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Medieval History

May 20, 2020

मुगलकालीन साहित्य, चित्रकला व संगीत के बारे में पूरी जानकारी

मुगलकालीन साहित्य

आइए जानते हैं सबसे पहले मुगलकालीन साहित्य के बारे में जो कि निम्न शासको के काल में साहित्य की रचना हुई जो कि निम्न प्रकार से है

1. बाबर

  • बाबर ने तुर्की भाषा में अपनी आत्मकथा तुजुक- ए – बाबरी लिखी थी !
  • एलफिनसटन ने इसे मध्य एशिया में लिखी गई इतिहास की सबसे प्रमाणित पुस्तक माना है !
  • मुगल काल में इसका चार बार तुर्की से फारसी में अनुवाद किया गया !
  • इसके फारसी अनुवाद को बाबरनामा कहते हैं !
  • हुमायूं के समय जैन खा व पायदा खा ने अकबर के समय अब्दुल रहीम खान-ए-खाना तथा शाहजहां के समय मीर अंबु तालिब तुरवीती ने इसका अनुवाद किया था !
  • लीउन एरीस्टन व किग ने फारसी से अंग्रेजी में अनुवाद किया तथा श्रीमती चार्ल्स बेबरीज ने इसका तुर्की से अंग्रेजी में अनुवाद किया !
  • इसी को अंग्रेजी का सबसे प्रमाणित अनुवाद मानते हैं !
  • बाबर की कविताओं के संग्रह को दीवान का जाता है !
  • बाबर ने पद्य शैली में इस्लाम के कानून लिखे हैं इस शैली को मुबइयान कहा जाता है !
  • बाबर के द्वारा अपने अधिकारियों वह शासको को भेजे गए पत्र व प्राप्त पत्रों के संग्रह को रिसाल-ए-उसज या खत-ए-बाबरी कहते हैं !

2. हुमायूं

  • हुमायूं के समय दवादा मीर ने कानून-ए-हुमायूंनी की रचना की !
  • इसमें हुमायूं का खगोल, ज्योतिष वह संगीत के प्रति लगाव बताया गया है !

3. अकबर

मुगलकालीन साहित्य

  • अकबर के समय हुमायूं के नौकर जोहर आफताबची ने तारीख-ए-हुमायूं की रचना की, इसे तजकिरात-उल-बाकियात भी कहते हैं !
  • हुमायूं की बहन गुलबदन बेगम ने हुमायूंनामा की रचना की परंतु यह दोनों पुस्तकें हुमायूं के निजी जीवन पर लिखी गई हैं !
  • अकबर के शासन काल में लिखित प्रथम ऐतिहासिक पुस्तक अलाऊदोला कजविनी की नफाइस उल मआसिर है !
  • अबुल फजल : – अबुल फजल अकबर के समय सरकारी इतिहासकार के पद पर था !
  • इसने अकबरनामा की रचना की जिस के कुल 3 भाग हैं तीसरे भाग को आइन-ए-अकबरी कहते हैं इसके भी कुल 5 भाग है !
  • इनायत उल्लाह :- 1602 से 1605 तक इनायत उल्लाह सरकारी इतिहासकार के पद पर रहा जिसने लकमील -ए-अकबरनामा की रचना की !
  • बदायूंनी ने मुतखत-उत-तवारीख की रचना की ! इसमें हल्दीघाटी युद्ध का उल्लेख किया गया है !
  • मिर्जा रोशन दौलगत ने तारीख-ए-रसीदो की रचना की है !
  • मोहसीन फनी ने दाविस्तान-ए -महाजिब की रचना की इसमें इबादतखाने में हुए वाद विवादो को लिखा गया है !

मुगलकाल में धर्म से संबंधित साहित्यकार

  • हिंदू धर्म से – पुरुषोत्तम व देवी
  • ईसाई धर्म से – मोसरोल, एक्वाबीव
  • जैन धर्म से – जिनचंद्र सूरी, हीर विजय सूरी
  • पारसी धर्म से – दस्तूर जी मेंहर राणा
  • राजस्थान से निर्गुण संप्रदाय के संत दादू दयाल जी ने भाग लिया !

आइए देखते हैं अकबर के शासन काल में और कौन-कौन से साहित्य लिखे गए गए हैं

  • अकबर के शासन काल में लिखित एकमात्र पुस्तक के मीर निजामुद्दीन अहमद की तवकात-ए-अकबरी है !
  • अबुल फजल के भाई फैजी को अकबर ने अनुवाद विभाग का अध्यक्ष बनाया ! फैजी की पुस्तक का नाम अकबरनामा था !
  • अबुल फजल ने पंचतंत्र का अरबी और फारसी भाषा में अनुवाद किया था !
  • इसके फारसी अनुवाद को अनवर-ए-सुहली अरबी अनुवाद को कलीला-दमन या अयार-ए-दानिश कहते हैं
  • गिजाली को अकबर के समय का श्रेष्ठ कवि माना गया इसने मसनवी नल एवं दमयत की रचना की
  • अकबर ने मुल्ला हुसैन कश्मीर को जरी कलम की उपाधि प्रदान की !

4. जहांगीर

  • जहांगीर ने अपनी आत्मकथा जहांगीरनामा लिखी इसके आरंभिक 16 सालों का इतिहास जहांगीर ने स्वयं अपने हाथों से लिखा और अगले 3 सालों का इतिहास मोतमिद खा ने लिखा !

