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Psychology

September 29, 2020

Wisdom शिक्षा मनोविज्ञान- बुद्धि और अधिगम पठार

Wisdom शिक्षा मनोविज्ञान- बुद्धि

बुद्धि की परिभाषा ( Definition of intelligence )

थार्नडाइक के अनुसार “उत्तम क्रिया करने तथा नई परिस्थितियों के साथ समायोजन करने की योग्यता को बुद्धि कहते हैं।”

थॉमसन के अनुसार- “बुद्धि वंशपरम्परागत प्राप्त विभिन्न गुणों का योग है।”

वेस्लर के मत में – “बुद्धि व्यक्ति की क्षमताओं का वह समुच्चय है जो उसकी ध्येयात्मक क्रिया, विवेकशील चिंतन तथा पर्यावरण के प्रभाव से समायोजन कराने में सहायक होती है।”

स्टोडार्ड के मतानुसार “बुद्धि (क) कठिनता (ख) जटिलता (ग) अमूर्तता (ड.) आर्थिकता (च) उद्देश्य प्राप्यता (छ) सामाजिक मूल्य तथा (ज) मौलिकता से सम्बंधित समस्याओं को समझने की योग्यता है।”

बुद्धि लब्धि का मान एवं अर्थ ( Meaning of wisdom )

  • 140 या उससे उपर प्रतिभाशाली
  • 120 से 139 अतिश्रेष्ठ
  • 110 से 119 श्रेष्ठ
  • 90 से 109  सामान्य
  • 80 से 89 मन्द
  • 70 से 79 सीमान्त मंदबुद्धि
  • 60 से 69 मंदबुद्धि
  • 20 से 59 हीनबुद्धि
  • 20 से कम जड़बुद्धि

बुद्धि_का मापन ( Measurement of intelligence )

बुद्धि परिक्षण के निर्माण का पहला प्रयास फ्रांसीसी मनोवैज्ञानिक अल्फ्रेड बिने ने 1905 में किया बिने को_बुद्धि लब्धि के विचार का जनक माना जाता है

1908 में बिने ने साइमन के सहयोग से बिने साइमन परीक्षण का विकास किया  स्टर्न ने 1912 में मानसिक लब्धि की बात कहीं,  

टरमन के अनुसार एक व्यक्ति गसी अनुपात में बुद्धिमान है जिस अनुपात में वह अमूर्त चिंतन करने योग्य है  टरमन ने बुद्धि लब्धि का ज्ञात करने के लिए सूत्र में 100 का गुणा कर दिया

बुद्धि_लब्धि =  ( मानसिक आयु / वास्तविक आयु ) X 100 

बुद्धि_के प्रकार ( Types of intelligence )

ई. एल. थार्नडाइक ने_बुद्धि के तीन प्रकार बतलाये है।

  1. सामाजिक_बुद्धि ( Social intelligence  )
  2. अमूर्त_बुद्धि ( Intangible intelligence )
  3. मूर्त_बुद्धि ( Tangible intelligence )

बुद्धि

अधिगम पठार

सीखते समय या अधिगम करते समय जब हमारी सीखने की गति अचानक रुक जाती है तो इसे अधिगम का पठार कहते है

जब अधिगम की दर में लंबे समय तक स्थिरता की स्थिति हो अर्थात ना तो अधिगम वक्र में चढ़ाव आ रहा है और ना अधिगम वक्र में उतारा रहा है इस स्थिरता को अधिगम पठार कहते हैं

यह अधिगम का पठार नई चीजों को सीखने में ; एक अवस्था से दूसरी अवस्था में सीखने पर ; काम की जटिलता होने पर ; रुचि का अभाव थकान कार्य की उदासीनता ; गलत आदतों से सीखने पर आदि कारणों से होता है

September 29, 2020

Psychology Introduction मनोविज्ञान का परिचय

मनोविज्ञान का परिचय

मनोविज्ञान का_परिचय

मनोविज्ञान_को शताब्दियों पूर्व ” दर्शन शास्त्र ” कि एक शाखा केरूप मे माना जाता था । मनोविज्ञान को स्वतंत्र विषय बनाने के लिए इसे परिभाषित करना शुरू किया ।

PSYCHOLOGY शब्द कि उत्पत्ति लैटिन भाषा के दो शब्दो PSYCHE+LOGOS से मिलकर हुई हैं, PSYCHE का अर्थ होता है ” आत्मा का” तथा LOGOS का अर्थ होता हैं “अध्ययन करना ” 

इस शाब्दिक अर्थ के आधार पर सर्वप्रथम प्लेटो, अरस्तु और डेकार्ट के द्वारा मनोविज्ञान को ” आत्मा का विज्ञान ” माना गया ।

आत्मा शब्द की स्पष्ट व्याख्या नहीं होने के कारण 16वीं शताब्दी के अंत मे यह परिभाषा अमान्य हो गई । 17वीं शताब्दी मे इटली के मनोवैज्ञानिक पॉम्पोनोजी ने मनोविज्ञान को ” मन या मस्तिष्क का विज्ञान ” माना । बाद मे यह परिभाषा भी अमान्य हो गई ।

19वीं शताब्दी में विलियम वुन्ट, विलियम जेम्स, वाइव्स और जेम्स सली आदि के द्वारा मनोविज्ञान को ” चेतना का विज्ञान ” माना गया था, अपूर्ण अर्थ होने के कारण यह परिभाषा भी अमान्य हो गई ।

20वीं शताब्दी में मनोविज्ञान को ” व्यवहार का विज्ञान ” माना हैं और आज तक यह परिभाषा प्रचलित हैं । 

व्यवहार का विज्ञान मानने वाले प्रमुख मनोवैज्ञानिक हैं – वाटसन, इसके अलावा वुडवर्थ , स्किनर , थॉर्नडॉइक और मैक्डुगल आदि मनोवैज्ञानिकों ने भी मनोविज्ञान को ” व्यवहार का विज्ञान ” माना है

विलियम वुन्ट ने जर्मनी के ” लिपजिग ” स्थान पर 1879 ई. में प्रथम ” मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला ” स्थापित की, इसलिए विलियम वुन्ट को ” प्रयोगात्मक मनोविज्ञान का जनक ” माना जाता हैं

विलियम मैक्डुगल ने अपनी पुस्तक ” आउट लाइन साइकोलॉजी ” के पृष्ट संख्या 16 पर ” चेतना शब्द ” की भरसक निन्दा की हैं ।

मनोविज्ञान व्यवहार का शुध्द विज्ञान हैं “- वाटसन ।

“तुम मुझे कोई भी बालक दे दो में उसे वैसा बनाउँगा जैसा मैं उसे बनाना चाहता हूँ ” – वाटसन ।

” मनोविज्ञान ने सर्वप्रथम अपनी आत्मा का त्याग किया ,फिर मन का त्याग किया ,फिर चेतना का त्याग किया और आज मनोविज्ञान व्यवहार के विधि के स्वरूप को स्वीकार करता हैं ” – वुड़वर्थ ।

मनोविज्ञान की मुख्य शाखाएँ या क्षेत्र ( Main branches or area of Psychology )

1. सामान्य मनोविज्ञान
2. असामान्य मनोविज्ञान
3. तुलनात्मक मनोविज्ञान
4. प्रयोगात्मक मनोविज्ञान
5. समाज मनोविज्ञान
6. औधोगिक मनोविज्ञान
7. बाल मनोविज्ञान
8. किशोर मनोविज्ञान
9. प्रोढ़ मनोविज्ञान
10. विकासात्मक मनोविज्ञान
11. शिक्षा मनोविज्ञान
12. निदानात्मक या उपचारात्मक या क्लिनिकल मनोविज्ञान
13. परा मनोविज्ञान ( आधुनिकतम शाखा )
14. पशु मनोविज्ञान 

मनोविज्ञान का परिचय मनोविज्ञान का परिचय मनोविज्ञान का परिचय

August 13, 2020

विशिष्ट बालकों की पहचान व शिक्षा Specific Children???

