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Modern History

September 22, 2020

India’s constitutional भारत का संवैधानिक विकास

भारत का संवैधानिक विकास

संवैधानिक

ब्रिटिश संसद द्वारा पारित अधिनियम 1858 का अधिनियम मुख्य लेख :-

भारत सरकार अधिनियम- 1858 इस अधिनियम के पारित होने के कुछ महत्त्वपूर्ण कारण थे। भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम, जो 1857 ई. में हुआ था, ने भारत में कम्पनी शासन के दोषों के प्रति ब्रिटिश जनमानस का ध्यान आकृष्ट किया।

इसी समय ब्रिटेन में सम्पन्न हुए आम चुनावों के बाद पामस्टर्न प्रधानमंत्री बने, इन्होंने तत्काल कम्पनी के भारत पर शासन करने के अधिकार को लेकर ब्रिटिश क्राउन के अधीन करने का निर्णय लिया। उस कम्पनी के अध्यक्ष ‘रोस मेगल्स’ एवं ‘जॉन स्टुअर्ट मिले’ ने इस निर्णय की आलोचना की।

अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ-:

1.ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी का शासन समाप्त कर शासन की ज़िम्मेदारी ब्रिटिश क्राउन को सौंप दी गयी। भारत का गवर्नर-जनरल अब ‘भारत का वायसराय’ कहा जाने लगा।

2.’बोर्ड ऑफ़ डाइरेक्टर्स’ एवं ‘बोर्ड ऑफ़ कन्ट्रोल’ के समस्त अधिकार ‘भारत सचिव’ को सौंपदिये गये। भारत संचिव ब्रिटिश मंत्रिमण्डल का एक सदस्य होता था,  जिसकी सहायता के लिए 15 सदस्यीय ‘भारतीय परिषद’ का गठन किया गया था, जिसमें 7 सदस्यों की नियुक्ति ‘कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर्स’ एवं शेष 8 की नियुक्ति ब्रिटिश सरकार करती थी। इन सदस्यों में आधे से अधिक केलिए यह शर्त थी कि वे भारत में कम से कम 10 वर्ष तक रह चुके हों।

3. भारत सचिव व उसकी कौंसिल का खर्च भारतीय राजकोष से दिया जायगा। संभावित जनपद सेवा मे नियुक्तियाँ खुली प्रतियोगिता के द्वारा की जाने लगी, जिसके लिए राज्य सचिव ने जनपद आयुक्तों की सहायता से निगम बनाए।

1861 का भारतीय परिषद अधिनियम मुख्य लेख :-

भारतीय परिषद अधिनियम- 1861- 1858 ई. का अधिनियम अपनी कसौटी पर पूर्णतः खरा नहीं उतरा, परिणाम स्वरूप 3 वर्ष बाद1861ई.में ब्रिटिश संसद ने ‘भारतीय परिषद अधिनियम’ पारित किया।

यह पहला ऐसा अधिनियम था, जिसमें ‘विभागीय प्रणाली’ एवं ‘मंत्रिमण्डलीय प्रणाली’ की नींव रखी गयी। पहली बार विधि निर्माण कार्य में भारतीयों का सहयोग लेने का प्रयास किया गया।

अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ-:

1. वायसरायकी परिषद में एक सदस्य और बढ़ा कर सदस्यों की संख्या 5 कर दी गयी। 5वाँ सदस्य विधि विशेषज्ञ होता था।

2. क़ानून निर्माण के लिए वायसराय की काउन्सिल में कम से कम 6 एवं अधिकतम 12 अतिरिक्त सदस्यों की नियुक्ति का अधिकार वायसराय को दिया गया।

इन सदस्यों का कार्यकाल 2 वर्ष का होता था। गैर सरकारी सदस्यों में कुछ उच्च श्रेणी के थे, पर भरतीय सदस्यों की नियुक्ति के प्रति वायसराय बाध्य नहीं था, किन्तु व्यवहार में कुछ गैर सरकारी सदस्य ‘उच्च श्रेणी के भारतीय’ थे। इस परिषद का कार्य क्षेत्र क़ानून निर्माण तक ही सीमित था।

3.इस अधिनियम की व्यवस्था के अनुसार बम्बई एवं मद्रास प्रान्तों को विधि निर्माण एवं उनमें संशोधन का अधिकार पुनः प्रदान कर दिया गया, किन्तु इनके द्वारा निर्मित क़ानून तभी वैध माने जाते थे, जब उन्हें वायसराय वैध ठहराता था।

4.वायसराय को प्रान्तों में विधान परिषद की स्थापना का अधिकार तथा लेफ़्टीनेन्ट गवर्नर की नियुक्ति का अधिकार प्राप्त हो गया।

भारत शासन अधिनियम 1935

इस अधिनियम के द्वारा भारत मे पहली बार संघात्मक सरकार की स्थापना की गई। इसके द्वारा एक अखिल भारतीय संघ की स्थापना की जानी थी जिसमे 11 ब्रिटिश प्रान्त 6 चीफ कमिश्नरों के क्षेत्र एवम देशी रियासते शामिल होनी थी परंतु देशी रियासतों के लिए यह ऐच्छिक था।

इस अखिल भारतीय संघ में प्रान्तों का शामिल होना अनिवार्य था। यह अखिल भारतीय संघ तभी अस्तित्व में आ सकता था जब सभी देशी रियासतों की कुल जनसंख्या की कम से कम आधी जनसंख्या वाली देशी रियासतों के शासक , जिन्हें संघीय विधान मंडल के उच्च सदन में देशी रियासतों के लिए निर्धारित 104 स्थानों में से कम से कम 52 प्रतिनिधि भेजने का अधिकार हो, संघ में शामिल होना स्वीकार कर ले।
उपरोक्त शर्ते पूरी न होने के कारण प्रस्तावित संघ कभी अस्तित्व में नही आया।

1935 के एक्ट द्वारा प्रान्तों में द्वेध शासन समाप्त करके केंद्र में द्वेध स्थापित किया गया। केंद्र के प्रशासन के विषय को दो भागों में विभाजित किये गए

  1. हस्तांतरित 
  2. रक्षित

रक्षित विषयो में प्रतिरक्षा विदेश मामले धार्मिक मामले व कबायती क्षेत्र शामिल थे। शेष सभी विषय हस्तांतित थे। आपातकाल में गवर्नर जनरल सम्पूर्ण शासन की बागडोर अपने हाथो में ले सकता था। इस अधिनियम के द्वारा प्रांतीय स्वायत्तता की स्थापना की गई।

1935 के अधिनयम पर भारतीय पर भारतीय नेताओ के विचार

  • “यह अनेक ब्रेकों वाली इंजन रहित गाड़ी के समान है” जवाहर लाल नेहरू
  •  “यह दासता का आज्ञा पत्र है” जवाहर लाल नेहरू
  • “नया संविधान द्वेध शासन से भी बुरा है” – राजगोपालाचारी
  • “1935 की योजना पुर्ण रूप से सडी हुई, मौलिक रूप से खराब और पूर्णत अस्वीकृति के योग्य थी” मोहम्मद अली जिन्ना

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September 22, 2020

Indian Freedom Struggle भारतीय स्वतंत्रता संग्राम

भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन (प्रथम चरण)

शुरुआत 1885 ई. में कांग्रेस की स्थापना के साथ ही इस आंदोलन की शुरुआत हुई, जो कुछ उतार-चढ़ावों के साथ 15 अगस्त, 1947 ई. तक अनवरत रूप से जारी रहा। प्रमुख संगठन एवं पार्टी गरम दल, नरम दल, गदर पार्टी, आज़ाद हिंद फ़ौज, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, इंडियन होमरूल लीग, मुस्लिम लीग

अन्य प्रमुख आंदोलन असहयोग आंदोलन, भारत छोड़ो आन्दोलन, सविनय अवज्ञा आन्दोलन, स्वदेशी आन्दोलन, नमक सत्याग्रह
परिणाम भारत स्वतंत्र राष्ट्र घोषित हुआ

भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन को तीन भागों में बाँटा जा सकता है-

  1. प्रथम चरण
  2. द्वितीय चरण
  3. तृतीय चरण।

1. आन्दोलन का प्रथम चरण (1885-1905)

भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के इस काल में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई।

1885 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के साथ ही इस पर उदारवादी राष्ट्रीय नेताओं का वर्चस्व स्थापित हो गया। तत्कालीन उदारवादी राष्ट्रवादी नेताओं में प्रमुख थे- दादाभाई नौरोजी, महादेव गोविन्द रानाडे, फ़िरोजशाह मेहता, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, दीनशा वाचा, व्योमेश चन्‍द्र बनर्जी, गोपाल कृष्ण गोखले, मदन मोहन मालवीय आदि।

कांग्रेस की स्थापना के आरम्भिक 20 वर्षो में उसकी नीति अत्यन्त ही उदार थी, इसलिए इस काल को कांग्रेस के इतिहास में ‘उदारवादी राष्ट्रीयता का काल’ माना जाता है।

कांग्रेस की मांगें

  • विधान परिषदों का विस्तार किया जाए।
  • परीक्षा की न्यूनतम आयु में वृद्धि की जाए।
  • परीक्षा का भारत और इंग्लैण्ड में का आयोजन हो।
  • अधिक भर्ती निकाली जाएँ।
  • वायसराय तथा गवर्नर की कार्यकारणी में भारतीयों को अधिक प्रतिनिधित्व दिया जाए।

ये सभी मांगे हीन से हीन शब्दों में याचना के रूप में संवैधानिक ढंगों से प्रस्तुत की जाती थीं। इनके इसी लचीलेपन एवं संचत व्यवहार के कारण ही लोकमान्य तिलक जैसे उग्रपंथी नेताओं ने इसे ‘राजनीतिक भिक्षावृति’ की संज्ञा दी थी।

कांग्रेस की लोकप्रियता

वर्ष 1885 ई. स्थान बम्बई सदस्य 72 अध्यक्ष व्योमेश चन्‍द्र बनर्जी
वर्ष 1886 ई. स्थान कलकत्ता सदस्य 434 अध्यक्ष दादाभाई नौरोजी
वर्ष 1887 ई. स्थान मद्रास सदस्य 607 अध्यक्ष बदरुद्दीन तैयब जी
वर्ष 1888 ई. स्थान इलाहाबाद सदस्य 1248 अध्यक्ष जॉर्ज यूल
वर्ष 1889 ई. स्थान बम्बई सदस्य 1880 अध्यक्ष विलियम वेडरबर्न

1909 का भारतीय परिषद् एक्ट (मार्ले -मिण्टो सुधार

  • नवम्बर, 1906 में लार्ड कर्जन की जगह लार्ड मिण्टो को भारत का वायसराय नियुक्त किया गया तथा जान मार्ले को भारत सचिव नियुक्त किया गया ।
  • मार्ले उदार विचार का व्यक्ति था तथा भारतीय प्रशासन में सुधार के समर्थक थे ।भारत के वायसराय मिण्टो , भारत सचिव मार्ले के विचारों से सहमत थे ।
  • इसलिए इन दोनो के द्वारा किये गए सुधारों को मार्ले-मिण्टो सुधार नाम दिया गया था ।
  • 1909 के अधिनियम द्वारा भारतीयों को विधि -निर्माण तथा प्रशासन दोनों में प्रतिनिधित्व प्रदान किया ।
  • केन्द्रीय विधान सभा में सदस्यों की संख्या 60 कर दी गई ।अब विधान मंडल में 69 सदस्य थे जिनमें से 37 शासकीय सदस्य तथा 32 गैर शासकीय वर्ग के सदस्य थे ।
  • 32 गैर सरकारी सदस्यों में से 27 सदस्य निर्वाचित होते थे और 5 नामजद ।निर्णायक मंडल को तीन भागों में बाँटा गया था -सामान्य निर्वाचक वर्ग, वर्गीय निर्वाचक वर्ग तथा विशिष्ट निर्वाचक वर्ग ।
  • इस अधिनियम में केन्द्रीय व प्रान्तीय विधायनी शक्ति को बढ़ा दिया था ।परिषद् के सदस्यों को बजट की विवेचना करने तथा उस पर प्रश्न करने का अधिकार दिया गया था ।
  • बंगाल, मद्रास व बम्बई की कार्यकारिणी की संख्या बढाकर 4 कर दी गई ।उप राज्यपालों को भी अपनी कार्यकारिणी नियुक्त करने की अनुमति मिल गई ।
  • परिषद के सदस्यों को विदेशी सम्बन्धों तथा देशी राजाओं से संबंधित कानून के सामने निर्णय के लिए आये प्रश्नों को उठाने की अनुमति नहीं थी ।
  • इस अधिनियम के द्वारा मुसलामानों के लिए प्रथक मताधिकार तथा पृथक निर्वाचन क्षेत्रों की स्थापना की गई ।

चंपारण सत्याग्रह-1917

चंपारण बिहार में है। नील की खेती की तिनकठिया प्रणाली प्रचलित थी। जिसमें 3/20 भाग पर नील की खेती करना अनिवार्य था। प्रथम विश्व युद्ध के समय जर्मनी की कृत्रिम नील बाजार में आ गई जिससे भारत की नील की खेती प्रभावित हुई। नील बागान मालिकों को घाटा हुआ। यह यूरोपियन थे इन्हें घाटे की भरपाई किसानों से अतिरिक्त वसूली करनी शुरू की है।

गांधी जी चंपारण गए उन्होंने क्षेत्र का दौरा किया है। गांधी जी की गिरफ्तारी के आदेश दिए और चंपारण में आने से मना किया।  गांधी जी ने इस आदेश की अवहेलना की जिस पर तिलक ने उच्च अधिकारियों को आदेश दिया कि गांधीजी हमारी सहयोगी है। अतः गिरफ्तार नहीं किया जाए बाद में एक जांच समिति गठित की गई। जिसमें गांधीजी को सदस्य बनाया गया।

गांधी जी ने मान समिति की माँग मान लिया, गांधी जी की आलोचना हुई कि उन्होंने पूरा समाप्त क्यों नहीं करवाया।  गांधी जी का कहना था कि छोटी सी कटौती से भी बागान मालिकों की बेज्जती होगी। गांधीजी का पहला सत्याग्रह।