5. शाहजहां

  • शाहजहां के द्वारा आमीन कजविनी को अपना इतिहासकार बनाया जिसने बादशाहनामा पुस्तक लिखना शुरू किया परंतु शाहजहां ने कजवीनी के स्थान अब्दुल हमीद लाहोरी को इतिहासकार नियुक्त किया !
  • इसी के द्वारा बादशाहनामा आदिशेष भाग का लेखन कार्य किया गया !
  • पंडित जगन्नाथ ने गंगाधर व गंगालहरी नामक पुस्तक लिखी !
  • शाहजहां के बेटे दाराशिकोह ने 52 उपनिषदों का सिर -ए-अकबर के नाम से फारसी में अनुवाद किया
  • दाराशिकोह ने मजम – उल- बहरीन (दो समुंदरों का संगम) नामक पुस्तक लिखी है !
  • इसके अलावा सकीनत – उल-ओलिया ने विभिन्न सूफी संतों की जीवनी लिखी है !
  • सकीनत उल औलिया ने कादरी संप्रदाय के संतों की जीवनी लिखी है !
  • शाहजहां की पुत्री जहांआरा ने साहिंबिया नामक पुस्तक लिखी है !
  • इसमें कादरी संप्रदाय के संत मुल्ला शाह की जीवनी लिखी थी !

6. औरंगजेब

  • औरंगजेब ने मिर्जा मुहम्मद कासिम को सरकारी इतिहासकार बनाया !
  • इसने आलमगीरनामा नामक पुस्तक लिखना शुरू की परंतु बाद में औरंगजेब ने सरकारी इतिहास के लेख पर प्रतिबंध लगा दिया !
  • फिर भी औरंगजेब के समय का इतिहास हाशिम मुंनतव उल लुबान पुस्तक में लिखा है परंतु औरंगजेब के डर के कारण इसे छिपा कर रखा गया
  • मुहम्मद शाह रंगीला (1719-1748) के समय से मुहम्मद शाह को दिया गया
  • मुहम्मद शाह ने हाशिम को खाफी खा की उपाधि प्रदान की !
  • पंडित भीमसेन ने नुस्खा -ए- दिलकुशा नामक पुस्तक लिखी जिसमें औरंगजेब को मराठों के विरुद्ध किए गए अभियानों को लिखा गया !
  • ईश्वरदास नागर ने फुतूहात-ए-आलमगीर नामक पुस्तक लिखी है !
  • इसने औरंगजेब का मेवाड़ के शासक राजसिंह व मारवाड़ के शासक अजीत सिंह के साथ संबंधों को लिखा है !
  • मिर्जा मोहम्मद साकी ने महासिरे आलमगिरी नामक पुस्तक लिखी है जिसे डॉक्टर जदुनाथ सरकार ने मुगल काल साहित्य का गिजेटीयर कहां है !
  • औरंगजेब की पुत्री जेब्लूनिस्सा ने दीवान ए मरूफी की रचना की है

मुगलकालीन चित्रकला

आइए मुगलकालीन चित्रकला के बारे में जानते हैं जो कि निम्न शासकों के काल में निम्न चित्रकला विकसित हुई है जो कि निम्न प्रकार से है !

1. बाबर

  • बाबर ने अपनी आत्मकथा तुजुक ए बाबरी में विहजाद नामक चित्रकार का उल्लेख किया गया है जिसे पूर्व का राफेल कहा गया है है !

2. हुमायूं

  • हुमायूं ने अपना निर्वासन कॉल ईरान के शासक तहमास्प के पास व्यतीत किया था !
  • ईरान से भारत लौटते समय हुमायूं दो चित्रकारों मीर सैयद अली वह अब्दुल समद को अपने साथ भारत ले आया !
  • इन दोनों ने हुमायूं के पास दास्तान -ए -अमीर हमज़ा या हमजनामा नामक ग्रंथ चित्रित करना शुरू किया !
  • अलाऊदोला कजवीनी ने अपनी पुस्तक नफाइस उल – मआसिर ने हम्ज़नामा को हुमायूं के मस्तिष्क की उपज का है ! परंतु हुमायूं जब भारत का शासक बना तथा उसके 6 महीने के बाद मृत्यु हो गई !

3. अकबर

  • हम्ज़नामा का अधिकांश चित्रण अकबर के शासनकाल में हुआ इसमें पैगंबर मोहम्मद के चाचा हमजा की अरब देशों में प्रचलित वीरता की कथाओं को कपड़ों पर चित्रित किया गया है !
  • 100 चित्रों के 12 खंडों सहित कुल 1200 चित्र बनाए गए !
  • हमजनमा मीर सैयद अली के निर्देशन में बनकर पूर्ण हुई !
  • अब्दुस समद को अकबर ने टकसाल का अधिकारी व मुल्तान का दीवान नियुक्त किया था !
  • अब्दुस समद ने चावल के दाने पर चौगान खेलते हुए व्यक्ति का चित्र बनाया था इसलिए अकबर ने अब्दुस समद को शीरी कलम की उपाधि प्रदान की थी !
  • अकबर के समय महाभारत को रज्जनामा के नाम से चित्रित किया गया !
  • रज्जनामा का शाब्दिक अर्थ- युद्धों की पुस्तक होता है !
  • फारुख बेग को छोड़कर अकबर के समकालीन सभी चित्रकारों ने रज्जनामा के चित्र बनाएं !
  • दसवंत अकबर के समय का उभरता हुआ चित्रकार था ! इसके चित्र केवल रज्जनामा में मिले बाद में दसवंत ने मानसिक रूप से विक्षिप्त होकर आत्महत्या कर ली !
  • रज्जनामा अब्दुस समद के के पुत्र मोहम्मद शरीफ के निर्देशन में बनकर पूर्ण हुई !
  • बसावन अकबर के समय का सर्वश्रेष्ठ चित्रकार माना गया है !
  • बसावन भूदृश्य, व्यंग चित्रकारी वछवि चित्रकारी में निपुण था ! एक क्रशकाय घोड़े के साथ जंगल में भटकते हुए मजनू का चित्र बसावन का सर्वश्रेष्ठ चित्र है !
  • अकबर चित्रकला को देवी देवताओं की कृपा प्राप्त करने का माध्यम मानता था !
  • अकबर के समय फारूक बेग ने कपड़े की बजाए कागज पर चित्रकारी को प्रारंभ किया था !
  • मिशकिन यूरोपीय शैली से प्रभावित चित्रकार था !
  • अकबर का कथन था” मैं ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को हेय की दृष्टि से देखता हूं जो चित्रकारी से घृणा करते हैं

