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September 16, 2020

September 16, 2020

Mughal Empire-Aurangzeb औरंगजेब और अन्य मुगल शासक

औरगंजेब और अन्य मुगल शासक

औरंगजेब

औरंगजेब का जन्म 1618 ई. में उज्जैन के निकट ‘ दोहद ‘नामक स्थान पर मुमताज महल के गर्भ से हुआ था । लेकिन औरंगजेब का अधिकांश बचपन नूरजहाँ के पास बीता

पिता- शाहजहां, माता- मुमताज महल

औरंगजेब का विवाह फारस के राजघराने के शाहनवाज की पुत्री दिलरस बानो बेगम (राबिया- उद् -दोरानी )से हुआ था । औरंगजेब की पुत्री का नाम मेहरून्निसा था ।

औरंगजेब दक्षिण का सूबेदार दो बार नियुक्त हुआ था
पहली बार -1636 -1644 ई. ।
दूसरी बार -1652 -1657 ई. ।

वह गुजरात, मुल्तान व सिन्ध का गवर्नर भी रहा । औरंगजेब का पहला युद्ध ओरछा के जुझार सिंह के विरूद्ध हुआ था । औरंगजेब का राज्याभिषेक दो बार हुआ था

  1. सामूगढ़ के युद्ध के बाद 1658 में आगरा में
  2. दौराई के युद्ध के बाद 1659 में दिल्ली में।

औरंगजेब ने 1659 ई. में राज्याभिषेक के समय औरंगजेब ने ‘अब्दुल मुजफ्फर मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब बहादुर आलमगीर पादशाह गाजी ‘की उपाधि धारण की

औरंगजेब ने जहाँआरा को ‘साहिबत -उज् -जमानी ‘की उपाधि प्रदान की

औरंगजेब ने

1. दरबारी संगीत पर प्रतिबन्ध लगाया
2. संगीत विभाग व इतिहास विभाग को समाप्त किया।
3. औरंगजेब के काल मे संगीत पर सर्वाधिक फ़ारसी भाषा में पुस्तकें लिखी गई।

औरंगजेब ने 1679 ई. में पुनः जजिया कर तथा तीर्थ कर लगाया।

1699 ई. में औरंगजेब ने मराठों के साथ चल रहे युद्ध को धर्मयुद्ध की संज्ञा दी। 

सिक्ख विद्रोह औरंगजेब के काल में एक मात्र विद्रोह था जो धार्मिक कारणों से हुआ। सिक्खो ने औरंगजेब के विरूद्ध सबसे अंत मे विद्रोह किया।

औरंगजेब को इस्लामिक कट्टरता के कारण जिन्दापीर और सादगी पूर्ण जीवन के कारण ‘शाह दरवेश’ कहा जाता था।

 मिर्जा मुहम्मद काजिम औरंगजेब के समय प्रथम व अंतिम सरकारी इतिहासकार।

औरंगजेब_द्वारा औरंगाबाद में अपनी बेगम ‘राबिया दुर्रानी’ की स्मृति में निर्मित इसे बीबी का मकबरा व द्वितीय ताजमहल भी कहा जाता है।

औरंगज़ेब के शासन में मुग़ल साम्राज्य अपने विस्तार के चरमोत्कर्ष पर पहुंचा। वो अपने समय का शायद सबसे धनी और शातिशाली व्यक्ति था जिसने अपने जीवनकाल में दक्षिण भारत में प्राप्त विजयों के जरिये मुग़ल साम्राज्य को साढ़े बारह लाख वर्ग मील में फैलाया और 15 करोड़ लोगों पर शासन किया जो की दुनिया की आबादी का 1/8 था।

औरंगज़ेब ने पूरे साम्राज्य पर फ़तवा-ए-आलमगीरी (शरियत या इस्लामी क़ानून पर आधारित) लागू किया और कुछ समय के लिए ग़ैर-मुस्लिमों पर अतिरिक्त कर भी लगाया। ग़ैर-मुसलमान जनता पर शरियत लागू करने वाला वो पहला मुसलमान शासक था।

मुग़ल शासनकाल में उनके शासन काल में उसके दरबारियों में सबसे ज्यादा हिन्दु थे। और सिखों के गुरु तेग़ बहादुर को दाराशिकोह के साथ मिलकर बग़ावत के जुर्म में मृत्युदंड दिया गया था।

मुहतसिब – औरंगजेब द्वारा इस्लाम के प्रचार के लिए नियुक्त अधिकारी।

विजयें

बीजापुर (1686):– बीजापुर के शासक सिकन्दर आदिलशाह ने आत्म समर्पण कर दिया इसे खान की उपाधि दी गई।