खेड़ा सत्याग्रह

22 मार्च 1918 को शुरू किया गया यहाँ अकाल पड़ा था जिसके कारण फसलों का उत्पादन कम हुआ था सरकारी नियम था कि अगर फसलों का उत्पादन कुल उत्पादन का 25% से कम हो तो सरकार लगान नहीं लेगी।

खेड़ा में 25% से थोड़ा अधिक उत्पादन हुआ लेकिन बढ़ती हुई महंगाई के कारण किसानों की हालत खराब थी उन्होंने लगान देने से मना कर दिया। मोहनलाल पांडे के नेतृत्व में यह आंदोलन हुआ बाद में विट्ठल भाई पटेल वल्लभभाई पटेल इस आंदोलन से जुड़े।  वल्लभ भाई पटेल का प्रथम आंदोलन था

गांधीजी उस समय गुजरात सभा के अध्यक्ष थे। विट्ठल भाई पटेल ने उन्हें खेड़ा आने का न्योता दिया। गांधी जी खेड़ा पहुंचे तथा किसानों का समर्थन किया। सरकार ने बात नहीं मानी तो गांधीजी ने उपवास अनशन शुरु किया बाद में सरकार ने निर्णय लिया कि जो किसान लगान भर सकते हैं केवल वही लगान दें।

गांधी जी ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिय इस कारण गांधी जी का गुजरात में जनाधार बढ़ा। हार्नीमैन ने खेड़ा को गांधी जी का पहला वास्तविक सत्याग्रह कहा

रोलेट सत्याग्रह-1919

भारतीय स्वतंत्रता

1917 में सर सिडनी रोलेट की अध्यक्षता में सेड्डीसन समिति गठित की गई। इस कानून का प्रमुख उद्देश्य- क्रांतिकारियों की गतिविधियों को रोकना और उनका दमन करना था।। 6 फरवरी 1919-रोलेट राष्ट्रीय परिषद के सम्मुख पेश किया गया।

24 फरवरी को गांधी जी ने सत्याग्रह सभा का गठन किया ताकि इस बिल का विरोध किया जा सके। इसके अध्यक्ष गांधीजी थे। 21 मार्च रोलेट अधिनियम पारित हुआ। गांधीजी ने 30 मार्च को हड़ताल की घोषणा की। जो बदलकर बाद में 6 अप्रैल कर दी गयी। 6 अप्रैल पूरे भारत में हड़ताल का आयोजन किया गया। गांधीजी की पंजाब और दिल्ली प्रवेश पर रोक लगाई गई।

गांधीजी ने दिल्ली में प्रवेश करने की कोशिश की 8 अप्रैल को गिरफ्तार हुए। 9 अप्रैल-गांधी जी की गिरफ्तारी से अमृतसर में भी हड़ताल हुई।जिसका नेतृत्व सत्यपाल व सैफुद्दीन ने किया। जो कांग्रेसी नेता थे। 10 अप्रैल को सरकार ने गिरफ्तार कर लिया। 13 अप्रैल को इन दोनों की गिरफ्तारी के विरोध में अमृतसर के जलियांवाला बाग में बड़ी सभा का आयोजन किया गया।

उस दिन वैशाखी का दिन था। पंजाब का लेफ्टिनेंट गर्वनर माइकल डायर था। और अमृतसर का पुलिस अधिकारी जनरल डायर था। माइकल डायर ने जनरल डायर को गोली चलाने का आदेश दिया। 379 लोग मारे गए जबकि वास्तविकता में 1300 से 1400 लोग मारे गए।

गांधीजी व कांग्रेस ने इस घटना की आलोचना की। सरकार पर दबाव बढ़ा सरकार ने इस हत्याकांड की जांच हेतु हंटर समिति गठित की।हन्टर समिति में पांच अंग्रेज दो भारतीय सदस्य थे। इस समिति ने जनरल डायर को निर्दोष करार दिया। बाद में नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया।

गांधीजी हंटर समिति की रिपोर्ट से नाखुश हुए। उन्होंने मदन मोहन मालवीय की अध्यक्षता में जांच समिति गठित की। जिसमें एक सदस्य गांधी जी स्वयं थे इस समिति ने जनरल डायर को दोषी करार दिया। गांधी जी के रोलेट एक्ट सत्याग्रह का विरोध एनी बेसेंट और तिलक ने किया था।

स्वतंत्रता आन्दोलन की महत्वपूर्ण तिथियां:

  • सैनिक विद्रोह (प्रथम स्वतंत्रता संग्राम) – 10 मई, 1857.
  • कंपनी शासन का अंत, विक्टोरिया भारत साम्राज्ञी घोषित, विक्टोरिया घोषणा – 1858.
  • भारतीय परिषद अधिनियम – 1861.
  • प्रार्थना समाज की स्थापना – 1867.
  • कूका विद्रोह – 1872.
  • थियोसोफिकल सोसायटी की स्थापना – 1875.
  • आर्य समाज की स्थापना – 1875.
  • लार्ड लिटन द्वारा दिल्ली दरबार का आयोजन – 1877.
  • पहला कारखाना अधिनियम (लार्ड रिपन) – 1881.
  • अड्यार में थियोसोफिकल सोसायटी केंद्र स्थापित – 1882.
  • इल्बर्ट बिल – 1883.
  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना – 1885.
  •  इंग्लैंड में भारतीय सुधार समिति” की स्थापना-1887
  •  विवेकानंद का शिकागो भाषण-1893
  • कोलकाता अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा धन के निष्कासन के सिद्धांत को स्वीकार किया गया-1896
  • लॉर्ड कर्जन ने विश्वविद्यालय शिक्षा में सुधार संबंधी सुझाव देने के लिए सर थाॅमस रैले की अध्यक्षता में कमीशन नियुक्त किया-1902
  • विश्वविद्यालय अधिनियम – 1904.
  • बंगाल का विभाजन (लिटन) – 1905.
  • मुस्लिम लीग की स्थापना – 1906.

  • मैडम भीकाजी कामा में स्टुटगार्ड (जर्मनी) में स्वयं डिजाइन किया हुआ भारतीय ध्वज फहराया गया- 1907
  • सूरत अधिवेशन, कांग्रेस में फूट – 1907.
  • मार्ले-मिंटो सुधार (सांप्रदायिक आधार पर मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था) – 1909.
  • बंगाल विभाजन को रद्द किया गया-1911
  • दिल्ली दरबार – 1911.
  • गदर पार्टी की स्थापना,रविंद्र नाथ टैगोर ने नोबेल पुरस्कार जीता-1913
  • प्रथम विश्व युद्ध – 1914-1918.
  • महात्मा गांधी का दक्षिण अफ्रीका से भारत आगमन-1915
  • होमरुल लीग की स्थापना (तिलक और एनी बेसेंट) – 1916.
  • लखनऊ समझौता – (कांग्रेस और मुस्लिम लीग में) – 1916.
  • लखनऊ​ में नरम दल और गरम दल में समझौता – 1916.
  • महात्मा गांधी द्वारा चंपारन सत्याग्रह – 1917.
  • रौलेट अधिनियम पारित किया गया-1919
  • अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी का गठन -1919
  • जालियांवाला बाग हत्याकांड – 13अप्रेल 1919.
  • मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार (द्वैध शासन) – 1919.
  • खिलाफत आन्दोलन – 1920.
  • असहयोग आंदोलन प्रारंभ – 1920.
  • चौरी-चौरा की घटना – 05 फरवरी, 1922.
  • असहयोग आंदोलन स्थगित – 12फरवरी, 1922.
    स्वराज्य पार्टी का गठन – 1923.
  • सायमन कमीशन की नियुक्ति – 1927.
  • सायमन कमीशन का भारत आगमन – 1928.
  • भगतसिंह द्वारा केंद्रीय असेंबली में बम फेकना – 1929.
  • पूर्ण स्वराज की मांग – 1929.
  • सविनय अवज्ञा आंदोलन, नमक सत्याग्रह – 1930
  • प्रथम गोलमेज सम्मेलन – 1930.
  • गांधी इर्विन समझौता – 1931.
  • द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (जिसमें कांग्रेस की ओर से गांधी जी ने भाग लिया) – 1931.
  • तीसरा गोलमेज सम्मेलन – 1932.
  • ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेम्जे मैकडोनाल्ड द्वारा कम्यूनल अवार्ड की घोषणा – 1932.
  • गांधी और अंबेडकर के बीच पूना समझौता – 1932.
  • भारत​ छोड़ो आन्दोलन – 09, अगस्त 1942.
  • क्रिप्स मिशन – 1942.
  • आजाद हिंद फौज की स्थापना – 1943.
  • केबिनेट मिशन – 1946.
  • नौसेना विद्रोह – 1946.
  • मुस्लिम लीग द्वारा सीधी कार्यवाही की घोषणा – 16, अगस्त 1946.
  • अंतरिम सरकार की स्थापना – 02, सितंबर 1946.
  • भारत के विभाजन की माउंटबेटन योजना – 03, जून 1946.
  • स्वतंत्रता प्राप्ति – 15, अगस्त 1947.
  • महात्मा गांधी की हत्या – 30, जनवरी 1948

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September 22, 2020

Indian National Movement-Gandhian era गांधीवादी युग

गांधीवादी युग

गांधीवादी

राष्ट्रपिता’ की उपाधि से सम्मानित महात्मा गाँधी भारतीय राजनीतिक मंच पर1919ई. से 1948 ई. तक छाए रहे। गाँधीजी के इस कार्यकाल को ‘भारतीय इतिहास’ में ‘गाँधी युग’ के नाम से जाना जाता है।

गांधी जी 9 जनवरी 1915 को दक्षिण अफ्रीका से वापस भारत आए उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध में सरकार के युद्ध प्रयासों में मदद की जिनके लिए सरकार ने उन्हें कैसर-ए-हिंद की उपाधि से सम्मानित किया। 1915 ईस्वी में गांधी जी ने अहमदाबाद में साबरमती नदी के किनारे सत्याग्रह आश्रम की स्थापना की।

गाँधी-गोखले भेंट:

जनवरी 1915 ई. में गाँधी जी भारत आये और यहाँ पर उनका सम्पर्क गोपाल कृष्ण गोखले से हुआ, जिन्हें उन्होंने अपना राजनितिक गुरु बनाया। गोखले के प्रभाव में आकर ही गाँधी जी ने अपने को भारत की सक्रिय राजनीति से जोड़ लिया। गाँधी जी के भारतीय राजनीति में प्रवेश के समय ब्रिटिश सरकार प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918ई.) में फंसी थी।

गाँधी जी ने सरकार को पूर्ण सहयोग दिया, क्योंकि वह यह मानकर चल रहे थे कि ब्रिटिश सरकार युद्ध की समाप्ति पर भारतीयों को सहयोग के प्रतिफल के रूप में स्वराज्य दे देगी। गाँधी जी ने लोगों को सेना में भर्ती होने के लिए प्रोत्साहित किया।  इसके फलस्वरूप कुछ लोग उन्हें “भर्ती करने वाला सार्जेन्ट” भी कहने लगे थे।

1917 ईस्वी में गांधी जी ने चंपारण सत्याग्रह का सफल नेतृत्व किया। 1918 के खेड़ा सत्याग्रह को हार्डीमन ने भारत का पहला वास्तविक किसान सत्याग्रह कहा है।

फरवरी 1918 ईस्वी में अहमदाबाद मिल मजदूरों ने प्लेग बोनस को लेकर आंदोलन कर दिया। मिल मालिकों ने 20% बोनस देने का निर्णय किया जबकि गांधी जी ने मजदूरों को 35% बोनस देने की मांग की व 15 मार्च को गांधीजी भूख हड़ताल पर बैठ गए।

मिल मालिकों में अंबालाल साराभाई और उनकी बहन अनुसूया बेन ने भी गांधी जी का समर्थन किया। बोनस का मामला एक ट्रिब्यूनल को सौंपा गया जिसने मजदूरों को 35% बोनस देने का फैसला किया। इस प्रकार गांधी जी ने अहमदाबाद मिल मजदूरों के आंदोलन का सफल नेतृत्व किया।

1919 का रॉलेक्ट एक्ट

क्रांतिकारियों गतिविधियों को कुचलने के लिए सरकार ने 1917 ईस्वी में न्यायधीश सिडनी रौलेट की अध्यक्षता में आतंकवाद को कुचलने की योजना बनाने की एक समिति नियुक्त की। रौलट समिति के सुझाव पर 17 मार्च 1919 को केंद्रीय विधान परिषद ने भारतीय सदस्यों के विरोध के बावजूद रौलट एक्ट पारित किया।

रौलट एक्ट द्वारा कांग्रेस सरकार बिना मुकदमा चलाए किसी भी व्यक्ति को जेल में रख सकती थी। रौलट एक्ट को बिना वक़ील बिना अपील बिना दलील का कानून कहा गया इस एक्ट को भारतीय जनता ने काला कानून कहा।

गांधी जी ने रोलेट एक्ट के विरोध सत्याग्रह करने के लिए सत्याग्रह सभा की स्थापना की। इस सभा में जमनालाल दास द्वारकादास शंकरलाल बैंकर उमर सोमानी बी जी हार्निमन आदि शामिल थे। उदारवादी नेताओं सुरेंद्रनाथ बनर्जी तेग बहादुर सप्रू एवं श्रीनिवास शास्त्री तथा एनी बेसेंट ने गांधी जी के सत्याग्रह का विरोध किया।

6 अप्रैल 1919 को गांधी जी के अनुरोध पर देश भर में हड़तालों का आयोजन किया गया। हिंसा की घटनाओं के कारण गांधी जी का दिल्ली और पंजाब में प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया गया।  गांधी जी ने 9 अप्रैल को दिल्ली में प्रवेश करने का प्रयास किया गिरफ्तार हो गए।

जालियावाला बाग हत्याकांड 1919 ई

पंजाब में रौलट एक्ट का विरोध करने वाले दो स्थानीय कांग्रेसी नेता डॉक्टर सत्यपाल और डॉक्टर सैफुद्दीन किचलू को 9 अप्रैल को गिरफ्तार किया गया। जिस के विरोध में 10 अप्रैल को रैली निकाली गई जिस पर गोलीबारी में कुछ आंदोलनकारी मारे गए।

