Month

August 2020

August 31, 2020

वित्त आयोग Finance Commission

वित्त आयोग

वित्त आयोग एक संवैधानिक संस्था है जिसका गठन संविधान के अनुच्छेद 280 के तहत हर पांच साल में होता है।

वित्त_आयोग केंद्र से राज्यों को मिलने वाले अनुदान के नियम भी तय करता है। वित्त_आयोग में अध्यक्ष के अलावा 4 सदस्य होते हैं।

वित्त_आयोग संबंधित नीति और नियामकों में बदलाव कर इन्हें व्यापार के अनुरूप बनाने के साथ श्रम सुधार को बढ़ावा देने में हुई प्रगति की जांच भी करता है। 

राज्य वित्त_आयोग द्वारा की गई सिफारिशों के आधार पर राज्य में पंचायत तथा अभी तक भारत में कुल 14 वित्त आयोग का गठन किया जा चुका है।

चौदहवें वित्त_आयोग का गठन 2 जनवरी 2013 को हुआ था। इसकी संस्तुतियां 1 अप्रैल 2015 से पांच साल के लिए लागू हुईं थी, जिसका कार्यकाल 31 मार्च 2020 को समाप्त हो जाएगा। संविधान के अनुच्छेद 280 में वित्त_आयोग के गठन का प्रावधान किया गया है।

वित्त_आयोग के गठन का अधिकार राष्ट्रपति को दिया गया है।  वित्त_आयोग में राष्ट्रपति द्वारा एक अध्यक्ष व चार अन्य सदस्य नियुक्त किए जाते हैं।

नोट:- पहला वित्त आयोग 1951 में गठित किया गया था इसके प्रथम अध्यक्ष के सी नियोगी थे।

भारत के वित्त_आयोग के नए वित्त सचिव अरविंद मेहता है और सयुक्त सचिव के रूप में एम.एस. भाटिया को नियुक्त किया गया है। प्रधानमंत्री योजना आयोग, राष्ट्रीय एकीकरण परिषद, राष्ट्रीय विकास परिषद की अध्यक्षता करता है लेकिन वित्त_आयोग की नहीं करता है।

राष्ट्रपति द्वारा वित्त_आयोग का गठन 5 वर्षों में किया जाता है। वित्त बिल के लिए भारत के राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति आवश्यक है।  14 वित्त_आयोग का गठन भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर वाई वी रेड्डी की अध्यक्षता में किया गया। वर्तमान में 15 वे वित्त_आयोग के अध्यक्ष एन के सिंह हैं।

चौथे वित्त_आयोग में अध्यक्ष के अलावा 4 सदस्य तथा एक सचिव है।

राज्य वित्त आयोग ( State finance commission )

भारत के संविधान में राज्य वित्त_आयोग के गठन का प्रावधान 73वें संविधान संशोधन अधिनियम 1992 के द्वारा किया गया। भारत के संविधान के अनुच्छेद 243 के तहत राज्य के राज्यपाल इस प्रावधान के लागू होने के 1 वर्ष के भीतर तथा उसके पश्चात प्रत्येक 5 वर्ष की समाप्ति पर राज्य वित्त_आयोग का गठन करेगा।

राज्य वित्त आयोग का कार्य पंचायतों की वित्तीय स्थिति का मूल्यांकन करना और इस संदर्भ में राज्यपाल को रिपोर्ट देना है।

August 31, 2020

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग National minority commission

commission ( राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग )

अल्पसंख्यकों के लिए राष्ट्रीय आयोग (एनसीएम) ने अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों को अधिक प्रभावी ढंग से बचाने के लिए संवैधानिक स्थिति प्रदान करने के लिए सरकार से संपर्क करने का निर्णय लिया है।

संवैधानिक स्थिति की आवश्यकता:-

अपने वर्तमान रूप में, एनसीएम के पास मुख्य सचिवों और पुलिस के निदेशक जनरलों सहित अधिकारियों को बुलावा देने की शक्तियां हैं, लेकिन उन्हें उनके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए संबंधित विभागों पर भरोसा करना है। यदि संवैधानिक स्थिति दी जाती है, तो एनसीएम उन ग़लत अधिकारियों के खिलाफ कार्य करने में सक्षम होगा जो सुनवाई में शामिल नहीं होते हैं, इसके आदेश का पालन करते हैं या कर्तव्य के अपमान के दोषी पाए जाते हैं। इसके अलावा, एनसीएम दो दिनों तक एक अधिकारी को दंडित या निलंबित कर सकता है या उसे जेल भेज सकता है।

सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण (2017-18) की स्थायी समिति ने 53 वीं रिपोर्ट में यह भी नोट किया था कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ अत्याचार के मामलों से निपटने के लिए एनसीएम अपने वर्तमान राज्य में “लगभग अप्रभावी” है।

एनसीएम के बारे में:-

केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिनियम, 1992 के तहत अल्पसंख्यकों के लिए राष्ट्रीय आयोग (एनसीएम) की स्थापना की।

छह धार्मिक समुदायों:-

जैसे; पूरे भारत में केंद्र सरकार द्वारा अल्पसंख्यक समुदायों के रूप में भारत के राजपत्र में मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, ज्योतिषियों (पारसी) और जैनों को अधिसूचित किया गया है। 1993 की मूल अधिसूचना पांच धार्मिक समुदायों सिख, बौद्ध, पारसी, ईसाई और मुस्लिमों के लिए थी।

संरचना:-

आयोग में एक अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और पांच सदस्य केंद्र सरकार द्वारा मनोनीत, क्षमता और अखंडता के व्यक्तियों के नाम से मनोनीत होंगे; बशर्ते कि अध्यक्ष सहित पांच सदस्य अल्पसंख्यक समुदायों में से होंगे।

शिकायत निवारण:-

अल्पसंख्यक समुदायों से पीड़ित पीड़ित व्यक्ति संबंधित शिकायतों के निवारण के लिए संबंधित राज्य अल्पसंख्यक आयोगों से संपर्क कर सकते हैं। वे उनके लिए उपलब्ध सभी उपचारों को समाप्त करने के बाद, अल्पसंख्यकों के लिए राष्ट्रीय आयोग को भी अपने प्रतिनिधित्व भेज सकते हैं।

August 31, 2020

वैधानिक आयोग क्या है?? Legal Commission

वैधानिक आयोग

राष्ट्रीय महिला आयोग ( National Women Commission )