गोलकुण्डा (1687):- यहाँ का सुल्तान अबुल हसन कुतुबशाह था। उसने शासन की जिम्मेदारी मदन्ना एवं अकन्ना नामक ब्राहमण को सौंप दी थी।

औरंगजेब की दक्षिण नीति के परिणाम

  • दक्षिण के शिया राज्यो का विनाश अनुचित।
  • मुगलो की आर्थिक स्थिति का शोचनीय होना।
  • कृषि, वाणिज्य-व्यापार औऱ उद्योगों को भारी क्षति।
  • सेनिको और जमीदरो कि लूटपाट ।
  • उतरी भारत मे अशान्ति अराजकता औऱ विद्रोह ।
  • मुगल सेना में असंतोष कानून और शांति व्यवस्था का विहंग होना ।
  • मुगल प्रतिष्ठा को गहरा आघात ।
  • भारतीय संस्कृति और कला का हास् ।
  • कृषको और साधारण जनता की विकट समस्या ।
  • मुगल सम्राज्य के पतन के उत्तरदायी कारण।

ओरंगजेब द्वारा गोलकुंडा पर आक्रमण के कारण

  • गोलकुंडा के सुल्तान बीजापुर की सहायता करते थे ।
  • गोलकुंडा एक धन सम्पन्न राज्य था यहाँ हिरे जवाहरात की खाने थी।

मुगल दरबार मे दलबंदी के प्रमुख नेताओं एवं अमीरों के नाम।

  • जुल्फिकार खा,।
  • गाजीउद्दीन फिरोज।
  • जंगचिंकूलीच खा,।
  • मुनीम खा,।

ओरंगजेब के समय हुए प्रमुख विद्रोह

1. जाटो का विद्रोह

  • ओरंगजेब वके खिलाफ पहला संघठित विद्रोह मथुरा-आगरा व दिल्ली के आस पास बसे जाटो ने किया। जाटो ने आर्थिक कारणों से विद्रोह किया।
  • जाट विद्रोह की शुरुआत 1669 ई में मथुरा के पास तिलपत के जाट जमीदार गोकुला के नेतृत्व में हुई।
  •  जाट विद्रोह को सतनामियों ने भी समर्थन दिया।
  • 1686 में जाटों ने पुनः विद्रोह कर दिया इस बार नेतृत्व की बागडोर राजाराम एवं रामचिरा ने सम्भाली राजाराम ने मुगल सेनापति युगीर खाँ की हत्या कर दी तथा 1688 ई0 में अकबर के मकबरे में लूटपाट की।
  • मनूची ने लिखा है कि ’’राजाराम ने अकबर के मकबरे को खोदकर जला दिया’’
    • औरंगजेब के पौत्र बीदर बक्श और आमेर नरेश विशन सिंह ने राजाराम को मार डाला।

2. सतनामी विद्रोह

  • 1672 ई में नारनोल (हरियाणा) नामक स्थान पर वीरभान के नेतृत्व में सतनामी किसानों व मुगलों के बीच युद्ध हुआ।
  • नारनोल (पटियाला) एवं मेवात (अलवर) सतनामी बैराग्यों में से एक थे जो अपने बाल मुड़ाकर रखते थे। इसी कारण इन्हें मुडिया भी कहा जाता था।
  • सतनामी विद्रोह की शुरुआत एक सतनामी व मुगल सैनिक अधिकारी के बीच झगड़े के कारण हुई।1659 ई0 में उधो बैरागी नामक साधू एक चेले ने काजी की हत्या कर दी इस विद्रोह का तात्कालीक कारण एक मुगल पैदल सैनिक द्वारा उनके एक सदस्य की हत्या था।
  • सतनामी विद्रोह में राजपूत जमीदारों ने मुगलो का साथ दिया।

3. अफगान विद्रोह

  • 1668 ई में भागू नामक एक युसुफजई सरदार ने मुहम्मद शाह नामक व्यक्ति को राजा घोषित कर स्वयं को उसका वजीर घोषित किया व अफगान विद्रोह की शुरुआत हुई।

4. बुंदेला विद्रोह

  • मुगलो व बुंदेलों के बीच पहला संघर्ष मधुकर शाह के समय शुरू हुआ।
  • बुंदेला शासक वीर सिंह ने जहाँगीर के कहने पर 1602 ई में अबुल फजल की हत्या कर दी।

