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PHYSICS

June 30, 2020

What is Light प्रकाश उपयोग व कार्य क्या क्या है???

प्रकाश

प्रकाश

प्रकाश_एक प्रकार की ऊर्जा है इसका ज्ञान हमें आँखों द्वारा प्राप्त होता है जो विधुत चुम्बकीय तरंगों के रूप में संचारित होता है ।

प्रकाश_की दोहरी प्रकृति पायी जाती है ,

  • तरंग प्रकृति ( Wave nature )
  • फोटॉन (कण) प्रकृति ( Photon nature )

प्रकाश सरल रेखा में गमन करता प्रतीत होता है

सर्वप्रथम रोमर नामक वैज्ञानिक ने बृहस्पति ग्रह के उपग्रहो की गति को देखकर प्रकाश का वेग ज्ञात किया था डच भौतिकशास्त्री हाइजेन ने_प्रकाश का तरंग सिद्धांत दिया

सर्वप्रथम अंग्रेज भौतिकीवीद् व गणितज्ञ न्यूटन ने बताया कि_प्रकाश श्वेत_प्रकाश सभी रंगो के_प्रकाश से मिलकर बना है

आपतित किरणें ( Incident rays ) – किसी परावर्तित होने वाली सतह पर पड़ने वाली_प्रकाश की किरणें आपतित किरणें कहलाती हैं।

परावर्तित किरणें ( Reflected Rays )- किसी वस्तु से टकराकर लौटने वाली किरणें परावर्तित किरणें कहलाती हैं।

अभिलम्ब ( Perpendicular )– एक काल्पनिक रेखा जो परावर्तित होने वाली सतह पर प्रकाश की किरण पड़ने के बिन्दु पर लम्ब होती है, को अभिलम्ब या परावर्तित होने वाली सतह पर लम्ब कहते हैं।

आपतन कोण ( Angle of incidence )- प्रकाश की किरणों द्वारा आपतन बिन्दु तथा उस बिन्दु पर अभिलम्ब के साथ बनाने वाले कोण को आपतन कोण कहते हैं।

परावर्तन कोण ( Angle of reflection )– प्रकाश की किरणों द्वारा प्ररावर्तन के बिन्दु तथा अभिलम्ब के साथ बनाये जाने वाले कोण को परावर्तन कोण कहते हैं।

वास्तविक प्रतिबिम्ब ( Real image )  – प्रतिबिम्ब जिसे पर्दे पर उतारा जा सकता है, को वास्तविक प्रतिबिम्ब कहते हैं। वास्तविक प्रतिबिम्ब हमेशा दर्पण के सामने की ओर बनता है।

आभासी प्रतिबिम्ब ( Virtual image )-  प्रतिबिम्ब जिसे पर्दे पर नहीं उतारा जा सकता है, को आभासी प्रतिबिम्ब कहते हैं। आभासी प्रतिबिम्ब हमेशा दर्पण के पीछे बनता है।

June 29, 2020

Work, Energy and Power कार्य, ऊर्जा एवं शक्ति

कार्य, ऊर्जा एवं शक्ति

कार्य ( Work )

परिभाषा- जब किसी बल का क्रिया बिंदु की बल की दिशा में विस्थापन होता है तो यह समझा जाता है कि बल ने कार्य किया ह

  • नियत बल द्वारा किया गया कार्य- यदि आरोपित बल की दिशा तथा परिमाण नियत हो तो यह नियत बल कहलाता है |
  • परिवर्ती बल द्वारा किया गया कार्य –यदि आरोपित बल की दिशा या परिमाण या दोनों परिवर्तित हो तो यह परिवर्ती बल द्वारा किया गया कार्य कहलाता है|

कार्य का मात्रक जूल होता है कार्य करने की क्षमता को ऊर्जा कहते हैं कार्य तथा ऊर्जा के मात्रक समान होते हैं किसी निकाय की संपूर्ण ऊर्जा नियत रहती है ऊर्जा नष्ट की जा सकती है नहीं उत्पन्न की जा सकती है इसे एक प्रकार की ऊर्जा से दूसरी ऊर्जा में बदला जा सकता है जैसे

  • विद्युत ऊर्जा  – यांत्रिक ऊर्जा
  • यांत्रिक ऊर्जा  – विद्युत ऊर्जा
  • प्रकाश ऊर्जा – विद्युत ऊर्जा
  • विद्युत ऊर्जा – विद्युत ऊर्जा
  • नाभिकीय ऊर्जा –  विद्युत ऊर्जा
  • रासायनिक ऊर्जा-  विद्युत
  • विद्युत ऊर्जा – रासायनिक

ऊर्जा एक अदिश राशि है आइंस्टीन का सिद्धांत के अनुसार दांत होते हैं

E=MC^2

M is mass and
C is light velocity
E is energy

यांत्रिक ऊर्जा दो प्रकार की होती है

  1. गतिज ऊर्जा
  2. स्थितिज ऊर्जा

वस्तु की गतिज ऊर्जा विराम अवस्था प्राप्त करने से पूर्व वस्तु द्वारा किए गए कार्य के बराबर होती है

गतिज ऊर्जा=1/2mv^2

Where m is mass and V is velocity of particle

रेखीय संवेग P=MV होता है इस प्रकार हम गतिज ऊर्जा को एक दूसरे रूप में व्यक्त कर सकते हैं

K=P^2/2m

कार्य ऊर्जा प्रमेय

कण पर आरोपित सभी बलों द्वारा किए गए कार्य का योग इसकी गतिज ऊर्जा में परिवर्तन के बराबर होता है| कार्य ऊर्जा प्रमेय लगाते समय हमें कुल कार्य की गणना करने के लिए बाह्य तथा आंतरिक दोनों बलो का उपयोग करना चाहिए।

कार्य ऊर्जा शक्ति

  • कार्य= बल×बल की दिशा मे विस्थापन
  • कार्य एक अदिश राशि है
  • कार्य का SI मात्रक न्यूटन मीटर होता है
  • शक्ति का SI मात्रक वाट होता है
  • ऊर्जा का SI मात्रक जूल है

ऊर्जा का रूपांतरण

  • सौर सेल = प्रकाश ऊर्जा को विधुत ऊर्जा मे
  • डायनेमो = यांत्रिक ऊर्जा को विधुत ऊर्जा मे
  •  विधुत मोटर = विधुत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा मे

June 28, 2020

What Is Heat ऊष्मा का उपयोग व कार्य क्या क्या है???

