Category

Rajasthan History

September 27, 2020

Rajput History राजस्थान में राजपूत वंशों का उदय 7-12 वीं सदी

राजस्थान में राजपूत वंशों का उदय 7-12 वीं सदी

राजपूत

सूर्यवंशी, चंद्रवंशी, यदुवंशी, अग्निवंशी।

“राजपूत” शब्द की व्युत्पत्ति राजपूतों की उत्पत्ति के विभिन्न मत और उनकी समीक्षा

  • अग्निवंशीय मत
  • सूर्य तथा चंद्रवंशीय मत
  • विदेशी वंश का मत
  • गुर्जर वंश का मत
  • ब्राह्मणवंशीय मत
  • वैदिक आर्य वंश का मत

राजपूतों की विदेशी उत्पत्ति का सिद्धांत ( Rajput Origin )

(1) विदेशी सिद्धान्त ( Foreign principle )

राजस्थान के इतिहास को लिखने का श्रेय कर्नल जेम्स टॉड को दिया जाता है, कर्नल टॉड को हम राजस्थान इतिहास का जनक व राजस्थान इतिहास के पितामह भी कहते हैं कर्नल टॉड ने अपने ग्रंथ ‘दे एनल्स एंड एंटिक्विटी ऑफ राजस्थान’ में राजपूत को विदेशी जातियों से उत्पन्न होना बताया, कर्नल टॉड ने विदेशी जातियों में शक, कुषाण, सिर्थियन, आदि विदेशी जातियों के सम्मिश्रण से राजपूतों की उत्पत्ति हुई,

उनका मानना था कि जिस प्रकार यह विदेशी जातियां आक्रमण व युद्ध में विश्वास रखती थी, ठीक उसी प्रकार राजस्थान के राजपूत शासक भी युद्ध में विश्वास रखते थे इस कारण इस कारण कर्नल टॉड ने राजपूतों को विदेशियों की संतान कहा, इस मत का समर्थन इतिहासकार क्रुक महोदय ने भी किया!!!

(2) अग्निकुंड का सिद्धांत

लेखक चंद्रवरदाई ने अपने ग्रंथ पृथ्वीराज रासो में राजपूतों की उत्पत्ति का अग्नि कुंड का सिद्धांत प्रतिपादित किया  इनकी उत्पत्ति के बारे में उन्होंने बताया कि माउंट आबू पर गुरु वशिष्ट का आश्रम था, गुरु वशिष्ठ जब यज्ञ करते थे तब कुछ दैत्यो द्वारा उस यज्ञ को असफल कर दिया जाता था!  तथा उस यज्ञ में अनावश्यक वस्तुओं को डाल दिया जाता था

जिसके कारण यज्ञ दूषित हो जाता था गुरु वशिष्ठ ने इस समस्या से निजात पाने के लिए अग्निकुंड अग्नि से 3 योद्धाओं को प्रकट किया इन योद्धाओं में परमार, गुर्जर, प्रतिहार, तथा चालुक्य( सोलंकी) पैदा हुए, लेकिन समस्या का निराकरण नहीं हो पाया इस प्रकार गुरु वशिष्ठ ने पुनः एक बार यज्ञ किया और उस यज्ञ में एक वीर योद्धा अग्नि में प्रकट किया यही अंतिम योद्धा ,चौहान, कहलाया इस प्रकार चंद्रवरदाई ने राजपूतों की उत्पत्ति अग्निकुंड से बताई

नोट-  माउंट आबू सिरोही में वशिष्ठ कुण्ड व ग्ररू वशिष्ठ आश्रम स्थित है

राजपूतों की उत्पत्ति ( Rajput Origin )

अग्निवंशी मत ( Agnostic vote )

  • राजपूताना के इतिहास के सन्दर्भ में राजपूतों की उत्पत्ति के विभिन्न सिद्धान्तों का अध्ययन बड़ा महत्त्व का है। राजपूतों का विशुद्ध जाति से उत्पन्न होने के मत को बल देने के लिए उनको अग्निवंशीय बताया गया है।
  • इस मत का प्रथम सूत्रपात चन्दबरदाई के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘पृथ्वीराजरासो’ से होता है। उसके अनुसार राजपूतों के चार वंश प्रतिहार, परमार, चालुक्य और चौहान ऋषि वशिष्ठ के यज्ञ कुण्ड से राक्षसों के संहार के लिए उत्पन्न किये गये।
  • इस कथानक का प्रचार 16 वीं से 18वीं सदी तक भाटों द्वारा खूब होता रहा। मुहणोत नैणसी और सूर्यमल्ल मिसण ने इस आधार को लेकर उसको और बढ़ावे के साथ लिखा।
  • परन्तु इतिहासकारों के अनुसार ‘अग्निवंशीय सिद्धान्त’ पर विश्वास करना उचित नहीं है क्योंकि सम्पूर्ण कथानक बनावटी व अव्यावहारिक है। ऐसा प्रतीत होता है कि चन्दबरदाई ऋषि वशिष्ठ द्वारा अग्नि से इन वंशों की उत्पत्ति से यह अभिव्यक्त करता है कि जब विदेशी सत्ता से संघर्ष करने की आवश्यकता हुई तो इन चार वंश के राजपूतों ने शत्रुओं से मुकाबले हेतु स्वयं को सजग कर लिया।
  • गौरीशकंर हीराचन्द ओझा, सी.वी.वैद्य, दशरथ शर्मा, ईश्वरी प्रसाद इत्यादि इतिहासकारों ने इस मत को निराधार बताया है।
  • गौरीशंकर हीराचन्द ओझा राजपूतों को सूर्यवंशीय और चन्द्रवंशीय बताते हैं। अपने मत की पुष्टि के लिए उन्होंने कई शिलालेखों और साहित्यिक ग्रंथों के प्रमाण दिये हैं, जिनके आधार पर उनकी मान्यता है कि राजपूत प्राचीन क्षत्रियों के वंशज हैं।
  • राजपूतों की उत्पत्ति से सम्बन्धित यही मत सर्वाधिक लोकप्रिय है।
  • राजपूताना के प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने राजपूतों को शक और सीथियन बताया है। इसके प्रमाण में उनके बहुत से प्रचलित रीति-रिवाजों का, जो शक जाति के रिवाजों से समानता रखते थे, उल्लेख किया है। ऐसे रिवाजों में सूर्य पूजा, सती प्रथा प्रचलन, अश्वमेध यज्ञ, मद्यपान, शस्त्रों और घोड़ों की पूजा इत्यादि हैं।
  •  टॉड की पुस्तक के सम्पादक विलियम क्रुक ने भी इसी मत का समर्थन किया है
  • परन्तु इस विदेशी वंशीय मत का गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने खण्डन किया है। ओझा का कहना है कि राजपूतों तथा विदेशियों के रस्मों-रिवाजों में जो समानता कनर्ल टॉड ने बताई है, वह समानता विदेशियों से राजपूतों ने प्राप्त नहीं की है, वरन् उनकी सत्यता वैदिक तथा पौराणिक समाज और संस्कृति से की जा सकती है। अतः उनका कहना है कि शक, कुषाण या हूणों के जिन-जिन रस्मो-रिवाजों व परम्पराओं का उल्लेख समानता बताने के लिए जेम्स टॉड ने किया है, वे भारतवर्ष में अतीत काल से ही प्रचलित थीं। उनका सम्बन्ध इन विदेशी जातियों से जोड़ना निराधार है।
  •  डॉ. डी. आर. भण्डारकर राजपूतों को गुर्जर मानकर उनका संबंध श्वेत-हूणों के स्थापित करके विदेशी वंशीय उत्पत्ति को और बल देते हैं। इसकी पुष्टि में वे बताते हैं कि पुराणों में गुर्जर और हूणों का वर्णन विदेशियों के सन्दर्भ में मिलता है। इसी प्रकार उनका कहना है कि अग्निवंशीय प्रतिहार, परमार, चालुक्य और चौहान भी गुर्जर थे, क्योंकि राजोर अभिलेख में प्रतिहारों को गुर्जर कहा गया है।
  •  इनके अतिरिक्त भण्डारकर ने बिजौलिया शिलालेख के आधार पर कुछ राजपूत वंशों को ब्राह्मणों से उत्पन्न माना है। वे चौहानों को वत्स गोत्रीय ब्राह्मण बताते हैं और गुहिल राजपूतों की उत्पत्ति नागर ब्राह्मणों से मानते हैं।
  • डॉ. ओझा एवं वैद्य ने भण्डराकर की मान्यता को अस्वीकृत करते हुए लिखा है कि प्रतिहारों को गुर्जर कहा जाना जाति विशेष की संज्ञा नहीं है वरन् उनका प्रदेश विशेष गुजरात पर अधिकार होने के कारण है।
  • जहाँ तक राजपूतों की ब्राह्मणों से उत्पत्ति का प्रश्न है, वह भी निराधार है क्योंकि इस मत के समर्थन में उनके साक्ष्य कतिपय शब्दों का प्रयोग राजपूतों के साथ होने मात्र से है।
  • इस प्रकार राजपूतों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में उपर्युक्त मतों में मतैक्य नहीं है। फिर भी डॉ. ओझा के मत को सामान्यतः मान्यता मिली हुई है।
  • निःसन्देह राजपूतों को भारतीय मानना उचित है।

राजपूतों की शाखाएं ( Rajput caste history )

सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी, अग्निवंशीय 

सूर्य वंश की शाखायें ( Suryavansh )

1.कछवाह
2.राठौड
3.बडगूजर
4.सिकरवार
5.सिसोदिया
6.गहलोत
7.गौर
8.गहलबार
9.रेकबार
10 .जुनने
11. बैस
12. रघुवशी

चन्द्र वंश की शाखायें ( Chandravansh )

1.जादौन
2.भाटी
3.तोमर
4.चन्देल
5.छोंकर
6.होंड
7.पुण्डीर
8.कटैरिया
9 .दहिया

अग्निवंश की चार शाखायें ( Agnivansh )

1.चौहान
2.सोलंकी
3.परिहार
4.परमार

कर्नल जेम्स टॉड ( James Tod )

राजस्थान में रेजीडेंट 1817 से 1822 तक।  नियुक्ति- पश्चिमी राजपूताना क्षेत्र में। 28 तारीख को सामंतवादी की स्थापना करने का श्रेय कर्नल जेम्स टॉड को जाता है।

संज्ञा- घोड़े वाले बाबा राजस्थानी इतिहास के पितामह

पुस्तकों का संपादन विलियम क्रुक ने करवाया, पुस्तकों का हिंदी अनुवाद गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने किया

कर्नल जेम्स टॉड की पुस्तक ( James Tod’s book )

  • Vol.1:- एनाल्स एण्ड एण्टीक्वीटीज आॅफ राजस्थान 1829
  • Vol.2:- the central and western Rajputana states of India 1832
  • travels in western India (1839)

September 27, 2020

Medieval Rajasthan मध्यकालीन राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था

मध्यकालीन राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था

प्रशासनिक

मध्यकाल में राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था से तात्पर्य मुगलों से संपर्क के बाद से लेकर 1818 ईसवी में अंग्रेजों के साथ हुई संधियों की काल अवधि के अध्ययन से है।  इस काल अवधि में राजस्थान में 22 छोटी बड़ी रियासतें थी और अजमेर मुगल सूबा था।

इन सभी रियासतों का अपना प्रशासनिक तंत्र था लेकिन, कुछ मौलिक विशेषताएं एकरूपता लिए हुए भी थी। रियासतें मुगल सूबे के अंतर्गत होने के कारण मुगल प्रभाव भी था।

राजस्थान की मध्यकालीन प्रशासनिक व्यवस्था के मूलत 3 आधार थे —

  • सामान्य एवं सैनिक प्रशासन।
  • न्याय प्रशासन।
  • भू राजस्व प्रशासन।

संपूर्ण शासन तंत्र राजा और सामंत व्यवस्था पर आधारित था। राजस्थान की सामंत व्यवस्था रक्त संबंध और कुलीय भावना पर आधारित थी।सर्वप्रथम कर्नल जेम्स टॉड ने यहां की सामंत व्यवस्था के लिए इंग्लैंड की फ्यूडल व्यवस्था के समान मानते हुए उल्लेख किया है।

राजस्थान की सामंत व्यवस्था पर व्यापक शोध कार्य के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि यहां की सामंत व्यवस्था कर्नल टॉड द्वारा उल्लेखित पश्चिम के फ्यूडल व्यवस्था के समान स्वामी (राजा) और सेवक (सामंत) पर आधारित नहीं थी।

राजस्थान के सामंत व्यवस्था रक्त संबंध एवं कुलीय भावना पर आधारित प्रशासनिक और सैनिक व्यवस्था थी।

केन्द्रीय शासन ( Central Government )

राजा – सम्पूर्ण शक्ति का सर्वोच्च केंद्र

प्रधान – राजा के बाद प्रमुख। अलग अलग रियासतों में अलग अलग नाम – कोटा और में दीवान, जैसलमेर, मारवाड मेवाड में प्रधान, जयपुर में मुसाहिब, बीकानेर में मुख्त्यार।

बक्षी – सेना विभाग का प्रमुख। जोधपुर में फौजबक्षी होता था।

नायब बक्षी – सैनिको व किलों पर होने वाले खर्च और सामन्तों की रेख का हिसाब रखता था

नोट – रेख = एक जागीरदार की जागीर की वार्षिक आय

शिकदार- मुगल प्रशासन के कोतवाल के समान। गैर सैनिक कर्मचारियों के रोजगार सम्बंधी कार्य।

सामन्ती श्रेणियां ( Feudal System )

कर्नल टॉड ने सामन्ती व्यवस्था को इग्लैण्ड में चलने वाली फ्यूडवल व्यवस्था के समान माना है।

सामन्त श्रेणिया –

  • मारवाड- चार प्रकार की राजवी, सरदार, गनायत, मुत्सद्दी
  • मेवाड – तीन श्रेणियां , जिन्हे उमराव कहा जाता था। सलूम्बर के सामन्त का विशेष स्थान।
  • जयपुर – पृथ्वीसिंह के समय श्रेणी विभाजन। 12 पुत्रों के नाम से 12 स्थायी जागीरे चलीजिन्हे कोटडी कहा जाता था।
  • कोटा- में राजवी कहलाते थे।
  • बीकानेर – में सामन्तों की तीन श्रेणियां थी।
  • जैसलमेर में दो श्रेणियां थी।
  • अन्य श्रेणियां – भौमिया सामन्त, ग्रासिया सामन्त

सामन्त व्यवस्था ( Feudal system )

राजस्थान में परम्परागत शासन में राजा -सामन्त का संबंध भाई-बंधु का था।  मुगल काल में सामन्त व्यवस्था में परिवर्तन। अब स्थिति स्वामी – सेवक की स्थिति।

सेवाओं के साथ कर व्यवस्था –

परम्परागत शासन में सामन्त केवल सेवाएं देता था। लेकिन मुगल काल से कर व्यवस्था भी निर्धारित की गयी।

सामन्त अब

  • पट्टा रेख – राजा द्वारा जागीर के पट्टे में उल्लेखित अनुमानित राजस्व।
  • भरत रेख – राजा द्वारा सामन्त को प्रदत जागीर के पट्टे में उल्लेखित रेख के अनुसार राजस्व।
  • उत्तराधिकार शुल्क – जागीर के नये उत्तराधिकारी कर से वसूल किया जाने वाला कर। अलग अलग रियासतों में इसके नाम-मारवाड – पहले पेशकशी फिर हुक्मनामा. मेवाड और जयपुर में नजराना, अन्य रियासतों मे कैद खालसा या तलवार बंधाई नाम था।, जैसलमेर एकमात्र रियासत जहां उत्तराधिकारी शुल्क नहीं लिया जाता था।
  • नजराना कर- राजाके बडे पुत्र के विवाह पर दिया जाने वाला कर।
  • न्योत कर
  • तीर्थ यात्रा कर

भूमि और भू स्वामित्व ( Land and Land Ownership )

भूमि दो भागों में विभाजित थी –

  1. खालसा भूमि ( Khalsa land )- जो कि सीधे शासक के नियंत्रण में होती थी जिसे केंद्रीय भूमि भी कह सकते हैं।
  2. जागीर भूमि – यह चार प्रकार की थी।

सामंत जागीर ( Feudal Estate ) – यह जागीर भूमि जन्मजात जागीर थी जिसका लगान सामन्त द्वारा वसूल किया जाता था।

हुकूमत जागीर – यह मुत्सदद्धियों को दी जाती थी।

भौम जागीर – राज्य को निश्चित सेवाए व कर देते थे।

शासण जागीर – यह माफी जागीर भी कहलाती थी। यह करमुक्त जागीर थी। धर्मार्थ, शिक्षण कार्य, साहित्य लेखन कार्य, चारण व भाट आदि को अनुदान स्वरूप दी जाती थी।

इसके अलावा भूमि को ओर दो भागों में बांटा गया-

  • कृषि भूमि ( Agricultural land ) – खेती योग्य भूमि।
  • चरनोता भूमि ( Charnote land )- पशुओं के लिए चारा उगाया जाता था।

किसान- दो प्रकार के थे-

  • बापीदार – खुदकाश्तकार और भूमि का स्थाई स्वामी
  • गैरबापीदार – शिकमी काश्तकार और भूमि पर वंशानुगत अधिकार नहीं। ये खेतीहर मजदूर थे।

दाखला – किसानों को दी जाने वाली भूमि का पट्टा जो जागीरदार के रजिस्टर में दर्ज रहता था।

लगान वसूली की विधि ( Tax collection method )