5. शहजादा अकबर का विद्रोह

  • अकबर औरंगजेब का पुत्र था। उसने शिवाजी के पुत्र शम्भाजी के साथ मिलकर औरंगजेब के विरूद्ध षडयंत्र किया परन्तु औरंगजेब_ने बड़े बुद्धिमानी से शम्भाजी को अलग कर दिया। 
  • मेवाड़ व मारवाड़ के दुर्गादास के सहयोग से शहजादा अकबर ने 1681 ई में अपने को बादशाह घोषित कर दिया तथा ओरंगजेब की सेना पर अजमेर के पास आक्रमण किया। अकबर 1681 ई0 में भागकर फारस चला गया

6. सिक्ख विद्रोह

  • सिक्खों ने ओरंगजेब के खिलाफ सबसे अंत मे विद्रोह किया।
  • सिक्ख विद्रोह ओरंगजेब के काल का एक मात्र विद्रोह था जो धार्मिक कारणों से हुआ।

औरंगजेब की मृत्यु अहमदनगर में 3 मार्च 1707 में हुई। इसे दौलताबाद में मुस्लिम फकीर बुरहानुद्दीन की कब्र में दफना दिया गया इस समय उसके तीन पुत्र जीवित थे- मुअज्जम, आजम एवं कामबक्श

औरंगजेब के मृत्यु के समय मुअज्जम अफगानिस्तान में जमरुद नामक स्थान पर था। वह सीधा दिल्ली आया लाहौर के निकट उसने बहादुरशाह के नाम से अपने को बादशाह घोषित कर लिया।

आजम ने आगरा पर अधिकार करने के लिए जजाऊ के पास अपना शिविर लगाया फलस्वरूप जजाऊ का युद्ध हुआ।

जजाऊ का युद्ध (1707):- आगरा के पास स्थित इसी स्थान पर बहादुर शाह ने आजम को पराजित कर मार डाला।

बीजापुर का युद्ध (1709):- यह युद्ध बहादुरशाह और कामबक्श के बीच हुआ। इसमें भी बहादुर शाह की विजय हुई। इस प्रकार बहादुर शाह दिल्ली का शासक बना।

धार्मिक नीति

औरंगजेब एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था। उसने गद्दी पर बैठते ही कुरान के नियमों का पालने करते हुए 80 प्रकार के करों को समाप्त कर दिया।

इन करों में-

1. आबवाब-उपरिकर
2. पानडारी-चुंगीकर
3. राहदारी-परिवहन

कर शामिल थे।

उसने सिक्कों पर कलमा खुदवाना, नौरोज मनाना, भांग की खेती करना आदि पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया। राज्याभिषेक के 11वें वर्ष झरोखा दर्शन, संगीत निषेध जबकि 12वें वर्ष तुलादान प्रथा बन्द कर दी।

1689 ई0 जजिया को पुनः लागू कर दिया। इसे लागू करने का विरोध मेवाड़ के शासक राज सिंह ने किया था। उसे कई मन्दिरों के तुड़वाने का आरोप लगाया जाता है जिसमे मथुरा का केशवराय मन्दिर और बनारस का विश्वनाथ मन्दिर प्रसिद्ध है। उसने लोगों के आचरण पर नजर रखने के लिए एक अधिकारी मुहतसिब की नियुक्ति की।

Mughal Empire-Aurangzeb important facts 

  • ओरंगजेब को जिन्दापीर क्यों कहा जाता है➡कट्टरता के कारण।
  • मीना मस्जिद का निर्माण किसने करबाया➡ओरंगजेब।
  • जागीरदारी समस्या बनी किसके समय➡बहादुर शाह प्रथम।
  • किन मुगलो ने अपने सद्रो को हटाया➡अकबर, औरंगजेब। 
  • किस बादशाह ने अकबर के मकबरे के चित्रों को चूने से पुतबा दिया था➡औरंगजेब।
  • किस शासक के काल मे चित्रकला महलो से निकलकर आम जनता की पहुँच में आ गई➡औरंगजेब। 
  • हनाफी फिक के सिद्धान्तों का चित्रण पहली बार हुआ➡औरंगजेब।
  • एक नई तकनीकी सिहायी कलम का विकास किस मुगल शासक के काल मे हुआ➡औरंगजेब
  • औरंगजेब सबसे कट्टर शासक था लेकिन सर्वाधिक हिन्दू सरदार 33 प्रतिशत इसी के काल में थे।
  • शाहजहाँ के युग में इसके बाद हिन्दू सरदारों की संख्या 24 प्रतिशत थी।
  • औरंगजेब ने इतिहास की पुस्तकों को लिखने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था परन्तु सर्वाधिक इतिहास की पुस्तकें इसी के काल में लिखी गई।
  • खाफीखाँ ने अपनी पुस्तक मुन्तखब-उल-लुबाब छिप करके के लिखा।
  • औरंगजेब ने संगीत पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। परन्तु संगीत की सर्वाधिक पुस्तकें इसी के काल में लिखी गई। वह स्वयं ही वीणा बजाता था। मनूची लिखता है कि सम्राट संगीत सुनता भी था।
  • इसी के समय में सिक्खों के गुरु तेग बहादुर को 1675 में फाँसी दे दी गई।
  • शिवा जी के पुत्र शम्भा जी को भी 1689 में फांसी दे दी।