ऊष्मा (Heat)

ऊष्मा एक प्रकार की ऊर्जा है । जब किसी वस्तु को गर्म करते है तब वह ऊष्मा ग्रहण करती है । ऊष्मा को न तो बनाया जा सकता हे न ही नष्ट किया जा सकता हे ऊष्मा को सिर्फ एक निकाय से दूसरे निकाय में स्तान्तरित किया जा सकता हे ऊष्मा का प्रमाण सर्व प्रथम रदरफोर्ड ने दिया था ।

उष्मा का मात्रक कैलोरी व किलो कैलोरी मे होता है । S.I. पद्धति मे उष्मा का मात्रक जूल है ।

1 कैलोरी =4.18 या 4.2 जूल
1 किलो कैलोरी=4.18 ×1000 जूल

ताप मापने की इकाई डिग्री सेल्सियस, फारेनहाइट, केल्विन इत्यादि है।

Heat

उष्मा मापन की 3 इकाइयां होती है

  • 1 कैलोरी
  • अंतर्राष्ट्रीय कैलोरी
  • BTU ब्रिटिश थर्मल यूनिट

एक कैलोरी- 1 ग्राम पानी का तापमान 1 डिग्री बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊर्जा एक कैलोरी होती है

अंतरराष्ट्रीय कैलोरी- 1 ग्राम पानी का तापमान 14.5℃ से 15.5℃ बढ़ाने के लिए ऊर्जा आवश्यक ऊर्जा अंतरराष्ट्रीय कैलोरी कहलाती है

BTU ब्रिटिश थर्मल यूनिट – 1पौडं जल का तापमान 1 डिग्री फारेनहाइट बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊर्जा 1BTU कहलाती है

  • एक पाउंड =453 ग्राम
  • 1 BTU =252 कैलोरी

कोयले की ऊष्मा B T U में मापी जाती है ऊष्मा मापन की सबसे बड़ी इकाई B. T. U. है

तापक्रम पैमाने

C/5=F-32/9=R/4=T-273/5

विशिष्ट उष्मा – किसी पदार्थ के एकांक द्रव्यमान का ताप 1℃ बढांने के लिए आवश्यक उष्मा को उस पदार्थ कि विशिष्ट उष्मा कहते है ।  विशिष्ट उष्मा का मान 0 से लेकर अनन्त तक हो सकता है लेकिन कभी ऋणात्मक नही हो सकता।

त्रिक बिन्दु- वह ताप व दाब जहाँ पर उर्ध्वपातन ,संगलन व वाष्पन वक्र मिलते है अर्थात् तीनो अवस्थाएँ सहवर्ती होती है, उसे पदार्थ का त्रिक बिन्दु कहते है ।

गुप्त उष्मा- पदार्थ के एकांक द्रव्यमान की अवस्था परिवर्तन करने के लिए आवश्यक उष्मा को को पदार्थ की गुप्त उष्मा कहते है ।

ऊष्मा के प्रभाव- ऊष्मा के प्रभाव से पदार्थ में कई बदलाव आते हैं जो यदा कदा स्थाई होते है और कभी-कभी अस्थाई।

ऊष्मीय प्रसार – गर्म करने पर ठोस, द्रव या गैस के आकार में विस्तार होता है। पर वापस ठंढा करने पर ये प्रायः उसी स्वरूप में आ जाते हैं। इस कारण से इनके घनत्व में भी बदलाव आता है।

अवस्था में परिवर्तन – ठोस अपने द्रवानांक पर द्रव बन जाते हैं तथा अपने क्वथनांक पर द्रव गैस बन जाते हैं। यह क्वथनांक तथा द्रवनांक ठोस तथा द्रव के कुल दाब पर निर्भर करता है। कुल दाब के बढ़ने से क्वथनांक तथा द्रवनांक भी बढ़ जाते हैं।

विद्युतीय गुणों में परिवर्तन – तापमान बढाने पर यानि गर्म करने पर किसी वस्तु की प्रतिरोधक क्षमता (Resistivity) जैसे गुणों में परिवर्तन आता है। कई डायोड तथा ट्रांज़िस्टर उच्च तापमान पर काम करना बंद कर देते हैं।

रसायनिक परिवर्तन – कई अभिक्रियाएं तापमान के बढ़ाने से तेज हो जाती हैं। उदाहरण स्वरूप 8400C पर चूना पत्थर का विखंडन –
CaCO3 → CaO + CO2

ऊष्मा का एक स्थान से दूसरे स्थान को संचरण तीन विधियों से होता है-

  • चालन (Conduction)
  • संवहन (Convection)
  • विकिरण (Radiation)

तापमान

गर्म या ठंढे होने की माप तापमान कहलाता है जिसे तापमापी यानि थर्मामीटर के द्वारा मापा जाता है। लेकिन तापमान केवल ऊष्मा की माप है, खुद ऊष्मीय ऊर्जा नहीं। इसको मापने के लिए कई प्रणालियां विकसित की गई हैं

जिनमें सेल्सियस(Celsius), फॉरेन्हाइट(Farenhite) तथा केल्विन(Kelvin) प्रमुख हैं। इनके बीच का आपसी सम्बंध इनके व्यक्तिगत पृष्ठों पर देखा जा सकता है।

ऊष्मा मापने का मात्रक कैलोरी है। विज्ञान की जिस उपशाखा में ऊष्मा मापी जाती है, उसको ऊष्मामिति (Clorimetry) कहते हैं। इस मापन का बहुत महत्व है। विशेषतया विशिष्ट ऊष्मा का सैद्धांतिक रूप से बहुत महत्व है और इसके संबंध में कई सिद्धांत प्रचलित हैं। ऊष्मा Heat का एस आई मात्रक जूल है।

महत्वपुर्ण:-

पानी 0°C पर जमता है। पानी 100°C पर उबलता है।

मनुष्य के शरीर का सामान्य तापमान – 37°C / 98°F होता है।

Heat Heat Heat Heat Heat

June 26, 2020

What Is Pressure दाब क्या है व इसके कार्य???