इस आयोग का गठन राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम 1990 के तहत 31 जनवरी 1992 को हुआ। महिला आयोग में एक अध्यक्ष 5 सदस्य एवं एक सदस्य सचिव होता है। इसका प्रमुख कार्य महिलाओं को अन्याय के खिलाफ त्वरित न्याय दिलाना है।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ( National Child Rights Protection Commission )

दिसंबर 2006 में राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग की स्थापना की गई। आयोग का काम बच्चों के अधिकारों का सही रूप में उपयोग करना। कानूनों और कार्यक्रमों पर प्रभावी रूप से अमल करना है। राष्ट्रीय एकता परिषद इसका गठन 1961 को किया गया। यह एक गैर संवैधानिक संस्था है।

राष्ट्रीय महिला कोष ( National Women’s Fund )

वैधानिक आयोग Commission

समिति पंजीकरण अधिनियम 1860 के तहत 30 मार्च 1993 को गठित इस संस्था का लक्ष्य गरीब महिलाओं को सामाजिक आर्थिक उत्थान के लिए ऋण सुविधा उपलब्ध कराना है।

केन्द्रीय सूचना आयोग ( Central information commission )

सूचना का अधिकार कानून के तहत वर्ष 2005 में स्थापित केंद्रीय सूचना आयोग में प्राधिकृत निकाय है। केंद्रीय सूचना आयोग में मुख्य चुनाव सूचना आयुक्त के अलावा 10 से अधिक सूचना आयुक्त होते हैं। जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति समिति की सिफारिश पर की जाती है।

केंद्रीय सूचना आयुक्त व अन्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के लिए गठित समिति की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करता है। सूचना आयुक्तों का कार्यकाल 5 वर्ष या 65 वर्ष की अधिकतम आयु जो भी पहले हो

केंद्रीय सूचना आयोग “सूचना का अधिकार” कानून के तहत एक प्रकार का अपीलीय प्राधिकार है। जहां केंद्रीय लोक सूचना अधिकार या राज्य लोक सूचना आयुक्त द्वारा किसी व्यक्ति को सूचना देने से इनकार करने की दशा में अपील की जा सकती है।

प्रशासनिक सुधार आयोग ( Administrative reform commission )

भारत में प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से रही-

  • ✍?सरकार की भूमिका में परिवर्तन
  • ✍? माहौल में परिवर्तन
  • ✍? लोगों की आकांक्षाओं में अभिवृद्धि
  • ✍? कुशलता एवं प्रभावकारिता में सुधार

1⃣ प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग

  • ✍ प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन जनवरी 1966 में देश की लोक प्रशासन की परीक्षा करने
  • तथा आवश्यकता पड़ने पर उसमें सुधार करने व उसका पुनर्गठन करने हेतु सिफारिश करने के लिए किया गया था।
  • ✍ अध्यक्षता मोरारजी देसाई को नियुक्त किया गया।
  • ✍ जब मोरारजी देसाई देश के उप प्रधानमंत्री बन गए
  • तब इस आयोग के अध्यक्ष के. हनुमथैया को बनाया गया।
  • ✍ प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग ने सरकार को 20 रिपोर्ट सौंपी। जिनमें से 537 मुख्य सिफारिशें शामिल थी। इन सिफारिशों को नवंबर 1977 में संसद में पेश किया गया।

2⃣ द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग

  • ✍द्वितीय प्रशासनिक सुधार _आयोग का गठन वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में 31 अगस्त सन 2005 को हुआ था।
  • ✍इस _आयोग को सरकार के सभी स्तरों पर देश के लिए सक्रिय, उत्तरदायी, जवाबदेह, सतत एवं कुशल प्रशासन का लक्ष्य प्राप्त करने के उपायों का सुझाव देने का जिम्मा सौंपा गया था।
  • ✍ इस _आयोग में विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े 20 रिपोर्ट सरकार को सौंपा, जिस पर विचार करने के लिए वर्ष 2007 में तत्कालीन विदेश मंत्री की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई थी।

राष्ट्रीय विधि आयोग ( National law commission )

भारतीय इतिहास के विगत 300 वर्षों में विधि सुधार एक क्रमिक प्रक्रिया रही हैं। ऐसा पहला _आयोग 1833 के चार्टर एक्ट के तहत 1834 में गठित किया गया। जिसका अध्यक्ष लार्ड मैकाले को बनाया गया। स्वतंत्रता के पश्चात भी ऐसे _आयोग की स्थापना की आवश्यकता महसूस की गई।

तत्कालीन भारत महान्यायवादी सीतलबाड की अध्यक्षता में वर्ष 1955 में प्रथम विधि आयोग का गठन किया गया। 19 वे विधि आयोग का गठन न्यायमूर्ति पी.वी.रेड्डी की अध्यक्षता में किया गया 20वें विधि_आयोग का गठन वर्ष 2012 से 2015 अवधि के लिए किया गया। न्यायमूर्ति अजीत प्रकाश शाह इसके अध्यक्ष थे।

21 वे विधि_आयोग के अध्यक्ष बलबीर सिंह चौहान है

समान अवसर आयोग ( Equal opportunity commission )

केंद्र सरकार ने बहुप्रतीक्षित समान अवसर_आयोग(equal opportunities commission) 24 फरवरी 2014 को मंजूरी दे दी। मुसलमानों की सामाजिक एवं आर्थिक पिछड़ेपन का अध्ययन करने वाली सच्चर समिति ने समान अवसर _आयोग गठित करने की सिफारिश की थी।

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ( National backward class commission )

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 340 सरकार को पिछड़े वर्गों की स्थिति का मूल्यांकन के लिए एक_आयोग के गठन का अधिकार प्रदान करता है। सरकार में मंडलआयोग के रूप में पिछड़ा वर्ग _आयोग का गठन 1979 में किया

मंडल_आयोग की संस्तुतियों को मानते हुए सरकार ने 13 अगस्त 1990 को पिछड़े वर्गों को 27% आरक्षण सरकारी नौकरियां प्रदान करने की घोषणा कर दी। केंद्र सरकार ने 14 अगस्त 1933 को राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग_आयोग की स्थापना की

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति या जनजाति आयोग ( National Scheduled Castes or Tribe Commission)

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 338 के तहत अनुसूचित जाति या जनजाति के कल्याण के लिए एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति का प्रावधान था। संविधान के 65 वें संशोधन द्वारा इस प्रावधान को समाप्त कर एक राष्ट्रीय अनुसूचित जाति/जनजाति_आयोग की स्थापना का प्रावधान किया गया।

इस_आयोग में एक अध्यक्ष एक उपाध्यक्ष एवं पांच सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होना निर्धारित किया गया। 89 वें संविधान संशोधन अधिनियम 2003 द्वारा अनुसूचित जाति के लिए पृथक् राष्ट्रीय_आयोग के गठन का प्रावधान कर दिया गया।

