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September 20, 2020

Sufi Movement सूफी आंदोलन क्या है??

सूफी आंदोलन

सूफी आंदोलन

जिस प्रकार मध्यकालीन भारत में हिन्दुओं में भक्ति-आन्दोलन प्रारम्भ हुआ, उसी प्रकार मुसलमानों में प्रेम-भक्ति के आधार पर सूफीवाद का उदय हुआ। सूफी शब्द की उत्पत्ति कहाँ से हुई, इस विषय पर विद्वानों में विभिन्न मत है।

कुछ विद्वानों का विचार है कि इस शब्द की उत्पत्ति सफा शब्द से हुई। सफा का अर्थ पवित्र है। मुसलमानों में जो सन्त पवित्रता और त्याग का जीवन बिताते थे, वे सूफी कहलाये। एक विचार यह भी है कि सूफी शब्द की उत्पत्ति सूफा से हुई, जिसका अर्थ है ऊन। मुहम्मद साहब के पश्चात् जो सन्त ऊनी कपड़े पहनकर अपने मत का प्रचार करते थे, वे सूफी कहलाये।

कुछ विद्वानों का विचार है कि सूफी शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द सोफिया से हुई, जिसका अर्थ ज्ञान है।

सूफी वे हैं जिनका संबंध इस्लाम की सादगीयता पवित्रता समानता और उदारता से हैं  सूफी में अल्लाह और संसार से जुड़ी मुख्य दो धाराएं हैं

  • एक वजूदिया धारा
  • दूसरी सउदिया

यह ठीक उसी प्रकार है जैसे हिंदू धर्म में अद्वैतवाद और द्वैतवाद थी, भारतीय परिपेक्ष में जो वजूदिया रहे अधिक उदार रहे उनका झुकाव रहस्यवाद की ओर अधिक रहा उनकी कट्टर इस्लाम के प्रति दूरी बनी रही इसलिए वह इस्लाम का प्रचार नहीं करते थे  सल्तनत काल के अधिकतर सूफी संत इसी विचारधारा के थे 

ठीक इसके विपरीत सऊदिया धारा रुढ़िवादी इस्लाम के अधिक करीब रही इसमें रहस्यवाद पर इतना जोर नहीं दिया गया जितना इस्लाम के प्रचार पर दिया गया

इसका प्रभाव भारत में 14वीं शताब्दी के बाद पढ़ना प्रारंभ हुआ और यह अपने प्रभाव में कभी-कभी शासन नीति को भी प्रभावित करती थी अर्थात 14वीं शताब्दी में किस धारा के लोग अधिक मजबूत रहे क्योंकि इस्लाम का वर्चस्व अधिक था ऐतिहासिक रूप से सूफी धारा का अस्तित्व 8 वीं से 11 वीं शताब्दी के मध्य रहा है यह धारा पश्चिम एशिया अथवा मध्य एशिया से उत्पन्न हुई मानी जाती है 

सूफी मत के विभिन्न सम्प्रदाय

  • सूफी मत आगे चलकर विभिन्न सिलसिलों (सम्प्रदायों) में विभाजित हो गया।
  • इन सम्प्रदायों की निश्चित संख्या के बारे में मतभेद है। इनकी संख्या 175 तक मानी जाती है।
  • अबुल फजल ने आइन में 14 सिलसिलों का उल्लेख किया है।
  • इन सम्प्रदायों में से भारत में प्रमुख रूप से चार सम्प्रदाय- चिश्ती, सुहारावर्दी, कादरी और नक्शबन्दी अधिक प्रसिद्ध हुए।

सूफियों के निवास स्थान ‘खानकाह कहलाते हैं  राज्य नियंत्रण से मुक्त आध्यात्मिक क्षेत्र को सूफी शब्दावली में ‘विलायत’ कहा गया है सूफी संत के उत्तराधिकारी को वलि कहते थे

सूफी सिलसिला दो वर्गों में विभाजित है

1⃣ बार शरा:- जो इस्लामी विधान शरा को मानते हैं
2⃣ बे शरा:- जोशरा को नहीं मानते हैं

महिला रहस्य वादी रबिया आठंवी सदी और मंसूर बिन हज्जज प्रारंभिक सूफी संत थे मसूर ने अपने को अन्हलक (मैं ईश्वर हूं) घोषित किया

सूफी सन्तों का जीवन और सिद्धान्त-

सूफी सन्त सादगी और पवित्रता का जीवन व्यतीत करते थे। उन्होंने स्वेच्छा से निर्धनता को स्वीकार किया। वे व्यक्तिगत सम्पत्ति को आत्मिक विकास के लिए बाधक समझते थे।

उनके निवास-स्थान आमतौर पर मिट्टी के बने होते थे। यद्यपि इन सन्तों में से अनेकों ने विवाह किया था, परन्तु उन्होंने सादगी का जीवन नहीं त्यागा था। सुल्तान की ओर से, इन संतों को पद और धन, दोनों देने का प्रस्ताव किया जाता था। ये सुल्तानों से अपने लिए कोई पदवी स्वीकार नहीं करते थे, न ही कोई वजीफा ही लेते थे।

जनता जो स्वेच्छा से इन्हें दान करती थी, उसी में ये गुजारा करते थे। कभी-कभी ये संत भूखो मरने लगते थे, परन्तु ऐसी स्थिति में भी राजा या अमीरों से धन की याचना नहीं करते थे।

शेख निजामुद्दीन औलिया के जीवन में कई मौके ऐसे आए जबकि उन्हें रात भर भूखा रहना पड़ा। ऐसे समय में वे कहा करते थे- अब हम खुदा के मेहमान है।

भौतिक इच्छाओं के दमन के लिए ये सन्त उपवास करते थे। उनके कपड़े साधारण होते थे। आमतौर पर उनके कपड़ों पर पैबन्द लगे होते थे, परन्तु ये फटे-पुराने कपड़े पहनकर गरीबी में रहना पसन्द करते थे।

सूफियों में चिश्ती सन्तों का ऐसा विश्वास था कि भावनाओं पर काबू रखना चाहिए। आचार-विचार शुद्ध रखने चाहिए। शेख फरीद सुबह उठकर नमाज पढ़ते थे तथा घण्टों ईश्वर के ध्यान में मौन रहते थे।

निजामुद्दीन औलिया के बारे कहा जाता है कि वे प्रात:काल उठकर नमाज पढ़ते थे और बाद में समाधि चले जाते थे। दोपहर को वे विश्राम करते थे। वे लोगों से मिलते थे और रात्रि के समय नमाज पढ़ते थे तथा ध्यानमग्न हो जाते थे।

सूफी सन्त मन की पवित्रता में विश्वास करते थे। उनका विश्वास था कि मुक्ति (निजाद) प्राप्त करने के लिए मनुष्य का मन बड़ा पवित्र होना चाहिए, क्योंकि ईश्वर शुद्ध मन में ही निवास करता है।

वे ईश्वर-प्राप्ति के अंह को मिटाना आवश्यक समझते थे, क्योंकि अहं रहते व्यक्ति ईश्वर के दर्शन के योग्य नहीं होता। चिश्ती सन्त उदार विचारों के थे। उनके कई रीति-रिवाज ऐसे थे जो हिन्दुओं से मिलते-जुलते थे। उनके प्रमुख सिद्धान्त थे- ईश्वर के प्रति प्रेम और मनुष्य की सेवा।

वे अद्वैतवाद के सिद्धान्त में विश्वास करते थे। इस कारण बहुत से हिन्दू उनके भक्त बन गये। इन सन्तों की सादगी और सरल रहन-सहन के ढंग ने हिन्दुओं को बड़ा प्रभावित किया।

ये सन्त मनुष्य की सेवा को सारी भक्ति से ऊँचा मानते थे। दु:खी, दरिद्रों की सेवा करना वे अपना परम कर्तव्य मानते थे। ये सन्त निजी सम्पत्ति में विश्वास नहीं करते थे और सम्पत्ति का रखना ईश्वर की प्राप्ति में बाधक समझते थे।

शेख कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी से सुल्तान इल्तुतमिश ने अपने महल के समीप ही रहने की प्रार्थना की थी। परन्तु शेख ने इसे स्वीकार नहीं किया। वे शहर के बाहर एक खानकाह में रहने लगे। इल्तुतमिश ने उन्हें शेख-उल-इस्लाम का उच्च पद देना चाहा, परन्तु शेख ने उसे भी अस्वीकार कर दिया।

तब सुल्तान ने इस बडे पद पर माजमुद्दीन सुगरा को नियुक्त किया जो शेख से ईर्ष्या करने लगा। इस पर शेख ने दिल्ली छोड़कर अजमेर जाने का निश्चय किया, परन्तु दिल्ली की जनता के अनुरोध पर उन्होंने अपना यह विचार त्याग दिया।

इसी प्रकार निजामुद्दीन औलिया ने दिल्ली के सुल्तानों के राज्य-काल देखे थे, परन्तु वे इनमें से किसी के भी दरबार में कभी नहीं गये। उन्होंने कुतुबुद्दीन मुबारक शाह के दरबार में उपस्थिति होने के आदेश को भी नहीं माना।

इन सूफी सन्तों ने इस्लाम की कट्टरता को दूर करके उसे उदार बनाने का प्रयत्न किया। इन्होंने हिन्दू और मुसलमानों के बीच की खाई को पाटने का प्रयत्न किया और दोनों धमों के बीच प्रेम और सहिष्णुता की भावना को जागृत किया।

इस प्रकार इन सूफी सन्तों ने समाज की महान् सेवा की।

प्रमुख सिलसिले व परिचय

सूफी अरबी भाषा का शब्द है। जिसका अर्थ चटाईफ है। जो चटाई पर कतार में बैठकर ईश्वर उपासना करते थे उन्हें सूफी संत कहा जाता था।व्यापक अर्थ में सूफी मुस्लिम विचारको, चिंतको का वह वर्ग था, जो सादा जीवन व्यतीत कर आत्म त्याग, परोपकार और तपस्या को प्रमुखता देते थे।

भारत में कुल 4 प्रमुख सिलसिले हैं-

1. चिश्ती सम्प्रदाय-

भारत में चिश्ती सम्प्रदाय सबसे अधिक लोकप्रिय और प्रसिद्ध हुआ। भारत में चिश्ती सम्प्रदाय की स्थापना मुईनुउद्दीन चिश्ती ने की। मुईनुद्दीन चिश्ती 1192 ई. में मुहम्मद गौरी के साथ भारत आये थे। इन्होंने अजमेर को चिश्ती सम्प्रदाय का केन्द्र बनाया। अजमेर से इन्होंने दिल्ली का भी भ्रमण किया।

मुईनुउद्दीन चिश्ती हिन्दू और मुसलमान दोनों में लोकप्रिय थे और दोनों धर्मों में इनके शिष्य थे। इनकी मृत्यु के पश्चात् इनके शिष्यों ने चिश्ती सम्प्रदाय के कार्य को आगे बढ़ाया।

चिश्ती सम्प्रदाय में मुईनउद्दीन चिश्ती के अतिरिक्त जो प्रमुख सन्त हुए, वे थे- ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी, ख्वाजा फरीदउद्दीन मसूद गंज-ए-शिकार, शेख निजामुद्दीन औलिया, शेख नसीर-उद्दीन चिराग-ए-दिल्ली, शेख अब्दुल हक, हजरत अशरफ जहाँगीर, शेख हुसम उद्दीन मानिक पुरी और हजरत गेसू दराज।

शेख मुईनुउद्दीन चिश्ती की अजमेर में समाधि आज भी तीर्थस्थल बना हुआ है, जहाँ प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में मुसलमान और हिन्दू एकत्र होते हैं।मुईनउद्दीन चिश्ती के प्रमुख शिष्य कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी ने चिश्ती सम्प्रदाय को और अधिक विस्तृत बनाया।

काकी सुल्तान इल्तुतमिश के समकालीन थे। इल्तुतमिश उनका बड़ा सम्मान करता था। उसने इन्हें शेख उल इस्लाम का उच्च पद देने का प्रस्ताव किया, परन्तु इन्होंने सुल्तान से किसी भी प्रकार का पद और सम्मान लेना स्वीकार नहीं किया।

काकी के उत्तराधिकारी ख्वाजा फरीद उद्दीन मसूद गंजे शिकार माया-मोह से कोसो दूर रहते थे। वह अत्यन्त सादगी और संयम का जीवन व्यतीत करते थे। 93 वर्ष की आयु में 1265 ई. में उनका देहान्त हो गया। निजामुद्दीन ओलिया बाबा फरीद के शिष्य थे। 

उनके कार्य को उनके प्रसिद्ध होनहार शिष्य निजामुद्दीन औलिया ने आगे बढ़ाया। शेख निजामुद्दीन औलिया ने अपने मत का केन्द्र दिल्ली को बनाया और बहुत अधिक प्रसिद्धि प्राप्त की। “महबूब ए इलाही” निजामुद्दीन ओलिया को कहा जाता था

शेख निजामुद्दीन औलिया ने सात सुल्तानों का शासन काल देखा था। वे किसी भी सुल्तान के दरबार में उपस्थित नहीं हुए। सुल्तान ग्यासुउद्दीन तुगलक उनकी लेाकप्रियता और उनके बढ़ते प्रभाव से ईर्ष्या करता था।

सुल्तान का पुत्र जूना खाँ (मुहम्मद तुगलक) भी उनका शिष्य बन गया था। महान् कवि और लेखक अमीर खुसरो औलिया के शिष्य थे। शेख निजामुउद्दीन औलिया के शिष्यों ने उनके कार्यों को आगे बढ़ाया और चिश्ती सम्प्रदाय ने भारत में बड़ी लोकप्रियता अर्जित की।

अन्य सूफी सम्प्रदायों की अपेक्षा चिश्ती सम्प्रदाय भारत में सबसे अधिक लोकप्रिय हुआ।

इसकी लोकप्रियता के निम्नलिखित कारण थे-

  • सूफी चिश्ती सन्तों ने अपने को जनसाधारण से जोड़ा। वे गरीबों, असहायों के सहायक थे। उन्होंने सांसारिक प्रलोभनों से अपने को बहुत दूर रखा। दिल्ली के सुल्तानों द्वारा प्रदान किये जाने वाले किसी भी पद, प्रलोभन को ठुकरा दिया। इस प्रकार वे दरिद्र के सबसे सच्चे हितैषी सिद्ध हुए।
  • सूफी चिश्ती सन्त आडम्बर से कोसों दूर थे। उन्होंने स्वेच्छा से निर्धनता को अपनाया।  वे घास-फूस की झोपडियों अथवा मिट्टी के मकानों में रहते थे। उनकी आवश्यकता बहुत सीमित थी। सादा जीवन उच्च विचार उनका आदर्श था।
  • उनके इस आदर्श त्यागमय जीवन का जनता पर सीधा प्रभाव पड़ा। सूफी सन्तों का जीवन, सीधा, सादा और नियमित था। जिन बातों का वे उपदेश करते थे, उन पर स्वयं भी अमल करते थे। ऐसे सन्तों के जीवन से जनता प्रेरणा लेती थी।

  • सूफी सन्तों ने धार्मिक आधार पर कोई भेद-भाव नहीं किया। उन्होंने भाईचारे की भावना पर जोर दिया। इनकी धार्मिक उदारता से हिन्दू भी प्रभावित हुए।
  • डॉ. निजामी के शब्दों में- चिश्तियों ने भारत में अपने सिलसिलों के विकास की प्रारम्भिक अवस्थाओं में हिन्दू प्रथाओं और रिवाजों को अपना लिया था। इस कारण हिन्दू और मुसलमान दोनों ही ने चिश्ती सन्तों से प्रेरणा और दिशा निर्देशन प्राप्त किया।
  • ख्वाजा मुईनुउद्दीन चिश्ती के एक हिन्दू शिष्य रामदेव भी थे। चिश्ती सन्तों ने अपने मत का प्रचार करने के लिए जन साधारण की भाषा का प्रयोग किया। इस कारण इनके उपदेशों का आम जनता पर सीधा प्रभाव पड़ा।

  • चिश्ती सन्तों ने अपने को इस्लाम की कट्टरता से दूर रखा। इस्लाम में संगीत का निषेध है, परन्तु सूफी सन्तों ने अपनी पूजा-अर्चना एवं प्रचार में संगीत का खुलकर प्रयोग किया।
  • चिश्ती सन्त व्यवहारिक थे। गृहस्थ जीवन में भी इन्होंने जनसाधारण को साधना का मार्ग दिखाने का प्रयास किया। ईश्वर प्राप्ति के लिए घर का त्याग आवश्यक नहीं है, इस बात का प्रचार करते हुए, इन सन्तों ने पलायनवादी दृष्टिकोण छोड़ने को कहा।
  • जनता के बीच में रहते हुए, उसकी तकलीफों का अनुभव करते हुए इन्होंने उसके कल्याण के लिए अपने प्रयास जारी रखे। चिश्ती सन्त भक्ति में लीन रहते थे।
  • शेख निजामुद्दीन औलिया के अनुसार ईश्वर भक्ति दो प्रकार की है- (1) लाजमी (2) मुताद्दी (प्रचारित)।
  • प्रथम के अन्तर्गत खुदा की इबादत, उपवास, हज इत्यादि आते हैं और दूसरी के अन्तर्गत गरीब दीन दुखियों और असहाय लोगों की सहायता।दरिद्र नारायण की सेवा ही ईश्वर भक्ति का दूसरा रूप है। अपने इस दृष्टिकोण के कारण ही चिश्ती सन्त जनता में लोकप्रिय हुए।

2. सुहरावर्दी सिलसिला –

शेख शहाबुद्दीन सुहरावर्दी इसके प्रवर्तक थे। उन्होंने अपने शिष्यों को भारत जाकर उनके उपदेशों, सिद्धान्तों का प्रचार करने की प्रेरणा दी।उनके शिष्यों ने भारत में अपना प्रचार केन्द्र सिन्ध को बनाया। शेख हमीदुद्दीन नागौरी तथा शेख बहाउद्दीन जकारिया ने इस सम्प्रदाय के विचारों का बड़ा प्रचार किया।

उन्होंने मुल्तान में अपनी खानकाह स्थापित की। जकारिया के पुत्र शर्दुद्दीन आरिफ उनके उत्तराधिकारी बने तथा उनके एक अन्य शिष्य सैयद जलालुद्दीन सुर्ख ने उच्छ में एक केन्द्र की स्थापना की।

सैयद जलालुउद्दीन के तीन पुत्र हुए- सैयद अहमद कबीर, सैयद वहाउद्दीन, सैयद मोहम्मद।

शेख शर्दउद्दीन के पुत्र शेख रुकुनुद्दीन ने सुहरावर्दी सिलसिले को काफी प्रसिद्धि अर्जित कराई। उनकी तुलना चिश्ती सन्त निजामुद्दीन औलिया से की जा सकती है।

सुहरावर्दी सम्प्रदाय के सन्तों का जीवन-

चिश्ती सन्तों के विपरीत सुहारावर्दी सन्त सम्पन्नता का जीवन बिताते थे। वे दिल्ली के सुल्तानों और अमीरों से दान प्राप्त करने में संकोच नहीं करते थे।

शेख वहाउद्दीन जकारिया ने बहुत दौलत एकत्र की। ये सन्त सरकारी पद भी प्राप्त करने में कोई शर्म महसूस नहीं करते थे। वे अपने शिष्यों से भी उपहार स्वीकार करते थे।

सुहरावर्दी सन्त लम्बे उपवासों और भूखे रहकर शरीर शुद्धि में यकीन नहीं करते थे। ये सन्त अपने समय की राजनीति में भी भाग लेते थे। इनकी खानकाह बड़ी होती थी और धन सम्पत्ति से परिपूर्ण होती थी।

इन खानकाहों को सुल्तान से धन और जागीरें प्राप्त होती थी। इससे इन सन्तों को नियमित आय प्राप्त होती थी।  इन खानकाहों में कई हॉल होते थे। इन खानकहों में कुछ भक्तजन स्थायी रूप से रहते थे और कुछ अस्थायी तौर पर आते जाते रहते थे।

यात्री भी इन खानकाहों में आकर रात के समय रह सकते थे। खानकाह धार्मिक गतिविधियों का केन्द्र बिन्दु होती थी। यहाँ के रहने वालों से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे भाईचारे से रहते हुए ईश्वर प्रार्थना में लीन रहे और पवित्र जीवन बितायें।

3. कादिरी सिलसिला –

कादिरी सम्प्रदाय के प्रवर्तक बगदाद के शेख अब्दुल कादिर जिलानी (1077-1166 ई.) थे।  भारत में इस सम्प्रदाय का प्रचार मख्दूम मुहम्मद जिलानी और शाह नियामतुल्ला ने किया।  सैयद बन्दगी मुहम्मद ने 1482 ई. में सिन्ध को इस सम्प्रदाय का प्रचार केन्द्र बनाया।

वहाँ से कालान्तर में यह सम्प्रदाय कश्मीर, पंजाब, बंगाल और बिहार तक फैला। इस सम्प्रदाय के अनुयायी संगीत के विरोधी थे।

4. नक्शबन्दी सिलसिला –

तुर्किस्तान के ख्वाजा वहाअलदीन नक्शबन्द इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक थे। यह सम्प्रदाय भारत में 16वीं शताब्दी में ख्वाजा मुहम्मद शाकी गिल्लाह वैरंग द्वारा आया।

इस सम्प्रदाय के सन्तों ने इस्लाम की कट्टरता का विरोध किया। सन्तों ने धार्मिक आडम्बरों का विरोध किया और सादा सच्चा जीवन जीने का उपदेश दिया।

इस सम्प्रदाय का दृष्टिकोण बुद्धिवादी होने के कारण यह सम्प्रदाय जन साधारण को अपनी ओर बड़ी संख्या में आकर्षित न कर सका।

फिरदौसी – सुहरावर्दी सिलसिला की ही एक शाखा थी। जिसका कार्य क्षेत्र बिहार था इस सिलसिले को शेख शरीफउद्दीन याहया ने लोकप्रिय बनाया याहया ख्वाजा निजामुद्दीन के शिष्य थे

सत्तारी सिलसिला – इसकी स्थापना शेख अब्दुल्लाह सत्तारी की।इन्होंने खुदा के साथ सीधे संपर्क का दावा किया।  इसका मुख्य केंद्र बिहार था।

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September 20, 2020

Uttar Mughal Period New Dynasty उत्तर मुगलकालीन नये राजवंश

उतर मुगलकालीन नये राजवंश

अवध ( Awadh )

उत्तर मुगलकालीन

अवध के स्वतंत्र राज्य के संस्थापक सआदत खां बुराहनुल्मुल्क था। 1722 ई. में मुग़ल बादशाह मुहमदशाह द्वारा फारस के शिया सआदत खां को अवध का सूबेदार बनाये जाने के बाद अवध सूबे को स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया गया।

सआदत खां ने सैय्यद बंधुओं को हटाने में सहयोग दिया। बादशाह ने सआदत खां को नादिरशाह के साथ वार्ता के लिए नियुक्त किया ताकि वह एक बड़ी रकम के भुगतान के एवज में अपने देश लौट जाये और शहर को तबाह करने से उसे रोका जा सके।  लेकिन जब नादिरशाह को उस रकम का भुगतान नहीं किया गया तो उसका परिणाम दिल्ली की जनता को नरसंहार के रूप में भुगतना पड़ा। सआदत खां ने भी शर्म और अपमान के कारण आत्महत्या कर ली ।

सआदत खां के बाद अवध का अगला नवाब सफदरजंग बना जिसे मुग़ल साम्राज्य का वजीर भी नियुक्त किया गया था। उसका पुत्र शुजाउद्दौला उसका उत्तराधिकारी बना। अवध ने एक शक्तिशाली सेना का गठन किया जिसमे मुस्लिमों के साथ साथ हिन्दू ,नागा,सन्यासी भी शामिल थे।

अवध के शासक का प्राधिकार दिल्ली के पूर्व में स्थित रूहेलखंड क्षेत्र तक था। उत्तर –पश्चिमी सीमान्त की पर्वत श्रंखलाओं से बड़ी संख्या में अफ़ग़ान ,जिन्हें रोहिल्ला कहा जाता था ,वहाँ आकर बस गए थे।