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September 16, 2020

यूरोपीय कंपनियों का भारत मे आगमन European

यूरोपीय कंपनियों का भारत मे आगमन

15वीं शताब्दी से लेकर 17वीं शताब्दी के बीच निम्नलिखित यूरोपीय कम्पनियाँ क्रमशः भारत आयी- पुर्तगीज, डच, अंग्रेज, डेनिश, फ्रांसीसी परन्तु इन कम्पनियों के स्थापना का क्रम थोड़ा सा भिन्न था। ये निम्नलिखित क्रम में स्थापित हुई-

यूरोपीय कंपनियों

पुर्तगीज-अंग्रेज-डच-डेनिश-फ्रांसीसी।

पुर्तगीज सबसे पहले भारत पहुँचे, बाकी सभी कम्पनियाँ प्रारम्भ में भारत न आकर दक्षिण पूर्व एशिया की ओर गई

युरोप और भारत के बीच समुद्री मार्ग की तलाश 1498 मे पुतर्गाली नाविक वास्कोडिगामा के द्रारा की गई। वास्कोडिगामा सर्वप्रथम भारत के पश्चिमी समुद्री तट पर स्थिति कालीकट पहुँचा और वहाँ के शासक जमोरिन के द्रारा वास्कोडिगामा को सभी प्रकार की व्यापारिक सुविधाएं उपलब्ध करवाई गई।

पुर्तगाली ( Portuguese )

नये रास्ते की खोज में सर्वप्रथम प्रयास पुर्तगीजों ने प्रारम्भ किये। बार्थोलोम्यूडियाज ने 1487 ई0 में केप आॅफ गुड होप (उत्तमाशा अन्तरीप, या तूफानी अन्तरीप) तक की यात्रा की। 1494 ई0 में स्पेन के कोलम्बस ने भारत खोजने के क्रम में अमेरिका की खोज कर दी। 1499 में पिन्जोन ने ब्राजील की खोज की। मैगलेन ने यूरोप के पश्चिमी देशों की यात्रा करते हुए सम्पूर्ण पृथ्वी की यात्रा की।

वास्कोडिगामा समुद्री रास्ते से भारत आने वाला प्रथम पुर्तगाली व यूरोपियन यात्री था। वह अब्दुल मनिक नामक गुजराती प्रदर्शक की सहायता से भारत आया । कालीकट के शासक जमोरिन ने वास्कोडिगामा का स्वागत किया। किंतु अरब व्यापारियों ने उसका विरोध किया।

जमोरिन कालीकट के हिंदू शासकों की उपाधि थी। भारत से वापस जाते समय वास्कोडिगामा जहाज में कालीमिर्च भरकर ले गया जिस पर उसे 60 गुना फायदा हुआ। इससे अन्य पुर्तगाली व्यापारियों को प्रोत्साहन मिला।

1500 ई में वास्कोडिगामा के बाद दूसरा पुर्तगाली यात्री पेट्रो अल्ब्रेज क्रेबाल कालीकट (भारत) आया।  1502 ईस्वी में वास्कोडिगामा दूसरी बार भारत आया। पुर्तगालियों ने 1503 ईसवी में कोचीन में अपनी पहली व्यापारिक कोठी स्थापित की। पुर्तगीज अपने को ’’समूद्रों का स्वामी कहते’’ थे

पुर्तगाली कंपनी का नाम एसतादे दे इंडिया था।  भारत में प्रथम पुर्तगाली वायसराय फ्रांसिस्को डी अल्मीडा था जिसने ब्लू वाटर पॉलिसी (नीले पानी की नीति) अपनायी। वह 1505 से 09 ई. तक गवर्नर रहा

अल्बुकर्क को भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। भारत में पुर्तगालियों की संख्या बढ़ाने के लिए इसने पुर्तगालियों को भारतीय महिलाओं से विवाह करने के लिए प्रेरित किया।

अल्बुकर्क ने गोवा में सती प्रथा पर प्रतिबंध लगाया। अल्बुकर्क ने 1511 ईस्वी में दक्षिण पूर्वी एशिया की व्यापारिक मंडी मलक्का और हरमुज पर अधिकार कर लिया। पुर्तगाली वायसराय नीलू डी कुन्हा ने 1530 ईस्वी में कोचिंन की जगह गोवा को राजधानी बनाया।