अधिगम अक्षम बालक  Learning disabled child )

  • औसत विद्यालय उपलब्धि से निम्न का प्रदर्शन
  • निष्पादन संबंधी कठिनाई से युक्त।
  • बिना सोचे – विचारे कार्य करना
  • उपयुक्त आचरण नहीं करना
  • निर्णयात्मक क्षमता का अभाव
  • स्वयं के प्रति लापरवाही
  • लक्ष्य से आसानी से विचलित होना
  • सामान्य ध्वनियों एवं दृश्यों के प्रति आकर्षण
  • ध्यान कम केन्द्रित करना या ध्यान का भटकाव
  • भावात्मक अस्थिरता
  • एक ही स्थिति में शांत एवं स्थिर रहने की असमर्थता
  • स्वप्रगति के प्रति लापरवाही बरतना
  • सामान्य से ज्यादा सक्रियता
  • गामक क्रियाओं में बाधा
  • कार्य करने की मंद गति
  • सामान्य कार्य को संपादित करने के लिए एक से अधिक बार प्रयास करना
  • पाठ्य सहगामी क्रियाओं में शामिल नहीं होना
  • क्षीण स्मरण शक्ति का होना
  • बिना बाहय हस्तक्षेप के अन्य गतिविधियों में भाग लेना में असमर्थ होना तथा
  • प्रत्यक्षीकरण संबंधी दोष।

अधिगम अक्षमता का वर्गीकरण ( Classification of learning disabilities )

इसका प्रमुख विभेदीकरण ब्रिटिश कोलंबिया एवं ब्रिटेन के शिक्षा मंत्रालय द्वारा प्रकाशित पुस्तक सपोर्टिंग स्टूडेंट्स विद लर्निंग डिएबलिटी ए गाइड फॉर टीचर्स में दिया गया है, जो निम्नलिखित है –

  • Dyslexia ( पढ़ने संबंधी विकार )
  • Disgraficica डिस्ग्राफिया (लेखन संबंधी विकार)
  • Disclosure डिस्कैलकूलिया (गणितीय कौशल संबंधी विकार)
  • Dysphagia डिस्फैसिया (वाक् क्षमता संबंधी विकार)
  • Dyspraxia डिस्प्रैक्सिया (लेखन एवं चित्रांकन संबंधी विकार)
  • Dysarthographia डिसऑर्थोग्राफ़िय (वर्तनी संबंधी विकार)
  • Auditory processing disorder ऑडीटरी प्रोसेसिंग डिसआर्डर (श्रवण संबंधी विकार)
  • Visual perception disorder विजुअल परसेप्शन डिसआर्डर (दृश्य प्रत्यक्षण क्षमता संबंधी विकार)
  • Sensitive integration and processing disorder सेंसरी इंटीग्रेशन ऑर प्रोसेसिंग डिसआर्डर (इन्द्रिय समन्वयन क्षमता संबंधी विकार)
  • Organizational Learning disorder ऑर्गेनाइजेशनल लर्निंग डिसआर्डर (संगठनात्मक पठन संबंधी विकार)

सृजनात्मक बालक ( Creative child )

सृजनात्मकता का अर्थ है -सृजन करना,बनाना,उत्पन्न करना,आदि .

जेम्स ड्रेवर -“ अनिवार्यतः किसी नई वस्तु का सृजन करना ही सृजनात्मकता है “.

गिल्फोर्ड के अनुसार सृजनात्मकता के तत्व निम्नलिखित है –

1 तात्कालिक /वर्तमान से हटकर दूरदर्शी चिंतन का मूर्त रूप देना .
2.समस्या की पुनर्व्याख्या .
3.असामान्य किन्तु प्रासंगिक विचारों से सामंजस्य .
4.अन्य के विचारो में सार्थक /रचनात्मक परिवर्तन.

सृजनात्मक बालक की पहचान ( Creative child’s identity )

  • मौलिकता के दर्शन होते है 
  • स्वतंत्र निर्णय की क्षमता 
  • परिहास प्रिय
  • उत्सुकता 
  • संवेदनशीलता 
  • स्वायत्ता 

सृजनात्मकता परिक्षण ( Creativity Test )

  • चित्रपुर्ती करना 
  • पी आई टी -प्रोडक्ट इम्प्रूवमेंट टास्क 
  • वृत्त-परिक्षण -सर्किल टेस्ट -वृत्त में चित्र बनाना .
  • अनुपयोगी वस्तुओ जैसे-टीन के डिब्बे,बोतले आदि से संस्थापन.

सृजनात्मकता विकास ( Creativity development )

  • शिक्षक को सृजनात्मकता परिक्षण करना चाहिए , और सृजन -क्षमता वाले बालकों को सूचीबद्ध करना चाहिए.
  • रचनात्मक गतिविधिया आयोजित करनी चाहिए.
  • मौलिक प्रदर्शन के अवसर देने चाहिए .
  • बुलेटिन बोर्ड सजाना, कक्षा-पत्रिका, कार्नर आदि तैयार करवाना.
  • सृजनात्मकता परिक्षण के लिए भारत के पासी और बाकर मेहंदी जाने जाते है.

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August 7, 2020

Personality Meaning and Theory व्यक्तित्व अर्थ सिध्दांत

व्यक्तित्व – अर्थ सिध्दांत

व्यक्तित्व के सिद्धांत ( Principles of personality )

मनोविश्लेषण सिद्धांत ➖फ्रायड
आत्मज्ञान का सिद्धांत ➖हर्ज वर्ग मास्लो
रचना का सिद्धांत➖ शेल्डन
आलपोर्ट का सिद्धांत ➖आलपोर्ट
नव फ्रायड सिद्धांत ➖ एरिक्सन एरिक्फ्राम
जीव सिद्धांत ➖गोल्डस्टीन

एब्राहम मैसलो: व्यक्तित्व का मानवतावादी सिद्धान्त ( Abraham Misllo: The Humanitarian Principle of Personality )

एब्राहम मैसलो मानवतावादी मनोविज्ञान के आध्यात्मिक जनक माने गए है।
मैसलो ने अपने व्यक्तित्व सिद्धान्त में प्राणी के अनूठापन का उसके मूल्यों के महत्व पर तथा व्यक्तिगत वर्धन तथा आत्म निर्देश की क्षमता पर सर्वाधिक बल डाला है।
इस बल के कारण ही उनका मानना है कि सम्पूर्ण प्राणी का विकास उसके भीतर से संगठित ढंग से होता है। इन आन्तरिक कारकों की तुलना में बाहय कारकों जैसे गत अनुभूतियों का महत्व नगण्य होता है।

व्यक्तित्व एवं अभिप्रेरण का पदानुक्रमिक मॉडल ( Hierarchical model of personality and motivation )

व्यक्तित्व

मैसलो के व्यक्तित्व सिद्धान्त का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उसका अभिप्रेरण सिद्धान्त है।  इनका विश्वास था कि अधिकांश मानव व्यवहार की व्याख्या कोइ न कोइ व्यक्तिगत लक्ष्य पर पहुंचने की प्रवृत्ति से निर्देशित होता है।
मैसलों का मत था कि मानव अभिप्रेरक जन्मजात होते है और उन्हें प्राथमिकता या शक्ति के आरोही पदानुक्रम में सुव्यवस्थित किया जा सकता है।

ऐसे अभिप्रेरकों को प्राथमिकता या शक्ति के आरोही क्रम में इस प्रकार बतलाया गया है-

  1. शारीरिक या दैहिक आवश्यकता
  2. सुरक्षा की आवश्यकता
  3. संबंद्धता एवं स्नेह की आवश्यकता
  4. सम्मान की आवश्यकता तथा
  5. आत्म सिद्धि की आवश्यकता

इनमें से प्रथम दो आवश्यकताओं अर्थात शारीरिक या दैहिक आवश्यकता तथा सुरक्षा की आवश्यकता को निचले स्तर की आवश्यकता तथा अन्तिम तीनआवश्यकताओं अर्थात संबंद्धता एवं स्नेह की आवश्यकता, सम्मान की आवश्यकता तथा आत्म सिद्धि की आवश्यकता को उच्च स्तरीय आवश्यकता कहा है।

इस पदानुक्रम मॉडल में जो आवश्यकता जितनी ही नीचे है, उसकी प्राथमिकता या शक्ति उतनी ही अधिक मानी गयी है।