वर्तमान में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए पृथक् पृथक्आ_योग है।

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ( National minority commission )

भारत सरकार द्वारा जैन मुस्लिम सिख ईसाई बौद्ध एवं फारसी आदि समुदायों की अल्पसंख्यक के रूप में पहचान की गई। अल्पसंख्यक कल्याण एवं उनके अधिकारों को प्रभावी ढंग से संरक्षित करने के लिए बनी योजनाओं की प्रभावी क्रियान्वयन के लिए 1978 में भारत सरकार ने एक अल्पसंख्यक_आयोग का गठन किया।

भारतीय संसद द्वारा पारित राष्ट्रीय अल्पसंख्यक_आयोग अधिनियम 1992 के तहत पुराने अल्पसंख्यक_आयोग के स्थान पर 17 मई 1993 को नई राष्ट्रीय अल्पसंख्यक_आयोग की स्थापना की गई। यह आयोग 21 जनवरी 2010 को पुनः संगठित हुआ।

एक अध्यक्ष एक उपाध्यक्ष तथा 5 सदस्य होते हैं। जिनकी नियुक्ति केंद्रीय सरकार द्वारा होती हैं।

August 30, 2020

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग National SC commission

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग

एक संवैधानिक निकाय है क्योंकि इसका गठन संविधान के अनुच्छेद 338 के द्वारा किया गया है । दूसरी और अन्य राष्ट्रीय आयोग जैसे राष्ट्रीय महिला आयोग (1992) राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (1993) राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (1993 ) राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (1993) राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (2007 )आधी संवैधानिक आयोग न होकर सांविधिक आयोग है क्योंकि इनकी स्थापना संसद के अधिनियम के द्वारा की गई है ।

संविधान का अनुच्छेद 338 अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिए एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति करता है जो अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के संविधानिक संरक्षण से संबंधित सभी मामलों का निरीक्षण करें तथा उनसे संबंधित प्रतिवेदन राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत करें।

1990 के संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिए एक विशेष अधिकारी के स्थान पर एक उच्च स्तरीय सदस्य बहु सदस्य राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग की स्थापना की गई।

1987 में सरकार ने एक संकल्प के माध्यम से आयुक्त के कार्यों में संशोधन किया तथा आयोग का नाम बदलकर राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग कर दिया।

 पुनः 2003 के 89 वे संशोधन अधिनियम के द्वारा इस राष्ट्रीय आयोग का दो भागों में विभाजन कर दिया गया एवं राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग अनुच्छेद 338 एवं राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग अनुच्छेद 338 क अंतर्गत दो नए आयोग बना दिए गए ।

वर्ष 2004 से पृथक राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग अस्तित्व में आया । आयोग में एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष , तीन अन्य सदस्य राष्ट्रपति द्वारा उनके आदेश एवं मुहर लगे आदेश द्वारा नियुक्त किए जाते हैं । उनकी सेवा शर्तें एवं कार्यकाल भी राष्ट्रपति के द्वारा ही निर्धारित किए जाते हैं।

उनका कार्यकाल 3 वर्ष का होता है

आयोग की शक्तियां 

आयोग को अपने कार्यों को संपन्न करने के लिए शक्तियां प्रदान की गई है जब आयोग किसी कार्य की जांच पड़ताल कर रहा है । यह किसी शिकायत की जांच पड़ताल कर रहा है तो उसे दीवानी न्यायालय की शक्तियां प्राप्त होगी, जहाँ याचिका दायर की जा सकती है ।

निम्नलिखित मामलों में

  1. भारत के किसी भी भाग से किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना और शपथ पर उसकी परीक्षा करना
  2. किसी दस्तावेज़ को प्रकट करने की अपेक्षा करना
  3. शपथ पत्रों पर साक्षी ग्रहण करना
  4. किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रति की अपेक्षा करना
  5. साक्षी और दस्तावेजों की परीक्षा के लिए समन निकालना
  6. कोई अन्य विषय जो राष्ट्रपति नियम द्वारा अवधारित करें

आयोग पिछड़े वर्गों एवं आंग्ल भारतीय समुदाय के संबंध में भी उसी प्रकार कार्य करेगा जिस प्रकार अनुसूचित जातियों के लिए करता है, दूसरे शब्दों में आंग्ल भारतीय समुदाय के संवैधानिक संरक्षण एवं विधिक संरक्षण के संबंध में जांच करेगा और इसके संबंध में राष्ट्रपति की रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा।

August 30, 2020

नीति आयोग क्या है व इसके कार्य NITI AAYOG??

नीति आयोग

नीति आयोग

समकालीन आर्थिक परिवेश से समन्वय स्थापित करने तथा बाजार केंद्रित अर्थव्यवस्था के प्रति संवेदनशील संबंधी आवश्यकता को देखते हुए भारत सरकार द्वारा नीति आयोग की गठन की घोषणा 1 जनवरी 2015 को की गई।

नीति आयोग का पूरा नाम- नेशनल इंस्टिट्यूट फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया ( National Institute for Transforming India )

योजना आयोग की प्रासंगिकता पर समय-समय पर प्रश्न उठते रहें क्योंकि पुरानी सोवियत मॉडल पर आधारित योजना आयोग द्वारा वर्तमान आर्थिक समृद्धि से सामंजस्य बिठाना मुश्किल हो रहा था। इसी कारण नीति आयोग को अपनाया गया।

उद्देश्य ( An objective )

  • 1⃣ राज्यों के सहयोग द्वारा तथा उनको सहयोग प्रदान करके एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण करेगा।
  • 2⃣ नीति आयोग द्वारा जन सहभागिता की अवधारणा को सशक्त करके सहकारी संघवाद की संकल्पना को अधिक मजबूत करना।
  • 3⃣ नीति_आयोग राष्ट्रीय विकास की योजनाओं और नीतियों का इस प्रकार निर्धारण करेगा जिससेे राष्ट्रीय सुरक्षा आर्थिक विकास के बीच संबंध स्थापित किया जा सके।
  • 4⃣ प्रत्येक राज्य तथा उस राज्य के लोगों की सामाजिक आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर नीति_आयोग अपने आर्थिक नीतियों का निर्धारण इस प्रकार करेगा कि उस राज्य के प्रति वर्ग के हित सुनिश्चित हो सकें. ..
  • 5⃣ लघु अवधि के साथ-साथ नीति_आयोग दीर्घावधि के लिए भी नीतियों और योजनाओं का निर्धारण करेगा जिससे कि भविष्य के लिए आर्थिक हितों को सुनिश्चित किया जा सके।
  • 6⃣ निजी क्षेत्र के विशेषज्ञ तथा अन्य अंशकालिक सदस्यों की सहभागिता द्वारा नीति_आयोग की संघीय ढांचे की परिकल्पना को मजबूत करेगा।