पुर्तगालियों ने हिंद महासागर से होने वाले व्यापार पर एकाधिकार कर लिया उन्हें कार्टेज पद्धति द्वारा बिना परमिट के भारतीय अरबी जहाजों का अरब सागर में प्रवेश वर्जित कर दिया।

पुर्तगालियों ने भारत में तंबाकू की खेती तथा प्रिंटिंग प्रेस की शुरुआत की 1556 ईसवी में गोवा में प्रथम प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना हुई। व भारतीय जड़ी-बूटियों पर वनस्पति पर प्रथम पुस्तक 1563 ईस्वी में गोवा से प्रकाशित हुई।  पुर्तगालियो ने भारत में गोथिक स्थापत्य शैली की शुरुआत की।

पुर्तगीज व्यापार की विधि:-

पुर्तगीज भारतीय क्षेत्र को एस्तादो-द-इंडिया नाम से पुकारते थे। हिन्द महासागर के व्यापार को नियंत्रित करने के लिए उन्होंने परमिट व्यवस्था प्रारम्भ की। उनकी नौ सैनिक शक्ति भी उस समय श्रेष्ठ थी।

अकबर ने भी पुर्तगीजों से व्यापार के लिए परमिट ली थी। पुर्तगीज अपने को ’’सागर के स्वामी’’ कहते थे। पुर्तगीजों का पतन इसलिए हुआ क्योंकि वे अन्य यूरोपीय शक्तियों से प्रतिद्वन्दिता से पिछड़ गये। दूसरे ब्राजील का पता लग जाने पर उन्होंने वहीं उपनिवेश बसाने पर जोर दिया।

पुर्तगीज आधिपत्य का परिणाम पुर्तगीजों ने धर्म परिवर्तन पर बहुत जोर दिया। 1560 में गोवा में ईसाई धर्म न्यायालय की स्थापना की। 1542 में पुर्तगीज गर्वनर मार्टिन डिसूजा के साथ प्रसिद्ध सन्त जेवियर भारत आया। जापान के साथ व्यापार प्रारम्भ करने का श्रेय पुर्तगीजों को प्राप्त है।

पुर्तगीजों ने सर्वप्रथम प्रिटिंग प्रेस की शुरुआत की। पुर्तगीजों को भारत में आलू, तम्बाकू, अन्नानास, अमरुद, अंगूर, संतरा, पपीता, काजू, लीची, बादाम, मूंगफली, शकर कंद आदि को लाने का श्रेय दिया जाता है।

भारत में अन्तिम गर्वनर जनरल-जोआ-द-कास्त्रों था। गोथिक स्थापत्य कला पुर्तगाली लाये।

पुर्तगालियो के भारत मे आने के उद्देश्य

1. अरबो और वेनिस के व्यापारियों का भारत से प्रभाव समाप्त करना।
2. ईसाई धर्म का प्रचार करना।

पुर्तगालियो के भारत से पतन के कारण :-

1. भारतीय जनता के प्रति धार्मिक असहिष्णुता की भावना।
2. गुप्त रूप से व्यापार करना तथा डकैती और लूटमार को अपनी नीति का हिस्सा बनाना।
3. नए उपनिवेश ब्राजील की खोज।
4. अन्य यूरोपियन व्यापारिक कंपनियो से प्रतिस्परधा ।
5. अपर्याप्त व्यापारिक तकनीक
6. पुर्तगाली वायसरायों पर पुर्तगाली राजा का अधिक नियंत्रण।

अंग्रेज

इंग्लैंण्ड की महारानी एलिजाबेथ-प्रथम के समय में 1600 ई0 में एक कम्पनी की स्थापना हुई जिसका नाम The Governer of the Company of Marchents of London Trading in to the East Indiese रखा गया। इसे पूर्व के साथ 15 वर्षों के लिए व्यापार की अनुमति प्रदान की गई। इसने अपने प्रारम्भिक अभियान द0 पू0 एशिया में किये।

1688 में एक नयी कम्पनी न्यू कम्पनी को भी पूर्व के साथ व्यापार करने की अनुमति प्रदान की गयी। 1698 ई0 में दो और कम्पनियों General Soceity तथा English Company trading in to the East को भी इसी तरह की अनुमति दी गयी।

1702 में इन कम्पनियों ने आपस में विलय का निश्चय किया। 1708 में इन कम्पनियों का विलय हो गया तब इसका नाम The United Company of Merchant of England trading in to the East Indiese रखा गया।  1833 ई0 के अधिनियम के द्वारा इसका नाम छोटा करके East India Company रख दिया गया।

