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September 10, 2020

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चोल एवं पल्लव तथा अन्य प्राचीन राजवंश Chola Pallava Dynasty

चोल एवं पल्लव तथा अन्य प्राचीन राजवंश

चोल

प्राचीन भारत मानव के उदय से लेकर दसवीं सदी तक के भारत का इतिहास प्राचीन भारत का इतिहास कहलाता है। प्राचीन भारतीय इतिहास की जानकारी के साधनयों तो भारत के प्राचीन साहित्य तथा दर्शन के संबंध में जानकारी के अनेक साधन उपलब्ध हैं, परन्तु भारत के प्राचीन इतिहास की जानकारी के साधन संतोषप्रद नहीं है।

उनकी न्यूनता के कारण अति प्राचीन भारतीय संस्कृति एवं शासन का क्रमवद्ध इतिहास नहीं मिलता है। फिर भी ऐसे साधन उपलब्ध हैं जिनके अध्ययन एवं सर्वेक्षण से हमें भारत की प्राचीनता की कहानी की जानकारी होती है।

इन साधनों के अध्ययन के बिना अतीत और वर्तमान भारतके निकट के संबंध की जानकारी करना भी असंभव है। प्राचीन भारत के इतिहास की जानकारी के साधनों को दो भागों में बाँटा जा सकता है-

साहित्यिक साधन और पुरातात्विक साधन, जो देशी और विदेशी दोनों हैं।

साहित्यिक साधन दो प्रकार के हैं-:

  • धार्मिक साहित्य और
  • लौकिक साहित्य।

धार्मिक साहित्य भी दो प्रकार के हैं -:

  • ब्राह्मण ग्रन्थ और
  • अब्राह्मण ग्रन्थ।

ब्राह्मण ग्रन्थ दो प्रकार के हैं – श्रुति जिसमें वेद, ब्राह्मण, उपनिषद इत्यादि आते हैं और स्मृति जिसके अन्तर्गतरामायण, महाभारत, पुराण, स्मृतियाँ आदि आती हैं।

लौकिक साहित्य भी चार प्रकार के हैं-  ऐतिहासिक साहित्य, विदेशी विवरण, जीवनी और कल्पना प्रधान तथा गल्प साहित्य।

पुरातात्विक सामग्रियों को तीन भागों में बाँटा जा सकता है –  अभिलेख, मुद्राएं तथा भग्नावशेष स्मारक।

अधोलिखित तालिका इन स्रोत साधनों को अधिक स्पष्ट करती है-?

(क) साहित्यिक साधन

  • धार्मिक साहित्य
  • ब्राह्मण ग्रंथ.
  • श्रुति (वेद ब्राह्मण उपनिषद् वेदांग).
  • स्मृति (रामायण महाभारत पुराण स्मृतियाँ)
  • अब्राह्मण ग्रंथ.
  • लौकिक साहित्य.
  • ऐतिहासिक
  • विदेशी विवरण.
  • जीवनी
  • कल्पना प्रधान तथा गल्प साहित्य

(ख) पुरातात्विक साधन

  • अभिलेख
  • मुद्राएँ.
  • भग्नावशेष स्मारक

चोल वंश ( Chol Dynasty )

नवीं से बारहवीं शताब्दी तक चोल शासकों का राजनैतिक वर्चस्व बना रहा। इन्होंने न सिर्फ एक विशाल साम्राज्य का निर्माण किया बल्कि शक्तिशाली नौसेना भी गठित की, जिससे ब्रहा देशों (श्री लंका आदि) पर भी अपना नियंत्रण स्थापित किया तथा साथ ही साथ उन्होंने हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के समुद्री व्यापार का मार्ग प्रशस्त किया।

चोल साम्राज्य को मध्यकालीन दक्षिण भारतीय इतिहास की चरम परिणीत कहा जा सकता है।

राजनैतिक इतिहास

चोल शासन दक्षिण भारत में पल्लवों के अधीनस्थ सांमतों के रूप में कार्यरत थे। 850 ई. में विजयालय ने तंजौर पर कब्ज़ा कर लिया। इसी ने चोल राजवंश की स्थापना की थी। उसने परकेसरी की उपाधि धारण की। उसने पल्लव एवं पाण्ड्य शासकों के बीच संघर्ष का लाभ उठाकर अपनी स्थिति मजबूत की।

विजयालय के उत्तराधिकारी एवं उसके पुत्र आदित्य प्रथम (887 – 900 ई.) ने पल्लव शासक अपराजित को (890 ई.) युद्ध में हराकर मार डाला। उसी ने पाण्ड्य (मदुरा) और गंग (कलिंग) शासकों को हराकर अपने साम्राज्य को और अधिक सुदृढ़ किया।

इसके उत्तराधिकारी परांतक प्रथम (907 – 953 ई.) ने साम्राज्य विस्तार को और विस्तृत किया तथा 915 ई. में उसने श्रीलंका को सेना को वेल्लूर के युद्ध में पराजित किया। किन्तु इस समय राष्ट्रकूट शासन भी शक्तिशाली थे।

राष्ट्रकूट शासक कृष्ण तृतीय ने 949 ई. में तक्कोलम के युद्ध में चोल सेना को पराजित किया। 953 ई. में परांतक प्रथम की मृत्यु हो गई। राष्ट्रकूट शासक कृष्ण तृतीय की मृत्यु (965 ई.) के उपरांत राष्ट्रकूट साम्राज्य का विघटन होना शुरू हुआ।

चोल शक्ति का पुनः जीर्णीद्धार 985 ई. में राजराज प्रथम (985 से 1014 ) के आधीन आरंभ हुआ। उसके अनेक विजयों के पश्चात एक विशाल साम्राज्य का निर्माण किया।

994 ई. से 1002 के मध्य उसने सैनिक अभियान किये तथा उसने चेर, पाण्ड्य, चालुक्य (पूर्वी एवं पश्चिमी दोनों को) तथा कलिंग के गंग शासकों को पराजित किया। 1004 ई. से 1012 ई. के मध्य नौसैनिक अभियान के क्रम में उसने अनुराधापुर (श्रीलंका) के उत्तरी क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित कर लिया और उसका नाम मुम्मडी चोलमंडलम रखा।

उसने मालदीप पर भी विजय प्राप्त की। इन सभी विजयों की जानकारी तंजौर एवं तिरुवलंगाडु अभिलेखों से प्राप्त हुई है। राजराज प्रथम का उत्तराधिकारी एवं उसका पुत्र राजेन्द्र प्रथम (1014 ई. से 1044 ई.) था।

राजराज प्रथम की विस्तारवादी नीति को आगे बढ़ाते हुए राजेन्द्र प्रथम ने पांड्य और चेर राजवंश का पूर्णत: उन्मूलन करके अपने साम्राज्य में मिला लिया। उसने 1017 ई. में अनुराधापुर के दक्षिणी क्षेत्र को जीतकर इस भाग को पूर्णतः अपने साम्राज्य में मिला लिया।

इन सैनिक कार्यवाहियों का उद्देश्य अंशत: यह था कि दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ होने वाले व्यापार पर नियंत्रण स्थापित किया जा सके।कोरोमंडल तट तथा मालाबार दक्षिण- पूर्व एशियाई देशों के साथ भारत के व्यापार के मुख्य केन्द्र थे।

1022 – 23 के बीच उसने बंगाल पर सफल सैनिक अभियान किया और महिपाल को पराजित किया। इसी अवसर पर उसने ‘गंगैकोंडचोलपुरम’ की उपाधि धारण की तथा तंजोर के नजदीक गंगैकोंडचोलपुरम को राजधानी बनाया।

राजेन्द्र प्रथम की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विजय 1025 ई. में श्री विजय की थी। उसने श्री विजय के शासन संग्राम विजयोत्तुंगवर्मन को पराजित कर अपनी संप्रभुता उस पर स्थापित की थी। चोल काल का अगला शासक राजाधिराज (1044 – 52 ) अनेक विद्रोहों और उपद्रवों से परेशान था।

उसने अनुराधापुर (श्रीलंका) में हुए विद्रोह का दमन किया। कोपंन्न के युद्ध में उसने चालुक्य शासन सोमेश्वर को हराकर उसकी शक्ति को कमजोर किया। किंतु इसी युद्ध में उसकी मृत्यु हो गयीं।

इसके पहले अपनी सैनिक सफलताओ के उपलक्ष्य में अश्वमेघ यज्ञ किया और जयगोंडचोल की उपाधि धारण की। राजधिराज का अगला उत्तराधिकारी, उसके भाई राजेन्द्र द्रितीय (1052 – 63 ) ने रणभूमि में ही अपना राज्याभिषेक कराया और युद्ध में सफलता प्राप्त की।

इसके पश्चात वीर राजेन्द्र (1063 – 70 ई.) शासन बना। उसने विक्रमादित्य के साथ अपनी पुत्र का विवाह किया तथा दोनों में मैत्रीपूर्ण संबंध बन गये। वीर राजेन्द्र के उत्तराधिकारी अधिराजेन्द्र को जनता ने उसके राज्यारोहण के पश्चात तुरंत राजगद्दी से हटा दिया।

लगभग 1070 ई. कुलोतुंग प्रथम शासन बना। उसका पिता चालुक्य वंश का शासक (विमलादित्य) था और उसकी माँ चोल राजकुमारी थी। अब चोल और चालुक्य वंश एक हो गये। इसने युद्धनीति त्याग कर जनकल्याणकारी कार्य किया। 1077 ई. में उसने चीन के सम्राट के समक्ष अपना दूत भेजकर व्यापारिक संबंधो को सुदृढ़ बनाने का प्रयास किया। इसके पश्चात के उत्तराधिकारियों में

  • विक्रमचोल (1120 – 35 ई.)
  • कुलोतुंग तृतीय (1135 – 50 ई.)
  • राजराज प्रथम तृतीय (1210 – 50 ई.)
  • राजेन्द्र तृतीय (1250 – 67 ई.) शामिल है।

राजेन्द्र तृतीय (1250 – 67 ई.) की मृत्यु के बाद चोल वंश का इतिहास समाप्त हो गया।

चोल साम्राज्य के पतन का प्रमुख कारण लगातार युद्ध और संघर्ष था जिसने राज्य के आर्थिक और सैनिक संसाधनों का हास किया। परवर्ती चोल शासकों की कमजोरी और नये राज्यों, विशेषकर पांड्य एवं होयसल वंशो के उत्कर्ष और उनके द्वारा चोल राज्य के क्षेत्रों पर आक्रमण ने भी साम्राज्य को बहुत ज्यादा कमजोर किया।

राजस्व प्रशासन

चोल राज्य की आय का प्रमुख साधन भूमिकर था। भूमिकर ग्राम-सभाएं एकत्र करके सरकारी कोष में जमा करती थी। इसके लिए चोल शासकों ने समस्त भूमि की माप करवायी तथा उसकी उत्पादकता के आधार पर कर का निर्धरण किया।

जैसे – राजराज प्रथम और कुलोतुंग प्रथम के समय में क्रमश: एक और दो बार भूमि की माप करायी गयीं थी। कर 1 / 2 से 1 / 4 भाग तक होता था। इसे कड़माप या कड़ीमै (भू- राजस्व) कहते थे। चोल काल में भूमि की 12 से भी अधिक किस्मो का उल्लेख मिलता है ।

प्रत्येक ग्राम तथा नगर में रहने के स्थान, मंदिर, तालाब, कारीगरों के आवास, शमशान आदि सभी प्रकार के करों से मुक्त थे।  पिंडारी (ग्राम्यदेवी) के लिए, बकरों की बलि का स्थान, कुंभकार, स्वर्णकार, लौहकार, रजक, बढ़ई आदि के निवास स्थानों को भी कर मुक्त रखा गया था।

राजस्व विभाग की पंजिका को वरित्योतगकणवक कहा जाता था जिसमें सभी प्रकार की भूमि के विवरण दर्ज किये जाते थे। कृषकों को यह सुविधा थी कि वे भूमिकर नगद अथवा अनाज के रूप में चुका सकते थे चोलों के स्वर्ण सिक्के कलंजु या पोंन कहे जाते थे। अकाल आदि दैवीय आपदाओं के समय भूमि माफ कर दिया जाता था।

दक्षिण भारत में तालाब ही सिंचाई के प्रमुख साधन थे। जिनके रखरखाब की जिम्मेदारी ग्राम सभाओं की होती थी, तालाबों की मरम्मत के लिए एरिआरम नामक कर भी वसूल किया जाता था।लोगों के कर न देने पर दण्ड की व्यवस्था थी। जैसे – पानी में डुबो देने और धूप में खड़ा कर देने का भी उल्लेख मिला है।

उदाहरण के लिए – तंजौर के कुछ ब्राहाण लगान चुकाने में असमर्थ होने पर अपनी जमीने छोड़कर गाँव से भाग गये तथा उनकी जमीने पड़ोस के मंदिरो को बेच दी गयी। बकाये कर पर ब्याज भी लिया जाता था।

केन्द्रीय शक्ति के निर्बल इहोने पर जनता ने विद्रोह किया क्योकि उनसे अन्यायपूर्ण कर वसूल किया जा रहा था जैसे – राजराज तृतीय और कुलोतुंग प्रथम के समय ।

भूमिकर के अतिरिक्त व्यापारिक वस्तुओं, विभिन्न व्यवसाओं , खानों, वनों, उत्सवों आदि पर भी कर लगते थे। राज्य की आय का व्यय अधिकारी तंत्र, निर्माण कार्यो, दान, यज्ञ, महोत्स्व आदि पर होता था। राजस्व विभाग के प्रमुख अधिकारी को वरितोत्गकक कहते थे। जो अपने-अपने अधिकार क्षेत्र के आय-व्यय का हिसाब रखते थे।

सैन्य शासन

चोल राजाओं ने एक विशाल संगठित सेना का निर्माण किया था। चोल शासन कुशल योद्धा थे और वे व्यक्तिगत रूप से युद्धों में भाग लिया करते थे।  अश्व, गज, रथ एवं पैदल सैनिकों के साथ एक अत्यंत शक्तिशाली नौ सेना थी। इसी नौ सेना की सहायता से उन्होंने श्रीविजय, सिंहल, मालदीप आदि दीपो की विजय की थी।

कुछ सैन्य दल नागरिक कार्यो में भाग लेते थे तथा मंदिरो आदि को दान किया करते थे। सैनिकों को वेतन में राजस्व का एक भाग या भूमि देने की प्रथा थी।

लेखों में बड़पेई (पैदल सैनिक), बिल्लिगल (धनुर्धारी सैनिक), कुडीरेइच्चेवगर (अश्वारोही सैनिक), आनैयाटक कुजीरमललर(गजसेना) आदि का उल्लेख मिला है।

न्याय प्रशासन

न्याय के लिए नियमित न्यायालयों का उल्लेख उनके लेखों में हुआ है जैसे – धर्मासन (राजा का न्यायालय) तथा धर्मासन भटट।

न्यायालय के पंडितो (न्यायाधीश) को धर्मभटट कहा जाता था। जिनके परामर्श से विवादों का निर्णय किया जाता था। दीवानी एवं फौजदारी मामलो में अंतर स्पष्ट नहीं है। नरवध तथा हत्या के लिए दंड व्यवस्था थी कि अपराधी पड़ोस के मंदिर में अखण्डदीप जलवाने का प्रबंध करे।

वस्तुतः यह एक प्रकार का प्रायश्चित था किन्तु मृत्युदंड दिये जाने के भी उदाहरण प्राप्त हुए है। राजद्रोह भयंकर अपराध था, जिसका निर्णय स्वंय राजा द्वारा किया जाता था। इसमें अपराधी को मृत्युदंड के साथ ही साथ उसकी संपत्ति भी जब्त कर लिया जाता था।

