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Arts & Culture

August 18, 2020

राजस्थान की कुलदेवी Rajasthan Kuldevi

राजस्थान की कुलदेवी

राजस्थान के जनमानस में शक्ति की प्रतीक के रूप में लोक देवियों के प्रति अटूट श्रद्धा, विश्वास और आस्था है । साधारण परिवारों की इन कन्याओं ने कल्याणकारी कार्य किए और अलौकिक चमत्कारो से जनसाधारण के दु:खो को दूर किया । इसी से जन सामान्य ने लोक देवियों के पद पर प्रतिष्ठित किया ।राजस्थान की प्रमुख लोक देवीयाँ निम्न है-

करणी माता ( Karni Mata )

कुलदेवी करणी माता

देशनोक(बीकानेर)

बीकानेर के राठौड़ शासकों की कुलदेवी करणी जी “चूहों वाली देवी” के नाम से विख्यात है । इनके आशीर्वाद से ही राव बीका ने बीकानेर राज्य की स्थापना की थी । इनका जन्म सूआप गांव में चारण जाति के श्री मेंहा जी के घर हुआ था ।

देशनोक स्थित इनके मंदिर में बड़ी संख्या में चूहे हैं जो “करणी जी की काबे” कहलाते हैं । यहां के सफेद चूहे के दर्शन करणी जी के दर्शन माने जाते हैं । करणी जी का मंदिर “मठ” कहलाता है । करणजी देवी का एक रुप से ‘सफेद चील’ भी है ।

करणी जी की इष्ट देवी “तेमड़ा” है । करणी जी के मंदिर के पास तेमड़ा राय देवि मंदिर भी है । करणी माता के मंदिर से कुछ दूर नेहड़ी नामक दर्शनीय स्थल है ,जंहा करनी जी देवी सर्प्रथम रही है ।

शीतला माता ( Shitala Mata )

कुलदेवी शीतला माता Shitala Mata

चाकसू ( जयपुर )

चेतक की देवी के रुप में प्रसिद्ध शीतला माता के अन्य नाम सेढ़ल माता या महामाई है । चाकसू स्थित माता के इस मंदिर का निर्माण जयपुर के महाराजा श्री माधोसिंह जी ने करवाया था ।

होली की पश्चात चैत्र कृष्ण अष्टमी को इनकी वार्षिक पूजा होती है । एंव चाकसू के मंदिर पर विशाल मेला भरता है । इस दिन लोग बास्योड़ा मनाते हैं अर्थात रात का बनाया ठंडा भोजन खाते हैं । शीतला माता की सवारी गधा है ।

बच्चों की संरक्षिका देवी है तथा बांध स्त्रियां संतान प्राप्ति हेतु भी इसकी पूजा करती है । प्रायः जांटी (खेजड़ी ) को शीतला मानकर पूजा की जाती है । शीतला देवी की पूजा खंडित प्रतिमा के रूप में की जाती है तथा इसके पुजारी कुम्हार जाति के लोग होते हैं ।

जीण माता ( Jeen Mata Sikar )

कुलदेवी जीण माता Jeen Mata

जीण माता का मंदिर सीकर जिले से 15 किलोमीटर दक्षिण में रेवासा नामक गांव के पास तीन छोटी पहाड़ीयों के मध्य स्थित है । यह चौहान वंश की कुलदेवी है  इस मंदिर में जीण माता की अष्टभुजी प्रतिमा है । 

कहां जाता है कि जीण(धंध राय की पुत्री ) तथा हर्ष दोनों भाई बहिन थे । जीण आजीवन ब्रम्हचारिणी रही और तपस्या के बल पर देवी बन गयी यहां चैत्र व आसोज के महीने में शुक्ल पक्ष की नवमी को मेले भरते हैं ।

राजस्थानी लोक साहित्य में इस देवी का गीत सबसे लंबा है इस गीत को कनपटी जोगी केसरिया कपड़े पहन कर ,माथे पर सिंदूर लगाकर ,डमरु एंव सारंगी पर गाते हैं । यह करुण रस से ओत प्रोत हैं । जीणमाता के मंदिर का निर्माण पृथ्वीराज चौहान प्रथम के शासनकाल में राजा हट्टड़ द्वारा करवाया गया ।

केला देवी करोली ( Kaila Devi Karauli )

कुलदेवी केला देवी करोली

यह करोली के यादव वंश की कुल देवी है । केला देवी का मंदिर करोली के पास त्रिकुट पर्वत में त्रिकुट की घाटी में स्थित है । इनके भगत इनकी आराधना में प्रसिद्ध “लांगुरिया गीत” गाते हैं ।

नवरात्रा में इनका विशाल लक्खी मेला भरता है । देवी के मंदिर के सामने बोहरा की छतरी है । मान्यता है कि कंस वासुदेव और देवकी की जिस कन्या संतान को शीला पर पटक कर मारना चाहा था वही नवजात कन्या योगमाया से त्रिकुट पर्वत पर केला देवी बनकर प्रकट हुई ।

इनका मेला प्रतिवर्ष चैत्र मास की शुक्ला अष्टमी को भरता है ।

राणी सती / नारायणी माता ( Narayani Mata  )

कुलदेवी राणी सती / नारायणी माता

अग्रवाल जाति की राणी सती का वास्तविक नाम नारायणी था । अपने पति की चिता पर प्राणोंत्सर्ग कर देने वाली सतियो की भी देवियों की तरह पूजा होती है झुंझुनूं की राणी सती पूरे प्रदेश में पूजी जाती है इनका विवाह तनधन दास से हुआ था।

झुंझुनूं में प्रतिवर्ष भाद्रपद कृष्णा अमावस्या को राणी सती का मेला भरता है अब प्रदेश में सती पूजन एवं महिमा मंडन पर रोक लगा दी गयी है इन्हें “दादी जी” भी कहा जाता है। यह चण्डिका के रूप में पूजी जाती है राणी सती के परिवार में 13 स्त्रियां सती हुई है

आई माता ( Aai mata )

बिलाड़ा (जोधपुर)

सिरवी जाति के लोगो की कुलदेवी । 

Other Important Rajasthan Kuldevi – 

  • आवड़ माता/हिंगलाज माता, जैसलमेर:-जैसलमेर में भाटी राजवंश की कुल देवी
  • आशापुरी माता/मोदरां माता, जालौर:-जालौर के सोनगरा चौहान शासकों की कुल देवी
  • सकराय माता,सीकर:-खण्डेलवालो कि कुल देवी
  • सच्चिया माता, जोधपुर:-ओसवालों की कुल देवी
  • राणासण देवी,मेवाड़:-राष्ट्रश्येना देवी को अपभ्रंश में राणासण देवी कहा जाता है ।
  •  सुंधामाता ,जालोर
  • सुराणा देवी ,नागौर
  • स्वांगियाजी आईनाथ जी माता, जैसलमेर
  • सुगाली माता ,आउवा (पाली):- आउवा के ठाकुरों( चंपावतो) की कुलदेवी सुगाली माता का मंदिर आउवा(पाली ) सन 1857 की क्रांति का मुख्य केंद्र रहा । इसके 54 भुजाएं तथा 10 सिर है ।
  • ब्राह्मणी माता, बारां:-विश्व मे एकमात्र देवी जंहा देवी की पीठ की ही पूजा होती है ।यंहा माघ शुक्ला सप्तमी को गधो का मेला भी लगता है ।
  • जिलाणी माता ,अलवर
  • नारायणी माता, राजगढ़ (अलवर)
  • शिला देवी(अन्नपूर्णा),आमेर:-कछवाहा राजवंश की कुल देवी ।
  • अम्बिका माता, जगत(उदयपुर):-“मेवाड़ का खजुराहो” कहलाता है ।
  • घेवर माता, राजसमंद ।

August 18, 2020

राजस्थान लोक देवता Rajasthan Folk God

राजस्थान लोक देवता

1. Pabuji ( पाबूजी )

पाबूजी

राठौड़ राजवंश के पाबूजी राठौड़ का जन्म 13 वीं शताब्दी में फलोदी (जोधपुर) के निकट “कोलूमण्ड” में धाँधल एवं कमलादे के घर हुआ।

पिता -धांधल , माता -कमलादे
पत्नी – अमरकोट के सूरजमल लोढा की पुत्री सुप्यारदे

राजस्थान के पंच पीर पाबु जी , हड़बूजी ,रामदेव जी ,गोगाजी एवं मांगलिया मेहा जी को कहा जाता है । ये राठौड़ो के मूल पुरुष सीहा वंसज थे ।

इनका विवाह अमरकोट के राजा सूरजमल सोढा की पुत्री सुप्यारदे से हो रहा था, कि ये चौथे फेरे के बीच से ही उठकर अपने बहनोई जायल के जीन्दराव खींची से देवल चारणी ( जिसकी केसर कालमी घोड़ी ये मांग कर लाए थे ) की गायें छुड़ाने चले गए और देंचु गांव में युद्ध करते हुए वीर गति को प्राप्त हुए।

इन्हें गौरक्षक ,प्लेग रक्षक और ऊँटो के देवता के रूप में पूजा जाता है । कहा जाता है मारवाड़ में सर्वप्रथम ऊंट(साण्ड) लाने के श्रेय इनको ही जाता है ।अतः ऊँटो की पालक राईका (रेबारी) जाति इन्हें अपना आराध्य देव मानती है ।

इन्हें लक्ष्मण का अवतार माना जाता है और मेहर जाति के मुसलमान इन्हें पीर मानकर पूजा करते है । पाबुजी केसर कालमी घोड़ी एवं बांयी ओर झुकी पाग के लिए प्रशिद्ध है । इनका बोध चिन्ह “भाला” है ।

कोलमुण्ड में इनका सबसे प्रमुख मंदिर है,जहाँ प्रतिवर्ष चैत्र अमावश्या को मेला भरता है । पाबु जी से संबंधित गाथा गीत ‘पाबुजी के पवाड़े’ माठ वाद्य के साथ नायक एवं रेबारी जाति द्वारा गाये जाते है ।

‘पाबुजी की पड़’ नायक जाति के भोपों द्वारा ‘रावणहत्था’ वाद्य के साथ बाँची जाती है । आशिया मोड़जी द्वारा लिखित ‘पाबु प्रकाश’ पाबु जी के जीवन पर एक महत्वपूर्ण रचना है ।

थोरी जाति के लोग सारंगी द्वारा पाबूजी का यश गाते हैं, जिसे राजस्थान की प्रचलित भाषा मे “पाबू धणी री वाचना” कहते हैं।

2. Goga Ji ( गोगा जी, ददरेवा चुरू )

 गोगा जी, ददरेवा चुरू

चौहान वीर गोगाजी का जन्म वि.सं. 1003 में चुरू जिले के “ददरेवा गांव” में हुआ था। इनके पिता का नाम जेवर सिंह तथा माता का नाम बाछल देवी था। इनका विवाह कोलूमण्ड की राजकुमारी केलमदे के साथ हुआ था।

गोगाजी को नागों का देवता कहा जाता है। आज भी सर्पदंश से मुक्ति के लिए गोगाजी की पूजा की जाती है। “भाद्रपद कृष्णा नवमी” को गोगाजी की स्मृति में मेला भरता है। महमूद गजनवी ने गोगाजी को “जाहीरा पीर” कहा।

गोगाजी “जाहरपीर” के नाम से प्रशिद्ध है। मुसलमान इन्हें “गोगापीर” कहते हैं। गोगाजी ने गौ रक्षा एवं तुर्क आकंर्ताओं (महमूद गजनवी) से देश की रक्षार्थ अपने प्राण न्योछावर कर दिये।

राजस्थान का किसान वर्षा के बाद हल जोतने से पहले गोगाजी के नाम की राखी “गोगा राखड़ी” हल और हाली, दोनों को बांधता है। गोगाजी के “थान” खेजड़ी वृक्ष के नीचे होते हैं।

जहां मूर्ति स्वरूप एक पथर पर सर्प की आकृति अंकित होती है। ऐसी मान्यता है कि युद्ध भूमि में लड़ते हुए गोगाजी का सिर चुरू जिले के जिस स्थान पर गिरा था वहाँ “शीश मेड़ी” तथा युद्ध करते हुए जहाँ शरीर गिरा था उसे “गोगामेड़ी” कहा जाता है।

गोगाजी के जन्मस्थल ददरेवा को “शीर्ष मेड़ी” तथा तथा समाधि स्थल “गोगामेड़ी” (नोहर-हनुमानगढ़) को ‘धुरमेडी” भी कहते हैं । गोगामेड़ी की बनावट मकबरेनुमा है।

सांचोर (जालौर) में भी “गोगाजी की ओल्डी” नामक स्थान पर गोगाजी का मंदिर है। गोगाजी की सवारी “नीली घोड़ी” थी। इन्हें “गोगा बप्पा” के नाम से भी पुकारते हैं। गोगाजी की पूजा भाला लिए योद्धा के रूप में या सर्प के रूप में होती है।

3. Baba Ramdev ji  ( बाबा रामदेव जी

लोक देवता बाबा रामदेव जी

सम्पूर्ण राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश आदि राज्यों में तथा पाकिस्तान में “रामसा पीर”, “रूणिचा रा धणी” व “बाबा रामदेव” नाम से प्रशिद्ध लोकदेवता रामदेवजी तंवर वंशीय राजपूत थे। कामड़िया पंथ के संस्थापक रामदेवजी का जन्म उण्डूकासमेर (बाड़मेर) में हुआ। इनका जन्मकाल वि.सं. 1409 से 1462 के मध्य माना जाता है। 

  • जन्म- उडूकासमेर बाड़मेर में तंवर राजपूत कुल में
  • पिता-  अजमाल जी
  • माता- मैणादे
  • अवतार- कृष्ण का अवतार!
  • विवाह- उमरकोट के सोढा राजपूत दल्ले सिंह की पुत्री नेतल दे देख के साथ

रामदेव जी को हिंदू विष्णु का अवतार तथा मुसलमान इन्हें रामसापीर और पीरों के पीर मानते हैं भाद्रपद शुक्ला द्वितीय से लेकर एकादशी तक रुणिचा रामदेवरा में मेला भरा जाता है मेले का मुख्य आकर्षण कामड़ जाति की स्त्रियों द्वारा तेरहताली नृत्य  है

रामदेवजी को साम्प्रदायिक सद्भाव के देवता माने जाते हैं क्योंकि यहाँ हिन्दू-मुस्लिम एवं अन्य धर्मो के लोग बड़ी मात्रा में आते हैं।

रामदेव जी ने सातलमेर (पोकरण) में भैरव नामक तांत्रिक रक्षक का वध किया था। रामदेवजी ने रामदेवरा नामक गांव बसाया था।

Temple of Ramdev ( रामदेव जी के अन्य मंदिर )

  • मसूरिया पहाड़ी➡ जोधपुर
  • बिराटिया➡ अजमेर
  • सुरता खेड़ा➡ चित्तौड़गढ़
  • छोटा रामदेवरा ➡गुजरात

रामदेवजी के चमत्कारों को पर्चा कहते हैं वह भक्तों द्वारा गाए जाने वाले भजन व्यावले कहते  हैं रिखिया रामदेव जी के मेघवाल जाति के भक्तों को कहा जाता है जम्मा रामदेव जी के नाम पर भाद्रपद द्वितीय से एकादशी तक जो रात्रि जागरण किया जाता है उन्हें जम्मा कहते हैं