4. जहांगीर

  • जहांगीर के समय के काल को मुगल चित्रकला का स्वर्ण काल कहा जाता है !
  • अकबर के समय ईरान से आये आका – रिजा- खा ने जहांगीर के समय आगरा में एक चित्रशाला की स्थापना की !
  • जहांगीर के समय से ही चित्रकारों को उस्ताद कहा जाने लगा !
  • उस्ताद मंसूर पशु पक्षियों की चित्रकारी में निपुण था इसे जहांगीर ने नादिर- उल- अस्त्र (संसार में आदित्य) की उपाधि प्रदान की !
  • इसके बनाए गए चित्रों में साइबेरियन सारस वह बंगाल के अनोखा पुष्प का चित्र प्रसिद्ध है !
  • अब्दुल हसन व्यक्तियों की छवि चित्रकारी में निपुणता इसे जहांगीर ने नादिर – उल – जमा (संसार में अतुल्य) की उपाधि प्रदान की ! यह व्यक्ति छवि चित्रकारी में निपुण था !
  • इसने ईसाई संत जान पाल व जहांगीरनामा मुखपृष्ठ भाग का चित्र बनाया था जिसमें जहांगीर का आगरा में हुआ राज्य अभिषेक है !
  • फारुख बेग ने बीजापुर के सुल्तान आदिल शाह का चित्र बनाया था !
  • फारुख बेग के शिष्य दौलत ने अपने साथी चित्रकारों गोवर्धन , विशन दास, अबुल हसन व अपने स्वयं का चित्र बनाया !
  • जहांगीर ने विशनदास को ईरान के राज परिवार का चित्र बनाने भेजा था !
  • जहांगीर ने अपनी आत्मकथा बसावन के पुत्र मनोहर के नाम का उल्लेख नहीं किया है !
  • पर्सी ब्राउन ने लिखा है ” जहांगीर की मृत्यु के साथ ही मुगल काल की चित्रकला का पतन हो गया !

5. शाहजहां

  • शाहजहां के समय चित्रों में आभामंडल बनने लगे !
  • साहिबा शाहजहां के समय की एक महिला चित्रकार थी !

6. औरंगजेब

  • औरंगजेब ने चित्रकला को प्रतिबंधित कर दिया था !

मुगलकालीन संगीत

आइए दोस्तों मुगलकालीन संगीत के बारे में जानते हैं जो कि निम्न प्रकार से –

1. बाबर

  • बाबर ने तुजुक -ए- बाबरी में लिखा है – दिनभर युद्धाभ्यास में व्यस्त होने के बाद भी दिन का एक पहर संगीत के लिए अवश्य निकालना चाहिए !

2. हुमायूं

  • हुमायूं का संगीत के प्रति लगाव” कानून- ए -हुमायूंनी नामक पुस्तक में लिखा गया है !

3. अकबर

  • अकबर के समय ध्रुवपद गायक कि 4 शेलिया प्रचलन थी !
  • गौरहागिरी
  • खंडारी
  • अंगूरी
  • नौहारी
  • इनका विकास ग्वालियर के शासक के मानसिंह तोमर के दरबार में हुआ था !
  • तानसेन अकबर के समय का प्रमुख संगीतकार था इसका वास्तविक नाम रामतनु पांडे था !
  • तानसेन पहले रीवा के शासक के रामचंद्र राव (मध्य प्रदेश ) के दरबार में कार्य करते थे !
  • अकबर ने तानसेन को रामचंद्र राव से मांगा था !
  • तानसेन सारंगी वादन में निपुण था जो दोपहर से शाम तक किया जाता था !
  • अबुल फजल ने लिखा है कि तानसेन जैसा गायक पिछले 1000 वर्षों में भी पैदा नहीं हुआ है !
  • अबुल फजल ने मालवा के शासक के बाज बहादुर को हिंदी गायन शैली का श्रेष्ठ संगीतकार कहां है !
  • बैजू बावरा अकबर के समकालीन था लेकिन कभी भी अकबर के दरबार में उपस्थित नहीं हुआ ! स्वयं अकबर इसका संगीत सुनने के लिए वृंदावन गया !
  • बैजू बावरा ने कहा था कि मेरा संगीत मेरे ईश्वर का है !

4. जहांगीर

  • जहांगीर के समय तानसेन का पुत्र विलास खा श्रेष्ठ संगीतकार था !
  • जहांगीर ने गजल गायक शैली को आनंद खां की उपाधि प्रदान की !

5. शाहजहां

  • शाहजहां के समय विलास खा का दामाद लाल खा श्रेष्ठ संगीतकार था जिसे शाहजहां ने गुण समुंद्र की उपाधि प्रदान की !

