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September 27, 2020

Rajput History राजस्थान में राजपूत वंशों का उदय 7-12 वीं सदी

राजस्थान में राजपूत वंशों का उदय 7-12 वीं सदी

राजपूत

सूर्यवंशी, चंद्रवंशी, यदुवंशी, अग्निवंशी।

“राजपूत” शब्द की व्युत्पत्ति राजपूतों की उत्पत्ति के विभिन्न मत और उनकी समीक्षा

  • अग्निवंशीय मत
  • सूर्य तथा चंद्रवंशीय मत
  • विदेशी वंश का मत
  • गुर्जर वंश का मत
  • ब्राह्मणवंशीय मत
  • वैदिक आर्य वंश का मत

राजपूतों की विदेशी उत्पत्ति का सिद्धांत ( Rajput Origin )

(1) विदेशी सिद्धान्त ( Foreign principle )

राजस्थान के इतिहास को लिखने का श्रेय कर्नल जेम्स टॉड को दिया जाता है, कर्नल टॉड को हम राजस्थान इतिहास का जनक व राजस्थान इतिहास के पितामह भी कहते हैं कर्नल टॉड ने अपने ग्रंथ ‘दे एनल्स एंड एंटिक्विटी ऑफ राजस्थान’ में राजपूत को विदेशी जातियों से उत्पन्न होना बताया, कर्नल टॉड ने विदेशी जातियों में शक, कुषाण, सिर्थियन, आदि विदेशी जातियों के सम्मिश्रण से राजपूतों की उत्पत्ति हुई,

उनका मानना था कि जिस प्रकार यह विदेशी जातियां आक्रमण व युद्ध में विश्वास रखती थी, ठीक उसी प्रकार राजस्थान के राजपूत शासक भी युद्ध में विश्वास रखते थे इस कारण इस कारण कर्नल टॉड ने राजपूतों को विदेशियों की संतान कहा, इस मत का समर्थन इतिहासकार क्रुक महोदय ने भी किया!!!

(2) अग्निकुंड का सिद्धांत

लेखक चंद्रवरदाई ने अपने ग्रंथ पृथ्वीराज रासो में राजपूतों की उत्पत्ति का अग्नि कुंड का सिद्धांत प्रतिपादित किया  इनकी उत्पत्ति के बारे में उन्होंने बताया कि माउंट आबू पर गुरु वशिष्ट का आश्रम था, गुरु वशिष्ठ जब यज्ञ करते थे तब कुछ दैत्यो द्वारा उस यज्ञ को असफल कर दिया जाता था!  तथा उस यज्ञ में अनावश्यक वस्तुओं को डाल दिया जाता था

जिसके कारण यज्ञ दूषित हो जाता था गुरु वशिष्ठ ने इस समस्या से निजात पाने के लिए अग्निकुंड अग्नि से 3 योद्धाओं को प्रकट किया इन योद्धाओं में परमार, गुर्जर, प्रतिहार, तथा चालुक्य( सोलंकी) पैदा हुए, लेकिन समस्या का निराकरण नहीं हो पाया इस प्रकार गुरु वशिष्ठ ने पुनः एक बार यज्ञ किया और उस यज्ञ में एक वीर योद्धा अग्नि में प्रकट किया यही अंतिम योद्धा ,चौहान, कहलाया इस प्रकार चंद्रवरदाई ने राजपूतों की उत्पत्ति अग्निकुंड से बताई

नोट-  माउंट आबू सिरोही में वशिष्ठ कुण्ड व ग्ररू वशिष्ठ आश्रम स्थित है

राजपूतों की उत्पत्ति ( Rajput Origin )

अग्निवंशी मत ( Agnostic vote )

  • राजपूताना के इतिहास के सन्दर्भ में राजपूतों की उत्पत्ति के विभिन्न सिद्धान्तों का अध्ययन बड़ा महत्त्व का है। राजपूतों का विशुद्ध जाति से उत्पन्न होने के मत को बल देने के लिए उनको अग्निवंशीय बताया गया है।
  • इस मत का प्रथम सूत्रपात चन्दबरदाई के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘पृथ्वीराजरासो’ से होता है। उसके अनुसार राजपूतों के चार वंश प्रतिहार, परमार, चालुक्य और चौहान ऋषि वशिष्ठ के यज्ञ कुण्ड से राक्षसों के संहार के लिए उत्पन्न किये गये।
  • इस कथानक का प्रचार 16 वीं से 18वीं सदी तक भाटों द्वारा खूब होता रहा। मुहणोत नैणसी और सूर्यमल्ल मिसण ने इस आधार को लेकर उसको और बढ़ावे के साथ लिखा।
  • परन्तु इतिहासकारों के अनुसार ‘अग्निवंशीय सिद्धान्त’ पर विश्वास करना उचित नहीं है क्योंकि सम्पूर्ण कथानक बनावटी व अव्यावहारिक है। ऐसा प्रतीत होता है कि चन्दबरदाई ऋषि वशिष्ठ द्वारा अग्नि से इन वंशों की उत्पत्ति से यह अभिव्यक्त करता है कि जब विदेशी सत्ता से संघर्ष करने की आवश्यकता हुई तो इन चार वंश के राजपूतों ने शत्रुओं से मुकाबले हेतु स्वयं को सजग कर लिया।
  • गौरीशकंर हीराचन्द ओझा, सी.वी.वैद्य, दशरथ शर्मा, ईश्वरी प्रसाद इत्यादि इतिहासकारों ने इस मत को निराधार बताया है।
  • गौरीशंकर हीराचन्द ओझा राजपूतों को सूर्यवंशीय और चन्द्रवंशीय बताते हैं। अपने मत की पुष्टि के लिए उन्होंने कई शिलालेखों और साहित्यिक ग्रंथों के प्रमाण दिये हैं, जिनके आधार पर उनकी मान्यता है कि राजपूत प्राचीन क्षत्रियों के वंशज हैं।
  • राजपूतों की उत्पत्ति से सम्बन्धित यही मत सर्वाधिक लोकप्रिय है।
  • राजपूताना के प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने राजपूतों को शक और सीथियन बताया है। इसके प्रमाण में उनके बहुत से प्रचलित रीति-रिवाजों का, जो शक जाति के रिवाजों से समानता रखते थे, उल्लेख किया है। ऐसे रिवाजों में सूर्य पूजा, सती प्रथा प्रचलन, अश्वमेध यज्ञ, मद्यपान, शस्त्रों और घोड़ों की पूजा इत्यादि हैं।
  •  टॉड की पुस्तक के सम्पादक विलियम क्रुक ने भी इसी मत का समर्थन किया है
  • परन्तु इस विदेशी वंशीय मत का गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने खण्डन किया है। ओझा का कहना है कि राजपूतों तथा विदेशियों के रस्मों-रिवाजों में जो समानता कनर्ल टॉड ने बताई है, वह समानता विदेशियों से राजपूतों ने प्राप्त नहीं की है, वरन् उनकी सत्यता वैदिक तथा पौराणिक समाज और संस्कृति से की जा सकती है। अतः उनका कहना है कि शक, कुषाण या हूणों के जिन-जिन रस्मो-रिवाजों व परम्पराओं का उल्लेख समानता बताने के लिए जेम्स टॉड ने किया है, वे भारतवर्ष में अतीत काल से ही प्रचलित थीं। उनका सम्बन्ध इन विदेशी जातियों से जोड़ना निराधार है।
  •  डॉ. डी. आर. भण्डारकर राजपूतों को गुर्जर मानकर उनका संबंध श्वेत-हूणों के स्थापित करके विदेशी वंशीय उत्पत्ति को और बल देते हैं। इसकी पुष्टि में वे बताते हैं कि पुराणों में गुर्जर और हूणों का वर्णन विदेशियों के सन्दर्भ में मिलता है। इसी प्रकार उनका कहना है कि अग्निवंशीय प्रतिहार, परमार, चालुक्य और चौहान भी गुर्जर थे, क्योंकि राजोर अभिलेख में प्रतिहारों को गुर्जर कहा गया है।
  •  इनके अतिरिक्त भण्डारकर ने बिजौलिया शिलालेख के आधार पर कुछ राजपूत वंशों को ब्राह्मणों से उत्पन्न माना है। वे चौहानों को वत्स गोत्रीय ब्राह्मण बताते हैं और गुहिल राजपूतों की उत्पत्ति नागर ब्राह्मणों से मानते हैं।
  • डॉ. ओझा एवं वैद्य ने भण्डराकर की मान्यता को अस्वीकृत करते हुए लिखा है कि प्रतिहारों को गुर्जर कहा जाना जाति विशेष की संज्ञा नहीं है वरन् उनका प्रदेश विशेष गुजरात पर अधिकार होने के कारण है।
  • जहाँ तक राजपूतों की ब्राह्मणों से उत्पत्ति का प्रश्न है, वह भी निराधार है क्योंकि इस मत के समर्थन में उनके साक्ष्य कतिपय शब्दों का प्रयोग राजपूतों के साथ होने मात्र से है।
  • इस प्रकार राजपूतों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में उपर्युक्त मतों में मतैक्य नहीं है। फिर भी डॉ. ओझा के मत को सामान्यतः मान्यता मिली हुई है।
  • निःसन्देह राजपूतों को भारतीय मानना उचित है।

राजपूतों की शाखाएं ( Rajput caste history )

सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी, अग्निवंशीय 

सूर्य वंश की शाखायें ( Suryavansh )

1.कछवाह
2.राठौड
3.बडगूजर
4.सिकरवार
5.सिसोदिया
6.गहलोत
7.गौर
8.गहलबार
9.रेकबार
10 .जुनने
11. बैस
12. रघुवशी

चन्द्र वंश की शाखायें ( Chandravansh )

1.जादौन
2.भाटी
3.तोमर
4.चन्देल
5.छोंकर
6.होंड
7.पुण्डीर
8.कटैरिया
9 .दहिया

अग्निवंश की चार शाखायें ( Agnivansh )

1.चौहान
2.सोलंकी
3.परिहार
4.परमार

कर्नल जेम्स टॉड ( James Tod )

राजस्थान में रेजीडेंट 1817 से 1822 तक।  नियुक्ति- पश्चिमी राजपूताना क्षेत्र में। 28 तारीख को सामंतवादी की स्थापना करने का श्रेय कर्नल जेम्स टॉड को जाता है।

संज्ञा- घोड़े वाले बाबा राजस्थानी इतिहास के पितामह

पुस्तकों का संपादन विलियम क्रुक ने करवाया, पुस्तकों का हिंदी अनुवाद गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने किया

कर्नल जेम्स टॉड की पुस्तक ( James Tod’s book )

  • Vol.1:- एनाल्स एण्ड एण्टीक्वीटीज आॅफ राजस्थान 1829
  • Vol.2:- the central and western Rajputana states of India 1832
  • travels in western India (1839)

September 27, 2020

Medieval Rajasthan मध्यकालीन राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था