प्रशासनिक ढाँचा

नीति_आयोग की अध्यक्षता प्रधानमंत्री द्वारा की जाएगी।इस आयोग के लिए एक उपाध्यक्ष की व्यवस्था भी की गई अरविंद पनगढ़िया को इस आयोग का प्रथम उपाध्यक्ष बनाया गया।

नीति आयोग का प्रशासनिक ढांचा

  • अध्यक्ष- प्रधानमंत्री
  • उपाध्यक्ष- डॉ राजीव कुमार
  • प्रथम उपाध्यक्ष- अरविंद पनगढ़िया
  • मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ)- अमिताभ कांत

विशेष सदस्य

  • ▶नितिन गडकरी
  • ▶थावरचंद गहलोत
  • ▶स्मृति ईरानी

पूर्णकालिक सदस्य

  • ▶विनोद पाल
  • रमेश चंद्र
  • ▶वी के सारस्वत

पदेन सदस्य

  • ▶अमित शाह
  • निर्मला सीतारमण
  • ▶नरेंद्र सिंह तोमर
  • राजनाथ सिंह

प्रधानमंत्री

सभी मुख्यमंत्री, केंद्र शासित प्रदेशों के राज्यपाल/प्रशासक विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ( प्रधानमंत्री द्वारा नामित) प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त किए जाएगा। इसकी संख्या 5 होगी। दो पदेन सदस्य तथा विश्वविद्यालयों की शिक्षक क्रम के अनुसार 4 केंद्रीय मंत्री केंद्र के सचिव स्तर का अधिकारी जिसे निश्चित काल के लिए नियुक्त किया जाएगा।

नीति_आयोग की भूमिका राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय महत्व के विभिन्न नीतिगत मुद्दों पर केंद्र सरकार तथा राज्य सरकारों को आवश्यक रणनीति तथा तकनीकी परामर्श देने की होगी अर्थात् नीति_आयोग एक परामर्शदात्री संस्था है। नीति आयोग के गठन से पहले सभी मंत्रालयों के बजट प्रस्ताव योजना आयोग को प्रेषित किए जाते थे। किंतु यह अधिकार अब सीधे मंत्रालय के पास आ गए हैं।

देश के प्रत्येक राज्य की आर्थिक आवश्यकताएं अलग-अलग है प्रत्येक राज्य के लिए उसकी आवश्यकता के अनुरूप नीतियों का निर्माण किया जाएगा जबकि योजना आयोग एक जैसी नीतियों को संपूर्ण देश में लागू करता रहा है। नीति_आयोग केंद्र राज्य संबंधों को और मजबूत करेगा इसके लिए नीति आयोग के अंतर्गत एक नवीन परिषद नामक विभाग की स्थापना की जाएगी।

यह परिषद अंतर राज्य परिषद की तरफ भूमिका निभाएगी। लंबे समय की योजनाओं के निर्माण तथा उनकी निगरानी हेतु नीति आयोग के तहत एक नवीन विभाग का गठन किया जाएगा। यह विभागीय योजनाओं के निर्माण के साथ-साथ उनके क्रियान्वयन हेतु दिशा निर्देश का प्रारूप तैयार करेगा डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर से जुड़ी प्रक्रियाओं के लिए भी एक तकनीकी संस्थान की स्थापना की जाएगी। यह संस्था जन सहभागिता और उनके लाभ की प्राप्ति के लिए उत्तरदायी होगी।

वर्तमान की समस्याओं और आवश्यकताओं के निर्धारण हेतु तथा भविष्य की संभावनाओं के प्रति दूरदर्शिता दिखाते हुए नीति आयोग अपनी नीतियों और कार्यक्रमों का निर्धारण इस प्रकार करेगा कि वर्तमान के साथ-साथ भविष्य के सामाजिक और आर्थिक लाभ सुनिश्चित किए जा सकें।।

August 30, 2020

What is Respiratory System?? Part 1

The major function of the respiratory system is to supply the body with oxygen and dispose of carbon dioxide.

To accom-plish this function, at least four processes, collectively called respiration, must happen:

  1. Pulmonary ventilation: movement of air into and out of the lungs so that the gases there are continuously changed and refreshed (commonly called breathing).
  2. External respiration: movement of oxygen from the lungs to the blood and of carbon dioxide from the blood to the lungs.
  3. Transport of respiratory gases: transport of oxygen from the lungs to the tissue cells of the body, and of carbon dioxide from the tissue cells to the lungs.
  4. This transport is accomplished by the cardiovascular system using blood as
    the transporting fluid.
  5. Internal respiration: movement of oxygen from blood to the tissue cells and of carbon dioxide from tissue cells to blood.
  6. Only the first two processes are the special responsibility of the respiratory system (Figure 22.1),
  7. but it cannot accomplish its primary goal of obtaining oxygen and eliminating carbon dioxide unless the third and fourth processes also occur.
  8. As you can see, the respiratory and circulatory systems are closely cou- pled, and if either system fails,
  9. the body’s cells begin to die from oxygen starvation.
  10. The actual use of oxygen and production of carbon dioxide by tissue cells, known as cellular respiration,
  11. is the cornerstone of all energy-producing chemical reactions in the body.
  12. We discuss cellular respiration, which is not a function of the respiratory system, in the metabolism section of Chapter 24.
  13. Because it moves air, the respiratory system is also involved
    with the sense of smell and with speech.
    Functional Anatomy

of the Respiratory System

Identify the organs forming the respiratory passageway(s)

In descending order until the alveoli are reached

Describe the location, structure, and function of each of

the following: nose, paranasal sinuses, pharynx, and larynx.

List and describe several protective mechanisms of the respiratory system.

The respiratory system includes the nose, nasal cavity, and paranasal sinuses; the pharynx; the larynx; the trachea; the bronchi and their smaller branches; and the lungs, which contain the terminal air sacs, or alveoli (Figure 22.1). Functionally, the system consists of two zones.

The respiratory zone, the actua site of gas exchange, is composed of the respiratory bronchioles, alveolar ducts, and alveoli, all microscopic structures.

The conducting zone includes all other respiratory passageways, which provide fairly rigid conduits for air to reach the gas ex-change sites.

