1 बुंदेलखंड की लोक चित्रकला

बुंदेलखंड में लोक चित्र परंपरा अपनी पृथक पहचान रखती है

पर्व त्योहारों पर बुंदेली महिलाएं उनसे संबंधित चित्र रेखांकन बनाकर उनकी पूजा कथा कहती हैं

वर्ष पर कोई ना कोई चित्र बनाने की परिपाटी समूचे बुंदेलखंड में मिलती है

  • सुरैती :- सुरैती बुंदेलखंड का पारंपरिक भित्तिचित्र है
  • दीपावली के आधार पर लक्ष्मी पूजा के समय सुरैती का रेखांकन महिलाओं द्वारा किया जाता है
  • सुरेती जी का जालीनुमा अंकन बुंदेली महिलाओं की कल्पनाशीलता की कलात्मक परिणीति है
  • इस चित्र में देव लक्ष्मी की आकृतियों करी जाती है वही भगवान विष्णु का आलेखन किया जाता है
  • सुरेहती का रेखांकन गेरू से किया जाता है
  • पूजा के पश्चात लक्ष्मी जी की कथा कही जाती है
  • सुरेती की लोकप्रिय कला की दृष्टि से बुंदेलखंड का सर्वश्रेष्ठ प्रतीकात्मक चित्र है
  • नौरता :- नवरात्रि में कुंवारी कन्याओं द्वारा बनाया जाने वाला व्यक्ति उदेखड़ का चित्र है
  • जो मिट्टी गेरू से हल्दी छुई आदि से बनाया जाता है लड़कियां सटा संबंधी गीत गाती है !
  • मोरते:- मोरते विवाह भित्ती लेखांकन है एक दरवाजे के दोनों तरफ की दीवार पर बनाए जाते हैं
  • पुतरी की आकृति प्रमुख होती है इसी जगह दूल्हा-दुल्हन हल्दी से थाप लगाते हैं
  • गोधन (गोवर्धन):- गोवर्धन गोबर से बनाए जाते हैं दीपावली पड़वा पर इसकी पूजा की जाती है
  • भाईदूज की दिन गोबर से तो पूतलिया बनाई जाती है
  • मोरइला:- मोरइला का अर्थ मोर के चित्रों से है इसे मोर मुरैला भी कहते हैं
  • इसका संबंध व्यक्ति अलंकरण से है
  • दीवारों को छुई मिट्टी से पूछ कर उस पर पतली गीली मिट्टी से मोरो की जोड़ी की आकृतियां बनाई जाती है
  • सूखने के बाद जिन्हें गेरु खड़ीया आदि रंग कई रंगों से रंगते हैं कोई कोई एक रंग में मोर मुरैना रंग देते हैं

2 नाग भक्ति चित्र

नाग पंचमी के दिन बघेली महिलाएं घर की भीतरी दीवार पर गेरू अथवा गोबर के गोल से दूध पीते हुए नाग नागिन के जोड़े का रेखांकन करती हैं पूजा करती हैं

भूमि चित्रों में कुंडा रिकॉर्ड सुख है छिपा त्वचा पर भी विभिन्न अवसरों पर भी तो पर लगाए जाते हैं

इसी तरह वधू मंडप में बरायन दंहेगर अग्रोहन सजाने की कला भी है

3 मालवा की लोक चित्रकला

मालवा में दो तरह की लोकचित्र परंपरा है एक वह परंपरा जो पर्व त्योहारों पर घर की महिलाएं व्रत अनुष्ठान के साथ दीवारों पर गेरों खड़िया चावल के आटे को घोलकर बनाती हैं

वह दूसरी जिनके बनाने वाले पैसेवर चितेरे होते हैं इस चित्र कला को मालवा में चित्रों व कहते हैं

जो घर की बाहरी व्यक्तियों अथवा मंदिरों के अहतों में बनाई जाती है !

