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September 13, 2020

September 13, 2020

सल्तनत काल- खिलजी वंश Khilji Dynasty

सल्तनत काल- खिलजी वंश

खिलजी क्रांति से तात्पर्य है – सत्ता पर तुर्की अमीर वर्ग के एकाधिकार की समाप्ति। अब श्रेष्ठ पद जातीय व नस्लीय आधार पर नहीं अपितु योग्यता के आधार पर किए जा सकते थे।

बलबन का राजस्व सिद्धांत जो कि रक्त की शुद्धता व उच्च कुलीनता पर आधारित था, खिलजी काल में समाप्त हो गया। अतः खिलजी क्रांति प्रशासन में व्यापक स्थानीय भागीदारी की दिशा महत्वपूर्ण थी। यद्यपि खिलजी सुल्तान भी तुर्क थे पर उन्होंने गैर तुर्कों को भी प्रशासन में शामिल किया। साम्राज्यवादी व आर्थिक नीतियों में उग्र व प्रबल परिवर्तन भी हुए। इतिहासकार हबीब ने इन परिवर्तनो को खिलजी क्रांति कहा है।

ख़िलजी वंश का संस्थापक- जलालुद्दीन ख़िलजी (1290-1296 ई)

जलालुद्दीन खिलजी ने दिल्ली सल्तनत में एक नवीन राजवंश, खिलजी वंश की स्थापना की। जलालुद्दीन खिलजी दिल्ली का प्रथम सुल्तान था जिसने उदार निरंकुशवाद को शासन का आधार बनाया। इसका दृष्टिकोण हिंदू जनता के प्रति उदार था।

खिलजी वंश की स्थापना ‘खिलजी क्रांति’ के नाम से प्रसिद्ध है। जलालुद्दीन खिलजी ने कैकुबाद द्वारा बनवाए गए किलोखरी महल में अपना राज्याभिषेक करवाया।

मुसलमानों का दक्षिण भारत का प्रथम आक्रमण जलालुद्दीन के शासनकाल में देवगिरी के शासक रामचंद्र देव पर हुआ। इस आक्रमण का नेतृत्व अलाउद्दीन खिलजी ने किया था।

जलालुद्दीन ने भारतीय हिन्दू समाज के प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाया। इसके शासनकाल में लगभग दो हजार मंगोल इस्लाम धर्म स्वीकार के दिल्ली के निकट बस गए।

जलालुद्दीन खिलजी की हत्या 1296 ईस्वी में उसके भतीजे अलाउद्दीन खिलजी ने छलपूर्वक की और खुद सुल्तान कर दिल्ली की गद्दी पर बैठा।

अलाउद्दीन ख़िलजी ( 1296-1316ई )

अलाउद्दीन खिलजी के पिता का नाम शिहाबुद्दीन खिलजी था जो जलालुद्दीन खिलजी का भाई था जलालुद्दीन खिलजी ने अपनी पुत्री का विवाह अल्लाउद्दीन खिलजी से किया अलाउद्दीन खिलजी ने जलालुद्दीन खिलजी की हत्या करवाई एवं सत्ता हासिल की

जलालुद्दीन खिलजी को मारने का षड़यंत्र अलाउद्दीन खिलजी उलूक खां जो अलाउद्दीन खिलजी का भाई था और मोहम्मद सलीम ने रची दक्षिणी भारत पर आक्रमण करने वाला प्रथम मुसलमान सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी था, जो विजय प्राप्त सुल्तान था

अलाउद्दीन खिलजी को मानकपुर में सुल्तान घोषित किया गया एवं राज्य अभिषेक दिल्ली में बलवन के लाल किले में हुआ

प्रारंभिक नाम- अली गुरशास्प

अलाउद्दीन खिलजी को इन नामों से भी जाना जाता है

1 जनता का चरवाहा
2 खलीफा का नायब
3 सिकंदर ए सानी
4 सिकंदर द्वितीय
5 यामीन उल खिलाफत
6 नासिरी अमीर उल मौममिन
7 विश्व का सुल्तान
8 पूर्व मध्यकालीन इतिहास का राजनीतिक अर्थशास्त्रज्ञ

अलाउद्दीन खिलजी के समय कोई विद्रोह हुए जिनमें से प्रमुख➖

  • 1 गुजरात विजय के पश्चात् लूट के माल को लेकर नव मुसलमानों ने विद्रोह किया यह रणथंबोर के शासक हम्मीर देव से जा मिले।
  • 2 अकत खां का विद्रोह
  • 3 मलिक उमर (बदायूं का गवर्नर) एवं मंगू खां (अवध का गवर्नर) का विद्रोह
  • 4 दिल्ली में हाजी मौला का विद्रोह

विद्रोह का दमन करने के लिए अलाउद्दीन खिलजी ने कई प्रयास किए➖

  • 1 अमीर वर्गों की संपत्ति जब्त
  • 2 गुप्तचर प्रणाली का गठन
  • 3 दिल्ली में शराबबंदी
  • 4 त्योहारों पर रोक

अलाउद्दीन खिलजी का राजत्व सिद्धांत 

अल्लाउद्दीन खिलजी को जिल्ले इलाही माना गया परंतु यह सिद्धांत शरीयत के सिद्धांत पर आधारित नहीं था। इसमें इस्लामी सिद्धांतों का सहारा नहीं लिया गया,धर्म को राजनीति से अलग रखा इसमें इस्लामी सिद्धांतों का सहारा नहीं लिया गया। धर्म को राजनीति से अलग रखा।