लगान वसूली की तीन विधि अपनाते थे-

लाटा या बटाई विधि- फसल कटने योग्य होने पर लगान वसूली के लिए नियुक्त अधिकारी की देखरेख में कटाई तथा धान साफ होने पर राज्य का भाग अलग किया जाता था।

कून्ता विधि- खडी फसल को देखकर अनुमानित लगान निर्धारिढ करना।

अन्य विधि – इसे तीन भागों में – मुकाता, डोरी और घूघरी

डोरी और मुकाता में कर निर्धारण एक मुश्त होता था। नकद कर भी लिया जाता था। डोरी कर निर्धारण में नापे गये भू भाग का निर्धारण करके वसूल करना।

घूघरी कर विधि के अनुसार शासक, सामन्त एवं जागीरदार किसान को जितनी घूघरी (बीज) देता था उतना ही अनाज के रूप में लेता था।दूसरी घूघरी विधि में प्रति कुआं या खेत की पैदावार पर निर्भर था।

मध्यकाल में राजस्थान में प्रचलित विभिन्न लाग-बाग

भू राजस्व के अतिरिक्त कृषकों से कई अन्य प्रकार के कर वसूल किए जाते थे उन्हें लाग बाग कहा जाता था लाग-बाग दो प्रकार के थे–

  • नियमित
  • अनियमित

नियमित लाग– की रकम निश्चित होती थी और उसकी वसूली प्रतिवर्ष या 2-3 वर्ष में एक बार की जाती थी

अनियमित लाग- की रकम निश्चित नहीं थी उपज के साथ-साथ यह कम या ज्यादा होती रहती थी इन लागों के निर्धारण का कोई निश्चित आधार नहीं था

  • नल बट एवं नहर वास- यह लाग सिंचित भूमि पर ली जाती थी
  • जाजम लाग- भूमि के विक्रय पर वसूली जाने वाली लाभ
  • सिंगोटी- मवेशी के विक्रय के समय वसूली जाने वाली लाग
  • मलबा और चौधर बाब- मारवाड़ में मालगुजारी के अतिरिक्त किसान से यह कर वसूल करने की व्यवस्था थी मलबा की आय से फसल की रक्षा संबंधी किए गए खर्च की पूर्ति की जाती थी और उन व्यक्तियों को पारिश्रमिक देने की व्यवस्था रहती थी जिन्होंने बटाई की प्रक्रिया में भाग लिया था

मारवाड़ में जागीर क्षेत्र में खारखार,कांसा,शुकराना (खिड़की या बारी खुलाई) हासा, माचा, हल, मवाली, आदि प्रमुख लागें थी

  • धूँआ भाछ- बीकानेर राज्य में यह कर वसूल किया जाता था
  • घर की बिछोती- जयपुर राज्य में इस कर की वसूली की जाती थी
  • घास मरी- विभिन्न प्रकार के चऱाई करो का सामूहिक नाम था
  • अंगाकर- मारवाड़ में प्रति व्यक्ति ₹1 की दर से महाराजा मानसिंह के समय इस कर की वसूली की गई थी
  • खेड़ खर्च-राज्य में सेना के खर्च के नाम से जो कर लिया जाता था उसे खेड़ खर्च या फौज खर्च की संज्ञा दी गई थी
  • गनीम बराड़- मेवाड़ में युद्ध के समय गनीम बराड़ कर वसूल किया जाता था
  • कागली या नाता कर- विधवा के पुनर्विवाह के अवसर पर प्रतिभा ₹1 की दर से यह कर वसूल किया जाता था ।

मेवाड़ में नाता बराड़, कोटा राज्य में नाता कागली, बीकानेर राज्य में नाता और जयपुर राज्य में छैली राशि के नाम से यह कर लिया जाता था

  • जकात कर- बीकानेर राज्य में सीमा शुल्क आयात निर्यात और चुंगी कर का सामूहिक नाम जकात था

जोधपुर और जयपुर राज्य में पारिवारिक भाषा में इसे सायर की संज्ञा दी थी

  • दाण कर- मेवाड़ और जैसलमेर राज्यों में माल के आयात निर्यात पर लगाया जाने वाला कर दाण कहलाता था
  • मापा ,बारुता कर- मेवाड़ में 1 गांव से दूसरे गांव में माल लाने ले जाने पर यह कर वसूल किया जाता था

जबकि बीकानेर राज्य में विक्रीकर को मापा के नाम से पुकारते थे

  • लाकड़ कर- जंगलात की लकड़ियों पर लाकड़ कर लिया जाता था।

इस कर को बीकानेर में काठ जयपुर में दरख्त की बिछोती मेवाड़ में खड़लाकड़ और मारवाड़ में कबाड़ा बाब के नाम से पुकारते थे

राली लाग- प्रतिवर्ष काश्तकार अपने कपड़ों में से एक गद्दा या राली बना कर देता था जो जागीदार या उसकी कर्मचारियों के काम आती थी

दस्तूर- भू राजस्व कर्मचारी पटेल पटवारी कानूनगो तहसीलदार और चौधरी जो अवैध रकम किसानों से वसूल करते थे उसे दस्तूर कहा जाता था

नजराना- यह लाग प्रतिवर्ष किसानों से जागीरदार और पटेल वसूल करते थे जागीरदार राजा को और पटेल तहसीलदार को नजराना देता था जिसकी रकम किसानों से वसूल की जाती थी

बकरा लाग- प्रत्येक काश्तकार से जागीरदार एक बकरा स्वयं के खाने के लिए लेता था उस जागीरदार बकरे के बदले प्रति परिवार से ₹2 वार्षिक लेते थे

न्योता लाग- यह लाग जागीरदार पटेल और चौधरी अपने लड़के लड़की की शादी के अवसर पर किसानों से वसूल करते थे

चवरी लाग- किसानों के पुत्र या पुत्री के विवाह पर एक से ₹25 तक चवरी लाग के नाम पर लिए जाते थे

कुंवर जी का घोड़ा- कुंवर के बड़े होने पर घोड़े की सवारी करना सिखाया जाता था तब घोड़ा खरीदने के लिए प्रति घर से ₹1 कर के रूप में लिया जाता था

खरगढी़- सार्वजनिक निर्माण या दुर्गों के भीतर निर्माण कार्यों के लिए गांव से बेगार में गधों को मंगवाया जाता था परंतु बाद में गधों के बदले खर गढी़ लाग वसूल की जाने लगी

खिचड़ी लाग- जागीरदार द्वारा अपने प्रत्येक गांव से उनकी आर्थिक स्थिति के अनुसार ली जाने वाली लाग राज्य की सेना जब किसी गांव के पास पडा़व डालती है तब उसके भोजन के लिए गांव के लोगों से वसूली जाने वाली लाग खिचड़ी लाग कहलाती थी

अंग लाग- प्रत्येक किसान के परिवार के प्रत्येक सदस्य से जो 5 वर्ष से ज्यादा आयु का होता था प्रति सदस्य ₹1 लिया जाता

मुगलों की राजपूत नीति ( Rajput policy of the Mughals )

अकबर की राजपूत नीति

अकबर ने मुगल-राजपूत सम्बन्धो की जो बुनियाद रखी थी वह कमोबेश आखिर तक चलती रही। आर.पी. त्रिपाठी के अनुसार अकबर शाही संघ के प्रति राजपूतों की केवल निष्ठा चाहता था।यह नीति “सुलह-ए-कुल”(सभी के साथ शांति एवं सुलह) पर आधारित थी। सुलह न किए जाने वाले शासकों को शक्ति के बल पर जीता, जैसे-मेवाड़, रणथंभौर आदि

अधीनस्थ शासक को उनकी “वतन जागीर” दी गई। उसको आंतरिक मामलों में पूर्ण स्वंतत्रता प्रदान की गई तथा बाहरी आक्रमणों से पूर्ण सुरक्षा की गारंटी दी गई। प्रशासन संचालन एवं युद्ध अभियानों में सम्मिलित किया एवं योग्यता अनुरूप उन्हें “मनसब” प्रदान किया।

“टीका प्रथा” शुरू की। राज्य के नए उत्तराधिकारी की वैधता “टीका प्रथा” द्वारा की जाती थी। जब कोई राजपूत शासक अपना उत्तराधिकारी चुनता था तो मुग़ल सम्राट उसे (नवनियुक्त) को “टीका” लगाता था, तब उसे मान्यता मिलती थी।

सभी राजपूत शासकों की टकसालों की जगह मुगली प्रभाव की मुद्रा शुरू की गई। सभी राजपूत राज्य अजमेर सुबे के अंतर्गत रखे गए

सैनिक व्यवस्था ( Military system )

मध्यकालीन राजस्थान की सैन्य व्यवस्था पर मुगल सैन्य व्यवस्था का प्रभाव दृष्टिगोचर होता हैं। सेना मुख्यत: दो.भागों मे बंटी हुई होती थी। एक राजा की सेना, जो ‘अहदी’ कहलाती थी तथा दूसरी सामन्तों की सेना, जो, ‘जमीयत’ कहलाती थी।

अहदी सैनिको की भर्ती, प्रशिक्षण, वेतन आदि कार्य दीवान व मीरबक्शी के अधीन होता था। ‘दाखिली’ सैनिकों की भर्ती यद्दपि राजा की ओर से होती थी किन्तु इनको सामन्तों की कमान या सेवा मे रख दिया जाता था। इन्हें वेतन सामन्तों की ओर से दिया जाता था। ‘जमीयत’ के लिए ये कार्य संबंधित सामतं करता था।

सेना मे भी अफगानों, रोहिलों,मराठों, सिन्धियों, अहमद-नगरियों आदि को स्थान दिये जाने जिन्हें ‘परदेशी’ कहा जाता था। घोडों को दागने की प्रथा चल गई थी। जिनके पास बन्दूकें होती थी वे बन्दूकची कहलाते थे।सेना के मुख्य रुप से दो भाग होते थे- प्यादे (पैदल) और सवार।

1. प्यादे (पैदल सैनिक):- यह राजपूतों की सेना की सबसे बड़ी शाखा थी। राजपूतों की पैदल सेैना म दो प्रकार के सैनिक होते थे- अहशमा सैनिक, सेहबन्दी सैनिक

2. सवार :- इसमे घुडसवार एवं शुतरसवार (ऊँट) सम्मिलित थे जो ‘राजपूत सेना के प्राण‘ मानी जाती थी। घुडसवारों मे दो प्रकार घुड़सवार होते थे बारगीर, सिलेदार।

  • निम अस्पा :- दो घुड़सवारों के पास एक घोडा़ होता था।
  • यक अस्पा :- वह घुड़सवार जिसके पास एक घोडा़ हो।
  • दअस्पा :- वह घुड़सवार जिसके पास दो घोड़े हो।
  • सिह अस्पा :- वह घुड़सवार जिसके पास तीन घोड़े हो।

तोपखाने के अधिकारियों मे ‘बक्शी-तोपखाना‘, ‘दरोगा- तोपखाना’ व मुशरिफ- तोपखाना’ के उल्लेख मिलता हैं। तोपचियों को ‘गोलन्दाज‘ कहा जाता था।

सैन्य विभाग को ‘सिलेहखाना’ कहा जाता था। सिलेहखाना शब्द हथियार डिपो के लिए भी प्रयुक्त हुआ है। घोड़े सहित सभी घुड़सवारों ‘दीवान-ए-अर्ज’ मे लाया जाता था।

प्रशासनिक प्रशासनिक प्रशासनिक प्रशासनिक प्रशासनिक प्रशासनिक प्रशासनिक प्रशासनिक प्रशासनिक प्रशासनिक

September 26, 2020

Historical Period Maurya ऐतिहासिक काल मौर्य काल

ऐतिहासिक काल मौर्य काल

मौर्य काल ( Maurya Empire )

चंद्रगुप्त मौर्य के समय से ही मौर्यों की सत्ता इस क्षेत्र में फैल गई। कोटा जिले के कणसावा गांव से मिले शिलालेख से यह पता चलता है कि वहां मौर्य वंश के राजा धवल का राज्य था बैराठ से अशोक के दो अभिलेख मिले हैं मौर्य काल में राजस्थान सिंध, गुजरात तथा कोकण का क्षेत्र अपर जनपद अथवा पश्चिमी जनपद कहलाता था

अशोक का बैराठ का शिलालेख तथा उसके उतराधिकारी कुणाल के पुत्र सम्प्रति द्वारा बनवाये गये मन्दिर मौर्यों के प्रभाव की पुष्टि करते हैं कुमारपाल प्रबंध अन्य जैन ग्रंथ से अनुमानित है कि चित्तौड़ का किला व चित्रांग तालाब मौर्य राजा चित्रांग द्वारा बनवाया हुआ है चित्तौड़ से कुछ दूर मानसरोवर नामक तालाब पर राजा मान का जो मौर्यवंशी माना जाता हैं

विक्रम संवत 770 का शिलालेख कर्नल टॉड को मिला जिसमें माहेश्वर, भीमभोज और मानचार नाम क्रमशः दिये है इन प्रमाणों से मौर्यों का राजस्थान में अधिकार और प्रभाव स्पष्ट होता है।

राजस्थान में मौर्य वंश ( Maurya dynasty in Rajasthan )

मौर्य युग में मत्स्य जनपद का भाग मौर्य शासकों के अधीन आ गया था। इस संदर्भ में अशोक का भाब्रू शिलालेख अति-महत्त्वपूर्ण है, जो राजस्थान में मौर्य शासन तथा अशोक के बौद्ध होने की पुष्टि करता है।

इसके अतिरिक्त अशोक के उत्तराधिकारी कुणाल के पुत्र सम्प्रति द्वारा बनवाये गये मंदिर इस वंश के प्रभाव की पुष्टि करते है। कुमारपाल प्रबंध तथा अन्य जैन ग्रन्थों से अनुमानित है कि चित्तौड़ का किला व एक चित्रांग तालाब मौर्य राजा चित्रांग का बनवाया गया है।

चित्तौड़ से कुछ दूर मानसरोवर नामक तालाब पर मौर्यवंशी राजा मान का शिलालेख मिला है।  जी.एच. ओझा ने उदयपुर राज्य के इतिहास में लिखा है कि चित्तौड़ का किला मौर्य वंश के राजा चित्रांगद ने बनाया था, जिसे आठवीं शताब्दी में बापा रावल ने मौर्य वंश के अंतिम राजा मान से यह किला छिना था।

इसके अतिरिक्त कोटा के कणसवा गाँव से मौर्य राजा धवल का शिलालेख मिला है जो बताता है कि राजस्थान में मौर्य राजाओं एवं उनके सामंतों का प्रभाव रहा होगा।

राजस्थान में जनपद ( District in Rajasthan )

राजस्थान के प्राचीन इतिहास का प्रारंभ प्रागैतिहासिक काल से ही शुरू हो जाता है। प्रागैतिहासिक काल के कई महत्त्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल प्राप्त होते जैसे- बागोर से प्राचीनतम पशुपालन के साक्ष्य मिले तथा दर, भरतपुर से प्राचीन चित्रित शैलाश्रय मिली है किंतु यहाँ से कोई लिखित साक्ष्य नहीं मिलते हैं जिसके कारण इनका विस्तृत अध्ययन संभव नहीं हो पाया है।

 प्राचीनतम साहित्य 6वीं सदी ईस्वी पूर्व से प्राप्त होते हैं जो राजस्थान में जनपद युग का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह जनपद चित्तौड़, अलवर, भरतपुर, जयपुर क्षेत्र में विस्तृत थे तथा यह क्रमशः शिवी, राजन्य, शाल्व एवं मत्स्य जनपद के नाम से जाने जाते थे।

कालांतर में महाजनपद का काल आया जिसमें राजस्थान के दो महत्त्वपपूर्ण महाजनपद का वर्णन मिलता है, जो निम्न थे- शुरसेन एवं कुरु जो क्रमशः भरतपुर, धौलपुर एवं अलवर क्षेत्र में विस्तृत थे।

महाभारत युद्ध के बाद कुरु और यादव जन-पद निर्बल हो गये। महात्मा बुद्ध के समय से अवन्ति राज्य का विस्तार हो रहा था। समूचा पूर्वी राजस्थान तथा मालवा प्रदेश इसके अंतर्गत था। ऐसा लगता है कि शूरसेन और मत्स्य भी किसी न किसी रूप में अवंति के प्रभाव क्षेत्र में थे।

327 ई. पू. सिकन्दर के आक्रमण के कारण पंजाब के कई जनों ने उसकी सेना का सामना किया। अपनी सुरक्षा और व्यक्तित्व को बनाए रखने के लिए ये कई कबीले राजस्थान की ओर बढ़े जिनमें मालव, शिवी, अर्जुनायन, योधेय आदि मुख्य थे। इन्होंने क्रमशः टोंक, चित्तौड़, अलवर-भरतपुर तथा बीकानेर पर अपना अधिकार स्थापित कर दिया।

मालव जनपद में श्री सोम नामक राजा हुआ जिसने 225 ई. में अपने शत्रुओं को परास्त करने के उपलक्ष में एकषष्ठी यज्ञ का आयोजन किया। ऐसा प्रतीत होता है कि समुद्रगुप्त के काल तक वे स्वतंत्र बने रहे।

मत्स्य जनपद ( Matsya Janapad )- 

मत्स्य शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है जहां मत्स्य निवासियों को सुदास का शत्रु बताया गया है। मत्स्य जनपद आधुनिक जयपुर, अलवर, भरतपुर के मध्यवर्ती क्षेत्र में विस्तृत था। इसकी राजधानी विराटनगर थी।