पर्व त्योहारों पर बनाई जाने वाली चित्रकला की दो तरह की होती है एक भित्ति चित्र दूसरे में अलंकरण मालवा के भित्ति चित्रों की अजस्त्र अतुल परंपरा है

दिवासा नाथ भेरू जी सरवण जन्माष्टमी संजा माई माता दी भक्ति कला के श्रेष्ठ उदाहरण है

इनमें संजय मालवा की किशोरियों का पर्व है जो पूरे श्रद्धा पक्ष में मनाया जाता है इस में किशोरियों प्रतिदिन गोबर फूल पत्ती अथवा चमकीली पत्तियों से 16 दिन संजा के अलग-अलग पारंपरिक आकृतियां बनाती हैं

अंतिम दिन सुंदर किला कौण बनाया जाता है लड़कियां प्रतिदिन संध्या की आरती उतारकर समूह में गीत गाती है

चित्र बनाने वाले कलाकारों की एक जाति विशेष होती है जिन्हें विवाह में बाहर दीवार पर विश्रावण के लिए मान सम्मान और नेक के साथ आमंत्रित किया जाता है

चित्रावन कलाकार आकृति अलंकरण में बनाई गई आंखों के हिसाब से अपना परिश्रमिक तय करते हैं

उनके साथ में एक अलग होता है

चितेरे ,मंगल कलश, मुख्य द्वार सज्जा,कलश ठुलाती महिलाएं भक्ति में दूल्हा दुल्हन हाथी पर दूल्हा-दुल्हन बारात बैंड वाले घुड़सवार पालकी बेल-बूटे बूटे पशु-पक्षी ब्याई ब्याण गणेश शंकर पार्वती देवी देवताओं के रंगीन चित्रों उकेरते हैं मंदिरों में देवी देवताओं के संबंधित चित्र अधिक होते हैं

चित्र वर्णन में मिट्टी के चटकरगों का उपयोग किया जाता है चित्र वर्णन के चितेरे इतने सिद्धहस्त होते हैं

कि वह बिना से स्केच के दीवार पर सीधा चित्र बनाते हैं उज्जैन के श्री धूल जी चित्रावण शैली के सबसे वरिष्ठ और शीर्ष चित्रकार हैं

उनके चित्र भारत भवन मानव संग्रहालय मध्यप्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद भोपाल हस्तशिल्प दिल्ली तथा विदेशों तक में संकलित है

4 निमाड़ की लोक चित्रकला

निमाड़ की लोक चित्रकला

निमाड़ अंचल में लोक चित्रकला की परंपरा सदियों से चली आ रही है

घर की दीवारों पर कुछ ना कुछ रेखांकन अवश्य मिलते हैं यही लोग चित्र जो परंपरा से बनते मिटते चले आ रहे हैं

पूरे वर्ष पर्व तिथि त्योहारों से संबंधित क्षेत्रों से संबंधित भित्ति चित्रों का रेखांकन पूजा प्रतिष्ठान चर्चा एवं से संबंधित लोकगीत कथाएं वार्ता जल्दी ही रहती है

हरियाली अमावस्या की जिरोती, नागपंचमी को नाग भित्तिचित्र, कुवार मास में संजाफुली, नवरात्रि में नवरात्र,दशहरे के दिन दशहरा का चित्र शैली, सप्तमी पर हाथ (थापा) दीपावली पर पड़वा गोवर्धन, दिवाली दूज पर भाई दूज का भित्ति चित्र,दीवाली पर ही व्यापारियों द्वारा शुभ मुहूर्त लक्ष्मी पूजा में गणपति और सरस्वती का हल्दी कुमकुम से रेखांकन ,देव प्रबोधिनी ग्यारस पर खोपड़ी पूजन, विवाह में कुल देवी का भित्तिचितत्र ,दरवाजे पर सती मुख्य द्वार पर गणपति पाना दूल्हा दुल्हन के हाथों में मेहंदी मांडना ,दूल्हा दुल्हन के मस्तक पर कंकाली भरना, पहले सुसु जानवर पर पगलिया का शुभ संदेश रेखांकन शांतिया और चौक कलश आदि मेला बाजारों में भिन्न-भिन्न गुना आकृतियों का रेखांकन निर्माण की अजस्त्र लोकचित्र परंपरा है !

भूमि अलंकरण के रूप में मांड्णा सर्वथा एक स्वतंत्र रूप पूर्णकला विधा है

दीपावली पर तो मांड्णा घर आंगन लक्ष्मी पूजा की जगह विशेष रूप से बनाए जाते हैं

एक गैरू तथा दूसरा खड़िया गैरों की लाल मुंडा लहरी रेखाओं के आसपास जब खड़िया की सफेद रेखा कलात्मक कल्पनाशील जल बूंदी है

तब मांड्णा से बनने ज्यामितिक प्रतीकों के सौंदर्य और अर्थ में श्री वृद्धि हो जाती है

मांड्णा घर की सुंदरता तो बढ़ती ही है मांगलिक ता के साथ धन-धान्य की भी पूर्ति करते हैं

लोक चित्रकला

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