 13 अप्रैल 1919 को वैशाखी के दिन इस गिरफ्तारी व गोलीबारी के विरोध में अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक सार्वजनिक सभा बुलाई गई। इस समय पंजाब में लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ डायर थे। अमृतसर के एक सेना के अधिकारी जनरल डायर ने बिना चेतावनी दीये भीड़ पर गोली चलवा दी। जिसमें एक हजार से ज्यादा निर्दोष लोग मारे गए सरकारी रिपोर्ट के अनुसार 379 लोग मारे गए थे।

हत्याकांड के विरोध में रविंद्र नाथ टैगोर ने नाइटहुड की उपाधि त्याग दी। और वायसराय की कार्यकारिणी के सदस्य शंकर नायर ने इस्तीफा दे दिया। सरकार ने जालियावाला बाग हत्याकांड की जांच के लिए लार्ड हंटर की अध्यक्षता में कमेटी नियुक्त की। इसके अन्य सदस्य थे जस्टिस रैस्किंग राइस जॉर्ज बरी थॉमस स्मित सर चिमनलाल सीतलवाड़ साहबजादा सुल्तान अहमद तथा जगत नारायण।

हंटर कमेटी ने जनरल डायर को दोषमुक्त कर दिया। सरकार ने तो हंटर कमेटी की रिपोर्ट आने से पूर्व ही दोषी लोगों को बचाने के लिए इंडे मिनिटि बिल पास कर दिया। सजा के रूप में जनरल डायर को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया लेकिन ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमंस में डायर की प्रशंसा की गई और उसे ब्रिटिश साम्राज्य का शेर कहा गया।

कांग्रेस ने जालियावाला बाग हत्याकांड की जांच के लिए मदन मोहन मालवीय की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की। समिति के अन्य सदस्य थे मोतीलाल नेहरू महात्मा गांधी सी आर दास तैयबजी।जलियांवाला बाग हत्याकांड में लगे मार्शल के दौरान गुजरावाला और उसके समीपवर्ती क्षेत्रो पर हवाई जहाज से हमले किए गए। इसी बीच पंजाब के चमनदीप के नेतृत्व में डंडा फौज का गठन हुआ।

खिलाफत आंदोलन

जालियावाला बाग हत्याकांड से भारतीय राजनीति में आकस्मिक परिवर्तन आया तो खिलाफत आंदोलन शुरू होने पर अधिक उग्र हो गया।

प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की की पराजय हुई भारतीय मुस्लिम तुर्की के सुल्तान को इस्लाम के खिलाफ मानते थे युद्ध के बाद जब ब्रिटेन में तुर्की का विभाजन करने का निश्चय किया तो भारतीय मुस्लिम नाराज हो गए उन्होंने खिलाफत आंदोलन शुरु किया।

जब गांधी जी ने खिलाफत आंदोलन में भाग लिया तो यह आंदोलन अधिक मजबूत हो गया। गांधीजी ने खिलाफत आंदोलन को हिंदू मुस्लिम एकता का एक ऐसा सुनहरा अवसर माना जो आगे सो वर्षों तक भी नहीं मिलेगा। गांधीजी ने खिलाफत आंदोलन को सहयोग दिया क्योंकि वह भारतीय मुसलमानों को ब्रिटेन के विरुद्ध स्वतंत्रता आंदोलन में मिलाना चाहते थे।

अली बन्धुओ ( मोहम्मद अली और शौकत अली) ने अपने पत्र कॉमरेड में तुर्की का समर्थन किया। अली बंधु हकीम अजमल खान डॉक्टर अंसारी मौलाना अब्दुल कलाम आजाद हसरत मोहानी आदि प्रमुख तुर्की समर्थक खिलाफत नेता थे उनके नेतृत्व में सितंबर 1919 में अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी का गठन हुआ।

17 अक्टूबर 1919 को खिलाफत दिवस मनाया गया। 24 नवंबर 1919 को दिल्ली में होने वाली अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी के सम्मेलन की अध्यक्षता गांधी जी ने की। अगस्त 1920 ईस्वी में सीवर्स की संधि के बाद तुर्की का विभाजन हो गया।

गांधी जी ने खिलाफत कमेटी को सहयोग आंदोलन करने का सुझाव दिया इसे मान लिया व जून 1920 में इलाहाबाद में खिलाफत कमेटी की मीटिंग में गांधीजी से सहयोग आंदोलन का नेतृत्व संभालने का आग्रह किया।

जिन्ना ने खिलाफत आंदोलन का समर्थन नहीं किया। सितंबर 1920 में कोलकाता में हुए कांग्रेस के विशेष अधिवेशन (लाला लाजपत राय के अध्यक्षता) में मुख्य मुद्दा जालीया वाला कांड और खिलाफत था कांग्रेस ने पहली बार भारत में विदेशी शासन के विरुद्ध सीधी कार्रवाई करने विधान परिषदों का बहिष्कार करने तथा असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करने का निर्णय लिया।

कोलकाता सम्मेलन में चितरंजन दास ने विधान परिषदों के बहिष्कार का व असहयोग प्रस्ताव का विरोध किया था। असहयोग आंदोलन के प्रस्ताव के लेखक गांधीजी थे।

राष्ट्रवाद के पुनः जीवंत होने के कारण:-

  1. युद्धोपरांत उत्पन्न हुई आर्थिक कठिनाइयां।
  2. विश्वव्यापी साम्राज्यवाद से राष्ट्रवादियों का मोहभंग होना।
  3. रूसी क्रांति का प्रभाव।

भारत में गांधीजी की प्रारंभिक गतिविधियां:

  • चम्पारन सत्याग्रह (1917) प्रथम सविनय अवज्ञा
  • अहमदाबाद मिल हड़ताल (1918) प्रथम भूख हड़ताल।
  • खेड़ा सत्याग्रह (1918) प्रथम असहयोग।
  • रॉलेट सत्याग्रह (1918) प्रथम जन-हड़ताल।

खिलाफत-असहयोग आंदोलन तीन मांगें-:

  • तुर्की के साथ सम्मानजनक व्यवहार।
  • सरकार पंजाब में हुयी ज्यादतियों का निराकरण करे।
  • स्वराज्य की स्थापना।

चुनिन्दा व्यक्तियों द्वारा गांधी जी के लिए कहे गये कथन

  • पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा कि “गांधी जी उस तेज हवा के झोंके की तरह आये जिसने हमारे लिए स्वच्छ एवं खुली हवा में सांस लेना संभव बनाया ।”
  •  आइंस्टीन ने कहा कि “आने वाली पीढ़ियों को शायद ही विश्वास होगा कि कोई हाड़ मांस का गांधी भी पैदा हुआ था ।”
  • लार्ड विलिंगडन ने गांधी के लिए कहा कि “ईमानदारी किन्तु बोल्शेविक अतः अधिक खतरनाक ।”
  • द्वितीय गोलमेज सम्मेलन के समय गांधी जी को लिए चर्चिल ने ‘ देशद्रोही फकीर ‘ की संज्ञा दी ।
  • द्वितीय गोलमेज सम्मेलन के समय ही फ्रेंको मारिस ने गांधी जी को ‘ अर्ध्दनग्न फकीर ‘ की संज्ञा दी ।
  •  ऐनी बेसेन्ट ने गांधी जी को भारतीय राजनीति का बच्चा कहा था ।
  •  सरोजिनी नायडू ने गांधी जी को बापू की उपाधि दी थी ।
  •  खान अब्दुल गफ्फार खान ने गांधी जी को मलंग बाबा की उपाधि दी जिसका अर्थ होता है नंगा फकीर ।
  •  अर्नोल्ड जोसेफ टायनवी ने कहा था कि “हमने जिस पीढी में जन्म लिया है, वह न केवल पश्चिम में हिटलर और रूस में स्टालिन की पीढी ही नही वरन भारत में गांधी की भी पीढ़ी है और यह भविष्यवाणी बड़े ही विश्वास के साथ की जा सकती है कि मानव इतिहास पर गांधी का प्रभाव स्टालिन या हिटलर से कहीं ज्यादा स्थायी होगा ।”

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September 21, 2020

Jawahar Lal Nehru जवाहरलाल नेहरु

जवाहरलाल नेहरु

जवाहरलाल नेहरु

भारत की आज़ादी के लिए सबसे लम्बे समय तक चलने वाला एक प्रमुख राष्ट्रीय आन्दोलन था। शुरुआत 1885 ई. में कांग्रेस की स्थापना के साथ ही इस आंदोलन की शुरुआत हुई जो कुछ उतार-चढ़ावों के साथ15 अगस्त,1947ई. तक अनवरत रूप से जारी रहा।

प्रमुख संगठन एवं पार्टी गरम दल, नरम दल, गदर पार्टी, आज़ाद हिंद फ़ौज, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, इंडियन होम रूल लीग, मुस्लिम लीग

जवाहरलाल नेहरू

पद बहाल:-15 अगस्त 1947 – 27 मई 1964

राजा:-जॉर्ज षष्ठम् (26 जनवरी 1950 तक)

गर्वनर जनरल बर्मा के पहले अर्ल माउंटबेटन चक्रवर्ती राज गोपालाचारी (26 जनवरी 1950 तक)

जवाहरलाल नेहरु 1912 में भारत लौटे और वकालत शुरू की। 1916 में उनकी शादी कमला नेहरू से हुई। 1917 में जवाहरलाल नेहरू होम रुल लीग‎ में शामिल हो गए। राजनीति में उनकी असली दीक्षा दो साल बाद 1919 में हुई जब वे महात्मा गांधी के संपर्क में आए। उस समय महात्मा गांधी ने रॉलेट अधिनियम के खिलाफ एक अभियान शुरू किया था।

नेहरू, महात्मा गांधी के सक्रिय लेकिन शांतिपूर्ण,सविनय अवज्ञा आंदोलनके प्रति खासे आकर्षित हुए। नेहरू ने महात्मा गांधी के उपदेशों के अनुसार अपने परिवार को भी ढाल लिया। जवाहरलाल और मोतीलाल नेहरू ने पश्चिमी कपडों और महंगी संपत्ति का त्याग कर दिया।

वे अब एक खादी कुर्ता और गाँधी टोपी पहनने लगे। जवाहरलाल नेहरू ने 1920-1922 में असहयोग आंदोलन में सक्रिय हिस्सा लिया और इस दौरान पहली बार गिरफ्तार किए गए। कुछ महीनों के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया।

जवाहरलाल नेहरु 1924 में इलाहाबाद नगर निगम के अध्यक्ष चुने गए और उन्होंने शहर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में दो वर्ष तक सेवा की 1926 में उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों से सहयोग की कमी का हवाला देकर इस्तीफा दे दिया।

1926 से 1928 तक, जवाहरलाल नेहरू ने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के महासचिव के रूप में सेवा की।  1928-29 में, कांग्रेस के वार्षिक सत्र का आयोजन मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में किया गया।

उस सत्र में जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चन्द्र बोसने पूरी राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग का समर्थन किया जबकि मोतीलाल नेहरू और अन्य नेताओं ने ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर ही प्रभुत्व सम्पन्न राज्य का दर्जा पाने की मांग का समर्थन किया

September 21, 2020

C Ramgopalchari चक्रवर्ती राजगोपालाचारी

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी

राजगोपालाचारी

चक्रवर्ती राजगोपालचारी का जन्म मद्रास के थोरपल्ली गांव में 10 दिसंबर 1878 को हुआ था। भारतीय राजनीति के शिखर पुरुष थे रोजगोपालचारी ‘राजाजी’ के नाम से भी जाने जाते हैं। राजगोपालाचारी वकील, लेखक, राजनीतिज्ञ और दार्शनिक थे

राजगोपालचारी को कांग्रेस के जनरल सेक्रेटरी के रूप में भी चुना गया था। अंतिम गवर्नर माउंटबेटन के बाद राजगोपालचारी स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर बने थे। (21 जून 1948 से 26 जनवरी 1950 तक)

अपने अद्भुत और प्रभावशाली व्यक्तित्व के कारण ‘राजाजी’ के नाम से प्रसिद्ध महान् स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक, गांधीवादी राजनीतिज्ञ चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को आधुनिक भारत के इतिहास का ‘चाणक्य’ माना जाता है

राजगोपालाचारी जी की बुद्धि चातुर्य और दृढ़ इच्छाशक्ति के कारण जवाहरलाल नेहरू,महात्मा गांधी और सरदार पटेल जैसे अनेक उच्चकोटि के कांग्रेसी नेता भी उनकी प्रशंसा करते नहीं अघाते थे।

प्रसिद्ध राष्ट्रवादी बाल गंगाधर तिलक से प्रभावित होकर उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया और सालेम नगर पालिका के सदस्य और फिर अध्यक्ष चुने गए। वह भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के सदस्य बन गए इसकी गतिविधियों और आंदोलनों में भाग लेने लगे। उन्होंने कांग्रेस के कलकत्ता (1906) और सूरत (1907) अधिवेसन में भाग लिया

सन 1917 में उन्होंने स्वाधीनता कार्यकर्ता पी. वर्दाराजुलू नायडू के पक्ष में अदालत में दलील दी। वर्दाराजुलू पर विद्रोह का मुकदमा लगाया गया था। वह एनी बेसेंट और सी. विजयराघव्चारियर जैसे नेताओं से बहुत प्रभावित थे।  जब महात्मा गाँधी स्वाधीनता आन्दोलन में सक्रीय हुए तब राजगोपालाचारी उनके अनुगामी बन गए।

उन्होंने असहयोग आन्दोलन में भाग लिया और अपनी वकालत छोड़ दी। वर्ष 1921 में उन्हें कांग्रेस कार्य समिति का सदस्य चुना गया और वह कांग्रेस के महामंत्री भी रहे। सन 1922 में कांग्रेस के गया अधिवेसन में उन्हें एक नयी पहचान मिली। उन्होंने ‘गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट 1919’ के तहत अग्रेज़ी सरकार के साथ किसी भी सहयोग का विरोध किया और ‘इम्पीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल’ के साथ-साथ राज्यों के ‘विधान परिषद्’ में प्रवेश का भी विरोध कर ‘अपरिवर्तनवादी ‘के नेता बन गए।