दाब

किसी सतह के इकाई क्षेत्रफल पर लगने वाले अभिलम्ब बल को दाब (Pressure) कहते हैं। अत: क्षेत्रफल जितना बड़ा होगा दाब उतना ही कम होगा और क्षेत्रफल जितना कम होगा दाब उतना ही आधिक होगा इसकी इकाई ‘न्यूटन प्रति वर्ग मीटर’ होती है जिसे अब पास्कल कहते है

Pressure

Pressure

पास्कल (Pa), बराबर एक न्यूटन प्रति वर्ग मीटर (N·m−2 या kg·m−1·s−2). इकाई का यह विशेष नाम 1971 में जुडा़ था। यह मात्रक द्रवो का विस्तृत अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक ब्लेज़ पास्कल के सम्मान में रखा गया है दबाव एक अदिश राशि है इसकी SI इकाई  पास्कल है;

दाब p= h × d × g

1 Pa = 1 N/m2

दाब = पृष्ठ के लम्बवत् बल / पृष्ठ का क्षेत्रफल

किसी वस्तु का क्षेत्रफल जितना कम होता है, वह सतह पर उतना ही अधिक दाब डालती है, इसके दैनिक जीवन में अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं, जैसे दलदल में फंसे व्यक्ति को लेट जाने की सलाह दी जाती है ताकि उसके शरीर का अधिक क्षेत्रफल दलदल के सम्पर्क में आ जाय व नीचे की ओर कम दाब लगे। कील का निचला हिस्सा नुकीला बनाया जाता है ताकि क्षेत्रफल कम होने से वह सतह पर अधिक दाब डाल सके व ठोंकने पर आसानी से गड़ जाये।

दाब,  ताप और आयतन में संबंध आदर्श गेस समीकरण द्वारा दिया जाता है

PV=nRT

P=pressure
V=volume
n=no. Of moles
R= constant
T=temprature

इस समीकरण का उपयोग करके हम निम्न नियम उत्पादित कर सकते है::

बॉयल का नियम { ट्रिक गर्मी से संबधित ह इसलिए ताप को स्थिर} – इसके अनुसार यदि तापमान को स्थिर रखते हुए आयतन को बढ़ाया जाए तो दाब में कमी होती है अर्थात दाब और आयतन एक दूसरे के व्युत्क्रमानुपाती होते ह।

P $ (1/V)

चार्ल्स का नियम:: इसके अनुसार यदि दाब को स्थिर रखते हुए ताप को बढ़ाया जाए तो आयतन में वृद्धि होती है अर्थात आयतन और तापमान एक दूसरे के समानुपाती होते हैं

V $ T

आवोगाद्रो का नियम :: इस नियम के अनुसार किसी निश्चित किसी गैस के निश्चित वॉल्यूम निश्चित तापमान निश्चित दाब पर गैसों में मोलो की संख्या समान होती है।

STP : stands for temperature and pressure

I.e. air at 0°C (273.15 K, 32°F) and pressure 10^5 pascals (1 bar).

संकेतों के अर्थ

  • T – ताप
  • N – मोलों की संख्या
  • n – अणुओं की संख्या
  • m – गैस का द्रव्यमान
  • ρ – घनत्व
  • V – आयतन
  • Vm – मोलर आयतन
  • kB – बोल्ट्जमान नियतांक
  • R – सार्वत्रिक गैस नियतांक
  • Rs – विशिष्ट गैस नियतांक

पास्कल का सिद्धान्त

जल-स्तम्भ के दबाव के कारण पीपे (barrel) का फटना। सन् 1646 में पास्कल ने यही प्रयोग किया था। पास्कल का सिद्धान्त या पास्कल का नियम द्रवस्थैतिकी में दाब से सम्बन्धित एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त है। इसे फ्रांसीसी गणितज्ञ ब्लेज पास्कल ने प्रतिपादित किया था। यह सिद्धान्त इस प्रकार है –

सब तरफ से घिरे तथा असंपीड्य ( in compressible ) द्रव में यदि किसी बिन्दु पर दाब परिवर्तित किया जाता है (घटाया या बढ़ाया जाता है) तो उस द्रव के अन्दर के प्रत्येक बिन्दु पर दाब में उतना ही परिवर्तन होगा।

वायुमंडलीय दाब 

पृथ्वी के एक निश्चित क्षेत्रफल पर वायुमंडल की सभी परतों द्वारा पढ़ने वाला दाब ही वायुमंडलीय दाब कहलाता है । अधिकांश परिस्थितियों मैं वायुमंडलीय दाब का लगभग सही अनुमान मापन बिंदु पर उसके ऊपर वाली हवा के भार द्वारा लगाए गए द्रव स्थैतिक द्वारा लगाया जाता है ।

स्थान बदलने पर वायुमंडलीय दाब का मान कम या अधिक होना उन स्थानों के ऊपर वायुमंडलीय स्तंभों के द्रव्यमान का कम या अधिक होना है । इसीलिए पृथ्वी तल से ऊंचाई पर जाने से वायुमंडलीय दाब कम हो जाता है और गहराई में जाने पर अधिक हो जाता है !

समुद्र तल पर वायुमंडलीय दाब का मान 1.0135×100000 Pa होता है जिसे 1atm से व्यक्त करते हैं 

बैरोमीटर या वायुदाबमापी एक ऐसा उपकरण है जिसकी सहायता से किसी स्थान पर वायुमंडलीय दाब की माप की जाती है वायुदाब मापने के लिए सामान्यतः पारे का प्रयोग किया जाता है !

समुद्र तल पर बैरोमीटर मैं पारे के स्तंभ की ऊंचाई 76 सेंटीमीटर के लगभग होती है!  जो पारे के 76 सेमी लंबे कॉलम के द्वारा 0℃ पर 45° अक्षांश पर समुद्र तल पर लगाया जाता है यह एक वर्ग सेमी अनुप्रस्थ काट वाले पारे के 76 सेमी लंबे कॉलम के भार के बराबर होता है मौसम विज्ञान में दाब का मात्रक बार लिया जाता है।

1 bar =2 kPa

June 25, 2020

What Is Motion गति क्या है व इसके कार्य???

गति

यदि कोई वस्तु अन्य वस्तुओं की तुलना में समय के सापेक्ष में स्थान परिवर्तन करती है, तो वस्तु की इस अवस्था को गति ( motion ) कहा जाता है।

गति

गति के प्रकार ( Types of Motion ):-

  • सरल रेखीय गति  ( Simple linear motion )
  • वृत्तीय गति ( Circular motion )
  • ‎घूर्णन गति ( Rotation speed )
  • दोलन गति ( Oscillation speed )
  • आवर्ती गति ( Recurring speed )
  • प्रक्षेप्य गति ( projectile motion )

सरल रेखीय गति ( Simple linear motion ):- जब कोई वस्तु सदैव एक सरल रेखा में गति करती है तो उसकी गति सरल रेखीय गति कहलाती है। जैसे- सीधी सड़क पर चलती हुई कार की गति