अमीर खुसरो ने अलाउद्दीन खिलजी के राजत्व सिद्धांत का प्रतिपादन किया अलाउद्दीन खिलजी ने खलीफा की सत्ता को मान्यता दी लेकिन प्रशासन में उनके हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं किया उसने इस्लाम, उलेमा, खलीफा किसी का सहारा नहीं लिया और निरकुशं राजतंत्र में विश्वास किया

अलाउद्दीन खिलजी ने बलबन की जातीय नीति को त्याग दिया और योग्यता के आधार पर पदों का विवरण किया।

अलाउद्दीन खिलजी सल्तनत का विस्तार करने के लिए भारत के कई क्षेत्रों में अभियान चलाया

1 उत्तर भारत पर किए गए अभियान

1. गुजरात अभियान- अलाउद्दीन खिलजी का पहला सैन्य अभियान 1298 में गुजरात के विरुद्ध था।  इस अभियान का नेतृत्व उलूग खां एवं नुसरत खां ने किया गुजरात का बघेल राजपूत कर्ण देव तृतीय(रायकरन) पराजित हुआ

गुजरात मार्ग में जैसलमेर को विजित किया गया गुजरात अभियान से ही मलिक काफूर को लाया गया। इसे 1000 दीनार में खरीदा गया इसी कारण ही हजार दीनारी भी कहा जाता है।

2. रणथंबोर अभियान- 

उलूग खां एवं नुसरत खां के नेतृत्व में रणथंबोर का आक्रमण किया गया पहले प्रयास मैं रणथंबोर के आक्रमण को हम्मीर देव ने विफल किया और नुसरत खान जो अलाउद्दीन खिलजी का सेनापति था मारा गया इसके बाद स्वयं अलाउद्दीन खिलजी ने रणथंबोर आक्रमण की कमान संभाली

राणा हमीर देव के प्रधान-मंत्री रणमल ने धोखा किया अंततः अमीर देव पराजित हुआ एवं मारा गया हम्मीर काव्य के अनुसार रति पाल एवं कृष्णपाल इस पराजय के प्रमुख कारण थे इस अभियान में नव मुसलमानों ने राणा हमीर का साथ दिया हम्मीर देव की मृत्यु के पश्चात रणथंबोर की राजपूत महिलाओं ने जोहर किया। राजस्थान में जौहर का यह प्रथम प्रमाण था।

जौहर – जोहर के दौरान एक अग्निकुंड बनाया जाता था पुरुषों द्वारा युद्ध में जाते समय केसरिया वस्त्र धारण किए जाते थे यह केसरिया करना कहा जाता था यदि युद्ध में राजा मारा जाता तो रानी एवं अन्य स्त्रियां अपने स्वाभिमान, इज्जत की रक्षा करने के लिए उस अग्नि कुंड में कूदकर जान देती थी एवं अपने गौरव एवं सतीत्व की रक्षा करती थी।

3. चित्तौड़गढ़ पर अभियान-

 चित्तौड़ पर आक्रमण 1303 ईस्वी में किया गया। इस आक्रमण का नेतृत्व स्वयं अलाउद्दीन खिलजी ने किया इसके आक्रमण के पीछे कई कारण थे जैसे➖

  • 1 चित्तौड़ का किला सामरिक महत्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण था
  • 2 राजा रतन सिंह की रानी पद्मिनी को प्राप्त करना अल्लाउद्दीन खिलजी की एक लालसा थी। (मलिक मुहम्मद जायसी की रचना पद्मावत के अनुसार)

आखिरकार अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया और राणा रतन सिंह को वीरगति प्राप्त हुई एवं रानी पद्मिनी ने जौहर किया दो वीर सैनिक गोरा एवं बादल वीरगति को प्राप्त हुए अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया। चित्तौड़ को अपने पुत्र को सुपुर्द कर दिया और इसका नाम खिज्राबाद कर दिया

इस अभियान में अमीर खुसरो अलाउद्दीन खिलजी के साथ था परंतु अमीर खुसरो ने पद्मावती की घटना का कोई उल्लेख नहीं किया

4. मालवा पर अभियान-

 इस अभियान का नेतृत्व आइनु मुल्क मुल्तानी ने किया मालवा का शासक महलकदेव भाग गया एवं मालवा भी दिल्ली सल्तनत के कब्जे में आ गया

5. सिवाना पर अभियान- 

सिवाना के शासक सातलदेव एवं अलाउद्दीन खिलजी के मध्य युद्ध हुआ। अलाउद्दीन खिलजी की ओर से कमालुद्दीन कुर्ग ने नेतृत्व किया युद्ध में सातलदेव वीरगति को प्राप्त हुआ  यहां भी राजपूत स्त्रियों ने जौहर किया

अलाउद्दीन खिलजी ने इस दुर्ग का नाम खैराबाद रख दिया और इस दुर्ग संरक्षक कमालुद्दीन को नियुक्त किया।

6. जालौर पर अभियान – 

जालौर शासक कान्हड़देव और अलाउद्दीन खिलजी के मध्य युद्ध हुआ। जिसका नेतृत्व कमालुद्दीन ने किया।कान्हड़देव को वीरगति प्राप्त हुई

2 दक्षिणी भारत पर किए गए अभियान

1. देवगिरी अभियान – अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय देवगिरी में सेना नहीं थी उस वक्त रामचंद्र का पुत्र सिंघणदेव अपनी सेना दक्षिण अभियान के लिए ले गया था अलाउद्दीन खिलजी ने यहां पर जनता को जी भर कर लूटा। रामचंद्र ने संधि प्रस्ताव भेजा परंतु सिंघणदेव ने युद्ध करने का निश्चय किया।