6. औरंगजेब

  • औरंगजेब ने संगीत कला पर भी प्रतिबंध लगा दिया फिर भी संगीत शास्त्र की सर्वा पुस्तकें औरंगजेब के समय से ही लिखी गई !
  • संगीतकारों के द्वारा वाद्य यंत्रों का जनाजा निकाला गया तक औरंगजेब ने कहा कि इन्हें इतनी गहराई में दफन कर दो ताकि इनका शोर बार सुनाई ना दे
  • खाफी खा ने औरंगजेब को कुशल वीणा वादक कहा !
  • मनूची ने लिखा कि प्रतिबंध के बावजूद राजमहल में राजकुमारियों की संगीत शिक्षा का अच्छा प्रबंध किया गया था !
  • मोहम्मद शाह रंगीला :- मोहम्मद शाह रंगीला के समय सुखरो खा ने तबले का अविष्कार किया था !

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May 6, 2020

शिवाजी का इतिहास Chhatrapati Shivaji Maharaj History

शिवाजी का इतिहास

शिवाजी भोंसले उर्फ़ छत्रपति शिवाजी महाराज एक भारतीय शासक और मराठा साम्राज्य के संस्थापक थे।

शिवाजी ने आदिलशाही सल्तनत की अधीनता स्वीकार ना करते हुए उनसे कई लड़ाईयां की थी।

शिवाजी को हिन्दूओं का नायक भी माना जाता है। शिवाजी महाराज एक बहादुर, बुद्धिमान और निडर शासक थे।

धार्मिक कार्य में उनकी काफी रूचि थी। रामायण और महाभारत का अभ्यास वह बड़े ध्यान से करते थे।

वर्ष 1674 में शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ और उन्हें छत्रपति का ख़िताब मिला।

आइये उनके जीवनी के बारे में विस्तार से पढ़ते हैं-

शिवाजी महाराज का प्रारंभिक जीवन

शिवाजी का इतिहासशिवाजी का इतिहास

शिवाजी महाराज का जन्म 19 फ़रवरी 1630 में शिवनेरी दुर्ग में हुआ था।

इनके पिता का नाम शाहजी भोसलें और माता का नाम जीजाबाई था।

शिवनेरी दुर्ग पुणे के पास है। उनकी माता ने उनका नाम भगवान शिवाय के नाम पर शिवाजी रखा।

उनकी माता भगवान शिवाय से स्वस्थ सन्तान के लिए प्रार्थना किया करती थी।

शिवाजी के पिताजी शाहजी भोंसले एक मराठा सेनापति थे,

जो कि डेक्कन सल्तनत के लिए कार्य किया करते थे।

शिवाजी के जन्म के समय डेक्कन की सत्ता तीन इस्लामिक सल्तनतों बीजापुर, अहमदनगर और गोलकोंडा में थी।

शिवाजी अपनी माँ जीजाबाई के प्रति बेहद समर्पित थे। उनकी माँ बहुत ही धार्मिक थी।

उनकी माता शिवाजी को बचपन से ही युद्ध की कहानियां तथा उस युग की घटनाओं के बारे में बताती रहती थीं,

खासकर उनकी माँ उन्हें रामायण और महाभारत की प्रमुख कहानियाँ सुनाती थीं।

जिन्हें सुनकर शिवाजी के ऊपर बहुत ही गहरा असर पड़ा था।

इन दो ग्रंथो की वजह से वो जीवनपर्यन्त हिन्दू महत्वो का बचाव करते रहे। इसी दौरान शाहजी ने दूसरा विवाह किया

और अपनी दुसरी पत्नी तुकाबाई के साथ कर्नाटक में आदिलशाह की तरफ से सैन्य अभियानो के लिए चले गए।

उन्होंने शिवाजी और जीजाबाई को दादोजी कोंणदेव के पास छोड़ दिया।

दादोजी ने शिवाजी को बुनियादी लड़ाई तकनीकों के बारे में जैसे कि- घुड़सवारी, तलवारबाजी और निशानेबाजी सिखाई।

विवाह

शिवाजी महाराज का विवाह 14 मई 1640 में सईबाई निम्बलाकर के साथ लाल महल, पूना (पुणे) में हुआ था।

शिवाजी महाराज का आदिलशाही साम्राज्य पर आक्रमण

शिवाजी महाराज ने वर्ष 1645 में, आदिलशाह सेना को बिना सूचित किए कोंड़ना किला पर हमला कर दिया।

इसके बाद आदिलशाह सेना ने शिवाजी के पिता शाहजी को गिरफ्तार कर लिया। आदिलशाह सेना ने यह मांग रखी

कि वह उनके पिता को तबरिहा करेगा जब वह कोंड़ना का किला छोड़ देंगे।

उनके पिता की रिहाई के बाद 1645 में शाहजी की मृत्यु हो गई।

पिता की मृत्यु के बाद शिवाजी ने फिर से आक्रमण करना शुरू कर दिया।

1

वर्ष 1659 में, आदिलशाह ने अपने सबसे बहादुर सेनापति अफज़ल खान को शिवाजी को मारने के लिए भेजा।

शिवाजी और अफज़ल खान 10 नवम्बर 1659 को प्रतापगढ़ के किले के पास एक झोपड़ी में मिले।

दोनों के बीच एक शर्त रखी गई कि वह दोनों अपने साथ केवल एक ही तलवार लाए गए। शिवाजी को अफज़ल खान पर भरोसा नही था

और इसलिए शिवाजी ने अपने कपड़ो के नीचे कवच डाला और अपनी दाई भुजा पर बाघ नख (Tiger’s Claw) रखा और अफज़ल खान से मिलने चले गए।