वृत्तीय गति ( Circular motion ):- जब कोई वस्तु वृत्ताकार मार्ग पर चलती है। तो उसकी गति वृतीय गति कहलाती हैं। जैसे-सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की गति, पृथ्वी के चारों ओर चन्द्रमा की गति, कोल्हू चलाते हुए बैल की गति,

घुर्णन गति ( Rotation speed ) :- वैसी गति जिसमे कोई कण किसी बिंदु के चारो ओर बिना स्थान परिवर्तन के घूमता हो, तो उस प्रकार की गति को घूर्णन गति कहते हैं! जैसे- छत के पंखे की गति, चक्की के पाटों की गति, लट्टू की गति आदि घूर्णी गति के उदाहरण है।

दोलन गति ( Oscillation speed ): जब कोई वस्तु अपने माध्य स्थिति के दोनों ओर गति करती है तो इस प्रकार की गति को दोलन गति कहते हैं। या जब कोई वस्तु किसी निश्चित बिंदु के आगे-पीछे या ऊपर-नीचे गति करती है, तो इस प्रकार की गति को दोलनी गति कहते हैं जैसे-झूले में झूलते हुए बच्चे की गति , किसी स्प्रिंग में लटके हुए पिण्ड की गति, दीवार घड़ी के पेन्डुलम की गति

आवर्ती गति ( Recurring speed ):- जब कोई पिंड नियत समय अंतराल पश्चात अपनी गति की पुनरावृती करता है तो उसमें होने वाली गति को आवर्ती गति कहते है। जैसे- एक समान वर्तुल गति, सरल लोलक की गति, झुला झुलते बालक की गति, स्प्रिंग को खींचने पर होने वाली गति

प्रक्षेप्य गति ( projectile motion ) :- जब किसी पिंड को कुछ प्रारंभिक वेग देकर फेंका जाता है तो वह गुरुत्वीय बल के प्रभाव में परवलयाकार पथ पर गति करने लगता है। परवलयाकार पथ में होने वाली इस गति को प्रक्षेप्य गति कहते है। जैसे:- किसी खिलाड़ी द्वारा फेंकी गेंद की गति, बन्दूक से छोड़ी गयी गोली की गति आदि प्रक्षेप्य गति के उदाहरण है।

गति के समीकरण ( Speed ​​Equation )

किसी वस्तु के वेग, त्वरण, समय तथा दूरी के बीच स्थापित संबंधों को गति का समीकरण कहा जाता है। गति के समीकरण मुख्य रूप से तीन तरह के होते हैं-

  • v=u+atv=u+at ————(i)
  • s=ut+12 at2s=ut+12 at2 ——— (ii)
  • 2as=v2−u22as=v2-u2 ————– (iii)

जहाँ uu = प्रारंभिक वेग

vv= अंतिम वेग

ss = दूरी

aa = त्वरण

tt = समय

  • समीकरण (i) वेग–समय के संबध को दिखालाता है।
  • समीकरण (ii) स्थिति तथा समय के संबंध को दिखलाता है।
  • समीकरण (iii) स्थिति तथा वेग के बीच संबंध को दिखलाता है।

संवेग ( Momentum )

किसी वस्तु के संवेग में परिवर्तन की दर उस पर आरोपित बलके समानुपाती होती हैं और उसी दिशा में होती हैं जिसमें बल लगाया जाता हैं।

P = mv

P = m(v-u)/t

जहा P = संवेग
m = द्रव्यमान
v = अंतिम वेग
u = प्रारम्भिक वेग

पलायन वेग ( Escape Velocity )

वह न्यूनतम वेग जिससे किसी वस्तु को फेंकने पर वह गुरुत्व क्षेत्र को पार कर अंतरिक्ष में चली जाती है और लौटकर पृथ्वी पर नहीं आती , पलायन वेग कहलाता है । पृथ्वी के लिए इसका मान 11.2 किलोमीटर प्रति सेकंड होता है।

June 24, 2020

What Is Steady Electricity स्थिर विद्युत

स्थिर विद्युत

स्थिर विद्युत

घर्षण आवेश उत्पन्न नहीं करता है । वस्तुतः घर्षण की प्रक्रिया में दो विद्युत रोधी वस्तुओं में एक वस्तु से दूसरी वस्तु में कुछ विशिष्ट आवेश कणों का स्थानांतरण होता है ।फलस्वरुप एक वस्तु धनावेशित और दूसरी ऋण आवेशित हो जाती है।

विजातीय आवेश एक दूसरे को आकर्षित तथा सजातीय आवेश एक दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं! आवेश संरक्षण नियमानुसार विलगित निकायो में कुल आवेश निकाय में किसी प्रक्रिया संपन्न होने के उपरांत भी परिवर्तित नहीं होता है ।

आवेश अदिश राशि है किसी निकाय में कुल आवेश निकाय मैं इनके बीजगणितीय योग से प्राप्त होता है विद्युत विभव उस कार्य के बराबर है जो इकाई धनावेश को अनंत से विद्युत क्षेत्र में लाने में करना होता है । इसकी इकाई वोल्ट है ।

विद्युत क्षेत्र में इकाई धनावेश को एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक ले जाने में किए गए कार्य को इन बिंदुओं के बीच विद्युत विभवांतर कहते हैं !

विधुत स्थितिज ऊर्जा ( Stateless Potential Energy ) :- अनंत से किसी आवेश को दूसरे आवेश के विद्युत क्षेत्र में इससे R दूरी पर लाने में दूसरे आवेश की तीव्रता के विरुद्ध किया गया कार्य, आवेश तंत्र की स्थितिज ऊर्जा होती है ।

समविभव पृष्ठ :- वह पृष्ठ जिसके किन्ही दो बिंदुओं के बीच विभवांतर शून्य हो ।

विद्युत द्विध्रुव :-वह निकाय जिसमें दो बराबर परंतु विपरीत प्रकार के बिंदु आवेश एक दूसरे से अल्प दूरी पर स्थित होते हैं!

विद्युत द्विध्रुव आघूर्ण:- द्विध्रुव के आवेश के परिमाण एवं इसके दो बिंदु आवेशों के मध्य दूरी के गुणनफल को कहते हैं ! द्विध्रुव आघूर्ण की दिशा ऋण आवेश से धन आवेश की ओर इंगित होती है!

स्थिर विद्युत स्थिर विद्युत स्थिर विद्युत स्थिर विद्युत

June 23, 2020

What Is Sound ध्वनि क्या है व इसके कार्य???