सिंघणदेव की सेना युद्ध छोड़कर भाग गई। यह देख कर सिघंणदेव ने संधि की फिर से पेशकश की। अलाउद्दीन खिलजी ने कठोर मांगों के साथ संधि स्वीकार की और कर देने का वचन दिया देवगिरी अभियान के समय अलाउद्दीन खिलजी ने अपार धन प्राप्त किया

2. देवगिरी का द्वितीय अभियान- 

 देवगिरी के शासकों ने 2- 3 वर्ष तक अलाउद्दीन खिलजी को कर देना बंद कर दिया। इस कारण देवगिरी पर अलाउद्दीन खिलजी ने फिर से आक्रमण किया गया। इस आक्रमण के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने रामचंद्र को ‘रायरायने की उपाधि” प्रदान की एवं गुजरात में “नवसारी” की जागीर प्रदान की।

इसका उद्देश्य अलाउद्दीन खिलजी दक्षिणी भारत पर विजय के लिए एक भरोसेमंद साथी चाहता था

3. देवगिरी का तृतीय अभियान- 

 रामचंद्र देव के पुत्र सिंघणदेव सिंहासन पर बैठते ही अधीनता के सब लक्षणों को त्याग दिया एवं स्वतंत्र शासक की भांति कार्य करने लगा। मलिक काफूर को आक्रमण के लिए भेजा गया, जिसमें सिंघणदेव मारा गया। रामचंद्र के दामाद हरपाल देव को गद्दी पर बैठाया गया।

4. तेलंगाना अभियान-

 इस अभियान का नेतृत्व मलिक काफूर ने किया एवं देवगिरी के शासक रामचंद्र ने मलिक काफूर का पूरा सहयोग किया वारंगल के शासक ने बिना युद्ध किए अधीनता स्वीकार की एवं प्रतीक के रूप में सोने की एक मूर्ति जिसके गले में सोने की जंजीर थी, भेंजी।

वारंगल के शासक रुद्र प्रताप ने हाथी,घोड़े,सोना, चांदी आदि दिए। कोहिनूर हीरा मलिक काफूर ने यहीं से प्राप्त किया।

5. होयसल अभियान या द्वार समुद्र की विजय-

 होयसल राज्य पर बल्लाल तृतीय का शासन था, इस अभियान का नेतृत्व मल्लिक काफूर ने किया। देवगिरी शासक रामचंद्र ने काफूर की सहायता की। आक्रमण के समय बल्लाल पांड्य राज्य के गृह युद्ध में वीर पांड्य की सहायता करने के लिए दक्षिण की ओर गया हुआ था।

बल्लाल ने प्रतिवर्ष कर अदा करने की संधि की। तथा बहुत अधिक मात्रा में सोना चांदी हीरे मोती आदि सुपुर्द किए। बल्लाल को अपने अगले अभियान में सहायता के लिए विवश किया

6. पंड्या अभियान या मदुरा पर विजय- 

होयसल सफल अभियान के बाद मलिक काफूर पांडेय राज्य की ओर बढ़ा। इस अभियान में बलाल तृतीय ने मलिक काफूर की मदद की पांडेय शासक के 2 पुत्र सुंदर पांडेय एवं वीर पांडेय के बीच सिंहासन को लेकर गृह युद्ध चल रहा था।

मलिक काफूर ने सुंदर पंड्या का पक्ष लिया, मलिक काफूर,वीर पांडेय को हरा नहीं सका। युद्ध में वीर पांडेय जीता एवं सुंदर पांडेय को बाहर निकाल दिया। इस अभियान में मलिक काफूर ने नगरों भवनों मंदिरों को लूटा परंतु वीर पांडेय से न जीत सका।

बलाल तृतीय को दिल्ली बुलाया गया,उसकी सहायता से प्रसन्न होकर अलाउद्दीन खिलजी ने उपहार स्वरूप किल्लत,एक मुकुट और छत्र तथा 10 लाख टंका मुद्राएं प्रदान की। यह विजय राजनीतिक दृष्टि से महत्वहीन परंतु आर्थिक दृष्टि से महान विजय थी

तुर्की सुल्तानों में अलाउद्दीन खिलजी प्रथम शासक था जिसने

  • घोड़ों को दागने की प्रथा प्रारंभ की।
  • विशाल तथा स्थाई सेना का गठन किया।
  • सैनिकों को नगद वेतन दिया।
  • भूमि की वास्तविक आय पर राजस्व निश्चित किया।
  • राज्य की नीति निर्धारण में उलेमा वर्ग का कोई दखल सहन नहीं किया। धर्म पर राज्य का नियंत्रण स्थापित किया।
  • बाजार नियंत्रण व्यवस्था- अलाउद्दीन द्वारा प्रारंभ (सर्वप्रथम)। राजकीय अन्नागार राशनिंग व्यवस्था की स्थापना की।
  • वेश्यावृत्ति पर प्रतिबंध लगाया।
  • दक्षिण भारत को जीतने और दिल्ली से उसे अपने अधीन रखने में सफल प्रयास किया।

अलाउद्दीन खिलजी द्वारा प्रशासन में कुछ पदों का सृजन किया गया 

  • दीवान-ए-वजारत-  इसका प्रमुख वजीर होता था। इसका मुख्य विभाग वित्त विभाग था। वजीर राजस्व एकत्रीकरण का कार्य करता था
  •  दीवान-ए-आरिज – यह सैनी मंत्री होता था। सेना की भर्ती,वेतन बांटना
  • दीवान-ए-इंशा – इसका कार्य शाही आदेशों एवं पत्रों का प्रारूप तैयार करना था
  • दीवान-ए-रसालत – पड़ोसी राज्य में भेजे जाने वाले पत्रों का प्रारूप तैयार करता था विदेशी राजदूतों से संपर्क रखता था
  • दीवान-ए-रियासत – अलाउद्दीन खिलजी ने यह नया मंत्रालय स्थापित किया  इसका प्रमुख कार्य राजधानी के आर्थिक मामलों की देखभाल करना। व्यापारी वर्ग पर नियंत्रण रखना था।
  • मुहतसिब- बाजारों पर नियंत्रण. नाप-तौल का निरीक्षण
  • बरीद ए मुमालिक – गुप्तचर विभाग का प्रमुख अधिकारी