महाभारत काल में मत्स्य जनपद पर विराट नगर शासक शासन कर रहा था तथा यह माना जाता है कि इसी विराट ने विराटनगर (बैराठ) की स्थापना की थी। नृत्य की कत्थक शैली के प्रणेता मिहिर ईसा पूर्व दूसरी सदी में मत्स्य देश में ही हुआ था।

कुरू जनपद ( Kuru district ) – राज्य में अलवर का उत्तरी भाग कुरु जनपद का हिस्सा था। इसकी राजधानी इन्द्रपथ थी।

अवंती जनपद ( Avanti District ) :- अवंति महाजनपद महत्व वर्तमान मध्य प्रदेश की सीमा में था परंतु सीमावर्ती राजस्थान का क्षेत्र इसके अंतर्गत आता था।

मालवा जनपद ( Malwa district ) :-  मालव सिकंदर के आक्रमण के कारण राजस्थान में प्रवेश कर गए और यहां अजमेर, टोंक, मेवाड़ के मध्यवर्ती क्षेत्र में बस गए और यहां अपनी बस्तियां स्थापित की। पहली सदी के अंत तक इस क्षेत्र में मानव ने अपनी शक्ति संगठित कर ली तथा मालव नगर को अपनी राजधानी बनाया।

इस स्थान का समीकरण टोंक जिले में स्थित नगर या ककोर्टनगर से किया जाता है। हमें राज्य में जिस जनपद के सर्वाधिक सिक्के अब तक प्राप्त हुए हैं वह मालव जनपद ही है। राज्य में मालव जनपद के सिक्के रैढ तथा नगर (टोंक) से प्रमुखता से मिले हैं। मालवो द्वारा 57 ईसवी पूर्व को मालव संवत के रूप में उपयोग किया गया। यह संवत पहले कृत फिर मालव और अंततः विक्रम संवत कहलाया।

शूरसेन जनपद ( Shoresen district ) :- इसका क्षेत्र वर्तमान पूर्वी अलवर,धौलपुर,भरतपुर तथा करौली था। इसकी राजधानी मथुरा थी। वासुदेव पुत्र कृष्ण का संबंध किस जनपद से था।

शिवि जनपद ( Shivi district ) :- 

मेवाड़ प्रदेश (चितौड़गढ) नामकरण की दृष्टि से द्वितीय शताब्दी में शिव जनपद (राजधानी माध्यमिका) के नाम से प्रसिद्ध था। बाद में ‘प्राग्वाट‘ नाम का प्रयोग हुआ। कालान्तर में इस भू भाग को ‘मेदपाट‘ नाम से सम्बोधित किया गया।

छठी शताब्दी ईसापूर्व सिकंदर के आक्रमण के परिणाम स्वरुप सभी लोग पंजाब से राजस्थान की ओर आय तथा चित्तौड़ के समीप नगरी नामक स्थान पर बस गए नगरी को ही मध्यमिका के नाम से जाना जाता है राज्य में शिवि जनपद के अधिकांश सिक्के नगरी क्षेत्र से ही प्राप्त हुए हैं। इस जनपद का उल्लेख पाणिनी कृत अष्टाध्यायी से मिलता है।

यौद्धेय जनपद ( Yudhayya district ) :- योद्धेय जनपद वर्तमान श्रीगंगानगर हनुमानगढ़ क्षेत्र में विस्तृत था।

राजन्य जनपद ( State level) :- राजन्य जनपद वर्तमान भरतपुर क्षेत्र में विस्तृत था।

अर्जुनायन जनपद ( Arjunaan district ) :- अर्जुनायन जनपद अलवर क्षेत्र में विस्तृत था।

शाल्व जनपद ( Shalve district ) :-  शाल्व जनपद अलवर क्षेत्र में विस्तृत था।

August 18, 2020

अजमेर के चौहान Ajmer Chauhan Dynasty

अजमेर के चौहान

चौहानों की उत्पति के संबंध में विभिन्न मत हैं। पृथ्वीराज रासौ (चंद्र बरदाई) में इन्हें ‘अग्निकुण्ड’ से उत्पन्न बताया गया है, जो ऋषि वशिष्ठ द्वारा आबू पर्वत पर किये गये यज्ञ से उत्पन्न हुए चार राजपूत – प्रतिहार, परमार,चालुक्य एवं चौहानों (हार मार चाचो – क्रम) में से एक थे। मुहणोत नैणसी एवं सूर्यमल मिश्रण ने भी इस मत का समर्थन किया है।

प. गौरीशंकर ओझा चौहानों को सूर्यवंशी मानते हैं।  बिजोलिया शिलालेख के अनुसार चौहानों की उत्पत्ति ब्राह्मण वंश से हुई है।

अजमेर के चौहान

चौहानों की उत्पति के विभिन्न मत:-

  • अग्निकुल – पृथ्वीराज रासौ, नैणसी एवं सूर्यमल्ल मिश्रण।
  • सूर्यवंशी – पृथ्वीराज विजय, हम्मीर महाकाव्य, हम्मीर रासो, सर्जन चरित्र,चौहान प्रशस्ति, बेदला शिलालेख इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा भी इन्हें सूर्यवंशी मानते हैं।
  • इन्द्र के वंशज – रायपाल का सेवाडी अभिलेख।
  • विदेशी मत –(शक-सीथियन)- कर्नल जेम्स टाॅड, डाॅ.वी.ए. स्मिथ एवं विलियम क्रुक।
  • ब्राह्मणवंशी मत –डाॅ.दशरथ शर्मा, डाॅ. गोपीनाथ शर्मा, कायम खां रासो,बिजौलिया शिलालेख।
  • चंद्रवंशी मत – हांसी शिलालेख, अचलेश्वर मंदिर का लेख।

अजमेर के चौहान वंश के कई नाम है- जैसे जांगल प्रदेश के चौहान, सपादलक्ष की चौहान,  शाकंभरी के चौहान आदि।

सांभर चौहान वंश

राजस्थान में चौहानों के मूल स्थान सांभर (शाकम्भरी देवी – तीर्थों की नानी, देवयानी तीर्थ) के आसपास वाला क्षेत्र माना जाता था इस क्षेत्र को सपादलक्ष (सपादलक्ष का अर्थ सवा लाख गांवों का समूह) के नाम से जानते थे?

प्रारम्भिक चौहान राजाओं की राजधानी अहिच्छत्रपुर (हर्षनाथ की प्रशस्ति) थी जिसे वर्तमान में नागौर के नाम से जानते हैं। गोपीनाथ शर्मा के अनुसार वासुदेव चौहान ने 551 ई में चौहान वंश की नींव डाली। आसपास जांगल प्रदेश में चौहान सत्ता स्थापित की। चौहान राज्य में कुल सवा लाख थे अतः सपादलक्ष चौहान का कहलाये।

कुछ विद्वानों के अनुसार सांभर इनकी राजधानी थी। यहीं पर वासुदेव चौहान ने चौहान वंश की नीव डाली। इसने सांभर ( सांभर झील के चारों ओर रहने के कारण चौहान कहलाये ) को अपनी राजधानी बनाया। सांभर झील का निर्माण ( बिजोलिया शिलालेख के अनुसार ) भी इसी शासक ने करवाया। इसकी उपाधि महाराज की थी। अतः यह एक सामंत शासक था।

वासुदेव के उत्तराधिकारी “गुवक प्रथम’ ने सीकर में हर्षनाथ मंदिर को निर्माण कराया इस मंदिर मे भगवान शंकर की प्रतिमा विराजमान है, जिन्हें श्रीहर्ष के रूप में पूजा जाता है।

गुवक प्रथम के बाद गंगा के उपनाम से विग्रहराज द्वितीय को जाना जाता है सर्वप्रथम विग्रहराज द्वितीय ने भरूच (गुजरात) के चालुक्य शासक मूलराज प्रथम को पराजित किया तथा भरूच गुजरात में ही आशापुरा देवी के मंदिर का निर्माण कराया इस कारण विग्रहराज द्वितीय को मतंगा शासक कहा गया इस शासक की जानकारी का एकमात्र स्त्रोत सीकर से प्राप्त हर्षनाथ का शिलालेख है, जो संभवतयः 973ई. का है।

इस वंश का प्रथम स्वतंत्र शासक पृथ्वीराज प्रथम था जिसकी उपाधि महाराजाधिराज थी। पृथ्वीराज प्रथम के मंत्री हट्ड ने सीकर में जीण माता के मंदिर का निर्माण करवाया।

पृथ्वीराज चौहान शाकंभरी माता की आराधना करता था अतः शाकंभरी चौहान कहलाये, सर्वाधिक प्रसिद्धि अजमेर में मिली, अतः अजमेर के चौहान कहलाये, इन की कुलदेवी सीकर की जीण माता तथा कुल देवता हर्षनाथ को माना गया

मान्यता है कि चौहान गुर्जर प्रतिहारों के सामन्त थे। लगभग 10 वीं शताब्दी में सिंहराज चौहान प्रतिहारों से मुक्त हुआ तथा स्वतंत्र शासक बना।आगामी शासक अजयपाल चौहान से क्रमबद्ध इतिहास प्राप्त होता है

अजयराज (1105 – 1133)

पृथ्वीराज प्रथम के पुत्र का नाम अजयराज था। अजयराज को चाँदी के सिक्कों पर ‘श्री अजयदेव’ के रूप में प्रदर्शित किया गया था। अजयराज की रानी सोमलेखा के भी हमें सिक्के प्राप्त हुए हैं, इससे ज्ञात होता है कि सोमलेखा ने भी अपने नाम के चाँदी के सिक्के चलवाए।

अजयराज ने 1113 ई. में अजयमेरू दुर्ग का निर्माण कराया, इस दुर्ग को पूर्व का जिब्राल्टर कहा जाता है।

अजमेर को अपनी राजधानी के रूप में स्वीकार किया मेवाड़ के शासक पृथ्वीराज ने अपनी रानी तारा के नाम पर अजयमेरू दुर्ग का नाम तारागढ़ दुर्ग रखा बाद में यही अजयमेरू/तारागढ़/ गढ़बीठली के रूप में जाना जाने लगा।

अजयराज ने इस दुर्ग का निर्माण अजमेर की बीठली पहाड़ी पर कराया था जिसे कारण इसे गढ़बीठली कहा गया।

अजयराज की उपलब्धि यह थी कि इसने चौहानों को एक संगठित भू-भाग प्रदान किया जिसे अजमेर के नाम से जाना गया है।

अर्णोराज/अर्णाराज(1133- 1155 ई)-

इस शासक ने सर्वप्रथम तुर्कों को पराजित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, तुर्कों पर विजय के उपलक्ष्य में अर्णोराज ने अजमेर शहर के बीचों-बीच आनासागर झील का निर्माण (1137 ई.) कराया था।

जयानक ने अपने ग्रन्थ पृथ्वीराज विजय में लिखा है कि “अजमेर को तुर्कों के रक्त से शुद्ध करने के लिए आनासागर झील का निर्माण कराया था’ क्योंकि इस विजय में तुर्का का अपार खून बहा था।

जहांगीर ने यहां दौलत बाग का निर्माण करवाया। जिसे शाही बाग कहा जाता था। जिसे अब सुभाष उद्यान कहा जाता है। इस उद्यान में नूरजहां की मां अस्मत बेगम ने गुलाब के इत्र का आविष्कार किया।

शाहजहां ने इसी उद्यान में पांच बारहदरी का निर्माण करवाया। अर्णांराज ने पुष्कर में वराह मंदिर का निर्माण करवाया था। इसके दरबारी कवि देवबोध व धर्म घोष थे

गुजरात के चालुक्य शासक कुमारपाल ने अर्णाराज पर आक्रमण किया लेकिन इस आक्रमण को अर्णोराज ने विफल कर दिया यह जानकारी हमें मेरूतुंग के प्रबंध चिन्तामणि नामक ग्रन्थ से मिलती है।

अर्णोराज के पुत्र जगदेव ने इनकी हत्या कर दी इस कारण इसे चौहानों का पितृहंता भी कहा जाता है।

यदि आपको हमारे दुआर दिए गए नोट्स पसंद आ रहे है तो आप हमें पेज पर भी फॉलो कर सकते है  👉👉 FaceBook

August 17, 2020

राजस्थान के अभिलेख Rajasthan Abhilekh

राजस्थान के अभिलेख

पुरातात्विक स्रोतों के अंतर्गत अभिलेख एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं इसका मुख्य कारण उनका तिथि युक्त एवं समसामयिक होना है जिन अभिलेखों में मात्र किसी शासक की उपलब्धियों का यशोगान होता है उसे प्रशस्ति कहते हैं अभिलेखों के अध्ययन को एपिग्राफी कहते हैं अभिलेखों में शिलालेख, स्तंभ लेख, गुहालेख, मूर्ति लेख इत्यादि आते हैं

Image result for राजस्थान के अभिलेख
अभिलेख

भारत में सबसे प्राचीन अभिलेख अशोक मौर्य के हैं शक शासक रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख भारत में संस्कृत का पहला अभिलेख है राजस्थान के अभिलेखों की मुख्य भाषा संस्कृत एवं राजस्थानी है इनकी शैली गद्य-पद्य है तथा लिपि महाजनी एवं हर्ष कालीन है लेकिन नागरी लिपि को विशेष रूप से काम में लिया जाता है

राजस्थान में प्राप्त हुए 162 शिलालेख की सँख्या है इनका वर्णन ”वार्षिक रिपोर्ट राजपुताना अजमेर “ में प्रकाशित हो चुका है !  राजस्थान में पुरातात्विक सर्वेक्षण का कार्य सर्वप्रथम 1871 ई. में ए. सी.एल. कार्माइस प्रारंभ किया –

1. बड़ली का शिलालेख

अजमेर जिले के बड़ली गांव में 443 ईसवी पूर्व का शिलालेख वीर सम्वत 84 और विक्रम सम्वत 368 का है  यह अशोक से भी पहले ब्राह्मी लिपि का है। स्थानीय आख्यानो के अनुसार पद्मसेन बरली का समृद्ध राजा था जिसने अजमेर की तलहटी में बीद्मावती नगरी इन्दरकोट बसाया था ।अजमेर जिले में 27 km दूर बङली गाँव  में भिलोत माता मंदिर से स्तंभ के टुकडो से प्राप्त हुआ। राजस्थान तथा ब्राह्मी लिपि का सबसे प्राचीन शिलालेख है

यह अभिलेख गौरीशंकर हीराचंद ओझा को भिलोत माता के मंदिर में मिला था यह राजस्थान का सबसे प्राचीन अभिलेख है जो वर्तमान में अजमेर संग्रहालय में सुरक्षित है अजमेर के साथ मद्यामिका[ चित्तोड] में जैन धर्म के प्रसार का उल्लेख।

2. घोसुंडी शिलालेख (द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व)

यह लेख कई शिलाखण्डों में टूटा हुआ है। इसके कुछ टुकड़े ही उपलब्ध हो सके हैं। इसमें एक बड़ा खण्ड उदयपुर संग्रहालय में सुरक्षित है।

घोसुंडी का शिलालेख नगरी चित्तौड़ के निकट  घोसुण्डी गांव में प्राप्त हुआ था इस लेख में प्रयुक्त की गई भाषा संस्कृत और लिपि ब्राह्मी है। घोसुंडी का शिलालेख सर्वप्रथम डॉक्टर डी आर भंडारकर द्वारा पढ़ा गया यह राजस्थान में वैष्णव या भागवत संप्रदाय से संबंधित सर्वाधिक प्राचीन अभिलेख है इस अभिलेख से ज्ञात होता है कि उस समय तक राजस्थान में भागवत धर्म लोकप्रिय हो चुका था इसमें भागवत की पूजा के निमित्त शिला प्राकार बनाए जाने का वर्णन है

इस लेख में संकर्षण और वासुदेव के पूजागृह के चारों ओर पत्थर की चारदीवारी बनाने और गजवंश के सर्वतात द्वारा अश्वमेघ यज्ञ करने का उल्लेख है। इस लेख का महत्त्व द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व में भागवत धर्म का प्रचार, संकर्शण तथा वासुदेव की मान्यता और अश्वमेघ यज्ञ के प्रचलन आदि में है।

3. बिजोलिया शिलालेख

बिजोलिया के पाश्वर्नाथ जैन मंदिर के पास एक चट्टान पर उत्कीर्ण  1170 ई. के इस शिलालेख को जैन श्रावक लोलाक द्वारा मंदिर के निर्माण की स्मृति में बनवाया गया था  इसका प्रशस्ति कार गुण भद्र था

इस अभिलेख में सांभर एवं अजमेर के चौहानों का वर्णन है इसके अनुसार चौहानों के आदि पुरुष वासुदेव चौहान ने 551 ईस्वी में शाकंभरी में चौहान राज्य की स्थापना की थी तथा सांभर झील का निर्माण करवाया उसने अहिछत्रपुर को अपनी राजधानी बनाया इसमें सांभर तथा अजमेर के चौहानों को वत्सगोत्रीय ब्राहमण बताया है

इस लेख में उस समय  के क्षेत्रों के प्राचीन नाम भी मिलते हैं-जैसे एक जबालीपुर(जालौर), नड्डूल (नाडोल), शाकंभरी(सांभर), दिल्लिका (दिल्ली), श्रीमाल(भीनमाल), मंडलकर (मांडलगढ़), विंध्यवल्ली(बिजोलिया), नागहृद(नागदा) आदि।इस लेख में उस समय दिए गए भूमि अनुदान का वर्णन डोहली नाम से किया गया है ।