ध्वनि

ध्वनि तरंगों का आवर्ती परिसर ( Frequency of sound waves )

1.अवश्रव्य तरंगें ( Habitual waves )- 20 Hz से नीचे की आवर्ती वाली ध्वनि तरंगों को अवश्रव्य तरंगे कहते हैं इसे हमारा कान सुन नहीं सकता है इस प्रकार की तरंगों को बहुत बड़े आकार के स्रोतों से उत्पन्न किया जा सकता है

2.श्रव्य तरंगे ( Audio Wave )- 20 Hz से 20000 Hz के बीच की आवर्ती वाली तरंगों को श्रव्य तरंग कहते हैं इन तरंगों को हमारा कान सुन सकता है

3.पराश्रव्य तरंगें ( Ultraviolet waves )- 20000 Hz से ऊपर की तरंगों को पराश्रव्य तरंगें कहा जाता है मनुष्य के कान से सुन नहीं सकते परंतु कुछ जानवर जैसे कुत्ता बिल्ली चमगादड़ आदि इसे सुन सकते हैं इन तरंगों को गाल्टन की सीटी के द्वारा तथा दाब वैद्युत प्रभाव की विधि द्वारा क्वार्ट्ज के क्रिस्टल के कंपनों से उत्पन्न करते हैं

इन तरंगों की आवृत्ति बहुत ऊंची होने के कारण इसमें बहुत अधिक उर्जा होती है साथ ही इनकी तरंग दैध्य छोटी होने के कारण इन्हें एक पतले किरण पुंज के रूप में बहुत दूर तक भेजा जा सकता है

पराश्रव्य तरंगों के उपयोग ( Use of Ultraviolet Waves)

1. संकेत भेजने में
2.समुद्र की गहराई का पता लगाने में
3. कीमती कपड़ों वायुयान तथा गाड़ियों के पुर्जों को साफ करने में
4. कल कारखानों की चिमनियों से कालीख हटाने में
5.दूध के अंदर के हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करने में
6.गठिया रोग के उपचार एवं मस्तिष्क के ट्यूमर का पता लगाने में

ध्वनि की चाल ( Speed of sound )

विभिन्न माध्यमों में ध्वनि की चाल भिन्न-भिन्न होती है  किसी माध्यम में ध्वनि की चाल मुख्यतः माध्यम की प्रत्यास्था तथा घनत्व पर निर्भर करती है ध्वनि की चाल सबसे अधिक ठोस में उसके बाद द्रव में और उसके बाद गैस में होती है वायु में ध्वनि की चाल 332 मीटर प्रति सेकंड जल में ध्वनि की चाल 1483 मीटर प्रति सेकंड और लोहे में ध्वनि की चाल 5130 मीटर प्रति सेकंड होती है

जब _ध्वनि एक माध्यम से दूसरे माध्यम में जाती है तो _ध्वनि की चाल तथा तरंगधैर्य बदल जाती है जब की आवर्ती नहीं बदलती है किसी माध्यम में _ध्वनि की चाल आवर्ती पर निर्भर नहीं करती है

प्रतिध्वनि ( Echo Sound )

जब ध्वनि तरंगें दूर स्थित किसी टावर या पहाड़ से टकराकर परावर्तित होती है तो इस _ध्वनि को प्रति_ध्वनि कहते हैं प्रति_ध्वनि सुनने के लिए श्रोता एवं परावर्तक सतह के बीच न्यूनतम 17 मीटर दूरी होनी चाहिए

June 22, 2020

What Is Magnetic Fields चुम्बकीय क्षेत्र एवं रेखाएं

चुम्बकीय क्षेत्र एवं रेखाएं

चुम्बकीय

भौतिकी में चुम्बकत्व वह प्रक्रिया है, जिसमें एक वस्तु दूसरी वस्तु पर आकर्षण या प्रतिकर्षण बल लगाती है। जो वस्तुएँ यह गुण प्रदर्शित करती हैं, उन्हें चुम्बक कहते हैं। 

कुछ पदार्थों में -Fe, Co,Ni जैसे पदार्थों को आकर्षित करने का एक विशेष गुण पाया जाता है, इस गुण को चुंबकत्व कहा जाता है तथा चुंबकत्व का गुण दर्शाने वाले पदार्थों को चुंबक कहते है।

सब वस्तुएं न्यूनाधिक मात्रा में चुम्बकीय क्षेत्र की उपस्थिति से प्रभावित होती हैं।

चुम्बकत्व प्रमुख मात्रक

चुम्बकशीलता का मात्रक- हेनरी/मीटर

चुम्बकीय तीव्रता का मात्रक-  न्यूटन /एम्पीयर मीटर व वेबर/मीटर×मीटर व टेस्ला 

यह एक सदिश राशी है चुम्बकीय क्षेत्र का CGS पद्धति में मात्रक गौस ( Gauss ) है SI पद्धति में मात्रक टेस्ला है

1 Gauss =10^-4  

चुंबक के प्रकार ( Types of Magnets )

प्राकृतिक चुंबक ( Natural Magnet )

सर्वप्रथम यूनान के एशिया माइनर प्रांत में मैग्नीशिया नाम की जगह पर एक ऐसे पदार्थ की खोज हुई जिसमें दिशा निर्देशन का गुण पाया जाता हो। इसे मैग्नेटाइट ( Fe2O3 ) नाम दिया गया। इसका उपयोग नाविक दिशा ज्ञान में करते हैं। अतः इसे दिशा सूचक पत्थर(Lood stone) कहते हैं।

कृत्रिम चुंबक ( Artificial Magnet )

वह चुंबक जो कृत्रिम रूप से बनाई जाती है, कृत्रिम चुंबक कहलाती है। कृत्रिम चुंबक दो प्रकार की होती है:-

1. स्थाई चुंबक ( Permanent Magnet )

यदि Fe, Co, Ni आदि को लंबे समय के लिए प्रबल चुंबकीय क्षेत्र में रख दिया जाए तो इनमे चुंबकत्व का गुण प्रेरित हो जाता है तथा नाखून लंबे समय तक बना रहता है। इस प्रकार बने चुंबक को स्थाई चुंबक कहा जाता है। इसके चुंबकत्व को आसानी से घटा या बढ़ा या नहीं जा सकता।

जैसे – छड़ चुंबक(दंड चुंबक),U-Shape Magnet, गुड नाल चुंबक, चुंबकीय सुई ।

2.अस्थाई चुंबक ( Floating magnet )

नर्म लोहे व नर्म स्टील की बनाई जाती है, जिसे आसानी से चुम्बकित तथा विचुम्बकित किया जा सकता है। यह चुंबक तब तक ही चुम्बक की तरह काम करता है जब तक इस पर कोई प्रेरित बल लगता रहे।