13 वीं सदी के चीनी लेखक चाऊ-जू-कुआ ने चोल दंड व्यवस्था के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान की है। ग्रामीण या स्थानीय स्वायत्तता चोलकालीन प्रशासन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता ग्रामीण स्तर पर स्थानीय शासन या स्वायत्तता की व्यवस्था थी।

चोलकालीन अभिलेखों की प्रचुरता के कारण हमें इस साम्राज्य के ग्राम प्रशासन की अधिक जानकारी प्राप्त है। इसके लिए विभिन्न गाँवो में स्थानीय प्रशासन का काम प्रतिनिधि संस्थाओ के माध्यम से संचालित होता था।

अभिलेखों में दो सभाओं का उल्लेख मिलता है – उर, सभा या महासभा।

उर गाँव की आम सभा थी। किसी भी गाँव के वयस्क, पुरुष करदाताओं के द्वारा उर या ग्राम या मेलग्राम का संचालन होता था। सभा या महासभा, अग्रहार कहे जाने वाले ब्राहाणों व गॉवो के वयस्क सदस्यों की सभा थी।

अग्रहार गाँवो में ब्राहाण लोग निवास करते थे और वहां की अधिकांश भूमि लगान मुक्त होती थी तथा इन्हें काफी स्वायत्तता मिली हुई थी। सभा या महासभा के कार्य संचालन के लिए समितियॉ होती थी। वे समितियाँ थी – वरियम और वरियार।

इन समितियों के प्रमुख कार्य होते थे-

  • करों की वसूली, करों को लगाना एवं माफ करना।
  • न्यायिक कार्य, शिक्षा एवं स्वास्थ्य की देखरेख।
  • कृषि का विकास एवं समुचित व्यवस्था करना।
  • मंदिरों की देखरेख इत्यादि।

ग्रामीण प्रतिनिधि सभाओं के अतिरिक्त नगरम नामक प्रतिनिधि सभा की भी चर्चा मिली है जो व्यापारियों के हितों और उनकी गतिविधियों की देख- रेख करती थी। ग्रामीण समिति के संचालन, सदस्यों का चुनाव एवं निष्कासन आदि की जानकारी उत्तरमेरूर के दो अभिलेखों से मिलती है जो क्रमश: 919 ई. एवं 921 ई. के है।

इन अभिलेखों से ज्ञात होता है कि इन सभाओं के प्रतिनिधियों का चुनाव प्रत्येक वर्ष किया जाता था एवं इसके अंतर्गत 1 / 3 सदस्य प्रत्येक वर्ष बदल दिये जाते थे जबकि सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्ष के लिए होता था। प्रत्येक गाँव को 30 वार्डो में बाँटा गया था। चुनाव लड़ने की निम्न योग्यता होनी चाहिए थी-

  • वह उस गाँव का निवासी हो जहाँ से चुनाव लड़ रहा हो।
  • 30 से 70 वर्ष तक उम्र तथा शिक्षित भी हो।
  • वह 1 / 4 वेलि भूमि का मालिक हो।
  • उसका अपना मकान हो।
  • वह वैदिक मंत्रो को ज्ञाता हो।

सदस्यों को कार्यकाल के दौरान हटाने का प्रावधान भी था-

  • यदि किसी सदस्य ने तीन वर्ष तक खर्च का लेखा-जोखा प्रस्तुत नहीं किया हो।
  • किसी अपराध में दोषी पाये जाने पर।
  • किसी भ्रष्टाचार मामलें में संलिप्त पाये जाने पर।

चुनाव किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव होती है। इसकी जानकारी चोल अभिलेखों से मिली है। आधुनिक चुनाव प्रक्रिया के समान ही ग्रामीण शासन के लिए चुनाव क्षेत्रों का विभाजन किया गया था। इतना ही नहीं चुनाव के लिए आवश्यक था, व्यक्ति उसी गाँव का निवासी हो अर्थात ऐसे व्यक्ति का चुनाव किया जाए जिसे स्थानीय परिसिथतियों की जानकारी हो।

सदस्यों को चुनाव लड़ने के लिए भी योग्यता का प्रावधान किया गया था। किसी भी शासन के कुशलतापूर्वक संचालन के लिए यह आवश्यक है कि योग्य एवं अनुभवी लोगों को शासन संचालन की जिम्मेदारी सौंपी जाय। इसके साथ ही यह भी जरुरी है कि अयोग्य लोगों को शासन से बाहर अर्थात भ्र्ष्ट एवं अपराधी लोगों को शासन संचालन से बाहर रखा जाय।

इस प्रकार ग्राम सभा प्रशासन की एक महत्वपूर्ण इकाई हुआ करती थी जो स्थानीय स्तर पर कार्यपालक, विधायी एवं न्यायिक प्रकृति को सम्पन्न करती थी। यदि ये संस्थाये अपने दायित्वों का निर्वहन ईमानदारीपूर्वक करती थी तो वह ग्राम सभाओं से परामर्श जरूर लेता रहा होगा।

आरंभ में ये सभाएं बहुत हद तक स्वायत्त थी लेकिन उत्तरकालीन चोलों के समय केन्द्रीय हस्तक्षेप बढ़ाता गया। सामान्यतः आपसी कलह , हिंसा एवं महत्वपूर्ण विवादों की स्थिति में राज्य हस्तक्षेप करता था। कई बार केन्द्रीय कर्मचारियों की उपस्थिति में ही ग्रामीण सभाओं के प्रस्ताव पारित किये जाते थे।

पल्लव वंश ( Pallava Dynasty )

दक्षिण भारत में कृष्णा और गोदावरी नदियों के बीच के प्रदेश में पल्लव वंश के राज्य की स्थापना हुई।  पल्लवों ने कांची या कांजीवरम को अपनी राजधानी बनाया। पल्लव वंश में अनेक राजा हुए। सिंह विष्णु इस राजवंश का संस्थापक था। इसे पोत्तरयण एवं अवनिसिंह भी कहा जाता है।

महेन्द्र वर्मन् प्रथम इस वंश का एक प्रसिद्ध शासक हुआ है जिसने 600 से 630 ई. तक राज्य किया। 

वह एक महान् निर्माता था और उसने विशाल चट्टानों को कटवाकर मन्दिर बनवाये।

उसने महेन्द्रवाड़ी के निकट महेन्द्र कुंड नामक जलाशय का निर्माण कराया।

नरसिंह वर्मा प्रथम- महेन्द्र वर्मन् प्रथम के पश्चात् उसका पुत्र नरसिंह वर्मन् प्रथम सिंहासन पर बैठा। उसने 630 से 668 ई. तक राज्य किया। वह पल्लव वंश का महान् शासक था। उसने काँची की ओर बढ़ते हुए पुलकेशिन द्वितीय के आक्रमण को विफल कर दिया।

उसने अपने सेनापति सिरू तोंड उपनाम परन्जोति के सेनापतित्व में एक विशाल सेना वातापी पर आक्रमण करने के लिए भेजी। इस सेना ने 642 ई. में चालुक्यों की राजधानी वातापी पर आक्रमण किया। पुलकेशिन द्वितीय अपनी राजधानी की रक्षा करते हुआ मारा गया।

वातापी पर नरसिंह वर्मन् प्रथम का अधिकार हो गया। इस विजय की यादगार में नरसिंह वर्मन् कोंड का विरुद धारण किया। चालुक्य साम्राज्य के दक्षिण भाग पर उसका अधिकार हो गया। इस प्रकार उसने अपने पिता की पराजय का बदला लिया।

फिर उसने वातापीकोंड की उपाधि ली। इसके पश्चात् नरसिंह वर्मम् प्रथम ने सिंहल (श्रीलंका) के राजसिंहासन के एक दावेदार मानवम्म की सहायता के लिए दो बार सिंहल-विजय के लिए सेना भेजी।

मानवम्म ने नरसिंह वर्मा प्रथम की उसके युद्धों में सहायता की थी और इसी सहायता के उपहार स्वरूप नरसिंह वर्मन् ने प्रथम मानवम्म को सिंहल का राजसिंहासन प्राप्त करने में सहायता दी। दूसरे अभियान में वर्मन् को सफलता मिली और उसने मानवम्म को सिंहल के सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर दिया।

नरसिंह वर्मन् एक महान् विजेता ही नहीं, एक महान् निर्माता भी था। त्रिचनापली जिले और पुड्डुकोट में अनेक मन्दिरों का निर्माण उसने कराया।  नरसिंह वर्मन प्रथम महामल्ल ने अपने नाम के अनुकूल महाबलिपुरम् अथवा महामल्लपुरम नामक नगर बसाया और धर्मराज रथ के मन्दिरों से सुशोभित किया।

उसके शासनकाल में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग 642 ई. के लगभग कांची आया। पल्लव राज्य और वहाँ के लोगों का वर्णन करता हुआ वह लिखता है- कांची 6 मील की परिधि में है। यहाँ 100 के लगभग बौद्ध मठ हैं जिसमें 10,000 भिक्षु रहते हैं। ये भिक्षु महायान सम्प्रदाय की स्थविर शाखा के अनुयायी हैं।

यहाँ 80 मन्दिर हैं जिनमें अधिकांश जैनियों के हैं- भूमि उर्वर है, नियम से जोती जाती है और प्रभूत अन्न उपजाती है। अनेक प्रकार के फल-फूल होते हैं। बहुमूल्य रत्न और अन्य वस्तुएं यहां उत्पन्न होती हैं। जलवायु उष्ण है और प्रजा साहसी है। लोग सच्चे और ईमानदार हैं। वे विद्या का बड़ा आदर करते हैं।

ह्वेनसांग के विवरण से यह जानकारी मिलती है कि तक्षशिला विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध विद्वान धर्मपाल कांची के ही निवासी थे।

महेन्द्र वर्मन् द्वितीय और परमेश्वर वर्मा प्रथम-

नरसिंह वर्मन् प्रथम के बाद उसका पुत्र महेन्द्र वर्मन् द्वितीय (668-670 ई.) और पौत्र परमेश्वर वर्मन् प्रथम (670-695 ई.) राजा बने। कोई विशेष घटना महेन्द्र वर्मन् के अल्प शासन-काल में नहीं घटी। उसकी मृत्यु के पश्चात् परमेश्वर वर्मन् प्रथम सिंहासनरूढ़ हुआ।

पल्लवों और चालुक्यों में संघर्ष परमेश्वर वर्मन् प्रथम के शासन-काल में चलता रहा। इस संघर्ष के बारे में दोनों पक्षों ने अलग-अलग दावे किये हैं। चालुक्य अभिलेखों के अनुसार चालुक्य नरेश विक्रमादित्य प्रथम ने कांची पर अधिकार कर लिया। परन्तु पल्लव अभिलेखों के अनुसार परमेश्वर वर्मन् प्रथम ने पेरूवलनल्लुर के युद्ध में विक्रमादित्य प्रथम की सेना को पराजित किया

इन परस्पर विरोधी प्रमाणों के आधार पर हम निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि किसी भी पक्ष को निर्णायक विजय प्राप्त नहीं हुई। परमेश्वर वर्मन् प्रथम शिव का उपासक था। अपने राज्य में उसने शिव मन्दिरों का निर्माण कराया।

नरसिंह वर्मन् द्वितीय और परमेश्वर वर्मन् द्वितीय-

परमेश्वर वर्मन् प्रथम के बाद उसका पुत्र नरसिंह वर्मन् द्वितीय (695-722 ई.) राजा बना। उसका शासन-काल शांतिमय था। निर्माण कार्य पर अपने शांतिमय शासन-काल में उसने जोर दिया। उसने कांची में कैलाशनाथ मन्दिर का निर्माण कराया। कांची में ही उसने ऐरावतेश्वर मन्दिर तथा महाबलिपुरम् में तथाकथित शोर मन्दिर का निर्माण कराया।

उसके अभिलेख इन मन्दिरों में उत्कीर्ण हैं। नरसिंह वर्मन् द्वितीय विद्वानों का आश्रयदाता था। उसने अनेक उपाधियाँ धारण की-जैसे राजसिंह, आगय प्रिय, शिव चूडामणि, शंकर भक्त तथा वाद्यविद्याधर। नरसिंह वर्मन् द्वितीय के बाद उसका पुत्र परमेश्वर वर्मन् द्वितीय (722-730 ई.) शासक बना। उसका चालुक्यों से युद्ध छिड़ गया।

नन्दी वर्मन् द्वितीय- पल्लव वंश का नन्दी वर्मन् द्वितीय महत्वपूर्ण शासक था।

वह 730 ई. में सिंहासन पर बैठा और उसने लगभग 65 वर्ष तक राज्य किया। उसके काल में चालुक्य-पल्लव संघर्ष तीव्र हो गया। 740 ई. में चालुक्य राजा विक्रमादित्य द्वितीय ने नन्दी वर्मन् द्वितीय को पराजित किया और कांची पर अधिकार कर लिया। लेकिन पल्लवों ने काँची पर पुन: अधिकार कर लिया। नन्दी वर्मन् द्वितीय को पाण्ड्यों और राष्ट्रकूटों से भी युद्ध करना पड़ा।

राष्ट्रकूट राजा दन्तिदुर्ग ने कांची पर अधिकार कर लिया, परन्तु बाद में दोनों में सन्धि हो गई और दन्तिदुर्ग ने अपनी पुत्री रेवा का विवाह नन्दी वर्मन् द्वितीय के साथ कर दिया। नंदीवर्मन् का शासन-काल यद्यपि संघर्षों, अभियानों, आक्रमणों में बिता था परन्तु उसने निर्माण कायों में भी रूचि ली।

उसने अपनी राजधानी कांची में मुक्तेश्वर ओर बैकुन्ठ-पेरूमल मन्दिरों का निर्माण कराया। नन्दी वर्मन् द्वितीय स्वयं विद्वान्, कवि और विद्वानों का आश्रयदाता था। उसके शासन-काल में प्रसिद्द विद्वान एवं वैष्णव संत त्रिरूमन्गईम अलवार हुए।

दन्तिवर्मन और उसके उत्तराधिकारी-

नंदी वर्मन द्वितीय के पश्चात् उका पुत्र दन्तिवर्मन राजा बना। यह उसकी राष्ट्रकूट रानी रेवा से उत्पन्न पुत्र था। इस विवाह के फलस्वरूप यद्यपि राष्ट्रकूटों और पल्लवों में सम्बन्ध स्थापित हो चुके थे, फिर भी ध्रुव, निरूपम तथा गोविन्द तृतीय नामक राष्ट्रकूट राजाओं ने कांची पर आक्रमण किये।

804 ई. के लगभग गोविन्द तृतीय ने कांची पर आक्रमण करके दन्ति वर्मन् को पराजित किया। दन्ति वर्मन् को पाण्ड्यों से भी युद्ध करना पड़ा। उसके उत्तराधिकारी नन्दी और नृपतुंगवर्मन को भी पाण्ड्यों से लोहा लेना पड़ा।

पल्लव राजाओं को चोलों से भी युद्ध करने पडे। 855 ई. के लगभग चोल राजा आदित्य प्रथम ने अन्तिम पल्लव राजा अपराजित वर्मन् को पराजित करके कांची पर अधिकार कर लिया और पल्लव राज्य का अन्त हो गया।

Other Ancient Dynasties ( अन्य प्राचीन राजवंश )