बिजोलिया के आसपास के पठारी भाग को उत्तमाद्री के नाम से संबोधित किया गया  जिसे वर्तमान में उपरमाल के नाम से जाना जाता है । यह अभिलेख संस्कृत भाषा में है और इसमें 13 पद्य है यह लेख दिगंबर लेख है। गोपीनाथ शर्मा के अनुसार 12 वीं सदी के जनजीवन ,धार्मिक अवस्था और भोगोलिक और राजनीति अवस्था जानने हेतु यह लेख बड़े महत्व का है। इस शिलालेख से कुटीला नदी के पास अनेक शैव व जैन तीर्थ स्थलों का पता चलता है ।

4. रणकपुर प्रशस्ति ( 1439 ई. )

इसका प्रशस्तिकार देपाक था इसमें मेवाड़ के राजवंश एवं धरणक सेठ के वंश का वर्णन मिलता है इसमें बप्पा एवं कालभोज को अलग-अलग व्यक्ति बताया है इसमें महाराणा कुंभा की वीजीयो एवं उपाधियों का वर्णन है इसमें गुहीलो को बप्पा रावल का पुत्र बताया है

रणकपुर के चोमुखा जैन मंदिर में स्थापित। रणकपुर मंदिर का निर्माता सूत्रधार दीपा था। इस लेख में बप्पा से कुंभा तक की वंशावली दी है। जिसमें बप्पा को गुहिल का पिता माना गया है।

इस लेख की वंशावली में महेंद्र,अपराजिता आदि कई नाम जोड़ दिए गए। फिर भी कुंभा के वर्णन के लिए बड़ा महत्व रखता है। इसमें महाराणा की प्रारंभिक विजय बूंदी गागरोन सारंगपुर नागौर अजमेर मंडोर मांडलगढ़ आदि का वर्णन है। मेवाड़ में प्रचलित नाणक नामक मुद्रा का साक्ष्य मिलता है। स्थानीय भाषा में आज भी नाणा शब्द मुद्रा के लिए काम में लिया जाता है।

5. कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति ( 1460 में )

इसका प्रशस्ति कार महेश भट्ट था यह राणा कुंभा की प्रशस्ति है इसमें बप्पा से लेकर राणा कुंभा तक की वंशावली का वर्णन हैb इसमें कुंभा की उपलब्धियों एवं उसके द्वारा रचित ग्रंथों का वर्णन मिलता है प्रशस्ति में चंडी शतक, गीत गोविंद की टीका संगीत राज आदि ग्रंथों का उल्लेख हुआ है

इस प्रशस्ति में कुंभा को महाराजाधिराज अभिनव, भरताचार्य, हिंदुस्तान सुरतान, राय रायन, राणो, रासो छाप, गुरु दान गुरु, राजगुरु और सेल गुरु उपाधियों से पुकारा गया है कुंभा ने मालवा और गुजरात की सेना को हराने के बाद इस विजय के उपलक्ष में चित्तौड़ ने विजय स्तंभ का निर्माण करवाया विजय स्तंभ की पांचवी मंजिल पर उत्कीर्ण है

  • उत्कीर्णकर्त्ता- जेता, पौमा, नापा, पूँजा, जइता।
  • महाराणा कुंभा की उपलब्धियां तथा युद्धों का वर्णन।।
  • 179वें श्लोक में गुजरात में मालवा की सम्मिलित सेना को पराजित करने का साक्ष्य।

6. मानमोरी अभिलेख (713 ई.)

यह लेख चित्तौड़ के पास मानसरोवर झील के तट से कर्नल टॉड को मिला था। चित्तौड़ की प्राचीन स्थिति एवं मोरी वंश के इतिहास के लिए यह अभिलेख उपयोगी है। इस लेख से यह भी ज्ञात होता है कि धार्मिक भावना से अनुप्राणित होकर मानसरोवर झील का निर्माण करवाया गया था।

इसमे अम्रत मथन का उल्लेख मिलता हैं! इस शिलालेख के अत्यधिक भारी होने के कारण कर्नल जेम्स टॉड ने इसे इग्लैंड ले जाने की अपेक्षा समुन्द्र में फेकना उचित समझा !

स्थान- चितोड़गढ़, लेखक- पुष्प,  ख़ोजकर्ता – कर्नल जेम्स टोड, उत्कीर्णकर्ता- शिवादित्य

7. सारणेश्वर प्रशस्ति (953 ई.)

उदयपुर के श्मशान के सारणेश्वर नामक शिवालय पर स्थित है इस प्रशस्ति से वराह मंदिर की व्यवस्था, स्थानीय व्यापार, कर, शासकीय पदाधिकारियों आदि के विषय में पता चलता है।  गोपीनाथ शर्मा की मान्यता है कि मूलतः यह प्रशस्ति उदयपुर के आहड़ गाँव के किसी वराह मंदिर में लगी होगी। बाद में इसे वहाँ से हटाकर वर्तमान सारणेश्वर मंदिर के निर्माण के समय में सभा मंडप के छबने के काम में ले ली हो।

8 कुंभलगढ़ शिलालेख-1460 ( राजसमंद )

यह शिलालेख कुम्भलगढ़ दुर्ग में सिथत कुंभश्याम के मंदिर ( इसे वर्तमान में मामदेव का मन्दिर कहते हैं) में मिला है, इसकी निम्न विशेषतायें हैं-

(1)-इसमे गुहिल वंश का वर्णन हैं!
(2)- यह मेवाड़ के महाराणाओं की वंशावली रूप से जानने का महत्वपूर्ण साधन हैं!
(3)-यह राजस्थान का एकमात्र अभिलेख हैं जो महाराणा कुंभा के लेखन पर प्रकाश डालता हैं!
(4)-इस लेख में हम्मीर को विषम घाटी पंचानन कहा गया हैं!

यह मेवाड़ के महाराणाओं की वंशावली को विशुद्ध रूप से जानने के लिए बड़ा महत्वपूर्ण है। इसमें कुल 5 शिलालेखों का वर्णन मिलता है इस शिलालेख में 2709 श्लोक हैं। दासता, आश्रम व्यवस्था, यज्ञ, तपस्या, शिक्षा आदि अनेक विषयों का उल्लेख इस शिलालेख में मिलता है।

इस लेख का रचयिता डॉक्टर ओझा के अनुसार महेश होना चाहिए। क्योंकि इस लेख के कई साक्ष्य चित्तौड़ की प्रशस्ति से मिलते हैं।

9. प्रतापगढ़ अभिलेख (946 ई.)

इस अभिलेख मे गुर्जर -प्रतिहार नरेश महेन्द्रपाल की उपलब्धियों का वर्णन किया गया है। तत्कालीन समाज कृषि, समाज एवं धर्म की जानकारी मिलती है।

10. विराट नगर अभिलेख (जयपुर)

अशोक के अभिलेख मौर्य सम्राट अशोक के 2 अभिलेख विराट की पहाड़ी पर मिले थे

1⃣ भाब्रू अभिलेख
2⃣ बैराठ शिलालेख

Image result for राजस्थान के अभिलेख

जयपुर में सिथत विराट नगर की बीजक पहाड़ी पर यह शिलालेख उत्कीर्ण हैं! यह शिलालेख पाली व बाह्मी लिपि में लिखा हुआ था! इस शिलालेख को कालांतर में 1840 ई. में बिर्टिश सेनादिकारी कैप्टन बर्ट दारा कटवा कर कलकत्ता के सग्रहालय में रखवा दिया गया इस अभिलेख में सम्राट अशोक द्वारा बौद्ध धर्म एवं संघ में आस्था प्रकट की गई है इस अभिलेख से अशोक के बुद्ध धर्म का अनुयायी होना सिद्ध होता है इसे मौर्य सम्राट अशोक ने स्वयं उत्कीर्ण करवाया था! चीनी यात्री हेनसांग ने भी इस स्थाल का वर्णन किया है!

11. फारसी शिलालेख 

भारत में मुस्लिम राज्य की स्थापना के पश्चात् फारसी भाषा के लेख भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं। ये लेख मस्जिदों, दरगाहों, कब्रों, सरायों, तालाबों के घाटों, पत्थर आदि पर उत्कीर्ण करके लगाए गए थे। राजस्थान के मध्यकालीन इतिहास के निर्माण में इन लेखों से महत्त्वपूर्ण सहायता मिलती है। इनके माध्यम से हम राजपूत शासकों और दिल्ली के सुलतान तथा मुगल शासकों के मध्य लड़े गए युद्धों, राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों पर समय-समय पर होने वाले मुस्लिम आक्रमण, राजनीतिक संबंधों आदि का मूल्यांकन कर सकते हैं।

इस प्रकार के लेख सांभर, नागौर, मेड़ता, जालौर, सांचोर, जयपुर, अलवर, टोंक, कोटा आदि क्षेत्रों में अधिक पाए गए हैं। फारसी भाषा में लिखा सबसे पुराना लेख अजमेर के ढ़ाई दिन के झोंपड़े के गुम्बज की दीवार के पीछे लगा हुआ मिला है। यह लेख 1200 ई. का है और इसमें उन व्यक्तियों के नामों का उल्लेख है जिनके निर्देशन में संस्कृत पाठशाला तोड़कर मस्जिद का निर्माण करवाया गया।

चित्तौड़ की गैबी पीर की दरगाह से 1325 ई. का फारसी लेख मिला है जिससे ज्ञात होता है कि अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ का नाम खिज्राबाद कर दिया था।

जालौर और नागौर से जो फारसी लेख में मिले हैं, उनसे इस क्षेत्र पर लम्बे समय तक मुस्लिम प्रभुत्व की जानकारी मिलती है।

पुष्कर के जहाँगीर महल के लेख (1615 ई.) से राणा अमरसिंह पर जहाँगीर की विजय की जानकारी मिलती है। इस घटना की पुष्टि 1637 ई. के शाहजहानी मस्जिद, अजमेर के लेख से भी होती है।

नोट-अजमेर शिलालेख राजस्थान में फ़ारसी भाषा का सबसे प्राचीन अभिलेख हैं!

12. साडेश्वर अभिलेख

इस अभिलेख से वराह मंदिर की व्यवस्था स्थानीय व्यापार कर शासकीय पदाधिकारियों आदि के विषय में पता चलता है

13. कुमारपाल अभिलेख 1161ई.(1218 वि.स.)

इस अभिलेख से आबू के परमारों की वंशावली प्रस्तुत की गई है

14. चीरवे का शिलालेख ( 1273 ई. )

रचयिता- रत्नप्रभुसूरी + पार्श्वचन्द्र, उत्कीर्णकर्त्ता– देल्हण

चीरवे शिलालेख के समय मेवाड़ का शासक समर सिंह था। चीरवा गांव उदयपुर से 8 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। एक मंदिर की बाहरी दीवार पर यह लेख लगा हुआ। चीरवे शिलालेख में संस्कृत में 51 श्लोकों का वर्णन मिलता है। चीरवे शिलालेख में गुहिल वंशीय, बप्पा, पद्मसिंह, जैत्रसिंह, तेजसिहं और समर सिंह का वर्णन मिलता है।

चीरवे शिलालेख में चीरवा गांव की स्थिति, विष्णु मंदिर की स्थापना, शिव मंदिर के लिए खेतों का अनुदान आदि विषयों का समावेश है। इस लेख में मेवाड़ी गोचर भूमि, सती प्रथा, शैव धर्म आदि पर प्रकाश पड़ता है।

15. रसिया की छत्री का शिलालेख ( 1274 ई. )

इस शिलालेख की एक शिला बची है। जो चित्तौड़ के पीछे के द्वार पर लगी हुई है। इसमें बप्पा से नरवर्मा तक। गुहिल वंशीय मेवाड़ शासकों की उपलब्धियों का वर्णन मिलता है। इस शिलालेख के कुछ अंश 13 सदी के जन जीवन पर प्रकाश डालते है। नागदा और देलवाड़ा के गांवों का वर्णन मिलता है। दक्षिणी पश्चिमी राजस्थान के पहाड़ी भाग की वनस्पति का चित्रण

इस शिलालेख से आदिवासियों के आभूषण वैदिक यज्ञ परंपरा और शिक्षा के स्तर की समुचित जानकारी का वर्णन मिलता है।

16. चित्तौड़ के पार्श्वनाथ के मंदिर का लेख (1278 ई. )

तेज सिंह की रानी जयतल्ल देवी के द्वारा एक पार्श्वनाथ के मंदिर बनाने का उल्लेख मिलता है। जिसे भर्तृपुरीय आचार्य के उपदेश से बनवाया।इस लेख से शासन व्यवस्था,धर्म व्यवस्था तथा धार्मिक सहिष्णुता के बारें में जानकारी मिलती हैं।

17. आबू का लेख ( 1342 ई. )

लेख श्लोक- 62, रचना- वेद शर्मा

बप्पा से लेकर समर सिंह तक के मेवाड़ शासकों का वर्णन, इस लेख में आबू की वनस्पति तथा ध्यान,ज्ञान, यज्ञ आदि से संबंधित प्रचलित मान्यताओं का वर्णन मिलता है।  इस शिलालेख से लेखक का नाम शुभ चंद्र है। शिल्पी सूत्रधार का नाम कर्मसिंह मिलता है

18. गंभीरी नदी के पुल का लेख

यह लेख किसी स्थान से लाकर अलाउद्दीन खिलजी के समय गंभीरी नदी के पुल के 10 वी सीढ़ियों पर लगा दिया गया। इसमें समर सिंह तथा उनकी माता जयतल्ल देवी का वर्णन मिलता है। यह लेख महाराणाओं की धर्म सहिष्णुता नीति तथा मेवाड़ के आर्थिक स्थिति पर अच्छा प्रकाश डालता है।

19. श्रृंगी ऋषि का शिलालेख ( 1428 ई. )

सूत्रधार– पन्ना

यह लेख खण्डित दशा में है। जिसका बड़ा टुकड़ा खो गया।  इस लेख की रचना कविराज वाणी विलास योगेश्वर ने की। हमीर के संबंध में इसमें लिखा है कि उसने जिलवड़े को छीना और पालनपुर को जलाया। हम्मीर का भीलों के साथ भी सफल युद्ध होने का उल्लेख मिलता।

इस लेख में लक्ष्मण सिंह और क्षेत्र सिंह की त्रिस्तरीय यात्रा का वर्णन मिलता है। जहां उन्होंने दान में विपुल धनराशि दी और गया में मंदिरों का निर्माण करवाया।

20. समिधेश्वर मंदिर का शिलालेख ( 1485 ई. )

  • रचना- एकनाथ ने
  • उस समय में शिल्पियों के परिवारों का बोध। इसमें लेख को शिल्पकार वीसल ने लिखा।
  • सूत्रधार-वसा
  • इसमें मोकल द्वारा निर्मित विष्णु मंदिर निर्माण का उल्लेख मिलता है।इस लेख में यह भी लिखा मिलता है कि महाराजा लक्ष्मण सिंह ने झोटिंग भट्ट जैसे विद्वानों को आश्रय दिया था।
  • सिसोदिया एवं परमार वंश की जानकारी का साक्ष्य। चित्तौड़ दुर्ग में।

21. देलवाड़ा का शिलालेख ( 1334ई. सिरोही )

इस शिलालेख में कुल 18 पंक्तियां हैं। जिसमें आरंभ की 8 पंक्तियां संस्कृत में और शेष 10 पंक्तियां मेवाड़ी भाषा में। इस लेख में धार्मिक आर्थिक और राजनीतिक स्थिति पर प्रकाश पड़ता है। टंक नाम की मुद्रा के प्रचलन का उल्लेख मिलता है। मेवाड़ी भाषा का प्रयोग किया गया है जो उसमें की बोलचाल भाषा थी।

22. रायसिंह की प्रशस्ति ( 1593 में )

  • जूनागढ़ के दुर्ग के दरवाजे पर
  • रचयिता- जैन मुनि जइता/जैता(क्षेमरत्न कि शिष्य)
  • इस लेख में बीका से रायसिंह तक के बीकानेर के शासकों की उपलब्धियों का वर्णन मिलता है।
  • 60 वीं पंक्ति में रायसिंह के कार्यों का उल्लेख आरंभ होता है। जिनमें का काबुलियों, सिंधियों और कच्छियों पर विजय मुख्य हैं।

यदि आपको हमारे दुआर दिए गए नोट्स पसंद आ रहे है तो आप हमें पेज पर भी फॉलो कर सकते है  👇👇

FaceBook

August 17, 2020

पाषाण काल से राजपूतों की उत्पत्ति तक का इतिहास

पाषाण काल से राजपूतों की उत्पत्ति तक का इतिहास

पुरातात्त्विक संस्कृतियां  Archaeological cultures

इतिहास को प्रागैतिहासिक काल, आद्दंऐतिहास काल एवं ऐतिहासिक काल मे बांटा जाता हैं प्रागैतिहासिक काल से तात्पर्य हैं कि उस समय के मानव के इतिहास के बारे मे कोई लिखित सामग्री नहीं मिली बल्कि पुरातात्विक सामग्रियों के आधार पर ही उसके इतिहास (संस्कृति) के बारे मे अनुमान लगाया जाता हैं

पाषाण काल से

एसी सभ्यता एवं संस्कृतियों को पुरातात्विक सभ्यता/संस्कृति या प्रागैतिहासिक काल कहते हैं जब मानव लेखन कला से तो परिचित हो गया लेकिन उसे अभी तक पढा़ नही जा सका हैं, तो उसे आद्दंऐतिहासिक कालीन सभ्यता/संस्कृति कहते हैं, जैसे- सिन्धुघाटी सभ्यता।