मनोवैज्ञानिक गुणो के आधार पर व्यक्तित्व ( Personality based on psychological properties )

युंग (1923) ने व्यक्तित्व के 3 प्रकार बताये-

  • बर्हिमुखी – इस तरह के व्यक्ति की अभिरूचि विशेषकर समाज के कार्यो की ओर होती है। वह अन्य लोगों से मिलना जुलना पसन्द करता है तथा प्राय: खुशमिजाज होता है।
  • अन्तर्मुखी – ऐसे व्यक्ति में बहिमुर्खी के विपरीत गुण पाये जाते है। इस तरह के व्यक्ति बहुत लोगों से मिलना जुलना पसंद नही करते है और उनकी दोस्ती कुछ ही लोगों तक सीमित होती है। इसमें आत्मकेन्द्रिता का गुण अधिक पाया जाता है।
  • उभयमुखी- इस प्रकार के व्यक्ति में अंतर्मुखी एवं बहुमुखी दोनों गुण पाये जाते हैं।

व्यक्तित्व का पंच कारक मॉडल ( Personality factor of 5 factor )

निकट के वर्षों में आधारभूत व्यक्तित्व विशेषको की संख्या को लेकर उत्पन्न हुए मत वैभिन्य से एक रुचिकर दिशा परिवर्तन हुआ है, पाल काष्टा तथा रॉबर्ट मेकरे ने सभी संभावित व्यक्तित्व विशेषको की जांच कर पांच कारकों के एक समुच्चय के बारे में जानकारी दी है, नारमेन ने इन्हें बिग फाइव की संज्ञा दी यह पांच कारक निम्न है

1 अनुभवों के लिए खुलापन
2 बहिर्मुखता
3 सहमति शीलता
4 तंत्रिका ताप
5 अंतरविवेक शीलता

व्यक्तित्व – अर्थ सिध्दांत व्यक्तित्व – अर्थ सिध्दांत अर्थ सिध्दांत अर्थ सिध्दांत

August 6, 2020

एक शिक्षक के लिए सीखने और शिक्षार्थी के विकास

एक शिक्षक के लिए सीखने और निहितार्थ सिद्धांतो, सीखने के हस्तांतरण, शिक्षा, रचनावादी सीखने प्रभावित करने वाले कारक

अधिगम या प्रशिक्षण के स्थानांतरण का सामान्य अर्थ- “ किसी एक परिस्थिति में अर्जित ज्ञान, आदित्य दृष्टिकोणों अथवा अन्य अनुप्रयोग का किसी अन्य परिस्थिति में प्रयोग करना”

अधिगम स्थानांतरण की महत्वपूर्ण परिभाषाएं-

सौरेंसन – “ स्थानांतरण एक परिस्थिति में अर्जित ज्ञान, प्रशिक्षण और आदतों का दूसरी परिस्थिति में स्थानांतरित किए जाने की चर्चा करता है|”

कार्लसनिक- ” स्थानांतरण पहली परिस्थिति में प्राप्त ज्ञान, कौशल, आदित्य, दृष्टिकोण हो या अन्य क्रियाओं का दूसरी परिस्थिति में अनुप्रयोग करना है|”

इन सभी के द्वारा हम स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि एक परिस्थिति में सीखे हुए ज्ञान, कौशल, आदतो आदि का अन्य परिस्थिति में अनुप्रयोग ही अधिगम या प्रशिक्षण का स्थानांतरण है|

अधिगम स्थानांतरण के प्रकार –

सकारात्मक स्थानांतरण-  एक परिस्थिति में अथवा एक विषय में सिखा गया ज्ञान किसी नवीन परिस्थिति या विषय को सीखने में सहायता प्रदान करता है  तो उसे सकारात्मक स्थानांतरण कहते है उदाहरण- जो व्यक्ति साइकिल चलाना सीख जाता है  उसे बाइक चलाने में भी आसानी रहती हैं, बाइक चलाना आसानी से सीख जाता है|

नकारात्मक स्थानांतरण-  जब एक परिस्थिति में सीखा गया ज्ञान, नवीन ज्ञान के सीखने में बाधा उत्पन्न करता है  तो उसे नकारात्मक स्थानांतरण कहते है उदाहरण-  यदि किसी अमेरिकन को, जीवन भर बाए हाथ से गाड़ी चलाई हो, अगर भारत में आ कर उसे दायां हाथ से गाड़ी चलानी पड़े तो उसका पहला प्रशिक्षण नई स्थिति में बाधा उत्पन्न करेगा|

शून्य स्थानांतरण –  जब एक कार्य का प्रशिक्षण दूसरे कार्य को सीखने में न तो सहायता ही करता है और नहीं बाधा उत्पन्न करता है तो इस प्रकार की प्रशिक्षण को शून्य स्थानांतरण कहते हैं| शून्य अंतरण का एक कारण यह भी हो सकता है कि पहले कार्य की प्रकृति का दूसरे कार्य की प्रकृति से कोई संबंध ही ना हो

Learner Development शिक्षार्थी के विकास- शारीरिक, भावनात्मक, सामाजिक

शिक्षक

वृद्धि का अर्थ है बढ़ना होता है अतः प्राणी के आंतरिक और बाह्य अंगों का बढ़ना वृद्धि कहलाताहै lवृद्धि शारीरिक रचना और शारीरिक परिवर्तनों की ओर संकेत करती है

विकास: विकास एक सार्वभौमिक प्रक्रिया है जो जन्म से लेकर जीवन पर्यंत तक चलती है विकास की प्रक्रिया में होने वाले परिवर्तन समान नहीं होते हैंl जीवन की प्रारंभिक अवस्था में होने वाले परिवर्तन रचनात्मक और बाद में होने वाले परिवर्तन विनाश आत्मक होते है

विकास को प्रभावित करने वाले कारक:

  • वातावरण
  • वंशानुक्रम
  • लिंग
  • जन्म क्रम
  • बुद्धि का अंत स्रावी ग्रंथियां
  • पोषण
  • शारीरिक रोग

विकास की विभिन्न अवस्थाएं

शैशवावस्था ( Infantilism )-

1.शारीरिक और मानसिक विकास तीव्र गति से 2. सीखने की प्रक्रिया में तीव्रता, जिज्ञासु प्रवृत्ति ,कल्पना जगत में विचरण ,दोहराने की प्रवृत्ति ,दूसरों पर निर्भरता संवेगों का प्रदर्शनl

बाल्यावस्था ( Childhood )-

साधारण खेलों में आवश्यक कौशल सीखना, पढ़ने लिखने एवं गणित की मौलिक क्रियाओं का विकास करना, अपने सभी व्यस्कों के साथ मिलकर रहना नैतिकता का विकास की भावना होना

किशोरावस्था 12 से 18 वर्ष ( Adolescence )-

शारीरिक विकास मानसिक विकास एवं समायोजन का अभाव, व्यवहार में भिन्नता , रुचियों में परिवर्तन एवं स्थिरता, समूह को महत्व ,स्वतंत्रता एवं विद्रोह की भावना घनिष्ठता एवं व्यक्तिगत भिन्नता

शिक्षक शिक्षक शिक्षक शिक्षक शिक्षक

August 5, 2020

Principles of Accretion अभिवृद्धि और विकास का सिद्धान्त

अभिवृद्धि और विकास का सिद्धान्त

अभिवृद्धि

विकास सभी के लिए समान है विकास सामान्य से विशिष्ट की ओर होता है विकास सत्तत् होता है विकास कि गति भिन्न होती है विकास समग्रता से विभेदीकरण की ओर होता है विकास मे सहसंबन्ध होते है

बाल- विकास के सिद्धांत-

  • सतत विकास का सिद्धांत-हरलोक(विकास निरन्तर चलता रहता है। गर्भाधान से मर्रतु तक)
  • अंगों की गति में भिनता का सिद्धांत-सिर का विकास पहले ,हाथ पैर का अंत मे।
  • अवस्थाओ में गति की भिन्नता का सिद्धांत-शेश्वावस्था व किशोरावस्था में तीव्र होता है
  • वंशानुक्रम व वातावरण की अंत: किर्या का सिद्धांत-विकास= वंशानुक्रम x वातावरण  