भारत में फैक्ट्रियाँ:-

पूर्व के साथ व्यापार की अनुमति मिलने के बाद इंग्लैण्ड के शासक जेम्स प्रथम ने अपने एक राजदूत हॉकिन्स को अकबर के नाम का पत्र लेकर भेजा। हॉकिन्स ने मध्य-पूर्व में तुर्की और फारसी भाषा सीखी। 

1608 ई0 में हेक्टर नामक जहाज से वह सूरत पहुँचा। जहाँगीर ने उसे फैक्ट्री खोलने की अनुमति दे दी परन्तु पुर्तगीजों के दबाव से शीघ्र में अनुमति रद्द कर दी गयी। तब अंग्रेज ने दक्षिण जाकर 1611 ई0 में मसली-पट्टम में अपनी फैक्ट्री स्थापित की। इसी बीच 1611 ई0 में स्वाल्ली के प्रसिद्ध युद्ध में अंग्रेजों ने पुर्तगीजों को पराजित कर दिया तब 1612 में उन्हें पुनः सूरत में फैक्ट्री खोलने की अनुमति दी गयी।

  • 1608 – सूरत (अनुमति रद्द)। (टामस एल्डवर्थ)
  • 1611 – मसूली पट्टम।
  • 1611 – स्वाल्ली का युद्ध।
  • 1612 – सूरत (किलेबन्द फैक्ट्री)

दक्षिण में फैक्ट्रियाँ

  • 1611 – मसूली पट्टम
  • 1626 – अर्मागाँव (कर्नाटक)
  • 1632 – Golden Ferman -गोलकुण्डा के शासक के द्वारा जारी किया गया। इसके 500 पगोज सलाना कर के बदले अंग्रेजों को गोलकुण्डा राज्य के बन्दरगाहों से व्यापार करने की छूट प्राप्त हो गयी।
  • 1639 – फोर्ट सेंट जार्ज की स्थापना। फ्रांसिस-डे ने चन्द्रगिरि के राजा से मद्रास को पट्टे पर लिया और वहाँ एक किला बन्द कोठी बनवायी। इसी का नाम फोर्ट सेंट जार्ज पड़ा।

बम्बई का द्वीप

  • 1661 ई0 में इंग्लैण्ड के राजा चार्ल्स -द्वितीय का विवाह पुर्तगीज राजकुमारी कैथरीन मेवों के साथ हुआ। जिसके फलस्वरूप पुर्तगीजों ने बम्बई का द्वीप दहेज में चार्ल्स -द्वितीय को दे दिया।

चार्ल्स -द्वितीय ने 1668 ई0 में 10 पौंड वार्षिक किराये पर यह द्वीप ईस्ट इंडिया कम्पनी को दे दिया। 1669 ई0 में जेराल्ड औंगियार सूरत और बम्बई का गर्वनर बना।

उसने कहा ’अब समय का तकाजा है कि हम अपने हाथों में तलवार लेकर व्यापार का प्रबन्ध करें।’’ 1688 ई0 में इसी नीति का पालन करते हुए सर जॉन चाइल्ड ने कुछ मुगल बन्दरगाहों पर घेरा डाला। परन्तु औरंगजेब की सेना द्वारा उन्हें पराजित होना पड़ा तथा माफी मांगनी पड़ी एवं हर्जाने के रूप में 1.5 लाख रूपये देना स्वीकार किया।

बंगाल में अंग्रेजी शक्ति का विकास:- 1651 ई0 में बंगाल के सूबेदार शाहसुजा ने 3,000 रूपये वार्षिक कर के बदले अंग्रेजों को बंगाल बिहार और उड़ीसा से व्यापार करने की अनुमति प्रदान की। यह अनुमति इसलिए प्रदान की गयी क्योंकि ग्रेबियन बॉटन नामक चिकित्सक ने शाहसुजा की किसी बीमारी का इलाज किया।

  • 1656 – पुनः मंजूरी मिल गयी।
  • 1680 – औरंगजेब ने आदेश जारी किया कि अंग्रेजों से 1.5% जजिया कर लिया जाय।
  • 1686 – अंग्रेजों ने हुगली को लूटा परन्तु बुरी तरह पराजित किये गये और एक ज्वर ग्रसित द्वीप में पहुँचे। यहीं से जॉब चार्नोंक ने समझौते की शुरुआत की। बहुत अनुनय विनय के बाद इन्हें वापस लौटने की अनुमति मिल गयी।
  • 1690 – जॉब चार्नोक ने सूतानाती में एक फैक्ट्री खोली, जो आगे चलकर कलकत्ता बना। इसी कारण चार्नोक को कलकत्ता का जन्मदाता माना जाता है।
  • 1698 – बंगाल के नवाब अजीमुशान ने जमीदार इब्राहिम खाँ से तीन क्षेत्रों की जमीदारी सूतानाती, कालीकाता और गोबिन्दपुर अंग्रेजों को प्रदान की।