The conducting zone organs also cleanse, humid- ify, and warm incoming air.

As a result, air reaching the lungs has fewer irritants (dust, bacteria, etc.)

than when it entered the system, and it is warm and damp, like the air of the tropics.

The functions of the major organs of the respiratory system are summarized in Table 22.1.


In addition to these organs, some authorities also include the respiratory muscles (diaphragm, etc.) as part of this system.

Al-though we will consider how these skeletal muscles bring about the volume changes that promote ventilation, we continue to classify them as part of the muscular system.


The Nose and Paranasal Sinuses The nose is the only externally visible part of the respiratory sys-tem. Unlike the eyes and lips, facial features often referred to po- etically, the nose is usually an irreverent target.

We are urged to our nose to the grindstone and to keep it out of other peo- ple’s business.

The nose (1) provides an airway for res- piration, (2) moistens and warms entering air, (3) filters and cleans inspired air, (4) serves as a resonating chamber for speech, and (5) houses the olfactory (smell) receptors.


The structures of the nose are divided into the external nose and the internal nasal cavity for ease of consideration.

The surface features of the external nose include the root (area between the eyebrows), bridge, and dorsum nasi (anterior margin), the latter terminating in the apex (tip of the nose) (Figure 22.2a).

Just inferior to the apex is a shallow vertical groove called the philtrum (fil-trum).

The external openings of the nose, the nostrils or nares (na-re-z), are bounded laterally by the flared alae.


The skeletal framework of the external nose is fashioned by the nasal and frontal bones superiorly (forming the bridge and root, respectively),

the maxillary bones laterally, and flex-ible plates of hyaline cartilage (the alar and septal cartilages, and the lateral processes of the septal cartilage) inferiorly (Figure 22.2b).

The skin covering the nose’s dorsal and lateral aspects is thin and contains many
sebaceous glands. The internal nasal cavity lies in and posterior to the external
nose.

The nasal cavity is divided by a midline nasal septum, formed anteriorly by the septal cartilage and posteriorly by the vomer bone and perpendicular plate of the ethmoid bone (see Figure 7.14b, p. 213).


“The nasal cavity is continuous posteriorly with the nasal por-tion of the pharynx through the posterior nasal apertures, also called the choanae (ko-a-ne; “funnels”)”.

The roof of the nasal cavity is formed by the ethmoid and sphenoid bones of the skull.

The floor is formed by the palate, which separates the nasal cavity from the oral cavity below.

An- teriorly, where the palate is supported by the palatine bones and processes of the maxillary bones, it is called the hard palate.

The unsupported posterior portion is the muscular soft palate.

The part of the nasal cavity just superior to the nostrils,called the nasal vestibule, is lined with skin containing seba-ceous and sweat glands and numerous hair follicles.

The hairs, or vibrissae (vi-bris-e; vibro – to quiver), filter coarse particles (dust, pollen) from inspired air.

The rest of the nasal cavity is lined with two types of mucous membrane.

The olfactory epithelium (mucosa), lining the slitlike superior region of the

August 29, 2020

भारत की लोकनीति क्या है?? Public Policy

लोकनीति

लोकनीति का अर्थ- लोकनीति में लोक का अर्थ सरकार सें है। अतः लोकनीति का तात्पर्य है सरकार द्वारा बनाई गई नीति। दूसरे शब्दों में जनता की विविध मांगों एवं कठिनाइयों का सामना करने के लिए सरकार को जो नीतियां बनानी पडती है उन्हें ही लोक नीतियां कहते है।

लोकनीति अथवा ‘सार्वजनिक नीति’ (Public policy) वह नीति है जिसके अनुसार राज्य के प्रशासनिक कार्यपालक अपना कार्य करते हैं। बहुत से विचार कों का मत है कि लोक प्रशासन, लोकनीति को लागू करने और उसकी पूर्ति के लिये लागू की गयी गतिविधियों का योग है।

सावर्जनिक नीति का अध्ययन अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों में प्रमुखता से किया जाता है। सार्वजनिक नीति सामान्यतया अर्थव्यवस्था, पर्यावरण, शिक्षा, तकनीकी एवं सामाजिक नीतियों जैसे सामान्य शीर्षकों में वर्गीकृत की जाती है।

हम सब अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में असंख्य सार्वजनिक नीतियों से अत्यन्त प्रभावित हैं। सार्वजनिक नीति की पहुँच व्यापक है, अत्यावश्यक से नगण्य तक। सार्वजनिक नीतियाँ आज प्रतिरक्षा, पर्यावरण सरंक्षण, चिकित्सकीय देखभाल एवं स्वास्थ्य, शिक्षा, गृह निर्माण, कराधान, महँगाई, विज्ञान और तकनीकी इत्यादि मूलभूत क्षेत्रों से संबंधित है।

सार्वजनिक नीतियां सूक्ष्म स्तर से वृहत स्तर तक अनेक पक्षों के साथ व्यवहार करती है। इसका संबंध चाहे आन्तरिक घरेलू पक्षों से हो या बाह्य विदेशी मामले से। घरेलू क्षेत्र में, सार्वजनिक नीतियां सूक्ष्म स्तर के किसी विशिष्ट गाँव पर ध्यान केन्द्रित कर सकती है या किसी विशिष्ट खण्ड या समुदाय से संबंधित हो सकती है।

इसी तरह सार्वजनिक नीतियाँ स्थानीय, राज्य या राष्ट्रीय सरकार से संबंधित हो सकती है। सार्वजनिक नीति विदेशी मामले, शिक्षा, प्रतिरक्षा, कृषि, गृह निर्माण, शहरी विकास, सिंचाई आदि से जुड़ी हो सकती है। सार्वजनिक नीतियों का विस्तार अत्यन्त नगण्य पक्ष से लेकर अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पक्ष तक हो सकता है।

इसमें किसी राष्ट्रीय नेता की स्मृति में राष्ट्रीय अवकाश घोषित करने और इसके तहत सैकड़ों करोड़ रूपये की मजदूरी देना भी सम्मिलित है।

यह अनेक रूपों में अभिव्यक्त होती है यथा कानून अध्यादेश न्यायालय के निर्णय कार्यकारी आदेश आदि लोकनीति सकारात्मक होती है क्योंकि यह सरकार की चिंताओं और विशिष्ट समस्याओं के प्रति उनकी गतिविधि को स्पष्ट करती है। लोकनीति के पीछे कानून की शक्ति से मान्यता होती है।