रामदेव जी का घोड़ा- लीला घोड़ा

रामदेव जी के मंदिर को देवरा कहा जाता है जिन पर श्वेत या 5 रंगों की नेजा फहरायी जाती है रामदेव जी एक मात्र लोक देवता हैं जो कवि भी थे इन्होंने चौबीस बाणिया की रचना की

डाली बाई- मेघवाल जाति की महिला जिसे रामदेव जी ने अपनी धर्म बहिन बनाया था डाली बाई ने रामदेव जी से 1 दिन पूर्व उनके पास ही जीवित समाधि ली थी, जहाँ वहीं पर “डाली बाई का मंदिर” बनवाया गया।

रामदेव जी ने भाद्रपद सुदी एकादशी संवत 1515 को रुणिचा के राम सरोवर के किनारे जीवित समाधि ली थी। रामदेवरा (रूणिचा) में रामदेवजी के समाधि स्थल पर भाद्रपद शुक्ला द्वितिया से एकादसी तक विशाल मेले का आयोजन होता है।

4. Hadabu ji ( हड़बू जी )

हड़बू जी

हड़बूजी भूंडोेल (नागौर )के राजा मेहा जी सांखला के पुत्र थे व मारवाड़ की राव जोधा के समकालीन थे। हड़बूजी लोक देवता रामदेव जी के मौसेरे भाई थे, उनकी प्रेरणा से ही हड़बूजी ने अस्त्र शस्त्र त्याग कर योगी बालीनाथ से दीक्षा ली। हड़बूजी का मुख्य पूजा स्थल बैंगटी ( फलौदी ) में है।

इनके पुजारी सांखला राजपूत होते हैं। श्रद्धालुओं द्वारा मांगी गई मनौतियां या कार्य सिद्ध होने पर गांव बैंगटी में स्थापित मंदिर में “हड़बूजी की गाड़ी” की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस गाड़ी में हड़बूजी पंगु गायों के लिए घास भरकर दूर-दूर से लाते थे।

हड़बूजी शकुन शास्त्र के भी अच्छे जानकार व भविष्यदृष्टा थे। हड़बूजी मारवाड़ के पंच पीरों में से एक हैं। “सांखला हडबू का हाल” इनके जीवन पर लिखा है प्रमुख ग्रंथ है।

इनके आशीर्वाद व इनके द्वारा भेंट की गई कटार के माहात्म्य से जोधपुर के संस्थापक राव जोधा ने मंडोर दुर्ग पर पुनः अधिकार कर उसे मेवाड़ के आधिपत्य से मुक्त करा लिया था।

5. Devnarayan ji ( देवनारायण जी )

देवनारायण जी लोक देवता

देवनारायण जी का जन्म सन 1243 ई.( विक्रम संवत 1300 ) में आसींद ( भीलवाड़ा ) में हुआ था। देवनारायण जी बगड़ावत कुल के नागवंशीय गुर्जर परिवार से संबंधित थे।

इनके पिता का नाम सवाई भोज और माता का नाम सेढू था था। इनके जन्म का नाम उदय सिंह था। देवनारायण जी का घोड़ा लीलागर ( नीला ) था। इनकी पत्नी का नाम पीपल दे था जो धार नरेश जय सिंह देव की पुत्री थी।

देवनारायण जी के देवरों में उनकी प्रतिमा के स्थान पर बड़ी इंटो की पूजा की जाती है। इसलिए इन्हें “ईंटों का श्याम” भी कहा जाता है।इनके प्रमुख अनुयाई गुर्जर जाति के लोग हैं जो देव नारायण जी को विष्णु का अवतार मानते है।

इन्होंने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर जनता के दुखों को दूर करने के लिए ज्ञान का प्रचार- प्रसार किया।

देवनारायण जी की पड़ “गुर्जर भोपों” द्वारा “जंतर वाद्य” के साथ बांची जाती है।

इनकी पड राज्य की सबसे बड़ी फड है। देवनारायण का प्रमुख पूजा स्थल आसींद (भीलवाड़ा) में है।

यहां पर प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को मेला लगता है।

देवनारायण जी औषधि शास्त्र के भी ज्ञाता थे।

इन्होंने गोबर तथा नीम का औषधि के रूप में प्रयोग के महत्व को प्रचारित किया।

देवनारायण जी ऐसे प्रथम लोक देवता हैं

जिन पर केंद्रीय सरकार के संचार मंत्रालय में सन 2010 में ₹5 का डाक टिकट जारी किया था।

देवनारायण जी के जन्मदिन भाद्रपद शुक्ल छठ को गुर्जर लोग दूध नहीं जमाते और नहीं बेचते हैं।

देवनारायण जी से संबंधित प्रमुख ग्रंथ –

बात देवजी बगड़ावत री, देव जी की पड़, देवनारायण का मारवाड़ ख्यात एवं बगडावत आदि हैं।

देवनारायण जी ने भिनाय के शासक को मारकर पिता की हत्या का बदला लिया

तथा अपने पराक्रम, और सिद्धियों का प्रयोग अन्याय का प्रतिकार करने व जन कल्याण में किया।

देवनारायण जी देहमाली/देवमाली मैं देह त्यागी। देवमाली को बगड़ावतों का गांव कहते हैं।

देवनारायण जी का मूल देवरा आसींद (भीलवाड़ा) के पास गोंठा दडावत में है।

अन्य प्रमुख देवरे देवमाली ( ब्यावर, अजमेर ), देव धाम जोधपुरिया (निवाई, टोंक)व देव डूंगरी पहाड़ी (चित्तौड़गढ़ )में हैं।

देव धाम जोधपुरिया में देवनारायण जी के मंदिर में बगड़ावतों की शौर्य गाथाओं का चित्रण किया हुआ है।

राजस्थान में देवमाली (अजमेर) नामक स्थान को बगड़ावतों का गांव का जाता है। यहीं पर देवनारायण जी का देहांत हुआ, यहां देवनारायण की संतानों बिला व बीली ने तपस्या की। यहां पर देवनारायण व सवाईभोज के मंदिर निर्मित है।

वनस्थली विद्यापीठ से 8 किलोमीटर दूर “देवधाम” जोधपुरिया( टोंक ) हैं, जहां के देवनारायण मंदिर में बगड़ावतों की शौर्य गाथाओं के चित्र बने हुए हैं। यहां भी प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ला सप्तमी को विशाल मेला लगता है

देवनारायण जी के अन्य स्थान ( Devnarayan temple )

  • गोठ (आसींद,भीलवाड़ा)
  • देवमाली (ब्यावर,अजमेर)
  • देवधाम जोधपुरिया (निवाई, टोंक )
  • देव डूंगरी पहाड़ (चित्तौड़गढ़)

Devnarayan ki Phad ( देवनारायण की फड़ )- राजस्थानी भाषा में देवनारायण री पड़। एक कपड़े पर बनाई गई भगवान विष्णु के अवतार देवनारायण की महागाथा है, जो मुख्यतः राजस्थान तथा मध्य प्रदेश में गाई जाती है।। राजस्थान में भोपे फड़ पर बने चित्रों को देखकर गाने गाते हैं, जिसे राजस्थानी भाषा में “पड़ का बाचना” कहा जाता है।  देवनारायण भगवान विष्णु के अवतार थे।

6. Tejaji ( तेजाजी, खड़नाल नागौर )

इनका जन्म मारवाड़ के नागौर परगने के खरनाल नामक ग्राम में जाट जाति के धौल्या गोत्र में विक्रम संवत 1130 (1073 ईस्वी) की माघ शुक्ला चतुर्दशी बृहस्पतिवार को हुआ था। इनके पिता का नाम तहाड़ जी और माता का नाम रामकुवंरी था।

तेजाजी लोक देवता

सुरसरा में विक्रम संवत (1160) 1103 ईस्वी की भादवा सुदी दशमी को उनका स्वर्गवास हो गया।  उनकी पत्नी का नाम पेमलदे था जो पनेर के रामचंद्र की पुत्री थी। तेजाजी को “धौलिया वीर” भी कहा जाता है।

तेजाजी की घोड़ी लीलण (सिणगारी) थी। इन्होंने लाछा गूजरी की गायों मेरों से छुड़ाने हेतु अपने प्राणोंत्सर्ग किए। इसलिए तेजाजी को परम गो-रक्षक व गायों का मुक्तिदाता माना जाता है।

सर्प व कुत्ते के काटे प्राणी के स्वस्थ होने हेतु इनकी पूजा की जाती है। इन्हें “काला और बाला” का देवता भी कहा जाता है. प्रत्येक किसान तेजाजी के गीत के साथ ही बवाई प्रारंभ करता है. इनके मुख्य “थान” अजमेर जिले के सुरसुरा, ब्यावर, सेंदरिया एवं भावतां में है।

इनके जन्म स्थान खरनाल में भी इनका मंदिर है सर्पदंश का इलाज करने वाले तेजाजी के भोपे को ‘घोड़ला’ कहते हैं। राजस्थान में तेजाजी सांपों के देवता के रूप में पूजे जाते हैं।

लोक देवता & उनकी पत्नियां ( Folk God & their Wives )

  • बाबा रामदेव      –  निहाल दे ( नेतल दे)
  • गोगाजी              –  कैलम दे
  • वीर तेजाजी        –  पेमल(अजमेर)
  • पाबूजी               –  फूलम दे
  • देवनारायण जी   –  पीपलदे

लोक देवता व पशु ( Folk Gods or Animals )

  • हरबूजी             –  सियार 
  • बाबा रामदेव     –  नीला घोडा
  • गोगाजी             –  नीली घोडी
  • मेहा मांगलिया   –  किरड काबरा ( घोडा)
  • पाबुजी              –  केसर कलमी ( घोडी)
  • तेजाजी              –  लीलण घोडी 

लोक देवता लोक देवता

August 17, 2020

राजस्थान के रीति -रिवाज Customs and Traditions

वैवाहिक रीति-रिवाज

  • बरी -पड़ला : – वर पक्ष विवाह के अवसर पर वधू के लिए श्रृंगारिक सामान, गहने एवं कपड़ें लाता हैं, जिसे ‘ बरी-पड़ला’ कहते हैं।
  • मोड़ बांधना:- विवाह के दिन वर के सिर पर सेहरा बांधा जाता हैं।
  • टीका (तिलक):-विवाह के निशिचत होने पर वे उपहार जो लड़की के पिता की ओर.से लड़के के लिए भेजे जाते थे ‘ टीका ‘ कहलाता था।
  • रीत:- विवाह निश्चित होने पर लड़के की तरफ से लड़की को भेजे उपहार ‘ रीत’ कहलाते है।
  • सामेला (मधुपर्क):-जब वर वधू के घर जाता हैं तो वधू के पिता द्रारा संबधियों के साथ वर पक्ष स्वागत करना ‘ सामेला ‘ कहलाता था।
  • बिंदोली:- विवाह के अवसर पर वर -वधू की निकासी जो बिंदोली होती हैं।
  • सगाई:- वर पक्ष की ओर स वधू के लिए जो गहने, कपड़ा, मिठाई आदि देते है। उसे पहरावणी या चिकणी कोथली कहते है।ओर उपहार देते है।
  • लग्न पत्रिका ( पीली चिठ्टी ):- सगाई के पशचात पुरोहित से विवाह की तिथि तय करवा के कन्या पक्ष को भेजते हैं इसे लग्न पत्रिका अथवा पीली चिठ्ठी भेजना कहते हैं।
  • इकताई:- वर के द्रारा ये कपड़ें निकासी के दिन पहने जाते है।
  • मुगधणा:- भोजन पकाने के लिए काम मे ली गई लकड़ियां।

  • हलदाय की पूजा:- विवाह के पाॅच, सात दिन पूर्व लग्न पत्रिका पहुँचने के बाद दोनो पक्षों के द्रारा गणेश पूजन व इसे पाट बैठाना या बाने बैठाना कहते हैं।
  • राति जगा:- वर के घर पर बरात जाने की पूर्व रात्रि तथा वधू के घर पर विवाह के पूर्व की रात्रि को रात्रि को जागरण- व मंगल कामना के गीत गाये जाते है।
  • बतीसी नूतना:- इस अवसर पर वर -वधू की माता अपने पीहर वालो को निमंत्रण ओर सहयोग देने की कामना व इसे बतीसी, भात नूतना कहते है।
  • मायरा:- लड़के के विवाह पर माता अपने पीहर वालो को न्योता भेजती है तब उसे आर्थिक स्थिति के अनुसार कुछ देते हैं वो मायरा ,भात भरना कहा जाता हैं।
  • निकासी:- वर अपने संगे-संम्बंधी, मित्रो के साथ वधू के घर की प्रस्थान करते हैं इसे जान चढ़ना या निकासी कहते हैं
  • कंवारी जान का भात:- बरातका स्वागत करने के बाद भोजन कराना कहलाता है।
  • चाक-भात :- विवाह से एक दिन पूर्व दुल्हे-दुल्हन के मामा की ओर वस्त्राभूषण भेट करना वह भात कहलाता है।
  • तोरण:- जब वर कन्यागृह पर प्रथम बार पहुंचता हैं वह दरवाजे पर बंधे तोरण को छड़ी से सात बार छूता हैं तोरण मांगलिक चिह् होता हैं।
  • जांनोटण: – वर पक्ष की ओर भोज दिया जाना।
  • छेड़़ा-छेड़ी :- विवाह के अवसर पर हथलेवा के लगाई जाने वाली गांठ।

  • पाणिग्रहण:- वर -वधू को मामा के द्रारा हाथो मे मेहंदी रख कर हाथ जोड़े जाते है, इसे हथलेवा जोड़ना कहते है।
  • कन्यावल:- विवाह के दिन वधू के माता-पिता, बडे़ भाई, बहिन आदि उपवास रखते हैं कन्याधान के पश्चात ही वे भोजन करते है, इसे कन्यावल, अखनाल,कलवास्या कहा जाता हैं।
  • पहरावणी/रंगबारी:- बारात बिदा करते समय प्रत्येक बाराती तथा वर-वधू को यथाशक्ति धन व उपहार देते है।?
  • ओझण :- बेटी को दहेज दिया जाने वाला।
  • जेवनवार :-वधू के घर पर बरात को चार जेवनवार (भोज) देने का आम रिवाज हैं। इसमे केवल घर के ही सदस्य, मित्रगण आदि।,
  • लडार:- कायस्थ जाति मे विवाह के छठे दिन वधू वधू पक्ष को भोजन देना।
  • हीरावणी :- विवाह के दौरान दुल्हन को कलेवा।
  • बरोटी:- विवाह के पश्चात दुल्हन के स्वागत मे भोज ।
  • जुआ जुई:- विवाह के दूसरे दिन।

  • ओलन्दी :- वधू के साथ पीहर से निकट सम्बन्धी आता वह ओलन्दा, अणवादी कहलाती हैं।
  • हथबोलणो:- दुल्हन का प्रथम परिचय।
  • रियाण:- पश्चिम मे विवाह के बाद मान मनुहार।
  • हरक बनौला:- श्रीमालियो मे यदि किसी की पहली लड़की का विवाह होता हैं तो चावल, लापसी खाना खिलाया जाता हैं।
  • सिंघोड़ा:– श्रीमालियो मे विवाह से पहले ‘ सिघोड़ा’ ,होता हैं।
  • सामा:- श्रीमालियो मे दूसरे दिन प्रात: ‘सामा’ की रस्म पूरी की जाती हैं।
  • छिक्की:- पुष्करणा ब्राह्मणों मे कँवारी जान के दूसरे दिन छिक्की होती हैं।वधू की दरवाजे पर सुहागण स्त्रियां आरती करती हैं।
  • मुकलावा या गौना:- विवाहित अवयस्क कन्या को जब वयस्क होने पर उसे ससुराल भेजा जाता हैं।
  • बढार:- विवाह के अवसर पर दुल्हन वालो की तरफ से सामुहिक भोजन।