बालक के विकास पर विद्यालय का योगदान

स्कूल शब्द स्कोला से बना है जिसका अर्थ अवकाश। यूनान में विद्यालयों में पहले खेलकूद आदि पर बल दिया जाता था कालांतर में यह विद्यालय विद्यालय के केंद्र बन

टी.एफ.लीच-  वाद विवाद या वार्ता के स्थान जहां एथेंस के युवक अपने अवकाश के समय को खेलकूद व्यवसाय और युद्ध कौशल में प्रशिक्षण में बिताते थे।  धीरे धीरे दर्शन और उच्च कक्षाओं के स्कूलों में बदल गए एकेडमी की सुंदर उद्यानों में व्यतीत किए जाने वाले अवकाश के माध्यम से विद्यालयों का विकास हुआ।

जॉन ड्यूवी- विद्यालय एक ऐसा वातावरण है जहां जीवन की कुछ गुणों और विशेष प्रकार की क्रियाओं तथा व्यवसाइयों की शिक्षा इस उद्देश्य से दी जाती है कि बालक का विकास वांछित दिशा में हो।

वृद्धि और विकास के सिद्धांत

1. निरन्तराता का सिद्धांत (Principles of Continuous Development) –शारीरिक और मानसिक विकास धीरे – धीरे और निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है। पर वृद्धि एक निश्चित अवस्था (आयु) तक होती है ।

2.जीवन के आरंभिक वर्षों में तीव्र गति – जैसा की देख गया है, विकास लगातार होता रहता है , परन्तु वृद्धि की दर एक जैसी हमेशा नही रहती। शुरूआती तीन वर्षों में वृद्धि और विकास दोनों तीव्र गति से होते हैं । उसके बाद वर्षों मे वृद्धि की गति धीमी पड़ जाती है, परन्तु विकास की गति निरन्तर चलती रहती है ।

3.विकास साधारण से विशेष की ओर अग्रसर – बच्चा आरंभ में साधारण बातें सीखता है, पर बाद में वह विशेष बातें सीखने लगता है । इसी प्रकार आरंभ में बालक आपने सम्पूर्ण अंग को और फिर बाद में भागों को चलाना सीखता है । अतः जब बालक के शरीक वृद्धि होती है तो वह विशेष प्रतिक्रियाएँ करना सीख जाता है । उदाहरण के तौर पर बालक पहले पूरे हाथ को, फिर उगलिंयो को एक साथ चलाना सीखता है ।

4.वैयक्तिक भिन्नताओ का सिद्धांत ( Principle of Individual difference ) – मनोवैज्ञानिक ने वैयक्तिक भिन्नताओ के सिद्धांत का व्यापक विश्लेषण किया गया परिणाम स्वरुप इस विश्लेषण मे पाया गया कि  विभिन-विभिन आयु वर्गो में बलकों के व्यवहारों में अन्तर पाया जाता हैं और यह भी देख गया जुड़ावा बच्चों में भी वैयक्तिक भिन्नताओ को देख गया । इस प्रकार  से कहा जा सकता है कि सभी बच्चों में वृद्धि तथा विकास में एकरूपता दिखाई नही देती ।

5.वंशानुक्रम और वातावरण के संयुक्त परिणाम का सिद्धांत – देखा गया है वंशानुक्रम और वातावरण बालक के ऊपर अपना अत्यधिक प्रभाव देता हैं जो कि विकास और वृद्धि की प्रक्रिया को अत्यधिक प्रभावित करती है । इसमें से किसी की भी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए । इस प्रकार से हम बच्चे के वातावरण में आवश्यक सुधार कर के बालक के विकास करने की प्रक्रिया मे सुधार लाया  जा सकता है ।

6.परिपक्वता अधिगम का सिद्धांत (Principle of maturation and losing ) – बालक के वृद्धि और विकास की प्रक्रिया में परिपक्वता का  विशेष महत्व होता है ।  जिस से परिपक्वता और वृद्धि और विकास दोनों प्रभावित होते हैं । देखा गया है बालक किसी भी कार्य को करने में परिपक्वता को ग्रहण कर लेता है इसी परिपक्वता के करण बालक अन्य कार्यो को आसानी से कर पता है।

7.एकीकरण का सिद्धांत (Principles of integration) – इस सिद्धांत के अनुसार बच्चा पहले सम्पूर्ण अंग को, फिर बाद मे विशिष्ट भागों का प्रयोग कर पाता है या अंगों को चलान सीखता है , फिर उन भागो एकीकरण करना सीखता है । उदाहरण – देखा जाता है बच्चा पहले अपने पूरे हाथ को हिलाता डुलता है, फिर उसके बाद वह हाथ और उँगलियों को हिलाने का प्रयास करता है ।

8.विकास की भविष्यवाणी का सिद्धांत (Principal of development direction) – अब तक के सिद्धांतों द्वारा यह पाता चलता है कि बालक की वृद्धि तथा विकास को ध्यान मे रखते हुए बालक के भविष्य की भविष्यवाणी की जा सकती है ।

9.विकास की दिशा का सिद्धांत (Principles of development direction ) – इस सिद्धांत के अनुसार वृद्धि और विकास की दिशा निश्चित है जो पहले सिर से प्रौढ़ आकार और फिर टांगें सबसे बाद में विकसित होती है। आगे भ्रूण ( Embryo) के विकास में यह सिद्धांत बहुत स्पष्ट रूप से है ।

अभिवृद्धि अभिवृद्धि अभिवृद्धि अभिवृद्धि अभिवृद्धि अभिवृद्धि

August 2, 2020

Child Development बाल विकास केसे होता है???

Child Development बाल विकास

बाल विकास

बाल_विकास (या बच्चे का विकास), बच्चे के जन्म से लेकर किशोरावस्था के अंत तक उनमें होने वाले जैविक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तनों को कहते हैं। ये विकासात्मक परिवर्तन काफी हद तक आनुवंशिक कारकों और घटनाओं से प्रभावित हो सकते हैं इसलिए आनुवंशिकी और जन्म पूर्व  विकास को आम तौर पर बच्चे के विकास के अध्ययन के हिस्से के रूप में शामिल किया जाता है।

बाल_मनोविज्ञान का जनक पेस्टालॉजी को माना जाता है

बाल_मनोविज्ञान की परिभाषाएं ( Child psychology definitions )

क्रो एंड क्रो बाल मनोविज्ञान गर्भाधान काल से लेकर पूर्व किशोरा तक सभी प्रकार के व्यवहारों का करता है ।
बर्क के अनुसार– जन्म पूर्व अवस्था से परिपक्व अवस्था तक का अध्ययन ।
जेम्स ड्रेवर- बाल मनोविज्ञान बालक की जन्म से लेकर परिपक्वता तक के सभी व्यवहारों का अध्ययन करता है

स्किनर के शब्दो मे : विकास जीव और उसके वातावरण की अन्तः क्रिया का प्रतिफल है ।

हरलाँक के शब्दो में “ विकास, अभिवृद्धि तक ही सीमित नहीं है । इसके बजाय, इसमें परिपक्वावस्था के लक्ष्य की ओर परिवर्तनों का प्रगतिशील क्रम निहित रहता है । विकास के परिणामस्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताएँ और नवीन योग्यताएँ प्रकट होती हैं । “

गेसेल के शब्दो में : “ विकास, प्रत्यय से अधिक है । इसे देखा, जाँचा और किसी सीमा तक तीन प्रमुख दिशाओं – शरीर अंक विशलेषण, शरीर ज्ञान तथा व्यवहारात्मक में मापा जा सकता है इस सब में व्यावहारिक संकेत ही सबसे अधिक विकासात्मक स्तर और विकासात्मक शक्तियों को व्यक्त करने का माध्यम है । “