मध्यकालीन राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था

प्रशासनिक

मध्यकाल में राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था से तात्पर्य मुगलों से संपर्क के बाद से लेकर 1818 ईसवी में अंग्रेजों के साथ हुई संधियों की काल अवधि के अध्ययन से है।  इस काल अवधि में राजस्थान में 22 छोटी बड़ी रियासतें थी और अजमेर मुगल सूबा था।

इन सभी रियासतों का अपना प्रशासनिक तंत्र था लेकिन, कुछ मौलिक विशेषताएं एकरूपता लिए हुए भी थी। रियासतें मुगल सूबे के अंतर्गत होने के कारण मुगल प्रभाव भी था।

राजस्थान की मध्यकालीन प्रशासनिक व्यवस्था के मूलत 3 आधार थे —

  • सामान्य एवं सैनिक प्रशासन।
  • न्याय प्रशासन।
  • भू राजस्व प्रशासन।

संपूर्ण शासन तंत्र राजा और सामंत व्यवस्था पर आधारित था। राजस्थान की सामंत व्यवस्था रक्त संबंध और कुलीय भावना पर आधारित थी।सर्वप्रथम कर्नल जेम्स टॉड ने यहां की सामंत व्यवस्था के लिए इंग्लैंड की फ्यूडल व्यवस्था के समान मानते हुए उल्लेख किया है।

राजस्थान की सामंत व्यवस्था पर व्यापक शोध कार्य के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि यहां की सामंत व्यवस्था कर्नल टॉड द्वारा उल्लेखित पश्चिम के फ्यूडल व्यवस्था के समान स्वामी (राजा) और सेवक (सामंत) पर आधारित नहीं थी।

राजस्थान के सामंत व्यवस्था रक्त संबंध एवं कुलीय भावना पर आधारित प्रशासनिक और सैनिक व्यवस्था थी।

केन्द्रीय शासन ( Central Government )

राजा – सम्पूर्ण शक्ति का सर्वोच्च केंद्र

प्रधान – राजा के बाद प्रमुख। अलग अलग रियासतों में अलग अलग नाम – कोटा और में दीवान, जैसलमेर, मारवाड मेवाड में प्रधान, जयपुर में मुसाहिब, बीकानेर में मुख्त्यार।

बक्षी – सेना विभाग का प्रमुख। जोधपुर में फौजबक्षी होता था।

नायब बक्षी – सैनिको व किलों पर होने वाले खर्च और सामन्तों की रेख का हिसाब रखता था

नोट – रेख = एक जागीरदार की जागीर की वार्षिक आय

शिकदार- मुगल प्रशासन के कोतवाल के समान। गैर सैनिक कर्मचारियों के रोजगार सम्बंधी कार्य।

सामन्ती श्रेणियां ( Feudal System )

कर्नल टॉड ने सामन्ती व्यवस्था को इग्लैण्ड में चलने वाली फ्यूडवल व्यवस्था के समान माना है।

सामन्त श्रेणिया –

  • मारवाड- चार प्रकार की राजवी, सरदार, गनायत, मुत्सद्दी
  • मेवाड – तीन श्रेणियां , जिन्हे उमराव कहा जाता था। सलूम्बर के सामन्त का विशेष स्थान।
  • जयपुर – पृथ्वीसिंह के समय श्रेणी विभाजन। 12 पुत्रों के नाम से 12 स्थायी जागीरे चलीजिन्हे कोटडी कहा जाता था।
  • कोटा- में राजवी कहलाते थे।
  • बीकानेर – में सामन्तों की तीन श्रेणियां थी।
  • जैसलमेर में दो श्रेणियां थी।
  • अन्य श्रेणियां – भौमिया सामन्त, ग्रासिया सामन्त

सामन्त व्यवस्था ( Feudal system )

राजस्थान में परम्परागत शासन में राजा -सामन्त का संबंध भाई-बंधु का था।  मुगल काल में सामन्त व्यवस्था में परिवर्तन। अब स्थिति स्वामी – सेवक की स्थिति।

सेवाओं के साथ कर व्यवस्था –

परम्परागत शासन में सामन्त केवल सेवाएं देता था। लेकिन मुगल काल से कर व्यवस्था भी निर्धारित की गयी।

सामन्त अब

  • पट्टा रेख – राजा द्वारा जागीर के पट्टे में उल्लेखित अनुमानित राजस्व।
  • भरत रेख – राजा द्वारा सामन्त को प्रदत जागीर के पट्टे में उल्लेखित रेख के अनुसार राजस्व।
  • उत्तराधिकार शुल्क – जागीर के नये उत्तराधिकारी कर से वसूल किया जाने वाला कर। अलग अलग रियासतों में इसके नाम-मारवाड – पहले पेशकशी फिर हुक्मनामा. मेवाड और जयपुर में नजराना, अन्य रियासतों मे कैद खालसा या तलवार बंधाई नाम था।, जैसलमेर एकमात्र रियासत जहां उत्तराधिकारी शुल्क नहीं लिया जाता था।
  • नजराना कर- राजाके बडे पुत्र के विवाह पर दिया जाने वाला कर।
  • न्योत कर
  • तीर्थ यात्रा कर

भूमि और भू स्वामित्व ( Land and Land Ownership )

भूमि दो भागों में विभाजित थी –

  1. खालसा भूमि ( Khalsa land )- जो कि सीधे शासक के नियंत्रण में होती थी जिसे केंद्रीय भूमि भी कह सकते हैं।
  2. जागीर भूमि – यह चार प्रकार की थी।

सामंत जागीर ( Feudal Estate ) – यह जागीर भूमि जन्मजात जागीर थी जिसका लगान सामन्त द्वारा वसूल किया जाता था।

हुकूमत जागीर – यह मुत्सदद्धियों को दी जाती थी।

भौम जागीर – राज्य को निश्चित सेवाए व कर देते थे।

शासण जागीर – यह माफी जागीर भी कहलाती थी। यह करमुक्त जागीर थी। धर्मार्थ, शिक्षण कार्य, साहित्य लेखन कार्य, चारण व भाट आदि को अनुदान स्वरूप दी जाती थी।

इसके अलावा भूमि को ओर दो भागों में बांटा गया-

  • कृषि भूमि ( Agricultural land ) – खेती योग्य भूमि।
  • चरनोता भूमि ( Charnote land )- पशुओं के लिए चारा उगाया जाता था।

किसान- दो प्रकार के थे-

  • बापीदार – खुदकाश्तकार और भूमि का स्थाई स्वामी
  • गैरबापीदार – शिकमी काश्तकार और भूमि पर वंशानुगत अधिकार नहीं। ये खेतीहर मजदूर थे।

दाखला – किसानों को दी जाने वाली भूमि का पट्टा जो जागीरदार के रजिस्टर में दर्ज रहता था।

लगान वसूली की विधि ( Tax collection method )

लगान वसूली की तीन विधि अपनाते थे-

लाटा या बटाई विधि- फसल कटने योग्य होने पर लगान वसूली के लिए नियुक्त अधिकारी की देखरेख में कटाई तथा धान साफ होने पर राज्य का भाग अलग किया जाता था।

कून्ता विधि- खडी फसल को देखकर अनुमानित लगान निर्धारिढ करना।

अन्य विधि – इसे तीन भागों में – मुकाता, डोरी और घूघरी

डोरी और मुकाता में कर निर्धारण एक मुश्त होता था। नकद कर भी लिया जाता था। डोरी कर निर्धारण में नापे गये भू भाग का निर्धारण करके वसूल करना।

घूघरी कर विधि के अनुसार शासक, सामन्त एवं जागीरदार किसान को जितनी घूघरी (बीज) देता था उतना ही अनाज के रूप में लेता था।दूसरी घूघरी विधि में प्रति कुआं या खेत की पैदावार पर निर्भर था।

मध्यकाल में राजस्थान में प्रचलित विभिन्न लाग-बाग

भू राजस्व के अतिरिक्त कृषकों से कई अन्य प्रकार के कर वसूल किए जाते थे उन्हें लाग बाग कहा जाता था लाग-बाग दो प्रकार के थे–

  • नियमित
  • अनियमित

नियमित लाग– की रकम निश्चित होती थी और उसकी वसूली प्रतिवर्ष या 2-3 वर्ष में एक बार की जाती थी

अनियमित लाग- की रकम निश्चित नहीं थी उपज के साथ-साथ यह कम या ज्यादा होती रहती थी इन लागों के निर्धारण का कोई निश्चित आधार नहीं था

  • नल बट एवं नहर वास- यह लाग सिंचित भूमि पर ली जाती थी
  • जाजम लाग- भूमि के विक्रय पर वसूली जाने वाली लाभ
  • सिंगोटी- मवेशी के विक्रय के समय वसूली जाने वाली लाग
  • मलबा और चौधर बाब- मारवाड़ में मालगुजारी के अतिरिक्त किसान से यह कर वसूल करने की व्यवस्था थी मलबा की आय से फसल की रक्षा संबंधी किए गए खर्च की पूर्ति की जाती थी और उन व्यक्तियों को पारिश्रमिक देने की व्यवस्था रहती थी जिन्होंने बटाई की प्रक्रिया में भाग लिया था

मारवाड़ में जागीर क्षेत्र में खारखार,कांसा,शुकराना (खिड़की या बारी खुलाई) हासा, माचा, हल, मवाली, आदि प्रमुख लागें थी

  • धूँआ भाछ- बीकानेर राज्य में यह कर वसूल किया जाता था
  • घर की बिछोती- जयपुर राज्य में इस कर की वसूली की जाती थी
  • घास मरी- विभिन्न प्रकार के चऱाई करो का सामूहिक नाम था
  • अंगाकर- मारवाड़ में प्रति व्यक्ति ₹1 की दर से महाराजा मानसिंह के समय इस कर की वसूली की गई थी
  • खेड़ खर्च-राज्य में सेना के खर्च के नाम से जो कर लिया जाता था उसे खेड़ खर्च या फौज खर्च की संज्ञा दी गई थी
  • गनीम बराड़- मेवाड़ में युद्ध के समय गनीम बराड़ कर वसूल किया जाता था
  • कागली या नाता कर- विधवा के पुनर्विवाह के अवसर पर प्रतिभा ₹1 की दर से यह कर वसूल किया जाता था ।

मेवाड़ में नाता बराड़, कोटा राज्य में नाता कागली, बीकानेर राज्य में नाता और जयपुर राज्य में छैली राशि के नाम से यह कर लिया जाता था

  • जकात कर- बीकानेर राज्य में सीमा शुल्क आयात निर्यात और चुंगी कर का सामूहिक नाम जकात था

जोधपुर और जयपुर राज्य में पारिवारिक भाषा में इसे सायर की संज्ञा दी थी

  • दाण कर- मेवाड़ और जैसलमेर राज्यों में माल के आयात निर्यात पर लगाया जाने वाला कर दाण कहलाता था
  • मापा ,बारुता कर- मेवाड़ में 1 गांव से दूसरे गांव में माल लाने ले जाने पर यह कर वसूल किया जाता था