अफज़ल खान ने शिवाजी के ऊपर वार किया लेकिन अपने कवच की वजह से वह बच गए, और फिर शिवाजी ने अपने बाघ नख (Tiger’s Claw) से अफज़ल खान पर हमला कर दिया।

हमला इतना घातक था कि अफज़ल खान बुरी तरह से घायल हो गया, और उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद शिवाजी के सैनिकों ने बीजापुर पर आक्रमण कर दिया।

शिवाजी ने 10 नवम्बर 1659 को प्रतापगढ़ के युद्ध में बीजापुर की सेना को हरा दिया।

शिवाजी की सेना ने लगातार आक्रमण करना शुरू कर दिया।

शिवाजी की सेना ने बीजापुर के 3000 सैनिक मार दिए, और अफज़ल खान के दो पुत्रों को गिरफ्तार कर लिया।

शिवाजी ने बड़ी संख्या में हथियारों ,घोड़ों,और दुसरे सैन्य सामानों को अपने अधीन कर लिया।

इससे शिवाजी की सेना और ज्यादा मजबूत हो गई,

और मुगल बादशाह औरंगजेब ने इसे मुगल साम्राज्य का सबसे बड़ा खतरा समझा।

शिवाजी महाराज का मुगलों से पहला मुकाबला

मुगलों के शासक औरंगजेब का ध्यान उत्तर भारत के बाद दक्षिण भारत की तरफ गया। उसे शिवाजी के बारे में पहले से ही मालूम था।

औरंगजेब ने दक्षिण भारत में अपने मामा शाइस्ता खान को सूबेदार बना दिया था।

शाइस्ता खान अपने 150,000 सैनिकों को लेकर पुणे पहुँच गया और उसने वहां लूटपाट शुरू कर दी।

शिवाजी ने अपने 350 मावलो के साथ उनपर हमला कर दिया था, तब शाइस्ता खान अपनी जान बचाकर भाग खड़ा हुआ

और शाइस्ता खान को इस हमले में अपनी 3 उँगलियाँ गंवानी पड़ी। इस हमले में शिवाजी महाराज ने शाइस्ता खान के पुत्र और उनके 40 सैनिकों का वध कर दिया।

शाइस्ता खान ने पुणे से बाहर मुगल सेना के पास जा कर शरण ली और

औरंगजेब ने शर्मिंदगी के मारे शाइस्ता खान को दक्षिण भारत से हटाकर बंगाल का सूबेदार बना दिया।

जब हुई सूरत में लूट

इस जीत के बाद शिवाजी की शक्ति और ज्यादा मजबूत हो गई थी।

लेकिन कुछ समय बाद शाइस्ता खान ने अपने 15,000 सैनिकों के साथ मिलकर  शिवाजी के कई क्षेत्रो को जला कर तबाह कर दिया,

बाद में शिवाजी ने इस तबाही का बदला लेने के लिए मुगलों के क्षेत्रों में जाकर लूटपाट शुरू कर दी।

सूरत उस समय हिन्दू मुसलमानों का हज पर जाने का एक प्रवेश द्वार था।

शिवाजी ने 4 हजार सैनिकों के साथ सूरत के व्यापारियों को लूटने का आदेश दिया

लेकिन शिवाजी ने किसी भी आम आदमी को अपनी लूट का शिकार नहीं बनाया।

शिवाजी को आगरा में आमन्त्रित करना-औरबंदी बनाना

शिवाजी महाराज को आगरा बुलाया गया जहां उन्हें लागा कि उनको उचित सम्मान नहीं दिया गया है।

इसके खिलाफ उन्होंने अपना रोष दरबार पर निकाला और औरंगजेब पर छल का आरोप लगाया।

औरंगजेब ने शिवाजी को कैद कर लिया और शिवाजी पर 500 सैनिकों का पहरा लगा दिया।

हालांकि उनके आग्रह करने पर उनकी स्वास्थ्य की दुआ करने वाले आगरा के संत, फकीरों और मन्दिरों में प्रतिदिन मिठाइयाँ और उपहार भेजने की अनुमति दे दी गई थी। कुछ दिनों तक यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहा।

एक दिन शिवाजी ने संभाजी को मिठाइयों की टोकरी में बैठकर और खुद मिठाई की टोकरी उठाने वाले मजदूर बनकर वहा से भाग गए।

इसके बाद शिवाजी ने खुद को और संभाजी को मुगलों से बचाने के लिए संभाजी की मौत की अफवाह फैला दी।

इसके बाद संभाजी को मथुरा में एक ब्राह्मण के यहाँ छोड़ कर शिवाजी महाराज बनारस चले गए। औरंगजेब ने जयसिंह पर शक करके उसकी हत्या विष देकर करवा डाली।

जसवंत सिंह ( शिवाजी का मित्र) के द्वारा पहल करने के बाद सन् 1668 में शिवाजी ने मुगलों के साथ दूसरी बार सन्धि की।

औरंगजेब ने शिवाजी को राजा की मान्यता दी। शिवाजी के पुत्र संभाजी को 5000 की मनसबदारी मिली और शिवाजी को पूना, चाकन और सूपा का जिला लौटा दिया गया

, लेकिन, सिंहगढ़ और पुरन्दर पर मुग़लों का अधिपत्य बना रहा।

सन् 1670 में सूरत नगर को दूसरी बार शिवाजी ने लूटा, नगर से 132 लाख की सम्पत्ति शिवाजी के हाथ लगी

और लौटते वक्त शिवाजी ने एक बार फिर मुगल सेना को सूरत में हराया।

शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक

सन 1674 तक शिवाजी के सम्राज्य का अच्छा खासा विस्तार हो चूका था।

पश्चिमी महाराष्ट्र में स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के बाद शिवाजी ने अपना राज्याभिषेक करना चाहा,