जब से मानव के बारे मे पठन योग्य (लिखित) सामग्री मिलना शुरू हो जाती हैं तो उसे ऐतिहासिक काल कहते हैं, जैसे- वैदिक काल। यहां हम इन तीनों कालो का राजस्थान के सन्दर्भ मे अध्ययन था

पुरापाषाण काल ( Palaeolithic Period )

राजस्थान में पाषाण युग के ‘आदि मानव’ द्वारा प्रयुक्त डेढ़ लाख वर्ष पूर्व के पाषाण उपकरण प्राप्त हुए हैं। अनुसन्धान से राजस्थान में पाषाणकालीन तीन प्रकार की संस्कृतियाँ थी-

  1. प्रारंभिक पाषाण काल  ( Early stone age )
  2. मध्य पाषाण काल ( Middle Stone Age )      
  3. उत्तर पाषाण काल ( Paleolithic )

प्रारंभिक पाषाण काल  ( Early stone age ) –

इसका काल आज से लगभग 1.5 लाख से 50000 वर्ष पूर्व तक का माना जाता है। यह राजस्थान में मानव संस्कृति का वह उषाकाल था जिसमें संस्कृति के सूर्य का उदय प्रारंभ हुआ था। अनुसन्धान से पता चलता है कि इस समय का मानव यायावर था।

उसके भोज्य पदार्थ के रूप में जंगली कंद-मूल फल तथा हिरन, शूकर, भेड़, बकरी आदि पशु थे। इस युग के उपकरणों की सर्वप्रथम खोज आज से लगभग 95 वर्ष पूर्व श्री सी. ए. हैकर ने जयपुर व इन्दरगढ़में की थी। उन्होंने वहां अश्म पत्थर से निर्मित हस्त-कुल्हाड़ी (हैण्ड एक्स) खोजे थे जो कलकत्ता के भारतीय संग्रहालय में उपलब्ध है।

इसके कुछ ही समय के उपरांत श्री सेटनकार को झालावाड जिले में इस काल के कुछ और उपकरण प्राप्त हुए थे। इसके बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग, नई दिल्ली, डेक्कन कॉलेज पूना तथा राजस्थान के पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा प्रारंभिक पाषाण काल के सम्बन्ध में अनुसन्धान कार्य किये हैं।

इन अनुसंधानों से प्रारंभिक पाषाण काल के मानव द्वारा प्रयुक्त ‘हस्त-कुल्हाड़ी (हैण्ड एक्स), क्लीवर तथा चौपर’ नाम के उपकरणों के बारे में पता चलता है।

हस्त-कुल्हाड़ी ( Hand Axe )- यह 10 सेमी से 20 सेमी तक लंबा, नोकदार, एक ओर गोल व चौड़ा तथा दूसरी ओर नुकीला व तेज किनारे वाला औजार होता है। इसका उपयोग जमीन से खोद कर कंद-मूल निकालने, शिकार को काटने तथा खाल उतारने के लिए होता था।

क्लीवर ( Cleaver )– यह एक आयताकार औजार होता है जो लगभग 10 सेमी से 20 सेमी तक लंबा तथा 5 से 10 सेमी चौड़ा होता है। इसका एक किनारा कुल्हाड़ी की भांति सीधा व तेज धारदार होता है तथा दूसरा किनारा गोल, सीधा व त्रिकोण होता है।

चौपर – यह एक गोल औजार होता है जिसके एक ओर अर्धचंद्राकार धार होती है तथा इसका दूसरा किनारा मोटा व गोल होता है जो हाथ में पकड़ने के लिए प्रयुक्त होता है।

प्रसार- प्रारंभिक पाषाण काल की संस्कृति का प्रसार राजस्थान की अनेक प्रमुख व सहायक नदियों के किनारों पर अजमेर, अलवर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, जयपुर, झालावाड़, जोधपुर, जालौर, पाली, टौंक आदि स्थानों पर होने के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।

इसका विशेषतः प्रसार चम्बल तथा बनास नदी के किनारे अधिक हुआ था। चित्तौड़ क्षेत्र में इतनी अधिक मात्रा में प्रारंभिक पाषाण काल के औजार मिले है जिनसे अनुमान लगता है कि उस युग में यहाँ पाषाण हथियारों का कोई कारखाना रहा होगा।

पूर्वी राजस्थान में भानगढ़ तथा ढिगारिया और विराटनगर में ‘हैण्ड-एक्स संस्कृति’ का पता चलता है। पश्चिमी राजस्थान में लूनी नदी के किनारे तथा जालौर जिले में रेत के टीलों में पाषाणकालीन उपकरणों की खोज हुई है।

विराटनगर में कुछ प्राकृतिक गुफाओं तथा शैलाश्रय की खोज हुई है जिनमें प्रारंभिक पाषाण काल से ले कर उत्तर पाषाण काल तक की सामग्री प्राप्त हुई है। इनमें चित्रों का अभाव है किन्तु भरतपुर जिले के ‘दर’ नामक स्थान से कुछ चित्रित शैलाश्रय खोजे गए हैं जिनमें मानवाकृति, व्याघ्र, बारहसिंघा तथा सूर्य आदि के चित्रांकन प्रमुख है।

मध्य पाषाण काल ( Middle Stone Age ) 

राजस्थान में मध्य पाषाण युग का प्रारंभ लगभग 50000 वर्ष पूर्व होना माना जाता है। यह संस्कृति प्रारंभिक पाषाण काल की संस्कृति से कुछ अधिक विकसित थी किन्तु इस समय तक मानव को न तो पशुपालन का ज्ञान था और न ही खेती बाड़ी का, इसलिए यह कहा जा सकता है कि यह संस्कृति संगठित सामाजिक जीवन से अभी भी दूर थी।

इस काल में छोटे, हलके तथा कुशलतापूर्वक बनाये गए उपकरण प्राप्त हुए हैं, जिनमें ‘स्क्रेपर तथा पॉइंट’ विशेष उल्लेखनीय है। ये उपकरण नुकीले होते थे तथा तीर अथवा भाले की नोक का काम देते थे।

स्क्रेपर – यह 3 सेमी से 10 सेमी लम्बा आयताकार तथा गोल औजार होता है। इसके एक अथवा दोनों किनारों पर धार होती थी और एक किनारा पकड़ने के काम आता था।

पॉइंट- यह त्रिभुजाकार स्क्रेपर के बराबर लम्बा तथा चौड़ा उपकरण था जिसे ‘नोक’ या ‘अस्त्राग्र’ के नाम से भी जाना जाता था। ये उपकरण चित्तौड़ की बेड़च नदी की घाटियों में, लूनी व उसकी सहायक नदियों की घाटियों में तथा विराटनगर से भी प्राप्त हुए हैं।

उत्तर पाषाण काल ( Paleolithic )

राजस्थान में उत्तर पाषाण युग का सूत्रपात आज से लगभग 10000 वर्ष पूर्व हुआ था। इस युग में उपकरणों का आकार मध्य पाषाण काल के उपकरणों से भी छोटा तथा कौशल से भरपूर हो गया था। इस काल में उपकरणों को लकड़ी तथा हड्डियों की लम्बी नलियों में गोंद से चिपका कर प्रयोग किया जाना प्रारंभ हो गया था।

इस काल के उपकरण उदयपुर के बागोर तथा मारवाड़ के तिलवाड़ानामक स्थानों से उत्खनन में प्राप्त हुए हैं। उत्तर पाषाण काल के उपकरणों व अन्य जानकारी की दृष्टि से राजस्थान का महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि भारत के अन्य क्षेत्रों से इतनी अधिक मात्रा उत्तर पाषाण कालीन उत्खनन नहीं हुआ है तथा उपकरण प्राप्त नहीं हुए हैं।

सिंधु सभ्यता का अवसान ( End of Indus Civilization )

                  कारण                    –           विद्वान

  • आर्यो का आक्रमण-                  मार्टिमर व्हीलर
  • बाढ़-                                        एम. आर. साहनी
  • जलवायु परिवर्तन-                    ओरेल स्टीन, अमलानंद घोष
  • पारिस्थितिकी असंतुलन-           फेयर सर्विस
  • प्रशासनिक शिथिलता-              जॉन मार्शल
  • प्राकृतिक आपदा-                     कैनेडी
  • सिंधु नदी का मार्ग परिवर्तन-      लैम्ब्रिक

प्राचीन सभ्यताए ( Ancient civilizations )

पाषाण स्थल (  Stone Age )

  • बागौर-भीलवाड़ा
  • बिलाड़ा-जोधपुर
  • दर-भरतपुर
  • जायल-नागौर
  • ड़ीडवाना-नागौर
  • तिपटिया-कोटा
  • नगरी-चित्तौड़
  • गरदड़ा-बूँदी
  • डाडाथोरा-बीकानेर
  • तिलवाड़ा-बाड़मेर

ताम्र पाषाण काल ( Copper stone age )

  • आहड़-उदयपुर
  • बालाथल-उदयपुर
  • गणेश्वर-सीकर
  • पूगल-बीकानेर
  • कुराड़ा-नागौर
  • गिलूंड-उदयपुर
  • मलाह-भरतपुर
  • बूढ़ा पुष्कर-अजमेर
  • एलाना-जालौर

लौहयुगीन स्थल ( Iron Age )

  • रैढ़- टोंक
  • विराटनगर- जयपुर
  • ईसवाल- उदयपुर
  • चक-84- श्रीगंगानगर
  • नगर- टोंक

कालीबंगा की सभ्यता ( Kalibanga )

स्थान- हनुमानगढ़ सरस्वती या घग्गर नदी के किनारे

इस सभ्यता का विकास घग्घर नदी के किनारे हुआ सरस्वती नदी का वर्णन ऋग्वेद में किया गया है, कालीबंगा का शाब्दिक अर्थ है- काली चूड़ियॉं

कालीबंगा में पूर्व हड़प्पा कालीन हड़प्पाकालीन तथा उत्तर हड़प्पा कालीन सभ्यता के अवशेष मिले हैं, काली चूड़ियों के अवशेष के कारण इसे कालीबंगा कहा जाता है इसमें दो स्थान मिले हैं पहला भाग का समय 2400 से 2250 ईसा पूर्व का है तथा दूसरा भाग 2200 से 1700 ईसा पूर्व का है

इस स्थान का पता 1952 में ए एन घोष ने लगाया था 1961-62 में बी के थापर तथा बीबी लाल है जे वी जोशी ने इसकी खुदाई की थी स्वतंत्र भारत का पहला स्थान जिसकी खुदाई स्वतंत्रता के बाद की गई

सभ्यता के उत्खनन में हड़प्पा सभ्यता तथा हड़प्पा समकालीन सभ्यता के अवशेष मिले है। कालीबंगा सभ्यता मे उत्खनन मे हल से जुते खेत के निशान मिले है।

यहां से सात अग्नि वैदिकाए मिली हैं इस सभ्यता मे उत्खनन मे जले हुए चावल के साक्ष्य मिले है। इस सभ्यता से उत्खनन मे सूती वस्त्र के साक्ष्य मिले है जो कपास उत्पादन के प्रतीक है इस सभ्यता के उत्खनन से मिली अधिकांश वस्तुएं कॉंसे की बनी हुई है जो इस सभ्यता के कॉंस्ययुगीन होने का प्रतीक है।

इस सभ्यता से नगर तीन चरणों में विकसित होने के प्रमाण मिले है।

इस सभ्यता में पक्की ईटों के बने दुर्ग के अवशेष मिले है।इस सभ्यता में नगर के भवन कच्ची ईटों से बने हुए मिले है

कालीबंगा सभ्यता में हवन कुण्ड के साक्ष्य मिले है।

यज्ञ की वेदियॉं जो इस सभ्यता में यज्ञीय परम्परा बली प्रथा का प्रतीक है।

आहड ( Ahar  )

  • उदयपुर में स्थित
  • उत्खनन- रतनचन्द्र अग्रवाल, एच.डी साकलिया
  • प्राचीन नाम-ताम्रवती नगरी
  • आहड बेडच (बनास की सहायक नदी) के किनारे पनपी
  • अन्य नाम-ताम्रवती नगरी, आघाटपुर(आघाट दुर्ग), धूलकोट(स्थानीय नाम)

यहां के निवासी शवों को आभूषण सहित गाड़ते थे।  यहां से तांबा गलाने की भट्टी मिली है। खुदाई में अनाज रखने के बर्तन मृदभांड बिगड़े हुए मिले जिन्हें यहां की बोलचाल की भाषा में गोरे व कोठे कहा जाता था। यह एक ताम्र युगीन सभ्यता है। 

पशुपालन इनकी अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार था , यहां पर यूनान की तांबे की 6 मुद्राएं मिली हैं जिस पर अपोलो देवता का चित्र अंकित है यहां टेराकोटा वृषभ आकृति मिली हैं जिन्हें बनासियन बुल कहा गया है

इसे मृतक टीले की सभ्यता भी कहा जाता है। साक्ष्य मिले- तंदूरी चुल्हे के,तांबे की कुल्हाडीयाँ

आहड़ सभ्यता के लोग कृषि से परिचित थे वे अन्न को पका कर खाते थे (गेहूँ, ज्वार, चावल) बैल व मातृदेवी की मृण मूर्ति प्राप्त हुई है।

बागोर सभ्यता ( Baghor civilization )

यह स्थल राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में कोठरी नदी के तट पर स्थित हैं। इस सभ्यता का उत्खनन 1967 से 1969 के मध्य वीरेंद्र नाथ मिश्र के द्वारा किया गया इस मध्यपाषाण कालीन स्थल से पशुपालन के प्राचीनतम प्रमाण मिले हैं।

बागोर सभ्यता को ‘आदिम जाति का संग्रहालय’ कहा गया है। यहाँ पर उत्खनन का कार्य महासतियों के टिले पर किया गया है।

गिलूंड ( Gilond )

राजसमन्द जिले में बनास नदी के तट से कुछ दूरी पर स्थित गिलूंड की खुदवायी में ताम्रयुगीन एवं बाद कि सभ्यताओं के अवशेष मिले है।यह स्थल आहार सभ्यता स्थल से 30 किलोमीटर दूरी पर स्थित है।

यहाँ पर भी आहड़ युगीन सभयता का प्रसार था।यहाँ चुने के प्लास्टर एवं कच्ची ईंटो का प्रयोग होता था।गिलूंड में काले व लाल रंग के मृद भांड मिले है।इस स्थल पर 100×80 फ़ीट विशाल आकार के विशाल भवन के अवशेष मिले है।जो ईंटो का बना हुआ है, आहार में इस प्रकार क भवनों अवशेष नही मीले है

लाछूरा ( Lachhura )

भीलवाड़ा जिले के आशिंद तहसील के गांव लाछूरा में हनुमान नाले के पास भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग(ASI) द्वारा 1998 में श्री बी.आर.मीना के निर्देशन में उत्खनन कार्य सम्पन्न करवाया गया।

उत्खनन में प्राप्त अवशेषों में यहाँ 7 वी सदी ई.पूर्व से लेकर दूसरी सदी (700B. C. से 2000A. D.) तक कि सभ्यताओं के प्रमाण मिले हैं।ये सभी अवशेष चार कालो में वर्गीकृत किये गए है यहाँ सुंगकालीन तीखे किनारे वाले प्याले आदि मील है।

बैराठ सभ्यता ( Bairath civilization )

विराटनगर (जयपुर), बाणगंगा नदी के किनारे

प्राचीन मत्स्य जनपद की राजधानी

पांडवों द्वारा अज्ञातवास गुजारने का साक्ष्य

तीन पहाड़ियाँ

  • सर्वाधिक उत्खनन (गणेश डूंगरी)
  • भीमडूँगरी
  • मोती डूंगरी

विशाल गोल बौद्ध मंदिर का साक्ष्य

बीजक पहाड़ियाँ से अशोक के सबसे बड़े लघु शिलालेख आबू शिलालेख का साक्ष्य।

वर्तमान में कोलकाता में संग्रहालय

36 मुद्राओं का साक्ष्य।

यूनानी शासक मिनांडर की स्वर्ण मुद्राओं की साक्ष्य।

उत्खनन दयाराम साहनी 1936 में किया गया।

खोज कैप्टन बर्ट ने की।

यदि आपको हमारे दुआर दिए गए नोट्स पसंद आ रहे है तो आप हमें पेज पर भी फॉलो कर सकते है  https://www.facebook.com/goldenclasses0/

August 17, 2020

राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था Administrative System

मध्यकालीन राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था

मध्यकाल में राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था से तात्पर्य मुगलों से संपर्क के बाद से लेकर 1818 ईसवी में अंग्रेजों के साथ हुई संधियों की काल अवधि के अध्ययन से है।  इस काल अवधि में राजस्थान में 22 छोटी बड़ी रियासतें थी और अजमेर मुगल सूबा था।

इन सभी रियासतों का अपना प्रशासनिक तंत्र था लेकिन, कुछ मौलिक विशेषताएं एकरूपता लिए हुए भी थी। रियासतें मुगल सूबे के अंतर्गत होने के कारण मुगल प्रभाव भी था।

राजस्थान की मध्यकालीन प्रशासनिक व्यवस्था के मूलत 3 आधार थे —

  • सामान्य एवं सैनिक प्रशासन।
  • न्याय प्रशासन।
  • भू राजस्व प्रशासन।

संपूर्ण शासन तंत्र राजा और सामंत व्यवस्था पर आधारित था। राजस्थान की सामंत व्यवस्था रक्त संबंध और कुलीय भावना पर आधारित थी।सर्वप्रथम कर्नल जेम्स टॉड ने यहां की सामंत व्यवस्था के लिए इंग्लैंड की फ्यूडल व्यवस्था के समान मानते हुए उल्लेख किया है।