‘अपरिवर्तनवादियो’ ने ‘परिवर्तनवादियो’ को पराजित कर दिया जिसके फलस्वरूप मोतीलाल नेहरु और चितरंजन दास जैसे नेताओं ने इस्तीफा दे दिया।

मुख्यमंत्री सन 1937 में हुए काँसिलो के चुनावों में चक्रवर्ती के नेतृत्व में कांग्रेस ने मद्रास प्रांत में विजय प्राप्त की। उन्हें मद्रास का मुख्यमंत्री बनाया गया। 1939 में ब्रिटिश सरकार और कांग्रेस के बीच मतभेद के चलते कांग्रेस की सभी सरकारें भंग कर दी गयी थीं। चक्रवर्ती ने भी अपने पद से त्यागपत्र दे दिया।

राजगोपालाचारी का द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम दिनों में महात्मा गांधी और मोहम्मद अली जिन्ना के बीच बातचीत शुरू कराने में अहम योगदान रहा था। राजगोपालाचारी ने पाकिस्तान की मांग करने वाले जिन्ना और मुस्लिम लीग से बातचीत का मार्ग बनाया था जिसे ‘सी आर फॉर्म्युला’ के नाम से भी जाना जाता है।

उन्होंने राजनीतिक समस्याओं के साथ-साथ सांस्कृतिक विषयों पर भी लेखन किया। रामायण(अग्रेजी) , महाभारत(अंग्रेजी) और गीता का अनुवाद अपने ढंग से किया। कई मौलिक कहानियां लिखने के साथ ही उन्होंने कुछ दिनों तक महात्मा गांधी के ‘ यंग इंडिया ’ का संपादन भी किया।  साहित्य अकादमी (तमिल) द्वारा उन्हें पुस्तक ‘चक्रवर्ती थिरुमगम्’ पर सम्मान भी मिला।

राज्यपाल:- 1946 में देश की अंतरिम सरकार बनी। उन्हें केन्द्र सरकार में उद्योग मंत्री बनाया गया। 1947 में देश के पूर्ण स्वतंत्र होने पर उन्हें बंगाल का राज्यपाल नियुक्त किया गया।

1950 में जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार में इन्हें गृहमंत्री भी बनाया गया। 1952 में राजगोपालचारी ने मद्रास के मुख्यमंत्री के रूप में थपथ ली।

स्वतंत्रता संग्राम से लेकर बाद तक देश की सेवा करने के लिए इन्हें भारत का सर्वश्रेष्ठ नागरिक पुरस्कार भारत रत्न 1954 में दिया गया। भारत रत्न पाने वाले वे पहले व्यक्ति थे

कांग्रेस से अलग होकर इन्होंने अपनी एक अलग पार्टी बनाई, जिसका नाम ‘एंटी कांग्रेस स्वतंत्र पार्टी‘ रखा गया। इन्होंने संस्कृत ग्रंथ ‘रामायण‘ का तमिल में अनुवाद किया। अपने कारावास के समय के बारे में उन्होंने ‘मेडिटेशन इन जेल‘ के नाम से किताब भी लिखी।

28 दिसम्बर 1972 को इनका निधन हो गया।

September 21, 2020

What is Muslim league मुस्लिम लीग क्या हे??

मुस्लिम लीग

मुस्लिम लीग

मुस्लिम_लीग का मूल नाम ‘अखिल भारतीय मुस्लिम लीग‘ था। यह एक राजनीतिक समूह था जिसने ब्रिटिश भारत के विभाजन (1947 ई.) से निर्मित एक अलग मुस्लिम राष्ट्र के लिए आन्दोलन चलाया।

बंगाल विभाजन की घोषणा के बाद मुस्लिम लीग अलीगढ़ कॉलेज के प्राचार्य आर्चबोल्ड एवं तत्कालीन वायसराय लॉर्ड मिंटो के निजी सचिव डनलप स्मिथ के प्रयास से आगा खां के नेतृत्व में 36 मुसलमानों का प्रतिनिधिमंडल 1 अक्टूबर 1906 को वायसराय लॉर्ड मिंटो से मिला ।  

उन्होंने मांग की कि प्रतिनिधि संस्थाओं में मुस्लिमों के राजनीतिक महत्व और साम्राज्य की रक्षा में उनकी देन के अनुरूप उनका स्थान होना चाहिए ना कि उनके समाज की जनसंख्या के आधार पर विधान परिषदों के लिए मुस्लिम निर्वाचन मंडल स्थापित किए जाएं

इस शिष्टमंडल ने केंद्रीय प्रांतीय वह स्थानीय निकायों में मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की मांग की। इस शिष्टमण्डल को भेजने के पीछे अंग्रेज़ उच्च अधिकारियों का हाथ था

अलीगढ़ कॉलेज के प्रिंसपल आर्चबोल्ड इस प्रतिनिधिमण्डल के जनक थे

ढाका के नवाब सलीमुल्लाह ने 30 दिसंबर 1906 को डाका में एक बैठक में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना की घोषणा की। नवाब सलीमुल्लाह मुस्लिम_लीग के संस्थापक व अध्यक्ष थे। वकार उल मुल्क मुश्ताक हुसैन इसके प्रथम अध्यक्ष थे। और 1908 में आगा खां के स्थाई अध्यक्ष बने।

मुस्लिम लीग की स्थापना के उद्देश्य।

  • ब्रिटिश सरकार के प्रति मुसलमानों की निष्ठा बढ़ाना।
  • मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा करना।
  • उपरोक्त दोनों को हानि पहुंचाए बिना जहां तक संभव हो मुसलमानों व दूसरी जातियों के बीच मित्रता का भाव उत्पन्न करना।
  • यह कांग्रेस के बढ़ते हुए प्रभाव को रोकना चाहती थी

मुस्लिम लीग के 1908 में अमृतसर अधिवेशन में मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की मांग की गई। जिसे 1909 ईस्वी में मार्ले मिंटो सुधारो में स्वीकार किया गया।

लीग ने 1916 ई. के ‘लखनऊ समझौते’ के आधार पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का समर्थन करने के अतिरिक्त कभी भी भारतीयों के राजनीतिक अधिकारों की मांग नहीं की

मुस्लिम लीग ने 23 मार्च 1940 ईस्वी को आयोजित अपने लाहौर अधिवेशन में पहली बार पाकिस्तान की मांग की । जिन्ना ने 23 मार्च 1940 ईस्वी को लाहौर में पाकिस्तान की मांग की घोषणा करते हुए कहा कि यह हिंदू और मुसलमान शब्द नियतनिष्ठा अर्थ में धर्म नहीं है अपितु वास्तव में भिन्न और स्पष्ट सामाजिक व्यवस्था है।

 1941 ईस्वी में मुस्लिम_लीग ने अपने मद्रास अधिवेशन में इसकी मांग पुनः दोहराया। भारत के मुसलमानों के लिए सर्वप्रथम एक अलग राज्य की मांग करने वाला व्यक्ति मोहम्मद इकबाल था।

September 20, 2020

Uttar Mughal Period New Dynasty उत्तर मुगलकालीन नये राजवंश

उतर मुगलकालीन नये राजवंश

अवध ( Awadh )

उत्तर मुगलकालीन

अवध के स्वतंत्र राज्य के संस्थापक सआदत खां बुराहनुल्मुल्क था। 1722 ई. में मुग़ल बादशाह मुहमदशाह द्वारा फारस के शिया सआदत खां को अवध का सूबेदार बनाये जाने के बाद अवध सूबे को स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया गया।

सआदत खां ने सैय्यद बंधुओं को हटाने में सहयोग दिया। बादशाह ने सआदत खां को नादिरशाह के साथ वार्ता के लिए नियुक्त किया ताकि वह एक बड़ी रकम के भुगतान के एवज में अपने देश लौट जाये और शहर को तबाह करने से उसे रोका जा सके।  लेकिन जब नादिरशाह को उस रकम का भुगतान नहीं किया गया तो उसका परिणाम दिल्ली की जनता को नरसंहार के रूप में भुगतना पड़ा। सआदत खां ने भी शर्म और अपमान के कारण आत्महत्या कर ली ।

सआदत खां के बाद अवध का अगला नवाब सफदरजंग बना जिसे मुग़ल साम्राज्य का वजीर भी नियुक्त किया गया था। उसका पुत्र शुजाउद्दौला उसका उत्तराधिकारी बना। अवध ने एक शक्तिशाली सेना का गठन किया जिसमे मुस्लिमों के साथ साथ हिन्दू ,नागा,सन्यासी भी शामिल थे।

अवध के शासक का प्राधिकार दिल्ली के पूर्व में स्थित रूहेलखंड क्षेत्र तक था। उत्तर –पश्चिमी सीमान्त की पर्वत श्रंखलाओं से बड़ी संख्या में अफ़ग़ान ,जिन्हें रोहिल्ला कहा जाता था ,वहाँ आकर बस गए थे।

अवध के नवाबों का विवरण निम्नलिखित है-

सआदत खां बुरहान-उल-मुल्क (1722-1739 ई ): इन्होने 1722 ई. में अवध की स्वायत्त राज्य के रूप में स्थापना की उसे मुग़ल बादशाह मुहम्मदशाह द्वारा गवर्नर नियुक्त किया गया था । उसने नादिरशाह के आक्रमण के समय साम्राज्य की गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अंततः इज्ज़त और सम्मान की खातिर आत्महत्या कर ली।

सफ़दर जंग अब्दुल मंसूर (1739-1754 ई ): वह सआदत खां का दामाद था जिसने 1748 ई. में अहमदशाह अब्दाली के विरुद्ध मानपुर के युद्ध में भाग लिया था।

शुजाउद्दौला (1754-1775 ई ): वह सफदरजंग का पुत्र और अहमदशाह अब्दाली का सहयोगी था। उसने अंग्रेजों के सहयोग से रोहिल्लों को हराकर 1755 ई. में रूहेलखंड को अपने साम्राज्य में मिला लिया था।

आसफ-उद-दौला: 

वह लखनऊ की संस्कृति को प्रोत्साहित करने और इमामबाड़ा तथा रूमी दरवाजा जैसी ऐतिहासिक इमारतें बनवाने के लिए प्रसिद्ध है। उसने 1755 ई. में अंग्रेजों के साथ फ़ैजाबाद की संधि की।

वाजिद अली शाह :  वह अवध का अंतिम नवाब था जिसे अख्तरप्रिया और जान-ए-आलम नाम से जाना जाता है। उसके समय में ही ब्रिटिश गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी द्वारा अवध को कुशासन के आधार पर ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया था। वह शास्त्रीय संगीत और नृत्य का शौक़ीन था जिसने कालका-बिंदा जैसे कलाकार भाइयों को अपने दरबार में शरण दी थी।

अवध अपनी उपजाऊ भूमि के कारण के हमेशा से आकर्षण का केंद्र रहा है ।अंग्रेजों ने भी अपने स्वार्थ के लिए इसकी उपजाऊ भूमि का दोहन किया। इसीलिए अंग्रेजों ने 1856 ई. में इसे अपने साम्राज्य में मिला लिया।

रुहेले एवं बंगश पठान

स्वतंत्र रूहेलखंड राज्य की स्थापना वीर दाउद तथा आलिमुहम्मद खांने ने की थी। रूहेल सरदार नजीबुद्दौला अफगान शासक अहमदशाह अब्दाली का विश्वासपात्र था। रूहेलखण्ड के कुछ दूर पूरब में मुहम्मद खां बंगश नामक एक वीर अफगान ने फरुखाबाद की जागीर को एक स्वतंत्र राज्य बना लिया।

मैसूर ( Mysore )

दक्षिण भारत में हैदराबाद के समीप हैदर अली नामक एक वीर योद्धा , जिसने अपना जीवन एक घुड़सवार के रूप में प्रारम्भ किया था, के आधीन जिस महत्वपूर्ण सत्ता का उदय हुआ, वह मैसूर था। 18वीं शताब्दी में मैसूर पर वाडियार वंश का शासन था। इस वंश के उस समय के अंतिम शासक चिक्का कृष्णराज द्वितीय के शासनकाल में शासन की वास्तविक शक्ति दो मंत्रियों देवराज व नंजराज के हाथों में थी।

हैदरअली के युद्ध कौशल से प्रभावित होकर नंजराज ने हैदर को डिंडीगुल के किले का फौजदार नियुक्त किया। फ्रांसीसियों की सहायता से हैदरअली ने डिंडीगुल में एक आधुनिक शास्त्रागार की स्थापना की। 1761 में हैदर ने नंजराज व देवराज को सत्ता से अलग कर दिया तथा स्वयं मैसूर का वास्तविक शासक बन बैठा।

हैदरअली ने मैसूर स्थित चामुंडेश्वरी देवी मंदिर के लिए दान दिया था, साथ ही अपने सिक्कों पर शिव, पार्वती, विष्णु इत्यादि की आकृति अंकित करवाई।

प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767-69)

हैदरअली के शीघ्र उदय ने स्वभावतः अंग्रेजों, निजाम और मराठों की ईष्या को उभार डाला। इसके साथ-साथ हैदर की फ्रांसीसियों से बढ़ती निकटता तथा अंग्रेजों की आक्रामक नीति ने भी इस युद्ध के लिए आवश्यक मनोदशा के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

हैदर ने कूटनीति से निजाम व मराठों को अपने पक्ष में करके कर्नाटक पर आक्रमण कर दिया। थोड़े उतार-चढ़ाव के साथ डेढ़ साल तक चले इस युद्ध में अंततः हैदरअली विजयी रहा। फलतः अंग्रेजों को हैदर की शर्तों पर एक अपमानजनक संधि करने को बाध्य होना पड़ा जिसे ‘मद्रास की संधि’ (1769) कहते है।

इसके अनुसार अंग्रेजों ने हैदर को किसी दुसरी शक्ति द्वारा आक्रांत होने पर सहायता का वचन दिया।