जबकि बीकानेर राज्य में विक्रीकर को मापा के नाम से पुकारते थे

  • लाकड़ कर- जंगलात की लकड़ियों पर लाकड़ कर लिया जाता था।

इस कर को बीकानेर में काठ जयपुर में दरख्त की बिछोती मेवाड़ में खड़लाकड़ और मारवाड़ में कबाड़ा बाब के नाम से पुकारते थे

राली लाग- प्रतिवर्ष काश्तकार अपने कपड़ों में से एक गद्दा या राली बना कर देता था जो जागीदार या उसकी कर्मचारियों के काम आती थी

दस्तूर- भू राजस्व कर्मचारी पटेल पटवारी कानूनगो तहसीलदार और चौधरी जो अवैध रकम किसानों से वसूल करते थे उसे दस्तूर कहा जाता था

नजराना- यह लाग प्रतिवर्ष किसानों से जागीरदार और पटेल वसूल करते थे जागीरदार राजा को और पटेल तहसीलदार को नजराना देता था जिसकी रकम किसानों से वसूल की जाती थी

बकरा लाग- प्रत्येक काश्तकार से जागीरदार एक बकरा स्वयं के खाने के लिए लेता था उस जागीरदार बकरे के बदले प्रति परिवार से ₹2 वार्षिक लेते थे

न्योता लाग- यह लाग जागीरदार पटेल और चौधरी अपने लड़के लड़की की शादी के अवसर पर किसानों से वसूल करते थे

चवरी लाग- किसानों के पुत्र या पुत्री के विवाह पर एक से ₹25 तक चवरी लाग के नाम पर लिए जाते थे

कुंवर जी का घोड़ा- कुंवर के बड़े होने पर घोड़े की सवारी करना सिखाया जाता था तब घोड़ा खरीदने के लिए प्रति घर से ₹1 कर के रूप में लिया जाता था

खरगढी़- सार्वजनिक निर्माण या दुर्गों के भीतर निर्माण कार्यों के लिए गांव से बेगार में गधों को मंगवाया जाता था परंतु बाद में गधों के बदले खर गढी़ लाग वसूल की जाने लगी

खिचड़ी लाग- जागीरदार द्वारा अपने प्रत्येक गांव से उनकी आर्थिक स्थिति के अनुसार ली जाने वाली लाग राज्य की सेना जब किसी गांव के पास पडा़व डालती है तब उसके भोजन के लिए गांव के लोगों से वसूली जाने वाली लाग खिचड़ी लाग कहलाती थी

अंग लाग- प्रत्येक किसान के परिवार के प्रत्येक सदस्य से जो 5 वर्ष से ज्यादा आयु का होता था प्रति सदस्य ₹1 लिया जाता

मुगलों की राजपूत नीति ( Rajput policy of the Mughals )

अकबर की राजपूत नीति

अकबर ने मुगल-राजपूत सम्बन्धो की जो बुनियाद रखी थी वह कमोबेश आखिर तक चलती रही। आर.पी. त्रिपाठी के अनुसार अकबर शाही संघ के प्रति राजपूतों की केवल निष्ठा चाहता था।यह नीति “सुलह-ए-कुल”(सभी के साथ शांति एवं सुलह) पर आधारित थी। सुलह न किए जाने वाले शासकों को शक्ति के बल पर जीता, जैसे-मेवाड़, रणथंभौर आदि

अधीनस्थ शासक को उनकी “वतन जागीर” दी गई। उसको आंतरिक मामलों में पूर्ण स्वंतत्रता प्रदान की गई तथा बाहरी आक्रमणों से पूर्ण सुरक्षा की गारंटी दी गई। प्रशासन संचालन एवं युद्ध अभियानों में सम्मिलित किया एवं योग्यता अनुरूप उन्हें “मनसब” प्रदान किया।

“टीका प्रथा” शुरू की। राज्य के नए उत्तराधिकारी की वैधता “टीका प्रथा” द्वारा की जाती थी। जब कोई राजपूत शासक अपना उत्तराधिकारी चुनता था तो मुग़ल सम्राट उसे (नवनियुक्त) को “टीका” लगाता था, तब उसे मान्यता मिलती थी।

सभी राजपूत शासकों की टकसालों की जगह मुगली प्रभाव की मुद्रा शुरू की गई। सभी राजपूत राज्य अजमेर सुबे के अंतर्गत रखे गए

सैनिक व्यवस्था ( Military system )

मध्यकालीन राजस्थान की सैन्य व्यवस्था पर मुगल सैन्य व्यवस्था का प्रभाव दृष्टिगोचर होता हैं। सेना मुख्यत: दो.भागों मे बंटी हुई होती थी। एक राजा की सेना, जो ‘अहदी’ कहलाती थी तथा दूसरी सामन्तों की सेना, जो, ‘जमीयत’ कहलाती थी।

अहदी सैनिको की भर्ती, प्रशिक्षण, वेतन आदि कार्य दीवान व मीरबक्शी के अधीन होता था। ‘दाखिली’ सैनिकों की भर्ती यद्दपि राजा की ओर से होती थी किन्तु इनको सामन्तों की कमान या सेवा मे रख दिया जाता था। इन्हें वेतन सामन्तों की ओर से दिया जाता था। ‘जमीयत’ के लिए ये कार्य संबंधित सामतं करता था।

सेना मे भी अफगानों, रोहिलों,मराठों, सिन्धियों, अहमद-नगरियों आदि को स्थान दिये जाने जिन्हें ‘परदेशी’ कहा जाता था। घोडों को दागने की प्रथा चल गई थी। जिनके पास बन्दूकें होती थी वे बन्दूकची कहलाते थे।सेना के मुख्य रुप से दो भाग होते थे- प्यादे (पैदल) और सवार।

1. प्यादे (पैदल सैनिक):- यह राजपूतों की सेना की सबसे बड़ी शाखा थी। राजपूतों की पैदल सेैना म दो प्रकार के सैनिक होते थे- अहशमा सैनिक, सेहबन्दी सैनिक

2. सवार :- इसमे घुडसवार एवं शुतरसवार (ऊँट) सम्मिलित थे जो ‘राजपूत सेना के प्राण‘ मानी जाती थी। घुडसवारों मे दो प्रकार घुड़सवार होते थे बारगीर, सिलेदार।

  • निम अस्पा :- दो घुड़सवारों के पास एक घोडा़ होता था।
  • यक अस्पा :- वह घुड़सवार जिसके पास एक घोडा़ हो।
  • दअस्पा :- वह घुड़सवार जिसके पास दो घोड़े हो।
  • सिह अस्पा :- वह घुड़सवार जिसके पास तीन घोड़े हो।

तोपखाने के अधिकारियों मे ‘बक्शी-तोपखाना‘, ‘दरोगा- तोपखाना’ व मुशरिफ- तोपखाना’ के उल्लेख मिलता हैं। तोपचियों को ‘गोलन्दाज‘ कहा जाता था।

सैन्य विभाग को ‘सिलेहखाना’ कहा जाता था। सिलेहखाना शब्द हथियार डिपो के लिए भी प्रयुक्त हुआ है। घोड़े सहित सभी घुड़सवारों ‘दीवान-ए-अर्ज’ मे लाया जाता था।

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September 26, 2020

Historical Period Maurya ऐतिहासिक काल मौर्य काल

ऐतिहासिक काल मौर्य काल

मौर्य काल ( Maurya Empire )

चंद्रगुप्त मौर्य के समय से ही मौर्यों की सत्ता इस क्षेत्र में फैल गई। कोटा जिले के कणसावा गांव से मिले शिलालेख से यह पता चलता है कि वहां मौर्य वंश के राजा धवल का राज्य था बैराठ से अशोक के दो अभिलेख मिले हैं मौर्य काल में राजस्थान सिंध, गुजरात तथा कोकण का क्षेत्र अपर जनपद अथवा पश्चिमी जनपद कहलाता था

अशोक का बैराठ का शिलालेख तथा उसके उतराधिकारी कुणाल के पुत्र सम्प्रति द्वारा बनवाये गये मन्दिर मौर्यों के प्रभाव की पुष्टि करते हैं कुमारपाल प्रबंध अन्य जैन ग्रंथ से अनुमानित है कि चित्तौड़ का किला व चित्रांग तालाब मौर्य राजा चित्रांग द्वारा बनवाया हुआ है चित्तौड़ से कुछ दूर मानसरोवर नामक तालाब पर राजा मान का जो मौर्यवंशी माना जाता हैं

विक्रम संवत 770 का शिलालेख कर्नल टॉड को मिला जिसमें माहेश्वर, भीमभोज और मानचार नाम क्रमशः दिये है इन प्रमाणों से मौर्यों का राजस्थान में अधिकार और प्रभाव स्पष्ट होता है।

राजस्थान में मौर्य वंश ( Maurya dynasty in Rajasthan )

मौर्य युग में मत्स्य जनपद का भाग मौर्य शासकों के अधीन आ गया था। इस संदर्भ में अशोक का भाब्रू शिलालेख अति-महत्त्वपूर्ण है, जो राजस्थान में मौर्य शासन तथा अशोक के बौद्ध होने की पुष्टि करता है।

इसके अतिरिक्त अशोक के उत्तराधिकारी कुणाल के पुत्र सम्प्रति द्वारा बनवाये गये मंदिर इस वंश के प्रभाव की पुष्टि करते है। कुमारपाल प्रबंध तथा अन्य जैन ग्रन्थों से अनुमानित है कि चित्तौड़ का किला व एक चित्रांग तालाब मौर्य राजा चित्रांग का बनवाया गया है।

चित्तौड़ से कुछ दूर मानसरोवर नामक तालाब पर मौर्यवंशी राजा मान का शिलालेख मिला है।  जी.एच. ओझा ने उदयपुर राज्य के इतिहास में लिखा है कि चित्तौड़ का किला मौर्य वंश के राजा चित्रांगद ने बनाया था, जिसे आठवीं शताब्दी में बापा रावल ने मौर्य वंश के अंतिम राजा मान से यह किला छिना था।

इसके अतिरिक्त कोटा के कणसवा गाँव से मौर्य राजा धवल का शिलालेख मिला है जो बताता है कि राजस्थान में मौर्य राजाओं एवं उनके सामंतों का प्रभाव रहा होगा।

राजस्थान में जनपद ( District in Rajasthan )

राजस्थान के प्राचीन इतिहास का प्रारंभ प्रागैतिहासिक काल से ही शुरू हो जाता है। प्रागैतिहासिक काल के कई महत्त्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल प्राप्त होते जैसे- बागोर से प्राचीनतम पशुपालन के साक्ष्य मिले तथा दर, भरतपुर से प्राचीन चित्रित शैलाश्रय मिली है किंतु यहाँ से कोई लिखित साक्ष्य नहीं मिलते हैं जिसके कारण इनका विस्तृत अध्ययन संभव नहीं हो पाया है।