रीति -रिवाज

शोक या गमी की रस्में ( Rites of mourning or grief ) :-

  • बकुण्ठी :- मृत्यु के बाद शमशान घाट लकड़ी की शैया पर मृत व्यक्ति को ले जाया जाता हैं।
  • बखेर अथवा उछाल:- कि सी सम्पन्न व्यक्ति की मृत्यु पर पैसे लुटाये या उछाले जाते है।
  • आधेटा:- घर और शमशान तक की यात्रा के बीच मे चौराहे पर बैकुण्ठी का दिशा परिवर्तन किया जाता हैं।
  • सांतरवाडा:- अंतिम संस्कार के बाद स्नान करना।
  • फूल एकत्र करना या फूल चुनना :- तीसरे दिन होता हैं।
  • तीया:- मृत के तीन दिन बाद उठावे की बैठक मित्रगण, परिवार, रिश्तेदार आदि सान्तवना देते है।
  • पगड़ी, श्राद्ध, नुक्ता या मोसर,ओख, दोवणिया- मृतक के 12वे दिन घर की शुद्धि हेतु जल से भरे जाने वाले मटके।

अन्य रिति-रिवाज ( Rituals )

  • नांगल,
  • जडूला,
  • जनेऊ प्रथा,
  • जामणा ,
  • देराल्ली आदि।

रीति -रिवाज रीति -रिवाज रीति -रिवाज रीति -रिवाज

August 17, 2020

राजस्थान के दुर्ग व महल Rajasthan Fort

राजस्थान के दुर्ग

राजस्थान के राजपूतों के नगरों और प्रासदों का निर्माण पहाडि़यों में हुआ, क्योकि वहां शुत्रओं के विरूद्ध प्राकृतिक सुरक्षा के साधन थे शुक्रनीति में दुर्गो की नौ श्रेणियों का वर्णन किया गया।

  1. एरण दूर्ग- खाई, कांटों तथा कठोर पत्थरों से युक्त जहां पहुंचना कठिन हो जैसे – रणथम्भौर दुर्ग।
  2. पारिख दूर्ग- जिसके चारों ओर खाई हो जैसे -लोहगढ़/भरतपुर दुर्ग।
  3. पारिध दूर्ग- ईट, पत्थरों से निर्मित मजबूत परकोटा -युक्त जैसे -चित्तौड़गढ दुर्ग
  4. वन/ओरण दूर्ग- चारों ओर वन से ढ़का हुआ जैसे- सिवाणा दुर्ग।
  5. धान्वन दूर्ग- जो चारों ओर रेत के ऊंचे टीलों से घिरा हो जैसे-जैसलमेर ।
  6. जल/ओदक- पानी से घिरा हुआ जैसे – गागरोन दुर्ग
  7. गिरी दूर्ग- एकांत में पहाड़ी पर हो तथा जल संचय प्रबंध हो जैसे-दुर्ग, कुम्भलगढ़
  8. सैन्य दूर्ग- जिसकी व्यूह रचना चतुर वीरों के होने से अभेद्य हो यह दुर्ग माना जाता हैं
  9. सहाय दूर्ग- सदा साथ देने वाले बंधुजन जिसमें हो।

राजस्थान के 6 किलों को जून 2013 में UNESCO विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया गया है।

  1. जयपुर का आमेर किला
  2. चित्तौड़गढ़ किला
  3. कुंभलगढ़ किला
  4. रणथंभौर किला
  5. गागरौन किला
  6. जैसलमेर किला

इनको याद करने की ट्रिक

R – रणथम्भौर(सवाई माधोपुर)
A – आमेर(जयपुर)
S – सोनारगढ़(जैसलमेर)
C – चित्तौड़गढ़(चित्तोड़गढ़)
G – गागरोण ( झालावाड़)
K – कुम्भलगढ़(राजसमंद)

चितौड़ का किला ( Chittorgarh fort )

राजस्थान का गौरव, गढ़ो में सिरमौर वीरता एवं शौर्य की क्रीड़ास्थली तथा त्याग व बलिदान का पावन तीर्थ चितौरगढ़ दुर्ग गम्भीरी ओर बेड़च नदियों के संगम स्थल के समीप अरावली पर्वतमाला के एक विशाल पर्वत शिखर पर बना हुआ है जिसे मौर्य राजा चित्रांग (चित्रांगद) ने बनवाया था अपने नाम पर चित्रकोट रखा था, उसी का अपभ्रंश चितौड़ है

गुहिल वंशिय बापा रावल ने मौर्य शासक मान मौर्य ( मान मोरी ) से 734 ई. में यह दुर्ग जीता

चितोड़ के किले का वास्तविक नाम चित्रकूट है आचार्य चाणक्य द्वारा बताई गयी चार कोटियों तथा आचार्य शुक्र द्वारा बताई गयी नो दुर्ग कोटियों में से केवल एक कोटि “धन्व दुर्ग” को छोड़कर चितौड़गढ़ को सभी कोटियों में रखा जा सकता है।

इसी कारण राजस्थान में कहावत कही जाती है कि “गढ़ तो गढ़ चितौड़गढ़, बाकी सब गड़ैया

यह 1810 फीट ऊँचे पठार पर निर्मित है तथा इसका क्षेत्रफल 28 वर्ग कि.मी. है एवं दुर्ग की परिधि लगभग 13 कि.मी. है। राजस्थान के किलों में क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा चितौड का किला है। यह दुर्ग 616 मीटर ऊंचे एक पहाड़ पर स्थित है जिसे मेसा का पठार कहते हैं

दिल्ली से मालवा और गुजरात जाने वाले मार्ग पर अवस्थित होने के कारण प्राचीन और मध्यकाल में इस किले का विशेष सामरिक महत्व था

इस दुर्ग तक पहुंचने के लिए एक घुमावदार रास्ते में से चढ़ाई करनी पड़ती है इसमें सात अभेद्य प्रवेश द्वार है इसका मुख्य व पहला प्रवेश द्वार पाटन पोल है । इसके बाद क्रमशः भैरवपोल, हनुमानपोल, गणेशपोल, जोडलापोल, लक्ष्मण पोल व राम पोल है

व्हेल मछली के आकार में बना यह दुर्ग राजस्थान का सबसे बड़ा लिविंग फोर्ट है इस दुर्ग में राणा कुम्भा ने माडु के सुल्तान महमूद खिलजी पर विजय पर विजय स्तंभ का निर्माण कराया

इसके पार्श्व में प्रतापगढ़ के रावत बाघसिंह का स्मारक बना है जो चित्तौड़ के दूसरे साके के समय बहादुर शाह की सेना से जूझते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे

विजय स्तंभ ( Victory column )-  इसमें नौ मंजिल है जो नवविधियो की प्रतीक है । यह लगभग 120 फ़ीट ऊंचाई का है । इसका निर्माण 1440 ई. में प्रारंभ हुआ तथा सन 1448 ई. में बनकर तैयार हुआ । इस स्तंभ को “पौराणिक हिन्दू मूर्तिकला का अनुपम खजाना” या “भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश” कहा जाता है । इस स्तंभ को विष्णु स्तभ भी कहते है ।

इसके वास्तुकार जैता तथा उसके पुत्र नापा ,पोमा व पुंजा आदि थे 2013 में इस दुर्ग को “यूनेस्को की विश्व विरासत” स्थलों में शामिल किया गया है  विजय स्तभ को कर्नल जेम्स टॉड ने ‘रोम के टार्जन’ की उपमा दी है

किले में रत्नेश्वर तालाब, कुंभ सागर तालाब, हाथी कुंड, भीमलत नामक बड़ा तालाब, महाराणा उदय सिंह की झाली रानी द्वारा निर्मित झालीबाव, चित्रांग मोरी तालाब, जल आपूर्ति के मुख्य स्रोत थे।

दुर्ग के अन्य प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों में कंवर पदा के खंडहर तोफखाना भामाशाह की हवेली सलूंबर और रामपुरा व अन्य संस्थानों की हवेलियां तोफखाना हिंदू अहाडा के महल इत्यादि प्रमुख है।

वँहा विद्यमान फतह प्रकाश महल को म्यूजियम या संग्रहालय के रूप में विकसित किया गया है जिसमे अनेक कलात्मक देव प्रतिमाएं, अलंकृत पाषाण स्तम्भ तथा और भी बहुत सारी पूरा सामग्री संग्रहित है।

चितौड़गढ़ दुर्ग ( Chittaur fort ) में इतिहास तीन प्रसिद्ध शाके हुए है

1. सन 1303 में अलाउदीन खिलजी व चितोड़ के राणा रतनसिंह के मध्य युद्ध | इस साके में रानी पद्मिनी ने जौहर किया तथा राणा रतनसिंह व सैंकड़ो रणबांकुरो के साथ वीर गोरा व बादल वीरगति को प्राप्त हुए | खिलजी ने दुर्ग अपने पुत्र खिज्रखा को सौंपकर उसका नाम खिज्राबाद रख दिया | यह राज्य का दूसरा साका माना जाता है। पहला साका रणथंभौर दुर्ग का हैं [ 1301 ई.

2. सन 1534 में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह तथा अल्पवय महाराणा विक्रमादित्य के मध्य युद्ध हुआ, जिसमे देवलिया प्रतापगढ़ के वीर रावत बाघसिंह वीरगति को प्राप्त हुए । हाडी रानी कर्मवती ओर अन्य वीरांगनाओ ने जोहर किया । इसी युद्ध के पूर्व रानी कर्मवती ने हुमायु को राखी भेजकर सहायता मांगी थी

3. सन 1567 में मुगल बादशाह अकबर व राणा उदयसिंह के मध्य युद्ध, जिसमे वीर जयमल पत्ता व कल्ला राठौड़ वीरगति को प्राप्त हुए

Amer Fort ( आमेर दुर्ग )

यह गिरी श्रेणी का दुर्ग है। इसका निर्माण 1150 ई. में दुल्हराय कच्छवाह ने करवाया। यह किला मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है।

  • शीला माता का मंदिर
  • सुहाग मंदिर
  • जगत सिरोमणि मंदिर

प्रमुख महल

  • श्शीश महल
  • दीवान-ए-खाश
  • दीवान-ए-आम

विशेष-  हैबर आमेर के महलों की सुंदरता के बारे में लिखता है कि ” मैने क्रेमलिन में जो कुछ देखा है और अलब्रह्राा के बारे में जो कुछ सुना है उससे भी बढ़कर ये महल है।”

मावठा तालाब और दिलारान का बाग उसके सौंदर्य को द्विगुणित कर देते है।  दीवान-ए-आम’का निर्माण मिर्जा राजा जय सिंह द्वारा किया गया

भटनेर दूर्ग

भटनेर का प्राचीन दुर्ग हनुमानगढ़ में स्थित है मरुस्थल से गिरा होने के कारण भटनेर के किले को शास्त्रों मे वर्णित धान्वन दुर्ग की श्रेणी में रख सकते हैं

जनश्रुति के अनुसार इस प्राचीन दुर्ग का निर्माण भाटी राजा भूपत ने तीसरी शताब्दी के अंतिम चरण में करवाया था ,घघर नदी के मुहाने पर बने इस दुर्ग को सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है

भटनेर पर 1001 ईस्वी में महमूद गजनबी ने तथा 1398 ईस्वी में तैमूर ने आक्रमण किया था तैमूर ने अपनी आत्मकथा तुजुक ए तैमूर में इस दुर्ग की प्रशंसा की है लिखा है कि मैंने इतना मजबूत और सुरक्षित किला पूरे हिंदुस्तान में नहीं देखा

भटनेर पर अधिकार करने के लिए भाटियों और जोहियों दीर्घ काल तक संघर्ष चला अंततः बीकानेर महाराजा सूरतसिंह ने 1805 ईसवी में जाब्ता खाँ भट्टी से भटनेर छीन लिया । इस दिन मंगलवार था और क्योंकि मंगलवार का दिन हनुमान जी का दिन माना जाता है इसलिए इसका नाम हनुमानगढ़ रखा तथा दुर्ग में एक हनुमान जी के मंदिर का निर्माण भी करवाया

तारागढ़ दुर्ग

उपनाम- अजयमेरू , गढ़ बीठली राजस्थान का जिब्राल्टर पूर्व का दूसरा जिब्राल्टर
स्थान- अजमेर बीठली पहाड़ी पर

अजयपाल के द्वारा निर्माण करवाया गया, दारा शिकोह ने यहीं आश्रय लिया था, मीरान साहब की दरगाह स्थित है, महाराणा रायमल के पुत्र पृथ्वीराज सिसोदिया द्वारा अपनी पत्नी ताराबाई के नाम पर इसका नाम तारागढ़ रखा

अकबर का किला ( Akbar Fort )

अजमेर में स्थित इस किले का निर्माण मुगल बादशाह अकबर द्वारा 1570ई. में करवाया गया था 1576 ईसवी के हल्दीघाटी के युद्ध की रणनीति अकबर ने इसी किले में बनाई थी

मैग्जीन या अकबर का किला, अजमेर – अकबर का किला अजमेर नगर के मध्य स्थित है जिसे मैग्जीन या अकबर का दौलत खाना भी कहते हैं। मुस्लिम दुर्ग निर्माण पद्धति से बनाया हुआ यह एकमात्र दुर्ग राजस्थान में है

इस दूर्ग का निर्माण 1571-72 में किया गया था 1908 से राजपूताना अजायबघर इसी किले में चलता है  इस किले के झरोखे में बैठकर जहांगीर न्याय करता था 1616 ईसवी में इंग्लैंड के सम्राट जेम्स प्रथम का राजदूत सर टाँमस रो इसी किले में जहाँगीर से मिला था।

हवामहल ( Hawa Mahal )

  • स्थिति= जयपुर
  • निर्माता = सवाई प्रताप सिंह
  • वास्तूकार= लालचंद उस्ताद

हवामहल का निर्माण सवाई प्रताप सिंह ने 1799 ईस्वी में करवाया था, जिसका वास्तूकार लाल चन्द था। हवामहल में 152 खिड़कियां व छज्जे है। ये एक 5 मंजिला इमारत है, जिसका आकार कृष्ण भगवान के मुकुट के समान प्रतीत होता है।

5 मंजिलो के नाम

  • शरद मन्दिर
  • रतन मन्दिर
  • विचित्र मन्दिर
  • प्रकाश मन्दिर
  • हवा मन्दिर

निर्माण शैली

  • मुगल- राजपुत मिश्रित शैली
  • पत्थर = लाल व गुलाबी/बलुआ पत्थर

ये बिना नींव की इमारत है हवामहल के निर्माण का उद्देश्य रानियो द्वारा शहर को व रैलियों को देखने हेतु ।

सिवाणा दुर्ग ( Shivana fort )