खिलजी वंश स्मरणीय तथ्य ( Memorial facts )

  • अमीर_खुसरो फारसी विद्वान, चित्तौड़ विजय के समय अलाउद्दीन खिलजी के साथ था।
  • इस दौरान पहली बार किसी समसामयिक लेखक द्वारा जोहर का विवरण (1303) लिखा गया। (खजाइल उल फुतूह ग्रंथ में)
  • अमीर_खुसरो के उपनाम- तूतिया ए हिंद, हिंदुस्तानी तुर्क, तुर्क अल्लाह।
  • अमीर_खुसरो बलबन से गयासुद्दीन तुगलक तक आठ सुल्तानों के शासनकाल का प्रत्यक्षदर्शी रहा।
  • अमीरखुसरो द्वारा रचित ग्रंथ – 
  • तारीख ए अलाई , नरसिपेहर, तुगलकनामा, आशिकी, किरानुस्सादेन।

  • अलाउद्दीन का सेनापति मलिक काफूर दक्षिण विजय का श्रेय इन्हें ही जाता है। उनका उपनाम हजार दिनारी था।
  • अलाउद्दीन के काल में सर्वाधिक मंगोल आक्रमण हुए थे।
  • अला उल मुल्क अलाउद्दीन खिलजी का सलाहकार, दिल्ली का कोतवाल, एकमात्र व्यक्ति जो अलाउद्दीन को सलाह देने का साहस करता था।
  • शहना ए मंडी – अलाउद्दीन खिलजी द्वारा गठित गल्ला अथवा खाद्यान्न बाजार का अधीक्षक जिसका मुख्य कार्य है मूल्यों पर नियंत्रण रखना था पहला शहना मलिक कबूल था।
  • बरीद – माल क्रय विक्रय की सूचना सुल्तान को भेजने वाला अधिकारी।

  • दीवान ए मुस्तखराज – अलाउद्दीन खिलजी द्वारा स्थापित राजस्व विभाग।
  • दीवान ए रियासत – अलाउद्दीन खिलजी द्वारा स्थापित नया पद जिसका कार्य व्यापारी वर्ग पर कठोर नियंत्रण रखना था मलिक याकूब इस विभाग का सर्वोच्च अधिकारी था।
  • मुनहियान – अलाउद्दीन के समय का गुप्तचर विभाग।
  • कुतुबुद्दीन मुबारक शाह सल्तनत काल का प्रथम शासक था जिसने स्वयं को खलीफा घोषित किया, खलीफा तुल्लाह (खिलाफत उल लह) की उपाधि धारण की।
  • अलाउद्दीन ख़लजी ने किस शासक को ‘ रायरायान ‘की पदवी दी –रामदेव को
  • किस अभिलेख में कहा गया है कि ,” अलाउद्दीन ख़लजी के देवातातुल्य शौर्य से पृथ्वी अत्याचारों से मुक्त हो गयी ।” जोधपुर लेख
  • किसने कहा कि ,”अलाउद्दीन के द्वारा विजित किलों की गणना कौन कर सकता है ।”- कक्क सूरी
  • अलाउद्दीन ख़लजी के योग्य सेनापति थे -उलूग खाँ, नूसरत खाँ, मलिक काफूर, ग़ाजी मलिक ।
  • अलाउद्दीन ख़लजी को सेनापतियों का सेनापति के रूप में स्मरण किया जाता है ।
  • होयसाल राजा बल्लाल के दिल्ली जाने एवं अलाउद्दीन ख़लजी के द्वारा उसके स्वागत का विवरण दिया है – इसामी ने ।
  • मलिक काफूर के माबर अभियान के समय उसकी सहायता किस शासक ने की थी – होयसाल राजा बल्लाल देव ने ।
  • जलालुद्दीन फिरोज खिलजी के शासन का समय रहा है –(1290-96) जलालुद्दीन फिरोज खिलजी
  • जलालुद्दीन फिरोज खिलजी दिल्ली की गद्दी पर कब बैठा -1290 ई.
  • सुल्तान बनने से पहले जलालुद्दीन क्या था –बुलंदशहर का इफ्तादार

  • नवीन मुसलमान किसे कहा गया –दिल्ली में बसने वाले मंगोलों को ।
  • किसने जलालुद्दीन फिरोज खिलजी की हत्या कर दिल्ली की गद्दी हासिल की – अलाउद्दीन खिलजी (1296 ई. में)
  • अलाउद्दीन खिलजी के शासन का समय रहा है  -(1296-1316 ई.) अलाउद्दीन खिलजी
  • जलालुउद्दीन खिलजी के शासन में अलाउद्दीन क्या था – ड़ा-मानिकपुर का सुबेदार
  • उसने देवगिरी पर कब आक्रमण किया  –1296 ई.
  •  सिकंदर-ए-सानी की उपाधि किसने ग्रहण की –अलाउद्दीन
  • अलाउद्दीन के समय किसने दिल्ली में विद्रोह किया था –हाजियों ने ।
  • हाजियों के विद्रोह को किसने खत्म किया –हमीदुद्दीन
  • अलाउद्दीन ने कौन-सा सिद्धांत चलाया था –दैवी अधिकार
  • अलाउद्दीन खिलजी ने सेना में कौन-सी प्रथा शुरू की –हुलिया रखने की प्रथा