अवध के नवाबों का विवरण निम्नलिखित है-

सआदत खां बुरहान-उल-मुल्क (1722-1739 ई ): इन्होने 1722 ई. में अवध की स्वायत्त राज्य के रूप में स्थापना की उसे मुग़ल बादशाह मुहम्मदशाह द्वारा गवर्नर नियुक्त किया गया था । उसने नादिरशाह के आक्रमण के समय साम्राज्य की गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अंततः इज्ज़त और सम्मान की खातिर आत्महत्या कर ली।

सफ़दर जंग अब्दुल मंसूर (1739-1754 ई ): वह सआदत खां का दामाद था जिसने 1748 ई. में अहमदशाह अब्दाली के विरुद्ध मानपुर के युद्ध में भाग लिया था।

शुजाउद्दौला (1754-1775 ई ): वह सफदरजंग का पुत्र और अहमदशाह अब्दाली का सहयोगी था। उसने अंग्रेजों के सहयोग से रोहिल्लों को हराकर 1755 ई. में रूहेलखंड को अपने साम्राज्य में मिला लिया था।

आसफ-उद-दौला: 

वह लखनऊ की संस्कृति को प्रोत्साहित करने और इमामबाड़ा तथा रूमी दरवाजा जैसी ऐतिहासिक इमारतें बनवाने के लिए प्रसिद्ध है। उसने 1755 ई. में अंग्रेजों के साथ फ़ैजाबाद की संधि की।

वाजिद अली शाह :  वह अवध का अंतिम नवाब था जिसे अख्तरप्रिया और जान-ए-आलम नाम से जाना जाता है। उसके समय में ही ब्रिटिश गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी द्वारा अवध को कुशासन के आधार पर ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया था। वह शास्त्रीय संगीत और नृत्य का शौक़ीन था जिसने कालका-बिंदा जैसे कलाकार भाइयों को अपने दरबार में शरण दी थी।

अवध अपनी उपजाऊ भूमि के कारण के हमेशा से आकर्षण का केंद्र रहा है ।अंग्रेजों ने भी अपने स्वार्थ के लिए इसकी उपजाऊ भूमि का दोहन किया। इसीलिए अंग्रेजों ने 1856 ई. में इसे अपने साम्राज्य में मिला लिया।

रुहेले एवं बंगश पठान

स्वतंत्र रूहेलखंड राज्य की स्थापना वीर दाउद तथा आलिमुहम्मद खांने ने की थी। रूहेल सरदार नजीबुद्दौला अफगान शासक अहमदशाह अब्दाली का विश्वासपात्र था। रूहेलखण्ड के कुछ दूर पूरब में मुहम्मद खां बंगश नामक एक वीर अफगान ने फरुखाबाद की जागीर को एक स्वतंत्र राज्य बना लिया।

मैसूर ( Mysore )

दक्षिण भारत में हैदराबाद के समीप हैदर अली नामक एक वीर योद्धा , जिसने अपना जीवन एक घुड़सवार के रूप में प्रारम्भ किया था, के आधीन जिस महत्वपूर्ण सत्ता का उदय हुआ, वह मैसूर था। 18वीं शताब्दी में मैसूर पर वाडियार वंश का शासन था। इस वंश के उस समय के अंतिम शासक चिक्का कृष्णराज द्वितीय के शासनकाल में शासन की वास्तविक शक्ति दो मंत्रियों देवराज व नंजराज के हाथों में थी।

हैदरअली के युद्ध कौशल से प्रभावित होकर नंजराज ने हैदर को डिंडीगुल के किले का फौजदार नियुक्त किया। फ्रांसीसियों की सहायता से हैदरअली ने डिंडीगुल में एक आधुनिक शास्त्रागार की स्थापना की। 1761 में हैदर ने नंजराज व देवराज को सत्ता से अलग कर दिया तथा स्वयं मैसूर का वास्तविक शासक बन बैठा।

हैदरअली ने मैसूर स्थित चामुंडेश्वरी देवी मंदिर के लिए दान दिया था, साथ ही अपने सिक्कों पर शिव, पार्वती, विष्णु इत्यादि की आकृति अंकित करवाई।

प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767-69)

हैदरअली के शीघ्र उदय ने स्वभावतः अंग्रेजों, निजाम और मराठों की ईष्या को उभार डाला। इसके साथ-साथ हैदर की फ्रांसीसियों से बढ़ती निकटता तथा अंग्रेजों की आक्रामक नीति ने भी इस युद्ध के लिए आवश्यक मनोदशा के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

हैदर ने कूटनीति से निजाम व मराठों को अपने पक्ष में करके कर्नाटक पर आक्रमण कर दिया। थोड़े उतार-चढ़ाव के साथ डेढ़ साल तक चले इस युद्ध में अंततः हैदरअली विजयी रहा। फलतः अंग्रेजों को हैदर की शर्तों पर एक अपमानजनक संधि करने को बाध्य होना पड़ा जिसे ‘मद्रास की संधि’ (1769) कहते है।

इसके अनुसार अंग्रेजों ने हैदर को किसी दुसरी शक्ति द्वारा आक्रांत होने पर सहायता का वचन दिया।

द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780-84)

तत्कालीन परिस्थितियों के अंतर्गत हैदर पुनः (कर्नाटक के प्रथम युद्ध की भांति) निजाम व मराठों के साथ त्रिगुट बनाने में सफल रहा तथा कर्नल वेली के नेतृत्व वाली अंग्रेजी सेना को पराजित कर दिया। 

लेकिन अंग्रेजों द्वारा निजाम व मराठों को अपने पक्ष में कर लेने के पश्चात् हैदर अंग्रेज जनरल आयरकूट के नेतृत्व वाली सेना से पोर्तोनोवा के युद्ध में पराजित हुआ एवं घायल हो गया जिससे कुछ दिनों पश्चात् उसकी मृत्यु हो गई। हैदर के पुत्र टीपू ने संघर्ष जारी रखा तथा ब्रिगेडीयर मैथ्यूज को पराजित कर सेना सहित बंदी बना लिया।

1784 में दोनों पक्षों के बीच मंगलौर की संधि से युद्ध समाप्त हुआ। भारतीय शक्तियों में हैदर अली पहला व्यक्ति था जिसने अंग्रेजों को पराजित किया।

टीपू सुल्तान

टीपू सुल्तान 1782 में मैसूर का शासक बना। टीपू को उर्दू, अरबी, फारसी, कन्नड़ इत्यादि भाषाएँ ज्ञात थी। टीपू एक प्रगतिशील विचारधारा वाला शासक था। इसने मापतौल के आधुनिक पैमाने अपनाएं, साथ ही आधुनिक कैलेंडर को लागू किया। टीपू ने सिक्का ढलाई की नई तकनीक अपनाई।

उसने अपने पिता हैदर अली की ही भांति अपने सिक्कों पर हिन्दू संवत् तथा हिन्दू देवी-देवताओं के चित्र अंकित करवाए। टीपू अपनी प्रशासनिक व्यवस्था में पाश्चात्य गुणों को शामिल करने वाला भारत का प्रथम शासक था। टीपू ने अरब, काबुल, मारीशस इत्यादि देशों से मैत्रीसम्बंध स्थापित करने हेतु अपने दूतमंडल वहाँ भेजे।

टीपू ने व्यापार की संवृद्धि के लिए अपने गुमास्तों की नियुक्ति कई देशों में की। इसने नौसेना के सशक्तिकरण हेतु मोलिदाबाद व मंगलौर में पोत निर्माण केंद्र स्थापित किये।

तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790-92)

मद्रास व मंगलौर की संधियाँ युद्ध का तात्कालिक किन्तु अस्थाई समाधान मात्र थीं। दोनों ही पक्षों की महत्वकांक्षाएँ ज्यों की त्यों बनी हुई थी।1790 में कार्नवालिस ने टीपू पर अंग्रेजों के खिलाफ फ्रांसीसियों से गुप्त समझौता करने तथा ब्रिटिश संरक्षित त्रावणकोर राज्य पर हमला करने का आरोप लगाकर युद्ध छेड़ दिया।

टीपू अंग्रेज, मराठों व निजाम की संयुक्तसेना से पराजित हो गया तथा अंग्रेजों से संधि करने को बाध्य हुआ।श्रीरंगपट्टनम की इस संधि (1792) के अनुसार टीपू अपना आधा राज्य तथा तीन करोड़ रूपये अंग्रेजों को देने को बाध्य हुआ।

चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799)

इस युद्ध का कारण था लार्ड वेलेजली द्वारा भेजे सहायक संधि के प्रस्ताव का टीपू द्वारा अस्वीकार कर दिया जाना। इस युद्ध में अंग्रेजों की सेना का नेतृत्व जनरल हैरिस,कर्नल वेलेजली तथा स्टुअर्ट ने किया। टीपू श्रीरंगपट्टनम दुर्ग के द्वार पर लड़ता मारा गया।

इस विजय के पश्चात् अंग्रेजों ने मैसूर राज्य का एक बड़ा भाग अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया तथा शेष मैसूर राज्य को वाडियार वंश के एक दो वर्षीय बालक कृष्णराज को राजा बनाकर अपने संरक्षण में ले लिया तथा मैसूर पर सहायक संधि आरोपित कर दी।

पंजाब / सिक्ख ( Punjab / Sikh )

सिक्ख धर्म की स्थापना सोलहवी शताब्दी के आरम्भ में गुरुनानक द्वारा की गई थी। गुरु नानक का जन्म 15 अप्रैल, 1469 को पश्चिमी पंजाब के एक गाँव तलवंडी में हुआ था। इन्होने कर्मकांड एवं अवतारवाद का विरोध किया तथा धर्मप्रचार के लिए सांगतो की स्थापना की।

गुरुअंगद (लेहना)- इन्हें गुरुनानक ने अपना उत्तराधिकारी बनाया था। इन्होने नानक द्वारा प्रारम्भ लंगर व्यवस्था को स्थायी बना दिया। इन्होने गुरुमुखी लिपि की शुरुआत की।

गुरुअमरदास- इन्होने सिक्ख सम्प्रदाय को एक संगठित रूप दिया। बादशाह अकबर इनमे मिलने स्वयं गोइंदवाल गया तथा इनकी पुत्री बीबीभानी के नाम कुछ जमीन दी। इन्होने हिन्दुओ और सिक्खों के विवाह को पृथक करने के लिए ‘लवन पद्धति’ शुरू की।

गुरुरामदास- अकबर ने इन्हें 500बीघा जमीन दी जिस पर इन्होने अमृतसर नगर की स्थापना की। इन्होंने गुरु के पद को पैतृक बना दिया।

गुरु अर्जुन देव-

 1604 में इन्होने आदिग्रंथ की रचना की। इन्होने सूफीसंत मियाँमीर द्वारा अमृतसर में हरविंदर साहब की नींव डलवायी। कालांतर में महाराज रणजीत सिंह द्वारा स्वर्ण जड़वाने के बाद अंग्रेजो द्वारा इसे स्वर्ण मंदिर नाम दिया गया। इन्होने अनिवार्य अध्यात्मिक कर (सिक्खों से) लेना प्रारम्भ किया। शहजादा खुसरो (जहाँगीर के खिलाफ विद्रोह करने वाले) का समर्थन करने के कारण जहाँगीर ने इनको मृत्युदंड दे दिया।

गुरुहरगोविन्द- इन्होने सिक्खों में सैन्य भावना पैदा की तथा उन्हें मांस खाने की अनुमति दी। इन्होने अमृतसर की किलेबंदी करवाई तथा उसमे अकाल तख़्त की स्थापना की। बाज प्रकरण पर इनका शाहजहाँ से संघर्ष हुआ।

गुरुहरराय- इन्होने सामूगढ़ के युद्ध में पराजित हुए दाराशिकोह की मदद की थी।

गुरुहरकिशन- इन्होने अपना जीवन दिल्ली में महामारी से पीड़ित लोगों की सेवा में बिताया। इनकी मृत्यु चेचक से हुई।

गुरुतेग बहादुर- इन्होने औरंगजेब की कट्टर धार्मिक नीतियों का विरोध किया। औरंगजेब ने इन्हें दिल्ली बुलाकर इस्लाम धर्म स्वीकार करने को कहा तथा इनकार करने पर इनकी हत्या करवा दी।

गुरुगोविन्द सिंह-

 ये सिक्खों के दसवें और अन्तिम गुरु थे। इनका जन्म पटना में हुआ था। इन्होने आनंदपुर की स्थापना कर वही अपनी गद्दी स्थापित की। इन्होने पाहुल प्रथा शुरू की। इस पंथ में दीक्षित व्यक्तियों को खालसा कहा जाता था। इन्होनें प्रत्येक सिक्खों को पंचकार धारण करने का आदेश दिया। चंदीदिवर एवं कृष्ण अवतार नामक पुस्तकों की रचना गुरु गोविन्द सिंह ने की। इनकी आत्मकथा का नाम विचित्रनाटक है। आनंदगढ़, लौहगढ़, फतेहपुर एवं केशगढ़ के किलों के निर्माण का श्रेय इन्ही को है।

गुरु गोविन्द सिंह के समय हुए कई युद्धों के दौरान आदि ग्रन्थ गायब हो गया अतः इन्होने पुनः उसका संकलन करवाया फलतः आदि ग्रन्थ को ‘दशम बादशाह का ग्रन्थ’ भी कहा जाता है। गुरु गोविंद सिंह ने अपनी मृत्यु से पहले गद्दी को समाप्त कर दिया। इनकी समाधि के कारण नादेड़(महाराष्ट्र) गुरुद्वारा पवित्र माना जाता है।

बंदा बहादुर- गुरु गोविन्द सिंह के पश्चात् सिक्खों का नेतृत्व बंद बहादुर ने संभाला। यह जम्मू का रहने वाला था। इसके बचपन का नाम लक्ष्मण था। इसे सिक्खों का पहला राजनीतिक नेता माना जाता था। 1716 में फर्रुखसियर के आदेश पर इसकी हत्या कर दी गई। सिक्खों ने 1716 में देग, तेग एवं फतह लेख युक्त चाँदी के सिक्के जारी किये, ये पंजाब में सिक्ख संप्रभुता की प्रथम उद्घोषणा मानी जाती है।

रणजीत सिंह- 

 आधुनिक पंजाब के निर्माण का श्रेय रणजीत सिंह को जाता है। ये सुकरचकिया मिसल के प्रमुख महासिंह के पुत्र थे अफगानिस्तान के शासक जमानशाह ने रणजीत सिंह राजा की पदवी दी तथा इन्हें लाहौर की सुबेदारी भी सौपी। 1809 में रणजीत सिंह व अंग्रेजों के बीच अमृतसर की संधि हुई जिसके द्वारा सतलज नदी दोनों राज्यों की सीमा मान ली गई।

1809 में रणजीत सिंह अपने भाई द्वारा अपदस्थ किये गए शाहशुजा को पुनः सत्तासीन करने में बहुत मदद की थी। शाहशुजा ने ही विश्व प्रसिद्द ‘कोहिनूर हीरा’ भेट किया था जिसे पहले नादिरशाह लूट कर ले गया था। रणजीत सिंह सदैव खालसा के नाम पर कार्य करते थे तथा अपनी सरकार को ‘सरकार-ए-खालसा’ जी कहते थे ।

इन्होंने गुरु नानक एवं गुरुगोविन्द सिंह के नाम पर सिक्के चलवाये।  रणजीत सिंह भारतीय सेनाओं के दुर्बल पक्ष को समझते हुए कम्पनी के नमूने पर विदेशी कमाण्डरों की सहायता से एक कुशल, अनुशासित व सुसंगठित सेना का गठन किया। इसे ‘फौजे-ए-आईन’ कहा जाता है।

रणजीत सिंह ने लाहौर में एक तोप खाना खोला। रणजीत सिंह का उतराधिकारी खड्ग सिंह हुआ। इसके पश्चात् क्रमशः नौनिहाल सिंह एवं शेर सिंह ने शासन किया। शेर सिंह की हत्या हो जाने पर 1843 में महाराजा रणजीत सिंह का अल्पवयस्क पुत्र दिलीपसिंह महारानी जिंदल कौर के संरक्षण में सिंहासन पर बैठा।

1845 में अंग्रेजों ने पंजाब पर आक्रमण कर दिया। फलतः प्रथम आंग्ल सिक्ख युद्ध का प्रारम्भ हुआ। युद्ध में सिक्खों की पराजय हुई तथा इन्हें लाहौर की संधि व भेरोंवाल की संधि (1846) के लिए बाध्य होना पड़ा।

संधि के बदले अंग्रेजों ने दिलीप सिंह को महाराज, रानी जिंदल को संरक्षिका तथा युद्ध में अंग्रेजों की मदद करने वाले सिक्ख सेना के सेनापति लाल सिंह को वजीर के रूप में मान्यता प्रदान की। साथ ही कश्मीर गुलाब सिंह को बेच दिया।

पंजाब को ब्रिटिश प्रभाव से मुक्त करने तथा खालसा शक्ति को पुनः प्रतिष्ठित करने के लिए 1848 में पुनः विद्रोह हो गया इसे ‘द्वितीय आंग्लसिक्ख युद्ध’ के नाम से जाना जाता है। जिसमे 1849 के गुजरात के युद्ध में चार्ल्स नेपियर के नेतृत्व वाली अंग्रेजी सेना ने सिक्ख सेना को बुरी तरह पराजित किया। गुजरात का युद्ध ‘तोपों के युद्ध’ के नाम से जाना जाता है।

29 मार्च, 1849 को सिक्ख राज्य को अंग्रेजी राज्य में मिला लिया गया। अंग्रेजों द्वारा दिलीप सिंह को शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंग्लैण्ड भेज दिया गया, जहाँ बाद में उन्होंने ईसाई धर्म ग्रहण कर लिया। दिलीप सिंह का निधन 23 अक्टूबर,1893 को पेरिस में हुआ।

हैदराबाद ( Hyderabad )

हैदराबाद के स्वतंत्र आसफजाही वंश की स्थापना चिनकिलिच खां निजामुलमुल्क ने 1724 में की थी। इसे मुग़ल बादशाह मुहम्मदशाह ने दक्कन का सूबेदार नियुक्त किया था।

1724 में स्वतंत्र हैदराबाद राज्य की स्थापना के पश्चात मुग़ल बादशाह मुहम्मदशाह ने इसे आसफजाह की उपाधि प्रदान की। शकुरखेडा के युद्ध में चिनकिलिच खां ने मुग़ल सूबेदार मुबरिजखां को पराजित किया।

चिनकिलिच खां की मृत्यु के बाद हैदराबाद का पतन प्रारंभ को गया और अंततः हैदराबाद भारत का पहला ऐसा राज्य बना जिसने वेलेजली की सहायता संधि के अनतर्गत एक आश्रित सेना रखना स्वीकार किया। यहॉं सन् 1724 से सन् 1948 तक ऩिजाम शाही या आसफजाही का शासन था।

निजाम शासकों के नाम इस प्रकार हैं-

  • निजामुलमुल्क चिनकिलिच खान(प्रथम निजाम) (1724- 48)
  • नासिर जंग(1748- 50)
  •  मुजफ्फर जंग(1750-51)
  • सलावत जंग (1751 – 62)
  • निजाम अली(द्वितीय निजाम) (1760 – 1803)
  • सिकन्दर जहां (तृतीय निजाम) (1803 – 29)
  • नासीर – उद-दौला (चतुर्थ निजाम) (1829-1857)
  • अफज-उद-दौला(पांचवा निजाम) ( 1857-69)
  • महबत अली खान(छठवां निजाम) ( 1869- 1911)
  • उस्मान अली खान (सातवां निजाम) (1911-1948)

इस ऩिजाम आसफिया खानदान को दक्कन पर दो सौ साल तक हुकूमत करने का अवसर मिला। मीर उस्मान अली खॉं (सातवां ऩिजाम) ने सन् 1911 से 1948 तक आसफजाही वंश के अंतिम शासक के रूप में शासन चलाया।

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September 19, 2020

Statutory Development 1857 से पहले वैधानिक विकास

रेग्यूलेटिंग एक्ट (1773 ई.) –

वैधानिक विकास

18 मई, 1773 ई. को लार्ड नार्थ ने कॉमन्स सभा में ईस्ट इंण्डिया कम्पनी रेग्यूलेटिंग बिल प्रस्तुत किया, जिसे कॉमन्स सभा ने 10 जून को और लार्ड सभा ने 19 जून को पास कर दिया। यह 1773 ई. के रेग्यूलेटिंग एक्ट के नाम से प्रसिद्ध है।

इस एक्ट का मुख्य उद्देश्य कम्पनी के संविधान तथा उसके भारतीय प्रशासन में सुधार लाना था।  बंगाल का शासन गवर्नर जनरल तथा चार सदस्यीय परिषद में निहित किया गया। इस परिषद में निर्णय बहुमत द्वारा लिए जाने की भी व्यवस्था की गयी।

इस अधिनियम द्वारा प्रशासक मंडल में वारेन हेस्टिंग्स को गवर्नर जनरल के रूप में तथा क्लैवरिंग, मॉनसन, बरवैल तथा पिफलिप प्रफांसिस को परिषद के सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया।

इन सभी का कार्यकाल पांच वर्ष का था तथा निदेशक बोर्ड की सिफारिश पर केवल ब्रिटिश सम्राट द्वारा ही इन्हें हटाया जा सकता था।

मद्रास तथा बम्बई प्रेसीडेंसियों को बंगाल प्रेसीडेन्सी के अधीन कर दिया गया तथा बंगाल के गवर्नर जनरल को तीनों प्रेसीडेन्सियों का गवर्नर जनरल बना दिया गया। इस प्रकार वारेन हेस्टिंग्स को बंगाल का प्रथम गवर्नर जनरल कहा जाता है और वे लोग सत्ता का उपयोग संयुक्त रूप से करते थे

सपरिषद गवर्नर जनरल को भारतीय प्रशासन के लिए कानून बनाने का अधिकार प्रदान किया गया, किन्तु इन कानूनों को लागू करने से पूर्व निदेशक बोर्ड की अनुमति प्राप्त करना अनिवार्य था।

इस अधिनियम द्वारा बंगाल (कलकत्ता) में एक उच्चतम न्यायालय की स्थापना की गयी।

इसमें एक मुख्य न्यायाधीश तथा तीन अन्य न्यायाधीश थे। सर एलिजा इम्पे को उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) का प्रथम मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया।  

इस न्यायालय को दीवानी, फौजदारी, जल सेना मामलों में व्यापक अधिकार दिया गया।

न्यायालय को यह भी अधिकार था कि वह कम्पनी तथा सम्राट की सेवा में लगे व्यक्तियों के विरुद्ध मामले की सुनवायी कर सकता था।

इस न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध इंग्लैंड स्थित प्रिवी कौंसिल में अपील की जा सकती थी।

संचालक मंडल का कार्यकाल चार वर्ष कर दिया गया तथा अब 500 पौंड के स्थान पर 1000 पौंड के अंशधारियों को संचालक चुनने का अधिकार दिया गया।

इस प्रकार 1773 के एक्ट के द्वारा भारत में कंपनी के कार्यों में ब्रिटिश संसद का हस्तक्षेप व नियंत्रण प्रारंभ हुआ

तथा कम्पनी के शासन के लिए पहली बार एक लिखित संविधान प्रस्तुत किया गया।

बंगाल न्यायालय एक्ट –

रेल्यूलेटिंग एक्ट के दोषों को दूर करने के लिए ब्रिटिश संसद ने मि. बर्क की अध्यक्षता में एक कमेटी नियुक्त की। इस कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर 1781 ई. में ब्रिटिश संसद ने एक एक्ट पास किया, जिसे बंगाल न्यायालय का एक्ट कहा जाता है। इसे संशोधन अधिनियम भी कहते हैं। इस एक्ट का मुख्य उद्देश्य न्यायालय के अधिकार क्षेत्र और शक्तियों के विषय में उत्पन्न अनिश्चितता का अन्त करना था।