द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780-84)

तत्कालीन परिस्थितियों के अंतर्गत हैदर पुनः (कर्नाटक के प्रथम युद्ध की भांति) निजाम व मराठों के साथ त्रिगुट बनाने में सफल रहा तथा कर्नल वेली के नेतृत्व वाली अंग्रेजी सेना को पराजित कर दिया। 

लेकिन अंग्रेजों द्वारा निजाम व मराठों को अपने पक्ष में कर लेने के पश्चात् हैदर अंग्रेज जनरल आयरकूट के नेतृत्व वाली सेना से पोर्तोनोवा के युद्ध में पराजित हुआ एवं घायल हो गया जिससे कुछ दिनों पश्चात् उसकी मृत्यु हो गई। हैदर के पुत्र टीपू ने संघर्ष जारी रखा तथा ब्रिगेडीयर मैथ्यूज को पराजित कर सेना सहित बंदी बना लिया।

1784 में दोनों पक्षों के बीच मंगलौर की संधि से युद्ध समाप्त हुआ। भारतीय शक्तियों में हैदर अली पहला व्यक्ति था जिसने अंग्रेजों को पराजित किया।

टीपू सुल्तान

टीपू सुल्तान 1782 में मैसूर का शासक बना। टीपू को उर्दू, अरबी, फारसी, कन्नड़ इत्यादि भाषाएँ ज्ञात थी। टीपू एक प्रगतिशील विचारधारा वाला शासक था। इसने मापतौल के आधुनिक पैमाने अपनाएं, साथ ही आधुनिक कैलेंडर को लागू किया। टीपू ने सिक्का ढलाई की नई तकनीक अपनाई।

उसने अपने पिता हैदर अली की ही भांति अपने सिक्कों पर हिन्दू संवत् तथा हिन्दू देवी-देवताओं के चित्र अंकित करवाए। टीपू अपनी प्रशासनिक व्यवस्था में पाश्चात्य गुणों को शामिल करने वाला भारत का प्रथम शासक था। टीपू ने अरब, काबुल, मारीशस इत्यादि देशों से मैत्रीसम्बंध स्थापित करने हेतु अपने दूतमंडल वहाँ भेजे।

टीपू ने व्यापार की संवृद्धि के लिए अपने गुमास्तों की नियुक्ति कई देशों में की। इसने नौसेना के सशक्तिकरण हेतु मोलिदाबाद व मंगलौर में पोत निर्माण केंद्र स्थापित किये।

तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790-92)

मद्रास व मंगलौर की संधियाँ युद्ध का तात्कालिक किन्तु अस्थाई समाधान मात्र थीं। दोनों ही पक्षों की महत्वकांक्षाएँ ज्यों की त्यों बनी हुई थी।1790 में कार्नवालिस ने टीपू पर अंग्रेजों के खिलाफ फ्रांसीसियों से गुप्त समझौता करने तथा ब्रिटिश संरक्षित त्रावणकोर राज्य पर हमला करने का आरोप लगाकर युद्ध छेड़ दिया।

टीपू अंग्रेज, मराठों व निजाम की संयुक्तसेना से पराजित हो गया तथा अंग्रेजों से संधि करने को बाध्य हुआ।श्रीरंगपट्टनम की इस संधि (1792) के अनुसार टीपू अपना आधा राज्य तथा तीन करोड़ रूपये अंग्रेजों को देने को बाध्य हुआ।

चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799)

इस युद्ध का कारण था लार्ड वेलेजली द्वारा भेजे सहायक संधि के प्रस्ताव का टीपू द्वारा अस्वीकार कर दिया जाना। इस युद्ध में अंग्रेजों की सेना का नेतृत्व जनरल हैरिस,कर्नल वेलेजली तथा स्टुअर्ट ने किया। टीपू श्रीरंगपट्टनम दुर्ग के द्वार पर लड़ता मारा गया।

इस विजय के पश्चात् अंग्रेजों ने मैसूर राज्य का एक बड़ा भाग अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया तथा शेष मैसूर राज्य को वाडियार वंश के एक दो वर्षीय बालक कृष्णराज को राजा बनाकर अपने संरक्षण में ले लिया तथा मैसूर पर सहायक संधि आरोपित कर दी।

पंजाब / सिक्ख ( Punjab / Sikh )

सिक्ख धर्म की स्थापना सोलहवी शताब्दी के आरम्भ में गुरुनानक द्वारा की गई थी। गुरु नानक का जन्म 15 अप्रैल, 1469 को पश्चिमी पंजाब के एक गाँव तलवंडी में हुआ था। इन्होने कर्मकांड एवं अवतारवाद का विरोध किया तथा धर्मप्रचार के लिए सांगतो की स्थापना की।

गुरुअंगद (लेहना)- इन्हें गुरुनानक ने अपना उत्तराधिकारी बनाया था। इन्होने नानक द्वारा प्रारम्भ लंगर व्यवस्था को स्थायी बना दिया। इन्होने गुरुमुखी लिपि की शुरुआत की।

गुरुअमरदास- इन्होने सिक्ख सम्प्रदाय को एक संगठित रूप दिया। बादशाह अकबर इनमे मिलने स्वयं गोइंदवाल गया तथा इनकी पुत्री बीबीभानी के नाम कुछ जमीन दी। इन्होने हिन्दुओ और सिक्खों के विवाह को पृथक करने के लिए ‘लवन पद्धति’ शुरू की।

गुरुरामदास- अकबर ने इन्हें 500बीघा जमीन दी जिस पर इन्होने अमृतसर नगर की स्थापना की। इन्होंने गुरु के पद को पैतृक बना दिया।

गुरु अर्जुन देव-

 1604 में इन्होने आदिग्रंथ की रचना की। इन्होने सूफीसंत मियाँमीर द्वारा अमृतसर में हरविंदर साहब की नींव डलवायी। कालांतर में महाराज रणजीत सिंह द्वारा स्वर्ण जड़वाने के बाद अंग्रेजो द्वारा इसे स्वर्ण मंदिर नाम दिया गया। इन्होने अनिवार्य अध्यात्मिक कर (सिक्खों से) लेना प्रारम्भ किया। शहजादा खुसरो (जहाँगीर के खिलाफ विद्रोह करने वाले) का समर्थन करने के कारण जहाँगीर ने इनको मृत्युदंड दे दिया।

गुरुहरगोविन्द- इन्होने सिक्खों में सैन्य भावना पैदा की तथा उन्हें मांस खाने की अनुमति दी। इन्होने अमृतसर की किलेबंदी करवाई तथा उसमे अकाल तख़्त की स्थापना की। बाज प्रकरण पर इनका शाहजहाँ से संघर्ष हुआ।

गुरुहरराय- इन्होने सामूगढ़ के युद्ध में पराजित हुए दाराशिकोह की मदद की थी।

गुरुहरकिशन- इन्होने अपना जीवन दिल्ली में महामारी से पीड़ित लोगों की सेवा में बिताया। इनकी मृत्यु चेचक से हुई।

गुरुतेग बहादुर- इन्होने औरंगजेब की कट्टर धार्मिक नीतियों का विरोध किया। औरंगजेब ने इन्हें दिल्ली बुलाकर इस्लाम धर्म स्वीकार करने को कहा तथा इनकार करने पर इनकी हत्या करवा दी।

गुरुगोविन्द सिंह-

 ये सिक्खों के दसवें और अन्तिम गुरु थे। इनका जन्म पटना में हुआ था। इन्होने आनंदपुर की स्थापना कर वही अपनी गद्दी स्थापित की। इन्होने पाहुल प्रथा शुरू की। इस पंथ में दीक्षित व्यक्तियों को खालसा कहा जाता था। इन्होनें प्रत्येक सिक्खों को पंचकार धारण करने का आदेश दिया। चंदीदिवर एवं कृष्ण अवतार नामक पुस्तकों की रचना गुरु गोविन्द सिंह ने की। इनकी आत्मकथा का नाम विचित्रनाटक है। आनंदगढ़, लौहगढ़, फतेहपुर एवं केशगढ़ के किलों के निर्माण का श्रेय इन्ही को है।

गुरु गोविन्द सिंह के समय हुए कई युद्धों के दौरान आदि ग्रन्थ गायब हो गया अतः इन्होने पुनः उसका संकलन करवाया फलतः आदि ग्रन्थ को ‘दशम बादशाह का ग्रन्थ’ भी कहा जाता है। गुरु गोविंद सिंह ने अपनी मृत्यु से पहले गद्दी को समाप्त कर दिया। इनकी समाधि के कारण नादेड़(महाराष्ट्र) गुरुद्वारा पवित्र माना जाता है।

बंदा बहादुर- गुरु गोविन्द सिंह के पश्चात् सिक्खों का नेतृत्व बंद बहादुर ने संभाला। यह जम्मू का रहने वाला था। इसके बचपन का नाम लक्ष्मण था। इसे सिक्खों का पहला राजनीतिक नेता माना जाता था। 1716 में फर्रुखसियर के आदेश पर इसकी हत्या कर दी गई। सिक्खों ने 1716 में देग, तेग एवं फतह लेख युक्त चाँदी के सिक्के जारी किये, ये पंजाब में सिक्ख संप्रभुता की प्रथम उद्घोषणा मानी जाती है।

रणजीत सिंह- 

 आधुनिक पंजाब के निर्माण का श्रेय रणजीत सिंह को जाता है। ये सुकरचकिया मिसल के प्रमुख महासिंह के पुत्र थे अफगानिस्तान के शासक जमानशाह ने रणजीत सिंह राजा की पदवी दी तथा इन्हें लाहौर की सुबेदारी भी सौपी। 1809 में रणजीत सिंह व अंग्रेजों के बीच अमृतसर की संधि हुई जिसके द्वारा सतलज नदी दोनों राज्यों की सीमा मान ली गई।

1809 में रणजीत सिंह अपने भाई द्वारा अपदस्थ किये गए शाहशुजा को पुनः सत्तासीन करने में बहुत मदद की थी। शाहशुजा ने ही विश्व प्रसिद्द ‘कोहिनूर हीरा’ भेट किया था जिसे पहले नादिरशाह लूट कर ले गया था। रणजीत सिंह सदैव खालसा के नाम पर कार्य करते थे तथा अपनी सरकार को ‘सरकार-ए-खालसा’ जी कहते थे ।

इन्होंने गुरु नानक एवं गुरुगोविन्द सिंह के नाम पर सिक्के चलवाये।  रणजीत सिंह भारतीय सेनाओं के दुर्बल पक्ष को समझते हुए कम्पनी के नमूने पर विदेशी कमाण्डरों की सहायता से एक कुशल, अनुशासित व सुसंगठित सेना का गठन किया। इसे ‘फौजे-ए-आईन’ कहा जाता है।

रणजीत सिंह ने लाहौर में एक तोप खाना खोला। रणजीत सिंह का उतराधिकारी खड्ग सिंह हुआ। इसके पश्चात् क्रमशः नौनिहाल सिंह एवं शेर सिंह ने शासन किया। शेर सिंह की हत्या हो जाने पर 1843 में महाराजा रणजीत सिंह का अल्पवयस्क पुत्र दिलीपसिंह महारानी जिंदल कौर के संरक्षण में सिंहासन पर बैठा।

1845 में अंग्रेजों ने पंजाब पर आक्रमण कर दिया। फलतः प्रथम आंग्ल सिक्ख युद्ध का प्रारम्भ हुआ। युद्ध में सिक्खों की पराजय हुई तथा इन्हें लाहौर की संधि व भेरोंवाल की संधि (1846) के लिए बाध्य होना पड़ा।

संधि के बदले अंग्रेजों ने दिलीप सिंह को महाराज, रानी जिंदल को संरक्षिका तथा युद्ध में अंग्रेजों की मदद करने वाले सिक्ख सेना के सेनापति लाल सिंह को वजीर के रूप में मान्यता प्रदान की। साथ ही कश्मीर गुलाब सिंह को बेच दिया।

पंजाब को ब्रिटिश प्रभाव से मुक्त करने तथा खालसा शक्ति को पुनः प्रतिष्ठित करने के लिए 1848 में पुनः विद्रोह हो गया इसे ‘द्वितीय आंग्लसिक्ख युद्ध’ के नाम से जाना जाता है। जिसमे 1849 के गुजरात के युद्ध में चार्ल्स नेपियर के नेतृत्व वाली अंग्रेजी सेना ने सिक्ख सेना को बुरी तरह पराजित किया। गुजरात का युद्ध ‘तोपों के युद्ध’ के नाम से जाना जाता है।

29 मार्च, 1849 को सिक्ख राज्य को अंग्रेजी राज्य में मिला लिया गया। अंग्रेजों द्वारा दिलीप सिंह को शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंग्लैण्ड भेज दिया गया, जहाँ बाद में उन्होंने ईसाई धर्म ग्रहण कर लिया। दिलीप सिंह का निधन 23 अक्टूबर,1893 को पेरिस में हुआ।

हैदराबाद ( Hyderabad )

हैदराबाद के स्वतंत्र आसफजाही वंश की स्थापना चिनकिलिच खां निजामुलमुल्क ने 1724 में की थी। इसे मुग़ल बादशाह मुहम्मदशाह ने दक्कन का सूबेदार नियुक्त किया था।

1724 में स्वतंत्र हैदराबाद राज्य की स्थापना के पश्चात मुग़ल बादशाह मुहम्मदशाह ने इसे आसफजाह की उपाधि प्रदान की। शकुरखेडा के युद्ध में चिनकिलिच खां ने मुग़ल सूबेदार मुबरिजखां को पराजित किया।

चिनकिलिच खां की मृत्यु के बाद हैदराबाद का पतन प्रारंभ को गया और अंततः हैदराबाद भारत का पहला ऐसा राज्य बना जिसने वेलेजली की सहायता संधि के अनतर्गत एक आश्रित सेना रखना स्वीकार किया। यहॉं सन् 1724 से सन् 1948 तक ऩिजाम शाही या आसफजाही का शासन था।