राजस्थान की सामंत व्यवस्था पर व्यापक शोध कार्य के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि यहां की सामंत व्यवस्था कर्नल टॉड द्वारा उल्लेखित पश्चिम के फ्यूडल व्यवस्था के समान स्वामी (राजा) और सेवक (सामंत) पर आधारित नहीं थी।

राजस्थान के सामंत व्यवस्था रक्त संबंध एवं कुलीय भावना पर आधारित प्रशासनिक और सैनिक व्यवस्था थी।

केन्द्रीय शासन ( Central Government )

राजा – सम्पूर्ण शक्ति का सर्वोच्च केंद्र

प्रधान – राजा के बाद प्रमुख। अलग अलग रियासतों में अलग अलग नाम – कोटा और में दीवान, जैसलमेर, मारवाड मेवाड में प्रधान, जयपुर में मुसाहिब, बीकानेर में मुख्त्यार।

बक्षी – सेना विभाग का प्रमुख। जोधपुर में फौजबक्षी होता था।

नायब बक्षी – सैनिको व किलों पर होने वाले खर्च और सामन्तों की रेख का हिसाब रखता था

नोट – रेख = एक जागीरदार की जागीर की वार्षिक आय

शिकदार- मुगल प्रशासन के कोतवाल के समान। गैर सैनिक कर्मचारियों के रोजगार सम्बंधी कार्य।

सामन्ती श्रेणियां ( Feudal System )

कर्नल टॉड ने सामन्ती व्यवस्था को इग्लैण्ड में चलने वाली फ्यूडवल व्यवस्था के समान माना है।

सामन्त श्रेणिया –

  • मारवाड- चार प्रकार की राजवी, सरदार, गनायत, मुत्सद्दी
  • मेवाड – तीन श्रेणियां , जिन्हे उमराव कहा जाता था। सलूम्बर के सामन्त का विशेष स्थान।
  • जयपुर – पृथ्वीसिंह के समय श्रेणी विभाजन। 12 पुत्रों के नाम से 12 स्थायी जागीरे चलीजिन्हे कोटडी कहा जाता था।
  • कोटा- में राजवी कहलाते थे।
  • बीकानेर – में सामन्तों की तीन श्रेणियां थी।
  • जैसलमेर में दो श्रेणियां थी।
  • अन्य श्रेणियां – भौमिया सामन्त, ग्रासिया सामन्त

सामन्त व्यवस्था ( Feudal system )

राजस्थान में परम्परागत शासन में राजा -सामन्त का संबंध भाई-बंधु का था।  मुगल काल में सामन्त व्यवस्था में परिवर्तन। अब स्थिति स्वामी – सेवक की स्थिति।

सेवाओं के साथ कर व्यवस्था –

परम्परागत शासन में सामन्त केवल सेवाएं देता था। लेकिन मुगल काल से कर व्यवस्था भी निर्धारित की गयी।

सामन्त अब

  • पट्टा रेख – राजा द्वारा जागीर के पट्टे में उल्लेखित अनुमानित राजस्व।
  • भरत रेख – राजा द्वारा सामन्त को प्रदत जागीर के पट्टे में उल्लेखित रेख के अनुसार राजस्व।
  • उत्तराधिकार शुल्क – जागीर के नये उत्तराधिकारी कर से वसूल किया जाने वाला कर। अलग अलग रियासतों में इसके नाम-मारवाड – पहले पेशकशी फिर हुक्मनामा. मेवाड और जयपुर में नजराना, अन्य रियासतों मे कैद खालसा या तलवार बंधाई नाम था।, जैसलमेर एकमात्र रियासत जहां उत्तराधिकारी शुल्क नहीं लिया जाता था।
  • नजराना कर- राजाके बडे पुत्र के विवाह पर दिया जाने वाला कर।
  • न्योत कर
  • तीर्थ यात्रा कर

भूमि और भू स्वामित्व ( Land and Land Ownership )

भूमि दो भागों में विभाजित थी –

  1. खालसा भूमि ( Khalsa land )- जो कि सीधे शासक के नियंत्रण में होती थी जिसे केंद्रीय भूमि भी कह सकते हैं।
  2. जागीर भूमि – यह चार प्रकार की थी।

सामंत जागीर ( Feudal Estate ) – यह जागीर भूमि जन्मजात जागीर थी जिसका लगान सामन्त द्वारा वसूल किया जाता था।

हुकूमत जागीर – यह मुत्सदद्धियों को दी जाती थी।

भौम जागीर – राज्य को निश्चित सेवाए व कर देते थे।

शासण जागीर – यह माफी जागीर भी कहलाती थी। यह करमुक्त जागीर थी। धर्मार्थ, शिक्षण कार्य, साहित्य लेखन कार्य, चारण व भाट आदि को अनुदान स्वरूप दी जाती थी।

इसके अलावा भूमि को ओर दो भागों में बांटा गया-

  • कृषि भूमि ( Agricultural land ) – खेती योग्य भूमि।
  • चरनोता भूमि ( Charnote land )- पशुओं के लिए चारा उगाया जाता था।

किसान- दो प्रकार के थे-

  • बापीदार – खुदकाश्तकार और भूमि का स्थाई स्वामी
  • गैरबापीदार – शिकमी काश्तकार और भूमि पर वंशानुगत अधिकार नहीं। ये खेतीहर मजदूर थे।

दाखला – किसानों को दी जाने वाली भूमि का पट्टा जो जागीरदार के रजिस्टर में दर्ज रहता था।

लगान वसूली की विधि ( Tax collection method )

लगान वसूली की तीन विधि अपनाते थे-

लाटा या बटाई विधि- फसल कटने योग्य होने पर लगान वसूली के लिए नियुक्त अधिकारी की देखरेख में कटाई तथा धान साफ होने पर राज्य का भाग अलग किया जाता था।

कून्ता विधि- खडी फसल को देखकर अनुमानित लगान निर्धारिढ करना।

अन्य विधि – इसे तीन भागों में – मुकाता, डोरी और घूघरी

डोरी और मुकाता में कर निर्धारण एक मुश्त होता था। नकद कर भी लिया जाता था। डोरी कर निर्धारण में नापे गये भू भाग का निर्धारण करके वसूल करना।

घूघरी कर विधि के अनुसार शासक, सामन्त एवं जागीरदार किसान को जितनी घूघरी (बीज) देता था उतना ही अनाज के रूप में लेता था।दूसरी घूघरी विधि में प्रति कुआं या खेत की पैदावार पर निर्भर था।

मध्यकाल में राजस्थान में प्रचलित विभिन्न लाग-बाग

प्रशासनिक व्यवस्था

भू राजस्व के अतिरिक्त कृषकों से कई अन्य प्रकार के कर वसूल किए जाते थे उन्हें लाग बाग कहा जाता था लाग-बाग दो प्रकार के थे–

  • नियमित
  • अनियमित

नियमित लाग– की रकम निश्चित होती थी और उसकी वसूली प्रतिवर्ष या 2-3 वर्ष में एक बार की जाती थी

अनियमित लाग- की रकम निश्चित नहीं थी उपज के साथ-साथ यह कम या ज्यादा होती रहती थी इन लागों के निर्धारण का कोई निश्चित आधार नहीं था

  • नल बट एवं नहर वास- यह लाग सिंचित भूमि पर ली जाती थी
  • जाजम लाग- भूमि के विक्रय पर वसूली जाने वाली लाभ
  • सिंगोटी- मवेशी के विक्रय के समय वसूली जाने वाली लाग
  • मलबा और चौधर बाब- मारवाड़ में मालगुजारी के अतिरिक्त किसान से यह कर वसूल करने की व्यवस्था थी मलबा की आय से फसल की रक्षा संबंधी किए गए खर्च की पूर्ति की जाती थी और उन व्यक्तियों को पारिश्रमिक देने की व्यवस्था रहती थी जिन्होंने बटाई की प्रक्रिया में भाग लिया था

मारवाड़ में जागीर क्षेत्र में खारखार,कांसा,शुकराना (खिड़की या बारी खुलाई) हासा, माचा, हल, मवाली, आदि प्रमुख लागें थी

  • धूँआ भाछ- बीकानेर राज्य में यह कर वसूल किया जाता था
  • घर की बिछोती- जयपुर राज्य में इस कर की वसूली की जाती थी
  • घास मरी- विभिन्न प्रकार के चऱाई करो का सामूहिक नाम था
  • अंगाकर- मारवाड़ में प्रति व्यक्ति ₹1 की दर से महाराजा मानसिंह के समय इस कर की वसूली की गई थी
  • खेड़ खर्च-राज्य में सेना के खर्च के नाम से जो कर लिया जाता था उसे खेड़ खर्च या फौज खर्च की संज्ञा दी गई थी
  • गनीम बराड़- मेवाड़ में युद्ध के समय गनीम बराड़ कर वसूल किया जाता था
  • कागली या नाता कर- विधवा के पुनर्विवाह के अवसर पर प्रतिभा ₹1 की दर से यह कर वसूल किया जाता था ।

मेवाड़ में नाता बराड़, कोटा राज्य में नाता कागली, बीकानेर राज्य में नाता और जयपुर राज्य में छैली राशि के नाम से यह कर लिया जाता था

  • जकात कर- बीकानेर राज्य में सीमा शुल्क आयात निर्यात और चुंगी कर का सामूहिक नाम जकात था

जोधपुर और जयपुर राज्य में पारिवारिक भाषा में इसे सायर की संज्ञा दी थी

  • दाण कर- मेवाड़ और जैसलमेर राज्यों में माल के आयात निर्यात पर लगाया जाने वाला कर दाण कहलाता था
  • मापा ,बारुता कर- मेवाड़ में 1 गांव से दूसरे गांव में माल लाने ले जाने पर यह कर वसूल किया जाता था

जबकि बीकानेर राज्य में विक्रीकर को मापा के नाम से पुकारते थे

  • लाकड़ कर- जंगलात की लकड़ियों पर लाकड़ कर लिया जाता था।

इस कर को बीकानेर में काठ जयपुर में दरख्त की बिछोती मेवाड़ में खड़लाकड़ और मारवाड़ में कबाड़ा बाब के नाम से पुकारते थे

राली लाग- प्रतिवर्ष काश्तकार अपने कपड़ों में से एक गद्दा या राली बना कर देता था जो जागीदार या उसकी कर्मचारियों के काम आती थी

दस्तूर- भू राजस्व कर्मचारी पटेल पटवारी कानूनगो तहसीलदार और चौधरी जो अवैध रकम किसानों से वसूल करते थे उसे दस्तूर कहा जाता था

नजराना- यह लाग प्रतिवर्ष किसानों से जागीरदार और पटेल वसूल करते थे जागीरदार राजा को और पटेल तहसीलदार को नजराना देता था जिसकी रकम किसानों से वसूल की जाती थी

बकरा लाग- प्रत्येक काश्तकार से जागीरदार एक बकरा स्वयं के खाने के लिए लेता था उस जागीरदार बकरे के बदले प्रति परिवार से ₹2 वार्षिक लेते थे

न्योता लाग- यह लाग जागीरदार पटेल और चौधरी अपने लड़के लड़की की शादी के अवसर पर किसानों से वसूल करते थे

चवरी लाग- किसानों के पुत्र या पुत्री के विवाह पर एक से ₹25 तक चवरी लाग के नाम पर लिए जाते थे

कुंवर जी का घोड़ा- कुंवर के बड़े होने पर घोड़े की सवारी करना सिखाया जाता था तब घोड़ा खरीदने के लिए प्रति घर से ₹1 कर के रूप में लिया जाता था

खरगढी़- सार्वजनिक निर्माण या दुर्गों के भीतर निर्माण कार्यों के लिए गांव से बेगार में गधों को मंगवाया जाता था परंतु बाद में गधों के बदले खर गढी़ लाग वसूल की जाने लगी

खिचड़ी लाग- जागीरदार द्वारा अपने प्रत्येक गांव से उनकी आर्थिक स्थिति के अनुसार ली जाने वाली लाग राज्य की सेना जब किसी गांव के पास पडा़व डालती है तब उसके भोजन के लिए गांव के लोगों से वसूली जाने वाली लाग खिचड़ी लाग कहलाती थी

अंग लाग- प्रत्येक किसान के परिवार के प्रत्येक सदस्य से जो 5 वर्ष से ज्यादा आयु का होता था प्रति सदस्य ₹1 लिया जाता

मुगलों की राजपूत नीति ( Rajput policy of the Mughals )

अकबर की राजपूत नीति

अकबर ने मुगल-राजपूत सम्बन्धो की जो बुनियाद रखी थी वह कमोबेश आखिर तक चलती रही। आर.पी. त्रिपाठी के अनुसार अकबर शाही संघ के प्रति राजपूतों की केवल निष्ठा चाहता था।यह नीति “सुलह-ए-कुल”(सभी के साथ शांति एवं सुलह) पर आधारित थी। सुलह न किए जाने वाले शासकों को शक्ति के बल पर जीता, जैसे-मेवाड़, रणथंभौर आदि

अधीनस्थ शासक को उनकी “वतन जागीर” दी गई। उसको आंतरिक मामलों में पूर्ण स्वंतत्रता प्रदान की गई तथा बाहरी आक्रमणों से पूर्ण सुरक्षा की गारंटी दी गई। प्रशासन संचालन एवं युद्ध अभियानों में सम्मिलित किया एवं योग्यता अनुरूप उन्हें “मनसब” प्रदान किया।

“टीका प्रथा” शुरू की। राज्य के नए उत्तराधिकारी की वैधता “टीका प्रथा” द्वारा की जाती थी। जब कोई राजपूत शासक अपना उत्तराधिकारी चुनता था तो मुग़ल सम्राट उसे (नवनियुक्त) को “टीका” लगाता था, तब उसे मान्यता मिलती थी।

सभी राजपूत शासकों की टकसालों की जगह मुगली प्रभाव की मुद्रा शुरू की गई। सभी राजपूत राज्य अजमेर सुबे के अंतर्गत रखे गए

सैनिक व्यवस्था ( Military system )

मध्यकालीन राजस्थान की सैन्य व्यवस्था पर मुगल सैन्य व्यवस्था का प्रभाव दृष्टिगोचर होता हैं। सेना मुख्यत: दो.भागों मे बंटी हुई होती थी। एक राजा की सेना, जो ‘अहदी’ कहलाती थी तथा दूसरी सामन्तों की सेना, जो, ‘जमीयत’ कहलाती थी।

अहदी सैनिको की भर्ती, प्रशिक्षण, वेतन आदि कार्य दीवान व मीरबक्शी के अधीन होता था। ‘दाखिली’ सैनिकों की भर्ती यद्दपि राजा की ओर से होती थी किन्तु इनको सामन्तों की कमान या सेवा मे रख दिया जाता था। इन्हें वेतन सामन्तों की ओर से दिया जाता था। ‘जमीयत’ के लिए ये कार्य संबंधित सामतं करता था।

सेना मे भी अफगानों, रोहिलों,मराठों, सिन्धियों, अहमद-नगरियों आदि को स्थान दिये जाने जिन्हें ‘परदेशी’ कहा जाता था। घोडों को दागने की प्रथा चल गई थी। जिनके पास बन्दूकें होती थी वे बन्दूकची कहलाते थे।सेना के मुख्य रुप से दो भाग होते थे- प्यादे (पैदल) और सवार।

1. प्यादे (पैदल सैनिक):- यह राजपूतों की सेना की सबसे बड़ी शाखा थी। राजपूतों की पैदल सेैना म दो प्रकार के सैनिक होते थे- अहशमा सैनिक, सेहबन्दी सैनिक

2. सवार :- इसमे घुडसवार एवं शुतरसवार (ऊँट) सम्मिलित थे जो ‘राजपूत सेना के प्राण‘ मानी जाती थी। घुडसवारों मे दो प्रकार घुड़सवार होते थे बारगीर, सिलेदार।

  • निम अस्पा :- दो घुड़सवारों के पास एक घोडा़ होता था।
  • यक अस्पा :- वह घुड़सवार जिसके पास एक घोडा़ हो।
  • दअस्पा :- वह घुड़सवार जिसके पास दो घोड़े हो।
  • सिह अस्पा :- वह घुड़सवार जिसके पास तीन घोड़े हो।

तोपखाने के अधिकारियों मे ‘बक्शी-तोपखाना‘, ‘दरोगा- तोपखाना’ व मुशरिफ- तोपखाना’ के उल्लेख मिलता हैं। तोपचियों को ‘गोलन्दाज‘ कहा जाता था।

सैन्य विभाग को ‘सिलेहखाना’ कहा जाता था। सिलेहखाना शब्द हथियार डिपो के लिए भी प्रयुक्त हुआ है। घोड़े सहित सभी घुड़सवारों दीवान-ए-अर्ज मे लाया जाता था।

प्रशासनिक व्यवस्था प्रशासनिक व्यवस्था प्रशासनिक व्यवस्था प्रशासनिक व्यवस्था प्रशासनिक

यदि आपको हमारे दुआर दिए गए नोट्स पसंद आ रहे है तो आप हमें पेज पर भी फॉलो कर सकते है  https://www.facebook.com/goldenclasses0/

August 17, 2020

मीरा बाई एवं दादू दयाल Meera Bai and Dadu Dayal

मीरा बाई एवं दादू दयाल

दादूदयाल जन्म 1544 ई.
मृत्यु: 1603 ई.)