 प्राचीनतम साहित्य 6वीं सदी ईस्वी पूर्व से प्राप्त होते हैं जो राजस्थान में जनपद युग का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह जनपद चित्तौड़, अलवर, भरतपुर, जयपुर क्षेत्र में विस्तृत थे तथा यह क्रमशः शिवी, राजन्य, शाल्व एवं मत्स्य जनपद के नाम से जाने जाते थे।

कालांतर में महाजनपद का काल आया जिसमें राजस्थान के दो महत्त्वपपूर्ण महाजनपद का वर्णन मिलता है, जो निम्न थे- शुरसेन एवं कुरु जो क्रमशः भरतपुर, धौलपुर एवं अलवर क्षेत्र में विस्तृत थे।

महाभारत युद्ध के बाद कुरु और यादव जन-पद निर्बल हो गये। महात्मा बुद्ध के समय से अवन्ति राज्य का विस्तार हो रहा था। समूचा पूर्वी राजस्थान तथा मालवा प्रदेश इसके अंतर्गत था। ऐसा लगता है कि शूरसेन और मत्स्य भी किसी न किसी रूप में अवंति के प्रभाव क्षेत्र में थे।

327 ई. पू. सिकन्दर के आक्रमण के कारण पंजाब के कई जनों ने उसकी सेना का सामना किया। अपनी सुरक्षा और व्यक्तित्व को बनाए रखने के लिए ये कई कबीले राजस्थान की ओर बढ़े जिनमें मालव, शिवी, अर्जुनायन, योधेय आदि मुख्य थे। इन्होंने क्रमशः टोंक, चित्तौड़, अलवर-भरतपुर तथा बीकानेर पर अपना अधिकार स्थापित कर दिया।

मालव जनपद में श्री सोम नामक राजा हुआ जिसने 225 ई. में अपने शत्रुओं को परास्त करने के उपलक्ष में एकषष्ठी यज्ञ का आयोजन किया। ऐसा प्रतीत होता है कि समुद्रगुप्त के काल तक वे स्वतंत्र बने रहे।

मत्स्य जनपद ( Matsya Janapad )- 

मत्स्य शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है जहां मत्स्य निवासियों को सुदास का शत्रु बताया गया है। मत्स्य जनपद आधुनिक जयपुर, अलवर, भरतपुर के मध्यवर्ती क्षेत्र में विस्तृत था। इसकी राजधानी विराटनगर थी।

महाभारत काल में मत्स्य जनपद पर विराट नगर शासक शासन कर रहा था तथा यह माना जाता है कि इसी विराट ने विराटनगर (बैराठ) की स्थापना की थी। नृत्य की कत्थक शैली के प्रणेता मिहिर ईसा पूर्व दूसरी सदी में मत्स्य देश में ही हुआ था।

कुरू जनपद ( Kuru district ) – राज्य में अलवर का उत्तरी भाग कुरु जनपद का हिस्सा था। इसकी राजधानी इन्द्रपथ थी।

अवंती जनपद ( Avanti District ) :- अवंति महाजनपद महत्व वर्तमान मध्य प्रदेश की सीमा में था परंतु सीमावर्ती राजस्थान का क्षेत्र इसके अंतर्गत आता था।

मालवा जनपद ( Malwa district ) :-  मालव सिकंदर के आक्रमण के कारण राजस्थान में प्रवेश कर गए और यहां अजमेर, टोंक, मेवाड़ के मध्यवर्ती क्षेत्र में बस गए और यहां अपनी बस्तियां स्थापित की। पहली सदी के अंत तक इस क्षेत्र में मानव ने अपनी शक्ति संगठित कर ली तथा मालव नगर को अपनी राजधानी बनाया।

इस स्थान का समीकरण टोंक जिले में स्थित नगर या ककोर्टनगर से किया जाता है। हमें राज्य में जिस जनपद के सर्वाधिक सिक्के अब तक प्राप्त हुए हैं वह मालव जनपद ही है। राज्य में मालव जनपद के सिक्के रैढ तथा नगर (टोंक) से प्रमुखता से मिले हैं। मालवो द्वारा 57 ईसवी पूर्व को मालव संवत के रूप में उपयोग किया गया। यह संवत पहले कृत फिर मालव और अंततः विक्रम संवत कहलाया।

शूरसेन जनपद ( Shoresen district ) :- इसका क्षेत्र वर्तमान पूर्वी अलवर,धौलपुर,भरतपुर तथा करौली था। इसकी राजधानी मथुरा थी। वासुदेव पुत्र कृष्ण का संबंध किस जनपद से था।

शिवि जनपद ( Shivi district ) :- 

मेवाड़ प्रदेश (चितौड़गढ) नामकरण की दृष्टि से द्वितीय शताब्दी में शिव जनपद (राजधानी माध्यमिका) के नाम से प्रसिद्ध था। बाद में ‘प्राग्वाट‘ नाम का प्रयोग हुआ। कालान्तर में इस भू भाग को ‘मेदपाट‘ नाम से सम्बोधित किया गया।

छठी शताब्दी ईसापूर्व सिकंदर के आक्रमण के परिणाम स्वरुप सभी लोग पंजाब से राजस्थान की ओर आय तथा चित्तौड़ के समीप नगरी नामक स्थान पर बस गए नगरी को ही मध्यमिका के नाम से जाना जाता है राज्य में शिवि जनपद के अधिकांश सिक्के नगरी क्षेत्र से ही प्राप्त हुए हैं। इस जनपद का उल्लेख पाणिनी कृत अष्टाध्यायी से मिलता है।

यौद्धेय जनपद ( Yudhayya district ) :- योद्धेय जनपद वर्तमान श्रीगंगानगर हनुमानगढ़ क्षेत्र में विस्तृत था।

राजन्य जनपद ( State level) :- राजन्य जनपद वर्तमान भरतपुर क्षेत्र में विस्तृत था।

अर्जुनायन जनपद ( Arjunaan district ) :- अर्जुनायन जनपद अलवर क्षेत्र में विस्तृत था।

शाल्व जनपद ( Shalve district ) :-  शाल्व जनपद अलवर क्षेत्र में विस्तृत था।

September 26, 2020

Literary and Museum आधुनिक साहित्यकार एवं संग्रहालय

आधुनिक साहित्यकार एवं संग्रहालय

Albert Hall Museum अल्बर्ट हॉल म्यूजियम 

यह राजस्थान का पहला संग्रहालय है, इसे महाराजा रामसिंह के शासनकाल में प्रिंस अलबर्ट ने 1876 में शुभारम्भ करवाया था  उनके नाम पर ही इसका नाम रखा गया है।

इसी राजस्थान का प्रथम संग्रहालय कहा जा सकता है वर्तमान में इसका आकर्षण केंद्र मिस्र से मंगवाई गई ममी है

राजस्थान पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग जयपुर ( Rajasthan Archeology and Museum Department )

राजस्थान पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग का गठन 1950 में हुआ, यह विभाग प्रदेश में बिखरी पुरासंपदा तथा सांस्कृतिक धरोहर की खोज सर्वेक्षण एवं प्रचार प्रसार में संलग्न है इस विभाग द्वारा 222 स्मारक तथा पुरास्थल संरक्षित घोषित किए गए हैं

यह विभाग अपनी पत्रिका द रिसर्चर नाम से प्रकाशित करता है

राजस्थान राज्य अभिलेखागार बीकानेर ( Rajasthan State Archives ) 

संग्रहालय

राजस्थान राज्य अभिलेखागार बीकानेर, राजस्थान में स्थित है। इतिहास की लिखित सामग्री को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से 1955 में इस विभाग की स्थापना की गई प्रारम्भ में इसकी स्थापना 1955 में जयपुर में की गई थी, जिसे 1960 में बीकानेर में स्थानांतरित कर दिया गया।

इस विभाग की 6 शाखाएं जयपुर कोटा उदयपुर अलवर भरतपुर एवं अजमेर में स्थित है, इसमें कोटा रियासत का 300 वर्ष पुराना अभिलेख विद्यमान है यह अभिलेख राजस्थान की सबसे कठिन माने जाने वाली हाडोती भाषा में लिखा हुआ है

 इसका उद्देश्य राजा के स्थायी महत्त्व के अभिलेखों को सुरक्षा प्रदान करना, वैज्ञानिक पद्धति द्वारा संरक्षण प्रदान करना तथा आवश्यकता पड़ने पर उसे न्यायालय, नागरिक, सरकार के विभाग, शोध अध्येताओं को उपलब्ध कराना है। 

प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान जोधपुर ( Prachy Vidya Pratishthan )

1955 में स्थापना की गई, मध्यकालीन राजस्थान की पांडुलिपियां संस्कृत प्राकृत अपभ्रंश तथा पाली और राजस्थानी भाषाओं में अनेक विषयों पर लिखी गई, पांडुलिपियों का संग्रह को पोथी खाना कहा जाता है

प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान के नियमित कार्यक्रमों में पांडुलिपियों का संपादन एवं प्रकाशन कार्यरत है पांडुलिपियों का प्रकाशन राजस्थान पुरातन ग्रंथ माला श्रृंखला के अंतर्गत किया जाता है

अरबी फारसी शोध संस्थान टोंक ( Arabic Persian Research Institute )

1978 में इसकी स्थापना की गई, यहां पर औरंगजेब द्वारा लिखी गई आलमगिरी कुरान तथा शाहजहां द्वारा लिखी गई कुराने कमाल दुर्लभ पुस्तकें स्थित है

नगर श्री लोक संस्कृति शोध संस्थान चूरू

1964 में इस विभाग की स्थापना इसके संस्थापक श्री अशोक कुमार अग्रवाल ने अपने अनुज श्री गोविंद अग्रवाल के सहयोग से चूरू सीकर नागौर तथा बीकानेर जिलों के लोक जीवन से जुड़े विभिन्न प्रसंगों को एकत्रित किया गया

1989 में श्री अग्रवाल ने संस्थान के मंच का निर्माण करवाया गया, वर्तमान में संस्थान द्वारा राजस्थानी लोक कथा कोष नामक प्रकाशन का काम अपने हाथ में लिया हुआ है