बाड़मेर में स्थित छपन का पहाड़ नामक पर्वतीय क्षेत्र में स्थित सिवाना का दुर्ग इतिहास प्रसिद्ध है इसे “अणखलो सिवाणो” दुर्ग भी कहते हैं।बाड़मेर जिले के सिवाना कस्बे में स्थित सिवाना दुर्ग की स्थापना 954 ईसवी में परमार वंश के वीरनारायण ने की थी।

यह एक ऊंची हल्देश्वर की पहाड़ी पर बसा हुआ है। इसका प्रारंभिक नाम कम्थान था । यह राजस्थान के दुर्गों में वर्तमान में सबसे पुराना दुर्ग है।इस पर कुमट नामक झाड़ी बहुतायत में मिलती थी, जिससे इसे ‘कुमट दुर्ग’ भी कहते हैं।

प्राचीन काल में इस तक पहुंचने का मार्ग अत्यंत दुर्गम था। अलाउद्दीन खिलजी के काल में यह दुर्ग जालौर के राजा कान्हड़देव के भतीजे सातल देव के अधिकार में था।

जब अलाउद्दीन जालोर पर आक्रमण करने के लिए रवाना हुआ, तो सातल देव ने उसका का मार्ग रोका और कहलवाया कि जालौर पर आक्रमण बाद में करना, पहले सिवाना से निपट।

इस पर विवश होकर अलाउद्दीन खिलजी ने सिवाना का रुख किया, काफी परिश्रम एवं विपुल समय की बर्बादी के बाद ही अलाउद्दीन खिलजी इस दुर्ग पर अधिकार कर पाया। राव मालदेव ने गिरी सुमेल युद्ध (1540 ईस्वी) के बाद सेना द्वारा पीछा किए जाने पर सिवाना दुर्ग में आश्रय लिया था।

फचंद्रसेन ने मुगलों(अकबर) से युद्ध भी सिवाना को केंद्र बनाकर किया। जोधपुर के राठौड़ नरेशों के लिए भी यह दुर्ग विपत्ति काल में शरण स्थली के रूप में काम आता था। दुर्ग में कल्ला रायमलोत का थडा, महाराजा अजीतसिंह का दरवाजा, कोट, हल्देश्वर महादेव का मंदिर आदि दर्शनीय है।

1308 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने सिवाणा दुर्ग को जीतकर उसका नाम “खैराबाद” रख दिया। इसमे दो साका हुए—प्रथम साका 1308 ई. में सातलदेव व अलाउद्दीन के संघर्ष के दौरान एवं द्वितीय साका वीर कल्ला रायमलोत व अकबर के संघर्ष के दौरान हुआ।

लोहागढ़ ( lohagarh fort )

भरतपुर नगर के दक्षिणी हिस्से में स्थित लोहागढ़ 1733 ईस्वी में जाट राजा सूरजमल द्वारा अपने पिता के समय बनवाया गया था। पूरा दुर्ग पत्थर की पक्की प्राचीर से घिरा हुआ है। इस प्राचीर के बाहर 100 फुट चौड़ी और 60 फुट गहरी खाई है।

इस खाई के बाहर मिट्टी की एक ऊंची प्राचीर हैं। इस प्रकार यह दोहरी प्राचीर से घिरा हुआ है। कहा जाता है कि अहमद शाह अब्दाली और जनरल लेक जैसे आक्रमणकारी भी इस दुर्ग में प्रवेश नहीं कर सके।

दुर्ग में प्रवेश करने के लिए इसके चारों ओर की खाई पर दो पुल बनाए गए हैं। इन पुलों के ऊपर गोपालगढ़ की तरफ से बना हुआ दरवाजा अष्ट धातुओं के मिश्रण से निर्मित है।

यह दरवाजा महाराजा जवाहर सिंह 1765 ईस्वी में मुगलों के शाही खजाने की लूट के समय लाल किले से उतार कर लाया था ।

जनसश्रुति है कि यह अष्टधातु द्वार पहले चित्तौड़गढ़ दुर्ग में लगा हुआ था, जिसे अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली ले गया था। दक्षिण की ओर बना हुआ दरवाजा लोहिया दरवाजा कहलाता है। 1733 ई. में जिस स्थान पर किले की नींव रखी गई थी वहां खेमकरण जाट की कच्ची गढ़ी थी जो चौबुर्जा कह रही थी।

इस दुर्ग में निर्माण कार्य राजा जसवंत सिंह(1853- 93 ई.) के काल तक चलता रहा। किले के चारों ओर की खाई में मोती झील से सुजान गंगा नहर द्वारा पानी लाया जाता था। यहां 8 बुर्जो में से सबसे प्रमुख जवाहर बुर्ज है जो महाराजा जवाहर सिंह की दिल्ली फतह के स्मारक के रूप में बनाया गया था।

फतेह बुर्ज अंग्रेजों पर फतह के स्मारक के रूप में 1806 ईसवी में बनवाया गया था। किले की अन्य बुर्जो में गोकला बुर्ज, कालिका बुर्ज, बागरवाली बुर्ज, तथा नवल सिंह बुर्ज उल्लेखनीय है। यह दुर्ग मैदानी दुर्गों की श्रेणी में विश्व का पहले नंबर का दुर्ग है।

कमरा खास महल में विशाल दरबारों का आयोजन होता था। भरतपुर दुर्ग पर सबसे जोरदार आक्रमण अंग्रेजों ने 1805 ईसवी में किया।भरतपुर के शासक रणजीत सिंह ने अंग्रेजों के शत्रु जशवंतराव होल्कर को अपने यहां शरण दी, जिससे उसे अंग्रेजों का कोपभाजन बनाना पड़ा।

अंग्रेज सेनापति लेक 1805 ईसवी की जनवरी से लेकर अप्रैल माह तक 5 बार भरतपुर दुर्ग पर जोरदार हमले किए गए। ब्रिटिश तोपो ने जो गोले बरसाए वे या तो मिट्टी की बाह्य प्राचीर में धँस गए। उनकी लाख कोशिश के बावजूद भी किले का पतन नहीं हो सका । फलतः अंग्रेजों को संधि करनी पड़ी।

17 मार्च 1948 को मत्स्य संघ का उद्घाटन समारोह भी इसी महल में हुआ था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद दीर्घ की अनेक इमारतों में सरकारी कार्यालय खुल गए हैं।

कुम्भलगढ़ दुर्ग ( Kumbhalgarh Fort )

अरावली की तेरह चोटियों से घिरा, जरगा पहाडी पर (1148 मी.) ऊंचाई पर निर्मित गिरी श्रेणी का दुर्ग है। इस दुर्ग का निर्माण महाराणा कुम्भा ने वि. संवत् 1505 ई. में अपनी पत्नी कुम्भलदेवी की स्मृति में बनवाया। इस दुर्ग का निर्माण कुम्भा के प्रमुख शिल्पी मण्डन की व देखरेख में हुआ। दुर्ग का निर्माण कार्य पूर्ण होने पर महाराणा कुम्भा ने सिक्के डलवाये जिन पर दुर्ग और उसका नाम अंकित था

उदयपुर से 7० किमी दूर समुद्र तल से 1087 मीटर ऊँचा और 30 किमी व्यास में फैला दुर्ग मेवाड़ के यशश्वी महाराणा कुम्भा की सूझबूझ व प्रतिभा का अनुपम स्मारक है

इस दुर्ग को मेवाड़ की आंख कहते है। इस किले की ऊंचाई के बारे में अतृल फजल ने लिखा है कि ” यह इतनी बुलन्दी पर बना हुआ है कि नीचे से देखने पर सिर से पगड़ी गिर जाती है।”

कर्नल टाॅड ने इस दुर्ग की तुलना “एस्टुकन” से की है। इस दुर्ग के चारों और 36 कि.मी. लम्बी दीवार बनी हुई है। दीवार की चैड़ाई इतनी है कि चार घुडसवार एक साथ अन्दर जा सकते है। इस लिए इसे ‘भारत की महान दीवार’ भी कहा जाता है।

दुर्ग के अन्य नाम – कुम्भलमेर कुम्भलमेरू, कुंभपुर मच्छेद और माहोर।

कुम्भलगढ दुर्ग के भीतर एक लघु दुर्ग भी स्थित है, जिसे कटारगढ़ कहते है, जो महाराणा कुम्भा का निवास स्थान रहा है। महाराणा कुम्भा की हत्या उनके ज्येष्ठ राजकुमार ऊदा (उदयकरण) न इसी दुर्ग में की। इस दुर्ग में ‘झाली रानी का मालिका’ स्थित है।

महाराणा प्रताप की जन्म स्थली कुम्भलगढ़ एक तरह से मेवाड़ की संकटकालीन राजधानी रहा है। महाराणा कुम्भा से लेकर महाराणा राज सिंह के समय तक मेवाड़ पर हुए आक्रमणों के समय राजपरिवार इसी दुर्ग में रहा। यहीं पर पृथ्वीराज और महाराणा सांगा का बचपन बीता था। 

महाराणा उदय सिंह को भी पन्ना धाय ने इसी दुर्ग में छिपा कर पालन पोषण किया था। उदयसिंह का राज्यभिषेक तथा वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप का जन्म कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ है। हल्दी घाटी के युद्ध के बाद महाराणा प्रताप भी काफी समय तक इसी दुर्ग में रहे। 

इस दुर्ग के बनने के बाद ही इस पर आक्रमण शुरू हो गए लेकिन एक बार को छोड़ कर ये दुर्ग प्राय: अजेय ही रहा है  कुल मिलाकर दुर्ग ऐतिहासिक विरासत की शान और शूरवीरों की तीर्थ स्थली रहा है। माड गायक इस दुर्ग की प्रशंसा में अक्सर गीत गाते हैं 

बयाना दुर्ग भरतपुर ( Bayana Durg )

यह दुर्ग गिरी श्रेणी का दुर्ग है। इस दुर्ग का निर्माण विजयपाल सिंह यादव न करवाया।
अन्य नाम- शोणितपुर, बाणपुर, श्रीपुर एवं श्रीपथ है।

अपनी दुर्भेद्यता के कारण बादशाह दुग व विजय मंदिर गढ भी कहलाता है।

दर्शनिय स्थल

  • भीमलाट- विष्णुवर्घन द्वारा लाल पत्थर से बनवाया गया स्तम्भ
  • विजयस्तम्भ- समुद्र गुप्त द्वारा

नहारगढ़ का किला ( Naharagarh Fort )

जयपुर में अरावली पर्वतमाला की पहाड़ी पर अवस्थित नाहरगढ़ के किले का निर्माण सवाई जयसिंह ने 1734 ईस्वी में मराठा आक्रमणों से बचाव के लिए करवाया था। यह भव्य और सुदृढ़ दुर्ग जयपुर के मुकुट के समान है । इसे “सुदर्शन गढ़’ भी कहते हैं।

इस किले का नाहरगढ़ नाम नाहर सिंह भोमिया के नाम पर पड़ा है। ऐसी मान्यता है कि नारगढ़ के निर्माण के समय जुझार नाहरसिंह ने किले के निर्माण में विघ्न उपस्थित किया

तब तांत्रिक रत्नाकार पुंडरीक ने नहारसिंह बाबा को अन्यत्र जाने के लिए राजी कर दिया, और उनका स्थान “अंबागढ़” के निकट एक चोबुर्जी गड़ी में स्थापित कर दिया। जहां आज भी लोग देवता के रूप में पूजे जाते हैं।

नाहरगढ़ के अधिकांश भव्य राजप्रसादों का निर्माण जयपुर के महाराजा सवाई रामसिंह द्वितीय तथा उनके बाद सवाई माधो सिंह ने अपनी नौ पासवानों के नाम पर एक जैसे नौ महलों का निर्माण करवाया।

जिनके नाम सूरज प्रकाश, खुशहाल प्रकाश, जवहार प्रकाश, ललित प्रकाश, आनंद प्रकाश, लक्ष्मी प्रकाश, चांद प्रकाश, फूल प्रकाश, और बसंत प्रकाश, है।जो कदाचित इन्ही पासवानों के नाम पर है।

इन महलों के स्थापत्य की प्रमुख विशेषता उनकी एकरूपता, रंगों का संयोजन तथा ऋतु के अनुसार इनमे हवा और रोशनी की व्यवस्था है। अब यह दुर्ग राजस्थान पर्यटन विभाग के अधीन है।

मेहरानगढ़ दुर्ग ( Mehrangarh fort )

उपनाम :-  चिन्तामणि, मिरिगढ़, मेहरानगढ़, मयूरध्वज गढ़

जोधपुर में स्थिति गिरीदुर्ग है निर्माता राव जोधा द्वारा 13 मई 1459 ईसवी में निर्मित अपनी विशालता के कारण यह किला मेहरानगढ़ कहलाता है । लाल पत्थरों से निर्मित जोधपुर का मयूर आकृति का होने के कारण इसे मयूरध्वज गढ़ या मोरध्वज गढ़ भी कहते हैं ।

इस दुर्ग की पहाड़ी प्रसिद्ध योगी चिङियानाथ के नाम पर चिड़िया टूंक कहलाती थी। मेहरानगढ़ किले के प्रवेश द्वारों मे लोहापोल, जयपोल, फतेहपोल प्रमुख है। लोहापोल का निर्माण राव मालदेव ने करवाया। जयपोल का निर्माण महाराजा मानसिंह ने करवाया। इसमे लगे लोहे के विशाल किवाड़ो को उदावत ठाकुर अमरसिंह अहमदाबाद से लाये थे।

रुडयार्ड किपलिंग ने कहा था कि “यह मानव निर्मित नही बल्कि फ़रिस्तो द्वारा बनाया लगता है

1544 ईस्वी में शेरशाह सूरी ने इस पर अधिकार कर लिया परंतु 1545 ईसवी में पुनः मालदेव का अधिकार हो गया । 1564 ईस्वी में अकबर ने इस दुर्ग पर अधिकार कर लिया। 1678 में औरंगजेब ने अधिकार कर लिया और 1707 में तक अपने अधिकार में रखा ।

इस दुर्ग में मोती महल ,फूल महल, तख्त विलास, अजीत विलास , मानसिंह पुस्तक प्रकाश पुस्तकालय, सिणगार चौकी चोखेलाल महल इत्यादि प्रमुख है। मेहरानगढ़ किले के दौलतखाने के आंगन मे महाराजा बख्तसिंह द्वारा बनवाई गई संगमरमर की श्रृंगार चौकी है।

राव जोधा ने चामुंडा माता का मंदिर बनवाया जहां 2008 में मेहरानगढ़ दुखांतिका घटना घटित हुई । महाराजा अभय सिंह द्वारा बनवाए गये आनंद धन जी एवं मुरली मनोहर मंदिर स्थित है।

जयगढ़ दुर्ग ( Jaigarh Fort )

जयपुर में स्थित गिरी दुर्ग का निर्माण मानसिंह प्रथम द्वारा करवाया गया लेकिन जगदीश गहलोत और गोपीनाथ शर्मा के अनुसार इस दुर्ग का निर्माता मिर्जा राजा जयसिंह था । जय गढ़ राजस्थान का एकमात्र दुर्ग है जिस पर कभी कोई बाह्य आक्रमण नहीं हुआ ।

रियासतकाल में किले के भीतर राजनीतिक कैदियों को रखने व खजाना रखने के काम लिया जाता था । जयबाण नामक एशिया की सबसे बड़ी तोप यहीं पर स्थित है। समूचे भारत में यही एक दुर्ग है जहाँ तोप ढालने का संयंत्र लगा है।

भैंस रोड गढ़ ( Bhansrood fort )