एक्ट की प्रमुख धाराएँ-
  • इस एक्ट के अनुसार कम्पनी के कर्मचारियों के सरकारी तौर पर किए गये कार्य काफी सीमा तक सुप्रीम कोर्ट के अधिकार के बाहर कर दिए गए। दूसरे शब्दों में गवर्नर जनरल और उसकी कौंसिल द्वारा किए गए कार्यो पर सर्वोच्च न्यायालय कोई नियंत्रण नहीं रहा।
  • छोटे न्यायालयों के न्याय अधिकारियों के न्याय सम्बन्धी कार्यों पर से सुप्रीम कोर्ट का कण्ट्रोल हटा दिया गया।
  • राजस्व वसूल करने वाले अधिकारियों पर से सुप्रीम कोर्ट का नियंत्रण हटा लिया गया।
  • गवर्नर जनरल तथा उसकी कौंसिल पर से सुप्रीम कोर्ट का नियंत्रण हटा दिया गया। अब सुप्रीम कोर्ट गवर्नर जनरल तथा उसकी कौंसिल के सिर्फ उसी कार्य में हस्तक्षेप कर सकता था, जिससे ब्रिटिश प्रजा को हानि पहुँचती हो।
  • कम्पनी के न्यायालयों के निर्णयों के विरूद्ध गवर्नर जनरल और उसकी कौंसिल को अपील सुनने का अधिकार दे दिया गया।
  • गवर्नर जनरल तथा उसकी परिषद् को सुप्रीम कोर्ट की सम्मत्ति के बिना प्रान्तीय न्यायालयों तथा परिषद् के सम्बन्ध में नियम बनाने का अधिकार दे दिया गया।
  • सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र केवल कलकत्ता वाशिंदों तक सीमित कर दिया गया अर्थात् शेष स्थानों पर रहने वाले भारतीयों के मुकदमें सुनने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट को नहीं था।
  • यह भी कहा गया कि न्याय करते समय भारतीयों की धार्मिक परम्पराओं, रीति-रिवाजो, सामाजिक नियमों और जातीय कानूनों को ध्यान में रखा जाएगा। इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट के लिए मुकदमों के फैसले अंग्रेजी कानून के अनुसार करने की मनाही कर दी गई।
  • यह भी कहा जाता है कि सुप्रीम कोर्ट हिन्दुओ के मुकदमों का हिन्दुओं के कानून के अनुसार और मुसलमानों के मुकदमों का मुसलामनों के कानून के अनुसार फैसला करे।

इस एक्ट से सुप्रीम कोर्ट के गवर्नर जनरल की कौंसिल तथा छोटे न्यायालयों के साथ चलने वाले झगड़े समाप्त हो गए। भारतीयों को अंग्रेजी कानून के विरूद्ध जो शिकायत थी, वह भी दूर हो गई। संक्षेप में, इस एक्ट ने रेग्युलेटिंग एक्ट के सर्वोच्च न्यायलय से सम्बन्धित दोषों को दूर कर दिया। इसके अतिरिक्त सर्वोच्च न्यायालय की तुलना में गवर्नर जनरल तथा उसकी कौंसिल की स्थिति को दृढ़ बना दिया।

डुण्डास का इण्डियन बिल (अप्रैल 1783) –

30 मई, 1782 ई. को डुण्डास के प्रस्ताव पर ब्रिटिश लोक सभा ने वारेन हेस्टिंग्स प्रशासन की निन्दा की और डायरेक्टरों से उसे वापस बुलाने के लिए कहा। परन्तु संचालक मण्डल ने लोक सभा के आदेश की अवहेलना करते हुए हेस्टिग्स को उसके पद पर बनाए रखा।

कीथ के अनुसार, इस तरह स्पष्ट कर दिया गया कि कम्पनी के डायरेक्टर न तो अपने कर्मचारियों का नियंत्रित कर सकते थे और राज्यों को या कम्पनी को, जबकि कलकत्ता के विरूद्ध होने वाली मद्रास प्रेसीडेन्सी की कार्यवाहियों ने यह सिद्ध कर दिया कि मुख्य प्रेसीडेन्सी सहायक को अपने नियंत्रण में नहीं रखा सकती थी।

कम्पनी के संविधान में सुधार करने के लिए अप्रैल, 1783 में मि. डुण्डास ने एक बिल प्रस्तुत किया, जिसमें निम्नलिखित सुझाव दिए गए थे-

  • सम्राट को कम्पनी के प्रमुख अधिकारियों को वापस बुलाने का अधिकार दिया जाए।
  • कुछ महत्त्वपूर्ण मामलों में गवर्नर जनरल को अपनी कौंसिल के निर्णयों को रद्द करने की शक्ति दी जाए।
  • गवर्नर जनरल और उसकी कौंसिल का प्रादेशिक सरकारों पर नियंत्रण बढ़ा दिया जाए।

चूँकि डुण्डास विरोधी दल का सदस्य था, अतः उसके द्वारा प्रस्तावित वह बिल पास नहीं हो सका। फिर, भी उसका विधेयक इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ कि इसने भारत में संवैधानिक परिवर्तन की आवश्यकता पर जोर दिया और मंत्रिमण्डल को कार्यवाही करने की प्रेरणा दी।

फॉक्स का इण्डिया बिल (नवम्बर, 1783) –

डुण्डास विधेयक ने सरकार को कम्पनी के संविधान में सुधार करने के लिए प्रेरित किया। अतः फॉक्स तथा नौर्थ के संयुक्त मंत्रिमण्डल ने तुरन्त इस प्रश्न को अपने हाथ में लिया। फॉक्स ने भारत में कम्पनी सरकार को अवर्णातीत, शोचनीय, अराजकता तथा गड़बड़ बतलाया। उसने 18 नवम्बर, 1783 ई. को अपना प्रसिद्ध ईस्ट इण्डिया बिल पेश किया, जिसके प्रमुख सुझाव निम्नलिखित थे-

  • कम्पनी की प्रादेशिक सरकार को उसके व्यापारिक हितों से पृथक् कर दिया गया।
  • संचालक मण्डल तथा संचालक मण्डल के स्थान पर सात कमिश्नरों का एक मण्डल लन्दन में स्थापित किया जाए।
  • इस मण्डल को भारतीय प्रदेशों तथा उसके राजस्व का प्रबन्ध करने का पूर्ण अधिकार हो। उसको कम्पनी के समस्त कर्मचारियों को नियुक्त तथा पदच्युत करने की शक्ति भी दी जाए।
  • मण्डल के सदस्यों की नियुक्ति पहली बार संसद के द्वारा की जाए लेकिन बाद में रिक्त होने वाले स्थानों को भरने का अधिकार सम्राट को हो।
  • इन सदस्यों का कार्यकाल चार वर्ष रखा गाय और इस अवधि के दौरान उन्हें संसद के दोनों सदनों में से किसी एक सदन के कहने पर इंग्लैण्ड का सम्राट उन्हें पदच्युत कर सके।
  • इस बोर्ड की बैठकें लन्दन में बुलाए जाए और संसद को इस मण्डल के कार्यों का निरीक्षण करने का अधिकार हो, अर्थात् बोर्ड पर संसद का नियंत्रण स्थापित किया जाए।
  • व्यापार को नियंत्रित करने के लिए व सहायक निदेशकों का एक और मण्डल बनाया जाए।
  • इन सहायक निदेशकों की नियुक्ति भी प्रथम बार संसद द्वारा हो और इसके पश्चात् संचालक मण्डल को उन्हें निर्वाचित करने का अधिकार दिया जाए।
  • इन सहायक निदेशकों को कार्यकाल पाँच वर्ष हो और इस सम्बन्ध में वे भी कमिश्नरों की तरह सुरक्षित हों।
  • विधेयक में एकाधिकार, भेंट तथा रियासतों को ब्रिटिश सेना के मदद को समाप्त करने की व्यवस्था की गई।

फॉक्स विधेयक का संसद में तथा उसके बाहर जोरदार विरोध हुआ। पुन्निया के शब्दो में पार्लियामेन्ट के अन्दर और बाहर दोनों जगह इस विधेयक का मुखर, प्रबल और कटुतापूर्ण विरोध हुआ।  इस विधेयक के दोषों के बारे में रॉबर्ट्सन ने लिखा है, भारत में कम्पनी सरकार को वस्तुतः सात व्यक्तियों के सुपुर्द कर दिया गया था। इससे कमिश्नरों तथा शासक दल को संरक्षण बाँटने का विस्तृत अधिकार मिल जाता। इससे संसद ने भ्रष्ट होने का भी भय था।

यह नये राजनीतिक दायित्व का निर्माण करता। कम्पनी का संविधान चार्टर द्वारा नियमित होता था, परन्तु फॉक्स विधेयक से कम्पनी के चार्टर की पवित्रता नष्ट हो जाती और उसके संविधान के नष्ट हो जाने से अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो जाती।

इंग्लैण्ड नरेश जार्ज तृतीय के व्यक्तिगत हस्तक्षेप के कारण यह विधेयक लार्ड सभा में अस्वीकृत हो गया। रॉबर्ट्सन के शब्दों में विधेयक एक बड़ी समस्या को व्यापक रूप से सुलझाने का निश्छल एवं कूटनीतिक प्रयास था। कीथ ने भी लिखा है, यह विधेयक सम्पूर्ण संविधान को सुधारने का एक प्रबल प्रयत्न था।

1784 ई. का पिट्स इंडिया एक्ट:

रेग्यूलेटिंग एक्ट के दोषों को दूर करने के लिये इस एक्ट को पारित किया गया। इस एक्ट से संबंधित विधेयक ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री पिट द यंगर ने संसद में प्रस्तुत किया तथा 1784 में ब्रिटिश संसद ने इसे पारित कर दिया।

इस एक्ट के प्रमुख उपबंध निम्नानुसार थे-

इसने कंपनी के राजनैतिक और वाणिज्यिक कार्यों को पृथक पृथक कर दिया | इसने निदेशक मंडल को कंपनी के व्यापारिक मामलों की अनुमति तो दी लेकिन राजनैतिक मामलों के प्रबंधन के लिए नियंत्रण बोर्ड (बोर्ड ऑफ़ कण्ट्रोल )नाम से एक नए निकाय का गठन कर दिया |

 इस प्रकार द्वैध शासन व्यवस्था का शुरुआत किया गया नियंत्रण बोर्ड को यह शक्ति थी की वह ब्रिटिश नियंत्रित भारत में सभी नागरिक , सैन्य सरकार व राजस्व गतिविधियों का अधीक्षण व नियंत्रण करे |

इस प्रकार यह अधिनियम दो कारणों से महत्वपूर्ण था –

  • भारत में कंपनी के अधीन क्षेत्रों को पहली बार ब्रिटिश अधिपत्य का क्षेत्र कहा गया
  • ब्रिटिश सरकार को भारत में कंपनी के कार्यों और इसके प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण प्रदान किया गया |

1793 का राजपत्र

कम्पनी के कार्यों एवं संगठन में सुधार के लिए यह चार्टर पारित किया गया। इस चार्टर की प्रमुख विशेषता यह थी कि इसमें पूर्व के अधिनियमों के सभी महत्वपूर्ण प्रावधानों को शामिल किया गया था।  इस अधिनियम की प्रमुख विशेषताएं निम्न थी-

  • कम्पनी के व्यापारिक अधिकारों को अगले 20 वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया।
  • विगत शासकों के व्यक्तिगत नियमों के स्थान पर ब्रिटिश भारत में लिखित विधि-विधानों द्वारा प्रशासन की आधारशिला रखी गयी।
  • इन लिखित विधियों एवं नियमों की व्याख्या न्यायालय द्वारा किया जाना निर्धारित की गयी।
  • गवर्नर जनरल एवं गवर्नरों की परिषदों की सदस्यता की योग्यता के लिए सदस्य को कम-से-कम 12 वर्षों तक भारत में रहने का अनुभव को आवश्यक कर दिया गया।
  • नियंत्रक मंडल के सदस्यों का वेतन अब भारतीय कोष से दिया जाना तय हुआ।

1813 ई. का चार्टर अधिनियम:

अधिनियम की विशेषताएं

  • कंपनी के अधिकार-पत्र को 20 सालों के लिए बढ़ा दिया गया
  • कंपनी के भारत के साथ व्यापार करने के एकाधिकार को छीन लिया गया।लेकिन उसे चीन के साथ व्यापर और पूर्वी देशों के साथ चाय के व्यापार के संबंध में 20 सालों के लिए एकाधिकार प्राप्त रहा
  • कुछ सीमाओं के अधीन सभी ब्रिटिश नागरिकों के लिए भारत के साथ व्यापार खोल दिया गया
  • ईसाई मिशनरियों को भारत में धर्म प्रचार की अनुमति दी गयी।

1833 ई. का चार्टर अधिनियम:

ब्रिटिश भारत के केन्द्रीयकरण की दिशा में यह अधिनियम निर्णायक कदम था | अधिनियम की विशेषताएं

  • कंपनी के व्यापारिक अधिकार पूर्णतः समाप्त कर दिए गए
  • अब कंपनी का कार्य ब्रिटिश सरकार की ओर से मात्र भारत का शासन करना रह गया
  • बंगाल के गवर्नर जरनल को भारत का गवर्नर जनरल कहा जाने लगा
  • जिसमे सभी नागरिक और सैन्य शक्तियां निहित थी |
  • विधि के संहिताकरण के लिए आयोग के गठन का प्रावधान किया गया।इस अधिनियम द्वारा भारत में केन्द्रीकरण का प्रारंभ किया गया, जिसका सबसे प्रबल प्रमाण विधियों को संहिताबद्ध करने के लिए एक आयोग का गठन था। इस आयोग का प्रथम अध्यक्ष लॉर्ड मैकाले नियुक्त किया गया।
  • भारत में दास-प्रथा को गैर-कानूनी घोषित किया गया। फलस्वरूप 1843 में भारत में दास-प्रथा की समाप्ति की घोषणा हुई।

इस प्रकार इस अधिनियम में एक ऐसी सरकार का निर्माण किया जिसका ब्रिटिश कब्जे वाले संपूर्ण भारतीय क्षेत्र पर पूर्ण नियंत्रण हो | लार्ड विलियम बैंटिक भारत के पहले गवर्नर जनरल थे | इसने मद्रास और बम्बई के गवर्नरों को विधायिका संबंधी शक्ति से वंचित कर दिया |

भारत के गवर्नर जनरल को पूरे ब्रिटिश भारत में विधायिका के असीमित अधिकार प्रदान कर दिए गए | इसके अन्तर्गत पहले बनाए गए कानूनों को नियामक कानून कहा गया और नए कानून के तहत बने कानूनों को एक्ट या अधिनियम कहा गया | भारतीय कानूनों का वर्गीकरण किया गया तथा इस कार्य के लिए विधि आयोग की नियुक्ति की व्यवस्था की गई।

1853 का राजपत्र

1853 का राजपत्र भारतीय शासन (ब्रिटिश कालीन) के इतिहास में अंतिम चार्टर एक्ट था।  यह अधिनियम मुख्यतः भारतीयों की ओर से कम्पनी के शासन की समाप्ति की मांग तथा तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी की रिपोर्ट पर आधारित था।

इसकी प्रमुख विशेषताएं निम्न थी-
  • ब्रिटिश संसद को किसी भी समय कम्पनी के भारतीय शासन को समाप्त करने का अधिकार प्रदान किया गया।
  • कार्यकारिणी परिषद के कानून सदस्य को परिषद का पूर्ण सदस्य का दर्जा प्रदान किया गया।
  • बंगाल के लिए पृथक गवर्नर की नियुक्ति की व्यवस्था की गयी।
  • गवर्नर जनरल को अपनी परिषद के उपाध्यक्ष की नियुक्ति का अधिकार दिया गया।
  • विधायी कार्यों को प्रशासनिक कार्यों से पृथक करने की व्यवस्था की गयी।
  • निदेशक मंडल में सदस्यों की संख्या 24 से घटाकर 18 कर दी गयी।
  • कम्पनी के कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए प्रतियोगी परीक्षा की व्यवस्था की गयी।
  • भारतीय विधि आयोग की रिपोर्ट पर विचार करने के लिए इंग्लैंड में विधि आयोग के गठन का प्रावधान किया गया।

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September 19, 2020

British Power बंगाल में ब्रिटिश शक्ति की स्थापना

बंगाल में ब्रिटिश शक्ति की स्थापना

बंगाल

मुगलकालीन बंगाल में आधुनिक पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश, बिहार और उड़ीसा शामिल थे। बंगाल में डच, अंग्रेज व फ्रांसीसियों ने व्यापारिक कोठीयां स्थापित की थी जिनमें हुगली सर्वाधिक महत्वपूर्ण थी। 1651 ईस्वी में शाहशुजा से अनुमति लेकर इस इंडिया कंपनी ने बंगाल में हुगली में अपने प्रथम कारखाने की स्थापना की।

1670-17०० ईसवी के बीच बंगाल में अनधिकृत अंग्रेज व्यापारियों जिन्हें इंटरलाॅपर्स कहा जाता था,ने कंपनी नियंत्रण से मुक्त होकर व्यापार किया जो अंग्रेज और मुगलों के बीच संघर्ष का कारण बना।

जॉब चारनाक नामक एक अंग्रेज ने कालिकाता, गोविंदपुर और सूतानाती को मिलाकर आधुनिक कलकत्ता की नींव डाली। कोलकाता में 1700 ई. में फोर्ट विलियम की स्थापना की गई। फोर्ट विलियम का प्रथम गवर्नर चार्ल्स आयर को बनाया गया। इसी समय बंगाल को मद्रास से स्वतंत्र कर अलग प्रेसीडेंसी बना दिया गया।

बंगाल के नवाब

मुर्शीद कुली खां (1717 ई. से 1727 ई.)

बंगाल प्रांत, मुग़ल कालीन भारत का सबसे समृद्ध प्रांत था। औरंगजेब ने मुर्शीद कुली खाँ को बंगाल का दीवान नियुक्त किया था, लेकिन 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुग़ल साम्राज्य की कमजोरी का लाभ उठाकर 1717 ई. में इसने स्वयं स्वतंत्र घोषित कर दिया।

1717 ई. में मुग़ल सम्राट फर्रूखसियर ने एक फरमान द्वारा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल में व्यापार करने की रियायत दे दीं। इस फरमान द्वारा बंगाल में 3000 रु. वार्षिक कर अदा करने पर कंपनी को उसके समस्त व्यापार में सीमा शुल्क से मुक्त कर दिया गया। साथ ही कोलकाता के आसपास के 38 गांवों को खरीदने का अधिकार मिल गया।

फरूखसियर का यह फरमान अंग्रेजो के लिए तो मील का पत्थर साबित हुआ लेकिन बंगाल के नवाबों के लिए यह सिरदर्द बन गया।

अंग्रेजो ने इस विशेषाधिकार का दुरुपयोग शुरु किया, तो मुर्शीद कुली खाँ ने इसका विरोध किया। मुर्शीद कुली खाँ ने फरूखसियर द्वारा दिए गए फरमान का बंगाल में स्वतंत्र प्रयोग नियंत्रित करने का प्रयत्न किया। मुर्शीद कुली खाँ ने बंगाल की राजधानी को ढाका से मुर्शिदाबाद स्थानांतरित किया।

1726 ई. में मुर्शीद कुली खाँ की मृत्यु के बाद उसके दामाद शुजाउद्दीन ने 1727 से 1739 तक बंगाल पर शासन किया। 1739 में शुजाउद्दीन की मृत्यु के बाद सरफराज खां ने सत्ता हथिया ली।

अलीवर्दी_खां

अलीवर्दी खां, सरफराज खां को गिरिया के युद्ध में पराजित कर 1740 में बंगाल का नवाब बना।

अली वर्दी खां ने यूरोपियों की तुलना मधुमक्खियों से की थी

और कहा था यदि उन्हें छेड़ा न जाए तो वे शहद देंगी और यदि छेड़ा जाए तो वे काट-काट कर मार डालेंगी।

सिराजु द्दौला

सिराजुद्दौला के शासनकाल में बंगाल अंग्रेजों और फ्रांसीसियों की आपसी प्रतिद्वंदिता के कारण अशांत था।

फरूखसियर द्वारा प्रदान किये विशेष अधिकार फरमान का, कम्पनी के कर्मचारियों द्वारा दुरूपयोग से सिराजुद्दौला अंग्रेजों से नाराज था। इसके अतिरिक्त अंग्रेजों और फ्रांसीसियों ने बंगाल में स्थान-स्थान पर किलेबंदी शुरू कर दी थी।

सिराजुद्दौला ने अंग्रेजो और फ्रांसीसियों को तत्काल किलेबंदी रोकने का आदेश दिया।

फ्रांसीसियों ने तो नवाब का आदेश मानकर किलेबंदी का काम रोक दिया किन्तु अंग्रेजो ने ऐसा नहीं किया। परिणामस्वरूप सिराजुद्दौला ने कासिम बाजार स्थित अंग्रेजो के किले पर आक्रमण कर उन्हें आत्मसमर्पण के लिए बाध्य किया।

20 जून, 1756 को फोर्ट विलियम ने आत्मसमर्पण कर दिया कुछ शहर छोड कर फुल्टा द्वीप भाग गए। कहा जाता है कि 146 अंग्रेजों को 18 फुट लंबे तथा 14 फुट 10 इंच चौड़े एक कमरे मेँ बंद कर दिया गया था, जिसमें से सिर्फ 23 अंग्रेज ही बच पाए थे। जून, 1756 में घटी यह घटना इतिहास में ब्लैक होल के नाम से विख्यात है।

जनवरी 1757 में राबर्ट क्लाइव और एडमिरल वाटसन ने कोलकाता पर पुनः अधिकार कर लिया। फरवरी 1757 में अंग्रेजो और सिराजुद्दौला के बीच कोलकाता में एक संधि हुई, जिसे अलीनगर की संधि के नाम से जाना जाता है। इस संधि द्वारा अंग्रेजो ने बंगाल में किलेबंदी और सिक्के ढालने की अनुमति प्राप्त की। अलीनगर की संधि द्वारा अंग्रेज और आक्रामक हो गए।

मार्च 1757 में अंग्रेजो ने फ़्रांसिसी क्षेत्र चंद्रनगर पर कब्जा कर लिया। अंग्रेजो ने सिराजुद्दौला के विरुद्ध एक षड्यंत्र रचा जिसमें सिराजुद्दौला के सेनापति मीरजाफर को बंगाल का नवाब बनाने का आश्वासन देकर शामिल किया गया था। अंग्रेजो की गतिविधियो से नाराज होकर सिराजुद्दौला युद्ध की तैयारी करने लगा।

23 जून 1757 को अंग्रेजो और सिराजुद्दौला की सेनाओं के बीच प्लासी नामक स्थान पर एक भीषण युद्ध हुआ, जिसमें सिराजुद्दौला की हार हुई।प्लासी के युद्ध में सिराजुद्दौला की सेना का नेतृत्व मीर जाफर, लतीफ खां, राय दुर्लभ, मीर मदान और मोहन लाल कर रहे थे।

इसमें मीरजाफर और राय दुर्लभ अंग्रेजो से मिले हुए थे। प्लासी के युद्ध में सिराजुद्दौला को बंदी बनाकर बाद में गोली मार दी गई।

मीर जाफर (1757 ई. से 1760 ई.)

प्लासी के युद्ध में विजय के बाद अंग्रेजो ने मीरजाफर को बंगाल का नवाब बनाया। नवाब बनने के बाद मीर जाफर ने पुरस्कार स्वरूप अंग्रेजो को 24 परगना की जमींदारी प्रदान की। साथ ही कंपनी को बंगाल, बिहार, और उड़ीसा में मुक्त व्यापार करने का अधिकार प्रदान किया।

कालांतर में मीर जाफर के अंग्रेजो से संबंध खराब हो गए। इसका कारण प्रशासनिक कार्यों में अंग्रेजो का बढ़ता हस्तक्षेप था। अंग्रेजों की लूटपाट से तंग आकर मीर जाफर ने अक्टूबर 1760 में अपने दामाद मीर कासिम के पक्ष में सिंहासन त्याग दिया।

मीर कासिम (1760 ई. से 1763 ई.)