इसका उपयोग विद्युत घंटी, विद्युत मोटर, विद्युत जनरेटर में किया जाता है।

चुंबकीय क्षेत्र की दिशा ज्ञात करने के नियम ( Rules for determining the direction of magnetic field )

1. दक्षिणावर्त पेच नियम ( Clockwise screw rule ):- इस नियम के अनुसार दक्षिणावर्ती पेच को इस प्रकार वृत्ताकार पथ में घुमाया जावे की पेच की नोक विद्युत धारा की दिशा में आगे बढ़े तो पेच को घुमाने की दिशा चुंबकीय क्षेत्र की दिशा को व्यक्त करेगी ।

2. दक्षिण हस्त का नियम( Law of the south hand ):- इस नियम के अनुसार धारावाही चालक को दाहिने हाथ से इस प्रकार पकड़े की अंगूठा धारा की दिशा में रहे तो मुड़ी हुई उंगलियां चुंबकीय क्षेत्र की दिशा को व्यक्त करेगी !

विद्युत धारा का चुंबकीय प्रभाव:- 1820 में ओरेस्टेट ने एक प्रयोग किया जिसमें एक चालक तार में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो चालक तार के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है और इसी कारण चालक के निकट की चुंबकीय सुई विक्षेपित होती है ।

चुम्बकत्व ( Magnetism )

चुम्बक के दो ध्रुव होते है उत्तरी ध्रुव तथा दक्षिणी ध्रुव

चुबक के चारो ओर का वह क्षेत्र जहा बल का अनुभव किया जाता है चुम्बकीय क्षेत्र कहलाता है चुंबक से निकलने वाली बल रेखाएं चुबकिय बल रेखाएं कहलाती है चुम्बकीय बल रेखाएं सदैव उत्तरी ध्रुव से निकलती है तथा दक्षिणी ध्रुव में विलीन होती है दो चुम्बकीय बल रेखाएं कभी भी एक दूसरे को प्रतिछेद नहीं करती

स्वतंत्रता पूर्वक लटकती हुई चुंबक सदैव भौगोलिक उतरी दक्षिणी ध्रुव में ठहरती है। 

चुम्बकत्व से संबंधित SI इकाइयाँ ( SI units related to magnetism )

       संकेत  मात्रा का नाम      व्युत्पन्न इकाई       इकाई मूल इकाई

  • I  विद्युत धारा एम्पीयर (SI base unit) A A = W/V = C/s
  • q विद्युत आवेश, विद्युत की मात्रा कूलम्ब C A·s
  • V विभवांतर या विद्युतवाहक बल वोल्ट V J/C = kg·m2·s−3·A−1
  • R, Z, X प्रतिरोध, प्रतिबाधा, प्रतिघात (Reactance) ओह्म Ω V/A = kg·m2·s−3·A−2
    ρ प्रतिरोधकता ओम प्रति मीटर Ω·m kg·m3·s−3·A−2
  • P शक्ति वाट W V·A = kg·m2·s−3
  • C धारिता फॅराड F C/V = kg−1·m−2·A2·s4
  • व्युत्क्रम धारिता व्युत्क्रम फैराड F−1 V/C = kg·m2·A−2·s−4
  • ε Permittivity फैराड प्रति मीटर F/m kg−1·m−3·A2·s4
  • χe वैद्युत प्रवृत्ति (Electric susceptibility) (विमाहीन) – –
    G, Y, B चालन, Admittance, Susceptance सीमेन्स S Ω−1 = kg−1·m−2·s3·A2
  • σ चालकता सिमेंस प्रति मीटर S/m kg−1·m−3·s3·A2
  • B चुम्बकीय क्षेत्र टेस्ला T Wb/m2 = kg·s−2·A−1 = N·A−1·m−1
  • Φm चुम्बकीय फ्लक्स वेबर Wb V·s = kg·m2·s−2·A−1
  • H चुम्बकीय क्षेत्र एम्पीयर प्रति मीटर A/m A·m−1
    Reluctance एम्पीयर-टर्न प्रति वेबर A/Wb kg−1·m−2·s2·A2
  • L प्रेरकत्व हेनरी H Wb/A = V·s/A = kg·m2·s−2·A−2
  • μ पारगम्यता (Permeability) हेनरी प्रति मीटर H/m kg·m·s−2·A−2
  • χm चुम्बकीय प्रवृत्ति (Magnetic susceptibility) (विमाहीन)

विद्युत चुंबकीय प्रेरण ( Electromagnetic induction )

किसी कुंडली एवम चुंबक के बीच सापेक्ष गति के कारण कुंडली में उत्पन्न विद्युत प्रभाव को विद्युत चुंबकीय प्रेरण कहते हैं !

चुंबकीय फ्लक्स ( Magnetic flux )

किसी चुंबकीय क्षेत्र में रखे पृष्ठ से गुजरने वाली चुंबकीय बल रेखाओं की संख्या को उस पृष्ठ से संबंद्ध चुंबकीय फ्लक्स कहते हैं। चुंबकीय फ्लक्स का मात्रक वेबर होता है ।

विद्युत धारा जनित्र ( Electric current generator )

ऐसी युक्ति है जो चुंबकीय क्षेत्र में रखी कुंडली को यांत्रिक ऊर्जा देखकर घूर्णन करवाकर विद्युत ऊर्जा प्राप्त की जाती है, यह विद्युत चुंबकीय प्रेरण के सिद्धांत पर आधारित है ।
यह दो प्रकार के होते हैं ।
1. प्रत्यावर्ती धारा जनित्र ( Alternating current generator ) :- यह एक ऐसी युक्ति है जो यांत्रिक ऊर्जा को प्रत्यावर्ती विद्युत ऊर्जा में बदलता है इसमें धारा का मान समय के साथ परिवर्तित होता रहता है !

2. दिष्ट धारा जनित्र ( Divisional Current Generator ) :- यह एक ऐसी युक्ति है जो यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलती है! इसमें विद्युत ऊर्जा से प्राप्त विद्युत धारा की दिशा समय के साथ नियत रहती है!

June 21, 2020

Electric Current विद्युत धारा एवं परिपथ क्या है???