चित्तौड़ जिले में स्थित जल दुर्ग चंबल और बामणी नदियों के संगम स्थल पर बना हुआ है। निर्माण भैंसा शाह नमक व्यापारी व रोडा चारण ने मिलकर करवाया। इस दुर्ग को राजस्थान का वेल्लोर कहा जाता है।

जूनागढ़ किला ( Junagadh Fort )

बीकानेर में स्थित स्थल दुर्ग निर्माता बीकानेर के शासक रायसिंह । यह किला लाल पत्थरों से बना है।रायसेन ने जूनागढ़ की सूरजपोल पर राय प्रशस्ति उत्कीर्ण करवाई।

जिसका रचयिता जेइता था। जूनागढ़ दुर्ग में रायसिंह का चौबारा ,फूल महल ,चंद्र महल, गज मंदिर, अनूप महल ,रतन निवास ,कर्ण महल, दलेल निवास, सरदार निवास,सूरत निवास इत्यादि प्रमुख भवन है। राय सिंह ने जयमल और पत्ता की पाषाण मूर्तियां इसी दुर्ग पर लगाई

गागरोन का किला ( Gagaron Fort )

झालावाड़ में आहु और कालीसिंध नदियों के संगम स्थल ‘सामेलजी’ के निकट यह उत्कृष्ट जल दुर्ग डोड (परमार) राजपूतो द्वारा निर्मित करवाया गया था । इन्ही के नाम पर इसे डोडगढ़ या धुलगढ़ कहते है । इसे कालीसिंध व आहू ने तीन तरफ से घेर रखा हैं एक सुरंग के द्रारा नदी का पानी दुर्ग के भीतर पहुंचाया गया हैं

खींची राजवंश के संस्थापक देवनसिंह ने 12वी शताब्दी में इसे डोड शासक बिजलदेव से जीतकर इसका नाम गागरोन रखा । ‘ चौहानों कुल कल्पद्रुम ‘के अनुसार गागरोण के खींची राजंवश का संस्थापक देवनसिंह (उर्फ धारु) था। 

यह दुर्ग मुकुन्दरा की पहाड़ी पर बना हुआ है । सन 1303 में दिल्ली सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने इस पर आक्रमण किया था परंतु वँहा के शासक जैत्रसिंह को हरा नही पाया ।

दुर्ग में प्रमुख दर्शनीय स्थल

  • भगवान मधुसूदन का मंन्दिर जो राव दुर्जनसाल हाडा ने बनवाया।
  • कोटा रियासत के सिक्का ढालने के लिए निर्मित टकसाल ।
  • रामानंद के शिष्य संत पीपाजी की छतरी जंहा प्रतिवर्ष उनकी पुण्यतिथि पर मेला भरता है ।
  • सूफी संत हमीदुद्दीन चिश्ती की समाधि जो “मीठेशाह की दरगाह” के नाम से प्रसिद्ध है ।
  • कोटा के झाला जालिमसिंह द्वारा निर्मित विशाल परकोटा ‘जलिमकोट’ ।

गागरोण खींची राजवंश में जेतसिंह की तीन पीढ़ी बाद पीपाराव शासक हुए जो दिल्ली सुल्तान फिरोजशाह तुगलक के समकालीन थे ।वे समस्त राज-पाट त्यागकर संत रामानंद के शिष्य बन गए तथा भगवत भक्ति में लीन हो गए ।दुर्ग के निकट ही उनकी छतरी बनी हुई है ।

दुर्ग के प्रमुख साके

  • 1423 ई. में मांडू के सुल्तान होशंगशाह व भोज के पुत्र अचलदास खींची के मध्य हुआ युद्ध जिसमे अचलदास वीरगति को प्राप्त हुए व अचलदास की रानी उमादे सहित दुर्ग की सभी ललनाओं ने जोहर किया ।प्रसिद्ध कवि शिवदास गाडण ने अपनी काव्यकृति”अचलदास खींची री वचनिका” में इस युद्व का विशद वर्णन किया है ।
  • सन 1444 ई. में मांडू के सुल्तान महमूद खिलजी प्रथम व अचलदास खींची के पुत्र पाल्हणसी के मध्य युद्व हुआ । विजयी सुल्तान ने दुर्ग में एक और कोट का निर्माण करवाया व दुर्ग का नाम “मुस्तफाबाद” रखा । 

इस पृथ्वीराज ने अपना प्रसिद्ध ग्रंथ –वेलि क्रिसन रुक्मिणी री गागरोण मे रहकर लिखा

_जालोर दुर्ग_

जालोर दुर्ग

अन्य नाम :- 

सोनलगढ़, कनकाचल, सुवर्णगिरि

  • सुवर्ण- गिरी पहाड़ी पर स्थित है। 
  • डॉ. दशरथ शर्मा के अनुसार प्रतिहार नरेश नागभट्ट प्रथम ने इस दुर्ग का निर्माण करवाया था।

आधुनिक इतिहासकार मानते है कि इस किले का निर्माण परमार राजपूतों ने आरंभ किया था। इसका निर्माण परिहारों के काल मे आंरभ हो गया था जालौर का दुर्ग दिल्ली से गुजरात जाने वाले मार्ग पर.स्थित हैं

इस दुर्ग की 13 वर्ष तक घेराबंदी चली जिसे खिलजी तोड़ नही सका । बाद मे 1311 ई.मे बीक नामक दहिया राजपूत की गद्दारी से किले का पतन हुआ इस दुर्ग का प्रसिद्ध साका वर्ष 1311-12 में हुआ ।

जिसमें जालोर के पराक्रमी शासक वीर कान्हड़देव सोनगरा ओर उसके पुत्र वीरमदेव अलाउदीन खिलजी के साथ जालौर दुर्ग में युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुये तथा 1311-12 ई.के लगभग खिलजी ने जालौर पर अधिकार किया।

इस युद्ध का वर्णन कवि पद्मनाभ द्वारा रचित ग्रंथ कान्हड़दे प्रबंध तथा वीरमदेव सोनगरा री बात में किया गया है। जालोर दुर्गापनी सुदृढ़ता के कारण संकटकाल में जहाँ मारवाड़ के राजाओं का आश्रय स्थल रहा वही उसमे राजकीय कोष भी रखा जाता रहा ।

जैन मंदिरो मे पाशर्वनाथ का मंदिर सबसे बडा़ एवं भव्य हैं सन्त मलिक शाह की दरगाह, तथा दुर्ग में स्थित परमार कालीन कीर्ति स्तम्भ ,जैन धर्मावलंबियों की आस्था का केंद्र प्रसिद्ध स्वर्णगिरि मन्दिर, तोपखाना आदि जालौर दुर्ग के प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल है

आंदौलन के समय कई नेताओं को इस किले मे नजरबंद किया गया मथुरादास माथुर , गणेशीलाल व्यास ,फतहराज जोशी एवं तुलसीदास राठी आदि

किले के भीतर बनी तोपखाना मस्जिद, जो पूर्व मे परमार शासक भोज द्रारा निर्मित संस्कृत पाठशाला थी, बहुत आकर्षक हैं।

रणथम्भोर दुर्ग ( Ranthambore Fort )

रणथम्भोर का दुर्ग सवाईमाधोपुर से लगभग 9 किलोमीटर दूर अरावली पर्वत मालाओं से घिरा हुआ एक पार्वत्य दुर्ग एवं वन दुर्ग हैं इसका दुर्ग  के तीनो और पहाडों में प्राकृतिक खाई बनी है जो इस किले की सुरक्षा को मजबूत कर अजेय बनाती है। निर्माण आठवीं शताब्दी मे अजमेर के चौहान शासको द्रारा करवाया गया था।

एक मान्यता के अनुसार इसका निर्माण रणथान देव चौहान ने करवाया था। यह दुर्ग विषम आकर वाली सात पहाड़ियों से घिरा हुआ है।

अबुल फजल ने लिखा है ‘ अन्य सब दुर्ग नंगे हैं, जबकि यह दुर्ग बख्तरबंद हैं’।

बीच -बीच मे गहरी खाइयां और नाले हैं। रणथम्भौर दुर्ग उंचे गिरी शिखर पर बना हुआ है। इसमे नौलखा दरवाजा (प्रवेश द्रार ), हाथी पोल, गणेश पोल, सूरज पोल, और त्रिपोलिया (अंधेरी दरवाजा) को पार करके दुर्ग मे पहुचा जाता हैं।

इसके पास से एक सुरंग महलो तक गयी हैं दुर्ग परिसर मे हम्हीर महल , रानी महल, हम्मीर की कचहरी ,सुपारी महल ,बादल महल, जौरा-भौरा, 32 खम्भों की छतरी, जोगीमहल तथा भारत प्रसिद्ध गणेश मंदिर स्थित हैं।

1192 में तहराइन के युद्ध में मुहम्मद गौरी से हारने के बाद दिल्ली की सत्ता पर पृथ्वीराज चौहान का अंत हो गया और उनके पुत्र गोविन्द राज ने रणथंभोर को अपनी राजधानी बनाया।

गोविन्द राज के अलावा वाल्हण देव, प्रहलादन, वीरनारायण, वाग्भट्ट, नाहर देव, जैमेत्र सिंह, हम्मीरदेव, महाराणा कुम्भा, राणा सांगा, शेरशाह सुरी, अल्लाऊदीन खिलजी, राव सुरजन हाड़ा और मुगलों के अलावा आमेर के राजाओं आदि का समय-समय पर नियंत्रण रहा

लेकिन इस दुर्ग की सबसे ज्यादा ख्याति हम्मीर देव (1282-1301) के शासन काल में रही। हम्मीरदेव का 19 वर्षो का शासन इस दुर्ग का स्वर्णिम युग था। हम्मीर देव चौहान ने 17 युद्ध किए जिनमे 13 युद्धो में उसे विजय प्राप्त हुई। करीब एक शताब्दी तक ये दुर्ग चितौड़ के महराणाओ के अधिकार में भी रहा। खानवा युद्ध में घायल राणा सांगा को इलाज के लिए इसी दुर्ग में लाया गया था

वह सन् 1301 मे अलाउद्दीन से युद्ध करते हुए शराणगत धर्म के लिए बलिदान हुआ

दुर्ग पर आक्रमण

  • मुहम्मद गौरी व चौहानो के मध्य इस दुर्ग की प्रभुसत्ता के लिये 1209 में युद्ध हुआ।
  • इसके बाद 1226 में इल्तुतमीश ने,
  • 1236 में रजिया सुल्तान ने,
  • 1248-58 में बलबन ने,
  • 1290-1292 में जलालुद्दीन खिल्जी ने,
  • 1301 में अलाऊद्दीन खिलजी ने,
  • 1325 में फ़िरोजशाह तुगलक ने,
  • 1489 में मालवा के मुहम्म्द खिलजी ने,
  • 1529 में महाराणा कुम्भा ने,
  • 1530 में गुजरात के बहादुर शाह ने,
  • 1543 में शेरशाह सुरी ने आक्रमण किये।
  • 1569 में इस दुर्ग पर अकबर ने आक्रमण कर आमेर के राजाओं के माध्यम से तत्कालीन शासक राव सुरजन हाड़ा से सन्धि कर ली।

पोकरण दुर्ग जैसलमेर ( Pokarna fort )

पोकरण मे लाल पत्थरों से निर्मित इस दुर्ग का निर्माण सन् 1550 मे राव मालदेव ने करवाया था। किले मे मंगल निवास,संग्रहालय, तोपें, द्रारा, बुर्जियां, तथा सुरक्षात्मक दीवार देखने लायक हैं।

सोनागढ़ (धान्वन दुर्ग), जैसलमेर

इसे सोनागढ़ तथा सोनारगढ़ भी कहते हैं। इसका निर्माण 1155 ई.मे रावल जैसल भाटी ने करवाया था। उसके पुत्र व उतराधिकारी शालिवाहन दि्तीय ने जैसलमेर दुर्ग का अधिकांश निर्माण पूर्ण करवाया। यह दुर्ग त्रिकूटाकृति का है तथा इसकी उँचाई 250 फीट हैं।

इस दुर्ग के चारो ओर विशाल मरुस्थल फैला हुआ है इस कारण यह _दुर्ग ‘ धान्वनदुर्ग ( मरु _दुर्ग )’ की श्रेणी मे आता है। कहावत प्रचलित हैं कि यहां पत्थर के पैर , लोहे का शरी और काठ घोड़े पर सवार होकर ही पहुंचा जा सकता हैं।

यह गहरे पीले रंग के बडे़ -बडे़ पत्थरों से निर्मित है जो बिना चूने के एक के ऊपर एक पत्थर रखकर बनाया गया है। जो इसके स्थापत्य की विशिष्टता हैं। जब सुबह-शाम को सूरज की रोशनी पड़ती हैं तो वह वाकई सोने के समान चमकता है।

_दुर्ग तक पहुंचने के लिए अक्षय पोल.,सूरजपोल,गणेश पोल व हवा पोल को पार करना होता है। _दुर्ग मे कई महल, एवं आवासीय भवन बने हुए हैं।दुर्ग मे स्थिति लक्ष्मीनारायण मंदिर दर्शनीय है। इसे 1437 ई मे महारावल वैरीसाल के शासन काल मे बनाया गया था।

इस मंदिर मे स्थापित लक्ष्मीनाथ की मूर्ति मेड़ता से लायी गयी थी। यहां ‘ ढा़ई साके ‘ हुए। राव लूणकरण के समय (1550ई.)मे यहां ‘अर्द्धसाका ‘ हुआ।।

दर्ग के भव्य महलों मे महारावल अखैसिंह द्रारा निर्मित सर्वोत्तम विलास (शीशमहल ),मूलराज द्रितीय के बनाये हुए रंगमहल और मोतीलाल महल भव्य जालियों और झरोखो तथा पुष्पतलाओं के सजीव ओर सुन्दर अलंकरण के कारण दर्शनीय हैं।

गज विलास और जवाहर विलास महल पत्थर के बारीक काम और जालियों की कटाई के लिए प्रसिद्ध हैं। बादल महल अपने प्राकृतिक परिवेश के लिए उल्लेखनीय हैं। जैसल कुआं किले के भीतर पेयजल का प्राचीन स्रोत हैं।

जैसलमेर _दुर्ग के भीतर बने प्राचीन एवं भव्य जैन मंदिर तो कला के उत्कृष्ट नमूने हैं। पार्श्वनाथ, संभवनाथ और ऋषभदेव मंदिर अपने शिल्प के कारण आबू के दिलवाड़ा जैन मंदिरों से प्रतिस्पर्धा करते मालूम होते है। इसकी कदाचित विशेषता इसमे हस्तलिखित ग्रंथो का एक दुर्लभ भण्डार हैं।

अनेक ग्रंथ ताड़पत्रों पर लिखे और हस्तलिखित सबसे बडा़ संग्रह जैन आचार्य जिनभद्सूरी के नाम पर ‘ जिनभ्रद सूरी ग्रंथ.भण्डार’ कहलाता हैं।

वर्तमान मे राजस्थान मे दो _दुर्ग ही ऐसे ही है जिनमे बडी़ सख्यां मे लोग निवास करते (लिविंग फोर्ट)हैं उनमे एक चितौड़ का _दुर्ग तथा दूसरा जैसलमेर का दुर्ग दूर से देखने पर यह किला पहाड़ी पर लंगर डाले एक जहाज का आभास कराता हैं।