नकारात्मक रूप में लोकनीति को इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है कि यह किसी मुद्दे पर सरकारी अधिकारियों द्वारा कोई कदम नहीं उठाने के रूप में भी अभिव्यक्त हो सकती है। लोक नीति की प्रकृति सरकारी व निजी दोनो है। लोक नीति में लोक का अर्थ है सरकारी।

  • भारत की पहली औपचारिक नीति वन नीति थी जो वर्ष 1894 में बनी थी। 
  • 1922 में लोक नीति का अध्ययन शुरु हुआ।  
  • प्रिंसिपल ऑफ मैनेजमेंट 1954 टेरी की कृति है।  “द पॉलिसी साइंस” डेनियल लर्नर लासवेल की रचना है।
  • पीटर आड़े गार्ड ने कहा कि “लोकनीति और प्रशासन राजनीति के जुड़वा बच्चे हैं।”

सार्वजनिक नीति की अवस्थाएँ ( Stages of public policy )

(1) नीति निरूपण- सार्वजनिक नीति प्रक्रिया में पहली अवस्था नीति-निरूपण है। सार्वजनिक नीति क्रियाकलापों का प्रस्तावित अनुक्रम है जो सार्वजनिक मांगों एवं समस्याओं पर विचार करता है।

(2) नीति व्याख्या- नीति-निरूपण का कार्य पूरा होने के साथ ही नीति में तकनीकी शब्द व वाक्यांश सम्मिलित हो जाते हैं। उन पदों व वाक्यांशों की व्याख्या बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। उनके अन्यथा गलत अर्थ लगाने पर नीति त्याज्य हो सकती है। अतः सरकारी कर्ता-धर्ताओं के लिए नीति की व्याख्या करना आवश्यक हो जाता है।

(3) नीति शिक्षा- सार्वजनिक नीति की अगली अवस्था नीति-शिक्षा है। सरकार, जनसंचार के विभिन्न माध्यमों से, अपने द्वारा बनायी नीति के बारे में जनसामान्य को अवगत कराने का प्रयास करती है। लोगों को नीति के बारे में शिक्षित करना बहुत जरूरी है क्योंकि लोग इसकी पालना व आदर तभी करेंगे जब वे इसे समझ लेंगे।

(4) नीति क्रियान्वयन- नीति के निरूपण व व्याख्या करने के पश्चात् व जनसाधारण को इसके बारे में शिक्षित करने के पश्चात्, अगली अवस्था नीति को क्रियान्वित करने की होती है। यह भी एक कठिन अवस्था है क्योंकि जब तक नीतियों का उपयुक्त एवं सकरात्मक क्रियान्वयन नहीं होगा, नीतियों के निरूपण पर समरू व्यय करने का कोई लाभ नहीं होगा। क्रियान्वयन कार्य केन्द्रीय, राज्य व स्थानीय स्तर पर कई प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा किया जाता है।

(5) नीति नियन्त्रण- नीति प्रक्रिया की अंतिम अवस्था विभिन्न कर्ताओं व अभिकरणों के द्वारा निरूपित एवं क्रियान्वित की गई सावर्जनिक नीतियों पर नियंत्रण की होती है। सार्वजनिक नीतियों पर पूर्ण नियन्त्रण स्थापित करना सरकार का कत्तर्व्य है ताकि वे उद्देश्य, जिनके लिए नीतियां बनाई गई थी, प्राप्त हो सकें और उनसे जनसाधारण पर्याप्त लाभान्वित हो सके।

सार्वजनिक नीतियों पर पूर्ण नियंत्रण रखने के लिए उचित एवं उपयुक्त प्रशासनिक तथा न्यायिक कार्यों की आवश्यकता होती है।

लोकनीति

सार्वजनिक नीति के अध्ययन का महत्त्व ( Importance of public policy study )

सार्वजनिक नीति की समग्र समझ के लिए, सार्वजनिक नीति परिदृश्यों एवं पर्यावरणीय शक्तियों के मध्य के संयोजन का विश्लेषण किया जाना चाहिए।  सार्वजनिक नीति के विभिन्न आयामों को समझने की घोर आवश्कता है।

वास्तव में आधुनिक विश्व में, सार्वजनिक नीतियां मानव जाति की नियति का निर्धारण करती है। मानव मात्र का कल्याण तथा आर्थिक उद्धार, सार्वजनिक नीति की निपुणता पर निर्भर है।  यदि अकुशल नीतियाँ साल दर साल जारी रखीगयी तो वे नीतियाँ लोगों के आर्थिक स्तर का ह्रास करने में योगदान देगी।

अकुशल नीतियों को छोड़ना ही होगा। सही लक्ष्यों के साथ यही सार्वजनिक नीतियों को अपनाना होता हैं।

लोक नीति निर्माण की विशेषताएं ( Features of Public Policy Creation)

  • 1⃣ लोकहित पर आधारित।
  • 2⃣ सरकारी संस्थाओं द्वारा बनाया जाना।
  • 3⃣ लोक नीति जटिल प्रक्रिया का परिणाम।
  • 4⃣ दिशा निर्देश रेखांकित करना।
  • 5⃣ भविष्योंन्मुख
  • 6⃣ विभिन्न निकायों व प्राधिकरणों का योगदान।

लोक नीति के प्रकार ( Types of public policy )

भारत में लोकनीति यों का वर्गीकरण मुख्य रूप से दो आधारों पर किया जाता है-

विषय वस्तु के आधार पर-

विषय वस्तु के आधार पर लोकनीतियां के निम्न प्रकार की हो सकती है-

  • आर्थिक
  • सामाजिक
  • राजनीतिक
  • सुरक्षा संबंधी आदि

नीति की तकनीकी प्रकृति के आधार पर-

  • तात्विक अथवा सारगत नीतियां
  • नियंत्रक नीतियां
  • वितरक नीतियां
  • पुनः वितरक नीतियां
  • निर्माणकारी नीतियां

लोकनीति निर्माण के चरण ( Steps for the development of democracy )

  • 1⃣ समस्या को पहचानना
  • 2⃣ समस्या के समाधान हेतु विभिन्न उपलब्ध विकल्पों का तुलनात्मक अध्ययन
  • 3⃣ सबसे उत्तम विकल्प का चयन
  • 4⃣  नीतियों का क्रियान्वयन
  • 5⃣ लोकनीति क्रियान्वयन की देखरेख
  • 6⃣ मूल्यांकन

भारत में नीति निर्धारण के अभिकरण ( Agency for Policy Assessment in India )

1⃣ संविधान

2⃣ संसद

3⃣ मंत्रिमंडल

4⃣ संघीय अभिकरण-

  • नीति आयोग
  • राष्ट्रीय विकास परिषद्
  • वित आयोग
  • अन्तर्राज्य परिषद्
  • क्षेत्रीय परिषदे