विद्युत धारा एवं परिपथ

विद्युत धारा

आवेश प्रवाह की दर को विद्युत धारा कहते हैं विद्युत आवेश का मात्रक कूलाम (C) तथा धारा का मात्रक एम्पियर (A) होता है

I=Q/T

किसी चालक तार के सिरों पर बैटरी जोड़ने पर चालक तार में मुक्त इलेक्ट्रान गति करते है।(आवेश का प्रवाह होता है।)

एकांक आवेश को किसी विद्युत परिपथ के एक बिंदु से दूसरे बिन्दु तक ले जाने में किए गये कार्य को उन दो बिन्दुओं के बीच विभवान्तर कहते है

विधुत धारा एक अदिश राशि होती है क्योंकि धाराओं का योग सदिश योग नियम का पालन नहीं करता है। विधुत धारा का SI मात्रक कूलाम/सेकण्ड या एम्पियर होता है। प्रतिरोध का मात्रक ओम होता है ओम नामक वैज्ञानिक ने प्रतिरोध के मात्रक की खोज की थी इसलिए इस का SI मात्रक ओम होता है

एमीटर से विद्युत धारा की गणना की जाती है जो कि विद्युत परिपथ में श्रेणी क्रम में लगाया जाता है विभवांतर की गणना वोल्टमीटर से की जाती है जो कि विद्युत परिपथ में समांतर क्रम में लगाया जाता है

एक एम्पियर धारा से तात्प्रर्य है – किसी चालक के किसी अनुप्रस्थ परिच्छेद से प्रति सेकण्ड 6.25×10` 18 इलेक्ट्रॉन गुजरते है।

Volt – विद्युत वाहक बल का मात्रक वोल्ट है । यदि 1 ओम से 1 एम्पियर धारा प्रवाहित की जाए तो यह एक एक वोल्ट कहलाता है। ओम के नियम अनुसार 

वोल्ट = धारा × प्रतिरोध

Ampere – विद्युत धारा का मात्रक एम्पियर A है । ओम के नियम अनुसार 

धारा = वोल्ट/प्रतिरोध

Watt – विद्युत शक्ति का मात्रक वाट है 1 वाट = 1 जूल प्रति सेकेंड

शक्ति = वोल्ट × धारा

HP –  Horse Power यानी अश्व शक्ति

1 ब्रिटिश HP = 746 वाट
1 मीट्रिक HP = 735.5 वाट

Unit –  वैद्युतिक उर्जा की इकाई यूनिट है ।

1 Unit = 1 किलो वाट घंटा  या 1 यूनिट = 1000 वाट घंटा

  • एक आदर्श अमीटर का प्रतिरोध सुन्न होना चाहिए
  • एक आदर्श वाल्टमीटर का प्रतिरोध अनन्त होना चाहिए
  • प्रतिरोध तार की लंबाई के समानुपाती होता ह अर्थात तार की लंबाई बढ़ेगी तो प्रतिरोध भी बढ़ेगा
  • प्रतिरोध तार की मोटाई अर्थात चेतरफल बढ़ने पर प्रतिरोध कम होगा

ओम का नियम ( Om’s Law )

इसके अनुसार, नियत ताप पर विद्युत परिपथ में चालक के दो सिरों के बीच विभवान्तर उसमें प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा के समानुपाती होता है।

किसी धातु के एक समान चालक का प्रतिरोध –

  • उसकी लम्बाई के अनुक्रमानुपाती(समानुपाती) होता है।
  • अनुप्रस्थ काट क्षेत्र के व्युतक्रमानुपाती होता है।
  • पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर करता है।

धारा ( CURRENT )

किसी चालक के धनावेश के प्रवाह की दिशा ही धारा की दिशा मानी जाती है। अतः धारा के प्रवाह की दिशा ऋणावेश के प्रवाह की दिशा के विपरीत होती है।

इसकी दिशा सदैव धन सिरे के ऋण सिरे की ओर होती है इसका मात्रक ‘ऐम्पियर’ होता है आवेशों के प्रवाह में रुकावट को “प्रतिरोध” कहते हैं यह लंबाई, अनुप्रस्थ काट, ताप व पदार्थ पर निर्भर करता है।

जब किसी चालक में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तब चालक के चारों ओर चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है यह धारा का ‘चुंबकीय प्रभाव’ कहलाता है। चुम्बकीय फ्लक्स का मात्रक “वेबर” होता है

चुम्बकीय फ्लक्स ( Magnetic flux ) –

किसी चुंबकीय क्षेत्र में रखे पृष्ठ से गुजरने वाली चुंबकीय बल रेखाओं की संख्या को उस पृष्ठ से संबद्ध “चुम्बकीय फ्लक्स” कहते हैं सर्व प्रथम 1796 में जर्मनी के “अलेक्ज़ेंडर वोल्टा” नामक वैज्ञानिक ने ‘विद्युत सेल’ बनाया था। ओम के नियम का प्रतिपादन सन 1826 में जर्मनी के वैज्ञानिक “डॉ. जार्ज साइम ओम” ने किया था 

Note :- चालकों में विधुत धारा का प्रवाह मुक्त इलेक्ट्रॉनों के कारण होता है,जबकि अर्द्ध चालकों में विधुत धारा का प्रवाह e- तथा होल के कारण होता है।

धारा के प्रकार ( Types of Current  )

  1. प्रत्यावर्ती धारा ( Alternating Current )
  2. दिष्ट धारा ( Direct Current )

प्रत्यावर्ती धारा ( Alternating Current ) – धारा का परिमाण व दिशा दोनों समय के साथ बदलते है। यह केवल उष्मीय प्रभाव दर्शाती है।

दिष्ट धारा ( Direct Current )- धारा का परिमाण व दिशा दोनों समय के साथ स्थिर रहते है। उष्मीय,रासायनिक,चुम्बकीय प्रभाव दर्शाती है।

फ्यूज ( Fuse )

फ्यूज_एक सुरक्षा युक्ति है जो विद्युत परिपथ की ओवरलोड तथा शार्ट सर्किट से सुरक्षा करता है । फ्यूज निम्न गलनांक वाली धातु से बना होता है, ये मुख्यतः तांबा, चांदी, एल्युमीनियम के बने होते हैं ।

फ्यूज_के प्रकार ( Types of fuse )

फ्यूज_का चयन मुख्यतः धारा वहन क्षमता और आवश्यकता पर निर्भर करता है । ये मुख्यतः

  • किट कैट फ्यूज
  • HRC फ्यूज
  • कार्टिज फ्यूज 

फ्यूज के कार्य ( Fuse Work )

इनका चयन इनकी धारा वहन क्षमता और परिपथ की आवश्यकता पर निर्भर करता है । फ्यूज को परिपथ की शुरुआत में फेज तार के श्रेणी क्रम में जोड़ा जाता है । जब शार्ट सर्किट या ओवरलोड आदि के कारण फ्यूज तार में से क्षमता से अधिक धारा प्रवाहित होती है तो फ्यूज तार धारा के उष्मीय प्रभाव के कारण गर्म होकर पिघलकर टूट जाता है ।

जिससे परिपथ में धारा प्रवाह रुक जाता है और परिपथ को किसी तरह की हानि नहीं होती । इस प्रकार फ्यूज स्वंय टूटकर परिपथ की सुरक्षा करती है । एक बार यदि फ्यूज तार टूट जाता है तो वह दोबारा उपयोग नही किया जा सकता और इसे बदलकर नया फ्यूज उपयोग किया जाता है ।

June 19, 2020

What Is Gravity : गुरुत्वाकर्षण क्या है???