बाल विज्ञान की खासियत क्या है बाल विकास की अवस्थाओं में-

  1. प्रगतिशीलता 
  2. क्रमबद्धता 
  3. सु-सम्बद्धता 
  4. ऐतिहासिक पहलू 

बाल मनोविज्ञान की इस शाखा का प्रतिपादक पेस्टोलॉजी (1774) को माना जाता है । (पेस्टोलॉजी ने बेबी बायोग्राफी मेथड से अध्ययन किया)
भारत में बाल विकास का अध्ययन 1930 से प्रारंभ माना जाता है (गिजुभाई बधेका के प्रयासों से)

बाल विकास के सिद्धांत( Child Development Theory )

1.  निरंतरता का सिद्धांत : – विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जो गर्भधारण से म्रत्यु पर्यंत चलता है

2. विकास सामान्य से विशिष्ट की ओर होता है :-   विकास क्रम का व्यवहार सामान्य से विशिष्ट की ओर होता है अर्थात् मनुष्य के विकास के सभी क्षेत्रों में सामान्य प्रतिक्रिया होती है उसके बाद विशिष्ट रूप धारण करती है. जैसे एक नवजात शिशु प्रारम्भ में एक समय में अपने पूरे शरीर को चलाता है फिर धीरे-धीरे विशिष्ट अंगों का उपयोग करने लगता है

3. परस्पर सम्बन्ध का सिद्धांत :- किशोरावस्था के दौरान शरीर के साथ साथ संवेगात्मक , सामाजिक , संज्ञानात्मक एवं क्रियात्मकता भी तेजी से होता है . 

4. विकास अवस्थाओं के अनुसार होता है:–  सामान्य रूप में देखने पर एसा लगता है कि बालक का विकास रुक-रुक कर हो रहा है परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं होता. उदहारण के लिए जब बालक के दूध के दांत निकलते हैं तप ऐसा लगता है कि एकाएक निकल गया परन्तु इसकी नीव गर्भावस्था के पांचवे माह में पद जाती है और 5-6 महीने में आती है

5. विकास एक सतत प्रक्रिया है:-  विकास एक सतत प्रक्रिया है, मनुष्य के जीवन में यह चलता रहता है. विकास की गति कभी तीव्र या अमंद हो सकती है. मनुष्य में गुणों का विकास यकायक नहीं होता. जैसे शारीरिक विकास गर्भावस्था से लेकर परिपक्वावस्था तक निरंतर चलता रहता है. परन्तु आगे चलकर बालक उठने-बैठने, चलने फिरने और दौड़ने भागने लगता है

6. बालक के विभिन्न गुण परस्पर सम्बंधित होते हैं:-  बालक के विकास का विभिन्न स्वरूप परस्पर सम्बंधित होते हैं. एक गुण का विकास जिस प्रकार हो रा है अन्य गुण भी उसी अनुपात में विकसित होंगे. उदहारण के लिए जिस बालक में शारीरिक क्रियाएँ जल्दी होती है वह शीघ्रता से बोलने भी लगता है जिससे उसके भीतर सामाजिकता का विकास तेजी से होता है. इसके विपरीत जिन बालकों के शारीरिक विकास की गति मंद होती है उनमें मानसिक तथा अन्य विकास भी देर से होता है I

7. विभिन्न अंगों के विकास की गति में भिन्नता पाई जाती है:-  शरीर के विभिन्न अंगों के विकास की दर एक समान नहीं होता इनके विकास की गति में भिन्नता पाई जाती है. शरीर के कुछ अंग तेज गति से बढ़ते है ओर कुछ मंद गति से जैसे- मनुष्य की 6 वर्ष की आयु तक मस्तिष्क विकसित होकर लगभग पूर्ण रूप धारण कर लेता है, जबकि मनुष्य के हाथ, पैर, नाक मुंह, का विकास किशोरावस्था तक पूरा हो जाता हैI

8. विकास की गति एक समान नहीं होती:-  मनुष्य के विकास का क्रम एक समान हो सकता है, किन्तु विकास की गति एक समान नहीं होती जैसे? शैशवावस्था और किशोरावस्था में बालक के विकास की गति तीव्र होती है लेकिन आगे जाकर मंद हो जाती है और प्रौढ़ावस्था के बाद रुक जाती है. पुनः बालक ओर बालिकाओं के विकास की गति में भी अंतर होता हैI

9. विकास की प्रक्रिया का एकीकरण होता है:-  विकास की प्रक्रिया एकीकरण के सिद्धांत का पालन करती है. इसके अनुसार बालक पहले अपने सम्पूर्ण अंग को और फिर अंग के भागों को चलाना सीखता है बाद में वह इन भागों का एकीकरण करना सीखता है

10.विकास का एक निश्चित प्रतिरूप होता है:- मनुष्य के विकास का एक क्रम में होता है और विकास की गति का प्रतिमान भी समान रहता है. सम्पूर्ण विश्व में सभी सामान्य बालकों का गर्भावस्था या जन्म के बाद विकास का क्रम सिर से पैर की ओर होता है. गेसेल और हरलॉक ने इस सिद्धांत की पुष्टि की हैI

11.विकास बहुआयामी होता है :- इसका  मतलब है की विकास कुछ छेत्रों में अधिक व कुछ में कम होता हैI

12.विकास बहुत ही लचीला होता है :- इसका मतलब यह है की विकास किसी व्यक्ति अपनी पिछली कक्छा की विकास दर की तुलना में किसी विशेष छेत्र में विशेष योग्यता प्राप्त कर लेता है यह उसके परिवेश आदि पर निर्भर करता है
13.विकास प्रासंगिक हो सकता है :- विकास एतिहासिक ,परिवेशीय , सामाजिक – संस्कृतिक घटकों से प्रभावित होता है .  

14.व्यक्तिक अंतर का सिद्धांत :-विकासात्मक परिवर्तनों की दर में व्यक्तिगत अंतर हो सकता है और यह अनुवंशकीय घटकों व सामाजिक परिवेश पर निर्भर करता है .

जैसे एक 3 वर्ष का बालक औसत 3 शब्दों के वाक्य आसानी से बोल लेता है वन्ही कुछ ऐसे भी बच्चे होतें है जो यह योग्यता 2 वर्ष की आयु में ही प्राप्त कर लेतें है तो कही ऐसे भी बचें होते है यो 4 वर्ष की आयु में भी वाक्य बोलने में कठिनाई महसूस करतें है . वृद्धि एवं विकास की गति की दर एक समान नहीं होतीI

15.विकास की प्रक्रिया एकीकरण के सिद्धांत का पालन करती हैं .

16.वृद्धि एवं विकास की क्रिया  वंशानुक्रम एवं वातावरण का परिणाम है

बाल विकास से संबंधित महत्वपूर्ण मान्यताएं ( Important assumptions related to child development )

1. जैविक परिपक्वता की मान्यताएं –  प्रमुख प्रतिपादक : -* G. Stanley Hall , Arnold Gesell
इस मान्यता के अनुसार विकास मुख्यतः आनुवंशिकता से प्रभावित है तथा व्यवहार प्राकृतिक नियमों द्वारा तय होता है

2.  व्यवहारवादी सिद्धांत की मान्यताएं –  प्रमुख प्रतिपादक : – जे बी वाटसन , बी एफ स्किनर
 इस मान्यता के अनुसार पर्यावरण के कारक पालक के विकास में सहायक हैं अर्थात विकास में इंद्रिय अनुभूतियों का गहरा प्रभाव पड़ता है

3.  संज्ञानात्मक विकास संबंधी मान्यता –   प्रमुख प्रतिपादक : – जीन प्याजे
इस विचारधारा के अनुसार बच्चों की अपनी एक अहम भूमिका होती है तथा उनके विकास को सर्वाधिक प्रभावित उनकी मानसिक क्रिया करती हैं बच्चे के विकास की अवधि के बारे में तरह-तरह की परिभाषाएँ दी जाती हैं क्योंकि प्रत्येक अवधि के शुरू और अंत के बारे में निरंतर व्यक्तिगत मतभेद रहा है।

4.  सामाजिक सांस्कृतिक विकास संबंधी मान्यताएं –

  प्रमुख प्रतिपादक : – लेव वाईगोतस्की
यह बाल मनोविज्ञान के क्षेत्र की नवीनतम विचारधारा है जो बाल विकास के तीन पक्षों की चर्चा करती है तथा इन तीनों का केंद्र बिंदु सीखने की प्रक्रिया को बताया है