परन्तु ब्राहमणों ने उनका घोर विरोध किया।

क्योंकि शिवाजी क्षत्रिय नहीं थे उन्होंने कहा की क्षत्रियता का प्रमाण लाओ तभी वह राज्याभिषेक करेगा।

बालाजी राव जी ने शिवाजी का सम्बन्ध मेवाड़ के सिसोदिया वंश से समबंद्ध के प्रमाण भेजे

जिससे संतुष्ट होकर वह रायगढ़ आया और उन्होंने राज्याभिषेक किया।

राज्याभिषेक के बाद भी पुणे के ब्राह्मणों ने शिवाजी को राजा मानने से इनकार कर दिया। इसके बाद शिवाजी ने अष्टप्रधान मंडल की स्थापना कि।

विभिन्न राज्यों के दूतों, प्रतिनिधियों के अलावा विदेशी व्यापारियों को भी इस समारोह में आमंत्रित किया गया।

इस समारोह में लगभग रायगढ़ के 5000 लोग इकट्ठा हुए थे।

शिवाजी को छत्रपति का खिताब दिया गया। उनके राज्याभिषेक के 12 दिन बाद ही उनकी माता का देहांत हो गया।

इस कारण फिर से 4 अक्टूबर 1674 को दूसरी बार उनका राज्याभिषेक हुआ।

दो बार हुए इस समारोह में लगभग 50 लाख रुपये खर्च हुए।

इस समारोह में हिन्दू स्वराज की स्थापना का उद्घोष किया गया था।

शिवाजी महाराज ने दिया संस्कृत को बढ़ावा

शिवाजी के परिवार में संस्कृत का ज्ञान अच्छा था और संस्कृत भाषा को बढ़ावा दिया गया था। शिवाजी ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अपने किलों के नाम संस्कृत में रखे जैसे कि- सिंधुदुर्ग, प्रचंडगढ़, तथा सुवर्णदुर्ग।

उनके राजपुरोहित केशव पंडित स्वंय एक संस्कृत के कवि तथा शास्त्री थे।

उन्होंने दरबार के कई पुराने कायदों को पुनर्जीवित किया

एवं शासकिय कार्यों में मराठी तथा संस्कृत भाषा के प्रयोग को बढ़ावा दिया।

शिवाजी महाराज के धार्मिक कार्य

शिवाजी एक कट्टर हिन्दू थे, वह सभी धर्मों का सम्मान करते थे। उनके राज्य में मुसलमानों को धार्मिक स्वतंत्रता थी।

शिवाजी ने कई मस्जिदों के निर्माण के लिए दान भी दिए था।

हिन्दू पण्डितों की तरह मुसलमान सन्तों और फ़कीरों को बराबर का सम्मान प्राप्त था।

उनकी सेना में कई मुस्लिम सैनिक भी थे।

शिवाजी हिन्दू संकृति का प्रचार किया करते थे। वह अक्सर दशहरा पर अपने अभियानों का आरम्भ किया करते थे।

शिवाजी महाराज की नौसेना

उनके पास एक विशाल नौसेना (Navy) भी थी।

जिसके प्रमुख मयंक भंडारी थे। शिवाजी ने अनुशासित सेना तथा सुस्थापित प्रशासनिक संगठनों की मदद से एक निपुण तथा प्रगतिशील सभ्य शासन स्थापित किया।

उन्होंने सैन्य रणनीति में नवीन तरीके अपनाएं जिसमें दुश्मनों पर अचानक आक्रमण करना जैसे तरीके शामिल थे।

शिवाजी महाराज का प्रशासनिक कौशल

शिवाजी को एक सम्राट के रूप में जाना जाता है। उनको बचपन में कुछ खास शिक्षा नहीं मिली थी,

लेकिन वह फिर भी भारतीय इतिहास और राजनीति से अच्छी तरह से परिचत थे।

शिवाजी ने प्रशासकीय कार्यों में मदद के लिए आठ मंत्रियों का एक मंडल तैयार किया था,

जिसे अष्टप्रधान कहा जाता था।ईसमें मंत्रियों प्रधान को पेशवा कहते थे,

राजा के बाद सबसे ज्यादा महत्व पेशवा का होता था। अमात्य वित्त मंत्री और राजस्व के कार्यों को देखता था,

और मंत्री राजा के दैनिक कार्यों का लेखा जोखा रखता था। सचिव दफ्तरी काम किया करता था। सुमन्त विदेश मंत्री होता था

जो सारे बाहर के काम किया करता था। सेनापति सेना का प्रधान होता था।

पण्डितराव दान और धार्मिक कार्य किया करता था। न्यायाधीश कानूनी मामलों की देखरेख करता था।

मराठा साम्राज्य उस समय तीन या चार विभागों में बटा हुआ था। प्रत्येक प्रान्त में एक सूबेदार था जिसे प्रान्तपति कहा जाता था।

हरेक सूबेदार के पास एक अष्टप्रधान समिति होती थी।

न्यायव्यवस्था प्राचीन प्रणाली पर आधारित थी। शुक्राचार्य, कौटिल्य और हिन्दू धर्मशास्त्रों को आधार मानकर निर्णय दिया जाता था।

गाँव के पटेल फौजदारी मुकदमों की जाँच करते थे। राज्य की आय का साधन भूमिकर था

, सरदेशमुखी से भी राजस्व वसूला जाता था। पड़ोसी राज्यों की सुरक्षा की गारंटी के लिए वसूले जाने वाला सरदेशमुखी कर था।