मीर कासिम ने नवाब बनने के बाद अंग्रेजो को मिदनापुर, बर्दवान तथा चटगांव के तीन जिले सौंप दिए। मीर कासिम ने राजधानी को मुर्शिदाबाद से मुंगेर स्थानांतरित कर दिया। फरुखसियर के 1717 के फरमान के अनुसार कंपनी को पारगमन शुल्क से मुक्त कर दिया गया था। इस तरह की छूट कंपनी के कर्मचारियों के लिए नहीँ थी।

कंपनी के कर्मचारियों द्वारा इस फरमान का दुरुपयोग किया जा रहा था। मीर कासिम ने क्रुद्ध होकर भारतीय व्यापारियों के लिए भी चुंगी समाप्त कर दी। 1763 में मीर कासिम और अंग्रेजो के बीच कई युद्ध हुए, जिसमें अंततः पराजित हुआ और भाग गया।

मीर जाफर (1763 ई. से 1765 ई.)

मीर कासिम के बाद एक बार फिर मीरजाफर बंगाल के सिंहासन पर बैठा। मीर जाफर ने अंग्रेजो की सेना के रखरखाव के लिए बर्दवान, मिदनापुर और चटगांव प्रदान किए तथा बंगाल में उन्मुक्त व्यापार का अधिकार दिया।

1764 में मीरजाफर ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला और मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय को मिलाकर बक्सर नामक स्थान पर अंग्रेजो से युद्ध किया इस युद्ध में अंग्रेजो की विजय हुई।

बक्सर के युद्ध के बाद बंगाल के गवर्नर लार्ड क्लाइव ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला तथा मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय के साथ इलाहाबाद की संधि की। इलाहाबाद की संधि द्वारा मुग़ल सम्राट को कड़ा और इलाहाबाद का क्षेत्र मिला। मुग़ल सम्राट ने कंपनी को बंगाल बिहार की दीवानी का अधिकार दिया।

कंपनी ने उसके बदले 26 लाख रूपये मुग़ल सम्राट को देना स्वीकार किया। शुजाउद्दौला द्वारा कंपनी को युद्ध हर्जाने के रुप में 50 लाख रुपए चुकाने के बाद उसके क्षेत्र पर अधिकार कर लिया गया।

5 फरवरी 1765 को मीर जाफर की मृत्यु के बाद उसके पुत्र नाजीमुद्दौला को बंगाल के नवाब बनाया गया।

द्वैध शासन (1765 ई. से 1772 ई.)

अंग्रेजों ने बंगाल में 1765 में द्वैध शासन की शुरुआत की, जो लगभग 1772 ई. तक चला। लियो कार्टिस को द्वैध शासन का जनक माना जाता है। द्वैध शासन के समय बंगाल से 1760-67 के बीच 2,24,67,500 रुपए की वसूली की गई।

इससे पूर्व राजस्व की वसूली मात्र 80 लाख थी। शासन के समय बंगाल में 1770 ई. में भयंकर अकाल पड़ा, जिसमें करीब एक करोड़ लोगों की भुखमरी के कारण मृत्यु हो गई। 1772 ई. में कोर्ट डायरेक्टर्स ने बंगाल में द्वैध शासन प्रणाली को समाप्त करके प्रशासन का उत्तरदायित्व अपने अधिकार में लेने का आदेश जारी किया।

बंगाल का अंतिम नवाब मुबारक उद्दौला (1770 से 1775) था।

स्मरणीय तथ्य

  • बंगाल में अंग्रेजी व्यापार की मुख्य वस्तुएं थीं – रेशम, सूती कपड़े, शोरा और चीनी।
  • 1757 में कलकत्ता को जीतने के बाद सिराजुद्दौला ने उसका नाम अलीनगर रख दिया था।
  • 1765-1772 तक बंगाल में चले द्वैध शासन को बंगाल के गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स ने समाप्त किया।
  • द्वैध शासन के समय कंपनी ने दीवानी कार्यों के लिए राजा सिताब राय को बिहार तथा मोहम्मद रजा खाँ को बंगाल का नवाब दीवान नियुक्त किया।
  • प्लासी के युद्ध में अंग्रेजो का सेनापति क्लाइव तथा नवाब का सेनापति मीरजाफर थे।
  • फरवरी 1760 में क्लाइव कुछ महीने के लिए गवर्नर का दायित्व हॉलवेल को सौंप कर इंग्लैण्ड वापस चला गया।
  •  हॉलवेल ने मीरजाफर को पदच्युत करने की योजना बनाई।
  • अल्फ्रेड लायल के अनुसार, “प्लासी में क्लाइव की सफलता ने बंगाल में युद्ध तथा राजनीति का एक अत्यंत विस्तृत क्षेत्र अंग्रेजों के लिए खोल दिया।“
  • मुर्शिदाबाद में मीर जाफर को कर्नल क्लाइव का गीदड़ कहा जाता था।
  • मीर जाफर के काल में ‘अंग्रेजो ने बांटो और राज करो’ की नीति को जन्म देते हुए एक गुट को दूसरे गुट से लड़ाने की शुरुआत की।
  • बक्सर के युद्ध में अंग्रेजी सेना का नेतृत्व हेक्टर मुनरो ने किया।
  • पी. ई. रोबर्ट्स ने बक्सर के युद्ध के बारे में कहा था कि, “प्लासी की अपेक्षा बक्सर को भारत में अंग्रेजी प्रभुता की जन्मभूमि मानना कहीं उपयुक्त है।”

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September 19, 2020

Governing Policies ब्रिटिश कंपनी की शासन नीतियां भाग 2

रैयतवाड़ी व्यवस्था

ब्रिटिश कंपनी

स्थायी बंदोबस्त के पश्चात, ब्रिटिश सरकार ने भू-राजस्व की एक नयी पद्धति अपनायी, जिसे रैयतवाड़ी बंदोबस्त कहा जाता है। मद्रास के तत्कालीन गवर्नर (1820-27) टॉमस मुनरो द्वारा 1820 में प्रारंभ की गयी इस व्यवस्था को मद्रास, बम्बई एवं असम के कुछ भागों लागू किया गया।

बम्बई में इस व्यवस्था को लागू करने में बंबई के तत्कालीन गवर्नर (1819-27) एल्फिन्सटन ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। भू-राजस्व की इस व्यवस्था में सरकार ने रैयतों अर्थात किसानों से सीधा बंदोबस्त किया। अब रैयतों को भूमि के मालिकाना हक तथा कब्जादारी अधिकार दे दिये गये तथा वे सीधे या व्यक्तिगत रूप से स्वयं सरकार को लगान अदा करने के लिये उत्तरदायी थे।

इस व्यवस्था ने किसानों के भू-स्वामित्व की स्थापना की। इस प्रथा में जमींदारों के स्थान पर किसानों को भूमि का स्वामी बना दिया गया। इस प्रणाली के अंतर्गत रैयतों से अलग-अलग समझौता कर लिया जाता था तथा भू-राजस्व का निर्धारण वास्तविक उपज की मात्रा पर न करके भूमि के क्षेत्रफल के आधार पर किया जाता था ।

सरकार द्वारा इस व्यवस्था को लागू करने का उद्देश्य, बिचौलियों (जमीदारों) के वर्ग को समाप्त करना था। क्योंकि स्थायी बंदोबस्त में निश्चित राशि से अधिक वसूल की गयी सारी रकम जर्मींदारों द्वारा हड़प ली जाती थी तथा सरकार की आय में कोई वृद्धि नहीं होती थी। अतः आय में वृद्धि करने के लिये ही सरकार ने इस व्यवस्था को लागू किया ताकि वह बिचौलियों द्वारा रखी जाने वाली राशि को खुद हड़प सके। दूसरे शब्दों में इस व्यवस्था द्वारा सरकार स्थायी बंदोबस्त के दोषों को दूर करना चाहती थी।

इस व्यवस्था के अंतर्गत 51 प्रतिशत भूमि आयी। कम्पनी के अधिकारी भी इस व्यवस्था को लागू करने के पक्ष में थे क्योंकि उनका मानना था कि दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम भारत में इतने बड़े जमींदार नहीं है कि उनसे स्थायी बंदोबस्त किया जा सके। इसलिये इन क्षेत्रों में रैयतवाड़ी व्यवस्था ही सबसे उपयुक्त है।

हालांकि इस व्यवस्था के बारे में यह तर्क दिया गया कि यह व्यवस्था भारतीय कृषकों एवं भारतीय कृषि के अनुरूप है किंतु वास्तविकता इससे बिल्कुल भिन्न थी।

व्यावहारिक रूप में यह व्यवस्था जमींदारी व्यवस्था से किसी भी प्रकार कम हानिकारक नहीं थी। इसने ग्रामीण समाज की सामूहिक स्वामित्व की अवधारणा को समाप्त कर दिया तथा जमींदारों का स्थान स्वयं ब्रिटिश सरकार ने ले लिया।

सरकार ने अधिकाधिक राजस्व वसूलने के लिये मनमाने ढंग से भू-राजस्व का निर्धारण किया तथा किसानों को बलपूर्वक खेत जोतने को बाध्य किया। रैयतवाड़ी व्यवस्था के अन्य दोष भी थे। इस व्यवस्था के तहत किसान का भूमि पर तब तक ही स्वामित्व रहता था, जब तक कि वह लगान की राशि सरकार को निश्चित समय के भीतर अदा करता रहे अन्यथा उसे भूमि से बेदखल कर दिया जाता था।

अधिकांश क्षेत्रों में लगान की दर अधिक थी अतः प्राकृतिक विपदा या अन्य किसी भी प्रकार की कठिनाई आने पर किसान लगान अदा नहीं कर पाता था तथा उसे अपनी भूमि से हाथ धोना पड़ता था। इसके अलावा किसानों को लगान वसूलने वाले कर्मचारियों के दुर्व्यवहार का सामना भी करना पड़ता था।

महालवाडी पद्धति

लार्ड हेस्टिंग्स के काल में ब्रिटिश सरकार ने भू-राजस्व की वसूली के लिये भू-राजस्व व्यवस्था का संशोधित रूप लागू किया, जिसे महालवाड़ी बंदोबस्त कहा गया। यह व्यवस्था मध्य प्रांत, यू.पी. (आगरा) एवं पंजाब में लागू की गयी तथा इस व्यवस्था के अंतर्गत 30 प्रतिशत भूमि आयी।

इस व्यवस्था में भू-राजस्व का बंदोबस्त एक पूरे गांव या महाल में जमींदारों या उन प्रधानों के साथ किया गया, जो सामूहिक रूप से पूरे गांव या महाल के प्रमुख होने का दावा करते थे। यद्यपि सैद्धांतिक रूप से भूमि पूरे गांव या महाल की मानी जाती थी किंतु व्यावहारिक रूप में किसान महाल की भूमि को आपस में विभाजित कर लेते थे तथा लगान, महाल के प्रमुख के पास जमा कर देते थे।

तदुपरांत ये महाल-प्रमुख, लगान को सरकार के पास जमा करते थे। मुखिया या महाल प्रमुख को यह अधिकार था कि वह लगान अदा न करने वाले किसान को उसकी भूमि से बेदखल कर सकता था। इस व्यवस्था में लगान का निर्धारण महाल या सम्पूर्ण गांव के उत्पादन के आधार पर किया जाता था।

महालवाड़ी बंदोबस्त का सबसे प्रमुख दोष यह था कि इसने महाल के मुखिया या प्रधान को अत्यधिक शक्तिशाली बना दिया। किसानों को भूमि से बेदखल कर देने के अधिकार से उनकी शक्ति अत्यधिक बढ़ गयी तथा वे यदाकदा मुखियाओं द्वारा इस अधिकार का दुरुपयोग किया जाने लगा।

इस व्यवस्था का दूसरा दोष यह था कि इससे सरकार एवं किसानों के प्रत्यक्ष संबंध बिल्कुल समाप्त हो गये। इस प्रकार अंग्रेजों द्वारा भारत में भू-राजस्व वसूलने की विभिन्न पद्धतियों को अपनाया गया।

इन पद्धतियों को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग समय पर लागू किया गया। किंतु इन सभी प्रयासों के पीछे अंग्रेजों का मूल उद्देश्य अधिक से अधिक भू-राजस्व को हड़प कर अपनी आय में वृद्धि करना था तथा किसानों की भलाई से उनका कोई संबंध नहीं था।

इसके कारण धीरे-धीरे भारतीय कृषक वर्ग कंगाल होने लगा तथा भारतीय कृषि बर्बाद हो गयी।

ब्रिटिश शासन का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

1 अनौद्योगीकरण – भारतीय हस्तशिल्प का ह्रास

अंग्रेजी माल का भारतीय बाजार में आने से भारतीय हस्तशिल्प का भारत में ह्रास हुआ ,जबकि कारखानों के खुलने से यूरोपीय बाजार में भारतीय हस्तशिल्प को नुकसान हुआ | भारत में अनेक शहरों का पतन तथा भारतीय शिल्पियों का गांव की तरफ पलायन का मुख्य कारण अनौद्योगीकरण ही था |

भारतीय दस्तकारों ने अपने परंपरागत व्यवसाय को त्याग दिया व गांव में जाकर खेती करने लगे | भारत एक सम्पूर्ण निर्यातक देश से सम्पूर्ण आयतक देश बन गया |

2 कृषकों की बढ़ती हुई दरिद्रता ( कारण )

  • जमींदारों के द्वारा शोषण |
  • जमीन की उर्वरता बढ़ाने में सरकार द्वारा प्रयाप्त कदम न उठाया जाना|
  • ऋण के लिए सूदखोरो पर निर्भरता |
  • अकाल व अन्य प्राकृतिक आपदा |

3 पुराने जमींदारों की तबाही तथा नई जमींदारी व्यवस्था का उदय —

नए जमींदार अपने हितों को देखते हुए अंग्रेजों के साथ रहे और किसानों से कभी भी उनके सम्बन्ध अच्छे नही रहे |

4 कृषि में स्थिरता एवं उसकी बर्बादी —

  • किसानों में धन, तकनीक व कृषि से सम्बंधित शिक्षा का अभाव था |
  • जिसके कारण भारतीय कृषि का धीरे धीरे पतन होने लगा व उत्पादकता में कमीं आने लगी |

5 भारतीय कृषि का वाणिज्यीकरण

वाणिज्यीकरण और विशेषीकरण को कई कारणों ने प्रोत्साहित किया जैसे मुद्रा अर्थव्यवस्था का प्रसार ,रूढ़ि और परंपरा के स्थान पर संविदा और प्रतियोगिता ,एकीकृत राष्ट्रीय बाजार का अभ्युदय,देशी एवं विदेशी व्यपार में वृद्धि ,रेलवे एवं संचार साधनों से राष्ट्रीय मंडी का विकास एवं अंग्रेजी पूंजी के आगमन से विदेशी व्यापार में वृद्धि |

भारतीय कृषि पर वाणिज्यीकरण का प्रभाव—

  • कुछ विशेष प्रकार के फसलों का उत्पादन राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए होने लगा |
  • भूमि कर अत्यधिक होने के कारण किसान इसे अदा करने में असमर्थ था और मजबूरन उसे वाणिज्यिक फसलों का उत्पादन करना पड़ता था |
  • कृषि मूल्यों पर विदेशी उतार चढ़ाव का भी प्रभाव पड़ने लगा |

6 आधुनिक उद्योगों का विकास

19 वीं शताब्दी में भारत में बड़े पैमाने पर आधुनिक उद्योगों की स्थापना की गई , जिसके फलस्वरूप देश में मशीनी युग प्रारम्भ हुआ | भारत में पहली सफल सूती वस्त्र मिल 1853 में कवासजी नानाभाई ने बम्बई में स्थापित की और पहली जूट मिल 1855 में रिशरा में स्थापित किया गया |आधुनिक उद्योगों का विकास मुख्यतः विदेशियों के द्वारा किया गया |

विदेशियों का भारत में निवेश करने के मुख्य कारण थे —
  • भारत में सस्ते श्रम की उपलब्धता|
  • कच्चे एवं तैयार माल की उपलब्धता|
  • भारत एवम उनके पडोसी देशों में बाजार की उपलब्धता|
  • पूंजी निवेश की अनुकूल दशाएं|
  • नौकरशाहियों के द्वारा उद्योगपतियों को समर्थन देने की दृढ इच्छाशक्ति|
  • कुछ वस्तुओं के आयात के लाभप्रद अवसर|

7 आर्थिक निकास —

भारतीय उत्पाद का वह हिस्सा , जो जनता के उपभोग के लिए उपलब्ध नहीं था तथा राजनितिक कारणों से जिसका प्रवाह इंग्लैंड की ओर हो रहा था ,जिसके बदले में भारत को कुछ भी प्राप्त नहीं होता था ,उसे ही आर्थिक निकास कहा गया 

दादा भाई नौरोजी ने सर्वप्रथम अपनी पुस्तक ‘पावर्टी एंड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया’ में आर्थिक निकास की अवधारणा प्रस्तुत की |

आर्थिक निकास के तत्व —

  • अंग्रेज प्रशासनिक एवं सैनिक अधिकारियों के वेतन |
  • भारत के द्वारा विदेशों से लिए गए ऋण का ब्याज|
  • नागरिक एवं सैन्य विभाग के लिए विदेशों से खरीदी गई वस्तुएं|
  • नौवहन कंपनियों को की गई अदायगी तथा विदेशी बैंकों तथा बीमा कंपनियों को दिया गया धन|
  • गृह व्यय तथा ईस्ट इंडिया कंपनी के भागीदारों का लाभांश|

8 अकाल एवं गरीबी

प्राकृतिक विपदाओं ने भी किसानों को गरीब बनाया | अकाल के दिनों में चारे के आभाव में पशुओं की मृत्यु हो जाती थी |पशुओं व संसाधनों के आभाव में कई बार किसान खेती ही नही कर पाते थे |

औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था की राष्ट्रवादी आलोचना —
  • औपनिवेशिक शोषण के कारण ही भारत दिनोंदिन निर्धन होता जा रहा है|
  • गरीबी की समस्यां और निर्धनता में वृद्धि हो रही थी |
  • ब्रिटिश शासन की व्यपार,वित्त ,आधारभूत विकास तथा व्यय की नीतियां साम्राज्यवादी हितों के अनुरूप है |
  • भारतीय शोषण को रोकने एवं भारत की स्वतंत्र अर्थव्यवस्था को विकसित करने की मांग की गई |

भाग 👉👉👉 1

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September 18, 2020

Governing Policies ब्रिटिश कंपनी की शासन नीतियां भाग 1

ब्रिटिश कंपनी की शासन नीतियां

ब्रिटिश कंपनी

अंग्रेजों की भू राजस्व नीतियां 

अंग्रेजों के आगमन से पूर्व भारत में जो परम्परागत भूमि व्यवस्था कायम थी उसमें भूमि पर किसानों का अधिकार था तथा फसल का एक भाग सरकार को दे दिया जाता था। 1765 में इलाहाबाद की संधि के द्वारा ईस्ट इंडिया कम्पनी ने बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा की दीवानी प्राप्त कर ली।

यद्यपि 1771 तक ईस्ट इंडिया कम्पनी ने भारत में प्रचलित पुरानी भू-राजस्व व्यवस्था को ही जारी रखा किंतु कम्पनी ने भू-राजस्व की दरों में वृद्धि कर दी।  धीरे-धीरे कम्पनी के खर्चे में वृद्धि होने लगी, जिसकी भरपाई के लिये कम्पनी ने भू-राजस्व की दरों को बढ़ाया। ऐसा करना स्वाभाविक भी था क्योंकि भू-राजस्व ही ऐसा माध्यम था जिससे कम्पनी को अधिकाधिक धन प्राप्त हो सकता था।

ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपने आर्थिक व्यय की पूर्ति करने तथा अधिकाधिक धन कमाने के उद्देश्य से भारत की कृषि व्यवस्था में हस्तक्षेप करना प्रारंभ कर दिया तथा कृषि के परम्परागत ढांचे को समाप्त करने का प्रयास किया। यद्यपि क्लाइव तथा उसके उत्तराधिकारियों के समय तक भू-राजस्व पद्धति में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं किया गया तथा इस समय तक भू-राजस्व की वसूली बिचौलियों (जमीदारों या लगान के ठेकेदारों) के माध्यम से ही की जाती रही, किंतु उसके पश्चात कम्पनी द्वारा नये प्रकार के कृषि संबंधों की शुरुआत की गयी।

इसके परिणामस्वरूप कम्पनी ने करों के निर्धारण और वसूली के लिये कई नये प्रकार के भू-राजस्व बंदोबस्त कायम किये।

मुख्य रूप से अंग्रेजों ने भारत में तीन प्रकार की भू-धृति पद्धतियां अपनायीं।
  • जमींदारी
  • रैयतवाड़ी एवं
  • महालवाड़ी।

यद्यपि प्रारंभ में (1772 में) वारेन हेस्टिग्स ने इजारेदारी प्रथा भी प्रारंभ की थी किंतु यह व्यवस्था ज्यादा दिनों तक नहीं चली तथा ब्रिटिश शासनकाल में यही तीन भू-राजस्व व्यवस्थायें हीं प्रभावी रहीं।

जमींदारी प्रथा मुख्यतया बंगाल में ही लागू की गयी थी। तत्पश्चात लागू की गयी जमींदारी या स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था को बंगाल, बिहार, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश के बनारस तथा कर्नाटक के उत्तरी भागों में लागू किया गया।

रैयतवाड़ी पद्धति मद्रास, बम्बई तथा असम के कुछ भागों में लागू की गयी। जबकि महालवाड़ी पद्धति मध्य प्रांत, यू.पी. एवं पंजाब में लागू की गयी। इन विभिन्न भू-राजस्व व्यवस्थाओं का वर्णन इस प्रकार है।

इजारेदारी प्रथा

1772 में वारेन हेस्टिंग्स ने एक नयी भू-राजस्व पद्धति लागू की, जिसे ‘इजारेदारी प्रथा’ के नाम से जाना गया है। इस पद्धति को अपनाने का मुख्य उद्देश्य अधिक भू-राजस्व वसूल करना था। इस व्यवस्था की मुख्य दो विशेषतायें थीं-

इसमें पंचवर्षीय ठेके की व्यवस्था थी तथा सबसे अधिक बोली लगाने वाले को भूमि ठेके पर दी जाती थी। किंतु इस व्यवस्था से कम्पनी को ज्यादा लाभ नहीं हुआ क्योंकि इस व्यवस्था से उसकी वसूली में अस्थिरता आ गयी।

पंचवर्षीय ठेके के इस दोष के कारण 1777 ई. में इसे परिवर्तित कर दिया गया तथा ठेके की अवधि एक वर्ष कर दी गयी अर्थात अब भू-राजस्व की वसूली का ठेका प्रति वर्ष किया जाने लगा। किंतु प्रति वर्ष ठेके की यह व्यवस्था और असफल रही क्योंकि इससे भू-राजस्व की दर तथा वसूल की राशि की मात्रा प्रति वर्ष परिवर्तित होने लगी। इससे कम्पनी को यह अनिश्चितता होती थी कि अगले वर्ष कितना लगान वसूल होगा।

इस व्यवस्था का एक दोष यह भी था कि प्रति वर्ष नये-नये व्यक्ति ठेका लेकर किसानों से अधिक से अधिक भू-राजस्व वसूल करते थे। चूंकि इसमें इजारेदारों (ठेकेदारों या जमींदारों) का भूमि पर अस्थायी स्वामित्व होता था, इसलिये वे भूमि सुधारों में कोई रुचि नहीं लेते थे। उनका मुख्य उद्देश्य अधिक से अधिक लगान वसूल करना होता था।

इसके लिये वे किसानों का उत्पीड़न भी करते थे। ये इजारेदार वसूली की पूरी रकम भी कम्पनी को नहीं देते थे। इस व्यवस्था के कारण किसानों पर अत्यधिक बोझ पड़ा। तथा वे कंगाल होने लगे। यद्यपि यह व्यवस्था काफी दोषपूर्ण थी फिर भी इससे कम्पनी की आय में वृद्धि हुयी।