  • सीखना एक सामाजिक व सांस्कृतिक प्रक्रिया है_    
  • सीखना सार्थक व उद्देश्यपूर्ण क्रियाओं की हिस्सेदारी से होता है
  • समय के साथ सामाजिक व सांस्कृतिक बदलाव सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं

शिक्षा मनोविज्ञान एवं बाल विज्ञान के अध्ययन क्षेत्र ( Study area of ​​education psychology and child science )

  • वंशक्रम तथा वातावरण
  • मनोविज्ञान की अध्ययन विधियां
  • अभिवृद्धि एवं विकास
  • व्यक्तिगत भेद
  • व्यक्तित्व
  • बुद्धि
  • अधिगम
  • विशिष्ट बालक
  • अभिरुचि ,अभिवृति, अभीक्षमता
  • सृजनात्मकता
  • आदतें
  • निर्देशन एवं परामर्श
  • मानसिक स्वास्थ्य
  • संज्ञान, स्मृति, विस्मरण
  • संवेगात्मक बुद्धि
  • संवेदना ,प्रत्यक्ष ,संप्रत्यय निर्माण।

विकास की विभिन्न अवस्थाएँ ( Different Stages of development )

वैसे तो बाल विकास की प्रक्रिया भुर्णावस्था से जीवन भर चलती है फिर भी मनोवैज्ञानिकों ने बालक की अवस्थाओं को विभाजित करने का प्रयत्न किया  कुछ आयु-संबंधी विकास अवधियों और निर्दिष्ट अंतरालों के उदाहरण इस प्रकार हैं:

  • शैशवावस्था ( Infantile )
  • बाल्यावस्था ( Childhood )
  • किशोरावस्था ( Adolescence )

शैशवावस्था ( Infantile ) 

(उम्र 1 से 6  वर्ष)  ( शैशवकाल 1 से 3 वर्ष तक और पूर्व बाल्यावस्था 3 से 6 वर्ष तक )

जन्म से पांचवे वर्ष तक की अवस्था को शैशवावस्था कहा जाता है. इस अवस्था को समायोजन की अवस्था भी कहते हैं.

विशेषताएं:

  • इस अवस्था में बालक अपरिपक्व होता है तथा वह पूर्णतया दूसरों पर निर्भर रहता है.
  • यह अवस्था संवेग प्रधान होती है तथा बालकों के भीतर लगभग सभी प्रमुख संवेग जैसे- प्रसन्नता, क्रोध, हर्ष, प्रेम, घृणा, आदि विकसित हो जाते हैं.
  • फ्रायड ने इस अवस्था को बालक का निर्माण काल कहा है. उनका मानना था कि ‘मनुष्य को जो भी बनाना होता है, वह प्रारंभिक पांच वर्षों में ही बन जाता है.

बाल्यावस्था ( Childhood )

पांच से बारह वर्ष की अवधि को बाल्यावस्था कहा जाता है. यह अवस्था शारीरिक और मानसिक विकास की दृष्टी से महत्वपूर्ण होती है.

विशेषताएं:

  • बच्चे बहुत ही जिज्ञाशु प्रवृति का हो जाता उनमें जानने की प्रबल इच्छा होती है.
  • बच्चों में प्रश्न पूछने की प्रवृति विकसित होती है.
  • सामाजिकता का अधिकतम विकास होता है
  • इस अवस्था में बच्चों में मित्र बनाने की प्रबल इच्छा होती है
  • बालकों में ‘समूह प्रवृति’ (Gregariousness) का विकास होता है

किशोरावस्था ( Adolescence )

12-20 वर्ष की अवधि को किशोरावस्था माना जाता है. इस अवस्था को जीवन का संधिकाल कहा गया है.

विशेषताएं:

  • इस अवस्था में बालकों में समस्या की अधिकता, कल्पना की अधिकता और सामाजिक अस्थिरता होती है जिसमें विरोधी प्रवृतियों का विकास होता है.
  • किशोरावस्था की अवधि कल्पनात्मक और भावनात्मक होती है.
  • इस अवस्था में बालकों में विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण बढ़ता है और वे भावी जीवन साथी की तलाश भी करते है.
  • उत्तर किशोरावस्था में व्यवहार में स्थायित्व आने लगता है
  • किशोरों में अनुशासन तथा सामाजिक नियंत्रण का भाव विकसित होने लगता है

इस अवस्था में समायोजन की क्षमता कम पायी जाती है.

August 1, 2020

Education Planning Unit शिक्षण की योजना व दैनिक पाठ योजना

शिक्षण की योजना, इकाई व दैनिक पाठ योजना

शिक्षण

रमन बिहारी लाल के अनुसार- ” किसी 1 घंटे के लिए निश्चित अंश को प्रारंभ करने के पहले हम उनके लिए निश्चित पाठ्य वस्तु का विश्लेषण कर उसके शिक्षण के लिए एक योजना बनाते हैं इसी को दैनिक पाठ योजना कहते हैं।”

दैनिक पाठ योजना का महत्व ( Importance of daily text plan )–

दैनिक पाठ योजना द्वारा शिक्षण को उद्देश्यनिष्ठ बनाया जा सकता है पाठ योजना द्वारा शिक्षक के सफल शिक्षण के लिए पूर्व विचार एवं चिंतन का अवसर मिलता है इसके द्वारा स्थाई ज्ञान की प्राप्ति होती है

पाठ योजना बनाते समय अध्यापक विभिन्न शैक्षिक उद्देश्यों को ध्यान में रखता है छात्रों के व्यवहारों को अभिप्रेरित एवं नियंत्रित करने में सहायता करती हैं शिक्षक विश्वास दृढ़ता एवं क्रमबद्ध रूप से शिक्षण करता है

पाठ योजना विषय वस्तु को प्रभावी एवं मनोवैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत करने में सहायक होती है प्रदत्त ज्ञान का मूल्यांकन किया जा सकता है

ईकाई योजना ( Unit plan )

इकाई योजना का मुख्य फायदा यह हैं कि इससे अधिगम -प्रबंधन मे आसानी होती हैं। चूँकि इसमे सभी अधिगम-क्रियाओं की अनुसूची दी जाती हैं और उन क्रियाओं से संम्बंन्धित प्रयोग मे आने वाली पठनीय सामग्री का उल्लेख होता हैं

इसलिए कार्य योजना तैयार करने का कार्य भी अपेक्षाकृत सरल हो जाता हैं। जब नियोजन अध्याय विषयक होता हैं तो हो सकता हैं कि विद्दाथिर्यो को उत्पत्ति या वास्तविक उपलब्धि जैसी भावना का अनुभव न हो

ईकाई योजना एवं पाठयोजना मे साम्य एवं वैषभ्य ईकाई योजना और पाठ योजना मे कई प्रकार की साम्यताएं दिखाई पड़ती हैं

पाठ योजना के प्रकार  ( Types of lesson plan )

  1. वार्षिक पाठ योजना ( Yearly lesson plan )
  2. इकाई पाठ योजना ( Unit lesson plan )
  3. दैनिक पाठ योजना ( Daily lesson plans )

वार्षिक पाठ योजना ( Yearly lesson plan )

एक शिक्षक द्वारा एक शैक्षिक सत्र में कराए जाने वाले कार्य की रूपरेखा जिसे वह अपनी डायरी में तैयार करता है उसे वार्षिक योजना कहा जाता है, वार्षिक योजना निर्धारण करते समय विद्यालय की स्थिति, कार्यक्षमता ,पाठ्यक्रम, समय सीमा, विद्यालय में उपलब्ध साधनों का ध्यान रखा जाना चाहिए, वार्षिक योजना के अंतर्गत संपूर्ण पाठ्यक्रम को विभिन्न मासिक योजनाओं में विभक्त कर दिया जाता है,

इसके बाद वर्ष के शिक्षण कार्य दिवसों की संख्या ज्ञात कर तथा माह के आधार पर प्रकरण निर्धारित किए जाते हैं इस प्रकार एक विस्तृत रूप रेखा तैयार कर ली जाती है जिससे शिक्षको यह ज्ञात हो जाता है की कौन से माह में कौन सा पाठ का, कौन सा प्रकरण पढ़ाना है