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September 13, 2020

सल्तनत काल- इल्वारी वंश Iibari Dynasty

सल्तनत काल- इल्वारी वंश

इल्वारी वंश

प्रथम इल्बरी वंश (1211-66 ई)
संस्थापक- इल्तुतमिश
अंतिम शासक- नसीरुद्दीन महमूद

द्वितीय इल्बरी वंश (1266-90)
संस्थापक-बलबन
उपनाम- जिल्ले इलाही (ईश्वर का प्रतिनिधि)

इल्बारी वंश की स्थापना इल्तुतमिश (1210- 1236 ई.) ने की थी, जो एक इल्बारी तुर्क था। खोखरों के विरुद्ध इल्तुतमिश की कार्य कुशलता से प्रभावित होकर मुहम्मद ग़ोरी ने उसे “अमीरूल उमर” नामक महत्त्वपूर्ण पद प्रदान किया था।

अकस्मात् मुत्यु के कारण कुतुबद्दीन ऐबक अपने किसी उत्तराधिकारी का चुनाव नहीं कर सका था। अतः लाहौर के तुर्क अधिकारियों ने कुतुबद्दीन ऐबक के विवादित पुत्र आरामशाह, जिसे इतिहासकार नहीं मानते, को लाहौर की गद्दी पर बैठाया। दिल्ली के तुर्क सरदारों एवं नागरिकों के विरोध के फलस्वरूप कुतुबद्दीन ऐबक के दामाद इल्तुतमिश, जो उस समय बदायूँ का सूबेदार था, को दिल्ली आमंत्रित कर राज्यसिंहासन पर बैठाया गया।

राजगद्दी पर अधिकार को लेकर आरामशाह एवं इल्तुतमिश के बीच दिल्ली के निकट ‘जड़’ नामक स्थान पर संघर्ष हुआ, जिसमें आरामशाह को बन्दी बनाया गया और बाद में उसकी हत्या कर दी गयी। ऐबक वंश के आरामशाह की मृत्यु के बाद दिल्ली सल्तनत में अब ‘इल्बारी वंश’ का शासन प्रारम्भ हुआ।

इल्तुतमिश ने अपने 40 वफादार गुलामों का समूह तैयार किया जिसे तुर्कान ए चहलगानी कहा जाता है। इल्तुतमिश ने मुद्रा व्यवस्था में भी काफी सुधार किया वह पहला तुर्क शासक था जिसने शुद्ध अरबी सिक्के चलाए सिक्कों पर टकसाल का नाम लिखवाने की परंपरा शुरू की इल्तुतमिश ने चांदी का टांका 175 ग्रेन एवं तांबे का जीतल भी प्रारंभ किया।

इल्तुतमिश का आरिजे मुमालिक इमादुल मुल्क नामक गुलाम था इल्तुतमिश ने इस दास की योग्यता से प्रभावित होकर उसे रावत-ए- अर्ज की उपाधि से सम्मानित किया। इल्तुतमिश का वजीर मोहम्मद जुनेद था इल्तुतमिश ने नागौर राजस्थान में अतारकीन का दरवाजा बनाया। इल्तुतमिश के शासनकाल में राजनीयक सिद्धांत और राजकीय संघटन की कला पर फखे मुदबिब्र ने आदाब अल अरब नामक प्रथम भारतीय मुस्लिम ग्रंथ तैयार किया गया ।

बनियान आक्रमण पर जाते समय इल्तुतमिश बीमार पड़ा वह दिल्ली लौट आया किंतु दिल्ली में 29 अप्रैल 1236 ई . को उसकी मृत्यु हो गई। इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद उसके पुत्र रुकनुद्दीन फिरोज शाह को गद्दी पर बैठाया गया इल्तुतमिश ने सुल्तान के पद को वंशानुगत किया।

इल्तुतमिश दिल्ली का प्रथम सुल्तान था जिसने

1. सुल्तान पद की स्वीकृति किसी गौर के साथ शासक से न लेकर खलीफा से प्राप्त की।
2. लाहौर के स्थान पर दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया।
3. दिल्ली शासन व्यवस्था की ओर ध्यान दिया।
4. भारत में मकबरे की परंपरा का सूत्रपात किया।
5. अपने जीवन काल में ही अपना उत्तराधिकारी (रजिया को) नियुक्त किया।
6. टका (चांदी का सिक्का 175 ग्रेन का) व जीतल ( तांबे का सिक्का) नामक शुद्ध अरबी सिक्के चलाए।
7. सिक्कों पर टकसाल का नाम लिखने की परंपरा को भारत में प्रचलित किया।
8 मध्यकालीन इस्लामी मुद्रा व्यवस्था का जन्मदाता था।

ग्यासुद्दीन बलबन (1266 से 1286 ईस्वी  तक)

मूल नाम- बहाउद्दीन
पूरा नाम- गियासुद्दीन बलबन
वंश की स्थापना- द्वितीय इल्बारी वंश
उपाधि- उलूग खॉं (नासीरुद्दीन मोहम्मद द्वारा), जिल्ले इलाही (ईश्वर का प्रतिबिंब )स्वयं धारण की, गियासुद्दीन( राज्यारोहण के बाद ),नियामत-ए-खुदाई 

बलबन का वास्तविक नाम बहाउद्दीन था वह इस्लामिक तुर्क था गद्दी पर बैठने के पश्चात उसने एक नवीन राजवंश बलबनी वंश अर्थात द्वितीय इल्बारी वंश की नींव डाली