सिसोदिया

गेहलोत मांगलिया या सिसोदिया एक राजपूत राजवंश है, जिसका राजस्थान के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है। यह सूर्य वंशी राजपूत थे। सिसोदिया राजवंश में कई वीर शासक हुए हैं।’ गुहिल’ या ‘गेहलोत’ ‘गुहिलपुत्र’ शब्द का अपभ्रष्ट रूप है।

कुछ विद्वान उन्हें मूलत:ब्राह्मण मानते हैं, किंतु वे स्वयं अपने को सूर्यवंशी क्षत्रिय कहते हैं जिसकी पुष्टि पृथ्वीराज विजय काव्य से होती है। मेवाड़ के दक्षिणी-पश्चिमी भाग से उनके सबसे प्राचीन अभिलेख मिले है।

अत: वहीं से मेवाड़ के अन्य भागों में उनकी विस्तार हुआ होगा। गुह के बाद भोज, महेंद्रनाथ, शील ओर अपराजित गद्दी पर बैठे। कई विद्वान शील या शीलादित्य को ही बप्पा मानते हैं।

अपराजित के बाद महेंद्रभट और उसके बाद कालभोज राजा हुए। गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने काल भोज को चित्तौड़ दुर्ग का विजेता बप्पा माना है। किंतु यह निश्चित करना कठिन है कि वास्तव में बप्पा कौन था। कालभोज के पुत्र खोम्माण के समय अरब आक्रान्ता मेवाड़ तक पहुंचे।

अरब आक्रांताओं को पीछे हटाने वाले इन राजा को देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर ने बप्पा मानने का सुझाव दिया है। राजस्थान के दक्षिण – पश्चिम भाग पर गुहिलों का शाषन था। “नैणसी री ख्यात” में गुहिलों की 24 शाखाओं का वर्णन मिलता है जिनमें मेवाड़, बागड़ और प्रताप शाखा ज्यादा प्रसिद्ध हुई।

गुहिल राजवंश की स्थापना गुहिल ने 566 ई० में की। गुहिल के वंशज नागादित्य को 727 ई० में भीलों ने मार डाला। “रावल राजवंश का संस्थापक।” नागादित्य के पुत्र कालभोज ने 727 ई० में गुहिल राजवंश की कमान संभाली।

बप्पा रावल उसकी उपाधि थी। इसकी तिन उपादिऔर हे हिन्दू सूर्य,राज गुरु,चकव

समर सिंह का एकपुत्र रतन सिंह मेवाड राज्य का उत्तराधिकारी हुआ और दूसरा पुत्र कुम्भकरण नेपाल चला गया। नेपाल के राज वंश के शासक कुम्भकरण के ही वंशज हैं।

मालवा के परमार

परमार वंश का संस्थापक उपेंद्र (कृष्णराज) था इस वंश का प्रथम स्वतंत्र शासक सियक हर्ष (श्रीहर्ष ) था  हर्ष ने महामांडलिक चूड़ामणि महाराजाधिराज की उपाधि धारण की परमारों की प्रारंभिक राजधानी उज्जैन थी कालांतर में धार ( भोज द्वारा) राजधानी बनी

सीयक के पुत्र मंजू व सिंधुराज थे, राजा मुंज (वाक्पति मुंज)सीयक का दत्तक पुत्र-उत्पल राज के नाम से भी प्रसिद्ध है मुंज ने राष्ट्रकूटों की तरह श्रीवल्लभ व अमोघवर्ष की उपाधि धारण की

राजा सिंधुराज

नवसाहसांकचरित के रचयिता पद्मगुप्त सिंधुराज के दरबारी कवि थे  राजा भोज प्रथम सिंधुराज का पुत्र इस वंश का सबसे महत्वपूर्ण शासक अपनी विद्वता के कारण कविराज नाम से प्रसिद्ध

भोज चिकित्सा शास्त्र ,खगोल शास्त्र ,धर्म ,व्याकरण ,स्थापत्य शास्त्र आदि पर लगभग 23 ग्रंथ लिखे

समरांगण सूत्रधार, सरस्वती कंठाभरण ,आयुर्वेद सर्वस्व, व्यवहार समुच्चय, नाममालिका आदि प्रमुख रचनाएं है

भोज ने एक सरस्वती मंदिर (भोजशाला) एवं संस्कृत विश्वविद्यालय बनवाया,

भोज ने चालुक्य नरेश विक्रमादित्य चतुर्थ को पराजित किया कलचुरी नरेश गांगेयदेव को हराकर कान्यकुब्ज पर अधिकार किया

विल्हण विक्रमांकदेवचरित में उल्लेख किया कि चालुक्य राजा सोमेश्वर द्वितीय ने भोज को हराकर राजधानी धार को तहस-नहस किया भोजपुर शहर की स्थापना की उदयपुर प्रशस्ति में भोज को पृथ्वी का अधिकारी कहा गया है

भोज का सेनापति जैन कुल चंद्र था, भोजेश्वर मंदिर मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में भोजपुर में बेतवा नदी के किनारे बनवाया शिव मंदिर यहां 22 फीट ऊंचा शिवलिंग है जो दुनिया का सबसे ऊंचा और विशालतम शिवलिंग है भोजेश्वर मंदिर को पूर्व का सोमनाथ भी कहते हैं

पार्वती की गुफा भोजेश्वर मंदिर के पश्चिम की तरफ चट्टान को काटकर बनाई गई, आचार्य मानतुंग की समाधि भोजपुर में जैन आचार्य मानतुंग की समाधि है आचार्य मानतुंग ने राजा भोज के समय भक्तामर स्त्रोत की रचना की

माल्हकदेव अंतिम परमार शासक थे जिन्हें अलाउद्दीन खिलजी ने हराकर मालवा को दिल्ली सल्तनत में मिला दिया, मुंज ने मुंजसागर तालाब बनवाया था, मुंज ने चालुक्य शासक तैलप द्वितीय को 6 बार पराजित किया लेकिन सातवीं बार युद्ध में पराजित हुआ और मारा गया

परमारों की कई शाखाएं राजपूताना में शासन कर रही थी जिनमें प्रमुख है

  • आबू (चंद्रावती व अर्बुद) के परमार
  • बागड़ (बांसवाड़ा) के परमार
  • जालौर (जाबालि )के परमार
  • किराडू के परमार

ऐतिहासिक स्त्रोत

मालवा के परमार वंश के इतिहास की जानकारी निम्न स्रोतों से मिलती है

  • पदमा गुप्त का नवसाहसांकचरित
  • मेरुतुंग की प्रबंध चिंतामणि
  • उदय दित्य की उदयपुर प्रशस्ति, उदयेश्वर मंदिर ,विदिशा ,मध्य प्रदेश
  • लक्ष्मणदेव की नागपुर प्रशस्ति
  • चिंतामणि सारकिका दशा वाला
  • भोज के बांसवाड़ा व बेतवा अभिलेख
  • भोजप्रबंध – बल्लाल

10 वीं शताब्दी के गणितज्ञ हलायुध इन्हीं के दरबार में थे हलायुध मृतसंजीवनी की रचना की

  • आबू के परमार
  • संस्थापक धूम राज
  • परंतु इस वंश की वंशावली उत्पल राज से प्रारंभ होती है
  • राजधानी चंद्रावती थी

इस वंश में सिंधुराज प्रतापी शासक हुआ जो मरू मंडल का महाराजा कहलाता था 1002 के दान पात्र से पता चलता है कि आबू पर धरनीवराह का अधिकार हो गया धंधुक परवर्ती काल में यहां परमार शासक धंधुक गुजरात के सोलंकी शासक भीमदेव से युद्ध हुआ जिसमें विमल शाह (भीमदेव का दंड पति ) ने दोनों के मध्य समझौता करवाया उसके बाद भीमदेव ने विमल शाह को आबू का दंड पति नियुक्त कर दिया

विमल शाह ने वहां रहते हुए 1031 में देलवाड़ा के प्रसिद्ध विमलशाही मंदिर (भगवान आदिनाथ का जैन मंदिर) का निर्माण करवाया धारा वर्ष आबू के परमारो में धारा वर्ष सर्वाधिक प्रतापी शासक था  धारावर्ष के छोटे भाई प्रहलादन ने पालनपुर नगर बसाया तथा पार्थ पराक्रम व्यायोग नामक नाटक की रचना की

कीर्ति कौमुदी ग्रंथ की रचना धारावर्ष के कवि सोमेश्वर ने की धारावर्ष का पुत्र व उत्तराधिकारी सोमसिंह का सोलंकियों के साथ युद्ध हुआ सोमसिहं के मंत्री तेजपाल ने देलवाड़ा में भगवान नेमिनाथ का जैन मंदिर बनाया जिसे लूणवशाही मंदिर या वास्तुपाल – तेजपाल मंदिर कहते हैं

1311 ईस्वी के आसपास जालोर के चौहान शासक राव लुंबा ने परमारों से चंद्रावती छीन ली तभी से आबू से परमाणु का शासन समाप्त हो गया बागड़ के परमार राजस्थान के दक्षिणी भाग को वागड़ कहते हैं दसवीं से बारहवीं सदी में परमारों का शासन विद्यमान था इसकी राजधानी आरथुना थी

इस वंश के शासकों में धनिक कंक देव, सत्यराज ,मंडलिक, चामुंड राज ,विजय राज प्रमुख शासक इस शाखा का अंतिम शासक संभवता विजय राज था 1178 में गुहिल सामंत सिंह ने बागड़ पर पर अधिकार कर परमारों के शासन का अंत कर दिया

सोलंकी वंश 

गुजरात में अन्हिलवाड (पाटन) नामक स्थान पर पहले प्रतिहार साम्राज्य का अधिकार था, परन्तु राजनैतिक प्रभुता के लिए राष्ट्रकूटों और प्रतिहारों में जो पारस्परिक संघर्ष हुआ उससे लाभ उठाकर मूलराज-प्रथम ने दसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में (942 ई.) अपना एक स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिया और अन्हिलवाड को अपने राज्य की राजधानी बनाया।

मूलराज सोलंकी-

 मूलराज सोलंकी ने अपने एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना कर लेने के बाद इसकी सीमाओं के विस्तार का भी प्रयत्न किया।उसने शीघ्र ही कच्छ देश और सोराष्ट्र के पूर्वी भाग पर अपना अधिकार जमा लिया।

परन्तु उसे अपने प्रबल पड़ोसियों की शक्ति का भी सामना करना पड़ा। उसने कई आक्रमणों का सामना किया और अधिकतर में उसे पराजय ही प्राप्त हुई फिर भी उसने अपने राजकुल का, जिसका कि वह स्वयं प्रतिष्ठापक था, नाश नहीं होने दिया।

उसकी मृत्यु के समय सोलंकियों का राज्य पूर्व और दक्षिण में साबरमती तक फैला हुआ था। जोधपुर राज्य का संचार भी उत्तर में इसमें सम्मिलित था। मूलराज की मृत्यु रणस्थल में विग्रहराज-द्वितीय के हाथों से हुई। मूलराज के पुत्र चामुण्डराज ने धारा नगरी के परमार नरेश सिन्धुराज को पराजित किया। चामुण्डराज का पौत्र भीमदेव-प्रथम (1022) सोलंकी राजकुल का एक विख्यात नरेश था।

भीमदेव-प्रथम- 

भीमदेव-प्रथम के शासन-काल के प्रारम्भिक वर्षों में महमूद ने उसके राज्य पर आक्रमण किया था।  भीम ने उसके आक्रमण का मुकाबला करने का निश्चय किया। परन्तु एकाएक उसके ऊपर मुस्लिम आक्रमणकारी का आतंक छा गया और वह रणभूमि छोड़कर भाग गया।

महमूद ने सोमनाथ के मन्दिर को खूब लूटा-खसोटा और वह अतुल सम्पत्ति लादकर अपने देश ले गया। महमूद द्वारा भगवान सोमनाथ के मन्दिर के तुड़वा दिये जाने पर भीमदेव ने उसका पुनर्निर्माण कराया। महमूद के लौट जाने पर भीमदेव ने फिर से अपनी शक्ति का संगठन किया। पहले उसने आबू के परमार राजा को हराया।

भीम ने परमार-नरेश के पतन में अपना योगदान दिया। इस कार्य में भीम ने लक्ष्मीकर्ण कलचुरि से सहायता प्राप्त की थी परन्तु उन दोनों की मैत्री अधिक समय तक टिक न सकी। दोनों में परस्पर लड़ाई छिड़ गई जिसमें लक्ष्मीकर्ण की हार हो गई।

माना जाता है कि भीम प्रथम ने भीमेश्वर देव तथा मट्टारिका के मंदिरों का निर्माण करवाया। उसके सेनानायक विमल ने माउंट आबू पर एक प्रसिद्ध जैन मंदिर का निर्माण करवाया। यह विमल वसही के नाम से जाना जाता है।

भीमदेव के उपरान्त कर्णदेव हलवाड के राजसिंहासन पर समासीन हुआ। कर्ण ने 1064 से लेकर 1094 तक शासन किया। कर्ण का शासन-काल शान्तिपूर्ण कार्यों के लिए विख्यात है। उसने अनेक मन्दिरों (कर्णेश्वर मंदिर) का निर्माण कराया, उसके समय में उसके ही नाम से एक नगर की स्थापना की गई।

उसने कवि विल्हण को राजाश्रय प्रदान किया। कर्ण को परमार राजा उदयादित्य ने युद्ध में पराजित किया। कर्ण ने कर्ण सागर झील का भी निर्माण करवाया था।

जयसिंह सिद्धराज-

 कर्ण का पुत्र जयसिंह सिद्धराज अपने वंश का प्रतापी और विख्यात राजा था। अपनी रणवाहिनी को उसने चारों दिशाओं में घुमाया और लगभग सर्वत्र विजय पायी। अपनी विजयों से उसने अपने पड़ोसियों को आतंकित कर दिया। उसने सोराष्ट्र के आभीर सरदार को युद्ध में पराजित करके उस राज्य को अपने साम्राज्य में मिला लिया।

जयसिंह ने बारह वर्षों तक मालवा से युद्ध किया और नरवर्मन तथा यशोवर्मन दोनों को सिंहासन-च्युत् करके उनके राज्य पर अधिकार कर लिया।

नद्दुल और शाकम्भरी दोनों स्थानों के चाहमान नरेशों ने उसके आगे आत्म-समर्पण कर दिया और उसके सामन्त के रूप में अपने राज्यों का शासन करते रहे।

जयसिंह ने यशकर्ण कलचुरि और गोविन्दचन्द्र गहड़वाल से मैत्री-सम्बन्ध स्थापित किया। 

उसने चन्देल राज्य पर भी आक्रमण किया और कालिंजर तथा महोबा तक आगे बढ़ गया।

 चन्देल नरेश मदनवर्मन को बाध्य होकर जयसिंह के साथ सन्धि करनी पड़ी और इस सन्धि के फलस्वरूप उसने सोलंकी राज्य को भिलसा का प्रदेश दिया।

जयसिंह ने चालुक्य नृपति विक्रमादित्य-षष्ठ पर भी विजय प्राप्त की। कहा जाता है कि सिन्ध के अरबों के विरुद्ध युद्ध में भी जयसिंह को सफलता प्राप्त हुई थी। 

उसके अभिलेखों के प्राप्ति-स्थानों से विदित होता है कि गुजरात, काठियावाड, कच्छ, मालवा और दक्षिणी राजपूताना उसके राज्य में सम्मिलित थे।

जयसिंह ने 1113-14 ई. में एक नया सम्वत् चलाया। राजा भोज की भांति यद्यपि सोलंकी नरेश जयसिंह का भी समय अधिकतर युद्ध में व्यतीत हुआ