Rajasthan Museum

  • विक्टोरिया हाल म्यूजियम,गुलाब बाग़ उदयपुर – स्थापना 1887 में इसका निर्माण हुआ
  • राजपुताना  मुयुजियम अजमेर  – स्थापना 19 अक्टूम्बर 1908
  • सरदार म्यूजियम, जोधपुर – स्थापना 1909 में
  • संग्रहालय झालावाड –  स्थापना 1915 में
  • गंगा गोल्डन जुबली म्यूजियम बीकानेर – गंगानर स्थापना 5 नवम्बर 1937
  • राजकीय संग्रहालय,  भरतपुर – स्थापना 1944
  • अलवर संग्रहालय –  स्थापना 1940
  • चित्तोड़गढ़ संग्रहालय – इसका निर्माण फतहसिह ने करवाया था
  • श्री बांगड़ राजकीय संग्रहालय पाली – 1857
  • सिटी पैलेस संग्रहायल जयपुर – 1959
  • श्री रामचरण प्राच्य विघापीठ एवं संग्रहालय जयपुर – 1960
  • करनी म्यूजियम, बीकानेर – यह जुनागड़ किले के गंगा निवास में स्थित है।
  • सार्दुल म्यूजियम, बीकानेर – यह बीकानेर के लालगड पैलेस में स्थित है।
  • बिड़ला तकनीकी म्यूजियम – इसकी स्थापना 1954 में की गयी
  • प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय जयपुर – यह प्रदेश का एकमात्र अनिखा संग्रहालय है।

  • लोक सांस्कृतिक संग्रहालय, गडसीसर, जैसलमेर – 1984
  • कालीबंगा संग्रहालय  – 1985 – 1986 में कालीबंगा के खनन से अवशेष के लिए इसे हनुमानगढ में बनाया गया ।
  • जनजाती संग्रहालय उदयपुर –  30 दिसंबर 1983 में माणिक्यलाल वर्माजनजाति शोध संस्थान द्वारा बनवाया गया जिसका उद्धेश्य जनजातियो की संस्कृति एवं सामाजिक आर्थिक व्यवस्था को सरक्षित करना था ।
  • मेहरानगढ़ संग्रहालय जोधपुर – यह मेहरानगढ़ दुर्ग में स्थित  है ।
  • उम्मेद भवन पैलेस संग्रहालय –  यह जोधपुर रियासत के राजा  उम्मेदसिह ने 1929 में करवाया 1942 में इसका कार्य समपन्न हुआ ।
  • नाहटा संग्रहालय, सरदार नगर  (चुरू) – यह राजस्थान के चुरू जिले में  स्थित  है
  • सिटी पैलेस म्यूजियम उदयपुर – यह संग्रहालय उदयपुर के भव्य राजमहल सिटी पैलेस में स्थित  है इसका निर्माण महाराणा अमरसिह ने करवाया था ।
  • आहड संग्रहालय उदयपुर – इसमे चार हजार पूर्व सभ्यता के अवशेष है
  • राव माधोसिह ट्रस्ट संग्रहालय कोटा – यह कोटा में स्थित है जो एतिहासिक हैं

  • लोक कला संग्रहालय उदयपुर – यह भारतीय लोक कला मंडल भवन में स्थित है
  • मीरा सग्रहालय – यह मेड़ता नगर में स्थित है जो मीरा के लिए प्रासिद्ध है।
  • हल्दी घाटी संग्रहालय – यह महाराणा प्रताप सिह के एतिहासिक जीवन की यादो को संजोने वाला संग्रहालय है।

Rajasthan Modern Literary Writers ( राजस्थान के आधुनिक साहित्यकार )

Kanhaiyalal Sethia ( कन्हैयालाल सेठिया )

चुरू जिले के सुजानगढ कस्बे में जन्मे सेठिया आधुनिक काल के प्रसिद्ध हिंदी व राजस्थानी लेखक है। इनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध काव्य रचना ‘पाथल व पीथल’ है। (पाथल राणाप्रताप को व पीथल पृथ्वीराज राठौड़ को कहा गया है) सेठिया की अन्य प्रसिद्ध रचनाएं – लीलटांस, मींझर व धरती धोरा री है।

Vijaydan Detha ( विजयदान देथा )

देथा की सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त कृति ‘बांता री फुलवारी’ है जिसमें राजस्थानी लोक कथाओं का संग्रह किया गया है। राजस्थानी लोकगीतों व कथाओं के शोध में इनका महत्वपूर्ण योगदान है।

Komal Kothari ( कोमल कोठारी )

राजस्थानी लोकगीतों व कथाओं आदि के संकलन एवं शोध हेतु समर्पित कोमल कोठारी को राजस्थानी साहित्य में किए गए कार्य हेतु नेहरू फैलोशिप प्रदान की गई। कोमल कोठारी द्वारा राजस्थान की लोक कलाओं, लोक संगीत एवं वाद्यों के संरक्षण, लुप्त हो रही कलाओं की खोज एवं उन्नयन तथा लोक कलाकारों को प्रोत्साहित करने हेतु बोरूंदा में रूपायन संस्था की स्थापना की गई।

Sitaram Lalas ( सीताराम लालस )

सीताराम लालस राजस्थानी भाषा के आधुनिका काल के प्रसिद्ध विद्वान रहे है। राजस्थानी साहित्य में सीताराम लालस की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि राजस्थानी शब्दकोश का निर्माण है।

Mani Madhukar ( मणि मधुकर)

मणि मधुकर की राजस्थानी भाषा की सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति पगफेरो है।

Rangeya Raghav ( रांगेय राघव )

राजस्थान के रांगेय राघ देश के प्रसिद्ध गद्य लेखक रहे है। इनके प्रसिद्ध उपन्यास घरोंदे, मुर्दों का टीला, कब तक पुकारूं, आखिरी आवाज है।

Yadavendra Sharma ‘Chandra’ ( यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’ )

राजस्थान के उपन्यासकारों में सर्वाधिक चर्चित उपन्यासकार बीकानेर के यादवेंद्र शर्मा चंद्र ने राजस्थान की सामंती पृष्ठभूमि पर अनेक सशक्त उपन्यास लिखे।

उनके उपन्यास ‘खम्मा अन्नदाता’ ‘मिट्टी का कलंक’ ‘जनानी ड्योढी’ ‘एक और मुख्यमंत्री’ व ‘हजार घोड़ों का सवार’ आदि में सामंती प्रथा के पोषक राजाओं व जागीरदारों के अंतरंग के खोखलेपन, षडयंत्रों व कुंठाओं पर जमकर प्रहार किये गए है। 

राजस्थानी भाषा की पहली रंगीन फिल्म लाजराखो राणी सती की कथा चंद्र ने ही लिखी है। हिंदी भाषा में लिखने वाले राजस्थानी लेखकों में यादवेंद्रशर्मा चंद्र सबसे अग्रणी है।

Chandrasinh Birkali ( चंद्रसिंह बिरकाली )

ये आधुनिक राजस्थान के सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रकृति प्रेमी कवि है। इनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रकृति परक रचनाएं लू, डाफर व बादली है। चंद्रसिं ह बिरकाली ने कालिदास के नाटकों का राजस्थानी में अनुवाद किया है।?

Meghraj Mukul ( मेघराज मुकुल )

सेनाणी व श्रीलाल जोशी की आभैपटकी राजस्थानी भाषा की लोकप्रिय रचनाएं रही है।

George Abraham Gireson ( जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन )

ये अंग्रेज भारतीय भाषाविद थे। जिन्होंने वर्ष 1912 में ‘Linguistic survey of India’नामक ग्रन्थ की रचना की।इस ग्रन्थ में इन्होंने राजस्थान की भाषा के लिये ‘राजस्थानी’शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया।जो इस परदेश में प्रचलित भाषाओं का सामुहिक नाम था।।

Kaviraj Shyamaldas ( कविराज श्यामलदास )

कविराज श्यामलदास मेवाड़ महाराणा सज्जन सिंह के कृपा पात्र थे। श्यामलदास कवि और इतिहासकार दोनो थे। ‘विरविनोद’ इनके द्वारा रचित प्रमुख इतिहास ग्रन्थ है।इसमें मुख्यतः मेवाड़ का इतिहास वर्णित है।चार खंडो में रचित इस ग्रन्थ पर कविराज को ब्रिटिश सरकार द्वारा ‘केसर-ए-हिन्द की उपाधि प्रदान की गई।।

James Tod ( कर्नल जेम्स टॉड )

इंग्लैंड निवासी जेम्स टॉड सन 1800 में पशिचमी एवं मध्य भारत के पॉलिटिकल एजेंट बनकर भारत आये थे।1817 में वे राजस्थान की कुछ रियासतों के पोलिटिकल एजेंट बनकर उदयपुर आये।

1829 में उन्होंने ‘Annals and antiquities of rajsthan’ग्रन्थ लिखा।तथा1839 में ‘Travels in western india’की रचना की।इन्हें राजस्थान के इतिहास लेखन का पितामह कहा जाता हैं।।

कन्हैयालाल सहल 

इनकी पुस्तकें-चोबोली, हरजस बावनी, राजस्थानी कहावतें, राजस्थान के ऐतिहासिक प्रवाद, आदि ।।

राव बख्तावर

ये उदयपुर के महाराणा स्वरूप सिंह के दरबारी कवि थे।’केहर प्रकाश’इनकी सर्वश्रेष्ठ रचना है।

September 26, 2020

Rajasthan Tribes राजस्थान में जनजाति

राजस्थान में जनजाति

जनजाति

भौगोलिक दृष्टि से राजस्थान में जनजातियों को 3 क्षेत्रों में विभाजित किया गया है ।

  1. पूर्वी एवं दक्षिणी पूर्वी क्षेत्र
  2. दक्षिणी क्षेत्र
  3. उत्तर पश्चिम क्षेत्र

1. पूर्वी एवं दक्षिणी पूर्वी क्षेत्र ( Eastern and Southern Eastern Areas )

अलवर ,भरतपुर ,धौलपुर, जयपुर, दोसा, सवाई माधोपुर, करौली ,अजमेर ,भीलवाड़ा, टोंक, कोटा, बारां, बूंदी, झालावाड़ इन क्षेत्रों में मीणा जाति का बाहुल्य है। अन्य जनजातियां भील, सहरिया, और सांसी पाई जाती है ,।

2. दक्षिणी क्षेत्र ( Southern Region )

सिरोही ,राजसमंद ,चित्तौड़गढ़, बांसवाड़ा ,डूंगरपुर ,उदयपुर क्षेत्र में भील, मीणा, गरासिया, डामोर मुख्य रूप से निवास करते हैं। भील जनजाति की बहुलता है। 70% गरासिया जनजाति सिरोही आबूरोड तहसील में निवास करती है। 98% डामोर जनजाति डूंगरपुर जिले की सीमलवाडा तहसील में निवास करते हैं ।

3. उत्तर पश्चिम क्षेत्र ( North West area )

झुंझुनू ,सीकर ,चूरू ,हनुमानगढ़, गंगानगर ,बीकानेर ,जैसलमेर, नागौर ,जोधपुर ,पाली ,बाड़मेर, जालोर इस क्षेत्र में मिश्रित जनजाति पाई जाती है । भील ,गरासिया ,मीणा मुख्य रूप से पाए जाते हैं ।

मीणा ( Meena )

मीणा शब्द का शाब्दिक अर्थ मत्स्य या मछली है । इनका संबंध भगवान मत्स्य अवतार से है। मीणाओं का संबंध मछली से उसी प्रकार संबंधित है जैसे भीलों का तीर कमान से । मीणा जनजाति में मछली निषेध है । इनमें 2 वर्ग मिलते हैं जमीदार मीणा व चौकीदार मीणा ।