उसके पिता या पितामाह इल्बारी तुर्क के 1 बड़े कबीले के मुखिया थे दुर्भाग्यवश बलवंत किशोरावस्था में ही मंगोलों द्वारा बंदी बना लिया गया था मंगोल उसे बगदाद ले आए जहां एक गुलाम के रूप में ख्वाजा जमालुद्दीन बसरी नामक व्यक्ति के हाथों में बेच दिया

जमालुद्दीन बसरी ने उसे अन्य तुर्क दासों के साथ दिल्ली लाया और वहां  इल्तुतमिश ने 1233 ईस्वी में ग्वालियर विजय के बाद उसे खरीदा

शीघ्र ही इल्तुतमिश ने बलवन को चालीसा दल में शामिल कर लिया।

बलबन की चालीसा दल में स्थिति सबसे नीचे थी, लेकिन अपनी योग्यता और कार्यशैली के आधार पर वह सबसे उच्च था

रजिया के शासनकाल में वह “अमीर- ए -शिकार” के पद पर नियुक्त हुआ।

रजिया और बहरामशाह के मध्य हुए सत्ता के लिए संघर्ष में उसने बहरामशाह का पक्ष लिया फलस्वरुप उसे “अमीर- ए-आखुर” का पद  प्राप्त हुआ

अलाउद्दीन मसूद शाह को सिहासन से हटाकर नासिरुद्दीन महमूद को सुल्तान बनाने में बलबन का प्रमुख योगदान रहा

नासिरुद्दीन महमूद का काल बलबन का उत्कर्ष का काल था। उस के समय में संपूर्ण शक्ति बलबन के हाथों में केंद्रित थी

अगस्त1249 ई. को बलबन ने अपनी पुत्री का विवाह नासिरुद्दीन से कर दिया। इस अवसर पर उसे “उलूग खां”की उपाधि और नायब एवं मामलिकात का पद दिया गया

1266 ईस्वी में नासिरुद्दीन की मृत्यु के बाद बलवंत गद्दी पर बैठा

बलबन के समय में यह कथन प्रसिद्ध है कि– ”एक मलिक होते हुए भी वह खान हो गया और फिर सुलतान बन गया”

बलवंत के सम्मुख दो समस्याएं प्रमुख थी

1. प्रथम समस्या– सुल्तान की शक्ति और प्रतिष्ठा को स्थापित करना और जनसाधारण में सुल्तान के प्रति भय और सम्मान की भावना जागृत करना था

2. दूसरी और तत्कालिक समस्या कानून और व्यवस्था की थी।जो केवल एक स्थाई सुव्यवस्थित सेना और पुलिस शासन द्वारा ही स्थापित की जा सकती थी

इल्वारी वंश इल्वारी वंश इल्वारी वंश इल्वारी वंश इल्वारी वंश

September 13, 2020

सल्तनत काल- गुलाम वंश/ममलुक वंश Ghulam dynasty

 सल्तनत काल- गुलाम वंश/ममलुक वंश

गुलाम वंश 1206 से 1290 ई

गुलाम वंश के प्रमुख शासक कालक्रमानुसार

  • कुतुबुद्दीन ऐबक – 1206 से 1210 ईसवी
  • शमसुद्दीन इल्तुतमिश – 1211 से 1136
  • रजिया – 1236 से1240 ईसवी
  • मोइनुद्दीन बहरामशाह-  1240 -1242 ई
  • अलाउद्दीन मसूद शाह  1242-1246 ई
  • नासिरुद्दीन महमूद-  1146-1265 ई
  • बलबन – 1265-1287 ई
  • केकुबाद – 1287-90
  • समसुद्दीन क्युमर्स – 1290 ई

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गुलाम वंश

कुतुबुद्दीन ऐबक के माता-पिता तुर्किस्तान के तुर्क थे। तुर्की भाषा में युवक का अर्थ होता है चंद्रमा का स्वामी। 1206 से 1290 इसी तक तीन राजवंशो के 9 शासकों ने शासन किया यह वंश कुतुबी वंश, शम्सी वंश, बलबनी वंश थे

इतिहासकार हबीबुल्ला ने गुलाम वंश को मामलुक कहा मामलुक अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है स्वतंत्र माता-पिता से उत्पन्न हुए दास। कुतुबुद्दीन ऐबक को भारत में तुर्की राज्य का संस्थापक माना जाता है वह दिल्ली का प्रथम तुर्क शासक था।

कुरान का अत्यंत सुरीली आवाज में पाठ करने के कारण कुतुबुद्दीन ऐबक को कुरान खां भी कहा जाता था उसे हातिम द्वितीय भी कहा जाता था। इल्तुतमिश इल्बरी तुर्क था उसे दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक माना जाता है कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के समय है बदायूं का सूबेदार था। चंगेज खान का मूल नाम तिमूचिन था वह अपने को ईश्वर का अभिशाप कहने में गर्व अनुभव करता था।

रजिया सुल्तान (1236-1240 ई.)