निजाम शासकों के नाम इस प्रकार हैं-

  • निजामुलमुल्क चिनकिलिच खान(प्रथम निजाम) (1724- 48)
  • नासिर जंग(1748- 50)
  •  मुजफ्फर जंग(1750-51)
  • सलावत जंग (1751 – 62)
  • निजाम अली(द्वितीय निजाम) (1760 – 1803)
  • सिकन्दर जहां (तृतीय निजाम) (1803 – 29)
  • नासीर – उद-दौला (चतुर्थ निजाम) (1829-1857)
  • अफज-उद-दौला(पांचवा निजाम) ( 1857-69)
  • महबत अली खान(छठवां निजाम) ( 1869- 1911)
  • उस्मान अली खान (सातवां निजाम) (1911-1948)

इस ऩिजाम आसफिया खानदान को दक्कन पर दो सौ साल तक हुकूमत करने का अवसर मिला। मीर उस्मान अली खॉं (सातवां ऩिजाम) ने सन् 1911 से 1948 तक आसफजाही वंश के अंतिम शासक के रूप में शासन चलाया।

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September 19, 2020

Statutory Development 1857 से पहले वैधानिक विकास

रेग्यूलेटिंग एक्ट (1773 ई.) –

वैधानिक विकास

18 मई, 1773 ई. को लार्ड नार्थ ने कॉमन्स सभा में ईस्ट इंण्डिया कम्पनी रेग्यूलेटिंग बिल प्रस्तुत किया, जिसे कॉमन्स सभा ने 10 जून को और लार्ड सभा ने 19 जून को पास कर दिया। यह 1773 ई. के रेग्यूलेटिंग एक्ट के नाम से प्रसिद्ध है।

इस एक्ट का मुख्य उद्देश्य कम्पनी के संविधान तथा उसके भारतीय प्रशासन में सुधार लाना था।  बंगाल का शासन गवर्नर जनरल तथा चार सदस्यीय परिषद में निहित किया गया। इस परिषद में निर्णय बहुमत द्वारा लिए जाने की भी व्यवस्था की गयी।

इस अधिनियम द्वारा प्रशासक मंडल में वारेन हेस्टिंग्स को गवर्नर जनरल के रूप में तथा क्लैवरिंग, मॉनसन, बरवैल तथा पिफलिप प्रफांसिस को परिषद के सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया।

इन सभी का कार्यकाल पांच वर्ष का था तथा निदेशक बोर्ड की सिफारिश पर केवल ब्रिटिश सम्राट द्वारा ही इन्हें हटाया जा सकता था।

मद्रास तथा बम्बई प्रेसीडेंसियों को बंगाल प्रेसीडेन्सी के अधीन कर दिया गया तथा बंगाल के गवर्नर जनरल को तीनों प्रेसीडेन्सियों का गवर्नर जनरल बना दिया गया। इस प्रकार वारेन हेस्टिंग्स को बंगाल का प्रथम गवर्नर जनरल कहा जाता है और वे लोग सत्ता का उपयोग संयुक्त रूप से करते थे

सपरिषद गवर्नर जनरल को भारतीय प्रशासन के लिए कानून बनाने का अधिकार प्रदान किया गया, किन्तु इन कानूनों को लागू करने से पूर्व निदेशक बोर्ड की अनुमति प्राप्त करना अनिवार्य था।

इस अधिनियम द्वारा बंगाल (कलकत्ता) में एक उच्चतम न्यायालय की स्थापना की गयी।

इसमें एक मुख्य न्यायाधीश तथा तीन अन्य न्यायाधीश थे। सर एलिजा इम्पे को उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) का प्रथम मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया।  

इस न्यायालय को दीवानी, फौजदारी, जल सेना मामलों में व्यापक अधिकार दिया गया।

न्यायालय को यह भी अधिकार था कि वह कम्पनी तथा सम्राट की सेवा में लगे व्यक्तियों के विरुद्ध मामले की सुनवायी कर सकता था।

इस न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध इंग्लैंड स्थित प्रिवी कौंसिल में अपील की जा सकती थी।

संचालक मंडल का कार्यकाल चार वर्ष कर दिया गया तथा अब 500 पौंड के स्थान पर 1000 पौंड के अंशधारियों को संचालक चुनने का अधिकार दिया गया।

इस प्रकार 1773 के एक्ट के द्वारा भारत में कंपनी के कार्यों में ब्रिटिश संसद का हस्तक्षेप व नियंत्रण प्रारंभ हुआ

तथा कम्पनी के शासन के लिए पहली बार एक लिखित संविधान प्रस्तुत किया गया।

बंगाल न्यायालय एक्ट –

रेल्यूलेटिंग एक्ट के दोषों को दूर करने के लिए ब्रिटिश संसद ने मि. बर्क की अध्यक्षता में एक कमेटी नियुक्त की। इस कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर 1781 ई. में ब्रिटिश संसद ने एक एक्ट पास किया, जिसे बंगाल न्यायालय का एक्ट कहा जाता है। इसे संशोधन अधिनियम भी कहते हैं। इस एक्ट का मुख्य उद्देश्य न्यायालय के अधिकार क्षेत्र और शक्तियों के विषय में उत्पन्न अनिश्चितता का अन्त करना था।

एक्ट की प्रमुख धाराएँ-
  • इस एक्ट के अनुसार कम्पनी के कर्मचारियों के सरकारी तौर पर किए गये कार्य काफी सीमा तक सुप्रीम कोर्ट के अधिकार के बाहर कर दिए गए। दूसरे शब्दों में गवर्नर जनरल और उसकी कौंसिल द्वारा किए गए कार्यो पर सर्वोच्च न्यायालय कोई नियंत्रण नहीं रहा।
  • छोटे न्यायालयों के न्याय अधिकारियों के न्याय सम्बन्धी कार्यों पर से सुप्रीम कोर्ट का कण्ट्रोल हटा दिया गया।
  • राजस्व वसूल करने वाले अधिकारियों पर से सुप्रीम कोर्ट का नियंत्रण हटा लिया गया।
  • गवर्नर जनरल तथा उसकी कौंसिल पर से सुप्रीम कोर्ट का नियंत्रण हटा दिया गया। अब सुप्रीम कोर्ट गवर्नर जनरल तथा उसकी कौंसिल के सिर्फ उसी कार्य में हस्तक्षेप कर सकता था, जिससे ब्रिटिश प्रजा को हानि पहुँचती हो।
  • कम्पनी के न्यायालयों के निर्णयों के विरूद्ध गवर्नर जनरल और उसकी कौंसिल को अपील सुनने का अधिकार दे दिया गया।
  • गवर्नर जनरल तथा उसकी परिषद् को सुप्रीम कोर्ट की सम्मत्ति के बिना प्रान्तीय न्यायालयों तथा परिषद् के सम्बन्ध में नियम बनाने का अधिकार दे दिया गया।
  • सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र केवल कलकत्ता वाशिंदों तक सीमित कर दिया गया अर्थात् शेष स्थानों पर रहने वाले भारतीयों के मुकदमें सुनने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट को नहीं था।
  • यह भी कहा गया कि न्याय करते समय भारतीयों की धार्मिक परम्पराओं, रीति-रिवाजो, सामाजिक नियमों और जातीय कानूनों को ध्यान में रखा जाएगा। इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट के लिए मुकदमों के फैसले अंग्रेजी कानून के अनुसार करने की मनाही कर दी गई।
  • यह भी कहा जाता है कि सुप्रीम कोर्ट हिन्दुओ के मुकदमों का हिन्दुओं के कानून के अनुसार और मुसलमानों के मुकदमों का मुसलामनों के कानून के अनुसार फैसला करे।

इस एक्ट से सुप्रीम कोर्ट के गवर्नर जनरल की कौंसिल तथा छोटे न्यायालयों के साथ चलने वाले झगड़े समाप्त हो गए। भारतीयों को अंग्रेजी कानून के विरूद्ध जो शिकायत थी, वह भी दूर हो गई। संक्षेप में, इस एक्ट ने रेग्युलेटिंग एक्ट के सर्वोच्च न्यायलय से सम्बन्धित दोषों को दूर कर दिया। इसके अतिरिक्त सर्वोच्च न्यायालय की तुलना में गवर्नर जनरल तथा उसकी कौंसिल की स्थिति को दृढ़ बना दिया।

डुण्डास का इण्डियन बिल (अप्रैल 1783) –

30 मई, 1782 ई. को डुण्डास के प्रस्ताव पर ब्रिटिश लोक सभा ने वारेन हेस्टिंग्स प्रशासन की निन्दा की और डायरेक्टरों से उसे वापस बुलाने के लिए कहा। परन्तु संचालक मण्डल ने लोक सभा के आदेश की अवहेलना करते हुए हेस्टिग्स को उसके पद पर बनाए रखा।

कीथ के अनुसार, इस तरह स्पष्ट कर दिया गया कि कम्पनी के डायरेक्टर न तो अपने कर्मचारियों का नियंत्रित कर सकते थे और राज्यों को या कम्पनी को, जबकि कलकत्ता के विरूद्ध होने वाली मद्रास प्रेसीडेन्सी की कार्यवाहियों ने यह सिद्ध कर दिया कि मुख्य प्रेसीडेन्सी सहायक को अपने नियंत्रण में नहीं रखा सकती थी।

कम्पनी के संविधान में सुधार करने के लिए अप्रैल, 1783 में मि. डुण्डास ने एक बिल प्रस्तुत किया, जिसमें निम्नलिखित सुझाव दिए गए थे-

  • सम्राट को कम्पनी के प्रमुख अधिकारियों को वापस बुलाने का अधिकार दिया जाए।
  • कुछ महत्त्वपूर्ण मामलों में गवर्नर जनरल को अपनी कौंसिल के निर्णयों को रद्द करने की शक्ति दी जाए।
  • गवर्नर जनरल और उसकी कौंसिल का प्रादेशिक सरकारों पर नियंत्रण बढ़ा दिया जाए।

चूँकि डुण्डास विरोधी दल का सदस्य था, अतः उसके द्वारा प्रस्तावित वह बिल पास नहीं हो सका। फिर, भी उसका विधेयक इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ कि इसने भारत में संवैधानिक परिवर्तन की आवश्यकता पर जोर दिया और मंत्रिमण्डल को कार्यवाही करने की प्रेरणा दी।

फॉक्स का इण्डिया बिल (नवम्बर, 1783) –

डुण्डास विधेयक ने सरकार को कम्पनी के संविधान में सुधार करने के लिए प्रेरित किया। अतः फॉक्स तथा नौर्थ के संयुक्त मंत्रिमण्डल ने तुरन्त इस प्रश्न को अपने हाथ में लिया। फॉक्स ने भारत में कम्पनी सरकार को अवर्णातीत, शोचनीय, अराजकता तथा गड़बड़ बतलाया। उसने 18 नवम्बर, 1783 ई. को अपना प्रसिद्ध ईस्ट इण्डिया बिल पेश किया, जिसके प्रमुख सुझाव निम्नलिखित थे-

  • कम्पनी की प्रादेशिक सरकार को उसके व्यापारिक हितों से पृथक् कर दिया गया।
  • संचालक मण्डल तथा संचालक मण्डल के स्थान पर सात कमिश्नरों का एक मण्डल लन्दन में स्थापित किया जाए।
  • इस मण्डल को भारतीय प्रदेशों तथा उसके राजस्व का प्रबन्ध करने का पूर्ण अधिकार हो। उसको कम्पनी के समस्त कर्मचारियों को नियुक्त तथा पदच्युत करने की शक्ति भी दी जाए।
  • मण्डल के सदस्यों की नियुक्ति पहली बार संसद के द्वारा की जाए लेकिन बाद में रिक्त होने वाले स्थानों को भरने का अधिकार सम्राट को हो।
  • इन सदस्यों का कार्यकाल चार वर्ष रखा गाय और इस अवधि के दौरान उन्हें संसद के दोनों सदनों में से किसी एक सदन के कहने पर इंग्लैण्ड का सम्राट उन्हें पदच्युत कर सके।
  • इस बोर्ड की बैठकें लन्दन में बुलाए जाए और संसद को इस मण्डल के कार्यों का निरीक्षण करने का अधिकार हो, अर्थात् बोर्ड पर संसद का नियंत्रण स्थापित किया जाए।
  • व्यापार को नियंत्रित करने के लिए व सहायक निदेशकों का एक और मण्डल बनाया जाए।
  • इन सहायक निदेशकों की नियुक्ति भी प्रथम बार संसद द्वारा हो और इसके पश्चात् संचालक मण्डल को उन्हें निर्वाचित करने का अधिकार दिया जाए।
  • इन सहायक निदेशकों को कार्यकाल पाँच वर्ष हो और इस सम्बन्ध में वे भी कमिश्नरों की तरह सुरक्षित हों।
  • विधेयक में एकाधिकार, भेंट तथा रियासतों को ब्रिटिश सेना के मदद को समाप्त करने की व्यवस्था की गई।

फॉक्स विधेयक का संसद में तथा उसके बाहर जोरदार विरोध हुआ। पुन्निया के शब्दो में पार्लियामेन्ट के अन्दर और बाहर दोनों जगह इस विधेयक का मुखर, प्रबल और कटुतापूर्ण विरोध हुआ।  इस विधेयक के दोषों के बारे में रॉबर्ट्सन ने लिखा है, भारत में कम्पनी सरकार को वस्तुतः सात व्यक्तियों के सुपुर्द कर दिया गया था। इससे कमिश्नरों तथा शासक दल को संरक्षण बाँटने का विस्तृत अधिकार मिल जाता। इससे संसद ने भ्रष्ट होने का भी भय था।

यह नये राजनीतिक दायित्व का निर्माण करता। कम्पनी का संविधान चार्टर द्वारा नियमित होता था, परन्तु फॉक्स विधेयक से कम्पनी के चार्टर की पवित्रता नष्ट हो जाती और उसके संविधान के नष्ट हो जाने से अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो जाती।

इंग्लैण्ड नरेश जार्ज तृतीय के व्यक्तिगत हस्तक्षेप के कारण यह विधेयक लार्ड सभा में अस्वीकृत हो गया। रॉबर्ट्सन के शब्दों में विधेयक एक बड़ी समस्या को व्यापक रूप से सुलझाने का निश्छल एवं कूटनीतिक प्रयास था। कीथ ने भी लिखा है, यह विधेयक सम्पूर्ण संविधान को सुधारने का एक प्रबल प्रयत्न था।