स्थायी बंदोबस्त

पृष्ठभूमिः- बंगाल की लगान व्यवस्था 1765 से ही कम्पनी के लिये एक समस्या बनी हुयी थी। क्लाइव ने इस व्यवस्था में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं किया तथा उसके काल में वार्षिक लगान व्यवस्था ही जारी रही। बाद में वारेन हेस्टिंग्स ने लगन व्यवस्था में सुधार के लिए इजारेदारी प्रथा लागु की किन्तु इससे समस्या सुलझने के बजाय और उलझ गयी। इस व्यवस्था के दोषपूर्ण प्रावधानों के कारण कृषक बर्बाद होने लगे तथा कृषि का पराभव होने लगा।

1886 में जब लार्ड कार्नवालिस गवर्नर-जनरल बनकर भारत आया उस समय कम्पनी की राजस्व व्यवस्था अस्त-व्यस्त थी तथा उस पर पर्याप्त वाद-विवाद चल रहा था। अतः उसके सम्मुख सबसे प्रमुख कार्य कम्पनी की लगान व्यवस्था में सुधार करना था।

प्रति वर्ष ठेके की व्यवस्था के कारण राजस्व वसूली में आयी अस्थिरता एवं अन्य दोषों के कारण कम्पनी के डायरेक्टरों ने कार्नवालिस को आदेश दिया कि वह सर्वप्रथम लगान व्यवस्था की दुरुस्त करे तथा वार्षिक ठेके की व्यवस्था से उत्पन्न दोषों को दूर करने के लिये जमींदारों से स्थायी समझौता कर ले।

डायरेक्टरों का यही आदेश अंत में स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था का सबसे मुख्य कारण बना। इसके फलस्वरूप भू-राजस्व या लगान के संबंध में जो व्यवस्था की गयी, उसे ‘जमींदारी व्यवस्था’ या ‘इस्तमरारी व्यवस्था’ या ‘स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था’ के नाम से जाना जाता है।

यद्यपि प्रारंभ में इस व्यवस्था से संबंधित कुछ समस्यायें थीं। जैसे-
  • समझौता किससे किया जाये ? किसान से या जमींदार से।
  • राज्य की पैदावार का कितना भाग लगान के रूप में प्राप्त हो। और यह समझौता कुछ वर्षों के लिये किया जाये या स्थायी रूप से।

प्रारंभ में इन समस्याओं के संबंध में जान शोर, चार्ल्स ग्रांट एवं स्वयं कार्नवालिस में तीव्र मतभेद थे।अतः इन समस्याओं पर पर्याप्त एवं पूर्ण विचार किया गया। अंत में प्रधानमंत्री पिट्, बोर्ड आफ कंट्रोल के सभापति डण्डास, कम्पनी के डायरेक्टर्स, जॉन शोर, चार्ल्स ग्रांट तथा कार्नवालिस की आपसी सहमति से 1790 में जमींदारों के साथ 10 वर्ष के लिये समझौता किया गया, जिसे 22 मार्च 1793 में स्थायी कर दिया गया।

यह व्यवस्था बंगाल, बिहार, उड़ीसा, यू.पी. के बनारस प्रखण्ड तथा उत्तरी कर्नाटक में लागू की गयी। इस व्यवस्था के तहत ब्रिटिश भारत के कुल क्षेत्रफल का लगभग 19 प्रतिशत भाग सम्मिलित था।

विशेषतायें:

इसकी निम्न विशेषतायें थीं-

  • जमीदारों को भूमि का स्थायी मालिक बना दिया गया। भूमि पर उनका अधिकार पैतृक एवं हस्तांतरणीय था। उन्हें उनकी भूमि से तब तक पृथक नहीं किया जा सकता था, जब तक वे अपना निश्चित लगान सरकार को देते रहें।
  • किसानों को मात्र रैयतों का नीचा दर्जा दिया गया तथा उनसे भूमि सम्बन्धी तथा अन्य परम्परागत अधिकारों को छीन लिया गया।
  • जमींदार, भूमि के स्वामी होने के कारण भूमि को खरीद या बेच सकते थे।
  • जमींदार, अपने जीवनकाल में या वसीयत द्वारा अपनी जमींदारी अपने वैध उत्तराधिकारी को दे सकते थे।
  • जमींदारों से लगान सदैव के लिये निश्चित कर दिया गया।
  • सरकार का किसानों से कोई प्रत्यक्ष सम्पर्क नहीं था।
  • जमीदारों को किसानों से वसूल किये गये भू-राजस्व की कुल रकम का 10/11 भाग कम्पनी को देना था तथा 1/11 भाग स्वयं रखना था।
  • तय की गयी रकम से अधिक वसूली करने पर, उसे रखने का अधिकार जमींदारों को दे दिया गया।
  • यदि कोई जमींदार निश्चित तारीख तक, भू-राजस्व की निर्धारित राशि जमा नहीं करता था तो उसकी जमींदारी नीलाम कर दी जाती थी।
  • कम्पनी की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुयी।

उद्देश्यः

कंपनी द्वारा भू-राजस्व की स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था को लागू करने के मुख्य दो उद्देश्य थे–

  • इंग्लैण्ड की तरह, भारत में जमींदारों का एक ऐसा वर्ग तैयार करना, जो अंग्रेजी साम्राज्य के लिये सामाजिक आधार का कार्य कर सके।
  • भारत में कम्पनी के फैलते साम्राज्य के मद्देनजर अंग्रेजों ने महसूस किया कि भारत जैसे विशाल देश पर नियंत्रण बनाये रखने के लिये उनके पास एक ऐसा वर्ग होना चाहिये, जो अंग्रेजी सत्ता को सामाजिक आधार प्रदान कर सके।
  • इसीलिये अंग्रेजों ने जमींदारों का ऐसा वर्ग तैयार किया जो कम्पनी की लूट-खसोट से थोड़ा सा हिस्सा प्राप्त कर संतुष्ट हो जाये तथा कम्पनी को सामाजिक आधार प्रदान करे।
  • कम्पनी की आय में वृद्धि करना। चूंकि भू-राजस्व कम्पनी की आय का अत्यंत प्रमुख साधन था अतः कम्पनी अधिक से राजस्व प्राप्त करना चाहती थी।

स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था के लाभ व हानियां

स्थायी बंदोस्त व्यवस्था के संबंध में इतिह्रासकारों ने अलग-अलग राय प्रकट की है। कुछ इतिह्रासकारों ने इसे साहसी एवं बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य माना है तो कुछ ने इसका तीव्र विरोध किया है-

तुलनात्मक तौर पर इस व्यवस्था से होने वाले लाभ व हानियां इस प्रकार थीं-

लाभ: जमींदारों को-

  • इस व्यवस्था से सबसे अधिक लाभ जमींदारों को ही हुआ। वे स्थायी रूप से भूमि के मालिक बन गये।
  • लगान की एक निश्चित रकम सरकार को देने के पश्चात काफी बड़ी धनराशि जमींदारों को प्राप्त होने लगी।
  • अधिक आय से कालांतर में जमींदार अत्यधिक समृद्ध हो गये तथा वे सुखमय जीवन व्यतीत करने लगे। बहुत से जमींदार तो गांव छोड़कर शहरों में बसे गए।

लाभ: सरकार को

  • जमींदारों के रूप में सरकार को ऐसा वर्ग प्राप्त हो गया, जो हर परिस्थिति में सरकार का साथ देने को तैयार था।
  • जमींदारों के इस वर्ग ने अंग्रेजी सत्ता को सामाजिक आधार प्रदान किया तथा कई अवसरों पर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध किये गये विद्रोहों को कुचलने में सरकार की सहायता की।
  • कालांतर में इन जमींदारों ने अनेक संस्थायें (जैसे-लैंड ओनर एसोसिएशन, लैंड होल्डर्स एसोसिएशन इत्यादि) बनायीं तथा राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष में सरकार के प्रति अपनी अटूट निष्ठा घोषित की।
  • सरकार की आय में अत्यधिक वृद्धि हो गयी।सरकार की आय निश्चित हो गयी, जिससे अपना बजट तैयार करने में उसे आसानी हुयी।
  • सरकार को प्रतिवर्ष राजस्व की दरें तय करने एवं ठेके देने के झंझट से मुक्ति मिल गयी।
  • कम्पनी के कर्मचारियों को लगान व्यवस्था से मुक्ति मिल गयी, जिससे वे कम्पनी के व्यापार की ओर अधिक ध्यान दे सके।
  • उसके प्रशासनिक व्यय में भी कमी आयी तथा प्रशासनिक कुशलता बढ़ी।

अन्य :

  • राजस्व में वृद्धि की संभावनाओं के कारण जमींदारों ने कृषि में स्थायी रूप से रुचि लेनी प्रारंभ कर दी तथा कृषि उत्पादन में वृद्धि के अनेक प्रयास किये। इससे कृषि उत्पादन में वृद्धि हुयी।
  • कृषि में उन्नति होने से व्यापार एवं उद्योग की प्रगति हुयी।
  • जमींदारों से न्याय एवं शांति स्थापित करने की जिम्मेदारी छीन ली गयी, जिससे उनका ध्यान मुख्यतया कृषि के विकास में लगा तथा इससे सूबों की आर्थिक संपन्नता में वृद्धि हुयी।सूबों की आर्थिक संपन्नता से सरकार को लाभ हुआ।

हानियां :

  • इस व्यवस्था से सबसे अधिक हानि किसानों को हुयी। इससे उनके भूमि संबंधी तथा अन्य परम्परागत अधिकार छीन लिये गये तथा वे केवल खेतिहर मजदूर बन कर रह गये।
  • किसानों को जमींदारों के अत्याचारों व शोषण का सामना करना पड़ा तथा वे पूर्णतया जमीदारों की दया पर निर्भर हो गये।
  • वे जमींदार, जो राजस्व वसूली की उगाही में उदार थे, भू-राजस्व की उच्च दरें सरकार को समय पर नहीं अदा कर सके, उन्हें बेरहमी के साथ बेदखल कर दिया गया तथा उनकी जमींदारी नीलाम कर दी गयी।
  • जमीदारों के समृद्ध होने से वे विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत करने लगे। जिससे सामाजिक भ्रष्टाचार में वृद्धि हुयी।
  • स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था ने कालांतर में राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष को भी हानि पहुंचायी। जर्मींदारों का यह वर्ग स्वतंत्रता संघर्ष में अंग्रेज भक्त बना रहा तथा कई अवसरों पर तो उसने राष्ट्रवादियों के विरुद्ध सरकार की मदद भी की।
  • इस व्यवस्था से किसान दिनों-दिन निर्धन होते गये तथा उनमें सरकार तथा जमींदारों के विरुद्ध असंतोष बढ़ने लगा।
  • कालांतर में होने वाले कृषक आंदोलनों में से कुछ के लिये इस असंतोष ने भी योगदान दिया।
  • इस प्रकार इस व्यवस्था ने कुछ कृषक आंदोलनों की पृष्ठभूमि तैयार करने में अप्रत्यक्ष भूमिका निभायी।
  • इस व्यवस्था से सरकार को भी हानि हुयी क्योंकि कृषि उत्पादन में वृद्धि के
  • साथ-साथ उसकी आय में कोई वृद्धि नहीं हुयी तथा उसका सम्पूर्ण लाभ केवल जमींदारों को ही प्राप्त होता रहा।

इस प्रकार स्पष्ट है कि स्थायी बंदोबस्त से सर्वाधिक लाभ जमींदारों को हुआ। यद्यपि सरकार की आय भी बढ़ी किंतु अन्य दृष्टिकोणों से इससे लाभ के स्थान पर हानि अधिक हुयी।  

इसके अतिरिक्त सम्पूर्ण लाभ 15-20 वर्ष या इससे थोड़े अधिक समय के बंदोबस्त द्वारा प्राप्त किये जा सकते थे और इस बंदोबस्त को स्थायी करने की आवश्यकता नहीं थी।

इस प्रकार स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था कुछ समय के लिए भले ही लाभदायक रही हो किन्तु रही हो किंतु इससे कोई दीर्घकालिक लाभ प्राप्त नहीं हुआ।

इसीलिये कुछ स्थानों के अलावा अंग्रेजों ने इस व्यवस्था को भारत के अन्य भागों में लागू नहीं किया। स्वतंत्रता के पश्चात सभी स्थानों से इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया।

भाग 👉👉👉 2

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September 18, 2020

Vijayanagar and Bahmanid बहमनी एवं विजयनगर साम्राज्य

बहमनी_एवं विजयनगर साम्राज्य

बहमनी_साम्राज्य

बहमनी_राज्य की स्थापना दक्षिण भारत में मुहम्मद तुगलक के खिलाफ विद्रोह से हुई ।  1347 ई. में हसन गंगु, अलाउद्दीन बहमनशाह के नाम से गद्दी पर बैठा और दक्षिण में मुस्लिम राज्य की नींव रखी । यह मुस्लिम राज्य भारत में बहमनी राज्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।

बहमनी_राज्य के_शासक

अलाउद्दीन हसन बहमन शाह (1347-1358 ई.)-

मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में  1347 ई. में सरदारों ने हसन गंगु को अबल मुजफ्फर अलाउद्दीन बहमन शाह के नाम से सुल्तान घोषित किया। गुलबर्गा में अपनी राजधानी स्थापित की और उसका नाम अहसनाबाद रखा । इसकी राजभासा मराठी थी।

मुहम्मद शाह प्रथम (1358-1373 ई.) –

वह एक कुशल संगठक था । मुहम्मद शाह प्रथम बहमनी राज्य का महान शासक हुआ । तेलगांना से गोलकुंडा के किले को छीन लिया और 22 लाख रूपये क्षतिपूर्ति की राशि भी वसुल लिया । 1375 ई. में उनका देहान्त हो गया ।

अलाउद्दीन मुहम्मद(मुजाहिदीन) (1373-1378 ई.)

1378 ई. में उसके चाचा दाऊद खां ने उसका वध करवा दिया ।

दाऊद खां (1378 ई)

केवल एक माह तक राज्य किया ।

मुहम्मदशाह द्वितीय (1377 – 1397 ई.) –

वह शान्ति प्रिय व उदार शासक था ।

गयासुद्दीन, शम्सुद्दीन, दाऊद तथा फिरोजशाह-

मुहम्मद शाह की मृत्यु के बाद उसके दो पुत्र गयासुद्दीन तथा शम्सुद्दीन एक एक करके गद्दी पर बैठे । शिहाबुद्दीन अहमद ने अपनी राजधानी गुलबर्गा से हटाकर बीदर में स्थापित की ।इसने बीदर का नया नाम मुहम्मदाबाद रखा ।

महमूद गवाँ ने बीदर एक महाविद्यालय की स्थापना कराई

ताजुद्दीन फिरोज शाह (1397-1422 ई.)-

1397 ई. में ताजुद्दीन फिरोज शाह बहमनी राज्य का सुल्तान था । वह कला प्रेमी तथा साहित्यकार था, जो अनेक भाषाओं का ज्ञाता था । वह विद्वानों का संरक्षक था । इसने विजयनगर से तीन युद्ध किये जिसमे से दो में विजयी रहा। भीमा नदी के तट पर फीरोजाबाद की स्थापना ताज-उद्दीन-फिरोज ने की थी

1417ई0 में रुसी यात्री निकितन बहमनी सम्राज्य की यात्रा पर आया ।इस समय बहमनी राज्य पर ताज-उद्दीन-फिरोज का शासन था

अहमदशाह (1422-1435 ई.)

1422 ई. में फिरोज शाह का भाई अहमद शाह गद्दी पर बैठा। अहमद शाह के समय में गुलबर्गा विद्रोह तथा षड्यन्त्रों का केन्द्र बन गया उसने गुलबर्गा को हटाकर बीदर को अपनी राजधानी बनाया ।

उसने वारंगल पर चढ़ाई कर उसे हस्तगत कर लिया। उसने काकतीय राज्य को भी जीत लिया था । विजयनगर से उसने कर वसूल किया  उसने गुजरात तथा कोंकण के सामन्तों को भी पराजित किया ।

1435 ई. में उसका देहान्त हो गया ।

अलाउद्दीन द्वितीय (1435-1457 ई.)

अहमद शाह के बाद उसका पुत्र अलाउद्दीन द्वितीय सिहासनारूढ़ हुआ ।  उसने कोंकण पर चढ़ाई की, परिणामस्वरूप कोंकण के शासक ने अधीनता स्वीकार कर ली । उसके भाई ने विद्रोह कर रायचूर तथा बीजापुर उससे छीन लिया ।

सुल्तान ने उसे उस विद्रोह के लिए क्षमा कर दिया तथा उसे रायचूर दे दिया । उसके समय में दक्षिणी तथा विदेशी मुसलमानों पर पारस्परिक विरोध आकाश छू रहा था । अलाउद्दीन द्वितीय ने साहस के साथ विजयनगर पर आक्रमण किया तथा उसे कर देने के लिए बाध्य किया ।

हूमायूंशाह(1457-1461 ई.)-

हुमायूं दक्षिण में नीरों के नाम से जाना जाता था । वह विद्वान था, पर निर्दयी तथा क्रूर था । अमीर उसकी क्रूरता से भयभीत रहते थे ।

निजाम शाह (1461-1463 ई.)-

हुमायूं की मृत्यु के समय निजाम शाह आठ वर्ष का था । उसे ही गावान ने गद्दी पर आसीन किया । निजाम की माता उसकी संरक्षिका थी उसने अपने पति द्वारा दण्डित किए गए सारे व्यक्तियों को छोड़ दिया ।

उस पर अवसर देखकर तेलंगाना के शासकों ने चढ़ाई कर दी, पर उसने बुद्धिमानी तथा वीरता से उन्हें खदेड़ दिया । इसी समय उसने गुजरात पर कब्जा कर लिया ।

1463 ई. में निजाम शाह की मृत्यु हो गयी।

मुहम्मद शाह तृतीय (1463-1482 ई.)-

निजाम शाह के निधन के बाद चाचा मुहम्मद शाह तृतीय के नाम से गद्दी पर बैठा । उसने अलना का प्रदेश संगमेश्वरम् राजा से छीन लिया ।विजयनगर तथा उड़ीसा पर भी आक्रमण किया । वहां लूट में हाथियों के साथ अपार धन मिला।

उसके शासनकाल में महमूद गवां के हाथों पूरी शक्ति केन्द्रित थी । महमदू गवां बहमनी राज्य का प्रतिभाशाली प्रधानमन्त्री था । वह पहले मिलानी (ईरान) का रहने वाला था । वह एक व्यापारी के रूप में गुलबर्गा आया था ।

अपनी योग्यता और कुशलता के बल पर वह प्रधानमंत्री के पद तक पहुंच गया । उसने दक्षिण में विदेशी अमीरों के झगड़ों को शान्त किया ।

कलीम उल्लाह बहमनी वंश का अंतिम शासक था

  • बीजापुर राज्य के संस्थापक—युसुफ आदिल शाह(आदिलशाही वंश) ।
  • अहमदनगर—मलिक अहमद(निजामशाही वंश) ।
  • बरार—फतेहउल्लाह इमादशाह (इमादशाही वंश) ।
  • गोलकुण्डा-कुलीकुतुबशाह (कुतुबशाही वंश) ।
  • बीदर—अमीर अली बरीद(बरीदशाही वंश) ।

बहमनी राज्य में कुल 18 शासक हुए, जिन्होंने कुल मिलाकर 175 वर्ष शासन किया ।

बहमनी राज्य के पतन के कारण

1⃣ विलासी शासक- बहमनी_राज्य के शासक प्राय: विलासी थे । वे सुरा सुन्दरी में डूबे रहते थे । विजयनगर के साथ निरन्तर संघर्ष के कारण प्रबन्ध पर विचार करने के लिए उन्हें अवसर नहीं मिला ।

2⃣ दक्षिण भारत तथा विदेशी अमीरों में संघर्ष – इस संघर्ष ने बहमनी राज्य को दुर्बल बना दिया ।

3⃣ धर्मान्धता- सुल्तानों की धर्मान्धता तथा असहिष्णुता के कारण, सामान्य जनता उनसे घृणा करती थी ।

4⃣ महमूद गंवा का वध – महमूद गवां के वध से योग्य तथा ईमानदार कर्मचारी निराश हुए इससे उनकी राजभक्ति में कमी आई । महमूद गवां की हत्या बहमनी राज्य के लिए एक ऐतिहासिक घटना थी, क्योंकि उसकी हत्या के पश्चात् बहमनी राज्य का पतन आरम्भ हो गया ।

5⃣ कमजोर शासक- महमूदशाह कमजोर शासक था । उत्तराधिकारी के सुनिश्चित नियम नहीं थे तथा राजकुमारों के सही प्रशिक्षण की व्यवस्था भी नहीं थी ।

अत: उपर्युक्त कारणों से बहमनी राज्य का पतन हो गया ।

स्थापत्य कला-

  • सुल्तानों ने अपने शासनकाल में अनेक भव्य भवनों का निर्माण करवाया ।
  • गुलबर्गा तथा बीदर के राजमहल, गेसुद राज की कब्र, चार विशाल दरवाजे वाला फिरोज शाह का महल, मुहम्मद आदिल शाह का मकबरा, जामा मस्जिद, बीजापुर की गोल गुम्बद तथा बीजापुर सुल्तानों के मकबरे स्थापत्य कला के उत्कृष्ट नमूने है ।
  • गोल गुम्बद को विश्व के गुम्बदों में श्रेष्ठ माना जाता है ।
  • गोलकुंडा तथा दौलताबाद के किले भी इसी श्रेणी में आते हैं ।
  • इस स्थापत्य कला में हिन्दू, तुर्की, मिस्त्री, र्इरानी तथा अरेबिक कलाओं का सम्मिश्रण है ।

साहित्य संगीत-

बहमनी के सुल्तानों ने साहित्य तथा संगीत को प्रोत्साहित किया। ताजउद्दीन फिरोज शाह स्वयं फारसी, अरबी और तुर्की भाषाओं का विद्वान था उसकी अनेक हिन्दू रानियां भी थी ।

वह प्रत्येक रानी से उसी की भाषा में बोलता था । मुहम्मद शाह तृतीय तथा उसका वजीर महमूद गवां एक विद्वान था । उसने शिक्षा का प्रचार किया । विद्यालय तथा पुस्तकालय खोले । इसके निजी पुस्तकालय में 3000 पुस्तकें थीं ।

उसके दो ग्रंथ अत्यधिक प्रसिद्ध हैं –

  • उरोजात-उन-इंशा
  • दीवाने अश्र

इस काल में प्रादेशिक तथा ऐतिहासिक साहित्य का उन्नयन हुआ ।

क़िले और मस्जिदे:-

बहमनी सुल्तानों ने गाबिलगढ़ और नरनाल में मज़बूत क़िले बनवाये और गुलबर्ग एवं बीदर में कुछ मस्जिदें भी बनवायीं। बहमनी सल्तनत के इतिहास से प्रकट होता है कि हिन्दू आबादी को सामूहिक रूप से किस प्रकार जबरन मुसलमान बनाने का सुल्तानों का प्रयास किस प्रकार विफल हुआ।

बहमनी सल्तनत की अपने पड़ोसी विजयनगर के हिन्दू राज्य से लगातार अनबन चलती रही। विजयनगर राज्य उस समय.तुंगभद्रा नदी.के दक्षिण और कृष्णा नदी के उत्तरी क्षेत्र में फैला हुआ था  और उसकी पश्चिमी सीमा बहमनी राज्य से मिली हुई थी।

विजयनगर राज्य के दो मज़बूत क़िले मुदगल और रायचूर बहमनी सीमा के निकट स्थित थे।  इन क़िलों पर बहमनी सल्तनत और विजयनगर राज्य दोनों दाँत लगाये हुए थे।

इन दोनों राज्यों में धर्म का अन्तर भी था। बहमनी राज्य इस्लामी और विजयनगर राज्य हिन्दू था। बहमनी सल्तनत की स्थापना के बाद ही उन दोनों राज्यों में लड़ाइयाँ शुरू हो गई और वे तब तक चलती रहीं जब तक बहमनी सल्तनत क़ायम रही।

बहमनी सुल्तानों के द्वारा पड़ोसी हिन्दू राज्य को नष्ट करने के सभी प्रयास निष्फल सिद्ध हुए यद्यपि इन युद्धों में अनेक बार बहमनी सुल्तानों की विजय हुई और रायचूर के दोआब पर विजयनगर के राजाओं के मुक़ाबले में बहमनी सुल्तानों का अधिकार अधिक समय तक रहा।