यहीं पर 1700 ई0 में फोर्ट विलियम की नींव रखी गयी। चार्ल्स आयर इसका पहला प्रेसीडेन्ट बना।

मुगल दरबार में मिशन:-

मुगल दरबार में अंग्रेजों के निम्नलिखित दो मिशन प्रमुख रूप से हुए-

1. नारिश मिशन:- 1698 इंग्लैंण्ड के राजा विलियम -तृतीय ने एक अन्य कम्पनी इंग्लिश कम्पनी टेर्डिंग इन-टू-द ईस्ट की स्थापना की। इस कम्पनी ने व्यापारिक सुविधायें प्राप्त करने के लिए सर विलियम नारिश की अध्यक्षता में एक मिशन औरंगजेब के दरबार में भेजा। किन्तु इसका कोई फल न हुआ।

2. जॉन सरमन मिशन:-1715- कलकत्ता से ईस्ट-इंडिया कम्पनी ने 1715 में जॉन सरमन की अध्यक्षता में फर्रुख-सियर के दरबार में एक दूत-मण्डल भेजा। इस मण्डल में-

रोहूर्द:- आरमेनियन दुभाषिया था।

हैमिल्टन:- 

यह अंग्रेज चिकित्सक था जिसने फर्रुखसियर की फोडे की बीमारी का इलाज किया। इससे प्रसन्न होकर फर्रुखसियर ने 1717 ई0 में एक फरमान जारी किया जिसके द्वारा-

  • 3,000 रू0 वार्षिक कर के बदले में कम्पनी को बंगाल में मुक्त व्यापार की छूट मिल गयी।
  • 10,000 रू0 वार्षिक कर के बदले में सूरत से व्यापार करने की छूट मिल गयी।
  • बम्बई में कम्पनी द्वारा ढाले गये सिक्कों को सम्पूर्ण मुगल साम्राज्य में चलाने की छूट मिल गयी।

ब्रिटिश इतिहासकार और्म ने इसे कम्पनी का मैग्नाकार्टा कहा। वस्तुतः इस व्यापारिक छूट से कम्पनी को बंगाल में अपने पाँव जमाने में सहूलियत मिली।

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September 16, 2020

Establishment of Colonial भारत में औपनिवेशिक शासन

भारत में औपनिवेशिक_शासन

औपनिवेशिक शासन

औपनिवेशिक_अर्थव्यवस्था

औपनिवेशिक_अर्थव्यवस्था से तात्पर्य है कि किसी दूसरे देश की अर्थव्यवस्था का उपयोग अपने हित के लिए प्रयोग करना। भारत में औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था की शुरुआत 1757 ई0 में प्लासी युद्ध से हुई, जो विभिन्न चरणों में अपने बदलते स्वरूप के साथ स्वतंत्रता प्राप्ति तक चलती रही।

भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के बारे में सर्वप्रथम दादा भाई नौरोजी ने अपनी पुस्तक ’द पावर्टी एण्ड अन ब्रिटिश रूल इन इण्डिया’ में उल्लेख किया। इनके अलावा रजनी पाम दत्त, कार्ल माक्र्स, रमेश चन्द्र दत्त, वी.के.आर.वी राव आदि ने भी ब्रिटिश औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के बारे में अपने विचार प्रगट किये हैं।

रजनी पाम दत्त ने अपनी पुस्तक ’इण्डिया टुडे’में ब्रिटिश औपनिवेशिक_अर्थव्यवस्था को तीन चरणों में विभाजित किया है-:

  1. वाणिज्यिक चरण -1757-1813
  2. औद्योगिक मुक्त व्यापार- 1813-1858.
  3. वित्तीय पूंजीवाद -1858 के बाद

1857 की क्रान्ति के बाद, प्रशानिक व्यवस्था में व्यापार परिवर्तन किया गया था। चूँकि भारत ब्रिटिश प्रशासन के अधीन था, अतः यहाँ ब्रिटिश हितों के अनुकूल नीतियाँ बनायी जा सकती थीं। भारत में कच्चा माल तथा सस्ता श्रम आसानी से उपलब्ध था।

ब्रिटिश प्रशासन द्वारा पूँजीपति को सस्ता ऋण भी उपलब्ध कराया गया। उपरोक्त परिस्थितियों ने ब्रिटिश पूँजीपतियों को अनेक क्षेत्रों में निवेश के लिए प्रेरित किया। अब ब्रिटिश पूँजी के अन्तर्गत अनेक उद्योग धन्धों, चाय, काफी नील तथा जूट के बगानों, बैंंकिंग, बीमा आदि क्षेत्र आ गये।