1784 ई. का पिट्स इंडिया एक्ट:

रेग्यूलेटिंग एक्ट के दोषों को दूर करने के लिये इस एक्ट को पारित किया गया। इस एक्ट से संबंधित विधेयक ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री पिट द यंगर ने संसद में प्रस्तुत किया तथा 1784 में ब्रिटिश संसद ने इसे पारित कर दिया।

इस एक्ट के प्रमुख उपबंध निम्नानुसार थे-

इसने कंपनी के राजनैतिक और वाणिज्यिक कार्यों को पृथक पृथक कर दिया | इसने निदेशक मंडल को कंपनी के व्यापारिक मामलों की अनुमति तो दी लेकिन राजनैतिक मामलों के प्रबंधन के लिए नियंत्रण बोर्ड (बोर्ड ऑफ़ कण्ट्रोल )नाम से एक नए निकाय का गठन कर दिया |

 इस प्रकार द्वैध शासन व्यवस्था का शुरुआत किया गया नियंत्रण बोर्ड को यह शक्ति थी की वह ब्रिटिश नियंत्रित भारत में सभी नागरिक , सैन्य सरकार व राजस्व गतिविधियों का अधीक्षण व नियंत्रण करे |

इस प्रकार यह अधिनियम दो कारणों से महत्वपूर्ण था –

  • भारत में कंपनी के अधीन क्षेत्रों को पहली बार ब्रिटिश अधिपत्य का क्षेत्र कहा गया
  • ब्रिटिश सरकार को भारत में कंपनी के कार्यों और इसके प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण प्रदान किया गया |

1793 का राजपत्र

कम्पनी के कार्यों एवं संगठन में सुधार के लिए यह चार्टर पारित किया गया। इस चार्टर की प्रमुख विशेषता यह थी कि इसमें पूर्व के अधिनियमों के सभी महत्वपूर्ण प्रावधानों को शामिल किया गया था।  इस अधिनियम की प्रमुख विशेषताएं निम्न थी-

  • कम्पनी के व्यापारिक अधिकारों को अगले 20 वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया।
  • विगत शासकों के व्यक्तिगत नियमों के स्थान पर ब्रिटिश भारत में लिखित विधि-विधानों द्वारा प्रशासन की आधारशिला रखी गयी।
  • इन लिखित विधियों एवं नियमों की व्याख्या न्यायालय द्वारा किया जाना निर्धारित की गयी।
  • गवर्नर जनरल एवं गवर्नरों की परिषदों की सदस्यता की योग्यता के लिए सदस्य को कम-से-कम 12 वर्षों तक भारत में रहने का अनुभव को आवश्यक कर दिया गया।
  • नियंत्रक मंडल के सदस्यों का वेतन अब भारतीय कोष से दिया जाना तय हुआ।

1813 ई. का चार्टर अधिनियम:

अधिनियम की विशेषताएं

  • कंपनी के अधिकार-पत्र को 20 सालों के लिए बढ़ा दिया गया
  • कंपनी के भारत के साथ व्यापार करने के एकाधिकार को छीन लिया गया।लेकिन उसे चीन के साथ व्यापर और पूर्वी देशों के साथ चाय के व्यापार के संबंध में 20 सालों के लिए एकाधिकार प्राप्त रहा
  • कुछ सीमाओं के अधीन सभी ब्रिटिश नागरिकों के लिए भारत के साथ व्यापार खोल दिया गया
  • ईसाई मिशनरियों को भारत में धर्म प्रचार की अनुमति दी गयी।

1833 ई. का चार्टर अधिनियम:

ब्रिटिश भारत के केन्द्रीयकरण की दिशा में यह अधिनियम निर्णायक कदम था | अधिनियम की विशेषताएं

  • कंपनी के व्यापारिक अधिकार पूर्णतः समाप्त कर दिए गए
  • अब कंपनी का कार्य ब्रिटिश सरकार की ओर से मात्र भारत का शासन करना रह गया
  • बंगाल के गवर्नर जरनल को भारत का गवर्नर जनरल कहा जाने लगा
  • जिसमे सभी नागरिक और सैन्य शक्तियां निहित थी |
  • विधि के संहिताकरण के लिए आयोग के गठन का प्रावधान किया गया।इस अधिनियम द्वारा भारत में केन्द्रीकरण का प्रारंभ किया गया, जिसका सबसे प्रबल प्रमाण विधियों को संहिताबद्ध करने के लिए एक आयोग का गठन था। इस आयोग का प्रथम अध्यक्ष लॉर्ड मैकाले नियुक्त किया गया।
  • भारत में दास-प्रथा को गैर-कानूनी घोषित किया गया। फलस्वरूप 1843 में भारत में दास-प्रथा की समाप्ति की घोषणा हुई।

इस प्रकार इस अधिनियम में एक ऐसी सरकार का निर्माण किया जिसका ब्रिटिश कब्जे वाले संपूर्ण भारतीय क्षेत्र पर पूर्ण नियंत्रण हो | लार्ड विलियम बैंटिक भारत के पहले गवर्नर जनरल थे | इसने मद्रास और बम्बई के गवर्नरों को विधायिका संबंधी शक्ति से वंचित कर दिया |

भारत के गवर्नर जनरल को पूरे ब्रिटिश भारत में विधायिका के असीमित अधिकार प्रदान कर दिए गए | इसके अन्तर्गत पहले बनाए गए कानूनों को नियामक कानून कहा गया और नए कानून के तहत बने कानूनों को एक्ट या अधिनियम कहा गया | भारतीय कानूनों का वर्गीकरण किया गया तथा इस कार्य के लिए विधि आयोग की नियुक्ति की व्यवस्था की गई।

1853 का राजपत्र

1853 का राजपत्र भारतीय शासन (ब्रिटिश कालीन) के इतिहास में अंतिम चार्टर एक्ट था।  यह अधिनियम मुख्यतः भारतीयों की ओर से कम्पनी के शासन की समाप्ति की मांग तथा तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी की रिपोर्ट पर आधारित था।

इसकी प्रमुख विशेषताएं निम्न थी-
  • ब्रिटिश संसद को किसी भी समय कम्पनी के भारतीय शासन को समाप्त करने का अधिकार प्रदान किया गया।
  • कार्यकारिणी परिषद के कानून सदस्य को परिषद का पूर्ण सदस्य का दर्जा प्रदान किया गया।
  • बंगाल के लिए पृथक गवर्नर की नियुक्ति की व्यवस्था की गयी।
  • गवर्नर जनरल को अपनी परिषद के उपाध्यक्ष की नियुक्ति का अधिकार दिया गया।
  • विधायी कार्यों को प्रशासनिक कार्यों से पृथक करने की व्यवस्था की गयी।
  • निदेशक मंडल में सदस्यों की संख्या 24 से घटाकर 18 कर दी गयी।
  • कम्पनी के कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए प्रतियोगी परीक्षा की व्यवस्था की गयी।
  • भारतीय विधि आयोग की रिपोर्ट पर विचार करने के लिए इंग्लैंड में विधि आयोग के गठन का प्रावधान किया गया।

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September 19, 2020

British Power बंगाल में ब्रिटिश शक्ति की स्थापना

बंगाल में ब्रिटिश शक्ति की स्थापना

बंगाल

मुगलकालीन बंगाल में आधुनिक पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश, बिहार और उड़ीसा शामिल थे। बंगाल में डच, अंग्रेज व फ्रांसीसियों ने व्यापारिक कोठीयां स्थापित की थी जिनमें हुगली सर्वाधिक महत्वपूर्ण थी। 1651 ईस्वी में शाहशुजा से अनुमति लेकर इस इंडिया कंपनी ने बंगाल में हुगली में अपने प्रथम कारखाने की स्थापना की।

1670-17०० ईसवी के बीच बंगाल में अनधिकृत अंग्रेज व्यापारियों जिन्हें इंटरलाॅपर्स कहा जाता था,ने कंपनी नियंत्रण से मुक्त होकर व्यापार किया जो अंग्रेज और मुगलों के बीच संघर्ष का कारण बना।

जॉब चारनाक नामक एक अंग्रेज ने कालिकाता, गोविंदपुर और सूतानाती को मिलाकर आधुनिक कलकत्ता की नींव डाली। कोलकाता में 1700 ई. में फोर्ट विलियम की स्थापना की गई। फोर्ट विलियम का प्रथम गवर्नर चार्ल्स आयर को बनाया गया। इसी समय बंगाल को मद्रास से स्वतंत्र कर अलग प्रेसीडेंसी बना दिया गया।

बंगाल के नवाब

मुर्शीद कुली खां (1717 ई. से 1727 ई.)

बंगाल प्रांत, मुग़ल कालीन भारत का सबसे समृद्ध प्रांत था। औरंगजेब ने मुर्शीद कुली खाँ को बंगाल का दीवान नियुक्त किया था, लेकिन 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुग़ल साम्राज्य की कमजोरी का लाभ उठाकर 1717 ई. में इसने स्वयं स्वतंत्र घोषित कर दिया।

1717 ई. में मुग़ल सम्राट फर्रूखसियर ने एक फरमान द्वारा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल में व्यापार करने की रियायत दे दीं। इस फरमान द्वारा बंगाल में 3000 रु. वार्षिक कर अदा करने पर कंपनी को उसके समस्त व्यापार में सीमा शुल्क से मुक्त कर दिया गया। साथ ही कोलकाता के आसपास के 38 गांवों को खरीदने का अधिकार मिल गया।

फरूखसियर का यह फरमान अंग्रेजो के लिए तो मील का पत्थर साबित हुआ लेकिन बंगाल के नवाबों के लिए यह सिरदर्द बन गया।

अंग्रेजो ने इस विशेषाधिकार का दुरुपयोग शुरु किया, तो मुर्शीद कुली खाँ ने इसका विरोध किया। मुर्शीद कुली खाँ ने फरूखसियर द्वारा दिए गए फरमान का बंगाल में स्वतंत्र प्रयोग नियंत्रित करने का प्रयत्न किया। मुर्शीद कुली खाँ ने बंगाल की राजधानी को ढाका से मुर्शिदाबाद स्थानांतरित किया।

1726 ई. में मुर्शीद कुली खाँ की मृत्यु के बाद उसके दामाद शुजाउद्दीन ने 1727 से 1739 तक बंगाल पर शासन किया। 1739 में शुजाउद्दीन की मृत्यु के बाद सरफराज खां ने सत्ता हथिया ली।

अलीवर्दी_खां

अलीवर्दी खां, सरफराज खां को गिरिया के युद्ध में पराजित कर 1740 में बंगाल का नवाब बना।

अली वर्दी खां ने यूरोपियों की तुलना मधुमक्खियों से की थी

और कहा था यदि उन्हें छेड़ा न जाए तो वे शहद देंगी और यदि छेड़ा जाए तो वे काट-काट कर मार डालेंगी।

सिराजु द्दौला

सिराजुद्दौला के शासनकाल में बंगाल अंग्रेजों और फ्रांसीसियों की आपसी प्रतिद्वंदिता के कारण अशांत था।

फरूखसियर द्वारा प्रदान किये विशेष अधिकार फरमान का, कम्पनी के कर्मचारियों द्वारा दुरूपयोग से सिराजुद्दौला अंग्रेजों से नाराज था। इसके अतिरिक्त अंग्रेजों और फ्रांसीसियों ने बंगाल में स्थान-स्थान पर किलेबंदी शुरू कर दी थी।

सिराजुद्दौला ने अंग्रेजो और फ्रांसीसियों को तत्काल किलेबंदी रोकने का आदेश दिया।

फ्रांसीसियों ने तो नवाब का आदेश मानकर किलेबंदी का काम रोक दिया किन्तु अंग्रेजो ने ऐसा नहीं किया। परिणामस्वरूप सिराजुद्दौला ने कासिम बाजार स्थित अंग्रेजो के किले पर आक्रमण कर उन्हें आत्मसमर्पण के लिए बाध्य किया।

20 जून, 1756 को फोर्ट विलियम ने आत्मसमर्पण कर दिया कुछ शहर छोड कर फुल्टा द्वीप भाग गए। कहा जाता है कि 146 अंग्रेजों को 18 फुट लंबे तथा 14 फुट 10 इंच चौड़े एक कमरे मेँ बंद कर दिया गया था, जिसमें से सिर्फ 23 अंग्रेज ही बच पाए थे। जून, 1756 में घटी यह घटना इतिहास में ब्लैक होल के नाम से विख्यात है।

जनवरी 1757 में राबर्ट क्लाइव और एडमिरल वाटसन ने कोलकाता पर पुनः अधिकार कर लिया। फरवरी 1757 में अंग्रेजो और सिराजुद्दौला के बीच कोलकाता में एक संधि हुई, जिसे अलीनगर की संधि के नाम से जाना जाता है। इस संधि द्वारा अंग्रेजो ने बंगाल में किलेबंदी और सिक्के ढालने की अनुमति प्राप्त की। अलीनगर की संधि द्वारा अंग्रेज और आक्रामक हो गए।

मार्च 1757 में अंग्रेजो ने फ़्रांसिसी क्षेत्र चंद्रनगर पर कब्जा कर लिया। अंग्रेजो ने सिराजुद्दौला के विरुद्ध एक षड्यंत्र रचा जिसमें सिराजुद्दौला के सेनापति मीरजाफर को बंगाल का नवाब बनाने का आश्वासन देकर शामिल किया गया था। अंग्रेजो की गतिविधियो से नाराज होकर सिराजुद्दौला युद्ध की तैयारी करने लगा।

23 जून 1757 को अंग्रेजो और सिराजुद्दौला की सेनाओं के बीच प्लासी नामक स्थान पर एक भीषण युद्ध हुआ, जिसमें सिराजुद्दौला की हार हुई।प्लासी के युद्ध में सिराजुद्दौला की सेना का नेतृत्व मीर जाफर, लतीफ खां, राय दुर्लभ, मीर मदान और मोहन लाल कर रहे थे।

इसमें मीरजाफर और राय दुर्लभ अंग्रेजो से मिले हुए थे। प्लासी के युद्ध में सिराजुद्दौला को बंदी बनाकर बाद में गोली मार दी गई।

मीर जाफर (1757 ई. से 1760 ई.)