इसके आधार पर वह अपनी कार्य योजना पर पाठ योजना तैयार कर लेता है वार्षिक योजना का निर्धारण होने के पश्चात शिक्षक को अध्यापक कार्य की प्रगति और कमियों का पता चल जाता है जिसका सही समय पर निराकरण कर लिया जाता है

इकाई पाठ योजना ( Unit lesson plan )

इकाई_अर्थ ( Unit meaning )

इकाई_का तात्पर्य ज्ञान के अनुभव के अधिकृत रूप से है, यह पाठ्यक्रम का वह संगठित अंश है जो ज्ञान के किसी महत्वपूर्ण क्षेत्र पर केंद्रित होता है प्रत्येक इकाई की अपनी सरंचना होती है जिसका ज्ञान होने पर उस में निहित विभिन्न प्रकरणों का परस्पर संबंध स्पष्ट हो जाता है

इकाई_योजना का आधार गेस्टाल्ट_मनोवैज्ञानिक है गेस्टाल्टवाद के अनुसार संपूर्ण विभिन्न अंशों का मात्र योग नहीं होता ,परंतु अंशो के योग से भी कुछ अधिक होता है

शिक्षा के क्षेत्र में इकाई शब्द देने का श्रेय हरबर्ट स्पेंसर को दिया जाता है इकाई शब्द का अर्थ है ज्ञान या अनुभव को एक सूत्र में पिरोना इकाई योजना का प्रतिपादक SC मॉरिसन के द्वारा 1926 में दिया गया है मॉरिसन के अनुसार यदि विषय वस्तु पर दक्षता प्राप्त करनी है

तो उसे इकाई में विभाजित कर दिया जाना चाहिए इकाई योजना के अंतर्गत एक ही आधार पर आधारित विभिन्न पाठो को एकत्रित कर एक इकाई माना जाता है छात्रों के व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन लाने के लिए शिक्षण शास्त्र के सिद्धांतों को लागू करने के पूर्व का चिंतन है, इकाई योजना शिक्षा की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है

जिससे विषय वस्तु को इस प्रकार संगठित किया जाता है कि सीखने और सीखने की परिस्थितियां महत्वपूर्ण बन जाती है या योजना संपूर्ण से अंश की ओर बढ़ते हुए ज्ञान प्राप्त करने की मनोवैज्ञानिक सिद्धांत पर काम करती है इसके निर्माण में सबसे पहले विषय वस्तु को विभिन्न इकाइयों में बांटा जाता है

तथा उसे पूर्ण करने के लिए एक निश्चित समय सीमा निर्धारित कर ली जाती है ,समय सीमा अल्पकालिक होती इसलिए इसे अल्पकालिक योजना भी कहते हैं ,इसके अंतर्गत वस्तु से संबंधित शिक्षक और छात्र की क्रियाएं, अधिगम सामग्री एवं मूल्यांकन की प्रविधियां को समाहित कर एक योजना पद एवं व्यवस्थित ढंग से लिखा जाता है

दैनिक पाठ योजना ( Daily lesson plans )

जब शिक्षक एक कालांश के लिए शिक्षण की योजना तैयार करता है तो उसे दैनिक पाठ योजना या शिक्षण की रूपरेखा कहते हैं शिक्षक द्वारा शिक्षण कार्य के क्रियान्वयन से पूर्ण उसकी एक रूपरेखा तैयार की जाती है जिसमें वह कक्षा में प्रवेश लेकर शिक्षण के पश्चात कक्षा से बाहर आने तक के समस्त कार्यों

जैसे शिक्षण उद्देश्य ,छात्रों के पूर्व ज्ञान, विषय वस्तु ,शिक्षण विधियों, प्रविधियों ,सहायक सामग्री, मूल्यांकन आदि सभी का निर्धारण करता है ,दैनिक पाठ योजना को छात्रों को प्रतिदिन शिक्षण करने को तैयार किया जाता है, पाठ योजना छात्रों के मानसिक स्तर में योग्यता तथा निश्चित समय को ध्यान में रखकर तैयार की जाती है

दैनिक पाठ योजना इकाई योजना का ही एक भाग है तथा यह शिक्षक की एक तरह से पूर्व तैयारी होती है ,डेविस के अनुसार -कक्षा में जाने से पूर्व अध्यापक को पूरी तैयारी कर लेनी चाहिए क्योंकि उसकी प्रगति में कोई भी बात इतनी बाधक नहीं है जितनी की शिक्षण की अपूर्ण तैयारी

July 4, 2020

Education Psychology शिक्षा मनोविज्ञान

शिक्षा मनोविज्ञान

शिक्षा मनोविज्ञान का अर्थ एवं परिभाषा वा शिक्षा मनोविज्ञान की प्रकृति

शिक्षा मनोविज्ञान

शिक्षा के ही द्वारा मनुष्य प्राणी से इंसान या सामाजिक “प्राणी” बनता है। इससे मनुष्य का शारीरिक,संवेगात्मक, मानसिक तथा शारीरिक विकास होता है ।

मनोविज्ञान के इतिहास के प्रारंभिक काल में इसे आत्मा का ज्ञान अथवा विज्ञान माना जाता था इसके बाद इस अर्थ को पूर्ण रुप से त्याग कर मनोविज्ञान को मन के विज्ञान के रूप में स्वीकार किया जाने लगा लेकिन कुछ समय बाद यह धारणा भी गलत सिद्ध हुई

इसके विभिन्न कारण थे वास्तव में मान कोई मूर्त वस्तु नहीं है मन तो केवल मानसिक वृत्तियों तथा प्रक्रियाओं के लिए प्रयोग होने वाला एक अमूर्त प्रत्यय है इसके बाद विभिन्न विचार कोने मनोविज्ञान को चेतना के विज्ञान के रूप में प्रतिपादित किया किंतु आधुनिक वैज्ञानिक खोजों के परिणाम स्वरुप इस धारणा को भी त्यागना पड़ा आधुनिक वैज्ञानिक खोजों से मालूम हुआ कि चेतना नाम का कोई विशिष्ट तत्व नहीं है

अध्ययन तथा शोध के क्रमिक विकास के परिणाम स्वरूप मनोविज्ञान का व्यवहार के विज्ञान के रूप में स्वीकार किया गया इस विचार की मुख्य समर्थक “जे बी वाटसन थे”। वाटसन ने मनोविज्ञान की परिभाषा इन शब्दों में प्रतिपादित की है ” एक ऐसा मनोविज्ञान लिखना संभव है जिसकी व्यवहार के विज्ञान के रूप में परिभाषा की जा सके”।

शिक्षा_मनोविज्ञान की परिभाषाएं ( Education Psychology Definition )

Crow and Crow- “शिक्षा_मनोविज्ञान जन्म से वृद्धावस्था तक एक व्यक्ति के सीखने के अनुभव का वर्णन और व्याख्या करता है”।

जेएम स्टीफन के अनुसार- “शिक्षा_मनोविज्ञान शैक्षणिक विकास का क्रमिक अध्ययन है”।

स्किनर : शिक्षा_मनोविज्ञान के अंतर्गत शिक्षा से सम्बन्धित सम्पूर्ण व्यवहार और व्यक्तित्व आ जाता है।

कॉलसनिक : शिक्षा_मनोविज्ञान, मनोविज्ञान के सिद्धान्तों और अनुसन्धान का शिक्षा में प्रयोग है।

सॉरे व टेलफ़ोर्ड : शिक्षा_मनोविज्ञान का मुख्य सम्बन्ध सिखने से है। यह मनोविज्ञान का वह अंग है, जो शिक्षा के मनोवैज्ञानिक पहलुओ की वैज्ञानिक खोज से विशेष रूप से सम्बन्धित है।

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है, की :