इनके अलावा अन्य सामाजिक समूह भी मिलते हैं ।

  • चौथिया मीणा- मारवाड़ के विभिन्न क्षेत्रों में कमजोर जमीदारों या ग्रामीणों द्वारा गांव की रक्षा हेतु चौथ कायम कर दी जिस कारण कुछ मीणा यहां रहने लगे इन्हें चौथिया मीना कहते हैं।
  • आद मीणा- ऊंषाहार वंश के मीणा को ठेठ असली और अमिश्रित मीणा माना गया है ।
  • रावत मीणा- स्वर्ण हिंदू राजपूतों से संबंधित मीणा रावत मीणा कहलाते हैं।
  • चमरिया मीणा- चमड़े के कार्य से जुड़े होते हैं।
  • सूरतेवाल मीणा – जब मीणा पुरुष किसी मालिन् या ऐसी ही किसी स्त्री से कोई संतान उत्पन्न करता है तो वह सूरतेवाल मीणा कहलाते हैं ।
  • ठेड़िया मीणा – गोडवाड तथा जालौर क्षेत्र के मीना इस नाम से जाने जाते हैं।
  • पडिहार मीणा – भैसे (पाडे) का मांस खाने के कारण इन्हें पडिहार मीना कहते हैं।
  • भील मीणा- भील एवं मीणा लगातार संपर्क में आने के कारण या भील मीणा अस्तित्व में आए । इनमें गोद प्रथा पाई जाती है।

ब्रह्म विवाह गंधर्व विवाह और राक्षस विवाह का प्रचलन है था परंतु वर्तमान में विवाह स्वभाविक रुप से संपन्न होते हैं । हिंदू धर्म को मानते हैं शक्ति और शिवजी के उपासक होते हैं । पितरों को जल अर्पण करने की रस्म निभाते हैं । जादू टोने में विश्वास करते हैं । गांव का पटेल पंच पटेल कहलाता है ।

Bhil tribe of Rajasthan  भील

स्थाई रूप से कृषक । सामाजिक दृष्टि से पितृसत्तात्मक,री शब्दों का अधिक प्रयोग होता है ।हैडन परंपरागत रूप से अच्छे तीरंदाज। मानव शास्त्रीय मुंडा जाति के वंशज मानते हैं इनकी भाषा मैं मुंडा ने इन्हें पूर्व द्रविड़ों की पश्चिम शाखा माना है ।

रिजले और क्रुक ने इन्हें द्रविड़ माना है ।प्रोफेसर गुहा इन्हें प्रोटो ऑस्ट्रेलियायड की प्रजाति से संबंधित मानते हैं । कर्नल टॉड के अनुसार तत्कालीन मेवाड़ राज्य अरावली पर्वत श्रेणी में रहने वाले लोग हैं ।

संस्कृत साहित्य में इन्हें निषाद या पुलिंद जाति से संबंधित माना गया है । इनकी उत्पत्ति महादेव की एक भील उप पत्नी से हुई है । भीलो की उत्पत्ति के विषय में महाभारत पुराण रामायण आदि प्राचीन ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है ।

यह देश के आदिम निवासी है। भील का अर्थ तीर चलाने वाले व्यक्ति से लिया गया है । द्रविड़ भाषा का शब्द जिसकी उत्पत्ति बिल या विल अर्थात तीर से हुई है । भीलो की कई उप शाखाओं का वर्णन है ।

इनमें से कई राजपूतों की उपशाखाएं भी पाई जाती है । भील जनजाति में राजपूतों के रक्त मिश्रण की पूर्ण संभावना है।

परंतु द्रावी ,जारगट, लेखिया और गेटार आदि भील गोत्रों में राजपूतों के रक्त का सम्मिश्रण नहीं है । कल्याणपुर के ओवरी ग्राम के भील मसार कहलाते हैं ।और अपने आप को धार के पवार बताते हैं । पार्ड़ा क्षेत्र के भील अपनी उत्पत्ति गुजरो से मानते हैं बुज गुर्जर भीलो में विवाह संबंध स्थापित करके भील हो गए ।

महुवाड़ा ,खेजड़ और सराडा क्षेत्र के भील पारगी कहलाते हैं । देवरा के भील अपने आप को सिसोदिया कहते हैं । सांभर के भ्रम में गाय मार कर खा गए भिलों में विवाह कर उन्हीं में शरीक हो गए यह गरासिया भील कहलाए । बिलक़ भील हाड़ा चौहान माने जाते हैं यह अहरि नाम से प्रसिद्ध है । कागदर के भिल राठौर कहलाते हैं। 

नठारा और बारापाल के भील कटार चौहान कहलाते हैं । जिस क्षेत्र में वास करते हैं वह नायर कहलाता है । वीर भोमिया अपने आप को राजपूत कहते हैं ।

1895 में जीएम थॉमसन भी्ली व्याकरण प्रकाशित की भीली भाषा में कई शब्द गुजराती है। भीलो की भाषा को कॉपर्स और जूनगल्ट इंडो आर्यन भाषा समूह से संबंधित नहीं मानते । 

भील छोटे कद के गाढे काले रंग चौड़ी नाक रूखे बाल लाल आंखें और जबड़ा बाहर निकले हुए होते हैं। हाथ पैर की हड्डियां मोटी होती है पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियां सुंदर होती है ।

वस्त्रों के आधार पर इन्हें दो वर्गों में बांटा जा सकता है ।

  • लंगोटिया भील ( Langotiya bheel)
  • पोतिद्द्दा भील ( Potidda Bhil )

लंगोटिया भील – कमर में एक लंगोटी पहनते हैं जिसे खोयतू कहते हैं ।
पोतिदद्दा भील – धोती बंडी और पगड़ी से शरीर् को ढकते हैं ।कमर पर अंगोछा लपेटते हैं यह फालू कहलाता है।

स्त्रियां जो कपड़े पहनती है कछावु कहलाते हैं। स्त्री पुरुषों को गोदने गुदवाने का बड़ा शौक होता है । बहुत से झोपड़े मिलकर पाल बनाते बनाते हैं । इनका मुख्य पालवी कहलाता है। भीलों के घर को कू कहते हैं।

मैदानी क्षेत्र में निवास करने वाले भील गांव में एक मोहल्ला फला बनाकर रहते हैं । छोटे गांव को फला बड़े गांव को पाल कहते हैं । भोजन में मक्का की रोटी कांदों का भात मुख्य है। मांसाहारी होते हैं महुआ की शराब व ताड का रस पीते हैं। संयुक्त परिवार प्रथा होती है ।

गांव में एक ही वंश की शाखा के लोग रहते हैं उनके मुखिया को तदवी या वंसाओ कहा जाता है। भीलों में विवाह इन्हें कन्या का मूल्य देना पड़ता है जिसे दापा कहा जाता है जो लड़की का बाप लेता है । 

नातरा विवाह, देवर ,बहुपत्नी ,बट्टा ,घर जमाई प्रथा आदि का प्रचलन है । भील भोले परंतु वीर साहसी और निडर स्वामी भक्त होते हैं। केसरिया नाथ के चढ़ी केसर का पानी पीकर कभी झूठ नहीं बोलते हैं । घर आए शत्रु का भी सम्मान करते हैं । फायरे भीलों का रण घोष है।
समस्त पाल का मुखिया गमेती कहलाताहै ।

मार्गदर्शक को बोलावा कहते हैं। कोई भील किसी सैनिक के घोड़े को मार ले तो वह पाखरीया कहलाता है ।जिसकी समाज में बड़ी इज्जत होती है । पाडा कह देने पर बहुत खुश होते हैं जबकि कांडी कहने पर गाली मानते हैं ।

हिंदू धर्म को मानते हैं और उन्हीं की भांति कर्मकांड करते हैं होली विशेष त्यौहार है । पहाड़ी ढालो पर वनों को जलाकर खेती करते हैं जिसे चिमाता कहा जाता है । मैदानी भाग में वनों को काटकर खेती करते हैं इसे दजिया कहा जाता है ।

गरासिया ( Garasia )

तीसरी सबसे बड़ी जनजाति गरासिया जनजाति चौहान राजपूतों के वंशज है ।

बड़ौदा के निकट चैनपारीन् क्षेत्र से चित्तौड़ के निकट आए अपनी राजपूती आदतों को त्याग कर भीलो की पुत्रियों से विवाह कर उन्हीं के अति निकट आदिम प्रकार का जीवन व्यतीत करते हैं।

गरासिया बोली भीली बोली से मिलती जुलती है लेकिन इसमें गुजराती के साथ मराठी शब्दों का प्रयोग भी है । पितृसत्तात्मक परिवार एक ही गोत्र एवं अटक के सदस्य आपस् में भाई बहन होते हैं । विवाह एक संविदा माना जाता है और उसका आधार वधू मूल्य होता है ।

तीन प्रकार के विवाह प्रचलित है मोर बंधिया विवाह के अंतर्गत फेरे चवरी और मोर बाँधना रस्मे होती है। पहरावना विवाह इसमें नाम मात्र के फेरे होते हैं । ताणना विवाह इसमें किसी प्रकार की रस्में नहीं होती है इसमें कन्या का मूल्य भेंट स्वरूप दिया जाता है ।

शिव भैरव दुर्गा की पूजा करते हैं अत्यंत अंधविश्वासी होते हैं । सफेद रंग के पशुओं को पवित्र मानते हैं । शव जलाने की प्रथा है 12 वें दिन अंतिम संस्कार करते हैं । 

होली और गणगौर प्रमुख त्योहार हैं । तीन मेले

  • स्थानीय मेले ,
  • संभागीय मेले और
  • सबसे बड़ा मेला ( मनखारो मेलों ) होते हैं 

गांवों में सबसे छोटी इकाई फलियां कहलाती है ।

सांसी जनजाति ( Sansi tribe )

खानाबदोश जीवन व्यतीत करती है । उत्पत्ति सासमल नामक व्यक्ति से। जनजाति दो भागों में विभक्त है

  • प्रथम बीजा 
  • दूसरी माला 

लोगों में सगाई की रस्म अनोखे ढंग से मनाई जाती है जब दो खानाबदोश समूह संयोग से घूमते-घूमते एक स्थान पर मिल जाते हैं तो सगाई हो जाती है गिरी के गोले के लेन-देन मात्र से विवाह पक्का मान लेते हैं।

होली व दीपावली के अवसर पर देवी माता के सम्मुख बकरों की बलि चढ़ाते हैं । यह लोग नीम पीपल और बरगद आदि वृक्षों की पूजा करते हैं। मांस में लोमड़ी और सांड का मांस अधिक पसंद किया जाता है। शराब भी पसंद करते हैं ।

सहरिया जनजाति ( Saharia tribe )