5⃣न्यायपालिका

6⃣दबाव समूह

7⃣प्रेस

8⃣परामर्श समितियां

9⃣ राजनीतिक दल

August 29, 2020

भारतीय लोकतंत्र एवं चुनोतियाँ Indian democracy and challenges

भारतीय लोकतंत्र एवं चुनोतियाँ

राजनीतिक व्यवस्था एक सामाजिक संस्था है जो किसी देश के शासन से संव्यवहार करती है और लोगों से इसका संबंध प्रकट करती है। राजनितिक कुछ मूलभूत सिद्धांतों का समुच्चय है जिसके इर्द-गिर्द राजनीति और राजनीतिक संस्थान विकसित होते हैं या देश को शासित करने हेतु संगठित होते हैं।

राजनीतिक व्यवस्था में ऐसे तरीके भी शामिल होते हैं जिसके अंतर्गत शासक चुने या निर्वाचित होते हैं, सरकारों का निर्माण होता है तथा राजनीतिक निर्णय लिए जाते हैं।  समाज में राजनीतिक पारस्परिक विमर्श तथा निर्णय-निर्माण की संरचना एवं प्रक्रिया सभी देशों की राजनीतिक व्यवस्था में समाहित होते हैं।

व्यक्ति की बहुविध जरूरतों की पूर्ति हेतु राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण हुआ है। संविधानवाद की अवधारणा एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था है जो एक संविधान के अंतर्गत शासित होती है और जो आवश्यक रूप से सीमित सरकार और कानून के शासन को प्रतिबिम्बित करती है तथा एक मध्यस्थ, कुलीतंत्रीय, निरंकुश तथा अधिनायकवादी व्यवस्था के विपरीत होती है।

किसी देश का संविधान राजनीतिक व्यवस्था के आधारभूत ढांचे की स्थापना करता है जिसके द्वारा लोग शासित होते हैं।  यह विभिन्न अंगों-विधानमण्डल, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका की स्थापना के साथ-साथ उनकी शक्तियों, जिम्मेदारियों एवं उनके एक-दूसरे के साथ और लोगों के साथ संबंधों को विनियमित करती है।

इसलिए संवैधानिक सरकार लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के लिए अपरिहार्य है।

लोकतंत्र की चुनौतियाँ ( Challenges of democracy )

चुनौती का मतलब कोई भी चुनौती केवल एक समस्या नहीं होती है। उसी समस्या को चुनौती का नाम दिया जाता है जो महत्वपूर्ण.हो और जिसे पार पाया जा सके।  जिस समस्या में आगे बढ़ने के अवसर छुपे हुए होते हैं उसे हम चुनौती कहते हैं। एक बार जब हम किसी चुनौती पर विजय प्राप्त कर लेते हैं तो हम पहले से कहीं अधिक आगे बढ़ते हैं।

लोकतंत्र

लोकतंत्र की मुख्य चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं:-

  1. आधार तैयार करने की चुनौती
  2. विस्तार की चुनौती
  3. लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करना

1. आधार तैयार करने की.चुनौती

अलग अलग देशों को अलग अलग चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। अभी विश्व का एक चौथाई हिस्सा लोकतंत्र से अछूता है। दुनिया के ऐसे कोनों में लोकतंत्र की चुनौती बिलकुल साफ है।

2. विस्तार की चुनौती:-

ज्यादातर स्थापित लोकतंत्र में विस्तार की चुनौती होती है। इसका मतलब है कि किसी देश के हर क्षेत्र में लोकतांत्रिक सरकार के मूलभूत सिद्धांतों को लागू करना और उसके प्रभाव को समाज के हर वर्ग और देश की हर संस्था तक पहुँचाना।

स्थानीय स्वशाषी निकायों को अधिक शक्ति प्रदान करना, संघ के हर इकाई को संघवाद के प्रभाव में लाना, महिलाओं और अल्पसंख्यकों को मुख्यधारा से जोड़ना

3. लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करना

लोकतंत्र को गहराई तक मजबूत करने की चुनौती का सामना हर लोकतंत्र को करना पड़ता है।  इसका मतलब है लोकतंत्र की प्रक्रियाओं और संस्थानों को मजबूत करना।  ऐसा इस तरह से करना होगा जिससे लोगों को लोक_तंत्र से अपनी अपेक्षाओं के बारे में सही जानकारी मिले।_

लोकतंत्र से साधारण लोगों की अपेक्षाएँ अलग अलग समाज में अलग अलग तरह की होती हैं।

August 29, 2020

What is Civil rights? नागरिक अधिकार_क्या है ??

Civil rights नागरिक

नागरिक

अधिदेश

अधिदेश देश में औषध क्षेत्र के विकास और साथ ही मूल्य निर्धारण एवं वहनीय मूल्यों पर दवाइयों की उपलब्धता, अनुसंधान एवं विकास, बौद्धिक सम्पदा अधिकारों की सुरक्षा और औषध क्षेत्र से संबंधित अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं पर अधिकाधिक ध्यान एवं बल देना।

दृष्टिकोण और मिशन

दृष्टिकोण भारत : वहनीय मूल्यों पर गुणवत्तायुक्त दवाइयों का सबसे बड़ा वैश्विक प्रदाता

मिशन:

  • औषध नीति के अनुसार वहनीय मूल्यों पर गुणवत्तायुक्त दवाइयों की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
  • औषध अवसंरचना का विकास तथा सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से भी औषध क्षेत्र में नवीन प्रगति।
  • फार्मा ब्रांड इंडिया का संवर्धन
  • औषध उद्योग के पर्यावरण धारणीय विकास को संवर्धित करना।
  • मानव जाति के लाभ के लिए औषध विज्ञान की शिक्षा एवं अनुसंधान के क्षेत्र में राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय रूप से अधिमान्य ब्रांड के रूप में नाईपरों को स्थापित करना।

सुशासन प्रत्येक राष्ट्र के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण तत्व है। सुशासन के लिए आवश्यक है कि प्रशासन में पारदर्शिता तथा जवाबदेही दोनों तत्व अनिवार्य रुप से विद्यमान हो। सिटीजन चार्टर अर्थात नागरिक अधिकार पत्र एक ऐसा ही हथियार है जोकि प्रशासन की जवाबदेहीता व पारदर्शिता को सुनिश्चित करता है तथा प्रशासन के साथ व्यवहार करते समय आम जनता अर्थात उपभोक्ताओं को सही सेवाओं की प्राप्ति सुनिश्चित करता है।