तथापि भोज की ही तरह उसने भी विद्या को प्रश्रय प्रदान किया।

ज्योतिष, न्याय और पुराण के अध्ययन के लिए जयसिंह ने शिक्षण संस्थायें खुलवाई। उसकी राजसभा में प्रसिद्ध जैन लेखक महापण्डित हेमचन्द्र रहते थे जिनके अनेक ग्रन्थ, उनके मस्तिष्क और विचार-शक्ति की उर्वरता को व्यक्त करते हैं।

जयसिंह स्वयं कट्टर शैव था, परन्तु उसका धार्मिक दृष्टिकोण राजा भोज की भांति जिज्ञासा-प्रधान था। जयसिंह विभिन्न धमाँ के आचायों के बीच धार्मिक विषयों पर विचार-विमर्श के लिए सम्मेलनों का आयोजन करता था। अकबर की धार्मिक विचारधारा का यह पुर्वाभास था।

जयसिंह ने अपने राज्य में अनेक मन्दिरों का निर्माण कराया। स्वयं शैव होते हुए भी उसने जैन पण्डित हेमचन्द्र को अपनी राजसभा में स्थान दिया। जयसिंह ने अवन्तिनाथ और सिद्धराज विरुद धारण किये। उसने सिद्धपुर में रूद्रमहाकाल मंदिर बनवाया। लगभग 1143 ई. में जयसिंह का देहान्त हो गया।

कुमारपाल- 

जयसिंह के उपरान्त उसके दूर के एक सम्बन्धी कुमारपाल ने उसके राज्य पर अधिकार कर लिया, क्योंकि जयसिंह के कोई पुत्र नहीं था। शाकम्भरी के चाहमानों को कुमारपाल ने पराजित किया और आबू के परमारों को दबाया। कोंकण के राजा मल्लिकार्जुन को भी उसने हराया था।

कुमारपाल का नाम जैन धर्म के इतिहास में काफी प्रसिद्ध है जैन ग्रन्थों में लिखा है कि आचार्य हेमचन्द्र के सशक्त धर्म-निरूपण से प्रभावित होकर कुमारपाल ने जैन मत ग्रहण कर लिया। उसने अपने राज्य भर में अहिंसा के सिद्धान्तों के परिपालन के लिए कठोर आज्ञायें निकलवा दीं। उसने ब्राह्मणों को इस बात के लिए बाध्य किया कि वे पशुबलि-प्रधान यज्ञों का परित्याग कर दें।

राज्य भर में कुमारपाल ने कसाइयों की दुकानों पर ताला लगवा दिया। संन्यासियों को मृगचर्म मिलना बन्द हो गया क्योंकि पशुओं का आखेट करना राजकीय कानून की दृष्टि से अवैध ठहरा दिया गया था। गिरनार पर्वत के निकट शिकारियों के समुदाय भूखों मरने लगे। राज्य भर में मनोरंजन के लिए पशुओं की लड़ाइयों को निषिद्ध ठहरा दिया गया।

जुआ और सुरा-सेवन पर कठोर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। जैन ग्रन्थों में कुमारपाल के अहिंसापालन-सम्बन्धी आदेशों के विषय में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। फिर भी उसके जैन मतानुयायी होने में संदेह का कोई कारण नहीं दिखलाई पड़ता।

जैन धर्म का अनुयायी होने पर भी कुमारपाल ने अपने पूर्वजों की शिवोपासना-सम्बन्धी मनोवृत्ति का त्याग नहीं किया। उसने सोमनाथ के प्रसिद्ध मन्दिर का जीर्णोद्धार कराया। उत्कीर्ण लेखों में कुमारपाल को शैव कहा गया है। 1171 ई. में कुमारपाल का देहान्त हो गया।

अजयपाल- कुमारपाल के बाद अजयपाल गुजरात का शासक हुआ जिसने अपने राज्य में जैन मत के विरुद्ध एक प्रतिक्रियात्मक नीति का प्रचार किया। उसने जैन मन्दिर को विध्वस्त कराना शुरू किया। कहा जाता है कि उसने महापण्डित हेमचन्द्र के प्रिय शिष्य और प्रसिद्ध जैन लेखक रामचन्द्र का वध करा दिया था।

किन्तु उसकी इस धार्मिक असहिष्णुता और संकीर्णता का प्रभाव अच्छा नहीं पड़ा। 1176 ई. में प्रतिहार नरेश वयजलदेव ने अजयपाल की हत्या कर दी। अजयपाल के पश्चात् मूलराज-द्वितीय ने कुछ समय तक शासन किया।

भीमदेव द्वितीय – 

1178 ई. में भीमदेव-द्वितीय राजा हुआ जिसने राज्यारोहण के वर्ष ही गोर के मुहम्मद को युद्ध में हराया। सन् 1195 में भीमदेव-द्वितीय ने कुतुबुद्दीन ऐबक से युद्ध किया और उसे इतनी गहरी पराजय दी कि मुस्लिम सेनानायक को अजमेर तक पीछे धकेल दिया।

परन्तु दूसरे वर्ष (1197 ई.) में अन्हिलवाड़ा पर मुसलमानों का अधिकार हो गया। किन्तु कुतुबुद्दीन का गुजरात पर स्थायी रूप से अधिकार नहीं स्थापित हो सका। भीमदेव-द्वितीय ने एक लम्बे समय, लगभग साठ वर्षों तक शासन किया।

मुसलमानों के जो आक्रमण उसके समय में हुए उससे उसके राज्य की स्थिति काफी डावांडोल हो गई और प्रान्तीय शासकों ने अपनी स्वतन्त्रता घोषित करने का अवसर ताकना आरम्भ किया।

अन्हिलवाड़ के राज्य की स्थिति इस समय इतनी गिरी हुई थी कि इसका शीघ्र विनष्ट हो जाना अवश्यवम्भावी प्रतीत हो रहा था। राज्य के बड़े-बड़े अधिकारियों और कुछ मन्त्रियों की नीयत भी दूषित हो गई।

परन्तु अर्णोराज नामक एक बघेल ने राज्य को पूर्ण विनाश से बचा लिया। उसके सुयोग्य पुत्र लवण प्रसाद ने अपने पिता के नाम को जारी रखा और शासन-संचालन का सारा कार्य अपने ही कन्धों पर वहन किया। उसने आन्तरिक विद्रोहों से राज्य की रक्षा की और बाहरी आक्रमणों का सफलतापूर्वक सामना किया।

इस प्रकार अन्हिलवाड का राज्य अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा करता हुआ अलाउद्दीन खिलजी के पूर्व तक बना रहा। तेरहवीं शताब्दी के अन्त में इस महत्त्वाकांक्षी मुस्लिम शासक ने अपने दो सेनापतियों उलुग खां और नुसरत खां की अध्यक्षता में एक विशाल सेना भेजी जिसे देखकर कर्ण, जो इस समय का शासक था, भाग गया।

गुजरात के राज्य पर मुसलमानों का अधिकार हो गया। जैन आचार्य मेरुतुंग के ग्रन्थ प्रबोधचिन्तामणि से गुजरात के प्राचीन इतिहास के विषय में काफी महत्त्वपूर्ण सूचनायें प्राप्त होती हैं।

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September 10, 2020

प्राचीनकालीन कला व संस्कृति Ancient Art Culture

प्राचीनकालीन कला व संस्कृति

भारतीय कला का इतिहास अत्यंत प्राचीन है । प्रागतिहासिक काल में मानव ने जंगली जानवरों बारहसिंघा, भालू , हाथी, आदि के चित्र बनाना सीख लिया था । महाराष्ट में स्थित कुछ गुफाओं में प्रागतिहासिक काल के जानवरों के चित्र बनाए हुए है, जिसका वह शिकार करता था ।

अनेक स्थानो पर मानव की कला के प्रमाण प्राप्त हुए हैं । इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय कला आदिकालीन है । यह परम्परा का प्रेम भारतीय संस्कृति सभ्यता का उन्नति का कारण है ।

वैदिक साहित्य

चारों वर्णों के कर्तव्यों का सर्वप्रथम वर्णन ऐतेरेय ब्राह्मण में मिलता है। छांदोग्य उपनिषद में ‘इतिहास पुराण’ को पंचमवेद कहा गया है याज्ञवल्क्य -गार्गी संवाद का उल्लेख वृहदारण्यक उपनिषद में मिलता है।

यम -नचिकेता की कहानी( कथा) कठोपनिषद में है । यह कृष्ण यजुर्वेद की कठशाखा का उपनिषद है। तैतीरिय ब्राह्मण ग्रंथ के अनुसार ब्राह्मण सूत का, क्षेत्रीय सन का और वैश्य ऊन का यज्ञोपवीत धारण करते थे।

पुनर्जन्म का सिद्धांत सर्वप्रथम शतपथ ब्राह्मण में मिलता है। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार राजा को प्रजा का अनुमोदन होना चाहिए । शतपथ ब्राह्मण में कुलाल चक्र (कुम्हार का चक्र) का उल्लेख है। अथर्ववेद का पृथ्वी सूक्त वैदिक राष्ट्रीय गीत माना जाता है।

विदुषी लोपामुद्रा अगस्त्य ऋषि की पत्नी थी। लोपमुद्रा ने कई वैदिक ऋचाओं की रचना की । याज्ञवल्क्य की दो पत्नियां मैत्रेयी और कात्यायनी थी। वृहदारण्यक उपनिषद् सबसे बड़ा उपनिषद है। इसके प्रधान प्रवक्ता महर्षि याज्ञवल्क्य है जो आरुणि उद्दालक के शिष्य थे ।

श्वेताश्वर उपनिषद रूद्र देवता को समर्पित है। इसमें रुद्र के परवर्ती नाम शिव का उल्लेख हुआ है।इस काल का सबसे बड़ा लौह पुंज अंतरजीखेड़ा में मिला है ,उत्तर वैदिक भारत की प्राचीन लौह युगीन बस्तियां वैदिक कालीन चित्रित घूसर मृदभांड से संबद्ध है ।

गोपथ ब्राह्मण की रचना ब्राह्मण ग्रंथों में सबसे अंत में हुई। अंबिका का रूद्र की बहन के रूप में उल्लेख तैतिरिय ब्राह्मण व शतपथ ब्राह्मण में हुआ है। श्राद्ध प्रथा की शुरुआत दत्तात्रेय ऋषि के बेटे निमि ने की। शल्यक्रिया का उल्लेख अथर्ववेद में मिलता है।

भारत का राष्ट्रीय वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ मुंडक उपनिषद से लिया गया है। जबकि शून्य का उल्लेख यजुर्वेद में है। शतपथ ब्राह्मण में रेवा ( नर्मदा) सदानीरा ( गंडक) नदी तक आर्य सभ्यता के विस्तार का उल्लेख मिलता है। मगध व अंग महाजनपदों का प्राचीनतम उल्लेख अथर्ववेद में मिलता है

‘निरवसित’ एवं अनिरवसित (वर्जित एवं अवर्जित) शूद्रों का उल्लेख पाणिनी की अष्टाधायी में लिखा है।  ग्रह सूत्रों में सर्वप्रथम संस्कारों का विवेचन मिलता है। संस्कारों का प्रचलन वैदिक काल से हुआ किंतु वैदिक साहित्य में इसका वर्णन नहीं मिलता है।

गौतम धर्म सूत्रों में संस्कारों की संख्या 40 दी है तथा वैखानस धर्मसूत्र में 18 संस्कार बताए गए हैं। परंतु प्राय सभी धर्मशास्त्रकार संस्कारों की संख्या 16 मानते हैं।

विविध आयाम स्थापत्य :-

सिन्धु सभ्यता की स्थापत्य कला :-

प्राचीन भारत की दृष्टि से हड़प्पा सभ्यता की कला अत्यंत प्राचीन है । हड़प्पा सभ्यता के निर्माता नगर और भवन निर्माण कला में दक्ष थे  मोहनजोदडो में एक सार्वजनिक भवन एवम विशाल स्नानाघर के अवशेष प्राप्त हुए हैं, जिनसे हड़प्पा स्थापत्य कला पर प्रकाश पड़ता है।

शिक्षा, भाषा और साहित्य

मौर्य काल में शिक्षा, भाषा और साहित्य के क्षेत्र में अच्छी उन्नति हुई। मौर्य कालीन शासकों के संरक्षण में शिक्षा की उन्नति को अनुकूल अवसर मिला। तक्षशिला उच्च शिक्षा का सुविख्यात केन्द्र था। यहाँ दूर-दूर के देशों से विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने के लिए आते थे।

कौशलराज प्रसेनजित् तक्षशिला के विद्यार्थी के रूप में रह चुका था। सम्राट् बिम्बिसार का राजवैद्य जीवन तक्षशिला का ही आचार्य था। चन्द्रगुप्त मौर्य कुछ समय तक तक्षशिला में आचार्य चाणक्य का शिष्य बनकर रह चुका था। इसी प्रकार अनेक राजकुमार तक्षशिला में अध्ययन किया करते थे।

तक्षशिला के आचार्य अपने ज्ञान के लिए सुविश्रुत थे। तक्षशिला में तीनों वेद, अष्टादश दिया, विविध शिल्य, धनुर्विद्या, हस्ति विद्या, मंत्र विद्या, चिकित्सा शास्त्र आदि की शिक्षा दी जाती थी। मौर्य काल में तक्षशिला जैसे उच्च शिक्षा- केन्द्रों के अतिरिक्त गुरुकुलों, मठों तथा विहारों में शिक्षा दी जाती थी। राजगृह, वैशाली, श्रावस्ती, कपिलवस्तु आदि नगर शिक्षा के सुविख्यात केन्द्र थे।

इन शिक्षा केन्द्रों को राज्य की ओर से आर्थिक सहायता मिलती थी। इसके अतिरिक्त अनेक आचार्य, पुरोहित तथा श्रोत्रिय आदि व्यक्तिगत रूप से शिक्षा दिया करते थे।

शिक्षा केन्द्रों या विद्यापीठों में दो प्रकार के अन्तेवासी आचार्य से शिक्षा ग्रहण करते थे- पहले धम्मनतेवासिक जो दिन में आचार्य का काम करते थे और रात्रि में शिक्षा ग्रहण करते थे, दूसरे आचारिय भागदायक जो आचार्य के निवास में रह कर उसके ज्येष्ठ पुत्र की तरह शिक्षा प्राप्त करते थे।ये अपना सारा समय ज्ञानार्जन में लगाते थे।

मौर्य-शासन काल में शिक्षा की स्थिति पर विचार करते हुए डॉ. वी.ए. स्मिथ ने लिखा है- अशोक के समय बौद्ध जनसंख्या का पढ़ा-लिखा प्रतिशत अंग्रेजी भारत के कई प्रान्तों के शिक्षित लोगों के प्रतिशत से अधिक था। मौर्य काल में तीन भाषाओं का प्रचलन था- संस्कृत, प्राकृत और पालि।

पालि एक प्रकार की जन भाषा थी। अशोक ने पालि को सम्पूर्ण साम्राज्य की राजभाषा बनाया और इसी भाषा में अपने अभिलेख उत्कीर्ण कराए। इस युग में इन तीनों भाषाओं में श्रेष्ठ साहित्य की रचना हुई।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र, भद्रबाहु का कल्पसूत्र तथा बौद्ध ग्रन्थ मंजू श्री मूल कल्प मौर्यकालीन साहित्य की अनुपम कृतियाँ हैं।

पतंजलि का महाभाष्य, वृहत्कथा का संस्कृत संस्करण, हरिषेण का जैन वृहत्कथा कोष तथा अभिनव गुप्त की नाट्य शास्त्र की रचनाएँ हैं।समाति, यवकृत, प्रियंसु, सुमनोत्तरा, भीमरथ, वारुवदत्ता तथा देवासुर आदि की सुविश्रुत रचनाएँ इसी युग की हैं।

