभाव स्पष्ट होता है।

राजस्थान में मौर्य वंश ( Maurya dynasty in Rajasthan )

मौर्य युग में मत्स्य जनपद का भाग मौर्य शासकों के अधीन आ गया था। इस संदर्भ में अशोक का भाब्रू शिलालेख अति-महत्त्वपूर्ण है, जो राजस्थान में मौर्य शासन तथा अशोक के बौद्ध होने की पुष्टि करता है।

इसके अतिरिक्त अशोक के उत्तराधिकारी कुणाल के पुत्र सम्प्रति द्वारा बनवाये गये मंदिर इस वंश के प्रभाव की पुष्टि करते है। कुमारपाल प्रबंध तथा अन्य जैन ग्रन्थों से अनुमानित है कि चित्तौड़ का किला व एक चित्रांग तालाब मौर्य राजा चित्रांग का बनवाया गया है।

चित्तौड़ से कुछ दूर मानसरोवर नामक तालाब पर मौर्यवंशी राजा मान का शिलालेख मिला है।  जी.एच. ओझा ने उदयपुर राज्य के इतिहास में लिखा है कि चित्तौड़ का किला मौर्य वंश के राजा चित्रांगद ने बनाया था, जिसे आठवीं शताब्दी में बापा रावल ने मौर्य वंश के अंतिम राजा मान से यह किला छिना था।

इसके अतिरिक्त कोटा के कणसवा गाँव से मौर्य राजा धवल का शिलालेख मिला है जो बताता है कि राजस्थान में मौर्य राजाओं एवं उनके सामंतों का प्रभाव रहा होगा।

राजस्थान में जनपद ( District in Rajasthan )

राजस्थान के प्राचीन इतिहास का प्रारंभ प्रागैतिहासिक काल से ही शुरू हो जाता है। प्रागैतिहासिक काल के कई महत्त्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल प्राप्त होते जैसे- बागोर से प्राचीनतम पशुपालन के साक्ष्य मिले तथा दर, भरतपुर से प्राचीन चित्रित शैलाश्रय मिली है किंतु यहाँ से कोई लिखित साक्ष्य नहीं मिलते हैं जिसके कारण इनका विस्तृत अध्ययन संभव नहीं हो पाया है।

 प्राचीनतम साहित्य 6वीं सदी ईस्वी पूर्व से प्राप्त होते हैं जो राजस्थान में जनपद युग का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह जनपद चित्तौड़, अलवर, भरतपुर, जयपुर क्षेत्र में विस्तृत थे तथा यह क्रमशः शिवी, राजन्य, शाल्व एवं मत्स्य जनपद के नाम से जाने जाते थे।

कालांतर में महाजनपद का काल आया जिसमें राजस्थान के दो महत्त्वपपूर्ण महाजनपद का वर्णन मिलता है, जो निम्न थे- शुरसेन एवं कुरु जो क्रमशः भरतपुर, धौलपुर एवं अलवर क्षेत्र में विस्तृत थे।

महाभारत युद्ध के बाद कुरु और यादव जन-पद निर्बल हो गये। महात्मा बुद्ध के समय से अवन्ति राज्य का विस्तार हो रहा था। समूचा पूर्वी राजस्थान तथा मालवा प्रदेश इसके अंतर्गत था। ऐसा लगता है कि शूरसेन और मत्स्य भी किसी न किसी रूप में अवंति के प्रभाव क्षेत्र में थे।

327 ई. पू. सिकन्दर के आक्रमण के कारण पंजाब के कई जनों ने उसकी सेना का सामना किया। अपनी सुरक्षा और व्यक्तित्व को बनाए रखने के लिए ये कई कबीले राजस्थान की ओर बढ़े जिनमें मालव, शिवी, अर्जुनायन, योधेय आदि मुख्य थे। इन्होंने क्रमशः टोंक, चित्तौड़, अलवर-भरतपुर तथा बीकानेर पर अपना अधिकार स्थापित कर दिया।

मालव जनपद में श्री सोम नामक राजा हुआ जिसने 225 ई. में अपने शत्रुओं को परास्त करने के उपलक्ष में एकषष्ठी यज्ञ का आयोजन किया। ऐसा प्रतीत होता है कि समुद्रगुप्त के काल तक वे स्वतंत्र बने रहे।