सुल्तान इल्तुतमिश ने अपनी ही बेटी रजिया को उत्तराधिकारी बनाया । रजिया दिल्ली सल्तनत की पहली और अंतिम महिला शासक थी । 1236 ई. में वह दिल्ली की गद्दी पर बैठी । रजिया बेगम ने जलालुद्दीन याकूत को अमीर-ए-आखूर नियुक्त किया था ।

भटिण्डा के सूबेदार अल्तूनिया से रजिया ने शादी की । इसी बीच इल्तुतमिश के एक पुत्र बहरामशाह ने सत्ता हथिया ली और भटिण्डा से दिल्ली आते वक्त रजिया व अल्तूनिया की हत्या कैथल के निकट कर दी गई ।

इतिहासकार मिन्हाज-उस-सिराज के मुताबिक रजिया का स्त्री होना उसके पतन का कारण था

गुलाम वंश की स्थापत्य एवं वास्तुकला –

गुलमावंश का शासनकाल हिन्दू इस्लामी वास्तुकला के विकास का प्रारंभिक चरण था। इस चरण में तुर्क शासकों ने भारतीय इमारतों को ही संशोधित करके या इन्हें तोड़कर मंदिर बनवाया था। इसी प्रकार अजमेर में ‘अढ़ाई दिन का झोपड़ा’ का निर्माण संस्कृत विद्यालयों को तोड़कर किया गया था।

इस काल में कुतुबमीनार पहली इमारत है जो नये ढ़ग से निर्मित हुई और इसमें इस्लामी शैली के प्रभाव प्रकट होते हैं। ‘सुल्तानगढ़ी मकबरा’ प्रथम सल्तनत कालीन मकबरा है। सर्वप्रथम बलवन के मकबरे में मेहराब का वास्तविक रूप दिखाई देता है। ‘कुव्वत उल इस्लाम’ मस्जिद भारत में मुस्लिम स्थापत्य कला की प्रथम इमारत है।

साथ ही यह इंडो-इस्लामिक शैली का पहला ऐसा उदाहरण है जिसमें स्पष्ट हिन्दू प्रभाव दिखाई देता है। बलबन की मकबरा शुद्ध इस्लामिक पद्धति द्वारा निर्मित भारत का पहला मकबरा है।

कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद –

इसका निर्माण दिल्ली में कुतुबद्दीन ऐबक ने पृथ्वीराज चौहान पर विजय प्राप्त करने की स्मृति में दिल्ली में 1192 ई. में कराया। भारत में मुस्लिम स्थापत्य कला का पहला भवन, जिसमें हिन्दू प्रभाव दिखाई देता है। यह पहले जैन मंदिर एवं बाद में विष्णु मंदिर था। सुल्तान इल्तुतमिश ने अपने समय में इस मस्जिद के ‘सहन’ (आंगन) को और विस्तृत कर दिया।

अलाउद्दीन खिलजी ने इसके इबादतखाना को और भी विस्तृत कराया तथा इसके अनेक स्तम्भों पर कुरान की आयतें भी अंकित करवाई। पूर्ववर्ती जैन और विष्णु के स्तंभ, तोरण, छत इत्यादि का प्रयोग मस्जिद की सामग्रियों के रूप में हुआ था। इसमें ‘धरण’ और ‘कोष्ठकों’ का प्रयोग किया गया था, जो भारतीय स्थापत्य कला के अंग हैं।

कुतुबमीनार

कुतुबमीनार का निर्माण दिल्ली में ऐबक द्वारा मुअज्जिन द्वारा अजान देने के लिए करवाया गया था, जो उस पर चढ़कर नमाज के लिए अजान दिया करता था। इसकी ऊंचाई 242 फीट है और नीचे से ऊपर की ओर पतली होती चली गई है। कुतुबमीनार में मूल रूप में चार मंजिलें थीं परंतु फिरोज तुगलक के काल में इसका चौथा तल्ला छतिग्रस्त हो गया था जिसे तुड़वाकर उसके स्थान पर दो मंजिलों का निर्माण कराया। जिसके कारण इसमें अब पांच मंजिलें हैं।

सिकंदर लोदी के समय में इसके मीनारों की मरम्मत की गई। इसकी पहली मंजिल सितारों की आकृति की भांति है तथा यह गोल और बांसुरीनुमा है। इसकी दूसरी मंजिल वृत्ताकार है। इसकी तीसरी मंजिल पूरी तरह सितारेनुमा है। इसकी चौथी मंजिल गोलाकार है। मीनार की अधिकांश मंजिलों के निर्माण में लाल पत्थरों का अधिकाधिक प्रयोग किया गया है।

अढ़ाई दिन का झोपड़ा, अजमेर-

कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसका निर्माण 1200 ई. में कराया। संभवतः इसका निर्माण अढ़ाई दिन में होने के कारण इसका नाम ‘अढ़ाई दिन का झोपड़ा’ पड़ा। इसका निर्माण कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद की पद्धति पर हुआ है। इसमें मेहराबदार पर्दा इल्तुतमिश ने लगवाया था। यह पहले एक मठ (संस्कृत विद्यालय) था। चौहान शासक विग्रहराज चतुर्थ बीसलदेव के नाटक ‘हरकेलि’ की कुछ पंक्तियां इसकी दीवारों पर अंकित है।

  • बकाते नासिरी मिनहाज उस सिराज ने लिखी जो गुलाम वंश के शासक नासिरुद्दीन महमूदबको समर्पित थी।
  • ताज उल मसिर के लेखक ख्वाजा सद्र निजामी।
  • दरगाह मुइनुद्दीन चिश्ती इसका निर्माण इल्तुतमिश ने करबाया।
  • इल्तुतमिश ने बदायूं में हौज ए शम्सी,शम्मी ईदगाह एवं जामा मस्जिद का निर्माण करबाया।
  • कुतुब उल इस्लाम मस्जिद का निर्माण कुतुबुद्दीन ने करबाया।यह भारत निर्मित पहली तुर्क मस्जिद है।

व्यवहारिक रूप से दिल्ली सल्तनत पूर्णतः धर्म प्रधान नहीं था। बरनी भी इस बात के लिए दुख प्रकट करता है कि वह दीनदारी न होकर जहांदारी है। इल्तुतमिश भी कहता है कि हिंदुस्तान दारुल हर्ब है इसे दारुल इस्लाम राज्य में परिवर्तित करना संभव नहीं है।