भौतिक विज्ञान : गुरुत्वाकर्षण

गुरुत्वाकर्षण ( Gravity ) एक पदार्थ द्वारा एक दूसरे की ओर आकृष्ट होने की प्रवृति है। गुरुत्वाकर्षण के बारे में पहली बार कोई गणितीय सूत्र देने की कोशिश आइजक न्यूटन द्वारा की गयी जो आश्चर्यजनक रूप से सही था।

उन्होंने गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत का प्रतिपादन किया। न्यूटन के सिद्धान्त को बाद में अलबर्ट आइंस्टाइन द्वारा सापेक्षता सिद्धांत से बदला गया। इससे पूर्व वराह मिहिर ने कहा था कि किसी प्रकार की शक्ति ही वस्तुओं को पृथिवी पर चिपकाए रखती है।

गुरुत्वाकर्षण बल ( Gravitational Force )

किसी भी दो पदार्थ , वस्तु  या कणो की बिच मौजूद एक आकर्षण बल है। गुरुत्वाकर्षण बल न सिर्फ पृथ्वी और वस्तुवो के बीच का आकर्षण बल है बल्कि यह ब्रह्माण्ड में मौजूद हर पदार्थ या वस्तु के बिच विद्यमान है।

न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण नियम ( newton’s law of gravitation ):

किन्हीं दो पिंडो के बीच कार्य करने वाला आकर्षण बल पिंडो के द्रव्यमानों के गुणनफल के अनुक्रमानुपाती तथा उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है.

माना दो पिंड जिनका द्रव्यमान m1 एवं m2 है, एक दूसरे से R दूरी पर स्थ‍ित है, तो न्यूटन के नियम के अनुसार उनके बीच लगने वाला आकर्षण बल, F = G m1m2/R^2 होता है. जहां G एक नियतांक है, जिसे सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक कहते हैं और जिसका मान 6.67 X 10^-11 Nm^2 / kg^2 होता है.

गुरुत्वाकर्षण बल का सूत्र ( Gravitational force formula )

F=Gm1m2 / r2

G एक समानुपाती नियतांक है जिसका मान सभी पदार्थों के लिए एक जैसा रहता है। इसे गुरुत्वीय स्थिरांक (Gravitational Constant) कहते हैं।

G = 6.6726 x 10-11 m3 kg-1 s-2

m1 और m2 दो वस्तुवो का द्रव्यमान है

r दोनों वस्तुवो की बीच की दुरी है

गुरुत्व ( gravity ):

न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के अनुसार दो पिंडो के बीच एक आकर्षण बल कार्य करता है. यदि इनमें से एक पिंड पृथ्वी हो तो इस आकर्षण बल को गुरुत्व कहते हैं. यानी कि, गुरुत्व वह आकर्षण बल है, जिससे पृथ्वी किसी वस्तु को अपने केंद्र की ओर खींचती है. इस बल के कारण जो त्वरण उत्पन्न होती है, उसे गुरुत्व जनित त्वरण (g) कहते हैं, जिनका मान 9.8 m/s^2 होता है.

गुरुत्व जनित त्वरण (g) वस्तु के रूप, आकार, द्रव्यमान आदि पर निर्भर नहीं करता है.

g के मान में परिवर्तन:

  1. पृथ्वी की सतह से ऊपर या नीचे जाने पर g का मान घटता है.
  2. ‘g’ का मान महत्तम पृथ्वी के ध्रुव (pole) पर होता है.
  3. ‘g’ का मान न्यूनतम विषुवत रेखा (equator) पर होता है.
  4. पृथ्वी की घूर्णन गति बढ़ने पर ‘g’ का मान कम हो जाता है.
  5. पृथ्वी की घूर्णन गति घटने पर ‘g’ का मान बढ़ जाता है.

नोट: – यदि पृथ्वी अपनी वर्तमान कोणीय चाल से 17 गुनी अधिक चाल से घूमने लगे तो भूमध्य रेखा पर रखी हुई वस्तु का भार शून्य हो जाएगा.

लिफ्ट में पिंड का भार ( weight of a body in lift ):

  1. जब_लिफ्ट ऊपर की ओर जाती है तो लिफ्ट में स्थित पिंड का भार बढ़ा हुआ प्रतीत होता है.
  2. जब लिफ्ट नीचे की ओर जाती है तो लिफ्ट में स्थित पिंड का भार घटा हुआ प्रतीत होता है.
  3. जब लिफ्ट एक समान वेग से ऊपर या नीचे गति करती है, तो लिफ्ट में स्थित पिंड के भार में कोई परिवर्तन प्रतीत नही होता.
  4. यदि नीचे उतरते समय लिफ्ट की डोरी टूट जाए तो वह मुक्त पिंड की भांति नीचे गिरती है. ऐसी स्थिति में लिफ्ट में स्थित पिंड का भार शून्य होता है. यही भारहीनता की स्थति है.
  5. यदि नीचे उतरते समय लिफ्ट का त्वरण गुरुत्वीय त्वरण से अधिक हो तो लिफ्ट में स्थित पिंड उसकी फर्श से उठकर उसकी छत से जा लगेगा.

Gravity facts

  • खोजकर्ता- आइजक न्यूटन
  • प्रत्येक पिंड पर गुरुत्वाकर्षण बल का मान अलग-अलग होता हैं।।
  • गुरुत्वीय त्वरण का मान 9.8 m/sec होता है।।
  • पृथ्वी के धुर्वो पर गुरुत्वाकर्षण बल का मान सर्वाधिक होता हैं।।
  • विषुवत रेखा (भूमध्य रेखा) पर गुरुत्वाकर्षण बल का मान सबसे कम होता हैं।।
  • यदि पृथ्वी का घूर्णन काल अपने वर्तमान काल से सत्रह गुना अधिक हो जाए तो विषुवत रेखा पर बैठे व्यक्ति का भार शून्य हो जाएगा।