दादूदयाल मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत थे. इनका जन्म विक्रम संवत् 1601 में फाल्गुन शुक्ला अष्टमी को अहमदाबाद में हुआ था.

हिन्दी के भक्तिकाल में ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रमुख सन्त कवि थे।  इन्होंने एक निर्गुणवादी संप्रदाय की स्थापना की, जो ‘दादू पंथ’ के नाम से ज्ञात है। दादू दयाल अहमदाबाद के एक धुनिया के पुत्र और मुग़ल सम्राट् अकबर के समकालीन थे।

उन्होंने अपना अधिकांश जीवन राजपूताना में व्यतीत किया एवं हिन्दू और इस्लाम धर्म में समन्वय स्थापित करने के लिए अनेक पदों की रचना की। उनके अनुयायी न तो मूर्तियों की पूजा करते हैं और न कोई विशेष प्रकार की वेशभूषा धारण करते हैं।  वे सिर्फ़ राम-नाम जपते हैं और शांतिमय जीवन में विश्वास करते हैं.

कविता के रूप में संकलित इनके ग्रन्थ दादूवानी तथा दादूदयाल जी रा दुहा कहे जाते हैं।  इनके प्रमुख सिद्धान्त मूर्तिपुजा का विरोध, हिन्दू मुस्लिम एकता, शव को न जलाना व दफनाना तथा उसे जंगली जानवरों के लिए खुला छोड़ देना, निर्गुण ब्रह्मा उपासक है।

दादूजी के शव को भी भराणा नामक स्थान पर खुला छोड़ दिया गया था। गुरू को बहुत अधिक महत्व देते हैं। तीर्थ यात्राओं को ढकोसला मानते हैं। सत्संग को अलख दरीबा कहते है।

उपदेश की भाषा सधुक्कड़ी।  वृद्धानंद जी इनके गुरु थे, साधु विवाह नही करते बच्चों को गोद लेते हैं। इन्हें राजस्थान का कबीर कहते हैं।

फतेहपुर सिकरी में अकबर से भेट के बाद आप भक्ति का प्रसार प्रसार करने लगे. राजस्थान में ये नारायणा में रहने लगे.

दादू जी की शिष्य परंपरा में 152 प्रमुख शिष्य हुए हैं । इनमें से 52 शिष्यों ने भिन्न-भिन्न स्थानों पर दादूद्वारों की स्थापना की तथा दादू पंथ के 52 स्तंभ कहलाए। दादू जी के शिष्यों में सुंदर दास जी एवं रज्जब जी सर्वाधिक प्रसिद्ध हुए।

इनके अनुसार ब्रह्मा से ओकार की उत्पति और ओंकार से पांच तत्वों की उत्पति हुई. माया के कारण ही आत्मा और परमात्मा के मध्य भेद होता है. दादूदयाल ने ईश्वर प्राप्ति के लिए गुरु को अत्यंत आवश्यक बताया.

अच्छी संगति, ईश्वर का स्मरण, अहंकार का त्याग, संयम एवं निर्भीक उपासना ही सच्चे साधन है. दादूदयाल ने विभिन्न प्रकार के सामाजिक आडम्बर, पाखंड एवं सामाजिक भेदभाव का खंडन किया. जीवन में सादगी, सफलता और निश्छलता पर विशेष बल दिया. सरल भाषा एवं विचारों के आधार पर दादू को राजस्थान का कबीर भी कहा जाता है

उसके बाद वे फतेहपुर सीकरी भी गए जहाँ पर बादशाह अकबर ने पूर्ण भक्ति व भावना से दादू जी के दर्शन कर उनके सत्संग व उपदेश ग्रहण करने के इच्छा प्रकट की तथा लगातार 40 दिनों तक दादूजी से सत्संग करते हुए उपदेश ग्रहण किया।

उसके बाद दादूजी महाराज नरेना ( जिला जयपुर ) पधारे और उन्होंने इस नगर को साधना, विश्राम तथा धाम के लिए चुना और यहाँ एक खेजडे के वृक्ष के नीचे विराजमान हुये यहीं पर उन्होंने ब्रह्मधाम “दादूद्वारा” की स्थापना की

ब्रह्मलीन होने के लिए निर्धारित दिन ( जयेष्ट कृष्ण अष्टमी सम्वत 1660 ) के शुभ समय में श्री दादूजी ने एकांत में ध्यानमग्न होते हुए “सत्यराम” शब्द का उच्चारण कर इस संसार से ब्रहम्लोक को प्रस्थान किया। श्री दादू दयाल जी महाराज के द्वारा स्थापित *“दादू पंथ” व “दादू पीठ” आज भी मानव मात्र की सेवा में लीन है इनके जन्म-दिन और मृत्यु के दिन वहाँ पर हर साल मेला लगता है।

दादू पंथ की 5 शाखाएं है – 

  1. खालसा
  2. विरक्त
  3. उतरादे
  4. खाकी
  5. नागा

Sundar Das Ji ( सुंदर दास जी )

सुंदर दास जी का जन्म 1596 ईस्वी में दौसा के खंडेलवाल वैश्य परिवार में हुआ। इनके पिता का नाम चोखा जी ( परमानंद ) माता का नाम सती देवी था इन्होंने दादू दयाल जी से दीक्षा लेकर दादू पंथ का प्रचार प्रसार किया तथा कई रचनाएं लिखि।

इन के प्रमुख ग्रंथ – सुंदर विलास, सुंदरदसार सुंदर ग्रंथावली एवं ज्ञान समुद्र है। सुंदर दास जी की मृत्यु सांगानेर में हुई। इन्होंने दादू पंथ में नागा मत का प्रवर्तन किया।

Sant Rajjab Ji ( संत रज्जब जी )

संत रज्जब जी का जन्म 1600 ई. में सांगानेर में हुआ ऐसा माना जाता है कि जब रज्जब जी दूल्हा बनकर विवाह करने जा रहे थे , तभी मार्ग में उन्होंने दादू जी के उपदेश सुने इन उद्देश्यों से वह इतने प्रभावित हुए कि जीवन भर दूल्हे के वेश में रहकर दादू पंथ का प्रचार किया।

इनकी प्रधान पीठ सांगानेर में है रज्जब वाणी एवं सर्वंगी इनके प्रमुख ग्रंथ है। इन्होंने सांगानेर में ही अपनी देह त्यागी थी।

Meera bai ( मीरा बाई )

संत शिरोमणि अनन्या कृष्ण भक्त मीरा बाई का जन्म बाजोली गांव वर्तमान नागौर जिले में डेगाना के निकट 1498 में हुआ ! उनके बचपन का नाम पेमल था कुछ इतिहासकार मीरा का जन्म स्थान कुडकी (पामानली) ते हैं

मीरा के पिता राव रतन सिंह माता वीर कंवरी थी ! डॉक्टर जयसिंह नीरज के अनुसार मीरा का बाल्यकाल कुड़की गांव (वर्तमान में पाली जिले के जैतारण तहसील )तथा मेड़ता में बीता ! कुड़की गांव रतन सिंह की जागीर थी !  मीरा के पिता मेड़ता के जागीरदार थे!

प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर गोपीनाथ शर्मा मीरा का जन्म कुड़की में हुआ मानते हैं! यह गांव पाली जिले में जोधपुर पुष्कर मार्ग पर स्थित है ,

वर्तमान में यहां पर एक लघु दुर्ग मीरा गढ़ एवं मीराबाई के बाल्यकाल से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण स्थान मिलते हैं! मीरा के दादा दुदा जी वैष्णव धर्म के उपासक थे! उन्होंने मेड़ता में चारभुजा नाथ का मंदिर बनवाया ! मीरा के जीवन वृत्त का लेख मीरा की पदावलीओ एवं भजनों के अलावा प्रिय दास कृत ‘भक्तमाल’ एवं ‘मेड़तिया री ख्यात’ तथा कर्नल जेम्स टॉड के इतिहास परक साहित्य में मिलता है!

मीरा का विवाह 1516 ईस्वी में मेवाड़ के महाराणा सांगा के जेष्ट पुत्र राजकुमार भोजराज के साथ हुआ! लेकिन विवाह के 7 वर्ष बाद जी भोजराज का स्वर्गवास हो गया! मीरा के लिए राणा सांगा ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग में कुंभ श्याम मंदिर के पास ‘कुंवरपदे’ का महल भी बनवाया!

मीरा ने कृष्ण को पति के रूप में मानकर आराधना की ! मीराबाई के गुरु संत रैदास चमार जाति के थे! कहा जाता है कि चैतन्य महाप्रभु के शिष्य जीव गोस्वामी मीराबाई से प्रभावित थे तथा मीरा उनसे प्रभावित थी ! मीराबाई ने सगुण भक्ति मार्ग अपनाया !

  • मीरा को राजस्थान की राधा कहा जाता है !
  • मीरा ने कृष्ण भक्ति में सैकड़ों भजनों की रचना वज्र मिश्रित राजस्थानी भाषा में की
  • वर्तमान में मीरा दासी संप्रदाय के लोगों की संख्या नगण्य है!

ऐसा माना जाता है कि अपने जीवन के अंतिम समय में मीराबाई मेवाड़ से मेड़ता एवं वृंदावन तथा वहां से द्वारिका चली गई तथा अंत में डाकोर ( गुजरात ) के रणछोड़ राय की मूर्ति में विलीन हो गई! मीरा के पदों को हरजस कहा जाता है!

रामस्नेही संप्रदाय , चरण दासी संप्रदाय ,दादूपंथी एवं जैन ग्रंथों में यह हरजस संकलित है!

मीरा की प्रमुख रचनाएं-

पदावली, नरसी जी रो मायरो (रत्ना खाती के सहयोग से रचित) राग गोविंद, राग सोरठ एवं सत्यभामा जी नू रूसणों है

मीरा बाई की रचनाएं

मीरा बाई ने चार ग्रंथों की रचना की-

नरसी का मायरा
गीत गोविंद टीका
राग गोविंद
राग सोरठ के पद

इसके अलावा मीराबाई के गीतों का संकलन “मीरांबाई की पदावली’ नामक ग्रन्थ में किया गया है।

मीरा द्वारा लिखे गए ग्रन्थ और सोरठो की भाषा मारवाड़ी थी

नरसी जी का मायरा ( Narsee Ji’s Mayra )

नरसी जी गरीब ब्राह्मण थे । मायरा भरना नामुमकिन था। उलटे मायरे में उच्च कुलीन वर्ग के लोगों के स्थान पर 15-16 वैष्णव भक्तों की टोली के साथ अंजार नगर पहुच गए थे, जो उनकी बेटी का ससुराल था।

उनकी कम “औकात” के चलते उनके तरह तरह के अपमान किये गए। पर सब कुछ उन्होंने भगवान के चरणों में चढ़ा दिया। सब सहा। पर भगवान से नहीं सहा गया। उनका मायरा श्री कृष्ण ने ही एक सेठ बनके भरा।

और समधी श्रीरंग जी द्वारा जो मायरा सूची बनाई गई थी, उससे कही ज्यादा भर दिया जो की राजा महाराजाओं से भी बढ़ के था। अर्थात श्रीरंग जी के स्तर से कहीं ऊपर था।

समधी(श्रीरंग जी) का परिवार अवाक होकर उस सेठ को देख रहा था। सोचता था- ये कौन है? कहा से आया है? और नरसी की मदद क्यों की? नरसी से इसका क्या रिश्ता है?

आखिर श्रीरंग जी ने उन सेठ (सांवरिया सेठ, श्री कृष्ण) से आखिर पूछ ही लिया “कृपा करके बताएँ आप नरसी जी के कौन लगते हैं?
नरसी जी आपके कौन लगते हैं?” इस प्रश्न के उत्तर में उस सेठ ने जो उत्तर दिया वो बताना ही इस प्रसंग का केंद्र बिंदु था। इस उत्तर को सुन कर आंखे सजल हो उठती हैं।

सांवलिया सेठ ने उत्तर में कहा “ये जो नरसी जी हैं ना, मैं इनका गुलाम हूँ। ये जब, जैसा चाहते हैं वैसा ही करता हूँ। जब बुलाते हैं हाज़िर हो जाता हूँ। इनका हर कार्य करने को तत्पर रहता हूँ।” उत्तर सुनकर समस्त समधी परिवार हक्का बक्का रह गया।

यदि आपको हमारे दुआर दिए गए नोट्स पसंद आ रहे है तो आप हमें पेज पर भी फॉलो कर सकते है  https://www.facebook.com/goldenclasses0/

मीरा बाई मीरा बाई मीरा बाई मीरा बाई

August 16, 2020

राजस्थान के इतिहास – सिक्के Coins-Archaeological Sources

राजस्थान के इतिहास – सिक्के

भारतीय इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता और वैदिक सभ्यता में सिक्कों का व्यापार वस्तु विनिमय पर आधारित था। भारत में सर्वप्रथम सिक्कों का प्रचलन 2500 वर्ष पूर्व हुआ। यह मुद्राएं खुदाई के दौरान खंडित अवस्था में प्राप्त हुई है। अतः इन्हें आहत मुद्राएं कहा जाता है। इन पर विशेष चिन्ह बने हुए हैं। अतः इन्हें पंचमार्क_सिक्के भी कहते हैं।

Related image

 प्राचीन इतिहास लेखन में मुद्राओं या सिक्कों से बड़ी सहायता मिली है यह सोने चांदी तांबे और मिश्रित धातुओं के हैं इन पर अनेक प्रकार के चिन्ह-त्रिशूल हाथी, घोड़े, चँवर, वृष -देवी देवताओं की आकृति सूर्य चंद्र नक्षत्र आदि खुले रहते हैं तिथि- कर्म शिल्प कौशल, आर्थिक स्थिति, राजाओं के नाम तथा उनकी धार्मिक अभिरुचि आदि पर प्रकाश डालते हैं। सिक्कों की उपलब्धता राज्य की सीमा निर्धारित करती हैं राजस्थान के विभिन्न भागों में मालव, शिवि, यौधेय,आदि जनपदों के सिक्के मिलते हैं

चांदी के प्राचीनतम सिक्कों को पंचमार्क या आहत_सिक्के कहा जाता है जेम्स प्रिंसेप ने इन सिक्कों को पंच मार्क कहा इन सिक्कों के लिए चांदी अथवा तांबे का इस्तेमाल होता है स्वर्ण के पंचमार्क सिक्के अभी तक नहीं मिले हैं

राजस्थान में रेढ के उत्खनन से 3075 चाँदी के पंच मार्क_सिक्के मिले यह सिक्के भारत के प्राचीनतम_सिक्के इन पर विशेष प्रकार के चिन्ह टंकित हैं और कोई लेख नहीं, 10वीं और 11वीं शताब्दी में प्रचलिंत सिक्को पर गधे के समान आकृति का अंकन मिलता हैं इन्हें गधिया_सिक्के कहा जाता है  मुगल शासन काल में जयपुर में जयपुर में झाडशाही, जोधपुर में विजयशाही सिक्कों का प्रचलन हुआ ब्रिटिश शासनकाल में अंग्रेजों ने अपने शासन के नाम से चांदी के सिक्के ढलवाए

सबसे पुराने लेख वाले सिक्के संभवतः विक्रम संवत् पूर्व की तीसरी शताब्दी के हैं। इस प्रकार के सिक्के भी मध्यमिका से ही प्राप्त हुए हैं। यहीं से यूनानी राजा मिनेंडर के द्रम्म_सिक्के भी मिले हैं। हूणों द्वारा प्रचलित किये गये चाँदी और ताँबे के ‘गधिये’ सिक्के आहाड़ आदि कई स्थानों में पाये जाते हैं।

राजा गुहिल के चाँदी के सिक्कों का एक बड़ा संग्रह आगरा से प्राप्त हुआ है। इन सिक्कों पर ‘गुहिलपति’ लिखा हुआ है, जिससे यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि यह किस गुहिल राजा के सिक्के हैं। शील (शीलादित्य) का एक ताँबे का सिक्का तथा उसके उत्तराधिकारी बापा (कालाभोज) की सोने की मोहरें मिली हैं।

खुम्मान प्रथम तथा महाराणा मोकल तक के राजाओं का कोई सिक्का प्राप्त नहीं हो पाया है। महाराणा कुंभा के तीन प्रकार के ताँबे के सिक्के पाये गये हैं। उनके चाँदी के_सिक्के भी चलते थे।

सिक्कों के अध्ययन को न्यूमिस्मेटिक्स (मुद्राशास्त्र )कहते हैं। फदिया_सिक्के चौहानों के हास काल से लेकर 1540 ईसवी तक चलने वाली राजस्थान कि स्वतंत्र मुद्रा शैली,  मेवाड़ में उदयपुरी, भिलाड़ी, चितोड़ी, एवं एलची तथा जोधपुर में विजशाही मुगल प्रभाव वाले सिक्के प्रचलित थे।

टकसालों की स्थापना

जब महाराणा अमरसिंह प्रथम ने बादशाह जहाँगीर के साथ सन्धि कर ली, तब मेवाड़ के टकसाल बंद करा दिये गये। मुग़ल बादशाहों के अधीनस्थ राज्यों में उन्हीं के द्वारा चलाया गया सिक्का चलाने का प्रचलन था। उसी प्रकार जब बादशाह अकबर ने चित्तौड़ पर कब्जा किया, तब यहाँ अपने नाम से ही _सिक्के चलवाए व आवश्यकतानुसार टकसालें भी खोलीं। इस प्रकार जहाँगीर तथा उसके बाद के शासकों के समय बाहरी टकसालों से बने हुए उन्हीं के _सिक्के यहाँ चलते रहे। इन सिक्कों का नाम पुराने बहीखातों में ‘सिक्का एलची’ मिलता है