बारा जिले की किशनगंज शाहबाद तहसील में निवास करते हैं । सहरिया जनजाति के गांव सहरोल कहलाते हैं । गांव के एकदम बाहर इन की बस्ती को सहराना कहते हैं । जिसमें गैर सहरिया निवास नहीं कर सकता। सबसे छोटी इकाई फला कहलाती है ।

सहरिया स्वभावव से संतोषी, हिंसा व अपराध से दूर रहते हैं। यह भूख से मरना मंजूर करते हैं लेकिन भीख नहीं मांगते। बहुविवाह ,वधू मूल्य ,प्रचलित  सगोत्र विवाह वर्जित ।

कन्या की गोद में मिठा रख कर सगाई संबंध पक्का करते हैं। मुखिया को कोतवाल कहते हैं सावन श्राद्ध नवरात्रा दशहरा दीपावली होली आदि प्रमुख पर्व मनाते हैं । पुवाड़ की सब्जी खाते हैं और महुआ फलों का सेवन करते हैं।

डामोर जनजाति ( Dhamor tribe )

डूंगरपुर जिले की सीमलवाडा पंचायत समिति और बांसवाड़ा जिले में गुजरात की सीमा पर पाए जाते हैं । यह अपनी उतपत्ति राजपूतों से बतलाते हैं । गांव की छोटी इकाई फला कहलाती है । मांसाहारी व शराब प्रिय।

विवाह की हर विधि में वधू मूल्य लिया जाता है कोई रियायत नहीं। बहुपत्नी विवाह प्रचलित नातरा प्रथा बच्चों के मुंडन की प्रथा प्रचलित है ।

डामोर जनजाति के लोगों के लिए छैला बाबजी का मेला जो गुजरात के पंचमहल में आयोजित होता है तथा ग्यारस की रेवाड़ी का मेला डूंगरपुर शहर में सितंबर माह में लगने वाला मेला दोनों महत्वपूर्ण मेले हैं। मुख्य रूप से कृषि से जीवन यापन करते हैं ।

कंजर जनजाति ( Kanraj tribe )

घुमंतू जनजाति अपराध वृत्ति के लिए प्रसिद्ध है संस्कृत शब्द काननचार अथवा कनकचार का अपभ्रंश है ।जिसका अर्थ जंगलों में विचरण करने वाला होता है । यह सामान्य कद के होते हैं पैदल चलने में इनका मुकाबला नहीं है।

कंजरों के मकान में किवाड़ नहीं होते हैं ।मकान के पृष्ठ भाग में एक खिड़की जरूर होती है जिसका यह उपयोग भाग कर् गिरफ्तारी से बचने के लिए करते हैं। इनमें एकता बहुत होती है ।

कंजर परिवारों में पटेल का स्थान प्रमुख होता है । किसी मामले की सच्चाई जानने के लिए संबंधित आदमी को हाकम राजा का प्याला पीकर कसम खानी पड़ती है ।चौथ माता और हनुमान जी को अपना आराध्य देव मानते हैं।

कंजर महिलाएं नाचने गाने में प्रवीण होती है । मरते समय व्यक्ति के मुंह में शराब की कुछ बूंदें डाली जाती है। मृतकों को गाड़ने की प्रथा है।मांसाहारी और शराब प्रिय जाति है । राष्ट्रीय पक्षी मोर का मांस इन्हें सर्वाधिक प्रिय है । कंजर लोग चोरी डकैती राहजनी को आज भी अपने बुजुर्गों की विरासत मानते हैं ।

चोरी डकैती तथा राहजनी जैसी वारदात पर जाने से पूर्व यह लोग विभिन्न तरीकों से शगुन अपशगुन देखते हैं ईश्वर का आशीर्वाद भी प्राप्त करते हैं इसे पाती मांगना कहते हैं ।

कथोडी जनजाति ( Kathodi tribe )

यह जनजाति छितरी छितरी निवास करती है । पत्तों की बनी झोपड़ियों में रहते हैं और खेर् के पेड़ों से कत्था तैयार कर जीवन यापन करते हैं इनका बाहुल्य दक्षिण पश्चिम राजस्थान की कोटड़ी तहसील और बारां जिले में है ।

September 25, 2020

राजस्थान के दर्शनीय स्थल Rajasthan Tourist Places

राजस्थान के दर्शनीय स्थल

दर्शनीय स्थल

बूंदी के दर्शनीय स्थल

चौरासी खम्भों की छतरी –

बूंदी शहर से लगभग डेढ किलोमीटर दूर कोटा मार्ग पर यह भव्य छतरी स्थित हैं। राव राजा अनिरूद्व सिंह के भाई देवा द्वारा सन् 1683 में इस छतरी का निर्माण करवाया गया था। चौरासी स्तम्भों की यह विशाल छतरी नगर के दर्शनीय स्थलों में से एक हैं।

तारागढ दुर्ग –

बूंदी शहर का प्रसिद्व दुर्ग जो पीले पत्थरों का बना हुआ हैं, तारागढ के दुर्ग के नाम से प्रसिद्व हैं। इसका निर्माण राव राजा बरसिंह ने 1354 में बनवाया था।

 रामेश्वर-

बूंदी से 25 किलोमीटर दूर रामेश्वर प्रसिद्व पर्यटक स्थल हैं। यहाँ का जल प्रपात और शिव मंन्दिर प्रसिद्व हैं।

खटखट महादेव-

बूंदी नैनवा मार्ग पर खटखट महादेव का प्रसिद्व मंदिर स्थित हैं। यहाँ का शिवलिंग खटखट महादेव के नाम से प्रसिद्व हैं।

इन्द्रगढ-

यह पश्चिमी-मध्य रेल्वे के सवाईमाधोपुर-कोटा रेल खण्ड पर स्थित हैं। यहाँ से 20-25 किलोमीटर दूर इन्द्रगढ की माता जी का मंदिर स्थित हैं जहाँ प्रतिवर्ष एक भव्य मेले का आयोजन किया जाता हैं।

नवलसागर-

तारागढ दुर्ग की पहाडी की तलहटी में स्थित नवलसागर तालाब प्रसिद्व हैं। इसके बीच में एक मंदिर तथा छतरी बनी हुई हैं। इसका निर्माण महाराव राज उम्मेद सिंह द्वारा करवाया गया ।

रानी जी की बावडी-

बूंदी को बावडियों का शहर भी कहते हैं। राव राजा अनिरूद्व सिंह की रानी नाथावती द्वारा 1699 में इस बावडी का निर्माण कराया था।

 जैतसागर-

शहर के निकट जैतसागर तालाब स्थित है। इसका निर्माण जैता मीणा द्वारा करवाया गया था। इसकी पाल पर सुख् महल बना हुआ हैं। जिसका निर्माण राजा विष्णु सिंह ने करवाया था। तालाब के किनारे पहाडी ढलान पर एक मनोरम टेरेस गार्डन बना हुआ है । जैतसागर तालाब में पैडल बोट के द्वार नौका विहार का 
आनन्द लिया जा सकता है।

फूलसागर-

बूंदी शहर से 7 किलोमीटर दूर स्थित फूलसागर तालाब स्थित हैं। इसका निर्माण राव राजा भोज सिंह की पत्नि फूल लता ने 1602 में करवाया था।।

भीरासाहब की दरगाह –

बूंदी शहर में निकट की पहाडी चोटी पर मीरा साहब की दरगाह बनी हुई हैं। यह दरगाह दूर से ही दिखाई देती हैं।

बाण गंगा-

बूंदी के उत्तर में शिकार बुर्ज के पास बाण गंगा एक प्रसिद्व धार्मिक स्थल हैं। यह स्थान कैदारेश्वर धाम के नाम से भी जाना जाता हैं।

क्षारबाग –

बूंदी राज्य के भूतपूर्व राजाओं की अनेक छतरियाँ जैतसागर औ शिकार बुर्ज के मध्य स्थित हैं। इन्हें क्षारबाग की छतरियों के नामे जाना जाता हैं।

शिकार बुर्ज –

जैतसागर से 3 किलोमीटर दूर शिकार बुर्ज स्थित हैं। इसका निर्माण शिकार खेलने के लिए करवाया गया था। शिकार बुर्ज के निकट ही चौथ माता का मन्दिर स्थित हैं।

भीमलत-

बूंदी से 24 किलोमीटर दूर भीमलत एक धार्मिक और प्रमुख पर्यटक स्थल हैं। यहाँ का जल प्रपात 150 फीट ऊंचा हैं। बरसात के दिनों में यहाँ का दृश्य बहुत ही मनोहारी होता हैं। नीचे एक शिव मंदिर बना हुआ हैं।

लाखेरी-

बूंदी से 60 किलोमीटर दूर पश्चिमी-मध्य रेल्वे के दिल्ली-मुम्बई रेलमार्ग पर स्थित हैं। राजस्थान की पहली सीमेंट फैक्ट्री 1912-13 में यहाँ स्थापित की गई थी। यहाँ से तुगलक कालीन सिक्के भी प्राप्त हुए हैं।

केशोरायपाटन-

(46 किमी) यह एक प्राचीन शहर हैं जो चम्बल नदी के किनारे स्थित हैं।यहाँ जो लेख पाये जाते हैं वो 1 शताब्दी ईस्वी के हैं। नदी के किनारे केसरिया जी (विष्णु का स्वरूप) का प्रसिद्व मंदिर स्थित हैं। यहाँ एक चीनी मील कार्यरत हैं जो सहकारी क्षेत्र में स्थित हैं।

अभयारण्य –

बुन्दी जिले मे वन क्षेत्र राज्य के औसत 9 प्रतिशत से कहीं अधिक है। जिले के कुल भौगो‍लिक क्षेत्रफल 5530 वर्ग किलामीटर में से 1569.28 वन क्षेत्र है जो कि लगभग 28 प्रतिशतहै। जिले में विन्ध्याचल एवं अरावली पर्वतमाला है, परन्तु ज्यादातर भाग विन्धयाचल पर्वतमाला का है। यहां के वन पतझड़ वाले शुल्क वन श्रेणी के है जिनमे मुख्य वृक्ष प्रजाति धोक है। मुख्य वनस्पति: धाके , पलाश, खेर, करे , सालर, विलायती बबलू है जबकि मुख्य वन्यप्राणी: तेन्दुआ, भालु, कृष्ण मृग, सांभर, चीतल, बिज्जु, काली पुछं का नेवला, जंगली सुअर है। मुख्य पक्षी: सारस, जंगली मुर्गा है।

 जिले मे कुल तीन अभयारण्य है।

रामगढ़ –

रामगढ़ अभयारण्य: रामगढ़ अभयारण्य की स्‍थापना 20 मई 1982 को हुई। इसका क्षेत्रफल 307 वर्ग कि.मी. है। इसके मुख्य आर्कषण में सघन वन, रामगढ़ महल एंव मजे नदी है। बाघ यहां नब्बे के दशक तक था। उसका स्थान अब तेन्दुआ ने ले लिया है। रामगढ़ में कई ट्रेकिगं रास्ते है जिनके द्वारा इसकी जैव विविधता का आनन्द उठाया जा सकता है। इसमें प्रवेश के लिये फिलहाल टिकिट व्यवस्था मण्डल कार्यालय बुन्दी से ही है।