मत्स्य जनपद ( Matsya Janapad )- 

मत्स्य शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है जहां मत्स्य निवासियों को सुदास का शत्रु बताया गया है। मत्स्य जनपद आधुनिक जयपुर, अलवर, भरतपुर के मध्यवर्ती क्षेत्र में विस्तृत था। इसकी राजधानी विराटनगर थी।

महाभारत काल में मत्स्य जनपद पर विराट नगर शासक शासन कर रहा था तथा यह माना जाता है कि इसी विराट ने विराटनगर (बैराठ) की स्थापना की थी। नृत्य की कत्थक शैली के प्रणेता मिहिर ईसा पूर्व दूसरी सदी में मत्स्य देश में ही हुआ था।

कुरू जनपद ( Kuru district ) – राज्य में अलवर का उत्तरी भाग कुरु जनपद का हिस्सा था। इसकी राजधानी इन्द्रपथ थी।

अवंती जनपद ( Avanti District ) :- अवंति महाजनपद महत्व वर्तमान मध्य प्रदेश की सीमा में था परंतु सीमावर्ती राजस्थान का क्षेत्र इसके अंतर्गत आता था।

मालवा जनपद ( Malwa district ) :-  मालव सिकंदर के आक्रमण के कारण राजस्थान में प्रवेश कर गए और यहां अजमेर, टोंक, मेवाड़ के मध्यवर्ती क्षेत्र में बस गए और यहां अपनी बस्तियां स्थापित की। पहली सदी के अंत तक इस क्षेत्र में मानव ने अपनी शक्ति संगठित कर ली तथा मालव नगर को अपनी राजधानी बनाया।

इस स्थान का समीकरण टोंक जिले में स्थित नगर या ककोर्टनगर से किया जाता है। हमें राज्य में जिस जनपद के सर्वाधिक सिक्के अब तक प्राप्त हुए हैं वह मालव जनपद ही है। राज्य में मालव जनपद के सिक्के रैढ तथा नगर (टोंक) से प्रमुखता से मिले हैं। मालवो द्वारा 57 ईसवी पूर्व को मालव संवत के रूप में उपयोग किया गया। यह संवत पहले कृत फिर मालव और अंततः विक्रम संवत कहलाया।

शूरसेन जनपद ( Shoresen district ) :- इसका क्षेत्र वर्तमान पूर्वी अलवर,धौलपुर,भरतपुर तथा करौली था। इसकी राजधानी मथुरा थी। वासुदेव पुत्र कृष्ण का संबंध किस जनपद से था।

शिवि जनपद ( Shivi district ) :- 

मेवाड़ प्रदेश (चितौड़गढ) नामकरण की दृष्टि से द्वितीय शताब्दी में शिव जनपद (राजधानी माध्यमिका) के नाम से प्रसिद्ध था। बाद में ‘प्राग्वाट‘ नाम का प्रयोग हुआ। कालान्तर में इस भू भाग को ‘मेदपाट‘ नाम से सम्बोधित किया गया।

छठी शताब्दी ईसापूर्व सिकंदर के आक्रमण के परिणाम स्वरुप सभी लोग पंजाब से राजस्थान की ओर आय तथा चित्तौड़ के समीप नगरी नामक स्थान पर बस गए नगरी को ही मध्यमिका के नाम से जाना जाता है राज्य में शिवि जनपद के अधिकांश सिक्के नगरी क्षेत्र से ही प्राप्त हुए हैं। इस जनपद का उल्लेख पाणिनी कृत अष्टाध्यायी से मिलता है।

यौद्धेय जनपद ( Yudhayya district ) :- योद्धेय जनपद वर्तमान श्रीगंगानगर हनुमानगढ़ क्षेत्र में विस्तृत था।

राजन्य जनपद ( State level) :- राजन्य जनपद वर्तमान भरतपुर क्षेत्र में विस्तृत था।

अर्जुनायन जनपद ( Arjunaan district ) :- अर्जुनायन जनपद अलवर क्षेत्र में विस्तृत था।

शाल्व जनपद ( Shalve district ) :-  शाल्व जनपद अलवर क्षेत्र में विस्तृत था।