  • शिक्षा_मनोविज्ञान शैक्षिक परिस्थितियों में मानव व्यवहार का अध्ययन करता है।
  • शिक्षा_मनोविज्ञान शिक्षण अधिगम की प्रक्रिया को अधिक सरल व सुगम बनाता है।
  • शिक्षा मनोविज्ञान की प्रकृति वैज्ञानिक है, क्योंकि इसके अध्ययन में वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग होता है।
  • शिक्षा मनोविज्ञान में मनोविज्ञान के सिद्धांतो व विधियों का प्रयोग होता है।

शिक्षा मनोविज्ञान की प्रकृति ( Education Psychology Nature  )

  • शिक्षा मनोविज्ञान द्वारा भविष्यवाणी करना सरल हो जाता है यहां छात्रों के भावी विकास में भविष्यवाणी कर सकता है ।
  • शिक्षा मनोविज्ञान सकारात्मक विज्ञान है ।
  • यह एक व्यावहारिक विज्ञान है ।
  • इसका दृष्टिकोण वैज्ञानिक है ।

स्मरणीय बिंदु ( Psychology Memorable point )

  • वाटसन को व्यवहारवादी मनोविज्ञान का जनक माना जाता है।
  • रूसो ने शिक्षा में मनोविज्ञानिक दृष्टिकोण की शुरुआत की।
  • मनोविज्ञान की शाखा के रूप में शिक्षा मनोविज्ञान का जन्म 1900 ई. में हुआ।
  • मनोविज्ञान व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन करता है।
  • मनोविज्ञान एक विधायक विज्ञान (Positive Science) है।
  • प्रयोगात्मक मनोविज्ञान के जन्मदाता विलियम वुन्ट थे।
  • कॉलसनिक शिक्षा_मनोविज्ञान का आरम्भ प्लेटो से मानते है।
  • स्किनर शिक्षा_मनोविज्ञान का आरम्भ अरस्तू से मानते है।

महत्त्वपूर्ण तथ्य ( Psychology facts )

  • मनोविज्ञान का जन्म अरस्तू के समय दर्शनशास्त्र के अंग के रूप में हुआ।
  • वाटसन ने मनोविज्ञान को व्यवहार का शुद्ध विज्ञान माना है।
  • विलियम जेम्स को आधुनिक मनोविज्ञान का जनक माना जाता है।
  • जर्मनी के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक विलियम वुन्ट ने 1879 ई. में लिपजिंग में प्रथम मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला की स्थापना करके मनोविज्ञान को वैज्ञानिक स्वरुप दिया।
  • वॉल्फ ने शक्ति मनोविज्ञान का प्रतिपादन किया।
  • आधुनिक शिक्षा के जनक माने जाते है-जे.ए.स्टिपर

July 3, 2020

Teaching methods शिक्षा मनोविज्ञान-शिक्षण विधियाँ

शिक्षा मनोविज्ञान-शिक्षण विधियाँ

शिक्षण

शिक्षण विधि का अर्थ

किसी विषय के ज्ञान को छात्रो तक किस प्रकार पहुँचाया जाए जिससे वे उस निर्धारित उद्देश्य की प्राप्ति कर सकें। वह पद्रृति’ शिक्षण पदृति’ कहलाती हैं।

शिक्षा मे ‘पदृति’ शब्द का प्रयोग शिक्षक के लिए उन प्रक्रियाओं के लिए किया जाता हैं जिसके द्रारा बालक उस विषय-वस्तु ज्ञान को सीखता हैं

अन्य विषयों की भाँति सामाजिक विज्ञान शिक्षण मे भी बहुत सी शिक्षण विधियां हैं जो निम्नलिखित हैं:

  • भ्रमण विधि
  • इकाई शिक्षण विधि
  • निरीक्षण (अवलोकन)विधि
  • समस्या समाधान विधि
  • प्रायोजना या योजना विधि
  • अनुसंधान विधि
  • कार्यगोष्ठी विधि
  • वार्तालाप विधि
  • स्त्रोत सन्दर्भ विधि
  • व्यक्तिश शिक्षण विधि

शिक्षण अभ्यास:- शिक्षण अभ्यास का आखिरी चरण छात्राध्यापक द्रारा कक्षा में अध्यापन होता हैं यह स्कूल की वास्तविक दशा मे सम्पन्न किया जाता हैं छात्रध्यापक अपने सीखे गये अध्यापन कौशल का प्रयोग इसी समय में करता है।

शिक्षण- अभ्यास का अभ्रिप्राय अध्यापन विषयों का शिक्षण मात्र से न होकर स्कूल के विभिन्न प्रकार के अनुभव से होता हैं शिक्षण-अभ्यास कार्यक्रम मे निम्न कार्यो को शामिल किया जाता है

  • कक्षाध्यापन कार्य
  • पाठ्य-सहकर्मी प्रवृत्तियों का प्रयोजन एवं कार्यान्वित।
  • स्कूल संम्बंन्धी अभिलेखों की तैयारी एवं प्रयोग
  • छात्रो के प्रगति अभिलेख का संचित अभिवृत्ति तैयार करना एवं उसकी पूर्ति करना
  • छात्रो का पूर्ण प्रगति प्रतिवेदन तैयार करना
  • छात्रो के कार्यों का मूल्यांकन
  • जो छात्र आवश्यकता अनुभव करे,उनकी सहायता करना
  • प्रधानाचार्य, परिवीक्षक,अध्यापक,छात्रो के मध्य उचित मानवीय सम्बन्धों का विकास करना

इस_शिक्षण -अभ्यास कार्यक्रम को कई विद्रान शिक्षणक्षण कार्य शिक्षक भी कहते है

विधियों के प्रकार

भ्रमण विधि:- इस विधि का प्रयोग सामाजिक विज्ञान के लिए उपयुक्त कहा जा सकता हैं विद्दार्थी को स्कूल प्रांगण से बाहर आकर सामाजिक संगठनों, भौगौलिक परिस्थितियों, ऐतिहासिक स्मारकों, प्राकृतिक और औद्योगिक परिवेश मे बहुत सी वस्तुओं एवं क्रियाओं को वास्तविक रुप मे देखने का अवसर मिलता हैं

इससें छात्र सक्रिय, रुचिशील एवं प्रत्यक्ष परिस्थिति के सम्पर्क मे आता है। भ्रमण का मूल आधार’ निरीक्षण की प्रक्रिया’ ही है ऐसी स्थिति मे विद्दार्थीयों को स्थान विशेष पर ले जाकर निरीक्षण योग्य बातो का निरीक्षण किया जाता हैं

भ्रमण का संचालन- भ्रमण को निर्धारित करने से पूर्व निम्नलिखित बाते ध्यान मे रखनी अत्यावश्यक हैं भ्रमण के उद्देश्यो का निर्धारण किया जाएं उचित स्थान का चयन किया जाए जहाँ उद्देश्य की पूर्ति हो सक आवश्यक सामान व खाने-पीने की व्यवस्था पहले से ही कर दी जाए

भ्रमण के उद्देश्य:- भ्रमण के सामाजिक विज्ञान के प्रति विद्दाथिर्यो की रुचि जाग्रत की जाती हैं विद्दार्थी की अवलोकन शक्ति का विकास होता हैं

भ्रमण के प्रकार:-

  • लघु भ्रमण
  • सामान्य भ्रमण तथा
  • वृहद भ्रमण

शिक्षक मे भ्रमण का समुचित प्रयोग निम्न प्रकार से किया जा सकता हैं:-

  • शैक्षणिक बिन्दु का चुनाव
  • स्थान विशेष का चयन

भ्रमण के संगठन

  • पूर्व शैक्षिक तैयारी
  • व्यवस्था सम्बन्धी तैयारी

सामाजिक विज्ञान_शिक्षण के उद्देश्य:-

  • बालको मे सामाजिक गुणों का विकास-
  • समाज स्वीकृत मूल्यों को सही दिशा मे लाने का अभ्यास
  • बालको को उनके सामाजिक, सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक पर्यावरण से अवगत कराना
  • विश्व-बन्धुता की भावना का विकास:
  • प्रजातांत्रिक सामाजिक व्यवस्था मे जीवन व्यतीत करने का कौशल
  • राष्ट्रीय धरोहर के प्रति सुरक्षा एवं सम्मान की भावना रखना
  • ग्लोब, मानचित्र, चित्र एवं रेखांचित्र का अध्ययन