दर्ग के चारो ओर घघरानुमा परकोटा बना हुआ हैं, जिसे ‘कमरकोट’ तथा ‘ पाडा’ कहा जाता हैं 99 बुर्जो वाला यह किला मरुभूमि का महत्वपूर्ण किला हैं।

August 17, 2020

राजस्थान के वाद्य यंत्र Musical instrument

वाद्य यंत्र

वाद्य यंत्र

  • तत वाद्य ( tat instrument )
  • सुषिर वाद्य ( sushir instrument )
  • ताल वाद्य ( Rhythm  instrument )
  • घन वाद्य ( Ghan instrument )

तत वाद्य यंत्र ( tat instrument )

TRICK

नकारा राज का भरतार गुस्सा में सुसु की दो

  • नकारा – चिकारा
  • रा – रावणहत्था
  • ज – जंतर
  • का – कामायचा
  • भ – भपंग
  • र – रबाब
  • ता – तंदुरा/ तम्बूरा/ बेनी/चौतारा/
  • र – रबाज
  • गु – गुजरी
  • सा- सारँगी
  • सु – सुरमढ़ल
  • सु – सुरनाई
  • दु – दुकाको

Out of trick – इकतारा

अवनद्ध वाद्य ( Avanaddh Instrument )

अवनद्ध (ताल) वाद्य:-चमड़े से मढ़े हुए लोक वाद्य )

मादल ( Madal )

मृदंग आकृति का 

  • क्षेत्र/वादक जाति/अवसर:- आदिवासी क्षेत्र – भील ,गरासिया,डांगिए द्वारा ।
  • सरंचना- यह मृदंग आकृति का प्राचीन लोक वाद्य हैं जो मिट्टी का बना होता है । इसका एक मुंह छोटा व एक मुंह बड़ा होता है जिसे क्रमश नारी और नर कहते हैं। भील गवरी नृत्य के समय तथा गरासिया व डांगीए नृत्यों में काम लेते हैं ।भील लोग गवरी नृत्य में बजाते हैं। इसे शिव- पार्वती का वाद्य मानते हैं ।

पखावज या मृदंग ( Pakhavaj )

  • क्षेत्र/वादक जाति/अवसर:- रावल,भवाई, राबिया लोग नृत्य में काम में लेते हैं । ज्यादातर धार्मिक स्थानों में उपयोग ।
  • सरंचना- यह बीजा ,सवन ,सुपारी व बड़ के पेड़ के तने के पेड़ की लकड़ी पर बकरे की खाल से बनते हैं ।

डैरूं ( Darun )

  • क्षेत्र/वादक जाति/अवसर –  भील व गोगाजी के भोपा द्वारा
  • सरंचना – आम की लकड़ी पर मढ़कर बनाया जाता है । डमरु का बड़ा रूप । इसे एक छोटी लकड़ी से बजाया जाता है।

खंजरी ( khanjari )

  • क्षेत्र/वादक जाति/अवसर – कामड़ ,कालबेलिया भील ,बलाई नाथ ,द्वारा
  • ढपनुमा वाद्य यंत्र जो आम की लकड़ी पर एक और मढ कर बनाया जाता है । दाहिने हाथ से पकड़ कर बाएं हाथ से बजाया जाता है ।

धौंसा ( Dhonas )

  • क्षेत्र/वादक जाति/अवसर:- दुर्ग या बड़े मंदिरों में
  • सरंचना – आम या फरास की लकड़ी के घेरे पर भैंस की खाल मढकर बनाते है । लकड़ी के डंडे से बजाते हैं ।

नौबत ( Naubat )

अवनद्ध वाद्य है जिसे प्रायः मंदिरों या राजा-महाराजाओं के महलों के मुख्य द्वार पर बजाया जाता था। इसे धातु की लगभग चार फुट गहरी अर्ध अंडाकार कूंडी को भैंसे के खाल से मढ़ कर चमड़े की डोरियों से कस कर बनाया जाता है। इसे लकड़ी के डंडों से बजाया जाता है।

नगाड़ा ( Nagada )

यह दो प्रकार का होता है- छोटा व बड़ा। छोटे नगाड़े के साथ एक नगाड़ी भी होती है। बड़ा नगाड़ा नौबत की तरह ही होता है। यह बड़े व भारी डंडों से बजाया जाने वाला कढाई के आकार का लोहे का एक बडा नगाडा होता है। इसे ‘बम, दमाम या टापक’ भी कहते हैं। नगाड़े को लोकनाट्यों व विवाह व मांगलिक उत्सव में शहनाई के साथ बजाया जाता है। इसे युद्ध के समय भी बजाया जाता था।

बम, कमट, टामक ( Bomb, commute, temac )

यह एक प्रकार का विशाल नगाड़ा है। इसका आकार लोहे की बड़ी कड़ाही जैसा होता है, जो लोहे की पटियों को जोड़कर बनाया जाता है। इसका ऊपरी भाग भैंस के चमड़े से मढ़ा जाता है। खाल को चमड़े की तांतों से खींचकर पेंदे में लगी गोल गिड़गिड़ी (लोहे का गोल घेरा) से कसा जाता है। 

अवनद्ध वाद्यों में यह सबसे बड़ा व भारी होता है। प्राचीन काल में यह रणक्षेत्र एवं दुर्ग की प्राचीर पर बजाया जाता था। इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले लिए लकड़ी के छोटी गाड़ी (गाडूलिए) का उपयोग किया जाता है। इसे बजाने के लिए वादक लकड़ी के दो डंडो का प्रयोग करते हैं।

कुंडी ( Kandi )

यह आदिवासी जनजातियों का प्रिय वाद्ययंत्र है, जो पाली, सिरोही एवं मेवाड़ के आदिवासी क्षेत्रों में बजाया जाता है। मिट्टी के छोटे पात्र के उपरी भाग पर बकरे की खाल मढ़ी रहती है। इसका ऊपरी भाग चार-छः इंच तक होता है।

कुंडी के उपरी भाग पर एक रस्सी या चमड़े की पट्टी लगी रहती है, जिसे वादक गले में डालकर खड़ा होकर बजाता है। वादन के लिए लकड़ी के दो छोटे गुटकों का प्रयोग किया जाता है। आदिवासी नृत्यों के साथ इसका वादन होता है।

पाबूजी के माटे ( Pabuji mate )

पाबूजी के माटे बनाने के लिए मिट्टी के दो बड़े मटकों के मुंह पर चमड़ा चढाया जाता है। चमड़े को मटके के मुँह की किनारी से चिपकाकर ऊपर डोरी बांध दी जाती है। दोनों माटों को अलग-अलग व्यक्ति बजाते हैं।

दोनों माटों में एक नर व एक मादा होता है, तदनुसार दोनों के स्वर भी अलग होते हैं। माटों पर पाबूजी व माता जी के पावड़े गाए जाते है। इनका वादन हथेली व अंगुलियों से किया जाता है। यह वाद्य मुख्य रुप से चुरू, बीकानेर, सीकर, जयपुर व नागौर क्षेत्र में बजाया जाता है।

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August 17, 2020

राजस्थान के इतिहास के साहित्यिक स्त्रोत Literary Sourace

राजस्थान के इतिहास के साहित्यिक स्त्रोत

राजस्थान में प्रारंभिक साहित्य की रचना संस्कृत और प्राकृत भाषा में की गई थी क्योंकि प्राचीन काल में व्यापक रूप से इन्हीं भाषाओं को मान्यता थी  मध्ययुग के प्रारंभिक काल से अपभ्रंश और उससे जनित मरू भाषा और स्थानीय बोलियां से से मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूंढाड़ी, मेवाती, बागड़ी आदि में भी साहित्य लेखन हुआ

इन प्रारंभिक संस्कृत साहित्य में हमें राजस्थान के इतिहास से संबंधित काफी सूचनाएं मिल जाती हैं

ऐतिहासिक राजस्थानी साहित्य

राजस्थानी साहित्य

पृथ्वी राज रासो ( Prithvi Raj Raso ) –  यह रासो ग्रंथ पृथ्वी राज चौहान के दरबारी कवि चन्दबरदाई द्रारा पिंगल (ब्रज हिन्दी)मे लिखा गया हैं, जिसे उसके पुत्र जल्हण ने पूरा किया । इसमें चार राजपूत वंशो यथा गुर्जर- प्रतिहार, परमार,सोलकी (चालुक्य) एवं चौहानों की उत्पत्ति गुरु वशिष्ठ विशवामित्र आदि के आबू पर्वत के अग्निकुण्ड से बताई गई हैं।

यह ग्रंथ चौहानों विशेषकर पृथ्वीराज चौहान के इतिहास पर विस्तृत प्रकाश डालता हैं।इसमें संयोगिता हरण एवं तराइन युद्ध का विशद वर्णन किया गया है इसकी ‘ चार बांस चौबीस गज अंगुल अष्ठ प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान हैं मत चुके चौहाण।’ यह विरोकंति बडी.प्रचलित है।चन्दबरदाई राजस्थानी के शीर्षस्थ कवि एवं हिन्दी के आदि कवि के रुप मे प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं।

  • पृथ्वीराजरासो – चन्दबरदाई
  • बीसलदेव रांसो – नरपति नाल्ह
  • हम्मीर रासो – जोधराज
  • हम्मीर रासो – शारगंधर
  • संगत रासो – गिरधर आंसिया
  • बेलिकृष्ण रूकमणीरी – पृथ्वीराज राठौड़
  • अचलदास खीची री वचनिका – शिवदास गाडण
  • कान्हड़ दे प्रबन्ध – पदमनाभ
  • पातल और पीथल – कन्हैया लाल सेठिया
  • धरती धोरा री – कन्हैया लाल सेठिया
  • लीलटास – कन्हैया लाल सेठिया
  • रूठीराणी, चेतावणी रा चूंगठिया – केसरीसिंह बारहड
  • राजस्थानी कहांवता – मुरलीधर ब्यास
  • राजस्थानी शब्दकोष – सीताराम लालस
  • नैणसी री ख्यात – मुहणौत नैणसी
  • मारवाड रे परगाना री विगत – मुहणौत नैणसी

संस्कृत भाषा  ( Sanskrit language )

संस्कृत भाषा

पृथ्वीराज विजय यह भयानक भट्ट द्वारा लिखा गया है इसमें अजमेर के चौहानों का इतिहास है, हमीर महाकाव्य यह नयन चंद्र सूरी द्वारा लिखा गया है इसमें रणथंबोर के चौहानों का इतिहास दिया गया है

राज वल्लभ यह मंडन द्वारा लिखा गया है जो 15वीं सदी का सैनिक संगठन स्थापत्य कला एवं मेवाड़ की जानकारी देता है राज विनोद यह भट्ट सदाशिव द्वारा लिखा गया है जो मेवाड़ के गुहिल एवं सोलहवीं शताब्दी में राजस्थान के सामाजिक परिवेश की जानकारी देता है

एकलिंग महात्म्य यह कान्ह व्यास द्वारा लिखा गया है इसमें मेवाड़ के गुहिलओ का इतिहास है करमचंद वंशों कीर्तन काव्यम यह जयसोम द्वारा लिखा गया है जो बीकानेर के राठौरों का इतिहास बीकानेर दुर्ग की निर्माण की जानकारी देता है

अमरसार पंडित जीवाधर द्वारा लिखा गया है जो महाराणा प्रताप एवं महाराणा अमर सिंह इतिहास की जानकारी देता है अमर काव्य वंशावली रणछोड़ भट्ट द्वारा लिखी गई है जो मेवाड़ के गुहीलो का विशेष कर महाराणा राजसिंह की गाथा का वर्णन है

राज रत्नाकर सदाशिव द्वारा लिखा गया है महाराणा राज सिंह सिसोदिया के इतिहास की जानकारी मिलती है अजीतोदय भट्ट जगजीवन द्वारा लिखा गया है जो जोधपुर के राठौरों का तथा अजीत सिंह राठौड़ का इतिहास बताता है

भट्टी काव्य भट्टी द्वारा लिखा गया है 15 शताब्दी में जैसलमेर की राजनीतिक एवं सामाजिक स्थिति पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालता है

संस्कृत साहित्य ( Sanskrit literature )

  • पृथ्वीराज विजय — जयानक (कश्मीरी)
  • हम्मीर महाकाव्य — नयन चन्द्र सूरी
  • हम्मीर मदमर्दन — जयसिंह सूरी
  • कुवलयमाला — उद्योतन सूरी
  • वंश भासकर/छंद मयूख — सूर्यमल्ल मिश्रण (बंूदी)
  • नृत्यरत्नकोष — राणा कुंभा
  • भाषा भूषण — जसवंत सिंह
  • एक लिंग महात्मय — कान्ह जी ब्यास
  • ललित विग्रराज — कवि सोमदेव

फारसी साहित्य ( Persian Literature )

  • ताज-उल मासिर- इसका लेखक सरउद्दीन हसन निजामी हैं। इस पुस्तक में 1129 ई. तक का हाल मिलता हैं।
  • तबकाते नासिरी- इसका लेखक काजी मिनहास-उस-सिराज हैं। दिल्ली सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश के राज्यकाल से लेकर सुल्तान नासिरूद्दीन के राज्यकाल के 15 वे वर्ष तक का हाल उसने स्वयं अपनी जानकारी के आधार पर लिखा हैं।
  • खजाइनुल फुतूह- इसका लेखक अमीर खुसरो हैं। इस ग्रन्थ की रचना 1311 ई. में की थी ।
  • तारीख-ए-फिरोजशाही- इसका लेखक जियाउद्दीन बरनी हैं। इसके ग्रन्थ से हमे रणथम्भौर और उस पर होने वाले मुस्लिम आक्रमणो की जानकारी मिलती हैं।
  • तारीखे-मुबारकशाही- इसका लेखक याहया-बिन-अहमद-अब्दुलशाह-सरहिन्दी हैं। तुगलक काल की जानकारी का मुख्य स्त्रोत हैं।
  • तुजुक-ए-बाबरी- बाबर द्वारा लिखित स्वयं की आत्मकथा को बाबरनामा के नाम से पुकारा जाता हैं। पानीपत युद्ध के बाद खानवा युद्ध तक की जानकारी इसी ग्रन्थ मे मिलती हैं।
  • हुमायूँनामा- इस ग्रन्थ की लेखिका गुलबदन बेगम थी।
  • तजकिरात-उल-वाकेयात- इसका लेखक जौहर आफताबची था। यह ग्रन्थ भी हुमायूँ की जीवनी हैं।
  • अकबरनामा ( Akbaranama ) – इसका लेखक अकबर का प्रमुख दरबारी और अधिकारी अबुल फजल हैं। लेखक ने मेवाड़, कोटा, मेवात, भरतपुर, और जयपुर के आसपास के क्षेत्रो की विस्तृत भौगोलिक जानकारी दी हैं।
  • बादशाहनामा ( Badashahanama ) इसका लेखक अब्दुल हमीद लाहौरी हैं। इसमे चित्तौड़ और उसके आसपास के क्षेत्रो की भौगोलिक विशेषताए बतायी गयी हैं।

फारसी साहित्य ( Persian Literature )

  • चचनामा – अली अहमद
  • मिम्ता-उल-फुतूह – अमीर खुसरो
  • तुजुके जहांगीरी – जहांगीर
  • तारीख -ए-राजस्थान – कालीराम कायस्थ
  • वाकीया-ए- राजपूताना – मुंशी ज्वाला सहाय