बलबन का राजत्व प्रतिष्ठा, शक्ति, न्याय, भय, उच्च कुलीनता व रक्त की शुद्धता पर आधारित था। दिल्ली सल्तनत की प्रशासनिक व्यवस्था मुख्यतः अरबी फारसी पद्धति पर आधारित थी सैनिक संगठन तुर्क मंगोल पद्धति पर आधारित था।

बहराम शाह ने नायब -ए -मुमालिक (उप सुल्तान या सुल्तान का प्रतिनिधि) का पद सृजित किया। किंतु नायब का यह पद बहुत कम समय के लिए अस्तित्व में रहा बहरामशाह ने इख़्तियारूदीन एतगीन को प्रथम नायब नियुक्त किया।

नासिरुद्दीन महमूद ने बलबन को नायब नियुक्त किया। इसके बाद नायब का पद समाप्त ही हो गया। केवल अलाउद्दीन ने मलिक काफूर को नायब नियुक्त किया जो सल्तनत काल का 4 व अंतिम नायब था।

बलबन के समय वजीर की शक्तियां निम्नतम बिंदु पर जा पहुंची। प्रांतों को इक्ता कहा जाता था। इक्ता का प्रधान मुक्ती, वली, नाजिम, नायब या इक्ता दार आदि नामों से जाना जाता था। बलबन ने जिन इक्ताओ से राजस्व नहीं मिल रहा था उन्हें खालसा भूमि में मिला दिया।

1279 ई में बलबन ने ख्वाजा नामक अधिकारी की सर्व प्रथम नियुक्ति इक्तादारो के साथ की, ताकि व्यक्तियों की आय व्यय का सही हिसाब रख सके। व इक्तादारो के भ्रष्टाचार को रोक सके। इस प्रकार उसने प्रांतों में द्वैध शासन की व्यवस्था की।

अक्ता व्यवस्था 

यूरोपीय इतिहासकार ‘ अक्ता ‘शब्द का अंग्रेजी अनुवाद ‘असाइनमेंट ‘में किया है जो कि भ्रामक है । अक्ता का मतलब –भूमि के विशेष खण्डों का राजस्व सैनिकों को उनके वेतन के बदले आवंटित किया जाना ।हिन्दुस्तान में अक्ता का प्रयोग भू -राजस्व अधिन्यास अर्थ में किया गया था ।

दिल्ली सल्तनत की राजनीतिक व्यवस्था अपने पूर्वगामी राजपूत सामन्ती राज्यों से भिन्न थी । इसमें दो भिन्नता थीं 

  1. अक्ता -जिसका अर्थ हस्तांतरणीय लगान अधिन्यास (Transferable revenue assignment ).।
  2. शासक वर्ग का स्वरूप ।

मध्यकालीन भारत के प्रारंभ में तुर्की शासन की राजनीति दो मूलभूत तत्वों पर आधारित थी और ये दोनों ही तत्व स्वतंत्र रूप में विकसित हुए थे ।इनमें पहला तत्व ‘ अक्ता ‘ था ।दूसरा तत्व खराज -(गैर -मुस्लिम जनता पर लागू भूमि कर )है । अक्ता के प्रशासकीय ढाँचे के अन्तर्गत किसी क्षेत्र से स्थायी संबंध न होते हुए भी शासक वर्ग के लिए वहाँ से आय की व्यवस्था हो जाती थी ।

अक्ता प्रणाली शासक वर्ग की सामाजिक स्थिति तथा उनके राजनीतिक प्रभाव के निर्धारण का आधार भी बनी रहती थी । अब यह भी जान लेना आवश्यक है कि अक्ता किस भाषा का शब्द है, तो ‘ अक्ता ‘एक अरबी भाषा का शब्द है जिसे एक प्रकार के प्रशासनिक अधिकार प्रदान करने के अर्थ में प्रयुक्त किया जाता था ।

अक्सर ‘ अक्ता ‘ शब्द को भ्रामक अनुवाद के कारण यूरोप में प्रचलित ‘ फीफ़ ‘(जागीर )शब्द के अर्थ में प्रयुक्त किया जाता रहा है । मुस्लिम राज्य के प्रभुत्व में आने के बाद प्रारम्भिक कुछ शताब्दी में राज्य के अन्तर्गत विभिन्न भू -भागों को विशिष्ट खण्डों में वितरित किया जातारहा ।इस विशिष्ठ खण्ड को ‘ कता ‘ कहा जाता था ।

राज्यके भू -भाग वास्तव में अर्धस्वामित्वशाली उस्र अदा करने की शर्तों पर प्रदान किए जाते थे ।मुस्लिम दुनिया के विस्तार के साथ ही राज्य का सैनिक उत्तरदायित्व भी बढगया था ।शक्तिशाली सेना के रखरखाव के लिए अधिकाधिक भूमि -भाग की जरूरत पड़ने लगी ।इसके परिणामस्वरूप एक नवीन व्यवस्था का जन्म हुआ जिसे अक्ता कहा गया ।

विद्वान मानते है कि अक्ता शब्द की उत्पत्ति उसी मूल अरबी धातु से हुई जिससे कताईया शब्द बना है । इस प्रकार इस्लाम के शुरूआती दौर से अक्ता प्रदान करने की प्रथा थी ।

1 )अक्ता –

प्राप्त सुल्तान की बेगमें तथा धार व्यक्ति अक्ताधारकों की अन्तिम श्रेणी में आते थे । मिनहाज ने ‘ अयालत ‘ का प्रयोग किया है ऐसा प्रतीत होता है वह अक्ता के लिए प्रयोग किया गया है ।