विजयनगर साम्राज्य (14वीं से 16वीं शताब्दी)

विजयनगर

 1310 ई. के लगभग दक्षिण भारत में मुस्लिम आक्रमणकारियों के आक्रमण प्रारम्भ हुए| मुस्लिम आक्रमणकारी देवगिरि के यादवों, वारंगल के काकातियों, मदुरै के पाण्ड्यों व काम्पिली पर लगातार आक्रमण कर रहे थे|

दिल्ली सल्तनत के खिलजी वंश के शासक अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफूर ने वारंगल पर अधिकार किया| उसके बाद उसने होयसल व यादवों के राज्य पर भी अधिकार किया|

विजयनगर साम्राज्य (1336-1646) मध्यकालीन दक्षिण भारत का एक साम्राज्य था। इसके राजाओं ने 310 वर्ष राज किया,  प्रायः इस नगर को मध्ययुग का प्रथम हिन्दू साम्राज्य माना जाता है।

1334 से 1336 के बीच मुहम्मद बिन तुगलक ने आक्रमण किया व एनगोंडी पर अधिकार किया|  इन परिस्थितियों के बीच हरिहर और बुक्का भाइयों ने 1336 में वर्तमान कर्नाटक में तुंगभद्रा नदी के उत्तर में विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की|  इसे “कर्नाटक साम्राज्य” भी कहा जाता हैं| पुर्तगाली इसे बिसनागा राज्य के नाम से जानते थे

 ये दोनों पूर्व में वारंगल के काकातियों के सामन्त थे|  इनकी प्रारम्भिक राजधानी एनगोंडी थी| बाद में इसकी राजधानी विजयनगर (हम्पी) बनी| इस साम्राज्य की स्थापना में हरिहर व बुक्का ने अपने गुरु माध्वाचार्य विद्यारण्य का सहयोग प्राप्त किया|

उन्होंने 1335 ई. के लगभग विजयनगर शहर (Tha City Of Victory) की स्थापना की| यहाँ उन्होंने अपने गुरु के सम्मान में “पम्पापति मंदिर” बनवाया|

हरिहर प्रथम ने 1343 ई. तक शासन किया| इनके पिता के नाम पर राजवंश का नाम “संगम” पड़ा | 14 वीं शताब्दी में उत्पन्न विजय नगर साम्राज्य को मध्ययुग और आधुनिक औपनिवेशिक काल के बीच का संक्रान्ति-काल कहा जाता है।

इस साम्राज्य पर राजा के रूप में तीन राजवंशों ने राज्य किया :

1. संगम वंश,
2. सालुव वंश,
3. तुलव वंश ।

विजयनगर साम्राज्य का राजनीतिक इतिहास:-

1. संगम वंश (1336 से 1485 र्इ. तक)

  • हरिहर प्रथम (1336 से 1353 र्इ. तक): –
  • बुकाराय (1353 से 1379 र्इ. तक):- 
  • हरिहर द्वितीय (1379 से 1404 र्इ. तक):- 
  • बुक्काराय द्वितीय (1404-06 र्इ.)
  • देवराय प्रथम (1404-10 र्इ.)
  • विजय राय (1410-19र्इ.)
  • देवराय द्वितीय (1419-44 र्इ)
  • मल्लिकार्जुन (1444-65 र्इ.)
  • विरूपाक्ष द्वितीय (1465-65 र्इ.)
  • विरूपाक्ष द्वितीय (1465-85 ई.) एवं प्रौढ देवराय (1485) इस वंश के अन्य शासक थे ।

हरिहर प्रथम (1336 से 1356 ई. तक) –

हरिहर प्रथम ने अपने भाई बुक्काराय के सहयोग से विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की ।  उसने धीरे-धीरे साम्राज्य का विस्तार किया । होयसल वंश के राजा बल्लाल की मृत्यु के बाद उसने उसके राज्य को अपने राज्य में मिला लिया।

1356 ई. में हरिहर की मृत्यु हो गई ।

बुक्काराय (1356 से 1377 ई. तक)-

बुक्काराय ने गद्दी पर बैठते ही राजा की उपाधि धारण की । उसका पूरा समय बहमनी साम्राज्य के साथ संघर्ष में बीता । 1377 ई. को उसकी मृत्यु हुई । वह सहिष्णु तथा उदार शासक था ।

हरिहर द्वितीय (1377 से 1404ई . तक)-

बुक्काराय की मृत्यु के उपरान्त उसका पुत्र हरिहर द्वितीय सिंहासनारूढ़ हुआ तथा साथ ही महाराजाधिराज की पदवी धारण की । इसने कर्इ क्षेत्रों को जीतकर साम्राज्य का विस्तार किया ।

1404 ई. में हरिहर द्वितीय कालकवलित हो गया ।

इसके बाद बुक्काराय द्वितीय (1404-06 ई.) देवराय प्रथम (1406-22 ई.),राम चन्द्र (1422) विजय राय प्रथम (1422 ई.) देवराय द्वितीय (1422-46 ई), मल्लिकार्जुन (1446-65 ई.) विरूपाक्ष द्वितीय (1465-85 ई.)एवं प्रौढ देवराय (1485) इस वंश के अन्य शासक थे ।

सालुव वंश (1486 से 1505 ई. तक)

नरसिंह सालुव (1486 – 1490 ई)-

एक सुयोग्य वीर शासक था । इसने राज्य में शांति की स्थापना की तथा सैनिक शक्ति में वृद्धि की । उसके बाद उसका पुत्र इम्मादि नरसिंह गद्दी पर बैठा।  1505 ई. में सेनापति नरसा नायक ने नरसिंह सालुव के पुत्र को हराकर गद्दी हथिया ली ।

तुलुव वंश (1505 से 1570 ई. तक)-

वीरनरसिंह तुलुव (1505 से 1509 ई. तक)-

1505 ई. में सेनापति नरसा नायक तुलुव की मृत्यु हो गई । उसके पुत्र वीरनर सिंह ने सालुव वंश के अन्तिम शासक की हत्या कर स्वयं गद्दी पर अधिकार कर लिया ।

कृष्णादेव राय तुलव (1509 से 1529 ई. तक)-

वह विजयनगर साम्राज्य का सर्वाधिक महान् शासक माना जाता है । यह वीर और कूटनीतिज्ञ था । इसने बुद्धिमानी से आन्तरिक विद्रोहों का दमन किया तथा उड़ीसा और बहमनी के राज्यों को फिर से अपने अधिकार में कर लिया ।

इसके शासनकाल में साम्राज्य विस्तार के साथ ही साथ कला तथा साहित्य की भी उन्नति हुई । वह स्वयं कवि व ग्रंथों का रचयिता था।

अच्युत राव (1529 से 1542)- कृष्णदेव राय का सौतला भाई ।

वेंकंट प्रथम (1542 से 1542 ई.)- छ: माह शासन किया ।

सदाशिव (1542 से 1570 ई.) – वेंकट का भतीजा था । ताली कोटा (1565) का युद्ध हुआ और विजयनगर की हार हुई ।

विजयनगर राज्य के विरोध में एक सघं का निर्माण किया । इसमें बीजापुर , अहमदनगर, बीदर, बरार की सेनाएं शामिल थी ।

इस राज्य की 1565 ई. में भारी पराजय हुई उसके पश्चात क्षीण रूप में यह और 80 वर्ष चला। राजधानी विजय नगर के अवशेष आधुनिक कर्नाटक राज्य में हम्पी शहर के निकट पाये गये हैं और यह एक विश्व विरासत स्थल है

देवराज प्रथम के समय इटली के यात्री निकोलोकोण्टी (1421ई) को विजयनगर आया था । अरब यात्री अब्दुल रज्जाक देवराय द्वितीय के शासनकाल 1443 ई. में आया था, जिसके विवरणों से विजय नगर राज्य के इतिहास के बारे में पता चलता है।

अब्दुल रज्जाक के तत्कालीन राजनीतिक स्थितियों का वर्णन करते हुये लिखा है- ‘‘यदि जो कुछ कहा जाता है वह सत्य है जो वर्तमान राजवंश के राज्य में तीन सौ बन्दरगाह हैं, जिनमें प्रत्येक कालिकट के बराबर है, राज्य तीन मास 8 यात्रा की दूरी तक फैला है, देश की अधिकांश जनता खेती करती है । जमीन उपजाऊ है, प्राय: सैनिको की संख्या 11 लाख होती है ।’’

उनका बहमनी सुल्तानों के साथ लम्बा संघर्ष हुआ । विरूपाक्ष की अयोग्यता का लाभ उठाकर नरसिंह सालुव ने नये राजवंश की स्थापना की 

पुतगालियोंं का आगमन:-

सल्तनत काल में ही यूरोप के साथ व्यापारिक संबंध कायम हो चुका था 1453 र्इ. में कुस्तुन्तुनिया पर तुर्को का अधिकार हो जाने के बाद यूरोपीय व्यापारियों को आर्थिक नुकसान होने लगा ।

पुरातात्त्विक खोज से इस साम्राज्य की शक्ति तथा धन-सम्पदा का पता चलता है। हिंदू संस्कृति के इतिहास में विजयनगर राज्य का महत्वपूर्ण स्थान रहा।

विजयनगर की सेना में मुसलमान सैनिक तथा सेनापति कार्य करते रहे, विजयनगर के शासक गण राज्य के सात अंगों में कोष को ही प्रधान समझते थे।

  • उन्होंने भूमि की पैमाइश कराई और बंजर तथा सिंचाइ वाली भूमि पर पृथक्-पृथक्कर बैठाए।
  • चुंगी, राजकीय भेंट, आर्थिक दंड तथा आयात पर निर्धारित कर उनके अन्य आय के साधन थे।

भारतीय साहित्य के इतिहास में विजयनगर राज्य का उल्लेख अमर है

  • तुंगभद्रा की घाटी में ब्राह्मण, जैन तथा शैव धर्म प्रचारकों ने कन्नड भाषा को अपनाया जिसमें रामायण,महाभारत तथा भागवत की रचना की गई।
  • इसी युग में कुमार व्यास का आविर्भाव हुआ।

विजयनगर का वास्तुशिल्प:-

  • इस साम्राज्य के विरासत के तौर पर हमें संपूर्ण दक्षिण भारत में स्मारक मिलते हैंजिनमें सबसे प्रसिद्ध हम्पी के हैं।
  • दक्षिण भारत में प्रचलित मंदिर निर्माण की अनेक शैलियाँ इस साम्राज्य ने संकलित की और विजयनगरीय स्थापत्य कला प्रदान की

साम्राज्य विस्तार:-

विजयनगर की स्थापना के साथ ही हरिहर तथा बुक्का के सामने कई कठिनाईयां थीं। वारंगल का शासक का पाया नायक तथा उसका मित्र प्रोलय वेम और वीर बल्लाल तृतीय उसके विरोधी थे।

देवगिरि का सूबेदार कुतलुगखाँ भी विजयनगर के स्वतंत्र अस्तित्व को नष्ट करना चाहता थे

सांस्कृतिक विकास

संस्कृति किसी समाज में गहराई तक व्याप्त गुणों के समग्र रूप का नाम है, जो उस समाज के सोचने, विचारने, कार्य करने, खाने-पीने, बोलने,नृत्य,गायन,साहित्य,कला,वास्तु आदि में परिलक्षित होती है।[

संस्कृति का वर्तमान रूप किसी समाज के दीर्घ काल तक अपनायी गयी पद्धतियों का परिणाम होता है। संस्कृति’ शब्द संस्कृत भाषा की धातु‘कृ’ (करना) से बना है।

 इस धातु से तीन शब्द बनते हैं ‘प्रकृति’ (मूल स्थिति), ‘संस्कृति’ (परिष्कृत स्थिति) और ‘विकृति’ (अवनति स्थिति)। जब ‘प्रकृत’ या कच्चा माल परिष्कृत किया जाता है तो यह संस्कृत हो जाता है और जब यह बिगड़ जाता है तो ‘विकृत’ हो जाता है।

अंग्रेजी में संस्कृति के लिये ‘कल्चर’ शब्द प्रयोग किया जाता है जो लैटिन भाषा के ‘कल्ट या कल्टस’ से लिया गया है जिसका अर्थ है जोतना,

संस्कृति का शब्दार्थ है -उत्तम या सुधरी हुई स्थिति

मनुष्य स्वभावतः प्रगतिशील प्राणी है। यह बुद्धि के प्रयोग से अपने चारों ओर की प्राकृतिक परिस्थिति को निरन्तर सुधारता और उन्नत करता रहता है।

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September 18, 2020

Mughal Period-Babur & Humayun मुगल साम्राज्य- बाबर & हुमायूँ

मुगल साम्राज्य बाबर & हुमायूँ

मुगल शब्द ग्रीक शब्द डवदह से बना है जिसका अर्थ है बहादुर, मुगल शासक पादशाह की उपाधि धारण करते थे। पाद का अर्थ है मूल और शाह का अर्थ है स्वामी अर्थात ऐसा शक्तिशाली राजा अथवा स्वामी जिसे अन्य कोई अपदस्थ नही कर सकता। मुगल राज्य का संस्थापक यद्यपि _बाबर माना जाता है परन्तु इसका वास्तविक संस्थापक वस्तुतः अकबर था।

मुग़ल साम्राज्य की शुरुवात 1526 में हुयी, जिसने 18 शताब्दी के शुरुवात तक भारतीय उप महाद्वीप में राज्य किया था।जो 19 वी शताब्दी के मध्य तक लगभग समाप्त हो गया था। मुग़ल साम्राज्य तुर्क-मंगोल पीढी के तैनुर वंशी थे।

मुग़ल साम्राज्य  ( Mughal Empire ) ने 1700 के आसपास अपनी ताकत को बढ़ाते हुए भारतीय महाद्वीपों के लगभग सभी भागो को अपने साम्राज्य के निचे कर लिया था।

बाबर (1526-1530.)

बाबर

बाबर_भारत में मुगल साम्राज्य का संस्थापक था_बाबर का जन्म 14 फरवरी 1483 को मध्य एशिया के छोटे से गांव फरगाना (अफगानिस्तान में) में हुआ। जिसका पूरा नाम ज़हिर उद-दिन मुहम्मद बाबर था_बाबर का पिता उमर शेख मिर्जा फरगना का शासक था तथा उसकी मां का नाम कुतलुग निगार खानम था।

बाबर_पितृ पक्ष की ओर से तैमूर (तुर्क) का पांचवा वंशज था तथा मां की ओर से में चंगेज खां (मंगोल) का 14 वां वंशज था।

अतः बाबर_में तुर्को और मंगोलों दोनों के रक्त का मिश्रण था। परिवार चगताई तुर्क, परन्तु_बाबर अपने को मंगोल ही मानता था उसने अपनी आत्मकथा_बाबर नामा में लिखा है चूंकि वह माँ के ज्यादा करीब था इसीलिए उसे मंगोल के वंश से जोड़ा जाना चाहिए

उसने तुर्की मूल के चगताई वंश का शासन स्थापित किया। जिसका नाम चंगेज खां के द्वितीय पुत्र के नाम पर पड़ा।

बाबर_अपने पिता की मृत्यु के बाद 11 वर्ष की आयु में 1494 ईसवी में फरगना की गद्दी पर बैठा। 1496 ईस्वी में_बाबर ने समरकंद को जीतने का असफल प्रयास किया। समरकंद तैमूर की राजधानी थी।

1497 ईस्वी में बाबर_ने समरकंद को जीता लेकिन शीघ्र ही समरकंद व फरगना दोनों बाबर के हाथ से निकल गए। 1504ई में बाबर ने काबुल पर अधिकार कर लिया। 1507 ईस्वी में पूर्वजों द्वारा प्रयुक्त मिर्जा की उपाधि त्याग कर बादशाह की उपाधि धारण की।

बाबर ने 1511 में समरकंद के साथ बुखारा व खुरासान को जीता। किंतु मई 1512 ईसवी में कुल-ए-मलिक के युद्ध में ओबेदुल्ला खान से पराजित होने पर समरकंद बाबर के हाथों से पुणे निकल गया।

परन्तु अफगानिस्तान में वह अपने साम्राज्य को स्थायी न रख सका अतः उसने भारत पर आक्रमण करने का निश्चय किया। बाबर ने उस्ताद अली कुली नामक एक तुर्क तोपची को तोपखाने का अध्यक्ष बनाया। भारत में मुस्तफा खां नामक तोप विशेषज्ञ की सेवाएं ली।

भारत पर आक्रमण:–

बाबर ने भारत पर कुल पाँच आक्रमण किये इसका पांचवा आक्रमण पानीपत के युद्ध में परिवर्तित हो गया इन आक्रमणों का मूल उद्देश्य धन की प्राप्ति था।

  • प्रथम आक्रमण (1519):- उत्तर पश्चिम में बाजौर और भेरा के दुर्ग पर।
  • द्वितीय आक्रमण (1519)-पेशावर पर
  • तृतीय आक्रमण (1520)-बाजौर और भेरा
  • चतुर्थ आक्रमण (1524)-लाहौर पर

अपने चौथे अभियान के समय इसे पंजाब के सरदार दौलत खाँ लोदी का नियन्त्रण मिला। इसके अतिरिक्त इब्राहिम लोदी के चाचा आलम खाँ और कहा जाता है कि राणा सांगा का भी उसे निमन्त्रण प्राप्त हुआ।

फलस्वरूप वह अपने पांचवे अभियान के दौरान वह दिल्ली तक चढ़ आया इस प्रकार पानीपत का प्रथम युद्ध हुआ।

1. पानीपत का प्रथम युद्ध (21 अप्रैल 1526)

21 अप्रैल 1526 ईस्वी में बाबर तथा इब्राहिम लोदी के मध्य पानीपत का प्रथम युद्ध हुआ था इस युद्ध में विजय प्राप्त करके बाबर ने भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना की थी।

बाबर ने इस युद्ध में तुलगमा युद्ध नीति एवं तोपखाने का प्रयोग किया उसके दो प्रसिद्ध तोपची उस्ताद अली और मुस्तफा थे। बाबर ने अपने विजय का श्रेय अपने दोनों तोपचियों को दिया और अपनी विजय के उपलक्ष में उसने काबूल निवासियों को एक-एक चाँदी के सिक्के उपहार में दिये इसी उदारता के कारण उसे कलन्दर की उपाधि दी गई।

2. खानवा का युद्ध (17 मार्च 1527)

16 मार्च 1527 ईसवी में बाबर तथा राणा सांगा के मध्य खानवा (भरतपुर) का युद्ध हुआ राणा सांगा प्राप्त हुआ।

राणा सांगा की सेना इब्राहिम लोदी से अधिक शक्तिशाली थी। बाबर के सैनिक राणा सांगा की सेना देखकर भयभीत हो गये। सैनिकों के उत्साह को बढ़ाने के लिए उसने शराब पीने और बेंचने पर प्रतिबन्ध लगा दिया।

मुसलमानों से तमगा कर न लेने की घोषणा की तथा जेहाद का नारा दिया। इस युद्ध को बाबर ने (जिहाद) धर्म युद्ध की संज्ञा दी। युद्ध में जीतने के बाद उसने गाजी की उपाधि धारण की। राणा सांगा के सामन्तों ने ही उसे जहर दे दिया। भारत में मुगल प्रभु सत्ता की स्थापना खानवा के युद्ध से ही मानी जाती है।

3. चन्देरी का युद्ध (29 जनवरी 1528):-

 28 जनवरी 1528 को बाबर व मारवाड़ के शासक मेदिनीराय के मध्य चंदेरी का युद्ध हुआ। युद्ध में बाबर विजय हुआ।

4. घाघरा का युद्ध (6 मई 1529):-

6 मई 1529 ईस्वी में महमूद लोदी और नुसरत शाह की संयुक्त सेना में बाबर के बीच घाघरा का युद्ध लड़ा गया बाबर विजय हुआ।

बाबर_आगरा में बीमार पड़ा तथा 27 दिसम्बर 1530 ई0 को आगरा में ही उसकी मृत्यु हो गई। उसके शव को आगरा के आराम बाग में रखा गया जिसे बाद में ले जाकर काबुल में दफना दिया गया। बाबर का मकबरा काबुल में है जिससे उसके पुत्र हुमायूं ने बनवाया था। बाबर ने तुर्की भाषा में अपनी आत्मकथा बाबरनामा लिखी।

बाबर_ने फारसी भाषा में कविताओं का संग्रह लिखा जिससे मुबाईयां कहा जाता है। बाबर को ’मुबइयान’ नामक पद्य शैली का भी जन्मदाता माना जाता है। बाबर बहुत बड़ा दानी था इसलिए उसे कलंदर कहा जाता है। बाबर ने मुसलमानों को तमगा नामक कर से मुक्त किया।

बाबर_का अन्य उपलब्धियां:-

  • बाबर_संस्कृत लैटिन, फारसी, तुर्की, भाषाओं का ज्ञाता था।
  • उसने अपनी आत्मकथा, बाबर नामा चगुताई तुर्क में लिखी, इस पुस्तक का सर्वप्रथम फारसी में अनुवाद अब्दुल रहीम खान खाना ने किया।
  • इसका सर्वप्रथम अंग्रेजी में अनुवाद 1826 ई0 में लीडेन एवं एर्सकिन ने किया।
  • इसका पुनः अंग्रेजी में अनुवाद फारसी भाषा से 1905 मिसेज बेवरीज ने किया।

Mughal Period-Babur Important Question- 

  • मुगल किसके वंश से संबंधित थे – तुर्की के चुगताई वंश
  • बाबर_के वंशजों की राजधानी कहां थी –समरकंद
  • बाबर_ने काबुल पर कब कब्जा किया –1504 ई.
  • बाबर_ने बादशाह की उपाधि कब धारण की –1507 ई.
  • मुगल वंश की नींव किसने रखी –बाबर
  • मुगलवंश की नींव रखने से पहले बाबर कहां का शासक था –फरगना
  • बाबर_का पूरा नाम क्या था -जहीरुद्दीन बाबर
  • बाबर का जन्म कब और कहां हुआ था-24 फरवरी 1483 ई. में फरगना में ।
  • बाबर_भारत पर पहला आक्रमण किसे विरुद्ध किया था –युसुफजाइयों के विरुद्ध (1519 ई.)
  • बाबर_का पहला महत्वपूर्ण आक्रमण कब माना जाता है –1526 ई.