धार्मिक साहित्य के क्षेत्र में भी इस युग महत्त्वपूर्ण रचनाओं का प्रण्यन हुआ। प्रसिद्ध जैन आचार्य भद्रबाहु ने नियुक्ति (प्रारम्भिक धर्म ग्रन्थ) पर एक भाष्य लिखा। जैन धर्म के प्रसिद्ध लेखक जम्बू स्वामी, प्रभव और स्वयम्भव की रचनाएँ इसी युग में लिखी गई।

आचारांग सूत्र समवायांग सूत्र, प्रश्न-व्याकरण आदि इसी युग की रचनाएँ हैं। बौद्ध साहित्य में त्रिपिटको का प्रणयन इसी युग में हुआ। वैदिक साहित्य के अन्तर्गत आने वाली कई रचनाएँ इसी युग की हैं।

मौर्य कला

कला एवं संस्कृति का मौर्य काल में चहुंमुखी विकास हुआ। एक राष्ट्र में शान्ति एवं जनता के सुखमय वैभवपूर्ण जीवन को कला एवं साहित्यिक विकास के लिए उपयुक्त माना गया है। फलत: हम इस काल में दोनों क्षेत्रों में अद्भुत उन्नति पाते हैं।

कुछ दृष्टियों से तो यह भी कहा जा सकता है कि इस काल में भारत कला-क्षेत्र में अपनी चरम सीमा तक पहुँच गया था। मौर्यकालीन कला को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है- दरबारी कला और लोकप्रिय कला।

दरबारी कला स्तम्भों और उनके शीर्षों में अभिव्यक्त हुई। पाटलिपुत्र में कुम्हार से एक राजप्रासाद का अवशेष प्राप्त हुआ है। ऐरियन ने इसे सुसा (मेसोपोटामिया) और एकबतना के राजप्रासादों से श्रेष्ठ माना है।

स्तम्भों को औपदार बनाया गया एवं निपुणता से काटा गया है। राजाश्रित कला की प्रेरणा का स्रोत स्वयं सम्राट् था। अशोक के युग के कला अवशेष अभिलेखों के साथ मिलते हैं। अभिलेख पुण्य स्थलों में या नगरों के निकट स्थापित किए गए। सबसे अधिक बहुलता से प्राप्त अवशेष स्तम्भों के पशुशीर्ष हैं।

स्तम्भ सामान्यतः एक प्रस्तर खण्ड से काटा जाता था। स्तम्भ लेख एक महत्त्वपूर्ण स्थान के साथ जोड़ते हुए उत्कीर्ण करवाये गये जो स्थल पवित्र माने जाते थे।

फाह्यान (399-413 ई.) ने अशोक के छः स्तम्भ एवं ह्वेनसांग (629-645 ई.) ने बारह स्तम्भों को देखा था। उनमें से कुछ स्तम्भ नष्ट हो गये हैं। ये स्तम्भ संकिसा, निग्लीव, लुम्बिनी, सारनाथ, बसरा-बीसरा (वैशाली), साँची, आदि स्थानों से प्राप्त हुए हैं।

इनकी संख्या बीस से अधिक कही गई है। इन्हें चुनार (बनारस के निकट) के बलुआ पत्थर से गढ़ा गया। चुनार की खानों से प्राप्त पाण्डुरंग के सूक्ष्म दानेदार कडे पत्थर पर अधिकांशत: छोटी-छोटी काली चित्तियाँ हैं।

जॉन मार्शल तथा पसीं ब्राउन जैसे विद्वानों ने अशोक के स्तम्भों को ईरानी स्तम्भों की अनुकृति बताया है परन्तु यह उपयुक्त नहीं लगता क्योंकि हमें ईरानी तथा अशोक के स्तम्भ में कई मूलभूत अन्तर दिखायी देते हैं।

इनमें कुछ इस प्रकार हैं-

  • (1) अशोक के स्तम्भ एकाश्म अर्थात् एक ही पत्थर से तराशकर बनाए गए हैं। इनके विपरीत ईरानी स्तम्भों को कई मण्डलकार टुकड़ों को जोड़कर बनाया जाता है।
  • (2) ईरानी स्तम्भ विशाल भवनों में लगाए गए थे। इसके विपरीत अशोक के स्तम्भ स्वतंत्र रूप से विकसित हुए हैं।
  • (3) अशोक के स्तम्भ बिना चौकी या आधार के भूमि पर टिकाए गए हैं जबकि ईरानी स्तम्भों को चौकी पर टिकाया गये है।
  • (4) अशोक के स्तम्भों के शीर्ष पर पशुओं की आकृतियाँ हैं, जबकि ईरानी स्तंभों पर मानव आकृतियाँ हैं।
  • (5) ईरानी स्तम्भ गराड़ीदार हैं किन्तु अशोक के स्तम्भ सपाट हैं।
  • (6) अशोक के स्तम्भ नीचे से ऊपर क्रमशः पतले होते हैं, जबकि ईरानी स्तंभों की चौड़ाई नीचे से ऊपर तक एक ही है।

इनमें से प्रत्येक स्तम्भ के मूलतः दो भाग हैं- स्थूण एवं शीर्ष। स्थूण एक पत्थर के टुकड़े (एक प्रास्तरिक) के बने हुए हैं और उन पर ऐसी सुन्दर ओप है कि आज भी लोगों को उसके धातु के बने होने का भ्रम होता है।

मौर्य कालीन स्तम्भों को कलामर्मज्ञों ने एकाश्म (एक पत्थर से निर्मित) कहा है परन्तु इन्हें दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। नीचे का लाट (यष्टि) एवं ऊपरी भाग को शीर्ष जो लाट की चोटी पर स्थापित रहता है। लाट एक शुंडाकार दण्ड है जिसकी लम्बाई चालीस से पचास फीट तक है।

शीर्ष को कला की दृष्टि से कई भागों में विभक्त किया जा सकता है। सबसे नीचे रस्सी की आकृति को मेखला (मेकला) कहा गया। इस पर उल्टे कमल की आकृति (या घंटाकृति), जिसे पूर्ण कुंभ भी कहा जाता है। घंटाकृति पर गोलाकार चौकी (या चौकोर चौकी) जिसे आधार पीठिका की संज्ञा दी गई, जिस पर पशु आकृति को प्रतिष्ठित किया गया। कुछ स्थलों पर पशु आकृतियों पर धर्मचक्र स्थापित है।

प्राय: इन स्तम्भों की बनावट एक जैसी होते हुए भी इनके शीर्ष पर विविध पशु आकृतियाँ स्थापित की गई हैं जैसे-अश्व, सिंह, वृषभ, हस्ति आदि।

एरण एवं ग्वालियर से प्राप्त स्तम्भ ताड़वृक्ष की आकृति के हैं। दूसरा अन्तर चौकी पर उत्कीर्ण विषय पर देखा जा सकता है। सारनाथ से प्राप्त शीर्ष की चौकी पर चारों ओर चार चक्र एवं उनके मध्य अश्व, सिंह, वृषभ, हस्ति अंकित किये गये हैं।

इसके अतिरिक्त प्रारम्भिक स्तम्भों (बसरा बखिरा) की पीठिका पर दाना चुगते हंस अथवा ताड़पत्र अंकित हैं। सारनाथ के अतिरिक्त सभी स्तम्भों पर एक पशु की आकृति स्थित है किन्तु सारनाथ स्तम्भ में चार सिंह पीठ से पीठ सटाये बनाये गये हैं।

धौली का प्रस्तर हस्ति अपेक्षाकृत सुडौल और कला की दृष्टि से प्रौढ़ है। इसे पशु शीर्षों की परम्परा से अलग माना गया है।हस्ति की छवि का अंकन एवं रूपांकन विशिष्ट प्रकार का है एवं उसकी रेखाओं का प्रवाह सुन्दर है। इसमें आकार की विशालता के साथ उसकी छवि में कल्पना का भाव है। उसकी शान्तिपूर्ण गरिमा अपूर्व है।

संकिसा की गजमूर्ति में भी संतुलन का अभाव है अर्थात् स्तम्भ की ऊँचाई की दृष्टि से हाथी अत्यन्त लघु है जो प्रारम्भिक अवस्था का द्योतन करता है। गज के शरीर का भाग बोझिल होने के कारण झुकाव आ गया है तथा अगले पैर स्तम्भ की सी बनावट के हैं। उसका विशाल एवं थुलथुल शरीर जो जड़ प्रतीत होता है। चौकी की बनावट और मुड़ी पत्तियोंवाला पद्य अधिक विकसित और सुन्दर है।

संकिसा के हस्तिमण्डित स्तम्भ को, विद्वानों ने मौर्य कला की विकास प्रक्रिया में अगले स्थान पर रखा है। लौरियानन्दनगढ़ की सिंह मूर्ति में बखिरा सिंह मूर्ति की अपेक्षा अधिक दृढ़ता है। माँस पेशियों एवं शिराओं का सफल चित्रण हुआ है।

विद्वानों ने लौरिया स्तम्भ को सर्वोत्तम नमूनों में से एक माना है। रामपुरवा से प्राप्त दो वृषभ एवं सिंह शीर्षों में बसरा-बखिरा आदि स्तम्भों से अधिक विकास दृष्टिगोचर होता है।

वृषभ की मूर्ति में गति, सजीवता एवं लालित्य परिलक्षित होता है। पीठिका एवं उस पर अवस्थित मूर्ति प्रस्थापन में भी पूर्ण संयोजन है। यद्यपि शीर्ष स्तम्भ ऊँचाई की दृष्टि से छोटा है, किन्तु इसमें कला के क्रमिक विकास के चिह्न स्पष्ट प्रतिबिम्बित होते हैं।

साँची सिंह शीर्ष में भी सारनाथ की भाँति चार पशु पीठ सटाये बैठे हैं एवं गोल अण्ड पर चुगते हसों की पंक्ति रामपुरवा शीर्षक की भाँति उत्कीर्ण है। साँची का अंकन अधिक रूढ़िग्रस्त है, संभवत: यह सारनाथ से परवर्ती रचना है।

अशोक कालीन सारे स्तम्भों में सारनाथ शीर्ष सबसे भव्य है एवं अब तक भारत में उपलब्ध मूर्ति कलाओं में सर्वोत्तम नमूना है। किसी देश में इस सुन्दर कलाकृति से बढ़कर अथवा उसके समान प्राचीन पशु मूर्ति का नमूना खोज निकालना कठिन है। इसमें वास्तविक बनावट के साथ-साथ आदर्श प्रतिष्ठित है और वह बनावट में प्रत्येक दृष्टि से और पूर्णतया सूक्ष्म है।

शीर्ष सात फीट ऊँचा है। इसके ऊपर चार भव्य सिंह पीठ से पीठ सटाये गोल पीठिका पर बैठे हैं। इनके बीच एक बड़ा पत्थर का चक्र धर्मचक्र का प्रतीक था। चक्र में संभवत: 32 तीलियाँ थीं। सिंहों के नीचे चार छोटे-छोटे चक्र हैं जिनमें 24-24 तीलियाँ हैं।

मौर्य युगीन स्तूप-

अशोक ने स्तूप निर्माण की परम्परा को प्रोत्साहन दिया। बौद्ध अनुश्रुति के अनुसार अशोक ने बुद्ध के अस्थि अवशेषों पर पूर्व निर्मित आठ स्तूपों को तुड़वाकर बुद्ध के अवशेषों को पुनर्वितरित कर 84,000 स्तूपों का निर्माण करवाया।

यह संख्या अतिशयोक्तिपूर्ण हो सकती है, परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि अशोक ने बड़ी तादाद में स्तूपों का निर्माण करवाया होगा। साँची तथा भरहुत स्तूपों का निर्माण मूल रूप में अशोक ने ही करवाया था एवं शुगों के समय में साँची स्तूप का विस्तार हुआ।

स्तूप (पालि में थूप) का अभिप्राय चिता पर निर्मित टीला होता है जो प्रारम्भ में मिट्टी का बनाया जाता था, अत: स्तूप की दूसरी संज्ञा चैत्य हुई। स्तूप शब्द का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। महापरिनिर्वाणसुत्त में उल्लेख आया है कि बुद्ध ने अपने प्रिय शिष्य आनन्द से कहा था, मेरी मृत्यु के पश्चात् मेरे अवशेषों पर उसी प्रकार का स्तूप बनाया जाए जिस प्रकार चक्रवर्ती राजाओं के अवशेषों पर बनते हैं।

महात्मा बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनकी अस्थियों को आठ भागों में बाँट कर उन पर स्तूप बनाए गए थे। कालान्तर में बौद्ध संघ ने इसे अपनी संघ व्यवस्था में शामिल कर लिया। चूंकि इनमें बुद्ध या उनके प्रमुख शिष्यों की अस्थियाँ थीं, अतः वे बौद्ध के स्थल बन गए। बौद्ध साहित्य में चार प्रकार के स्तूपों का उल्लेख किया गया है-

  • शारीरिक- जिनमें अस्थियाँ या अवशेष रखे जाते हैं।
  • पारिभोगिक- जिनमें बुद्ध से संबंधित वस्तुएँ (यथा, पादुका, दण्ड, भिक्षापात्र आदि) रखी गयी थीं।
  • उद्देशिक- इनमें वो स्तूप शामिल थे, जो बुद्ध के जीवन से संबंधित घटनाओं से जुड़े पवित्र स्थलों पर बनाए गए थे।
  • संकल्पित- इस वर्ग में वे स्तूप आते हैं। जो बौद्ध उपासकों के द्वारा बुद्ध के प्रति श्रद्धा में या पुण्य लाभार्थ निर्मित करवाए गए थे।

साधारणत: स्तूप का सम्बन्ध बौद्ध मत से रहा है। अंगुर्त्तर निकाय तथा मझिम निकाय में स्तूप शब्द का अधिकतर प्रयोग हुआ। अशोक से पूर्व किसी स्तूप के अवशेष नहीं मिले हैं। ह्वेनसांग ने सातवीं शताब्दी में अफगानिस्तान एवं भारत के विभिन्न भागों में अशोक द्वारा निर्मित स्तूप होने का उल्लेख किया है।

उसके विवरण से ज्ञात होता है कि ये स्तूप तक्षशिला, श्रीनगर, थानेश्वर, मथुरा, गया, बनारस आदि नगरों में विद्यमान थे। इनकी ऊंचाई 300 फीट तक थी। पिपहरवा (बस्ती जिला) नामक स्थान से अशोक के एक स्तूप के भग्नावशेष मिले हैं। सारनाथ में अशोक कालीन धर्म राजिका स्तूप का निचला भाग इस समय भी विद्यमान है।*

तक्षशिला में एक स्तूप अशोक द्वारा निर्मित माना जाता है जिसके अवशेष अब भी उपलब्ध हैं। जॉन मार्शल के अनुसार अशोककालीन साँची स्तूप का आकार वर्तमान स्तूपों के आकार का आधा था। इसका व्यास 70 फीट और ऊँचाई 35 फीट थी। ईंटों से निर्मित अर्द्धगोलाकार, उठी हुई मेघी, चतुर्दिक काष्ठ वेदिका तथा स्तूप की चोटी पर पत्थर का छत्र लगा था।

शुंगकाल में स्तूप वास्तुकला की आधार-शिला निश्चित हुई। अशोक के बाद इस प्रकार के स्तूपों को न केवल प्रस्तर शिलाओं से आच्छादित किया जाने लगा बल्कि काष्ठ वेदिका के स्थान पर प्रस्तर वेदिका लगाकर तोरणद्वारों का संयोजन किया जाने लगा।