मुहम्मदशाह और उनके बाद वाले बादशाहों के समय में राजपूताना के भिन्न-भिन्न राज्यों ने बादशाह के नाम वाले सिक्कों के लिए शाही आज्ञा से अपने-अपने यहाँ टकसालें स्थापित कीं।

विभिन्न प्रकार के सिक्के ( Different types of coins )

मेवाड़ में भी चित्तौड़, भीलवाड़ा तथा उदयपुर में टकसालों की स्थापना हुई। इन टकसालों में बने _सिक्के क्रमशः चित्तौड़ी, भीलवाड़ी तथा उदयपुरी कहलाते थे। इन सिक्कों पर बादशाह शाहआलम द्वितीय का लेख होता था। इन रुपयों का चलन होने पर धीरे-धीरे एलची_सिक्के बंद होते गये और पहले के लेन-देन में तीन एलची सिक्कों के बदले चार चित्तोड़ी, उदयपुरी आदि सिक्के दिये जाने का प्रावधान किया गया।

 ब्रिटिश सरकार के साथ अहदनामा होने के कारण महाराणा स्वरूप सिंह ने अपने नाम का रुपया चलाया, जिसको ‘सरुपसाही’ कहा जाता था। इन सिक्कों पर देवनागरी लिपि में एक तरफ़ ‘चित्रकूट उदयपुर’ तथा दूसरी तरफ़ ‘दोस्ति लंघन’ अर्थात ‘ब्रिटिश सरकार से मित्रता’, लिखा होता था। सरुपसाही सिक्कों में अठन्नी, चवन्नी, दुअन्नी व अन्नी भी बनती थी।

महाराणा भीम सिंह ने अपनी बहन चंद्रकुंवर बाई के स्मरण में ‘चांदोड़ी’_सिक्के चलवाये थे, जो रुपया, अठन्नी व चवन्नी में आते थे। पहले तो उन पर फ़ारसी भाषा के अक्षर थे, लेकिन बाद में महाराणा ने उन पर बेल-बूटों के चिह्न बनवाये। ये सिक्के अभी तक दान-पुण्य या विवाह आदि के अवसर पर देने के काम में आते हैं।

इनके अतिरिक्त भी मेवाड़ में कई अन्य तरह के ताँबे के _सिक्के प्रचलन में रहे थे, जिसमें उदयपुरी (ढ़ीगला), त्रिशूलिया, भींडरिया, नाथद्वारिया आदि प्रसिद्ध हैं। ये सभी भिन्न-भिन्न तोल और मोटाई के होते थे। उन पर त्रिशूल, वृक्ष आदि के चिह्न या अस्पष्ट फ़ारसी अक्षर बने भी दिखाई देते हैं।

राजस्थान में विभिन्न रियासतों में प्रचलित

राजपूताना में प्रचलित सिक्कों की विस्तृत अध्ययन हेतु 1893 विलियम विल्फ्रेड द्वारा द करेंसी ऑफ द हिंदू स्टेट्स ऑफ राजस्थान पुस्तक की।

Related image
  • गधिया:- राजपूताना क्षेत्र में 10-11 वीं शताब्दी में प्रचलित_सिक्के
  • गधे के विशेष चिन्ह- चाँदी के सिक्के।(गुर्जर-प्रतिहार क्षेत्र में प्रचलित।)
  • अलवर- रावशाही,अखैशाही
  • कोटा – मदनशाही,गुमानशाही
  • जयपुर – झाड़शाही,मोहम्मदशाही
  • जैसलमेर – अखैशाही,डोडिया,मुहम्मदशाही
  • जोधपुर – विजयशाही,भीमशाही,तख्तशाही
  • झालावाड- मदनशाही
  • धौलपुर- तमंचाशाही
  • प्रतापगढ़ – सालिमशाही
  • बाँसवाड़ा – लक्ष्मणशाही,सालिमशाही
  • बीकानेर – गजशाही,आलमशाही
  • बूँदी- रामशाही,चेहराशाही,पुराना रूपया,ग्यारह सनातन
  • मेवाड़- चाँदोड़ी,ढींगाल,स्वरूपशाही,शाहआलमी
  • भरतपुर – शाह आलमी
  • करौली – माणकशाही

सीकर के गुरारा से लगभग 2744 सिक्के प्राप्त हुए हैं इनमें लगभग 61 सीको पर मानव आकृतियां निर्मित है भारत में लेख वाले_सिक्के हिंद यवन शासको ने चलाएं  आहड के _सिक्के 6 तांबे के सिक्के प्राप्त हुए हैं जिनमें से एक चौकोर है 5 गोल है यहां से कुछ सिले भी प्राप्त हुई है

टोंक के सिक्के यहां पर 3075 चांदी के पंच मार्कसिक्के मिले हैं का वजन 32 रत्ती है मालवगढ़ के सिक्के इन सिक्कों पर मालवाना अंकित है  योद्धासिक्के राजस्थान के उत्तर पश्चिमी भाग में मिले हैं इन पर यौध्दैयाना वहुधाना अंकित है नगर मुद्राएं टोंक जिले में उनियारा के निकट नगर अथवा कर कोर्ट नगर में लगभग 6000 तांबे के सिक्के प्राप्त हुए हैं इन पर मालव सरदारों के नाम उत्कीर्ण है

रंगमहल सभ्यता के सिक्के हनुमानगढ़ जिले में स्थित सभ्यता से लगभग 105 सिक्के मिले हैं (मुरन्डा ) बैराठ सभ्यता के _सिक्के जयपुर में स्थित बैराठ से कुल 36 सिक्के प्राप्त हुए हैं यह संभव है शासक मिनेंडर के हैं

सांभर से प्राप्त सिक्के सांभर से लगभग 200 मुद्राएं प्राप्त हुई है 6 मुद्रा चांदी की पंच मार्क है 6 तांबे की है  गुप्तकालीन सिक्के राजस्थान में गुप्त कालीन सर्वाधिक सिक्के भरतपुर के बयाना के पास नगला खेल गांव से मिले हैं जिनकी संख्या लगभग 1800 है यह संभव है चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के हैं

गुर्जर प्रतिहारों के सिक्के इन पर महा आदिवराह उत्कीर्ण है  चौहान शासकों के सिक्के इन्हें दिनार या रूपक कहा जाता था अजय राज की रानी सोमलेखा द्वारा चांदी के सिक्के चलाए गए

मेवाड़ के सिक्के मेवाड़ के सिक्कों को रूपक और तांबे के कर्सापण कहलाते थे मेवाड़ क्षेत्र में सर्वाधिक गधिया मुद्राएं चलती थी गधे का प्रतिबिंब उत्कीर्ण था मुगल साम्राज्य मध्ययुग में अकबर ने राजस्थान में “सिक्का ए एलची” जारी किया। अकबर के आमेर से अच्छे संबंध थे। अतः वहां सर्वप्रथम टकसाल खोलने की अनुमति प्रदान की गई।

स्वरूप सिंह ने स्वरुप शाही सिक्के चलाए जिसके एक और चित्रकूट और दूसरी और दोस्ती लंगना अंकित था मारवाड़ के सिक्के इन्हें पंच मार्कंड आ जाता है इनको आगे चलकर गदिया मुद्रा कहा गया अंग्रेजो के समय जारी मुद्राओ में कलदार (चांदी) सर्वाधिक प्रसिद्ध है।

राजस्थान की रियासतों ने निम्नलिखित सिक्के जारी किए -:

  1. आमिर रियासत- कछवाह वंश -झाड़ शाही सिक्के
  2. मेवाड़ रियासत- सिसोदिया वंश -चांदौड़ी (स्वर्ण) सिक्के
  3. मारवाड़ सियासत- राठौड़ वंश – विजय शाही सिक्के
  4. मारवाड़(गजसिंह) राठौड़- राठौड़ वंश – गदिया/फदिया सिक्के  

गुप्तकालीन सिक्के ( Guptakalin Coins) :-

Related image
गुप्तकालीन सिक्के

राजस्थान मे बुन्दावली का टीबा(जयपुर), बयाना( भरतपुर), ग्राम-मोरोली (जयपुर), नलियासर (सांभर), रैढ.(टोंक), अहेडा.(अजमेर) तथा सायला (सुखपुरा), देवली (टोंक) से गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राएं मिली हैं 1948 ई.मे बयाना (भरतपुर) से गुप्त शासकों की सवधिक ‘स्वर्ण मुद्राएं मिली है जिनकी संख्या लगभग 2000 (1921) हैं गोपीनाथ शर्मा के अनुसार इन सिक्कों की संख्या 1800 है । जिनमें चन्द्रगुप्त प्रथम के 10, समुदृगुप्त के 173, काचगुप्त के 15, चन्द्रगुप्त द्वितीय के 961, कुमारगुप्त प्रथम के 623 तथा स्कन्दगुप्त का 1 सिक्का एवं 5 खंडित सिक्के मिले है। इनमे सवाधिक सिक्के चन्द्रगुप्त द्रितीय विक्रमादित्य के हैं।

ग्राम सायला से मिली 13 स्वर्ण मुद्राएं समुद्रगुप्त (350 से 375)ई. की है।ये सिक्के ध्वज शैली के हैं।इनके अग्रभाग पर समुद्रगुप्त बायें हाथ मे ध्वज लिए खडा़ हैं।राजा के बायें हाथ के नीचे लम्बवत् ‘ समुद्र’ अथवा ‘ समुद्रगुप्त’ ब्राह्मी लिपी मे खुदा हुआ हैं।सिक्के के अग्रभाग पर ही ‘समर- शतवितत विजयो जित – रिपुरजितों दिवं जयति’ (सवँत्र विजयी राजा जिसने सैकड़ों युद्धों मे सफलता प्राप्त की और शत्रु को पराजित किया, स्वर्ग श्री प्राप्त करता हैं) ब्राह्मी लिपि मे अंकित हैं। इनके पृष्ठ भाग पर सिंहासनासीन लक्ष्मी का चित्र हैं।इसी प्रकार की ‘ध्वज शैली’ के सिक्के यहां से काचगुप्त के भी मिले हैं।

चन्द्रगुप्त द्रितीय व्रिकमादित्य के ‘छत्रशैली’ के स्वणँ सिक्कों के अग्रभाग मे आहुति देता हुआ राजा खडा़ हैं।उसके बायें हाथ मे तलवार की मूंठ हैं।राजा के पीछे एक बोना सेवक राजा के सिर पर छत्र लिए हुए खडा़ हैं।व्रिकमादित्य के यहां से ‘धनुर्धर शैली’ प्रकार के भी सिक्के मिले हैं इन सिक्कों से यह प्रमाणित होता हैं कि टोंक क्षेत्र के आस- पास का क्षेत्र भी गुप्त साम्राज्य का एक अविभाज्य अंग रहा हैं।

यदि आपको हमारे दुआर दिए गए नोट्स पसंद आ रहे है तो आप हमें पेज पर भी फॉलो कर सकते है  https://www.facebook.com/goldenclasses0/

August 16, 2020

राजस्थान राजनीतिक संगठन व समाचार पत्र Political Organization

राजस्थान राजनीतिक संगठन व समाचार पत्र

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गठित संगठन

मारवाड़ सेवा संघ 1920 )- 

इसकी स्थापना चांदमल सुराणा ने की थी मारवाड़ सेवा संघ को सन् 1924 में जयनारायण व्यास ने पुनः जीवित किया और एक नई संस्था की स्थापना की जिसे‘‘मारवाड़ हितकारणी सभा’’ के नाम से जाना गया  मारवाड़ हितकारणी सभा की स्थापना 1929 में हुई।

अखिल भारतीय देषी राज्य लोक परिषद (1927):- 

इसकी स्थापना में मुख्य भूमिका जवाहरलाल नेहरू ने निभाई थी इसका प्रथम अधिवेषन मुम्बई में हुआ थाजिसकी अध्यक्षता रामचन्द्र राव ने की थी इसका उद्देष्य देषी रियासतों में शान्तिपूर्वंक तरीके से उत्तरदायी शासन की स्थापना करना था।

राजपुताना मध्य भारत सभा (1919):- 

इसकी स्थापना आमेर में जमनालाल बजाज ने की थी इसमें मुख्य भूमिका अर्जुनलाल सेठी एवं  विजयसिंह पथिक ने निभाई थी।

राजस्थान सेवा संघ (1919):-  

इस संस्था को 1920 में अजमेर स्थानांतरित कर दिया गया राजस्थान सेवा संघ में प्रमुख भूमिका अर्जुनलाल सेठी, विजयसिंह पथिक,  केसरीसिंह बारहठ एवं राम नारायण चैधरी ने निभाई थी।

वनस्थली विद्यापीठ 1938

इसकी स्थापना हीरालाल शास्त्री द्वारा रतनलाल शास्त्री के साथ मिलकर की गई थी जीवन कुटीरयोजना को ही बाद में वनस्थली विद्यापीठ  कहा गया था।

सभ्य सभा की स्थापना:- इसकी स्थापना गुरू गोविन्द गिरी ने आदिवासी हितों की सुरक्षा के लिए की थी।

वीर भारत समाज (1910):- इसकी स्थापना विजयसिंह पथिक ने की थी।

वीर भारत सभा (1910):- इसकी स्थापना केसरीसिंह बारहठ़ एवं गोपालदास खरवा ने की थी।

जैन वर्द्धमान विद्यालय (1907):- इसकी स्थापना अर्जुनलाल सेठी ने जयपुर में की थी।

वागड़ सेवा मंदिर एवं हरिजन सेवा समिति (1935):- इसकी स्थापना भोगीलाल पाण्ड्या ने की थी।

चरखा संघ (1927):- इसकी स्थापना जमनालाल बजाज ने जयपुर में की थी।

सस्ता साहित्य मण्डल (1925):- इसकी स्थापना हरिभाऊ उपाध्याय ने अजमेर के हुडी में की थी।

जीवन कुटीर (1927):- इसकी स्थापना हीरालाल शास्त्री द्वारा जयपुर में की गई थी। वर्तमान में यह निवाई (टोंक) में हैं।

सर्वहितकारिणी सभा (1907):- इसके संस्थापक कन्हैयालाल ढुढँ थें। सन् 1914 में गोपालदास (बीकानेर) ने इसे पुर्नजिवित किया था।

विद्या प्रचारिणी सभा (1914):- इसकी स्थापना विजयसिंह पथिक ने की थी।

नागरी प्रचारणी सभा (1934):- इसकी स्थापना ज्वालाप्रसाद ने धौलपुर में की थी।

नरेन्द्र मण्डल (1921):- देषी राज्यों के राजाओं द्वारा निर्मित मण्डल जिसके चांसलर बीकानरे के महाराजा गंगासिंह थे।

सेवासंघ (1938):- इसकी स्थापना भागीलाल पाण्ड्या ने डुंगरपुर में की थी।

स्वतन्त्रता आंदोलन के दौरान प्काषित होने वाले पत्र-पत्रिकाएँ व समाचार पत्र

राजस्थान केसरी 1920

यह  एक  साप्ताहिक पत्रिका थी, जिसकी शुरूआत विजयसिंह पथिक ने वर्धा में की थी इसके संपादक  रामनारायण चैधरी थे। इस पत्रिका के लिए वित्तीय सहायता जमनालाल बजाज ने दीथी।

नवीन राजस्थान 1921

यह समाचार पत्र अजमेर से प्रकाषित होता थाइसकी शुरूआत विजयसिंह पथित ने की थी यही समाचार पत्र आगे चलकर तरूण राजस्थान समाचार पत्र के नाम से जाना गया 

बिजौलिया किसान आंदोलन के समय पथिक ने नवीन राजस्थान और राजस्थान केसरी समाचारपत्रों का प्रयोग आंदोलन प्रचार के लिए किया था।

नवज्योति 1936

यह अजमेर से प्रकाषित होने वाला साप्ताहिक पत्र थाइसकी स्थापना रामनारायण चैधरी ने की थी इसकी बागड़ोर दुर्गाप्रसाद चैधरी ने संभाली थी।

राजस्थान समाचार 1889

यह अजमेर से प्रकाषित होता थाइसके संस्थापक मुंषी समर्थानन थें यह प्रथम हिन्दी दैनिक समाचार पत्र था।

राजपूताना गजट

समाचार पत्र राजपूताना गजट

यह अजमेर से प्रकाषित होता था। इसके संस्थापक मौलवी मुराद अली थे।

Akhand Bharat ( अखण्ड भारत ) – 

यह मुम्बई से प्राषित होता था। इसे संस्थाप जयनारायण व्यास थंे।

Lokwani ( लोकवाणी )- 

यह जयपुर से प्रकाषित होता थाइसके संस्थापक पंडित देवीषंकर थे यह पत्र जमनालाल बजाज की स्मृति में प्रकाषित किया गया था

सज्जन कीर्ति सुधाकर:- यह मेवाड़ से प्रकाषित होता था।

राजस्थान टाइम्स:- यह जयपुर से अंग्रेजी में प्रकाषित समाचार पत्र था।

प्रताप:- यह कानपुर से प्रकाषित होता था। इसके संस्थापक पथिकजी और गणेष शंकर विद्यार्थी थे।

देरा हितैषी:- यह समाचार पत्र अजमेर से प्रकाषित होता था।

आगी बाण (1932):- यह ब्यावर से प्रकाषित होता था। इसके संस्थापक जयनारायण व्यास थें।

यदि आपको हमारे दुआर दिए गए नोट्स पसंद आ रहे है तो आप हमें पेज पर भी फॉलो कर सकते है  https://www.facebook.com/goldenclasses0/