साहित्यिक पुरालेख ( Literary Archive )

  • फरमान और मन्सूर- बादशाह (शासक) द्वारा अपने सामन्तों, शहजादों, शासकों या प्रजा के स्वयं अथवा अन्य से लिखवाकर भेजा जाता था। इन पत्रों पर तुगरा या राजा का पंजा (हथेली का चिन्ह) लगा रहता था।
  • निशान- निशान नामक पत्र शहजादी या बेगमों द्वारा बादशाह के अतिरिक्त अन्य से लिखे गये पत्र कहलाते थे। जहाँगीर के शासनकाल में नूरजहां द्वारा भेजे गए निशानों पर जहाँगीर का नाम होता था, किन्तु उस पर नूरजहां की मुद्रा अंकित होती थी। इसको बेगम की मोहर कहा जाता था।
  • अर्जदाश्त- यह प्रजा द्वारा शासकों या शहजादों द्वारा बादशाह को लिखे जाने वाले पत्र थे। यदि ऐसी अर्जदाश्तों में विजय के संदेश प्रेषित होते तो इन्हें फतेहनामा कहा जाता था।
  • हस्बुलहुक्म- बादशाह की आज्ञा से बादशाही आज्ञा की सूचना देने के लिए मंत्री (वजीर) अपनी ओर से लिखता था।
  • रम्ज और अहकाम- बादशाहों द्वारा अपने सचिव को लिखवाई गयी कुछ टिप्पणियां विशेष कहलाते थे, जिनके आधार पर सचिव पूरा पत्र तैयार करता था।
  • सनद- पत्र नियुक्ति अथवा अधिकार हेतु प्रदान किया जाता था।
  • परवाना- अपने से छोटे अधिकारी को लिखा गया प्रशासनिक पत्र था।
  • रुक्का- निजी पत्र की संज्ञा थी, परवर्ती काल में राजा की ओर से प्राप्त पत्र को खास रुक्का कहा जाने लगा था।
  • दस्तक- के आधार पर लोग सामान एक स्थान से दूसरे स्थान पर ला-लेजा सकते थे, दरबार अथवा शिविर प्रवेश के लिए भी दस्तक एक प्रकार से आधुनिक “परमिट’ या “पास’ था।
  • वकील रिपोर्ट- प्रत्येक राज्यों से बादशाही दरबार में वकील नियुक्त होते थे, यह अपने शासकों के हितों की रक्षा तथा सूचना भेजते थे। इसके द्वारा लिखी सूचनाएं वकील रिपोर्ट कहलाती है।
  • अखबारात- इसी प्रकार राज्य और दरबार की कार्यवाहियों की प्रेसिडिस को अखबारात कहा जाता था

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August 17, 2020

मीरा बाई एवं दादू दयाल Meera Bai and Dadu Dayal

मीरा बाई एवं दादू दयाल

दादूदयाल जन्म 1544 ई.
मृत्यु: 1603 ई.)

दादूदयाल मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत थे. इनका जन्म विक्रम संवत् 1601 में फाल्गुन शुक्ला अष्टमी को अहमदाबाद में हुआ था.

हिन्दी के भक्तिकाल में ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रमुख सन्त कवि थे।  इन्होंने एक निर्गुणवादी संप्रदाय की स्थापना की, जो ‘दादू पंथ’ के नाम से ज्ञात है। दादू दयाल अहमदाबाद के एक धुनिया के पुत्र और मुग़ल सम्राट् अकबर के समकालीन थे।

उन्होंने अपना अधिकांश जीवन राजपूताना में व्यतीत किया एवं हिन्दू और इस्लाम धर्म में समन्वय स्थापित करने के लिए अनेक पदों की रचना की। उनके अनुयायी न तो मूर्तियों की पूजा करते हैं और न कोई विशेष प्रकार की वेशभूषा धारण करते हैं।  वे सिर्फ़ राम-नाम जपते हैं और शांतिमय जीवन में विश्वास करते हैं.

कविता के रूप में संकलित इनके ग्रन्थ दादूवानी तथा दादूदयाल जी रा दुहा कहे जाते हैं।  इनके प्रमुख सिद्धान्त मूर्तिपुजा का विरोध, हिन्दू मुस्लिम एकता, शव को न जलाना व दफनाना तथा उसे जंगली जानवरों के लिए खुला छोड़ देना, निर्गुण ब्रह्मा उपासक है।

दादूजी के शव को भी भराणा नामक स्थान पर खुला छोड़ दिया गया था। गुरू को बहुत अधिक महत्व देते हैं। तीर्थ यात्राओं को ढकोसला मानते हैं। सत्संग को अलख दरीबा कहते है।

उपदेश की भाषा सधुक्कड़ी।  वृद्धानंद जी इनके गुरु थे, साधु विवाह नही करते बच्चों को गोद लेते हैं। इन्हें राजस्थान का कबीर कहते हैं।

फतेहपुर सिकरी में अकबर से भेट के बाद आप भक्ति का प्रसार प्रसार करने लगे. राजस्थान में ये नारायणा में रहने लगे.

दादू जी की शिष्य परंपरा में 152 प्रमुख शिष्य हुए हैं । इनमें से 52 शिष्यों ने भिन्न-भिन्न स्थानों पर दादूद्वारों की स्थापना की तथा दादू पंथ के 52 स्तंभ कहलाए। दादू जी के शिष्यों में सुंदर दास जी एवं रज्जब जी सर्वाधिक प्रसिद्ध हुए।

इनके अनुसार ब्रह्मा से ओकार की उत्पति और ओंकार से पांच तत्वों की उत्पति हुई. माया के कारण ही आत्मा और परमात्मा के मध्य भेद होता है. दादूदयाल ने ईश्वर प्राप्ति के लिए गुरु को अत्यंत आवश्यक बताया.

अच्छी संगति, ईश्वर का स्मरण, अहंकार का त्याग, संयम एवं निर्भीक उपासना ही सच्चे साधन है. दादूदयाल ने विभिन्न प्रकार के सामाजिक आडम्बर, पाखंड एवं सामाजिक भेदभाव का खंडन किया. जीवन में सादगी, सफलता और निश्छलता पर विशेष बल दिया. सरल भाषा एवं विचारों के आधार पर दादू को राजस्थान का कबीर भी कहा जाता है

उसके बाद वे फतेहपुर सीकरी भी गए जहाँ पर बादशाह अकबर ने पूर्ण भक्ति व भावना से दादू जी के दर्शन कर उनके सत्संग व उपदेश ग्रहण करने के इच्छा प्रकट की तथा लगातार 40 दिनों तक दादूजी से सत्संग करते हुए उपदेश ग्रहण किया।

उसके बाद दादूजी महाराज नरेना ( जिला जयपुर ) पधारे और उन्होंने इस नगर को साधना, विश्राम तथा धाम के लिए चुना और यहाँ एक खेजडे के वृक्ष के नीचे विराजमान हुये यहीं पर उन्होंने ब्रह्मधाम “दादूद्वारा” की स्थापना की

ब्रह्मलीन होने के लिए निर्धारित दिन ( जयेष्ट कृष्ण अष्टमी सम्वत 1660 ) के शुभ समय में श्री दादूजी ने एकांत में ध्यानमग्न होते हुए “सत्यराम” शब्द का उच्चारण कर इस संसार से ब्रहम्लोक को प्रस्थान किया। श्री दादू दयाल जी महाराज के द्वारा स्थापित *“दादू पंथ” व “दादू पीठ” आज भी मानव मात्र की सेवा में लीन है इनके जन्म-दिन और मृत्यु के दिन वहाँ पर हर साल मेला लगता है।

दादू पंथ की 5 शाखाएं है – 

  1. खालसा
  2. विरक्त
  3. उतरादे
  4. खाकी
  5. नागा

Sundar Das Ji ( सुंदर दास जी )

सुंदर दास जी का जन्म 1596 ईस्वी में दौसा के खंडेलवाल वैश्य परिवार में हुआ। इनके पिता का नाम चोखा जी ( परमानंद ) माता का नाम सती देवी था इन्होंने दादू दयाल जी से दीक्षा लेकर दादू पंथ का प्रचार प्रसार किया तथा कई रचनाएं लिखि।

इन के प्रमुख ग्रंथ – सुंदर विलास, सुंदरदसार सुंदर ग्रंथावली एवं ज्ञान समुद्र है। सुंदर दास जी की मृत्यु सांगानेर में हुई। इन्होंने दादू पंथ में नागा मत का प्रवर्तन किया।

Sant Rajjab Ji ( संत रज्जब जी )

संत रज्जब जी का जन्म 1600 ई. में सांगानेर में हुआ ऐसा माना जाता है कि जब रज्जब जी दूल्हा बनकर विवाह करने जा रहे थे , तभी मार्ग में उन्होंने दादू जी के उपदेश सुने इन उद्देश्यों से वह इतने प्रभावित हुए कि जीवन भर दूल्हे के वेश में रहकर दादू पंथ का प्रचार किया।

इनकी प्रधान पीठ सांगानेर में है रज्जब वाणी एवं सर्वंगी इनके प्रमुख ग्रंथ है। इन्होंने सांगानेर में ही अपनी देह त्यागी थी।

Meera bai ( मीरा बाई )

संत शिरोमणि अनन्या कृष्ण भक्त मीरा बाई का जन्म बाजोली गांव वर्तमान नागौर जिले में डेगाना के निकट 1498 में हुआ ! उनके बचपन का नाम पेमल था कुछ इतिहासकार मीरा का जन्म स्थान कुडकी (पामानली) ते हैं

मीरा के पिता राव रतन सिंह माता वीर कंवरी थी ! डॉक्टर जयसिंह नीरज के अनुसार मीरा का बाल्यकाल कुड़की गांव (वर्तमान में पाली जिले के जैतारण तहसील )तथा मेड़ता में बीता ! कुड़की गांव रतन सिंह की जागीर थी !  मीरा के पिता मेड़ता के जागीरदार थे!

प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर गोपीनाथ शर्मा मीरा का जन्म कुड़की में हुआ मानते हैं! यह गांव पाली जिले में जोधपुर पुष्कर मार्ग पर स्थित है ,

वर्तमान में यहां पर एक लघु दुर्ग मीरा गढ़ एवं मीराबाई के बाल्यकाल से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण स्थान मिलते हैं! मीरा के दादा दुदा जी वैष्णव धर्म के उपासक थे! उन्होंने मेड़ता में चारभुजा नाथ का मंदिर बनवाया ! मीरा के जीवन वृत्त का लेख मीरा की पदावलीओ एवं भजनों के अलावा प्रिय दास कृत ‘भक्तमाल’ एवं ‘मेड़तिया री ख्यात’ तथा कर्नल जेम्स टॉड के इतिहास परक साहित्य में मिलता है!

मीरा का विवाह 1516 ईस्वी में मेवाड़ के महाराणा सांगा के जेष्ट पुत्र राजकुमार भोजराज के साथ हुआ! लेकिन विवाह के 7 वर्ष बाद जी भोजराज का स्वर्गवास हो गया! मीरा के लिए राणा सांगा ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग में कुंभ श्याम मंदिर के पास ‘कुंवरपदे’ का महल भी बनवाया!

मीरा ने कृष्ण को पति के रूप में मानकर आराधना की ! मीराबाई के गुरु संत रैदास चमार जाति के थे! कहा जाता है कि चैतन्य महाप्रभु के शिष्य जीव गोस्वामी मीराबाई से प्रभावित थे तथा मीरा उनसे प्रभावित थी ! मीराबाई ने सगुण भक्ति मार्ग अपनाया !

  • मीरा को राजस्थान की राधा कहा जाता है !
  • मीरा ने कृष्ण भक्ति में सैकड़ों भजनों की रचना वज्र मिश्रित राजस्थानी भाषा में की
  • वर्तमान में मीरा दासी संप्रदाय के लोगों की संख्या नगण्य है!

ऐसा माना जाता है कि अपने जीवन के अंतिम समय में मीराबाई मेवाड़ से मेड़ता एवं वृंदावन तथा वहां से द्वारिका चली गई तथा अंत में डाकोर ( गुजरात ) के रणछोड़ राय की मूर्ति में विलीन हो गई! मीरा के पदों को हरजस कहा जाता है!

रामस्नेही संप्रदाय , चरण दासी संप्रदाय ,दादूपंथी एवं जैन ग्रंथों में यह हरजस संकलित है!

मीरा की प्रमुख रचनाएं-

पदावली, नरसी जी रो मायरो (रत्ना खाती के सहयोग से रचित) राग गोविंद, राग सोरठ एवं सत्यभामा जी नू रूसणों है

मीरा बाई की रचनाएं

मीरा बाई ने चार ग्रंथों की रचना की-

नरसी का मायरा
गीत गोविंद टीका
राग गोविंद
राग सोरठ के पद

इसके अलावा मीराबाई के गीतों का संकलन “मीरांबाई की पदावली’ नामक ग्रन्थ में किया गया है।

मीरा द्वारा लिखे गए ग्रन्थ और सोरठो की भाषा मारवाड़ी थी

नरसी जी का मायरा ( Narsee Ji’s Mayra )

नरसी जी गरीब ब्राह्मण थे । मायरा भरना नामुमकिन था। उलटे मायरे में उच्च कुलीन वर्ग के लोगों के स्थान पर 15-16 वैष्णव भक्तों की टोली के साथ अंजार नगर पहुच गए थे, जो उनकी बेटी का ससुराल था।

उनकी कम “औकात” के चलते उनके तरह तरह के अपमान किये गए। पर सब कुछ उन्होंने भगवान के चरणों में चढ़ा दिया। सब सहा। पर भगवान से नहीं सहा गया। उनका मायरा श्री कृष्ण ने ही एक सेठ बनके भरा।

और समधी श्रीरंग जी द्वारा जो मायरा सूची बनाई गई थी, उससे कही ज्यादा भर दिया जो की राजा महाराजाओं से भी बढ़ के था। अर्थात श्रीरंग जी के स्तर से कहीं ऊपर था।

समधी(श्रीरंग जी) का परिवार अवाक होकर उस सेठ को देख रहा था। सोचता था- ये कौन है? कहा से आया है? और नरसी की मदद क्यों की? नरसी से इसका क्या रिश्ता है?