प्लासी के युद्ध में विजय के बाद अंग्रेजो ने मीरजाफर को बंगाल का नवाब बनाया। नवाब बनने के बाद मीर जाफर ने पुरस्कार स्वरूप अंग्रेजो को 24 परगना की जमींदारी प्रदान की। साथ ही कंपनी को बंगाल, बिहार, और उड़ीसा में मुक्त व्यापार करने का अधिकार प्रदान किया।

कालांतर में मीर जाफर के अंग्रेजो से संबंध खराब हो गए। इसका कारण प्रशासनिक कार्यों में अंग्रेजो का बढ़ता हस्तक्षेप था। अंग्रेजों की लूटपाट से तंग आकर मीर जाफर ने अक्टूबर 1760 में अपने दामाद मीर कासिम के पक्ष में सिंहासन त्याग दिया।

मीर कासिम (1760 ई. से 1763 ई.)

मीर कासिम ने नवाब बनने के बाद अंग्रेजो को मिदनापुर, बर्दवान तथा चटगांव के तीन जिले सौंप दिए। मीर कासिम ने राजधानी को मुर्शिदाबाद से मुंगेर स्थानांतरित कर दिया। फरुखसियर के 1717 के फरमान के अनुसार कंपनी को पारगमन शुल्क से मुक्त कर दिया गया था। इस तरह की छूट कंपनी के कर्मचारियों के लिए नहीँ थी।

कंपनी के कर्मचारियों द्वारा इस फरमान का दुरुपयोग किया जा रहा था। मीर कासिम ने क्रुद्ध होकर भारतीय व्यापारियों के लिए भी चुंगी समाप्त कर दी। 1763 में मीर कासिम और अंग्रेजो के बीच कई युद्ध हुए, जिसमें अंततः पराजित हुआ और भाग गया।

मीर जाफर (1763 ई. से 1765 ई.)

मीर कासिम के बाद एक बार फिर मीरजाफर बंगाल के सिंहासन पर बैठा। मीर जाफर ने अंग्रेजो की सेना के रखरखाव के लिए बर्दवान, मिदनापुर और चटगांव प्रदान किए तथा बंगाल में उन्मुक्त व्यापार का अधिकार दिया।

1764 में मीरजाफर ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला और मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय को मिलाकर बक्सर नामक स्थान पर अंग्रेजो से युद्ध किया इस युद्ध में अंग्रेजो की विजय हुई।

बक्सर के युद्ध के बाद बंगाल के गवर्नर लार्ड क्लाइव ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला तथा मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय के साथ इलाहाबाद की संधि की। इलाहाबाद की संधि द्वारा मुग़ल सम्राट को कड़ा और इलाहाबाद का क्षेत्र मिला। मुग़ल सम्राट ने कंपनी को बंगाल बिहार की दीवानी का अधिकार दिया।

कंपनी ने उसके बदले 26 लाख रूपये मुग़ल सम्राट को देना स्वीकार किया। शुजाउद्दौला द्वारा कंपनी को युद्ध हर्जाने के रुप में 50 लाख रुपए चुकाने के बाद उसके क्षेत्र पर अधिकार कर लिया गया।

5 फरवरी 1765 को मीर जाफर की मृत्यु के बाद उसके पुत्र नाजीमुद्दौला को बंगाल के नवाब बनाया गया।

द्वैध शासन (1765 ई. से 1772 ई.)

अंग्रेजों ने बंगाल में 1765 में द्वैध शासन की शुरुआत की, जो लगभग 1772 ई. तक चला। लियो कार्टिस को द्वैध शासन का जनक माना जाता है। द्वैध शासन के समय बंगाल से 1760-67 के बीच 2,24,67,500 रुपए की वसूली की गई।

इससे पूर्व राजस्व की वसूली मात्र 80 लाख थी। शासन के समय बंगाल में 1770 ई. में भयंकर अकाल पड़ा, जिसमें करीब एक करोड़ लोगों की भुखमरी के कारण मृत्यु हो गई। 1772 ई. में कोर्ट डायरेक्टर्स ने बंगाल में द्वैध शासन प्रणाली को समाप्त करके प्रशासन का उत्तरदायित्व अपने अधिकार में लेने का आदेश जारी किया।

बंगाल का अंतिम नवाब मुबारक उद्दौला (1770 से 1775) था।

स्मरणीय तथ्य

  • बंगाल में अंग्रेजी व्यापार की मुख्य वस्तुएं थीं – रेशम, सूती कपड़े, शोरा और चीनी।
  • 1757 में कलकत्ता को जीतने के बाद सिराजुद्दौला ने उसका नाम अलीनगर रख दिया था।
  • 1765-1772 तक बंगाल में चले द्वैध शासन को बंगाल के गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स ने समाप्त किया।
  • द्वैध शासन के समय कंपनी ने दीवानी कार्यों के लिए राजा सिताब राय को बिहार तथा मोहम्मद रजा खाँ को बंगाल का नवाब दीवान नियुक्त किया।
  • प्लासी के युद्ध में अंग्रेजो का सेनापति क्लाइव तथा नवाब का सेनापति मीरजाफर थे।
  • फरवरी 1760 में क्लाइव कुछ महीने के लिए गवर्नर का दायित्व हॉलवेल को सौंप कर इंग्लैण्ड वापस चला गया।
  •  हॉलवेल ने मीरजाफर को पदच्युत करने की योजना बनाई।
  • अल्फ्रेड लायल के अनुसार, “प्लासी में क्लाइव की सफलता ने बंगाल में युद्ध तथा राजनीति का एक अत्यंत विस्तृत क्षेत्र अंग्रेजों के लिए खोल दिया।“
  • मुर्शिदाबाद में मीर जाफर को कर्नल क्लाइव का गीदड़ कहा जाता था।
  • मीर जाफर के काल में ‘अंग्रेजो ने बांटो और राज करो’ की नीति को जन्म देते हुए एक गुट को दूसरे गुट से लड़ाने की शुरुआत की।
  • बक्सर के युद्ध में अंग्रेजी सेना का नेतृत्व हेक्टर मुनरो ने किया।
  • पी. ई. रोबर्ट्स ने बक्सर के युद्ध के बारे में कहा था कि, “प्लासी की अपेक्षा बक्सर को भारत में अंग्रेजी प्रभुता की जन्मभूमि मानना कहीं उपयुक्त है।”

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August 16, 2020

सुभाष चंद बोस Subhash Chandra Bose

सुभाष चंद बोस

सन् 1933 से लेकर 1936 तक सुभाष यूरोप में रहे। यूरोप में सुभाष ने अपनी सेहत का ख्याल रखते हुए अपना कार्य बदस्तूर जारी रखा। वहाँ वे इटली के नेता मुसोलिनी से मिले, जिन्होंने उन्हें भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में सहायता करने का वचन दिया। आयरलैंड के नेता डी वलेरा सुभाष के अच्छे दोस्त बन गये। जिन दिनों सुभाष यूरोप में थे

सुभाष चंद बोस

उन्हीं दिनों जवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू का ऑस्ट्रिया में निधन हो गया। सुभाष ने वहाँ जाकर जवाहरलाल नेहरू को सान्त्वना दी।जर्मनी में प्रवास एवं हिटलर से मुलाकात बर्लिन में सुभाष सर्वप्रथम रिबेन ट्रोप जैसे जर्मनी के अन्य नेताओं से मिले। उन्होंने जर्मनी में भारतीय स्वतन्त्रता संगठन और आज़ाद हिन्द रेडियो.की स्थापना की। इसी दौरान सुभाष नेताजी के नाम से जाने जाने लगे।

द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने के बाद सरकार ने सुभाष चंद्र बोस को कलकत्ता में नजरबंद कर लिया। 17 जनवरी 1941 को सुभाष चंद्र बोस कलकत्ता से गायब हो गए तथा काबुल होते हुए रूस पहुचे।

सुभाष चंद्र बोस कोलकाता से एक मौलवी के भेष में गोमेह पहुंचे गोमेह से एक बीमा एजेंट के रूप में पेशावर पहुंचे पेशावर से जिउद्दीइन पठान के नाम से काबुल पहुंचे काबुल से वे ओरलोण्डो मैसोट्टा नामक इटालियन नाम से पासपोर्ट लेकर रूस पहुचे।

काबुल से मास्को व बर्लिन की यात्रा किसी इटालियन पासपोर्ट पर की। रूस पर जून 1941 में जर्मनी ने आक्रमण कर दिया तो रूस मित्र राष्ट्रों में शामिल हो गया इसलिए सुभाष चंद्र बोस को रूस से जर्मनी जाना पड़ा। जर्मनी में बॉस नर हिटलर से मुलाकात कर भारतीय आजादी की लड़ाई में हिटलर से सहयोग मांगा।

जर्मन सरकार के एक मन्त्री एडॅम फॉन ट्रॉट सुभाष के अच्छे दोस्त बन गये। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सन 1942 में भारत को अंग्रेजों के कब्जे से स्वतन्त्र कराने के लिये आजाद हिन्द फौज या इन्डियन नेशनल आर्मी(INA) नामक सशस्त्र सेना का संगठन किया गया।

जर्मनी में ही भारतीयों द्वारा सुभाष चंद्र बोस को नेताजी की उपाधि दी गई। जर्मनी में सुभाष चंद्र बॉस ने फ्री इंडिया सेंटर की स्थापना की जहां पहली बार सुभाष चंद्र बोस ने जय हिंद का नारा दिया।

जून 1943 में रास बिहारी बोस की अध्यक्षता में इंडियन इंडिपेंडेंस लीग का बैंकॉक में एक सम्मेलन बुलाया गया जिसमें सुभाष चंद्र बोस को लेकर आजाद हिंद फौज का नेतृत्व सौंपने का निर्णय लिया गया।

4 जुलाई 1945 को रास बिहारी बोस ने सिंगापुर में आजाद हिंद फौज की कमान सुभाष चंद्र बोस को सौंप दी सुभाष चंद्र बोस आजाद हिंद फौज के सेनापति बने इस समय सुभाष चंद्र बोस ने दिल्ली चलो का नारा दिया।

सिंगापुर में ही सुभाष चंद्र बोस ने 21 अक्टूबर 1943 को स्वतंत्र भारत की अस्थाई सरकार का गठन किया सिंगापुर के अलावा रंगून में भी अस्थाई सरकार का मुख्यालय बनाया गया जापान और जर्मनी सहित धुरी राष्ट्रों ने अस्थाई सरकार को मान्यता दी। जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप इस अस्थायी सरकार को दे दिये। सुभाष उन द्वीपों में गये और उनका नया नामकरण किया।

इस अस्थाई सरकार में h c चटर्जी वित्त मंत्री m a अय्यर प्रचार मंत्री तथा लक्ष्मी स्वामीनाथन महिलाओं की मंत्री थी। मलेशिया में सैनिकों से आह्वान करते हुए बोस ने कहा तुम मुझे खून दो में तुम्हे आजादी दूंगा।

21 मार्च 1944 को ‘चलो दिल्ली’ के नारे के साथ आज़ाद हिंद फौज का हिन्दुस्थान की धरती पर आगमन हुआ।

1944 को आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा आक्रमण किया और कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त भी करा लिया कोहिमा का युद्ध 4 अप्रैल 1944 से 22 जून 1944 तक लड़ा गया एक भयंकर युद्ध था। इस युद्ध में जापानी सेना को पीछे हटना पड़ा था और यही एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ।

इसकी संरचना रासबिहारी बोस ने जापान की सहायता से टोकियो में की 6 जुलाई 1944 को बोस ने आजाद हिन्द रेडियो के प्रसारण द्वारा महात्मा गांधी से भारतीय स्वतंत्रता के अंतिम युद्ध के लिए आशिर्वाद मांगा। इसी प्रसारण में बोस ने ग़ांधी जी के लिए पहली बार राष्ट्रपिता शब्द संबोधन किया। आज़ाद हिन्द फौज़ द्वारा लड़ी जा रही इस निर्णायक लड़ाई की जीत के लिये उनकी शुभकामनाएँ माँगीं।

जवाहर लाल नेहरू ने बोस को भारतीय देशभक्ति की ज्वलंत तलवार कहा। 18 अगस्ट 1945 को बोस की ताइवान के ताइकु हवाई अड्डे पर हवाई दुर्घटना में मृत्यु हो गयी।

उपलब्धियां–

  • सुभाष चंद बोस ने‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा’ और ‘जय हिन्द’ जैसे प्रसिद्द नारे दिए,
  • भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा पास की,
  • 1938 और 1939 में कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए,
  • 1939 में फॉरवर्ड ब्लाक का गठन किया,

अंग्रेजों को देश से निकालने के लिए ‘आजाद हिन्द फ़ौज’ की स्थापना की सुभाष चंद बोस को ‘नेता जी’ भी बुलाया जाता है। वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रख्यात नेता थे| हालाँकि देश की आज़ादी में योगदान का ज्यादा श्रेय महात्मा गाँधी और नेहरु को दिया जाता है  मगर सुभाष चंद बोस का योगदान भी किसी से कम नहीं था|

स्वतन्त्रता –

 आन्दोलन में भाग ले रहे महान नेताओं को छोड़ कर केवल _सुभाष -बाबू को ही यह खिताब दिया गया था और वह इसके सच्चे अधिकारी भी थे जनता _सुभाष बाबू की तकरीरें सुनने क़े लिये बेकरार रहती थी उनका एक-एक शब्द गूढ़ अर्थ लिये होता था

जब उन्होंने कहा”तुम मुझे खून दो ,मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा” तब साधारण जनता की तो बात ही नहीं ब्रिटिश फ़ौज में अपने परिवार का पालन करने हेतु शामिल हुए वीर सैनिकों ने भी उनके आह्वान पर सरकारी फ़ौज छोड़ कर नेताजी का साथ दिया था

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