स्तूप शीर्ष पर हरनिका (हरमिका) बनाकर मध्य में छत्रावली स्थापित की जाती थीं मौर्य अनुवर्ती युग में स्तूप वैदिका, अण्ड, हरमिका एवं छत्रावली से युक्त थे जिन्हें बुद्ध के अवशेषों पर निर्मित किया गया। स्तूप के सिरे पर चौकोर घेरा तैयार दिखाई पड़ता है, जिसे हरमिका का नाम दिया गया। उसी में धातुगर्भ स्थित किया जाता है।

हरमिका के केन्द्र में छत्रयष्टि स्थिर की जाती है और यष्टि के सिरे पर तीन छत्र (एक के बाद दूसरा एवं तीसरा) निर्मित रहते हैं। विद्वानों की मान्यता है कि भरहुत एवं साँची स्तूप अशोक द्वारा निर्मित किये गये थे। शुंग-सातवाहन युग में उनका परिष्कार एवं परिवर्द्धन हुआ जिससे अशोक के योगदान को जान सकना संभव नहीं हैं।

अशोक ने वास्तुकला के इतिहास में चट्टानों को काटकर कंदराओं के निर्माण द्वारा एक नई शैली का प्रारम्भ किया। गया के निकट बाराबर की पहाड़ियों में अशोक ने अपने राज्याभिषेक के बारहवें वर्ष में सुदामा गुहा आजीविकों को दान में दी थी।

 मौर्यकाल में बाराबर की पहाड़ी को खलतिक पर्वत कहा जाता था। इस गुहा में दो प्रकोष्ठ हैं। बाहरी कक्ष 32.9 फीट लम्बा 19.5 फीट चौड़ा है। इसके पीछे 19.11×19 का कक्ष है। एक कक्ष गोल व्यास का है, जिसकी छत-अर्धवृत्त है।

प्रकोष्ठ का बाह्य मुखमण्डप आयताकार और छत गोलाई लिए हुए है, छत तथा भित्ति पर शीशे जैसी चमकती पॉलिश भी है। इसका विकास आगे चलकर महाराष्ट्र के भाजा, कन्हेरी और कालें चैत्यगृहों में परिलक्षित होता है। अशोक ने जहाँ गया जिले में बराबर पर्वत-श्रृंखला में नागार्जुनी पर्वत पर गुहाएँ बनाई थीं, वहीं उसके पौत्र ने कुछ हटकर क्रम से तीन गुहाओं का निर्माण करवाया, जो वहियक, गोपिका एवं बडथिका नाम से पुकारी जाती हैं।

इन गुहाओं के बाहर इनके निर्माण से सम्बद्ध अभिलेख मिलते हैं। इनका विन्यास सुरंग जैसा है। इसके मध्य में ढोलाकार छत और दोनों सिरों पर गोल मण्डल हैं, जिनमें से एक को गर्भगृह एवं दूसरे को मुखमण्डप की संज्ञा दी जा सकती है।

इनमें स्तम्भों का अभाव है, अतः वास्तुकला की दृष्टि से इनका अधिक महत्त्व नहीं है।

लोककला-

मौर्यकालीन लोक कला का परिज्ञान उन महाकाय यक्ष-यक्षिणीयों की मूर्तियों द्वारा होता है जिनका निर्माण स्थानीय मूर्तिकारों ने किया। इसमें वे मूर्तियाँ सम्मिलित थीं जिनकी रचना सम्राट् के आदेश से नहीं की गई। वस्तुत: बिना राज्य संरक्षण के इनका निर्माण हुआ।

लोकप्रिय कला के संरक्षक स्थानीय प्रान्तपति या नागरिक थे, जिनके प्रोत्साहन से अतिमानवीय महाकाय मूर्तियाँ खुले आकाश में स्थापित की जाती थीं। इनका प्रारम्भिक रूप अलग परम्परा के अन्तर्गत पहचाना जा सकता है। इस परम्परा में राज्य द्वारा आश्रय का कोई संकेत नहीं मिलता। अत: इस परम्परा को लोकाश्रयी परम्परा कहा जा सकता है।

यक्ष-यक्षिणी जैसे देवी-देवताओं की आराधना प्राचीन काल से ही की जाती रही है। संभवतः यह देव परम्परा मूलतः प्रागार्य थी। यद्यपि मौर्यकाल से पूर्व इस प्रकार की प्रतिमायें अनुपलब्ध हैं तथापि इनसे सम्बद्ध साहित्यिक साक्ष्य मिलते हैं जिनसे इनकी प्राचीनता प्रमाणित होती है

भारत के अनेक भागों से यक्षों की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं जिनका निर्माण मौर्य काल ई. पू. तीसरी सदी से कुषाणकाल ई. पू. प्रथम सदी के मध्य हुआ। मथुरा जिले के पर्क्हम ग्राम से प्राप्त यक्ष मूर्ति की चौकी पर एक लेख नीद अंकित है। इसे मणिभद्र की संज्ञा दी है। मथुरा क्षेत्र बरोदा ग्राम से भी एक यक्ष मूर्ति मिली।

परखम एवं बरोदा से प्राप्त यक्ष मूर्तियों के मूर्ति शिल्प के विषय में कहा गया है- परखम के निकट बरोदा से मिली विशाल यक्ष मूर्ति और दूसरी परखम से ही मिली यक्ष की मूर्ति में भी जो बरोदा के यक्षमूर्ति से आकार में कुछ छोटी है (दोनों मूर्तियाँ मथुरा संग्रहालय में सुरक्षित हैं)- इनका शरीर तो गोलाई में गढ़ दिया गया है, पर पीठ सपाट है।

वस्त्र और गहने शरीर के बाहर फेंके हुए हैं, इनमे वाही भारीपन, पुरातनता, जड़ता और बेजान मार्दव देखने में आता है। छोटी मूर्ति पर मौर्यों के स्तम्भों जैसी ही पॉलिश भी लगी है।

परखम की मूर्ति में किंचित मुड़े और अपेक्षाकृत पतले पैरों का सदृश्य ग्वालियर के निकट पवाया से प्राप्त मणिभद्र यक्ष की प्रतिमा से है, जबकि बरोदा और परखम की मूर्तियों में शरीर के सामने का भाग काफी उभरा और पीठ का भाग दबा है, जिसे देखकर मथुरा की असंस्कृत बोधिसत्व की याद आती है। परखम के यक्ष, दीदारगंज के चामरग्रागिनी और बेसनगर की यक्षिणी लोक कला के नमूने हैं।

शुंग, कुषाण और सातवाहन:

इस समय के कला स्मारक स्तूप, गुफा मंदिर (चैत्य), विहार, शैलकृत गुफाएं आदि हैं। भारहुत का प्रसिद्ध स्तूप का निर्माण शुंग काल के दौरान ही पूरा हुआ। इस काल में उड़ीसा में जैनियों ने गुफा मंदिरों का निर्माण कराया। उनके नाम हैं- हाथी गुम्फा, रानी गुम्फा, मंचापुरी गुम्फा, गणेश गुम्फा, जय विजय गुम्फा, अल्कापुरी गुम्फा इत्यादि।

अजंता की कुछ गुफाओं का निर्माण भी इसी काल के दौरान हुआ। इस काल के गुफा मंदिर काफी विशाल हैं। इसी काल के दौरान गांधार मूर्तिकला शैली का भी विकास हुआ। इस शैली को ग्रीक-बौद्ध शैली भी कहते हैं। इस शैली का विकास कुषाणों के संरक्षण में हुआ।

गांधार शैली के उदाहरण हद्दा व जैलियन से मिलते हैं। गांधार शैली की मूर्तियों में शरीर को यथार्थ व बलिष्ठ दिखाने की कोशिश की गई है। इसी काल के दौरान विकसित एक अन्य शैली-मथुरा शैली गांधार से भिन्न थी।

इस शैली में शरीर को पूरी तरह से यथार्थ दिखाने की तो कोशिश नहीं की गई है, लेकिन मुख की आकृति में आध्यात्मिक सुख और शांति पूरी तरह से झलकती है। सातवाहन वंश ने गोली, जग्गिहपेटा, भट्टीप्रोलू, गंटासाला, नागार्जुनकोंडा और अमरावती में कई विशाल स्तूपों का निर्माण कराया।

गुप्तकालीन साहित्य

कला और साहित्य के अप्रतिम विकास के आधार पर ही भारतीय इतिहास में गुप्तकाल को ‘स्वर्णयुग’ कहा गया है। साहित्य की दृष्टि से गुप्त काल अत्यंत समृद्ध था। कालिदास ने युगांतरकारी साहित्य की रचना से गुप्तकाल को इतिहास में सम्मानजनक स्थान दिलाया है।

कुमारसंभव, मेघदूत, ऋतुसंहार और अभिज्ञानशाकुन्तलम जैसी कालजयी कृतियों की रचना गुप्तकाल में ही हुईं थीं। पुराणों तथा नारद कात्यारान, पराशर, वृहस्पति आदि स्मृतियों की रचना भी गुप्तकाल में ही हुई।

विज्ञान के क्षेत्र में भी साहित्य का सृजन हुआ। ब्रह्मसिद्धांत, आर्यभिटयम और सूर्यसिद्धान्त की रचना करने वाले आर्यभट्ट थे। कामंदक ने ‘नीतिसार’ और वात्सायन में कामसूत्र की रचना गुप्तकाल में ही की। विष्णु शर्मा द्वारा रचित ‘पंचतंत्र’ गुप्तकालीन साहित्य का सर्वोत्कृष्ट नमूना है।

यास्क कृत ‘निघतु’ निरुक्त से वैदिक साहित्य के अध्ययन में सहायता मिलती है। भट्टी, भौमक आदि व्याकरण के विद्वान् थे। इस काल में बौद्ध साहित्य की भी रचना हुई, बुद्धघोष में सुमंगलविलासिनी की रचना की। इसके अतिरिक्त ‘लंकावतारसूत्र’ ‘महायानसूत्र’ ‘स्वर्णप्रभास’ आदि बौद्ध कृतियों की रचना की गयी।

जैनाचार्य सिद्धसेन ने तत्वानुसारिणी तत्वार्थटीका नामक ग्रन्थ की रचना की। महादयडनायक ध्रुवभूति का पुत्र हरिषेण समुद्रगुप्त के समय में सान्धिविग्रहिक कुमारामात्य एवं महादण्डनायक के पद पर कार्यरत था। हरिषेण की शैली के विषय में जानकारी ‘प्रयाग स्तम्भ’ लेख से मिलती है। हरिषेण द्वारा स्तम्भ लेख में प्रयुक्त छन्द कालिदास की शैली की याद दिलाते हैं।

हरिषेण का पूरा लेख ‘चंपू (गद्यपद्य-मिश्रित) शैली’ का एक अनोखा उदाहरण है। स्वप्नवासवदत्ता भास की अनुपम रचना है। इसके अतिरिक्त प्रतिभा नाटक, पञ्चरात्र, प्रतिज्ञा सौगंधरायण उसकी अन्य प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। शूद्रक का मृच्छकटिकम् भी गुप्त युग का प्रमुख नाटक है।

मुद्राराक्षस व देवीचन्द्रगुप्तम् का लेखक विशाखदत्त भी गुप्तकाल से सम्बद्ध है। इसे चन्द्रगुप्त द्वितीय का समकालीन माना गया है। गुप्त काल में अमरसिंह ने अमरकोश की रचना की। सांख्य दर्शन से संबंधित ईश्वर कृष्ण की सांख्यकारिका भी गुप्त युग की रचना है।

गुप्तकालीन स्थापत्य

मूर्तिकला

मथुरा से बुद्ध की भव्य लाल बलुआ पत्थर की प्रतिमा पांचवीं शताब्दी ईसवी सन् की गुप्त कारीगरी का एक सर्वाधिक असाधारण उदाहरण है ।यहां महान गुरु को उसकी सम्पूर्ण भव्यता के साथ खड़े हुए दिखाया जाता है, उसका दाहिना हाथ संरक्षण आश्वस्त करते हुए अभयमुद्रा में है और बाएं हाथ से वस्त्र का किनारा पकड़ा हुआ है 

उदास नेत्रों के साथ मुस्कुराती हुई उसकी मुखाकृति आत्मिक उल्लास से वंचित रह जाती है । दोनों कंधों को ढकने वाले वस्त्र का कुशलतापूर्वक निरूपण निपुणतापूर्वक ढकी हुई आरेखीय परतों से होता है और यह वस्त्र शरीर से चिपका है ।

सिर एक उभार के साथ आरेखीय सर्पिल कुण्डलों से ढका है और विस्तृत प्रभामण्डल मनोहारी आभूषणों के संकेन्द्रित फीतों से सजा है बुद्ध की प्रतिमा में परिष्कृत प्रवीणता और अभिव्यक्ति की राजसी शक्ति को स्याम, कम्बोडिया, बर्मा, जावा, मध्य एशिया, चीन तथा जापान आदि ने बौद्ध धर्म अपनाने के साथ ही स्थानीय परिर्वतन के साथ ग्रहण किया ।

सारनाथ में खड़े हुए बुद्ध की प्रतिमा परिपक्वता में गुप्तकालीन कला का एक उत्कृ्ष्ट उदाहरण है । कोमलता से झुकी हुई आकृति में दाहिना हाथ संरक्षण आश्वास्त‍ करने की स्थिति में है । मथुरा की बुद्ध की मूर्ति में निपुणतापूर्वक काट कर बनाई गई वस्त्रों की परतों से भिन्न, पारदर्शक वस्त्रों के किनारे मात्र को दर्शाया गया है ।

अपनी शान्त आत्मिक अभिव्यक्ति से मेल खाती हुई आकृति का सटीक निष्पा‍दन वास्तव में उत्कृष्ट कहलाने के योग्य है । सारनाथ, न केवल रूप की कोमलता और परिष्करण से परिचय कराता है बल्कि अपनी स्वयं की धुरी पर हल्के से टिकी हुई खड़ी आकृति के संबंध में शरीर को झुका कर विश्राम की एक मुद्रा को भी प्रस्तुत करता है ।

इस प्रकार इसमें मथुरा की समान कृतियों की कठोरता के प्रतिकूल कुछ लचीलापन और संचलन मिलता है । यहां तक कि बैठी हुई प्रतिमा प्रतिरूपण छरहरे शरीर, संचलन का आभास गूढ़ सूक्ष्मता के साथ कराती हैं ।

परतों को अब बिल्कुल निकाल दिया गया है, शरीर पर वस्त्र अब पतली रेखाओं के रूप में विद्यमान हैं जो वस्त्र के किनारों का संकेत देते हैं ।पृथक होने वाली परतों को पुन: मलमल का वस्त्र दिया जाता है । शरीर में अपनी चिकनी तथा चमकदार सुगढ़ता सारनाथ के कलाकारों के मूल विषय थे ।

गुप्त काल के दौरान भारतीय मन्दिरों की विशेषताओं वाली तकनीक उभर कर सामने आए । मूर्तियों का सामान्य वास्तुकला योजना के एक आन्तरिक भाग के रूप में उत्तम रीति से प्रयोग करना प्रारम्भ कर दिया गया । देवगढ़ के मन्दिरों और उदयगिरि तथा अजन्ता के मन्दिरों के प्रस्तर उत्कीर्ण अपने सजावटी विन्यास में मूर्तिकला के उत्कृष्ट नमूने हैं ।