सिटीजन चार्टर एक ऐसा माध्यम है जो जनता तथा सरकार के बीच विश्वास की स्थापना करने में अत्यंत सहायक है।

विश्व का नागरिक अधिकार पत्र के संबंध में पहला अभिनव प्रयोग 1991 में यूनाइटेड किंगडम में कंजरवेटिव पार्टी के प्रधानमंत्री जान मेजर ने राष्ट्रीय कार्यक्रम के तौर पर किया गया था जिसे बाद में लेबर पार्टी के टोनी ब्लेयर ने भी आगे बढ़ाया।

नागरिक चार्टर का मूल उद्देश्य सार्वजनिक सेवा वितरण के संबंध में नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है।

नागरिक अधिकार पत्र के महत्वपूर्ण सिद्धांत निम्न प्रकार हैं-:

  • गुणवत्ता
  • विकल्प
  • मानदंड
  • मूल्य
  • जवाबदेही
  • पारदर्शिता

24 मई 1997 को राज्यों की एक कॉन्फ्रेंस में प्रभावी एवं उत्तरदाई सरकार की एक कार्य योजना तैयार की गई जिसमें निर्णय लिया गया कि राज्य तथा केंद्र सरकार के बड़े विभागों यथा रेलवे, पोस्ट ऑफिस, बैंक आदि से नागरिक अधिकार पत्र की शुरुआत की जाए।

अधिकार पत्र में निम्नलिखित तत्वों को शामिल किया जाता है :

  1. विज़न और मिशन स्टेटमेंट
  2. संगठन द्वारा संचालित व्यापार का विवरण
  3. ग्राहकों का विवरण
  4. प्रत्येक ग्राहक समूह को प्रदान की गई सेवाओंका विवरण
  5. शिकायत निवारण तंत्र का विवरण और इसका उपयोग कैसे करना है
  6. ग्राहकों से उम्मीदे प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग ने सार्वजनिक सेवा डिलीवरी के लिए रूपरेखा में सुधारके आकलन के रूप में 2006 में सेवोत्तम ढांचा तैयार किया था।

इसमें मूल रूप से तीन मॉड्यूल हैं:–

  1. नागरिक अधिकार पत्र,
  2. लोक शिकायत समाधान प्रणाली,
  3. सेवा डिलीवरी क्षमता।

यह ढांचा सरकारी विभागों को अपनी लोक सेवा डिलीवरी सुधारने में मदद करता है। शुरू में सेवोत्तम ढांचा सरकार के 10 विभागों में अप्रैल 2009 से जून 2010 के दौरान लागू किया गया था। ये विभाग हैं – डाक विभाग, सीबीईसी, सीबीडीटी, रेलवे, पासपोर्ट कार्यालय, पेंशन, खाद्य प्रसंस्करण, कार्पोरेट मामले, केन्द्रीय विद्यालय और ईपीएफओ

इस परियोजना का विस्तार अब सरकार के 62 मंत्रालयों में कर दिया गया है।

August 28, 2020

व्यवस्था एवं शासन- विधिक अधिकार Legal right

व्यवस्था एवं शासन- विधिक अधिकार

विधिक अधिकार वे हैं जो किसी दत्त विधिक प्रणाली द्वारा किसी व्यक्ति को प्रदान किये जाते हैं

अर्थात्, वे अधिकार जो मानवीय नियमों द्वारा परिवर्तित, निरसित और निरुद्ध किये जा सकते।

विधिक सहायता का अधिकार ऐसे लोगों जो न्याय पाने के लिये वकीलों और अदालतों का खर्च वहन नहीं कर सकते, को निःशुल्क विधिक सहायता प्रदान करता है।

भारतीय संविधान में उल्लिखित राज्य के नीति-निदेशक तत्त्वों के अंतर्गत इसे अनुच्छेद 39- A के तहत जोड़ा गया है,

जिसके अंतर्गत गरीब और वंचित वर्गों के लिये निःशुल्क विधिक सहायता उपलब्ध करवाना राज्य का कर्त्तव्य होगा।

विधिक सहायता का महत्त्व

विधिक सहायता का अधिकार यह सुनिश्चित करने का तरीका है

कि किसी व्यक्ति को गरीबी और निरक्षरता के कारण न्याय प्राप्त करने से वंचित नहीं रखा जा सकता।

यह न्याय तक गरीबों की पहुँच को सरल बनाकर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करता है। यह समानता के सिद्धांत को स्थापित करता है तथा नागरिकों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों को संरक्षित करने का प्रयास करता है।

यह अधिकार राज्य द्वारा लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिये सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने में सहायता करता है। महँगे और देरी से मिलने वाले न्याय के विपरीत यह कमज़ोर व्यक्ति की आवाज़ उठाने का काम करता है और उसके लिये त्वरित एवं सस्ता न्याय उपलब्ध करवाता है।

अन्य वैकल्पिक उपाय ( Other alternative solutions )

विवाद को विशेष न्यायाधिकरणों के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है। इनके द्वारा दिये गए निर्णय बाध्यकारी होते हैं। यहाँ सामान्य सुनवाई की तुलना में औपचारिकता कम होती है। इनमें अपील करने का अधिकार नहीं होता तथा इनमें न्यायिक हस्तक्षेप की बहुत कम गुंजाइश होती है।

समझौते या सुलह के रूप में एक गैर-बाध्यकारी प्रक्रिया, जिसमें एक निष्पक्ष तीसरा पक्ष सहायता करता है। इसमें भी औपचारिकता कम होती है।यदि दोनों पक्ष सहमत होते हैं, तो इनका निर्णय बाध्यकारी होता है।  मध्यस्थ के माध्यम से भी विवादों का निपटारा संभव है।

इसमें मध्यस्थ दोनों पक्षों के बीच संवाद स्थापित करवाने में मदद करता है, जैसे- महिला न्यायालय

कई प्रकार के न्यायाधिकरण, उपभोक्ता फोरम, लोक अदालतें, परिवार न्यायालय, फास्ट ट्रैक अदालतें व लोकपाल आदि न्यायिक प्रक्रिया की गति को तेज़ करने का प्रयास कर रहे हैं।

 वैकल्पिक न्याय प्रणाली न्यायपालिका के भार को कम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

जागरूकता की कमी के कारण लोग इसका लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण को इसके प्रचार के लिये प्रयास करना चाहिये।

अखिल भारतीय न्यायिक सेवा की स्थापना से भी भारतीय न्याय व्यवस्था में क्रांतिकारी सुधार किया जा सकता है।