  • बाबर_के पिता का क्या नाम था –उमरशेख मिर्जा
  • कुतलुगनिगार खानम किसकी माता का नाम था –बाबर
  • पानीपथ की पहली लड़ाई किसके बीच हुई थी -इब्राहिम लोदी और बाबर
  • पानीपथ की पहली लड़ाई कब लड़ी गई -1526 ई.
  • इब्राहिम लोदी को हराकर बाबर ने किस वंश की नींव रखी -मुगल
  • खानवा का युद्ध कब और किसके बीच हुआ –1527 ई. में राणा सांगा और बाबर के बीच ।
  • बाबर और मेदिनीराय के बीच हुआ युद्ध किस नाम से जाना जाता है –चंदेरी का युद्ध (1528ई.)
  • घाघरा के युद्ध में बाबर ने किसे पराजित किया था –महमूद लोदी (इब्राहिम लोदी का भाई)
  • बाबर ने किस भाषा में अपनी आत्मकथा लिखी –तुर्की
  • बाबर की आत्मकथा को किस नाम से जाना जाता है –तुजुक-ए-बाबरी (बाबरनामा)
  • किस युद्ध में बाबर ने तोपखाना का इस्तेमाल किया था –पानीपथ का प्रथम युद्ध
  • बाबर ने युद्ध की कौन सी नई नीति अपनाई –तुलुगमा
  • उस्ताद अली और मुस्तफा बाबर के क्या थे –तोपची
  • बाबर की मृत्यु कहां हुई –आगरा ।
  • उदारता के कारण बाबर को किस नाम से जाना जाता है –कलंदर
  • बाबर के अलावा कौन से मुगल शासक के मकबरे भारत से बाहर बने हैं –जहांगीर और बहादुरशाह जफर

हुमायूँ (1530-56)

हुमायूँ

  • माँ का नाम:- माहिम बेगम
  • जन्म:- काबुल में
  • बाबर के चार पुत्र थे हुमायूँ, कामरान, अस्करी एवं हिन्दाल।

हुमायूँ ने कामरान को काबुल, कान्धार एवं पंजाब की सुबेदारी की। अस्करी को सम्हल की एवं हिन्दाल को अलवर की सुबेदारी प्रदान की।

हुमायूँ की विजयें

1. कालिंजर अभियान:- 1531 यहाँ के शासक प्रताप रुद्र देव ने हुमायूँ से सन्धि कर ली।

2. दोराहा का युद्ध (1532):- लखनऊ के पास सई नदी के किनारे हुआ और महमूद लोदी के बीच, महमूद लोदी पराजित हुआ।

3. चुनार का युद्ध (1532):- चुनार शेरखाँ के कब्जे में था। हुमायूँ ने शेरखाँ को पराजित किया अन्ततः दोनों के बीच एक समझौता हो गया।
शेर खाँ ने अपने पुत्र कुतुब खाँ को हुमायूँ के पास रखना स्वीकार कर लिया परन्तु शेरखाँ की शक्ति को न कुचलना हुमायूँ की बहुत बड़ी भूल थी।

अपनी इस विजय की खुशी में हुमायूँ ने 1533 ई0 में दिल्ली में दीन पनाह नामक नगर बसाया और अपनी राजधानी वहीं स्थानान्तरित कर ली।

4. गुजरात से युद्ध (1535-1536):- इस समय गुजरात का शासक बहादुर शाह था। उसने मालवा को अपने अधिकार में कर लिया तथा 1534 ई0 में चित्तौड़ के शासक विक्रमादित्य पर अभियान किया।

एक क्विंदन्ती के अनुसार विक्रमादित्य की माता कर्णवती ने हुमायूँ के पास अपने राज्य की सुरक्षा के लिए राखी भेजा। बहादुर शाह के पास टर्की का एक कुशल तोपची रुमी खाँ की सेवाएं थी।

बहादुर शाह और हुमायूँ के बीच के युद्ध में बहादुर शाह पराजित हुआ और भागकर माण्डू चला गया। बाद में बहादुर शाह की मृत्यु समुद्र में डूबने से हो गई।

5. शेरखाँ से युद्ध

  • 1. चौसा का युद्ध (26 जून 1539):- गंगा नदी के तट पर चौसा नामक स्थान पर हुमायूँ और शेरशाह के बीच युद्ध हुआ। निजाम नामक भिश्ती की सहायता से किसी तरह हुमायूँ की जान बच पाई शेरखाँ ने अपनी इस विजय के उपलक्ष्य में शेर शाह की उपाधि धारण की।
  • 2. बिलग्राम का युद्ध, अथवा कन्नौज या गंगा का युद्ध (17 मई 1540):- युद्ध में हुमायूँ शेरशाह से अन्तिम रूप से पराजित हो गया।शेरशाह ने आगरा एवं दिल्ली पर कब्जा कर लिया। हुमायूँ भागकर सिन्ध पहुँचा जहाँ वह 15 वर्षों तक रहा। यहीं पर उसने हमीदा बेगम से निकाह किया जिससे अकबर उत्पन्न हुआ। सिन्ध से हुमायूँ काबुल चला गया और उसे अपनी अस्थायी राजधानी बनाया।

हुमायूँ द्वारा पुनः गद्दी की प्राप्ति:- हुमायूँ ने 1555 ई0 में लाहौर पर कब्जा कर लिया उसके बाद अफगानों से उसका मच्छीवारा का प्रसिद्ध युद्ध हुआ।

मच्छीवारा का युद्ध (15 मई 1555 ई0):- यह स्थान सतलज नदी के किनारे स्थित था, हुमायूँ एवं अफगान सरदार नसीब खाँ के बीच युद्ध हुआ। सम्पूर्ण पंजाब मुगलों के अधीन आ गया।

सरहिन्द का युद्ध (22 जून 1555):- अफगान सेनापति सुल्तान सिकन्दर सूर एवं मुगल सेनापति बैरम खाँ के बीच युद्ध। मुगलों को विजय प्राप्ति हुई। इस प्रकार 23 जुलाई 1555 ई0 को हुमायूँ दिल्ली की गद्दी पर पुनः आसीन हुआ।

जनवरी 1556 ई0 में दीनपनाह भवन में अपने पुस्तकालय की सीढियों से गिरने के कारण उसकी मृत्यु हो गई।

लेनपूल ने लिखा है ’’वैसे हुमायूँ का अर्थ है भाग्यवान परन्तु वह जिन्दगी भर लड़खड़ाता रहा और लड़खड़ाते ही उसकी मृत्यु हो गई’’

हुमायूँ की असफलता के कारण:-

हुमायूँ की असफलता का मूल कारण उसकी चारित्रिक दुर्बलता थी हलांकि प्रसिद्ध इतिहासकार डाॅ0 सतीस चन्द्र अफगानों की शक्ति का सही आकलन न कर पाना उसके पतन का प्रमुख कारण मानते है।

अन्य उपलब्धियां

  • हुमायूँ_ज्योतिष में बहुत विश्वास करता था इसीलिए उसने सप्ताह के सातों दिन सात रंग के कपड़े पहनने के नियम बनाये-जैसे-शनिवार को काला, रविवार को पीला एवं सोमवार को सफेद।
  • हुमायूँ_समकालीन सूफीसन्त शेख मुहम्मद गौस ( सत्तारी सिलसिला का शिष्य था ) यह उनके बड़े भाई शेख बहलोल का भी शिष्य था।
  • हुमायूँ को ही भारत में चित्रकला की शुरुआत करने का श्रेय दिया जाता है। इसने अपनी अस्थायी राजधानी काबुल में फारस के दो चित्रकारों मीर सैय्यद अली एवं ख्वाजा अब्दुल समद को आमन्त्रित किया बाद में इन्हें अपने साथ भारत ले आया।
  • फारसी में इसका काब्य संग्रह दीवान नाम से जाना जाता है।

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September 17, 2020

Mughal Empire Shahjahan मुग़ल वंश- शाहजहाँ

मुग़ल वंश- शाहजहाँ

शाहजहाँ

  • जन्म:-1592 लाहौर में
  • माँ का नाम:-जगत गोसाईं
  • विवाह:-1612 ई0 में आसफ खाँ की पुत्री अरजुमन्द बानो बेगम उर्फ मुमताज महल से। यह नूरजहाँ की भतीजी थी। मुमताज महल की उपाधि मलिका-ए-जमानी।

दक्षिण अभियान की सफलता के बाद 1617 में खुर्रम को शाहजहाँ की उपाधि प्रदान की गई। शाहजहाँ का राज्याभिषेक 1628 ई0 में आगरा में। राज्याभिषेक के बाद ’’अबुल मुजफ्फर शहाबुद्दीन मुहम्मद शाहिब किस ए सानी’’ की उपाधि धारण की।

Shah Jahan Major Revolt ( शाहजहाँ प्रमुख विद्रोह )

शाहजहाँ के समय के प्रमुख विद्रोह निम्नलिखित हैं-

1. बुन्देल खण्ड का विद्रोह (1628-36):- इस विद्रोह का नेतृत्व जूझार सिंह बुन्देला ने किया। औरंगजेब ने ही इस विद्रोह को दबाया।

2. खाने जहाँ लोदी का विद्रोह (1628 से 31)-  खाने जहाँ लोदी अफगान सरदार था इसे मालवा की सूबेदारी दी गई थी परन्तु इसने विद्रोह कर दिया बाद में यह अहमद नगर के शासक मुर्तजा निजाम शाह के दरबार में पहुँचा।

शाहजहाँ के दक्षिण पहुँचने पर यह उत्तर पश्चिम भाग गया अन्त में बांदा जिले के सिहोदा नामक स्थान पर माधव सिंह द्वारा इसकी हत्या कर दी गई।

3. पुर्तगालियों से संघर्ष (1632):– पुर्तगालियों के बढ़ते प्रभाव को समाप्त करने के उद्देश्य से 1632 ई0 में उसके महत्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र हुगली पर अधिकार कर लिया गया।

4. अहमद नगर की विजय (1633):- इस समय अहमद नगर का शासक मूर्तजा खाँ था। इस प्रकार शाहजहाँ के समय तक खानदेश बरार और अहमद नगर मुगलों के अधीन आ गया।

औरंगजेब को दक्षिण का सूबेदार बनाया गया। जहाँ वह 1636 से 44 के बीच आठ वर्षों तक रहा। उसने दक्षिण के प्रदेशों को चार सूबों में विभाजित किया। तथा इसकी राजधानी औरंगाबाद बनाई।

  • खानदेश -राजधानी -बुरहानपुर
  • बरार -राजधानी -एलिच पुर
  • तेलंगाना -राजधानी -नान्देर
  • अहमद नगर -राजधानी -अहमद नगर

औरंगजेब दुबारा दक्षिण का सूबेदार 1652 से 57 के बीच रहा तब उसने मुर्शीद कुली खाँ के सहयोग से एक नई भू-राजस्व व्यवस्था लागू की।

Shahjahan Important Events ( महत्वपूर्ण घटनायें ):-

  • गोलकुण्डा के प्रधान मंत्री मीर जुमला जिसका वास्तविक नाम मुहम्मद सैय्यद था और जो एक पार्शी व्यापारी था ने शाहजहाँ को कोहिनूर हीरा भेंट किया।
  • शाहजहाँ के समय में कान्धार हमेशा के लिए 1649 ई0 में मुगल साम्राज्य से निकल गया। इस समय यहाँ का शासक शाह अब्बास द्वितीय था।
  • शाहजहाँ के समय में 1630-32 ई0 में दक्खन और गुजरात में अकाल पड़ा इसका वर्णन वर्नियर एवं पीटर मुंडी ने किया है। पीटर मुडी एक अंग्रेज व्यापारी था जो अकाल के समय आया था अकाल के बाद शाहजहाँ ने भू-राजस्व को कम कर दिया।

War of Succession ( उत्तराधिकार का युद्ध ):–

शाहजहाँ के कुल चार पुत्र थे- दारा, शुजा, औरंगजेब एवं मुराद, उसकी तीन पुत्रियां थी, जहाँआरा, रोशन आरा एवं गौहन आरा।

इस समय शुजा बंगाल का सूबेदार, औरंगजेब दक्षिण का सूबेदार और मुराद गुजरात का सूबेदार था। उसकी पुत्री जहाँआरा ने दारा का पक्ष लिया, रोशन आरा ने औरंगजेब का और गौहन आरा ने मुराद का।

उत्तराधिकार के महत्वपूर्ण युद्ध ( Shah Jahan War of Succession ) –

प्रथम युद्ध –बहादुरपुर में (24 फरवरी 1658) यह युद्ध शाहशुजा एवं दारा के लड़के शुलेमान शिकोह के बीच हुआ।

द्वितीय युद्ध-धरमत का युद्ध (25 अप्रैल 1658):- उज्जैन के पास यह युद्ध दारा द्वारा भेजी गई सेना (जसवंत सिंह एवं कासिम खाँ) एवं औरंगजेब तथा मुराद के मिली जुली सेना के बीच। इसमें औरंगजेब की विजय हुई। इस विजय के उपलक्ष्य में औरंगजेब ने फतेहाबाद नामक नगर की स्थापना की।

तीसरा युद्ध –सामूगढ़ का युद्ध-आगरा के पास (8 जून 1658):- दारा एवं औरंगजेब के बीच इस युद्ध में दारा की पराजय हुई यह एक निर्णायक युद्ध था इसी के बाद औरंगजेब ने 31 जुलाई 1658 को आगरा में अपना राज्याभिषेक किया।

चतुर्थ युद्ध-खजवा का युद्ध (1659):- इलाहाबाद के निकट औरंगजेब ने शुजा को पराजित किया।

पांचवा युद्ध-दौराई का युद्ध (अप्रैल 1659):- अजमेर के पास दारा अन्तिम रूप से पराजित।

जून 1659 में औरंगजेब ने दूसरी बार राज्याभिषेक दौराई के युद्ध में सफलता के बाद दिल्ली में किया।

Shahjahan Architecture ( शाहजहाँ स्थापत्य कला )

मुग़ल स्थापत्य कला के इतिहास में शाहजहाँ का शासन काल सर्वाधिक महत्वपूर्ण साबित हुआ। इस मुग़ल कालावधि में भारतीय वास्तुकला अपने चरमोत्कर्ष को प्राप्त हुई।

शाहजहाँ के शासन काल को अगर स्वर्ण युग कह कर पुकारा जाता है तो इसमें उसके द्वारा निर्मित भवनों का सर्वाधिक योगदान है।

शाहजहाँ_को उसकी इसी कला के प्रति अगाध प्रेम होने के कारण निर्माताओं का राजकुमार कहा जाता है।

शाहजहाँ_की देख रेख और उसके संरक्षण में आगरा, लाहौर, दिल्ली, काबुल, कश्मीर, अजमेर, कंधार, अहमदाबाद आदि अनेक स्थानों में सफ़ेद संगमरमर के महल,मस्जिद,मंडप,मकबरें आदि का निर्माण किया गया।

शाहजहाँ_ने आगरा तथा लाहौर में अकबर के द्वारा लाल पत्थरों से निर्मित अनेक भवनों को नष्ट करवा कर उनके स्थान पर सफ़ेद संगमरमर के भवनों का निर्माण करवाया। आगरे के किले में सम्राट ने दीवाने आम, दीवाने खास, खास महल, शीश महल, मोती मस्जिद, मुसम्मन बुर्ज तथा अनेक बनावटों का निर्माण करवाया।

दीवाने खास की सुन्दरता इसमें दोहरे खम्भों और सजावटों के कारण है। मुस्समन बुर्ज किले की लम्बी चोड़ी दीवार पर अप्सरा कुञ्ज के सामान शोभायमान है। मोती मस्जिद की कारीगरी मुग़ल कालीन स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है।

1638 ई. में दिल्ली में सम्राट ने एक नये दुर्ग का निर्माण करवाया जो दिल्ली के लाल किले के नाम से प्रसिद्ध है। उसके भीतर एक नगर बसाया गया जिसका नाम शाहजहांनाबाद रखा गया।

दिल्ली के लाल किले के भीतर सफ़ेद संगमरमर की सुंदर इमारतें बनवाई गयी जिनमे मोती महल, हीरा महल, रंग महल , दीवाने आम , दीवाने खास आदि उल्लेखनीय है।

लाल किले में शाहजहाँ ने संगीत भवन अनेक दफ्तर या बाज़ार भी बनवाये। हर महल के सामने फूलों की क्यारियां एवं फव्वारे निर्मित किये गए। जिस से उनकी सुन्दरता में चार चाँद लग गये।

सरे महल, जाली, खम्भों ,मेहराबों और चित्रों से सुसज्जित है। इन महलो के फर्श संगमरमर के बने हुए है। लाल किले में स्थित भवनों में रंग महल की शोभा अति न्यारी है। इसमें सुंदर फव्वारों की भी व्यवस्था की गयी। शाहजहाँ के द्वारा इसकी एक दीवार पर खुदवाया गया यह वाक्य ” अगर धरती पर कही स्वर्ग एवं आनंद है तो वह यहीं है”। बिलकुल सत्य प्रतीत होता है।

शाहजहाँ ने लाहौर के किले में 40 खम्भों का दीवाने आम, मुसलमान बुर्ज, शीश महल, ख्वाबगाह आदि का निर्माण करवाया। शाहजहाँ ने शाहजहांनाबाद में प्रसिद्ध जामा मस्जिद का निर्माण करवाया। यह मस्जिद अपनी विशालता एवं सुन्दरता के लिए प्रसिद्ध है। किन्तु कला की दृष्टि से उत्कृष्ट नही है।

शाहजहाँ द्वारा निर्मित ताजमहल सर्वाधिक विख्यात व महत्वपूर्ण समझा जाता है। कहा जाता है इसका निर्माण 1631 ई. से लेकर 1653 ई. तक हुआ। इस प्रकार ताजमहल निर्माण में 22 वर्ष व 9 करोड रूपये लगे।  संभवत ताजमहल की योजना उस्ताद अहमद लाहोरी द्वारा तैयार की गयी तथा इसके निर्माण हेतु देश विदेश से कारीगर नियुक्त किये गए।

पर्सी ब्राउन के मत में ताजमहल का निर्माण प्रायः मुसलमान शिल्पकारो द्वारा ही हुआ था किन्तु इसकी चित्रकारी सामान्यत: हिन्दू कलाकारों के द्वारा की गयी थीऔर पित्रादुरा जैसी कठिन पच्चीकारी कन्नौज के हिन्दू कलाकारों को सौंपी गयी।

ताज की रूपरेखा प्रधान रूप से फ़ारसी ही है, किन्तु कुछ अंश में हिन्दू शिल्प कला तथा हिन्दू साजो सज्जा का सम्मिश्रण भी हम पाते है। फिर भी इसके डिजाइन को पूर्णत: मौलिक नहीं खा जा सकता। अनुमानत: यह बीजापुर के सुल्तानों के द्वारा निर्मित मकबरों एवं शेरशाह के मकबरे से बहुत अधिक प्रभावित है।

शाहजहाँ के समय चित्रकला ( Painting at Shahjahan )

शाहजहाँ के समय चित्रकला में वह सजीवता नहीं है जो जहाँगीर के समय थी। इसमें अलंकरण पर बहुत बल दिया गया है और रंगों के बदले सोने की सजावट पर अधिक बल दिया गया है और औरंगजेब के समय तो चित्रकला का अवसान ही हो गया।

Dara Shikoh ( दारा शिकोह ):-

उपाधि- शाहबुलन्द इकबाल

दारा शिकोह शाहजहाँ का सबसे योग्य पुत्र था। वह अरबी फारसी एवं संस्कृत का विद्वान था। वह कादरी उप नाम से कविता भी लिखता था।उसके पास चित्रों का एक मुरक्का (एलबम) था। उसकी दो पुस्तकें-

  • शफीनात-अल-औलिया (यह सूफी सिद्धान्तों पर आधारित थी)
  • मजमुल-बहरीन (इसका अर्थ है दो समुद्रों का मिलन)

यह हिन्दू और मुस्लिम दो धर्मों के मिलन से सम्बन्धित थी। इसके अतिरिक्त 52 उपनिषदों का अनुवाद सिर्र-ए- अकबर अथवा सिर्र-ए-असरार के नाम से किया गया। दारा शिकोह ने भगवत गीता एवं योग वशिष्ठ का भी फारसी में अनुवाद करवाया।

दौराई के युद्ध में औरंगजेब से पराजय के बाद यह उत्तर-पश्चिम भाग गया तथा एक अफगानी जीवन खाँ के यहाँ शरण ली। उसने धोखा देकर इसे बहादुर खाँ के हवाले कर दिया जो उसे दिल्ली ले जाकर औरंगजेब को सौंप दिया। औरंगजेब ने दारा पर इस्लाम धर्म की अवहेलना का आरोप लगाया। उसे गधे पर बिठाकर दिल्ली में घुमाया गया।

इस दृश्य का चश्मदीन गवाह बर्नीयर था। बाद में दारा को फाँसी दे गई। उसे हुमायूँ को कब्र के गुम्बज के नीचे एक तहखाने में गाड़ दिया गया।

औरंगजेब ने सितम्बर 1658 में शाहजहाँ को आगरे के किले में कैद कर दिया। जहाँ 1666 ई0 में 74 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हो गई।शाहजहाँ जहाँगीर से अच्छा गायक था।

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September 17, 2020

Mughal Empire-Akbar मुगल काल-अकबर

मुगल काल-अकबर

अकबर

अकबर मुगल वास्तुकला का वास्तविक जन्मदाता था। इसके निर्माण में अधिकतर लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग हुआ है।

  • जन्मः- 15 अक्टूबर 1542 को अमरकोट के राणा वीरसाल के महल में ।
  • माँ का नाम:– हमीदा बानो बेगम (सिन्ध के पास)
  • 1551 में 9 वर्ष की अवस्था में गजनी की सूबेदारी मिली।
  • राज्याभिषेक:- कलानौर (पंजाब) 14 फरवरी 1556 को
  • संरक्षक:- बैरम खाँ

बैरम खाँ:- यह सिया मतावलम्बी था तथा अकबर के समय वकील के पद पर था। अकबर का संरक्षक भी यह था।

हेमू:- यह सूर शासक आदिल शाह का प्रधानमंत्री था जो वैश्य जाति का था। 24 युद्धों में से 22 को जीतने का इसे श्रेय प्राप्त था। इसी कारण इसे आदिलशाह ने विक्रमादित्य की उपाधि प्रदान की थी। यह मध्य युगीन भारत का पहला और अन्तिम हिन्दू महान शासक हुआ जो दिल्ली की गद्दी पर आरुढ़ हुआ।

पानीपत का द्वितीय युद्ध (5 नवम्बर 1556):-

हेमू के नेतृत्व में अफगान सेना एवं बैरम खाँ के नेतृत्व में मुगल सेना के बीच

बैरम खाँ का प्रभुत्व (1556-60)

पानीपत के द्वितीय युद्ध में बैरम खाँ की विजय के बाद शासन पर उसका अप्रत्यक्ष नियंत्रण हो गया। अपने चार वर्षों के नियंत्रण के बाद उसका पतन हुआ। इस पतन में मुख्य योगदान ’’अतका खेल’’ का था।

अतका खेल:- 

यह एक ऐसे वर्ग का सामूहिक नाम था जिसमें अकबर की धाय मां माहम अनगा, जीजी अनगा, आदम खाँ, राज माता हमीदा बानों बेगम, शमशुद्दीन खाँ, साहाबुद्दीन, मुल्ला मीर मुहम्मद आदि लोग सम्मिलित थे।

इन लोगों ने अकबर को बैरम खाँ के विरूद्ध उकसाना प्रारम्भ किया अकबर भी वैरम खाँ से असंन्तुष्ट था उसने बैरम खाँ के समक्ष तीन प्रस्ताव रखे।

  • राज दरबार में सम्राट के गुप्त मामलों का सलाहकार।
  • काल्पी एवं चन्देरी की सूबेदारी।
  • मक्का की तीर्थ यात्रा।

बैरम खाँ ने तीर्थ यात्रा पर जाने का निश्चय किया जाते समय पाटन नामक स्थान पर मुबारक खाँ नामक एक अफगान युवक ने उसकी हत्या कर दी। अकबर ने बैरम खाँ की विधवा सलीमा बेगम से निकाह कर लिया और उसके चार वर्षीय पुत्र अब्दुल रहीम को संरक्षण प्रदान किया।

1584 में अकबर ने उसे खान खाना की उपाधि प्रदान की। बैरम खाँ के पतन के बाद राज परिवार के सदस्यों का ही शासन पर अप्रत्यक्ष नियन्त्रण हो गया इसीलिए इसे पर्दा शासन कहा जाता है।

पर्दा शासन (1560-62):- इस शासन में अकबर की धाय माँ माहम अनगा उसका पुत्र आधम खाँ, जीजी अनगा, शिहाबुद्दीन अहमद आदि लोगों का प्रभुत्व था।  जब आधम खाँ ने अकबर के प्रधानमंत्री सम्सुद्दीन आतग खाँ की हत्या कर दी तब अकबर ने आधम खाँ को अपने महल से नीचे फेंक दिया और इस तरह पर्दा शासन का अन्त हो गया।

अकबर की विजयें

1. मुगलों की कान्धार विजय

  •  बाबर:- 1522 ई0 में कान्धार विजय की।
  • हुमायुँ:-1545 ई0 में कान्धार विजय की।
  • अकबर:-1595 ई0 में कान्धार विजय की।
  • जहाँगीर:-1621 ई0 में कान्धार हाथ से निकल गया (पहली बार)
  • शाहजहाँ:- 1638 ई0 में पुनः मुगलों के अधीन। 1649 में अन्तिम रूप से निकल गया।

2. मुगलों की दक्षिण विजय

अकबर:- अकबर ने खानदेश, बरार और अहमद नगर के एक भाग को विजित किया। दक्षिण विजय के बाद ही उसने ’’दक्षिण के सम्राट’’ की उपाधि धारण की। अकबर ने सम्पूर्ण उत्तर भारत की भी विजय की केवल मेवाड़ को वह न जीत सका।