शिवाजी अपने आपको मराठों का सरदेशमुख कहा करते थे और इसी हैसियत से सरदेशमुखी कर वसूला जाता था।

शिवाजी महाराज के बारे में एक पुस्तक “गनिमी कावा” लिखी गई है,

जिसमें उनके शत्रु पर अचानक से आक्रमण करने के कई किस्से हैं।

शिवाजी महाराज का सिक्का 

एक स्वतंत्र शासक की तरह उन्होंने अपने नाम का सिक्का चलवाया।

जिसे “शिवराई” कहते थे, और यह सिक्का संस्कृत भाषा में था।

संस्कृत: “प्रतिपच्चंद्रलेखेव वर्धिष्णुर्विश्ववंदिता शाहसुनोः शिवस्यैषा मुद्रा भद्राय राजते”

शिवाजी महाराज की मृत्यु

3 अप्रैल, 1680 में लगातार तीन सप्ताह तक बीमार रहने के बाद यह वीर हिन्दू सम्राट सदा के लिए इतिहासों में अमर हो गया,

और उस समय उनकी आयु 50 वर्ष थी। शिवाजी महाराज एक वीर पुरुष थे,

जिन्होंने अपना पूरा जीवन मराठा, हिन्दू साम्राज्य के लिए समर्पित कर दिया। मराठा इतिहास में सबसे पहला नाम शिवाजी का ही आता है।

आज महाराष्ट्र में ही नहीं पूरे देश में वीर शिवाजीमहाराज की जयंती बड़े ही धूम-धाम के साथ मनाई जाती है।

शिवाजीमहाराज की जयंती

शिवाजीमहाराज की जयंती हर वर्ष 15 मार्च को मनाई जाती

शिवाजी का इतिहास शिवाजी का इतिहास शिवाजी का इतिहास शिवाजी का इतिहास

http://शिवाजी का इतिहास

May 2, 2020

गुलाम वंश के बारे में पूरी जानकारी भाग – 3

आप ने अभी तक भाग 1 और 2 पढ़ लिया होगा यदि नहीं पढ़ा तो पहले उसे पढ़े धन्यवाद अब आगेhttp://www.goldenclasses.com/%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%AE-%E0%A4%B5%E0%A4%82%E0%A4%B6-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97-2/

रुकनुद्दीन फिरोज शाह

इल्तुतमिश के बाद रुकनुद्दीन शासक बना इसका शासन केवल 8 महीनों तक रहा इसके काल में शासन के समस्त अधिकार

इसकी मां शाह तुरकान के हाथों में थे इसके काल में दिल्ली में अव्यवस्था की स्थिति हो गई

रजिया-सुल्तान 1236-40

रजिया दिल्ली सल्तनत की पहली और अंतिम महिला शासिका थी।

इन्होंने पर्दा प्रथा को त्याग कर दरबार में कोट व टोपी पहनकर शासन किया।

रजिया में बदायूं के इक्तेदार एतगिंन को अमीर-एहाजिब दरबारी

शिष्टाचार से संबंधित अधिकारी होता था।

रजिया सुल्तान के द्वारा एबिसिनिया के जलालुद्दीन याकूत को अमीर ए आखुर का पद दिया गया ।

अमीर ए आखुर साही अश्वशाला का प्रधान होता था तुर्क ए चहल गानी के सदस्यों ने रजिया का विरोध किया।

और बहराम शाह ने रजिया को पराजित कर दिया और बहराम शाह ने रजिया को पराजित कर दिया।

हरियाणा के कैथल नामक स्थान पर रजिया सुल्तान की मृत्यु हो गई

एलीफिंटन ने लिखा है कि रजिया यदि महिला नहीं होती तो रजिया का नाम हिंदुस्तान के श्रेष्ठ शासकों में लिया जाता

मोइजुद्दीन बहराम शाह 1240-42

इसके काल में नायब ए ममलात नामक पद का सृजन किया गया और यह पद सर्वप्रथम एतगिन को प्रदान किया।

गया नायब ए ममलात से तात्पर्य है संपूर्ण अधिकारों का स्वामी अब सत्ता के 3 केंद्र हो गए

1 सुल्तान

2 नायब

3 वजीर

बहराम शाह के काल में मंगोल आक्रमण हुए जिसमें बहराम शाह पराजित हुआ।

बलबन बहराम शाह के काल में अमीर ए हाजिब के पद पर नियुक्त हुआ और अपनी शक्तियों में वृद्धि करने लगा।

बहराम शाह के बाद अलाउद्दीन मसूद शाह शासक बना बलवंन इसके काल में अमीर ए हाजीब के पद पर था।

मसूद साह के काल में बलबन ने अपनी शक्तियों में तेजी से वृद्धि करने लगा।

नसीरुद्दीन महमूद के काल में बलवंन नायब ए मम लात के पद पर पहुंचा था।

इस समय शासन के सभी अधिकार बलवंन के हाथों में थे

इब्नबतूता के अनुसार वलवन नै नासिरूद्दीन को जहर दे दिया

गुलाम वंश रजिया-सुल्तानकी फोटो http://गुलाम-वंश-के-बारे-में-पूरी

बलबन 1265-1287

बलवंन रक्त व लोगों की नीति का पालन करता था बलबन ने स्वयं को अफरासियाब वंश से संबंधित बताया था।

बलबन नए जिले ए इलाई व नियति खुदाई की उपाधि ली थी

बलबन मैं अपने विरोधियों का दमन करने हेतु रक्त और लोहे की नीति का पालन किया था।

गयासुद्दीन बलबन ने तुर्क ए चहल गानी का दमन करके दीवान ए अर्ज नामक सैन्य विभाग का गठन किया था