उपरोक्त चरणों के अध्ययन से पता चलता है कि औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था ने भारतीय अर्थव्यवस्था को पूरी तरह नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। कृषि, उद्योग, हस्तशिल्प कुटीर उद्योग पर इसके दूरगामी प्रभाव पड़े, जिसे हम निम्नलिखित बिन्दुओं के तहत समझ सकते है-

व्यापार एवं कुटीर उद्योग पूर्णतया समाप्त होगये जिससे कृषि पर दबाव बढ़ गया। वाणिज्यक फसलें उगाने के कारण देश में दुर्भिक्ष, अकाल आदि आम बात हो गये, जिससे देश में प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में धन-जन की हानि हुई।

ब्रिटिश उद्योगों को प्रोत्साहन तथा भारतीय उद्योग को हतोत्साहित किया गया, जिससे भारत के हस्त-शिल्प एवं परम्परागत कपड़ा उद्योग पूर्णतयः नष्ट हो गये। अंगे्रजों ने भारतीय जुलाहों को इतना कम मूल्य देना आरम्भ कर दिया कि उन्होंने बढि़या कपड़ा बनाना ही बन्द कर दिया।

भारतीय माल पर अंग्रेजों द्वारा इतना कर लगा दिया जाता जिससे उसकी कीमत बाजारमें दोगुनी हो गई, जिससे बाजार प्रतिस्पर्धा में वे मशीनीउत्पादन का मुकाबला न कर सके।

भारत के गवर्नर एवं गवर्नर जनरल के अधीन घटनाक्रम

गवर्नर जनरल 1773 से 18 57 इसी तक भारत में ब्रिटिश शासन का सर्वोच्च अधिकारी। वायसराय 1858 ईस्वी के बाद भारत में ब्रिटिश शासन का सर्वोच्च अधिकारी।

लार्ड वारेन हेस्टिंग्स 1772 से 1785

 1772 से 1774 तक बंगाल का गवर्नर रहा तथा 1774 से 1785 तक बंगाल का प्रथम गवर्नर जनरल रहा। दस्तक प्रथा पर प्रतिबंध लगाया।पंचवर्षीय भूमि बंदोबस्त किया। इन्होंने देशी रियासतों के प्रति रिंग फेंस की शुरूआत की। इन्हें भारत का पिट तथा पूर्व का चैथम भी कहा जाता है।

इनके समय में 1773 इसवी में रेगुलेटिंग एक्ट शुरू हुआ। 1774 ईसवी में कोलकाता में सर्वोच्च न्यायालय स्थापित हुआ। 1784 में पिट्स इंडिया एक्ट लागू हुआ।

लार्ड कार्नवालिस

न्यायिक क्षेत्र शक्ति के पृथक्करण सिद्धांत को भारत में लागू किया। कार्नवालिस ने अमेरिकन स्वतंत्रता संग्राम में ब्रिटिश सेना का नेतृत्व किया।भारत में नागरिक सेवा का जनक कहलाता है। 1793 ईस्वी में कार्नवालिस संहिता लागू की। 22 मार्च 1793 ईस्वी में भूमि बंदोबस्त का स्थाई प्रणाली बंगाल में लागू की।

1805 में गाजीपुर (उत्तर प्रदेश) में इनकी मृत्यु हुई। दो बार गवर्नर जनरल बनने वाला एकमात्र व्यक्ति था। इससे पहले क्लाइव दो बार बंगाल का गवर्नर बना था न की गवर्नर जनरल।

लार्ड वेलेजली

सहायक संधि प्रणाली (1798 ) की शुरुआत की। हैदराबाद के निजाम के साथ प्रथम सहायक संधि की।

लार्ड विलियम बैंटिक

राजा राममोहन राय के प्रयासों से 1829 ईस्वी में सती प्रथा को समाप्त किया। भारत का प्रथम गवर्नर जनरल जिसने 1935 ईस्वी में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी भाषा को बनाया। ठगी प्रथा की समाप्ति – इस कार्य में कर्नल स्लीमैन ने सहयोग दिया। कन्यावध निषेध किया गया।1885 में लार्ड मैकाले की अध्यक्षता में पहला विधि आयोग गठित हुआ।

चाल्स मेटकाफ

समाचार पत्रों का मुक्तिदाता कहा जाता है।

लार्ड ऑकलैंड

1829 ईस्वी में कोलकाता में भारत में पहली राजनीतिक संस्था जमीदारों की सभा की स्थापना की गई।

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