अकबर की दक्षिण भारत की विजय दो उद्देश्यों से प्रेरित थी-

  • अखिल भारतीय साम्राज्य की स्थापना।
  • पूर्तगीजों की शक्ति पर नियंन्त्रण।

इसमें अहमद नगर ने 1574 ई0 में बरार को अपने अधीन कर लिया था। अकबर ने दक्षिणी राज्यों को अपनी सत्ता स्वीकार करने के लिए कहा।सर्वप्रथम खान-देश के शासक मीरन बहादुर ने बिना युद्ध किये हुए अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली। अहमद नगर यहाँ की शासिका चाँद बीबी थी। जो बीजापुर के शासक आदिल शाह प्रथम की विधवा थी।

अकबर ने अब्दुल रहीम खानखाना एवं मुराद को अहमद नगर पर विजय के लिए भेजा। 1595 ई0 में दोनों के बीच युद्ध हुआ परन्तु चाँद बीबी की पराजय हुई। अतः चाँदबीबी ने 1596 ई0 में एक सन्धि कर ली। इस सन्धि के अन्तर्गत बरार मुगलों को सौंप दिया गया।

बीजापुर और गोल कुण्डा को यह सन्धि पसन्द नहीं आई। अहमद नगर में भी मलिक अम्बर के नेतृत्व में एक वर्ग इस सन्धि का विरोध कर रहा था। फलस्वरूप अहमद नगर गोलकुण्डा और बीजापुर की सेना ने मिलकर बरार पर आक्रमण कर दिया।

अबुल फजल और मुराद की सेना से इनका युद्ध हुआ। चाँद बीबी ने पुनः सन्धि की बात-चीत प्रारम्भ की उस पर दगाबाजी का आरोप लगाकर मार डाला गया। अहमद नगर के एक भाग पर मुगलों का आधिपत्य हो गया लेकिन इसका एक बड़ा भाग मलिक अम्बर के अधीन बना रहा।इस तरह अहमद नगर की पूर्ण विजय न की जा सकी।

जहाँगीर:- जहाँगीर के काल की सबसे प्रमुख घटना 1615 ई0 में मेवाड़ की विजय थी। परन्तु उसकी के समय में 1621 ई0 में कान्धार मुगल राज्य से बाहर चला गया।

शाहजहाँ:- शाहजहाँ ने 1633 ई0 में अहमद नगर की विजय की। 1638 में उसने पुनः कान्धार की भी विजय की परन्तु कान्धार अन्तिम रूप से 1649 ई0 में उसी के शासन काल में बाहर निकल गया।

औरंगजेब:-1686 ई0 में बीजापुर और 1687 ई0 में गोल कुण्डा की विजय की।

3. अकबर की उत्तर भारत की विजयें

1. मालवा:-

  • शासक:- बाजबहादुर
  • मुगल सेनापति:- आधम खाँ और पीर मोहम्मद
  • यह अकबर की पहली विजय थी।

2. गोड़वाना विजय –

  • शासक:-रानी दुर्गावती ( महोबा की चन्देल राज कुमार )
  • मुगल सेनापति:– आसफ खाँ
  • गोड़वाना राज्य की शासिका महोबा की चन्देल राजकुमारी रानी दुर्गावती थी। यह अपने अल्प वयस्क पुत्र वीर नारायण की संरक्षिका थी अकबर ने गोड़वाना विजय करने के बाद चन्द्रशाह को यह राज्य वापस कर दिया। गोडवाना की राजधानी चैरागढ़ थी।

3. राजस्थान विजय:-

आमेर (1562):-

  • शासक:-भारमल
  • आमेर ने स्वेच्छा से अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली यह पहला राजपूताना राज्य था जिसने अकबर के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किया। भारमल ने अपनी पुत्री जोधाबाई का विवाह अकबर के साथ कर दिया। जिससे जहाँगीर उत्पन्न हुआ।
  • अकबर ने भारमल के दत्तक पुत्र भगवान दास एवं पौत्र मानसिंह को उच्च मनसब प्रदान किये।

मेड़ता विजय (1562):-

  • शासक:-जयमल
  • मुगल नेतृत्व: सरफुद्दीन

रणथम्भौर विजय (1569)

मेवाड़ (1568)

  • शासक:-उदय सिंह
  • मुगल नेतृत्व-अकबर
  • मेवाड़ पर आक्रमण का नेतृत्व स्वयं अकबर ने किया। उदयसिंह ने किले की सुरक्षा का भार अपने दो सेनापतियों जयमल एवं फत्ता (फतेह सिंह) को सौंपकर समीप की पहाडियों में चला गया।
  • अकबर ने मेवाड़ आक्रमण के दौरान 30,000 राजपूतों का कत्ल करवा दिया। इस कलंक को मिटाने के लिए उसने आगरा के किले के दरवाजे पर जयमल एवं फत्ता की वीरता की स्मृति में उनकी प्रस्तर मूर्तियां स्थापित करवाई।
  • उदयसिंह के बाद महाराणा प्रताप ने अकबर का विरोध जारी रखा। अकबर ने अपने दो सेनापतियों मानसिंह एवं आसफ खाँ को भेजा। फलस्वरूप हल्दी घाटी का प्रसिद्ध युद्ध हुआ।
  • शासक:-सुरजन राय
  • मुगल नेतृत्व -अकबर एवं भगवान दास

कालिंजर विजय (1569)

  • शासक:– रामचन्द्र
  • मुगल नेतृत्व:- मजनू खाँ काकशाह

मारवाड़, बीकानेर और जैसलमेर (1570):–

  • इन तीनों राज्यों के शासकों ने स्वेच्छा से अकबर की स्वाधीनता स्वीकार कर ली। मारवाड़ के शासक पहले चन्द्र सेन एवं फिर मोटाराजा उदयसिंह, बीकानेर के कल्याण मल और जैसलमेर के शासक रावल हरराय थे।
  • नोट:- आमेर, बीकानेर, मारवाड और जैसलमेर की रियासतों ने अकबर के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये।

हल्दी घाटी का युद्ध (18 जून 1576):-

  • महाराणा प्रताप एवं मानसिंह एवं आसफ खाँ की मिली जुली सेना के बीच। यह युद्ध अरावली घाटी के पास एक घाटी में लड़ा गया चूँकि यहाँ की भूमि पीली थी इसी कारण इसे हल्दी घाटी के नाम से जाना जाता है।
  • यद्यपि यह युद्ध राणा प्रताप के पक्ष में नहीं रहा परन्तु मानसिंह इसे पूरी तरह नही जीत सका। राणा प्रताप चावंड नामक स्थान पर चले गये और उसे अपनी राजधानी बनाया। वहीं पर धनुष प्रत्यंचा चढ़ाते समय चोट लगने के कारण 1597 ई0 में उनकी मृत्यु हो गई उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र अमर सिंह ने युद्ध जारी रखा। इस तरह अकबर मेवाड़ की पूर्ण विजय न कर सका।

गुजरात विजय (1572-84)

  • शासकः-मुजफ्फर खाँ तृतीय
  • प्रारम्भ में अकबर ने स्वयं गुजरात विजय का नेतृत्व किया। गुजरात पर अधिकार करने के बाद अकबर ने मिर्जा अजीज कोका को गुजरात का गर्वनर नियुक्त कर स्वयं वापस आ गया।
  • इसी बीच उसे सूचना मिली कि गुजरात के मुहम्मद हुसैन मिर्जा ने विद्रोह कर दिया है। अकबर ने बहुत तीव्र गति से आकर 1573 ई0 में इस विद्रोह को कुचल दिया। अकबर के इस तीव्र अभियान के बारे में स्मिथ ने लिखा है-कि यह ’’संसार के इतिहास का सर्वाधिक द्रुत गामी आक्रमण था’’
  • गुजरात में ही अकबर सर्वप्रथम पुर्तगालियों से मिला और कैम्बे में समुद्र को देखा।
  • अकबर के वापस लौटने पर वहाँ पुनः विद्रोह हो गया इस विद्रोह को कुचलने का कार्य 1584 ई0 में अब्दुल रहीम ने किया। इसी समय अकबर ने उसे खान-खाना की उपाधि प्रदान की।

बिहार एवं बंगाल विजय (1574-76)

  • शासक:– दाऊद
  • मुगल नेतृत्व- मुनीम खाँ

काबुल विजय (1581)

  • शासकः- मिर्जा हकीम (अकबर का सौतेला भाई)
  • मुगल नेतृत्व- अकबर एवं मान सिंह
  • काबुल विजय के बाद अकबर ने मिर्जा की बहन वख्तुननिशा बेगम को वहाँ का गर्वनर बनाया परन्तु बाद में काबुल को, मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया। तब राजा मान सिंह को वहाँ का गर्वनर बनाया गया।

कश्मीर विजय (1585-86)

  • शासक:- यूसुफ खाँ
  • मुगल नेतृत्व-भगवानदास एवं कासिम खाँ।

सिन्ध विजय (1591)

  • शासक:- जानीबेग
  • मुगल नेतृत्व -अब्दुल रहीम खान खाना

उड़ीसा विजय (1590-92)

  • शासक:– निसार खाँ
  • मुगल नेतृत्व – मानसिंह

ब्लूचिस्तान विजय (1595)

  • शासकः- पन्नी अफगान
  • मुगल नेतृत्व- मीर मासूम

कान्धार विजय (1595):-

  • कान्धार के शासक मुजफ्फर हुसैन मिर्जा ने स्वेच्छा से मुगल सरदार साहबेग को कान्धार सौंपकर स्वयं अकबर का मनसबदार बन गया।
  • इस प्रकार मेवाड़ को छोड़कर सम्पूर्ण उत्तर भारत अकबर के अधीन आ गया।

असीरगढ़ की विजय (1601)

  • शासक:- मीरन बहादुर
  • असीरगढ़ की विजय अकबर की अन्तिम विजय थी।
  • अकबर ने अपने दक्षिण राज्यों खानदेश-बरार और अहमद नगर की सूबेदारी अपने पुत्र दानियाल को प्रदान की तथा स्वयं दक्षिण के सम्राट की उपाधि धारण की।

प्रमुख विद्रोह

उजबेगों का विद्रोह:–

  • उजबेग अफगानिस्तान से सम्बन्धित थे। 1564 ई0 में मालवा के अब्दुल्ला खाँ ने विद्रोह किया परन्तु इसे कुचल दिया गया।
  • 1565 ई0 में जौनपुर के खान जमान एवं उसके भाई बहादुर खाँ ने विद्रोह किया इसे भी कुचल दिया गया।

मिर्जा वर्ग का विद्रोह:-

  • मिर्जा लोग अकबर के रिश्तेदार थे। इब्राहिम मिर्जा, मुहम्मद हुसेन मिर्जा आदि ने विद्रोह किया।
  • इसे 1573 ई0 तक समाप्त कर दिया गया।

बंगाल एवं बिहार में विद्राह:-

  • 1580 ई0 में बंगाल में बाबा खाँ काकराल ने विद्रोह किया जबकि बिहार में मुहम्मद मासूम काबुली ने विद्रोह किया।
  • 1581 तक इन विद्रोहों को समाप्त कर दिया गया।

अफगान ब्लूचियों का विद्रोह (1585):–

  • इसी विद्रोह में बीरबल की मृत्यु हो गई। तब इस विद्राहे को कुचलने का कार्य टोडरमल एवं मानसिंह ने किया।

सलीम का विद्रोह (1602):-

  • अकबर के पुत्र सलीम ने विद्रोह कर दिया उसने वीर सिंह बुन्देल खाँ द्वारा 1602 ई0 में अबुल फजल की हत्या करवा दी।

1605 में अकबर की मृत्यु पेचिश से हो गई। सिकन्दरिया में अकबर को दफना दिया गया।

अकबर के पुत्र

  • 1. हसन
  • 2. हुसैन ( बचपन में मर गये )
  • 3. सलीम
  • 4. मुराद
  • 5. दानियाल ( मदिरापान के कारण मर गया )

इसके काल के प्रमुख निर्माण निम्नलिखित है-

1. हुमायूँ का मकबरा: (ताजमहल का पूर्वगामी):- अकबर के काल की सर्वप्रथम इमारत हुमायूँ का मकबरा है। इसका निर्माण हुमायूँ की पत्नी हाजी बेगम द्वारा करवाया गया। यह दीन-पनाह के ठीक बाहर स्थित है। इसका वास्तुकार फारस का मीरन मिर्जा गियास था।

इसमें मुख्य कक्ष के अतिरिक्त चार अन्य कक्ष भी हैं। जिसमें बाद में कई शहजदों एवं शहजादियों को दफनाया गया था ,जैसे-दाराशिकोह, रफी उद्दरजात, रफी उद्दौला, बहादुर शाह जफर के दो पत्र आदि। हुमायूँ के मकबरे में एक दोहरा गुम्बद है। इसे ताजमहल का पूर्वगामी कहा जाता है क्योंकि यह पूर्णतः संगमरमर से निर्मित है।

अकबर कालीन इमारतों को दो भागों में बांटा जा सकता है।

1. लाल किले की इमारतें:- आगरे का लाल किला अकबर द्वारा बनवाया गया पहला किला था इसकी समानता मान सिंह द्वारा बनवाये गये ग्वालियर के किले से है। इसके अन्तर्गत प्रमुख इमारत जहाँगीरी महल है। यह स्थापत्य से प्रभावित है। इसके अन्दर की दूसरी इमारत अकबरी महल है।

2. फतेहपुर सीकरी:- अपनी गुजरात विजय के बाद अकबर ने फतेहपुर सीकरी का निर्माण प्रारम्भ किया इसके निर्माण का श्रेय बहाउद्दीन को जाता है। फतेहपुर सीकरी की अधिकांश इमारते लाल बलुआ पत्थर से बनी हैं परन्तु कुछ इमारतों में संगमरमर का भी प्रयोग हुआ है। आइने अकबरी में अबुल-फजल ने लिखा है कि ’’सम्राट अपनी कल्पना में जिस वास्तु-कला की संकल्पना करता है उसको वह इमारत निर्माण में असली रूप प्रदान करता है’’।

फतेहपुर सीकरी की प्रमुख इमारतें निम्नलिखित हैं-

• जोधाबाई_का_महल:-

यह फतेहपुर_सीकरी की सबसे बड़ी इमारत है जो हिन्दू स्थापत्य से प्रभावित है।
• पंचमहल या हवा महल:–

यह बौद्ध विहारों से प्रभावित है।
• मरियम महल:- इसमें भित्ति चित्र प्राप्त हुए हैं।
• जामा मस्जिद:– यह फतेहपुर सीकरी की सबसे सुन्दर इमारत है। इसमें संगमरमर का भी प्रयोग हुआ है। प्रसिद्ध कलाविद फंग्र्यूसन ने इसे पत्थर में रुमानी कथा कहा है। अकबर ने दीन-ए-इलाही की घोषणा यहीं से की थी।

बुलन्द दरवाजा:-

 जामा मस्जिद के दक्षिण में बुलन्द दरवाजा स्थित है। इसका निर्माण गुजरात विजय के उपलक्ष्य में किया गया इसकी ऊंचाई दक्षिण विजय के बाद बढ़ा दी गई। इस प्रकार यह गुजरात एवं दक्षिण विजय का प्रतीक है। इसे फतेहपुर सीकरी का गौरव कहा जाता है। जमीन तल से यह 176 फीट ऊंचा है। अकबर के काल मे बुलंद दरबाजा का निर्माण पीले बलुआ पत्थर से हुआ था। 

शेख सलीम चिश्ती का मकबरा:- जामा मस्जिद के प्रांगड़ में स्थित है जहाँगीर ने इसे बाद में पूर्णतः संगमरमर से निर्मित कर दिया।

इस्लाम शाह की कब्र

दीवाने खास:- यही अकबर का इबादत खाना है। जहाँ प्रत्येक गुरुवार को चर्चा होती थी।

अकबर द्वारा निर्मित किले

1. आगरा का किला
2. लाहौर का किला
3. इलाहाबाद का किला:- सर्वाधिक बड़ा
4. अजमेर का किला
5. अटक का किला

अकबर का मकबरा- अकबर का मकबरा सिकंदराबाद मे है जिसका नाम अकबर ने बहिस्ताबाद रखा था। इसकी प्रमुख विशेषता गुम्बद का अभाव है। यह बौद्ध विहारों से प्रभावित है। इस मकबरे का निर्माण कार्य अकबर के समय में ही प्रारम्भ हुआ परन्तु यह पूर्ण जहाँगीर के समय में हुआ।

अकबर के समय के महत्व पूर्ण अधिकारी वकील के कार्यो को चार विभागों में बाटा गया➡

  1. दिवान
  2. मीरवख्शी
  3. मीरसमा
  4. सदर ए सुदूर।

अकबर की भू-राजस्व नीति:-

मुग़ल शासकों में अकबर ने ही सर्वप्रथम भूमि या भूमि कर व्यवस्था को संगठित करने का प्रयास किया। उसने शेरशाह सूरी की राजस्व व्यवस्था को प्रारम्भ में अपनाया। शेरशाह द्वारा भू-राजस्व हेतु अपनायी जाने वाली पद्धति ‘राई’ का प्रयोग अकबर ने भी राजस्व दरों के प्रयोग के लिए किया। अकबर ने शेरशाह की तरह भूमि की नाप-जोख करवाकर, भूमि को उत्पादकता के आधार पर एक-तिहाई भाग लगान के रूप में निश्चित किया था।

बैरम ख़ाँ के प्रभाव से मुक्त होने पर अकबर ने भू-राजस्व व्यवस्था के पुनः निर्धारण हेतु 1570-1571 ई. में मुज़फ्फर ख़ाँ तुरबाती एवं राजा टोडरमल को अर्थमंत्री के पद पर नियुक्त किया। उसने वास्तविक आंकड़ों के आधार पर भू-राजस्व का ‘जमा-हाल हासिल’ नामक नवीन लेखा तैयार करवाया।

गुजरात को जीतने के बाद 1573 ई. में अकबर ने पूरे उत्तर भारत में ‘करोड़ी’ नाम के अधिकारी की नियुक्ति की। उसे अपने क्षेत्र से एक करोड़ दाम वसूल करना होता था। ‘करोड़ी’ की सहायता के लिए ‘आमिल’ नियुक्त किये गए। ये क़ानूनगों द्वारा बताये गये आंकड़े की भी जाँच करते थे। वास्तविक उत्पादन, स्थानीय क़ीमतें, उत्पादकता आदि पर उनकी सूचना के आधार पर अकबर ने 1580 ई. में ‘दहसाला’ नाम की नवीन प्रणाली को प्रारम्भ किया।

टोडरमल का बन्दोबस्त

अकबर के शासनकाल के 1571 ई. से 1580 ई. (10 वर्षों) के आंकड़ों के आधार पर भू-राजस्व का औसत निकालकर ‘आइन-ए-दहसाला’ लागू किया गया। इस प्रणाली के अन्तर्गत राजा टोडरमल ने अलग-अलग फ़सलों पर नक़द के रूप में वसूल किये जाने वाला लगान का 1571 से ई. के मध्य क़रीब 10 वर्ष का औसत निकालकर, उस औसत का एक-तिहाई भू-राजस्व के रूप में निश्चित किया।

कालान्तर में इस प्रणाली में सुधार के अन्तर्गत न केवल ‘स्थानीय क़ीमतों’ को आधार बनाया गया, बल्कि कृषि उत्पादन वाले परगनों को विभिन्न कर हलकों में बांटा गया। अब किसान को भू-राजस्व स्थानीय क़ीमत एवं स्थानीय उत्पादन के अनुसार देना होता था ‘आइने दहसाला’ व्यवस्था को ‘टोडरमल बन्दोबस्त’ भी कहा जाता था।

इस व्यवस्था के अन्तर्गत भूमि की पैमाइश हेतु उसे 4 भागों में विभाजित किया गया-

  1. पोलज भूमि – इस भूमि पर नियमित रूप से खेती होती थी।
  2. परती भूमि – यह भूमि उर्वरा-शक्ति प्राप्त करने हेतु एक या दो वर्ष तक परती पड़ी रहती थी।
  3. छच्छर या चाचर भूमि – ऐसी भूमि, जिस पर लगभग तीन या चार वर्षों तक खेती नहीं की जाती थी।
  4. बंजर भूमि – निकृष्ट कोटि की भूमि, जिसे लगभग 5 वर्षों तक काश्त के प्रयोग में लाया गया हो।लगान खेती के लिए प्रयुक्त भूमि पर ही वसूला जाता था।

आइन-ए-दहसाला मुग़ल साम्राज्य में बादशाह अकबर के शासन काल में राजा टोडरमल द्वारा स्थापित की गई भू-राजस्व व्यवस्था की पद्धति थी।

भूमि की नाप का प्रचलन:-

लगान निर्धारण से पूर्व भूमि की माप कराई जाती थी। अकबर ने अपने शासन काल के 31वें वर्ष लगभग 1587 ई. में भूमि की पैमाइश हेतु पुरानी मानक ईकाई सन की रस्सी से निर्मित ‘सिकन्दरी गज़’ के स्थान पर ‘इलाही गज़’ का प्रयोग आरम्भ किया।

यह गज़ लगभग 41 अंगुल या 33 इंच के बराबर होता था। वह ‘तनब’ तम्बू की रस्सी एवं ‘जरीब’ लोहे की कड़ियों से जुड़ी हुई बाँस द्वारा निर्मित होती थी। शाहजहाँ के काल में दो नई नापों का प्रचलन हुआ।

बीघा-ए-इलाहीदिरा-ए-शाहजहाँनी (बीघा-ए-दफ़्तरी)

औरंगज़ेब के शासन काल में ‘दिरा-ए-शाहजहाँनी’ का प्रयोग बंद हो गया था, परन्तु ‘बीघा-ए-इलाही’ का प्रयोग मुग़लसाम्राज्य के अंत तक चलता रहा।

जाब्ती प्रथा

अकबर के शासन काल में 15वें वर्ष लगभग 1570-1571 ई. में टोडरमल ने खालसा भूमि पर भू-राजस्व की नवीन प्रणाली, जिसका नाम ‘जाब्ती’ था, को प्रारम्भ किया। इस प्रणाली में भूमि की पैमाइश एवं खेतों की मूल वास्तविक पैदावार को आंकने के आधार पर कर की दरों को निर्धारित किया जाता था।

यह प्रणाली बिहार, लाहौर, इलाहाबाद, मुल्तान, दिल्ली, अवध, मालवा एवं गुजरात में प्रचलित थी। इसमें कर निर्धारण की दो श्रेणी थी, एक को ‘तखशीस’ कर निर्धारण कहते थे और दूसरे को ‘तहसील’ व ‘वास्तविक वसूली’ कहते थे। लगान निर्धारण के समय राजस्व अधिकारी द्वारा लिखे गये पत्र को ‘पट्टा’, ‘कौल’ या ‘कौलकरार’ कहा जाता था।

उपर्युक्त प्रणाली के अन्तर्गत उपज के रूप में निर्धारित भू-राजस्व को नक़दी के रूप में वसूल करने के लिए विभिन्न फ़सलों के क्षेत्रीय आधार पर नक़दी भू-राजस्व अनुसूची (दस्तूरूल अमल) तैयार की जाती थी। मुग़ल काल में ‘खुम्स’ नामक कर समाप्त हो गया था, क्योंकि मुग़ल सैनिक वेतनभोगी होते थे। इस प्रकार उन्हें लूट की सम्पत्ति का कोई हिस्सा नहीं मिलता था।

मुग़ल सम्राटों को अधीनस्थ राजाओं तथा मनसबदारों द्वारा समय-समय पर दिये जाने वाले एक निश्चित राजस्व को ‘पेशकश’ कहा जाता था। औरंगजेब ने आज्ञा दी थी, कि नक़द पेशकश को ‘नज़र’ कहा जाय तथा सम्राट द्वारा शाहज़ादों को दिये गये उपहार को ‘नियाज’ एवं अमीर के उपहार को ‘निसार’ कहा जाय।

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