देवगढ़ मन्दिर में अनन्त सर्प पर सोते हुए परमसत्ता का प्रतिनिधित्व करने वाले शेषशायी विष्णु का एक विशाल पैनल, विश्व की समाप्ति और इसके नए सृजन के बीच की अवधि में शाश्वतता का एक उत्तम उदाहरण है । चार भुजा वाले विष्णु ऐसे आदिशेष की कुण्डली पर शालीनता से लेटे हुए हैं जिसके चार फन विष्णु के मुकुटधारी सिर पर एक छतरी बनाते हैं ।

उनकी पत्नी लक्ष्मी उनका दाहिना पांव दबा रही हैं और दो परिचर आकृतियां लक्ष्मी के पीछे खड़ी हैं । कई देव तथा दिव्य पुरुष ऊपर घूम रहे हैं । उभरी पैनल में, मधु और कैटभ नाम के दो राक्षस, जो कि आक्रमण करने की मुद्रा में, विष्णु के चार मूर्तिमान अस्त्रों को चुनौती दे रहे हैं ।

पूरी संरचना को उत्कृष्ट कौशल से बनाया गया है जो नितान्‍त शान्ति आन्दोलित तनाव का एक वातावरण उत्पन्न करती है और इसे कला की एक श्रेष्ठ कृति बनाती है। विष्णु की एक भव्य मूर्ति का संबंध गुप्त काल, पांचवीं शताब्दी ईसवी सन् से है जो मथुरा में है ।

प्रतीकात्मक गाउन, वनमाला, मोतियों की ऐसी मनोहारी डोरी जो ग्रीवा के चारों ओर घूमती है, लम्बा और सुरुचिपूर्ण यज्ञपवित्र, प्रारम्भिक गुप्ता कृति के उदाहरण हैं ।

अहिछत्र में शिव मंन्दिर के ऊपरी चबूतरे की ओर जाने वाली प्रमुख सीढ़ी के पार्श्व के आलों में मूल रूप से स्थापित गंगा और यमुना, दो आदमकद पक्की मिट्टी की मूर्तियों का संबंध गुप्त काल चौथी शताब्दी ईसवी से है । गंगा अपने वाहन मकर और यमुना कच्छप पर खड़ी है ।

कालिदास ने इन दोनों देव नदियों का शिव के परिचर के रूप में उल्लेख किया है तथा ऐसा गुप्त काल की परवर्ती मन्दिर वास्तुकला की एक नियमित विशेषता के रूप में होता है ।

इसका सर्वाधिक उल्लेखनीय उदाहरण देवगढ़ के ब्राह्यणीय मन्दिर के द्वार के बाजू हैं । मिट्टी की लघु-मूर्ति का सामाजिक और धार्मिक इतिहास के स्रोतों के रूप में अत्यधिक महत्‍त्‍व है ।

भारत में पकी हुई चिकनी मिट्टी से निर्मित लघु-मूर्तियों की कला अति प्राचीनतम महत्‍त्‍व की है, जैसा कि हमने पहले ही हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में देखा है जहां भारी मात्रा में मृण्मूर्तियां मिली हैं ।

शिव का सिर गुप्त मृण्मूर्ति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है जिसे एक मुख्य एवं मनोहारी शीर्षस्थ गांठ से बंधे निष्प्रभ लट के रूप में दर्शाया गया है । शिव तथा पार्वती दोनों की आकृतियों के चेहरे की अभिव्यक्ति ध्यान देने योग्य है और ये अहिछत्र के दो सर्वाधिक मनोहारी नूमने हैं ।

पार्वती का सिर तीसरी आंख के साथ है और माथे पर अर्द्धचन्द्र है । उनकी अलक-लटों को खूबसूरती के साथ व्य्वस्थि‍त किया गया है, उनकी वेणी को एक माला से कसा गया है और पुष्प के एक उभार से सजाया गया है । उन्होंने एक गोल बाली पहनी हुई है जिस पर स्वस्तिक का चिह्न है ।

दक्षिण में वाकाटक सर्वोपरि थे जो उत्तर में गुप्त के समकालिक थे । इनके क्षेत्र में कला में हासिल किए गए सम्पूर्णता के उच्च जल-चिह्न को अजन्ता की उत्तरवर्ती गुफाओं में और ऐलोरा की एवं औरंगाबाद की पूर्ववर्ती गुफाओं में बेहतर ढंग से देखा जा सकता है ।

मंदिर

गुप्तकाल से पूर्व मन्दिर वास्तु के अवशेष नहीं मिलते। मन्दिर निर्माण का प्रारम्भ इस युग की महत्त्वपूर्ण देन कही जा सकती है। इस काल में मन्दिर वास्तु का विकास ही नहीं हुआ बल्कि इसके शास्त्रीय नियम भी निर्धारित हुए। मन्दिर निर्माण के उद्भव का सम्बन्ध व्यक्तिगत देवता की अवधारणा से है।

भारत में देवपूजा की परम्परा बहुत प्राचीन रही है। प्राय: इसके उद्भव को प्रागार्थ (अनार्य) परम्परा में खोजने का प्रयत्न किया गया है इत्सिंग ने श्री गुप्त द्वारा ‘मि-लि-क्या-सी-क्या-पोनो’ (सारनाथ) में चीनी यात्रियों के लिए मन्दिर बनाये जाने का उल्लेख किया है। इसी तरह चन्द्रगुप्त द्वितीय के मंत्री शाब (वीरसेन) द्वारा उदयगिरि गुहा में भगवान शिव के लिए गुहा मन्दिर बनवाये जाने का विवेचन आया है।

कुमारगुप्त के मिलसद अभिलेख से ज्ञात होता है कि उसने कार्तिकेय के मन्दिर का निर्माण करवाया। उसके मन्दसोर अभिलेख से भी सूर्य मन्दिर निर्माण करवाये जाने एवं मन्दिरों के जीर्णोद्धार की जानकारी मिलती है।

गुप्तकालीन मन्दिरों के अवशेष अनेक स्थानों से प्राप्त हुए हैं, जैसे-सांची, शंकरगढ़, दहपर्वतया (असम), भीतरी गाँव, अहिच्छत्र, गढ़वा, सारनाथ, बौद्धगया आदि। इन मन्दिरों को गुप्तकालीन स्वीकार किये जाने का एक आधार तो कुछ मन्दिर स्थलों से अभिलेखों की प्राप्ति रहा है।

प्रारूप की दृष्टि से एक गर्भ के मन्दिर धीरे-धीरे पंचायतन शैली में परिवर्तित हुए अर्थात् इस प्रक्रिया में पाँच देवों के गृह की स्थापना की गई। साधारणतः मन्दिर वर्गाकार हैं। इस विकास प्रक्रिया के प्रमाण भूमरा एवं देवगढ़ के मंदिर हैं। आयताकार योजना वाले मंदिर अवश्य ही दक्षिण के चैत्य गुहाओं से सम्बद्ध रहे होंगे।

वस्तुत: पंचायतन योजना वर्गाकार मंदिर का विकसित रूप है। इस प्रक्रिया में गर्भ गृह के चारों ओर चार अतिरिक्त देवालय बनाये गये। भूमरा के गर्भगृह के सामने चबूतरों के दोनों कोनों पर देवालय बने हैं। पृष्ठ भाग में गर्भगृह हैं तथापि इन्हें इसी शैली में रखा जाता है। यह मन्दिर देवगढ़ से पूर्ववर्ती है।

प्रारम्भिक मंदिर शिखर- रहित अर्थात् सपाट छत से आवृत्त थे किन्तु सपाट छत क्रमश: ऊंची उठती गई और गर्भगृह के ऊपर पिरामिडाकार स्वरूप बनता गया।

इस प्रक्रिया में कई तल वाले शिखर का विकास हुआ। इस तरह मंदिर का स्वरूप सप्त एवं नवप्रासाद के रूप में परिवर्तित हुआ। शिखर मूलतः गर्भ पर बनी ऐसी वास्तुरचना है जो क्रमश: कई तल, गवाक्ष, कर्णश्रृंग, शुकनाशा, आमलक, कलश, बीजपूरक, ध्वजा से युक्त होता है।

इन तत्त्वों के साथ शिखर की रचना पीठायुक्त अथवा ऊपर की ओर क्रमश: तनु होते हुए भी कोणाकार हो सकती है। संभवत: शिखर का विकास मानव निर्मित कई मजिलों के प्रासादों के अनुकरण पर हुआ होगा।

शिखर प्रासाद के विभिन्न तल ऊपर की ओर छोटे होते गये। इसका सर्वोत्तम उदाहरण नाचनाकुठारा का मंदिर है जिसमें प्रथम कक्ष पर दूसरे एवं तीसरे कक्ष (या खण्ड) दिखाई देते हैं संभवत: इसी से आगे शिखर विकास का प्रारम्भ हुआ और आगे जाकर शिखर की बनावट में अनेक तत्त्व जुड़ते गये।

  • शंकरगढ़- जबलपुर में तिगवां से तीन मील पूर्व में कुण्डाग्राम में लाल पत्थर का एक छोटा शिव मंदिर प्राप्त हुआ है।
  • मुकुंददर्रा- राजस्थान के कोटा जिले में एक पहाड़ी दर्रा, जिसे मुकुन्ददर्रा कहा जाता है, में एक छोटे सपाट छतयुक्त स्तम्भों पर खड़ा मंदिर अवस्थित है।
  • तिगवा- पत्थर से निर्मित एक वर्गाकार सपाट छत का मंदिर है जिसके सामने चार स्तम्भों पर मण्डप स्थित है।
  • भूमरा- सतना (मध्य प्रदेश) में भूमरा नामक स्थान में शिवमंदिर का निर्माण पाँचवीं शताब्दी के मध्य में हुआ माना जाता है।
  • नाचना कुठारा- भूमरा के निकट अजयगढ़ के पास नाचना कुठारा में पार्वती मंदिर स्थित है।
  • देवगढ़- देवगढ़ (ललितपुर) झाँसी के पास गुप्तकाल के बचे हुए उत्कृष्ट मंदिर में से है, जिसका विस्मयकारी अलंकरण मन मोह लेता है। (गुप्त काल का सर्वोत्कृष्ठ मंदिर झांसी जिले में देवगढ़ का दशावतार मंदिर है।)
  • भीतरगाँव- कानपुर के निकट दक्षिण में भीतरगाँव का विष्णु मंदिर ईंटों से निर्मित किया गया। इसका महत्त्व ईंट का प्राचीनतम मंदिर होने में ही नहीं है वरन् इस बात में भी है कि उसमें शिखर है।

गुप्तकालीन मंदिरों की विशेषताएँ-

मंदिरों का निर्माण सामान्यतः ऊँचे चबूतरे पर हुआ था तथा चढ़ने के लिए चारों तरफ से सीढि़याँ बनायी गयी थी। प्रारम्भिक मंदिरों की छतें चपटी होती थी, किन्तु आगे चलकर शिखर भी बनाये जाने लगे। दीवारों पर मूर्तियों का अलंकरण।

मंदिर के भीतर एक चौकोर या वर्गाकार कक्ष बनाया जाता था जिसमें मूर्ति रखी जाती थी। गर्भगृह सबसे महत्वपूर्ण भाग था।गर्भगृह के चारों ओर ऊपर से आच्छादित प्रदक्षिणा मार्ग बना होता था। गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर बने चैखट पर मकरवाहिनी गंगा और कूर्मवाहिनी यमुना की आकृतियाँ उत्कीर्ण हैं।

मंदिर के वर्गाकार स्तंभों के शीर्ष भाग पर चार सिंहों की मूर्तियाँ एक दूसरे से पीठ सटाये हुए बनायी गयी हैं। गर्भगृह में केवल मूर्ति स्थापित होती थी। गुप्तकाल के अधिकांश मंदिर पाषाण निर्मित हैं। केवल भीतरगाँव तथा सिरपुर के मंदिर ही ईटों से बनाये गये हैं।

September 10, 2020

राजपूत राज्यो का उदय Rise of Rajput kingdoms

राजपूत राज्यो का उदय ( Rise of Rajput kingdoms )

हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद उत्तर भारत में विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया तेज हो गयी। किसी शक्तिशाली केन्द्रीय शक्ति के अभाव में छोटे छोटे स्वतंत्र राज्यों की स्थापना होने लगी। 7-8 शताब्दी में उन स्थापित राज्यों के शासक ‘ राजपूत’ कहे गए। उनका उत्तर भारत की राजनीति में बारहवीं सदी तक प्रभाव कायम रहा। भारतीय इतिहास में यह काल ‘राजपूत काल’ के नाम से जाना जाता है।

कुछ इतिहासकर इसे संधिकाल का पूर्व मध्यकाल भी कहते हैं, क्योंकि यह प्राचीन काल एवं मध्यकाल के बीच कड़ी स्थापित करने का कार्य करता है। ‘राजपूत’ शब्द संस्कृत के राजपुत्र का ही अपभ्रंश है। संभवतः प्राचीन काल में इस शब्द का प्रयोग किसी जाति के रूप में न होकर राजपरिवार के सदस्यों के लिए होता था, पर हर्ष की मृत्यु के बाद राजपुत्र शब्द का प्रयोग जाति के रूप में होने लगा।

इन राजपुत्रों के की उत्पत्ति के विषय में भिन्न-भिन्न मत प्रचलित हैं। कुछ विद्वान इसे भारत में रहने वाली एक जाति मानते हैं, तो कुछ अन्य इन्हें विदेशियों की संतान मानते हैं। कुछ विद्वान् राजपूतों को आबू पर्वत पर महर्षि वशिष्ट के अग्निकुंड से उत्पन्न हुआ मानते हैं। प्रतिहार, चालुक्य, चौहान और परमार राजपूतों का जन्म इसी से माना जाता है।

  • कर्नल टॉड जैसे विद्वान राजपूतों को शक, कुषाण तथा हूण आदि विदेशी जातियों की संतान मानते हैं।
  • डॉ. ईश्वरी प्रसाद तथा भंडारकर आदि विद्वान् भी राजपूतों को विदेशी मानते हैं।
  • जी.एन.ओझा. और पी.सी. वैद्य तथा अन्य कई इतिहासकार यही मानते हैं की राजपूत प्राचीन क्षत्रियों की ही संतान हैं।
  • स्मिथ का मानना है की राजपूत प्राचीन आदिम जातियों – गोंड, खरवार, भर, आदि के वंशज थे।

इस काल में उत्तर भारत में राजपूतों के प्रमुख वंशों – चौहान, परमार, गुर्जर, प्रतिहार, पाल, चंदेल, गहड़वाल आदि ने अपने राज्य स्थापित किये।

राजपूत

हूणों के आक्रमण के कारण साम्राज्य के पतन के पश्चात गुप्तोत्तर काल में पाटलिपुत्र के स्थान पर कन्नौज का राजनीतिक सत्ता के केंद्र के रुप में उदय हुआ।  डॉ ईश्वरी प्रसाद ने इस समय को राज्य के अंदर राज्यों का काल कहा है।

सामंतवाद का उत्कर्ष इस काल की प्रमुख विशेषता थी जिसने प्रशासनिक विकेंद्रीकरण को बढ़ावा दिया और देश की राजनीतिक एकता को नष्ट कर दिया। एक शक्तिशाली राजवंश के स्थान पर इस युग में उत्तर भारत में अनेक राजपूत राजवंशो ने शासन किया। इसलिए इस युग को राजपूत युग भी कहा जाता है।

राजपूत शब्द का प्रयोग नवीं शताब्दी से पूर्व नहीं हुआ है। राजपूत संस्कृत शब्द राजपुत्र का अपभ्रंश है।

राजपूतों की उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांत ( Principles related to Origin of Rajputs )