आखिर श्रीरंग जी ने उन सेठ (सांवरिया सेठ, श्री कृष्ण) से आखिर पूछ ही लिया “कृपा करके बताएँ आप नरसी जी के कौन लगते हैं?
नरसी जी आपके कौन लगते हैं?” इस प्रश्न के उत्तर में उस सेठ ने जो उत्तर दिया वो बताना ही इस प्रसंग का केंद्र बिंदु था। इस उत्तर को सुन कर आंखे सजल हो उठती हैं।

सांवलिया सेठ ने उत्तर में कहा “ये जो नरसी जी हैं ना, मैं इनका गुलाम हूँ। ये जब, जैसा चाहते हैं वैसा ही करता हूँ। जब बुलाते हैं हाज़िर हो जाता हूँ। इनका हर कार्य करने को तत्पर रहता हूँ।” उत्तर सुनकर समस्त समधी परिवार हक्का बक्का रह गया।

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मीरा बाई मीरा बाई मीरा बाई मीरा बाई

August 15, 2020

राजस्थान की छतरियां Rajasthan Cenotaphs

राजस्थान की छतरियां

छतरियां

गैटोर की छतरिया – नाहरगढ़ (जयपुर) में स्थित है। ये कछवाहा शासको की छतरियां है। जयसिंह द्वितीय से मानसिंह द्वितीय की छतरियां है।

बड़ा बाग की छतरियां- जैसलमेर में स्थित है। – यहां भाटी शासकों की छतरियां स्थित है।

क्षारबाग की छतरियां – कोटा में स्थित है। – यहां हाड़ा शासकों की छतरियां स्थित है।

देवकुण्ड की छतरियां- रिड़मलसर (बीकानेर) में स्थित है। राव बीकाजी व रायसिंह की छतरियां प्रसिद्ध है।

छात्र विलास की छतरी- कोटा में स्थित है।

केसर बाग की छतरी- बूंदी में स्थित है।

जसवंत थड़ा- जोधपुर में स्थित है। सरदार सिंह द्वारा निर्मित है।

रैदास की छतरी- चित्तौड़गढ में स्थित है।

गोपाल सिंह यादव की छतरी- करौली में स्थित है।

08 खम्भों की छतरी- बांडोली (उदयपुर) में स्थित है। यह वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की छतरी है।

32 खम्भो की छातरी- राजस्थान में दो स्थानों पर 32-32 खम्भों की छतरियां है। मांडल गढ (भीलवाड़ा) में स्थित 32 खम्भों की छतरी का संबंध जगन्नाथ कच्छवाहा से है। रणथम्भौर (सवाई माधोपुर) में स्थित 32 खम्भों की छतरी हम्मीर देव चैहान की छतरी है।

80 खम्भों की छतरी –  अलवर में स्थित हैं यह छतरी मूसी महारानी से संबंधित है।

84 खम्भों की छतरी- बूंदी में स्थित है। यह छतरी राजा अनिरूद के माता देव की छतरी है। यह छतरी भगवान शिव को समर्पित है।

16 खम्भों की छतरी – नागौर में स्थित हैं यह अमर सिंह की छतरी है। ये राठौड वंशीय थे।

टंहला की छतरीयां – अलवर में स्थित हैं।

आहड़ की छतरियां – उदयपुर में स्थित हैं इन्हे महासतियां भी कहते है।

राजा बख्तावर सिंह की छतरी- अलवर में स्थित है।

राजा जोधसिंह की छतरी- बदनौर (भीलवाडा) में स्थित है।

मानसिंह प्रथम की छतरी- आमेर (जयपुर) में स्थित है।

06 खम्भों की छतरी- लालसौट (दौसा) में स्थित है।

गोराधाय की छतरी- जोधपुर में स्थित हैं। अजीत सिंह की धाय मां की छतरी है।

राजस्थान की ऐतिहासिक छतरियाँ ( Historical Cenotaphs of Rajasthan )

  • अमरसिंह की छतरी – नागौर
  • सिसोदिया राणाओं की छतरियाँ – आहड़ , उदयपुर
  • राव बीका जी रायसिंह की छतरियाँ – देव कुंड बीकानेर
  • हाड़ा राजाओं की छतरियाँ – सारबाग ,कोटा
  • रैदास की छतरी – चित्तौड़गढ़
  • गोपालसिंह की छतरी – करौली
  • 84 खंभों की छतरी – बूँदी
  • राजा बख्तावर सिंह की छतरी – अलवर
  • 32 खंभों की छतरी – रणथम्भौर
  • केसर बाग व क्षार बाग की छतरियाँ – बूँदी ( बूँदी राजवंश की )
  • भाटी राजाओं की छतरियाँ – बड़ा बाग ,जैसलमेर
  • राठौड़ राजाओं की छतरियाँ – मंडोर जोधपुर
  • मूसी महारानी की छतरी – अलवर
  • महाराणा प्रताप की छतरी ( 8 खंभोकी )- बाडोली ( उदयपुर )
  • कच्छवाहा राजाओं की छतरियाँ – गेटोर ( नाहरगढ़ , जयपुर )
  • राव जोधसिंह की छतरी – बदनौर
  • जयमल ( जैमल ) व कल्ला राठौड़ की छतरियाँ – चित्तौड़गढ

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August 15, 2020

आभूषण कोन कोन से होते है? Jewelery

आभूषण

शरीर को सुंदर और आकर्षक बनाने के लिये स्त्रियों व पुरषों द्वारा आभूषण पहने जाते हैं। आभूषण का शाब्दिक अर्थ होता है गहना व अलंकार।

सिर , मस्तक, माथे पर पहने जाने वाले आभूषण ( Head jewelery )

  • टीडी – भलको ,ललाट का आभूषण टिकी , काचर, फीणी , सांकली , तावित
  • गोफण ( Sling ) –  ये बालो में गुथा जाता है
  • गेड़ी ( chap ) – चांद सूरज , चूड़ामन , चूड़ारत्न, तीबगट्टों , तिलक मणि
  • थुड़ी ( Thumb ) –  ये राजघराने में भी प्रचलित रहा है
  • थाळो ( Thalow ) = देवमूर्ति युक्त गले का आभूषण
  • फूलगूधर ( Phulagudhar ) = शीश पर गुथा जाने वाला एक रजत आभूषण विशेष
  • मेमन्द ( memand )= सिर का_आभूषण
  • बोर, बोरलो ( रखड़ी rakhadi )
  • मेंण , मौडियो , मौरमीडली , मांग टीको , मांग फूल
  • सेलड़ो , वेणी के साथ गुथा जाता है
  • सोहली= ललाट पर
  • सिरभोग , शिशफूल ( sheeshaphool )( इसे सेरज के नाम से जाना जाता है )

कान के आभूषण ( Ear Jewelry )

  • ओगनियो = कान के ऊपर की लोट में पहना जाने वाला सोने या चाँदी की एक लटकन जैसा होता है। इसे पीपल पतो, पीपलपानो भी कहा जाता है।
  • एरंगपतो , कर्णफूल , कुड़कली , खीटली , छैलकडी , जमेलो
  • झूटणों = कान में पहने जाने वाले इस_आभूषण पर एक लोकगीत भी प्रचलित रहा है
  • झूमणू, झूमर ( Chandelier ) , झूमका कर्ण के_आभूषण विशेष
  • टोटी-झूमर = कान के नीचले भाग में पहने जाने वाला एक_आभूषण विशेष इसे मेघवाल जाति व जाट जाति की महिलाएं अधिक पहनती है
  • टोटी , टोरियो , डरगनियो, तड़कली , पीपलपत्र, पासो , पीपलपान, बाली, लटकन, माकड़ी, सन्दोल , वेडलो , बूसली कुछ अन्य प्रमुख कान के_आभूषण है।

गले के आभूषण ( Throat ornaments )

  • आड़ , कन्ठल , कन्टी , कन्ठसरी , खींवली
  • खुंगाली :- ये गले मे पहनने का सोने या चांदी का_आभूषण है, जो हंसुली की हड्डी के पास रहता है
  • Galapatiyo, Galasankalo, Galahar
  • चम्पाकली , छेड़ियो , झालरों, ( Champakali, Chhedio, Frost ) (ठुसी :- ये वर्तमान में प्रचलित नेकलेस का ही रूप है, बस थोड़ा भारी होता है, नेकलेस से)।
  • तिमणियो :- ये गले का आभूषण विशेष है जो अपने ईष्ट देव के नाम का बनवाया जाता है, मांदलिया का ही एक रूप।
  • तुलसी , दुगदूगी, नक़्क़स, निबौरी , निगोदर, पचमाणियो , पचलडी , पटियो , मंगलसूत्र, माणिक्यमाला , मुक्तमाला, हंसली, हारलियो, हमेल, हांस , होदल , पाट , हाकर , मटर माला, मोहन माला, जालरो , चन्दन हार , जुगावली।

नोट = गले व छाती पर लटकने वाले आभूषणों को पत्रलता, आमुक्तावली आदि कहते है।

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August 15, 2020

राजस्थान के महल और हवेलियाँ Palace and Havelis

Havelis

जैसलमेर की हवेलियाँ ( Jaisalmer havelis )

1. पटवों की हवेली ( Haveli of patwon )

यहाँ की पटवों की हवेली अपनी शिल्पकला, विशालता एवंअद्भुत नक्काशी के कारण प्रसिद्ध है

पटवों की हवेली को सेठ गुमानचन्द बापना  ने 18 वीं सदी के उत्तरार्द्ध में बनवाया था।

जैसलमेर की सबसे बड़ी यह पाँच मंजिला हवेली शहर के मध्य स्थित है

इस हवेली के जाली-झरोखे बरबस ही पयर्टकों को आकर्षित करते हैं।

2. सालिमसिंह की हवेली ( Salem Singh’s Haveli )

पटवों की हवेली के अतिरिक्त जैसलमेर में स्थित सालिमसिंह की हवेली का शिल्प-सौन्दर्य भी अद्वितीय है

 इसका निर्माण जैसलमेर राज्य के दीवान सालिम सिंह ने 1815 ई. में करवाया था 

इस नौ खण्डी हवेली के प्रथम सात खण्ड पत्थर के और ऊपरी दो खण्ड लकड़ी के बनेहुए थे। बाद  में  लकडी़  के  दोनों  खण्ड  उतार लिये गए।

3. नथमल  की  हवेली (Havelis)

जैसलमेर राज्य के प्रधानमंत्री नथमलजी द्वारा 19वीं शताब्दी में निर्मित नथमल की हवेली भी शिल्पकला कीदृष्टि से अपना अनूठा स्थान रखती है 

 इस हवेली का शिल्पकारी का कार्य हाथी और लालू नामक दो भाइयों ने इस सकंल्प के साथ शुरू किया था

 कि वे हवेली में प्रयुक्त शिल्प  को दोहराएंगे  नहीं, इसी कारण इसका शिल्प अनूठाहै।

शेखावाटी की हवेलियाँ ( Shekhawati Havelis )

ये अपने भित्तिचित्रों के लिए विख्यात हैं शेखावाटी की हवेलियाँ स्वर्णनगरी के रूप में विख्यात हैं

  • नवलगढ़ (झुंझुनूं)  में सौ से ज्यादा हवेलियाँ अपनी शिल्पसौन्दर्य बिखेरे हुए हैं
  • यहाँ की हवेलियों में रूप निवास,भगतो की हवेली, जालान की हवेली, पोद्दार की हवेली और भगेरियाँ की हवेली प्रसिद्ध हैं।
  • बिसाऊ (झुंझुनूं) में नाथूराम पोद्दार की हवेली, सेठजयदयाल केठिया की
  •  हीराराम बनारसी लाल की हवेली तथा सीताराम सिंगतिया  की हवेली प्रसिद्ध है।
  • झुंझुनूं में टीबड़ेवाला की हवेली तथा ईसरदास  मोदी  की हवेली अपने शिल्प वैभव के कारण अलग ही छवि लिए हुएहैं।
  • मण्डावा (झुंझुनूं) में सागरमल लाडिया, रामदेव चौखाणी तथा रामनाथ गोयनका की हवेली,
  • डूंडलोद (झुंझुनूं) मेंसेठ लालचन्द गोयनका,  मुकुन्दगढ़ (झुंझुनूं) में सेठ राधाकृष्ण एवं केसरदेव कानोड़िया की हवेलियाँ प्रसिद्ध है
  • चिड़ावा(झुंझुनूं) में बागड़िया की हवेली, डालमिया की हवेली प्रसिद्ध है।
  • महनसर (झुंझुनूं) की सोने -चाँदी की हवेली प्रसिद्ध है।
  • श्रीमाधोपुर(सीकर) में पंसारी की हवेली ( Pansari haveli ) प्रसिद्ध है।
  • लक्ष्मणगढ़ (सीकर) केडिया एवं राठी की हवेली प्रसिद्ध है।
  • सीकर में गौरीलाल बियाणी की हवेली ( Gaurilal Biyani Ki Haveli ) प्रसिद्ध है।
  • रामगढ़ (सीकर)में ताराचन्द रूइया की हवेली समकालीन भित्तिचित्रों के कारण प्रसिद्ध है
  • फतेहपुर (सीकर) में नन्दलाल देवड़ा,कन्हैयालाल गोयनका  की हवेलियाँ भी भित्तिचित्रों केकारण प्रसिद्ध है।

झुंझुनूं जिले की ये ऊँची-ऊँची हवेलियाँ बलुआ पत्थर,ईंट, जिप्सम एवं चूना, काष्ठ तथा ढलवाँ धातु के समन्वयसे निर्मित अपने अन्दर भित्ति  चित्रों की छटा लिये हुए हैं।

महल Palace

सुनहरी कोठी  ( Golden Mansion )

स्थिति= टोंक जिले में

इसका निर्माण 1824 ईस्वी में अमीर खाँ पिंडारी द्वारा करवाया गया। इस शीश महल के मान भी जानी जाती है। ये दो मंजिला कोठी है, इसकी दूसरी मंजिल का निर्माण इब्राहिम अली खां ने करवाया था।

इस कोठी पर स्वर्ण की नक्काशी का कार्य भी इब्राहिम खाँ द्वारा करवाया गया। तब से इसे सुनहरी कोठी कहा जाने लगा. अतः सुनहरी कोठी का निर्माता इब्राहिम खाँ हो ही मानते है।

जलमहल ( Jal mahal )

  • The Island palace
  • स्थिति = जयपुर-आमेर मार्ग

जलमहल मानसागर झील में स्थिति है सवाई जयसिंह ने जयपुर की जलापूर्ति हेतु गर्वावती नदी के पानी को रोककर इसका निर्माण करवाया था।

ध्यान रहे – इसका पूर्ण रूप से निर्माण सवाई प्रताप सिंह ने करवाया था।

जग मंदिर ( Jag mandir )

लोकप्रिय शब्दों में जग मंदिर, झील गार्डन पैलेस, पिछोला झील के चार द्वीपों में से एक पर स्थित है। मेवाड़ राजवंश के तीन सिसोदिया राजपूत राजाओं ने महल का निर्माण किया।

महाराणा अमर सिंह ने पहली बार 1551 में महल (Palace) का निर्माण शुरू किया। बाद में, महाराणा कर्ण सिंह ने 1620 और 1628 के बीच कुछ काम कराया। महाराणा जगत सिंह प्रथम ने (1628-1652) महल निर्माण कार्य को पूरा किया।

यह जग मन्दिर के रूप में अंतिम राजा महाराणा जगत सिंह के नाम पर नामित किया गया। जग मंदिर में गुल महल (Palace) मुगल राजकुमार खुर्रम के लिए बनाया गया था।

महल के शीर्ष पर इस्लामी वर्धमान के साथ एक गुंबद है। इमारत के अंदर, हॉल, स्वागत क्षेत्र, अदालतें, और आवासीय स्थान हैं। कुंवर पाडा का महल (palace) या युवराज पैलेस जग मंदिर के पश्चिम में स्थित है। मंडप शानदार हाथी संरचना के पत्थर के साथ सजाया गया है।

यहाँ महल ( बगीचा भी है। यात्री बगीचे में बोगनवेलिया, चमेली, काई गुलाब, फ्रैंगीपानी के पेड़ों और खजूर के पेड़ो को देख सकते हैं।

जगनिवास ( Jug Niwas )

जगनिवास

जगनिवास महल (Palace) का निर्माण महाराणा जगत सिंह ने 1746 ई. में करवाया था महाराणा उदयसिंह ने इसकी मरम्मत करवाई। वर्तमान में यहां होटल लैक पैलेस संचालित है।

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