बलबन की मृत्यु के बारे में बर्नी ने लिखा है।

कि बलबन की मृत्यु पर 40 दिनों का शोक मनाया गया।

बलबन के बाद केकू बाद वह क्यो मर्श शासक बने

May 1, 2020

गुलाम वंश इल्तुतमिश के बारे में पूरी जानकारी भाग – 2

भाग 1 के लिए यहां क्लिक करे इल्तुतमिश के बारे में जाने

इल्तुतमिश 1210-1236

कुतुबुद्दीन ऐबक के बाद आराम साहब दिल्ली सल्तनत का शासक बना आराम साहा व इल्तुतमिश के मध्य जुद की लड़ाई हुई इस युद्ध में आराम साहब पराजित हुए

इल्तुतमिश को दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।

इल्तुतमिश ने दिल्ली को अपनी राजधानी के रूप में स्थापित किया

इसका अर्थ है साम्राज्य का स्वामी

इल्तुतमिश के द्वारा सुल्तान ए आजम की उपाधि ली गई इल्तुत मिश के द्वारा 1229 में बगदाद के खलीफा मुतसिर बिल्लाह से सनद प्राप्त किया गया

और इल्तुतमिश दिल्ली सल्तनत का वैधानिक सुल्तान बना

इल्तुतमिश के द्वारा शुद्ध अरबी के सिक्के प्रचलित कराए गए

जिसमें चांदी का टका वह तांबे का जीतल प्रमुख था

इल्तुत मिश के द्वारा ग्वालियर विजय के बाद अपने सिक्कों पर

रजिया का नाम को उत्कृण कराया गया

इल्तुतमिश दिल्ली सल्तनत इल्तुतमिश दिल्ली सल्तनत http://गुलाम-वंश-भाग-2

इक्ता

यह अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है

भूमि का क्षेत्र इल्तुत मिश के द्वारा इक्ता व्यवस्था की शुरुआत की गई

इक्ता वह राजस्व क्षेत्र था जो सैनिकों व अमीरों को प्रदान किया जाता थ

इक्ता के अधिकारी बलि मुक्ति कहलाते थे

तुर्क ए चहलगानी क्या होता है?

यह 40 तुर्क सरदारों का दल था जिसकी स्थापना इल्तुत मिश के द्वारा की गई बलवंन के काल में इस तुर्क ए चहलगानी का दमन कर दिया गया

1221 में ख्वारिज्म के शासक जलालुद्दीन मांगबरनी ने इल्तुत मिश से सैनिक सहायता की मांग की इल्तुत-मिश ने सहायता देने से इनकार कर दिया

क्योंकि सहायता करने पर चंगेज खान का आक्रमण दिल्ली पर हो सकता था

सुल्तान गढ़ी का मकबरा

इल्तुत मिश के द्वारा दिल्ली में अपने पुत्र नसीरुद्दीन महमूद के सम्मान में सुल्तान गढ़ी के मकबरे का निर्माण कराया गया

भारत में प्रथम मकबरा निर्मित कराने का श्रेय इल्तुत मिश को दिया जाता है

मदरसा ए मुंइजी

दिल्ली में मोहम्मद गौरी के सम्मान में इसका निर्माण कराया गया प्राथमिक शिक्षा के केंद्र मकतब कहलाते थे

तथा उच्च शिक्षा के केंद्र मदरसा कहलाते थे

भाग 1 देखने के लिए यहां पर Click करे

April 30, 2020

ग़ुलाम वंश में कुतुबुद्दीन ऐबक के बारे में पूरी जानकारी भाग – 1

1 कुतुबुद्दीन ऐबक 1206-1210

दिल्ली सल्तनत ग़ुलाम वंश के शासकों के लिए मामलुक शब्द का प्रयोग किया गया है

मामलुक से तात्पर्य ऐसे गुलाम शासक जो स्वतंत्र माता-पिता से उत्पन्न हुए दिल्ली सल्तनत ग़ुलाम वंश का संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक को माना जाता है

ऐबक तुर्की भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है चंद्रमा का देवता

उपाधि (Tital)

1 क़ुरान खावा

2 लाख बख्श

3 पिल बख्श

ऐबक ने लाहौर को अपनी राजधानी के रूप में स्थापित किया था ऐबक के द्वारा सुल्तान की उपाधि नहीं ली गई उसके स्थान पर मलिक व सिपहसालार की उपाधि ली गई ऐबक ने हसन निजामी तथा फक्र ए मुदवीर नामक विद्वानों को शरण दी फक्र ए मुदवीर द्वारा आदाब उल हरब नामक पुस्तक और हसन निजामी के द्वारा ताज उल मासिर नामक पुस्तक की रचना की गई

कुतुबुद्दीन ऐबक के द्वारा ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के सम्मान मैं क़तुब मीनार का निर्माण कराया गया

इल्तुतमिश के काल में इसे पूरा बनवाया गया

कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली में पिथौरागढ़ के स्थान पर कूवत उल इस्लाम मस्जिद का निर्माण कराया इस्लामी शैली पर निर्मित यह पहली मस्जिद भारत में मानी जाती है कुतुबुद्दीन ऐबक के द्वारा सरस्वती कंठ भरण नामक संस्कृत पाठशाला के स्थान पर अराई दिन के झोपड़े का निर्माण कराया गया वर्तमान में यहां पंजाब शाह नामक पीर का ढाई दिन का उर्स आयोजित किया जाता हैआयोजित किया जाता है

ग़ुलाम वंश में कुतुबुद्दीन ऐबकग़ुलाम वंश में कुतुबुद्दीन ऐबक

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