सिद्धान्त विद्वान

  1. आबू पर्वत पर चंद्रवरदाई का वशिष्ठ के पृथ्वीराज रासो अग्निकुंड से उत्पन्न।
  2. शक कुषाण हूण कर्नल टॉडआदि विदेशी जातियों डॉ ईस्वरी  की संतान। प्रसाद
  3. प्राचीन क्षत्रियों जी एच ओझाकी संतान। सी वी वैद्य
  4. सामाजिक आर्थिक वी डी चटोपाध्यायप्रक्रिया की उपज
  5. प्राचीन आदिम स्मिथजातियों गोंड खरवार भर आदि के वंशज
  6. यू-ची(कुषाण) कनिंघमजाति के वंशज
  7. विभिन्न जातियों दशरथ शर्मा का मिश्रण विशुद्धानंद पाठक

अग्निकुंड से 4 जातियों की उत्पत्ति मानी जाती है यह है

1. गुर्जर प्रतिहार (परिहार)
2.चालुक्य (सोलंकी)
3.चाहमान (चौहान)
4.परमार

पृथ्वीराज रासो में 36 राजपूत कुलों का उल्लेख मिलता है।

त्रिपक्षीय संघर्ष ( Trilateral conflict )

हर्ष की मृत्यु के बाद कन्नौज पर अधिकार को लेकर प्रतिहारों, पालों और राष्ट्रकूटों के बीच 8वीं शताब्दी के मध्य से 10वी शताब्दी के मध्य एक संघर्ष प्रारम्भ होता है जो भारतीय इतिहास में त्रिपक्षीय संघर्ष के नाम से विख्यात है।

इस संघर्ष में अन्ततः प्रतिहारों की विजय होती है तथा उनका कन्नौज पर अधिकार स्थापित हो जाता है। प्रतिहारों के पतन के बाद कन्नौज पर गहड़वालों का आधिपत्य हो जाता हे। ये काशी नरेश के नाम से विख्यात थे।

प्रतिहारों के पतन के बाद उत्तर भारत में कुछ अन्य राजवंशों का उदय भी होता है। इनमें दिल्ली तथा अजमेर के चाहमान, बुन्देलखण्ड के चन्देल, मालवा के परमार और त्रिपुरी के कल्चुरी शामिल थे।

 इन सभी राजवंशों में परमार, राष्ट्रकूटों के सामन्त माने जाते हैं जबकि शेष अन्य प्रतिहारों के।

त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लेने वाले शासक:-

प्रतिहार वंश             राष्ट्रकूट वंश        पालवंश

1. वत्सराज               ध्रुव                     धर्मपाल

2. नागभट्ट द्वितीय   गोविन्द तृतीय       देवपाल

3. रामभद्र             अमोघवर्ष प्रथम     विग्रह पाल

4. मिहिर भोज        कृष्ण द्वितीय        नारायण पाल

5. महेन्द्र पाल

हर्ष की मृत्यु के बाद कन्नौज पर आयुध शासकों का शासन था। इनमें दो भाइयों चक्रयुध एवं इन्द्रायुध को लेकर गद्दी के लिए संघर्ष चल रहा था। इसी समय प्रतिहारों पालों एवं राष्ट्रकूटों ने हस्तक्षेप किया।

Rajput era ( राजपूत युग 7 – 8 वीं शताब्दी)

आधुनिक समय में राजपूत शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम कर्नल टाड़ ने अपनी पुस्तक में किया। राजपूत शब्द एक जाति के रूप में अरब आक्रमण के बाद ही प्रचलित हुआ। भारतीय इतिहास में 7वीं से 12वीं शताब्दी के बीच का काल राजपूत काल के नाम से विख्यात है।

ऋग्वेद में राजन् शब्द का प्रयोग मिलता है। अर्थशास्त्र में इनके लिए राजपूत शब्द का प्रयोग किया गया। युवांग च्वांग ने इन्हें क्षत्रिय कहा और अरब आक्रमण के बाद राष्ट्रकूट शब्द का प्रचलन हुआ। इनकी उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है।

राजपूतों की उत्पत्ति ( Origin of Rajputs )

प्राचीन क्षत्रियों से:-गौरी शंकर ओझा जैसे इतिहासकार राजपूतों को प्राचीन क्षत्रियों से उत्पन्न मानते हैं इनके अनुसार प्राचीन क्षत्रिय ही आगे चलकर राजपूतों के नाम से प्रसिद्ध हो गये।

विदेशी उत्पत्तिः-कुछ विदेशी इतिहासकार जैसे-कर्नल टॉड एवं स्मिथ आदि लोग विदेशी जातियों शक, कुषाण, सीथियन आदि से इनकी उत्पत्ति मानते हैं।

लक्ष्मण से:- प्रतिहारों के अभिलेखों में इनकी उत्पत्ति लक्ष्मण से दर्शायी गई है। इनके अनुसार लक्ष्मण ने जैसे द्वारपाल के रूप में रामचन्द्र की रक्षा की थी उसी तरह प्रतिहारों ने आखों से भारत की। प्रतिहार का अर्थ ही द्वारपाल होता है।

अग्निकुण्ड सिद्धान्त से:- चन्द्रबरदाई द्वारा लिखी पुस्तक पृथ्वीराज रासो में अग्निकुण्ड सिद्धान्त का उल्लेख प्राप्त होता है। यह पदमगुप्त के नवसहशांक, चरित सूर्यमल के वंश भास्कर आदि में भी प्राप्त होता है।

पृथ्वी राज रासो के अनुसार गौतम, अगस्त्य, वशिष्ठ आदि तीनों ने आबू पर्वत पर एक यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ से उन्होंने तीन योद्धाओं प्रतिहार, चालुक्य एवं परमार को पैदा किया। बाद में चार भुजाओं वाले एक अन्य योद्धा चाहमान की उत्पत्ति की।

इस प्रकार अग्नि कुण्ड सिद्धान्त से कुल चार राजपूतों की उत्पत्ति दर्शायी गयी है। अग्निकुंड सिद्धान्त का विशेष महत्व है क्योंकि अग्नि पवित्रता का प्रतीक है। ऐसा लगता है कि कुछ विदेशी लोगों को भी अग्नि के माध्यम से पवित्र कर राजपूतों में शामिल कर लिया गया।

राष्ट्रकूट वंश ( Rashtrakuta Dynasty )

  • संस्थापकः– दन्तिदुर्ग
  • राजधानी:– मान्यखेत या मात्यखण्ड (आन्ध्रप्रदेश)
  • दन्तिदुर्ग (752-56) –यह चालुक्यों का सामन्त था इसने आधुनिक आन्ध्रप्रदेश में अपने राज्य की स्थापना की।

राष्ट्रकूट लोग मुख्यतः लाट्टलर (वर्तमान आन्ध्र प्रदेश) के निवासी माने जाते है। यह ब्राह्मण धर्मावलम्बी था तथा उज्जैन में अनेक यज्ञ किये।

कृष्ण प्रथम (756-73):- इसने एलोरा के प्रसिद्ध कैलाश मन्दिर का निर्माण करवाया।

गोविन्द द्वितीय (773-80)

ध्रुव (780-93):- राष्ट्रकूटों की तरफ ने त्रिपक्षीय संघर्ष में इसी शासक ने भाग लिया। इसका एक नाम धारावर्ष भी है।

गोविन्द तृतीय (793-814):- यह राष्ट्रकूट वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था।

अमोघवर्ष (814-78):- अमोघवर्ष ने एक नये नगर मान्यखेत या माल्यखण्ड का निर्माण किया और अपनी राजधानी एलिचुर अथवा बरार से यहीं स्थानान्तरित की।

यह स्वयं भी विद्वान था और अन्य विद्वानों का आश्रयदाता भी था। इसने कन्नड़ भाषा में एक प्रसिद्ध ग्रन्थ कविराज मार्ग की रचना की। इसके दरबार में निम्न महत्वपूर्ण विद्वान भी थे।

  1. जिनसेन – आदिपुराण
  2. महावीराचार्य – गणितारा संग्रह
  3. शक्तायना – अमोघवृत्ति

वैसे तो अमोघवर्ष जैन धर्म का उपासक था परन्तु संजन ताम्रपत्र से पता चलता है कि एक अवसर पर इसने अपने बायें हाथ की अंगुली देवी को चढ़ा दी थी।

कृष्ण द्वितीय (878-914)

इन्द्र तृतीय (915-927):- इसके समय ही ईराकी यात्री अलमसूदी भारत आया था। उसने इन्द्र तृतीय को भारत का सर्वश्रेष्ठ शासक बताया।

कृष्ण तृतीय (939-965):- कृष्ण तृतीय ने अपने समकालीन चोल शासक परान्तक प्रथम को तक्कोलम के युद्ध में पराजित किया। इसने रामेश्वरम् तक धावा बोला तथा वहीं एक विजय स्तम्भ तथा एक देवालय की स्थापना करवाई।

खोटिटग (965-72)- इसके समय में परमार नरेश सीयक ने राष्ट्रकूटों की राजधानी मान्यखेत पर आक्रमण कर उसे नष्ट कर दिया।

कर्क द्वितीय (972-74):- इसके सामन्त तैलप द्वितीय ने इस पर आक्रमण कर इसे पराजित कर दिया। तैलप ने जिस नये वंश की नींव रखी उसे कल्याणी के पश्चिमी चालुक्य कहा जाता है।

प्रतिहार वंश ( Pratihar dynasty )

  • संस्थापक:- हरिश्चन्द्र जो ब्रहमक्षत्री था।
  • राजधानी:- कन्नौज परन्तु प्रारम्भिक राजधानी भिन्न माल ( राजस्थान )

नागभट्ट प्रथम (730-56):- इस वंश का यह वास्तविक संस्थापक था। ग्वालियर अभिलेख से पता चलता है कि इसने अरबों को पराजित किया था।

वत्सराज (778-805)

नागभट्ट द्वितीय (805-833)

रामभद्र (833-836)

मिहिर भोज (836-82):- यह प्रतिहार वंश का महानतम शासक था। इसके स्वर्ण सिक्के पर आदि वाराह शब्द का उल्लेख मिलता है जिससे इसका वैष्णव धर्मानुयायी पता चलता है। इसी के समय में अरब यात्री सुलेमान भारत आया जिसने इस शासक की बहुत प्रशंसा की है। इसी ने भिन्न माल से अपनी राजधानी कन्नौज स्थानान्तरित की।

6. महेन्द्र पाल प्रथम (885-910):- यह प्रतिहार वंश का शक्तिशाली शासक था। इसके समय में इस राजवंश का सर्वाधिक विस्तार हुआ।इसके दरबार में संस्कृत का प्रसिद्ध विद्वान राजशेखर रहता था। उसने निम्नलिखित प्रसिद्ध ग्रन्थ लिखे-काब्य मीमांसा, कर्पूरमंजरी, भिदूशाल भंजिका, बालरामायण, भुव कोष, हरविलास।

राजशेखर कुछ समय के लिए त्रिपुरी के कल्चुरी के वंश में चला गया था और वहाँ के शासक के यूरवर्ष या युवराज प्रथम के काल में अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ काब्य मीमांसा तथा कर्पूर मंजरी की रचना की।

7. भोज द्वितीय (910-12)

8. महीपाल (912-44)- इसी के समय में ईराक का यात्री अलमसूदी भारत आया। राजशेखर इसके दरबार से भी सम्बन्धित था।

9. महेन्द्रपाल द्वितीय (944-46)
10. देवपाल (946-49)

11. विनायक पाल (949-54 ई0)

12. राज्यपाल (1018):- इसी के समय में महमूद गजनवी ने 1018 ई0 में कन्नौज पर आक्रमण किया। राज्यपाल अपनी राजधानी छोड़कर भाग खड़ा हुआ। 

इस वंश का अन्तिम शासक यशपाल था। इसी के बाद कन्नौज के गहड़वालों ने अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया और उन्होंने गहड़वाल वंश की नींव डाली।

पालवंश ( Pal dynasty )

  • संस्थापक-गोपाल
  • राजधानी-नदिया

शशांक की मृत्यु के बाद बंगाल में 100 वर्षों तक अराजक्ता व्याप्त रही तब नागरिकों ने स्वयं इससे ऊबकर एक बौद्ध मतानुयायी गोपाल को अपना शासक बनाया। गोपाल ने जिस वंश की नींव रखी उसे पाल वंश कहा जाता है।

गोपाल (750-770):- गोपाल बौद्ध धर्म मतानुयायी था। इसे आम जनता ने गद्दी पर बैठाया (मध्य काल में फिरोज तुगलक और रजिया ऐसे दो शासक थे जो जनता द्वारा बैठाये गये)/ इसने बंगाल में ओदन्तपुरी विद्यालय की स्थापना की।

धर्मपाल (770-810 ई0):-

  1. उपाधि:- परमसौगत, अन्य उपाधियों उत्तरपथ स्वामी (यह उपाधि गुजरात कवि सोडढल ने इसे प्रदान की।
  2. इसने प्रसिद्ध विद्यालय विक्रमशिला की स्थापना की।
  3. नालन्दा विश्वविद्यालय के खर्च के लिए दो सौ ग्राम दान में दिये।
  4. इसने बंगाल के प्रसिद्ध सोमपुरी बिहार की स्थापना की जो इसके पूर्व में पड़ता है। प्रसिद्ध लेखक ताराचन्द्र ने लिखा है कि इसने बंगाल में 50 से अधिक धार्मिक विद्यालयों की स्थापना करवाई थी। इसके दरबार में प्रसिद्ध बौद्ध लेखक हरिभद्र निवास करता था।

देवपाल (810-50):- उपाधि,- परमसौगत
यह बंगाल के शासकों में सबसे शक्तिशाली शासक था। इसने समकालीन प्रतिहार नरेश मिहिरभोज को पराजित किया।
अरब यात्री सुलेमान इसके समय में भी भारत आया था तथा इसे अत्यन्त श्रेष्ठ शासक बताया है। इसके समय में शैलेन्द्र वंशी शासक बालपुत्र देव ने नालन्दा में एक बौद्ध मठ की स्थापना की। इसके खर्च हेतु देवपाल ने पाँच ग्राम दान में दिये।

इसने अपनी राजधानी नदिया से मुगेर में स्थानान्तरित कर ली। 850 से 988 ई तक पाल वंश का इतिहास पतन का काल माना जाता है। इस समय के शासकों के नाम नहीं प्राप्त होते हैं इसके बाद महीपाल गद्दी पर बैठता है।

महीपाल (988-1038):- चूँकि महीपाल ने दुबारा पाल वंश की शक्ति को स्थापित किया इसी लिए इसे पालवंश का द्वितीय संस्थापक कहा जाता है। परन्तु इसके काल की सबसे महत्वपूर्ण घटना चोल शासक राजेन्द्र चोल का इसके राज्य पर आक्रमण था। राजेन्द्र चोल ने इसे पराजित कर गंगइकोंडचोल की उपाधि धारण की।

नयपाल (1038-55)

रामपाल (1077-1120):- रामपाल के समय में भारतीय इतिहास का प्रथम कृषक विद्रोह हुआ। यह कैवर्त (केवट) जातियों द्वारा किया गया इसका पता सन्ध्याकर नन्दी की पुस्तक रामचरित से चलता है। (आधुनिक काल में पहला कृषक विद्रोह नील विद्रोह माना जाता है।)

इसने मध्य-प्रदेश में जगदलपुर में एक विद्यालय की स्थापना की। रामपाल के बाद मदन पाल ने 1161 ई0 तक राज किया। इसके बाद पालों की सत्ता सेन वंश के हाथों चली गई।