राष्ट्रीय घड़ियाल अभयारण्य :

चम्बल नदी के एक किमी. चोडी पट्टी मे यह अभयारण्य केशोराय पाटन से आरम्भ होकर
सवाईमाधोपुर की सीमा तक है। घडिय़ाल व मगर संरक्षण वास्ते इस क्षेत्र का अभयारण्य घोषित किया है।

जवाहर सागर –

जवाहर सागर अभयारण्य का नियंत्रण वन मण्डल कोटा (वन्यजीव) द्वारा होता है।

चितौडगढ के दर्शनीय स्थल  ( Tourist places in Chittodgarh )

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वास्तु की दृष्टि से राजस्थान स्थित चित्तौड़गढ़ का शुमार भारत के उन स्थलों में है जो अपने महलों, किलों और मौजूद वास्तुकला के कारण भारत के अलावा दुनिया भर के पर्यटकों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करते हैं।  यदि बात पर्यटन की हो तो शहर का प्रमुख आकर्षण चित्तौड़गढ़ किला है, जो 180 मीटर ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। इस किले में कई स्मारक है, जिनमें से प्रत्येक के निर्माण के पीछे कुछ कहानी है।

यहां सांवरियाजी मंदिर, तुलजा भवानी मंदिर, जोगिनिया माता जी मंदिर और मत्री कुंडिया मंदिर, बस्सी वन्य जीवन अभ्यारण्य, पुरातत्व संग्रहालय और मेनाल प्रमुख दर्शनीय स्थल है।

चित्तौड़गढ़ किला ( Chittorgarh Fort )

चित्तौड़गढ़ किला एक भव्य और शानदार संरचना है जो चित्तौड़गढ़ के शानदार इतिहास को बताता है। यह इस शहर का प्रमुख पर्यटन स्थल है। एक लोककथा के अनुसार इस किले का निर्माण मौर्य ने 7 वीं शताब्दी के दौरान किया था। यह शानदार संरचना 180 मीटर ऊंची पहाड़ी पर स्थित है और लगभग 700 एकड़ के क्षेत्र  में फैली हुई है। यह वास्तुकला प्रवीणता का एक प्रतीक है जो कई विध्वंसों के बाद भी बचा हुआ है।


 
 बस्सी वन्य जीवन अभ्यारण्य बस्सी 

वन्य जीवन अभ्यारण्य बस्सी गांव के पास स्थित है जो 50 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। पश्चिम में विंध्याचल श्रेणियों द्वारा घिरा हुआ यह क्षेत्र प्रकृति प्रेमियों की खुशी के लिए एक सुरम्य दृश्य प्रस्तुत करता है। बहुत से जंगली जानवरों जैसे चीता, जंगली सूअर, नेवले और हिरणों का प्राकृतिक आवास होने के कारण यह स्थान वन्य जीवन के प्रति उत्साही लोगों के लिए आकर्षक गंतव्य स्थान है।

मीरा मंदिर

मीरा मंदिर मीराबाई से जुड़ा हुआ एक धार्मिक स्थल है। उन्होंने राजसी जीवन की सभी विलासिता को त्याग कर भगवान कृष्ण की भक्ति में अपना जीवन व्यतीत किया। मीराबाई ने अपना सारा जीवन भगवान कृष्ण के भजन और गीत गाने में बिताया। मीरा मंदिर राजपूताना शैली की वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है। यह कुम्भाश्याम मंदिर के निकट स्थित है। मंदिर के निर्माण में उत्तर भारतीय शैली का प्रयोग किया गया है।

पद्मिनी का महल

यह महल चित्तौड़गढ़ किले में स्थित है और रानी पद्मिनी के साहस और शान की कहानी बताता है। महल के पास सुंदर कमल का एक तालाब है। ऐसा विश्वास है कि यही वह स्थान है जहां सुलतान अलाउद्दीन खिलजी ने रानी पद्मिनी के प्रतिबिम्ब की एक झलक देखी थी। रानी के शाश्वत सौंदर्य से सुलतान अभिभूत हो गया और उसकी रानी को पाने की इच्छा के कारण अंतत: युद्ध हुआ। इस महल की वास्तुकला अदभुत है और यहां का सचित्र वातावरण यहां का आकर्षण बढ़ाता है। पास ही भगवान शिव को समर्पित नीलकंठ महादेव मंदिर है। यह मंदिर भी काफी आकर्षक है। इस स्थान पर वर्षभर पर्यटकों का तांता लगा रहता है। 

गोमुखकुंड 

गोमुखकुंड, प्रसिद्द चितौड़गढ़ किले के पश्चिमी भाग में स्थित एक पवित्र जलाशय है। गोमुख का वास्तविक अर्थ ‘गाय का मुख’ होता है। पानी, चट्टानों की दरारों के बीच से बहता है व एक अवधि के पश्चात जलाशय में गिरता है। यात्रियों को जलाशय की मछलियों को खिलाने की अनुमति है। इस जलाशय के पास स्थित रानी बिंदर सुरंग भी एक विख्यात आकर्षण है

विजयस्तम्भ_

विजयस्तम्भ_का नाम मात्र सुनने भर से चित्तौड़गढ़ के अभेद्य दुर्ग पर स्थित इस अनूठी इमारत की कृति मानस पटल पर बन आती है | विश्वप्रसिद्ध विजयस्तम्भ मेवाड़ की दीर्घ कालीन राजधानी और वीरता व  पराक्रम के प्रतीक  चितौड़गढ़ दुर्ग पर स्थित है |

विजयस्तम्भ (Victory Tower) के निर्माण की कहानी हमें  इतिहास के पन्नों को पलटने को मज़बूर कर देती है | इतिहासकार बताते है कि विजय स्तम्भ का निर्माण 1437 में  मेवाड़ नरेश राणा कुम्भा ने महमूद खिलजी के नेतृत्व वाली मालवा और गुजरात की सेनाओं पर विजय हासिल करने के बाद विजय प्रतीक (Victory Tower) के रूप में बनवाया था | 

इतिहासकार बताते है कि राणा कुम्भा ने मालवा के सुल्तान महमूद को ना केवल युद्ध में हराया , बल्कि उसे चितौड़गढ़  में छह माह तक बंदी भी बनाकर रखा. “बाबरनामा” में इस प्रसंग का भी वर्णन मिलता है कि महाराणा सांगा को खानवा के मैदान में हराने के बाद बाबर ने उनके राजकोष से वह मुकुट भी प्राप्त किया जिसे राणा सांगा के दादा कुम्भा ने मालवा के सुल्तान से जीता था.इतिहासकार बताते है कि विजयस्तम्भ के वास्तुकार राव जैता थे |

फतेह प्रकाश महल

राजपूत वास्तु शैली में यह महल, महाराणा फतेह सिंह द्वारा उनके निवास स्थान के रूप में बनाया गया था। उनकी रूचि कला और संस्कृति में थी और इसीलिए इस महल में बस्सी गाँव के लकड़ी के शिल्प, रष्मि गाँव की जैन अंबिका और इन्द्र की पूर्व मध्ययुगीन मूर्तियाँ, प्राचीन हथियार, वेश भूषा, पेंटिग्स, क्रिस्टल के बर्तन आदि का अनूठा संग्रह यहाँ रखा गया। अब इस महल को संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया गया है।

कुंभ श्याम मंदिर

राणा कुंभा के शासन के दौरान इस मंदिर का निर्माण किया गया था। उस समय की लोकप्रिय इंडो – आर्यन शैली में बने इस मंदिर का अटूट सम्बन्ध, राजकुमार भोजराज की पत्नी कवियित्री ’मीरां बाई’ से रहा है। मीरां बाई को, भगवान कृष्ण की अनन्य भक्त और संगिनी के रूप में सारा जग जानता है।

नगरी

बेडच या बेराच नदी के तट पर स्थित नगरी गाँव है, जो कि चित्तौड़गढ़ से 18 कि.मी. उत्तर में स्थित है। यह प्राचीन युग में ’माझीमिका’ या माध्यमिका’ नाम से जाना जाता था। इसका उद्भव 443 ई. पू. माना जाता है। मौर्य काल में यह एक समृद्ध तथा विकसित नगर था तथा गुप्त काल तक इसी तरह रहा।

यहाँ की गई खुदाई में हिंदू तथा बौद्ध प्रभाव के ठोस संकेतों के रूप में कई पुराने सिक्के तथा पंचमार्क सिक्के पाए गए। नगरी या नागरी पर प्रथम शताब्दी में सिब्बी जनजातियों का शासन होने के प्रमाण स्वरूप ‘सिब्बी’ जनजाति के सिक्के मिले, जिन पर ‘‘मझिमिकाया सिबी जनपदासा’’ अंकित है। पुष्यमित्र शुंग के समकालीन पतंजलि ने अपने महाभाष्य में 150 ई.पू. मझिमिका पर यवन (ग्रीक) हमले में, सिब्बी जनजातियों को हराने का, उल्लेख किया है।

तत्पश्चात् दूसरी शताब्दी में नगारी क्षत्रियों के प्रभाव में आया। तीसरी शताब्दी में यहाँ मालवा शसक का अधिकार था। बाद में हूण राजा द्वारा इस पर विजय प्राप्त की गई। नागरी के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में, आकर्षक शिव मंदिर, हाथियों का बाड़ा और प्रकाश स्तम्भ शामिल हैं।

कीर्ति स्तम्भ

यह विशाल स्तम्भ, जैन तीर्थंकर तथा महान शिक्षाविद् आदिनाथ जी को समर्पित है। एक धनी जैन व्यापारी जीजा बघेरवाल तथा उसके पुत्र पुण्य सिंह ने, 13वीं शताब्दी में बनवाया था। यह 24.5 मीटर ऊँचा हिन्दू स्थापत्य शैली में बना, विजय स्तम्भ से भी पुराना है। इस 6 मंज़िले स्तम्भ पर जैन तीर्थांकरों की तथा ऊपरी मंजिलों में सैंकड़ों लघु मूर्तियां शिल्पांकित की गईं हैं।

जैन मन्दिर

चित्तौड़ के क़िले के अन्दर छह जैन मंदिर हैं। इनमें सबसे बड़ा भगवान आदिनाथ का मंदिर है जिसमें 52 देवकुलिकाएं हैं।

कालिका माता मंदिर

मूलरूप से सूर्य को समर्पित इस मंदिर को निर्माण राजा मानभंग ने 8वीं शताब्दी में करवाया था। क्षैतिज योजना में मुदिर पंचरथ गर्भगृह, अंतराल, मंडप तथा मुख मंडप युक्त है। मंडप पारिश्व आलिन्द युक्त है। गर्भगृह की द्वार शाखा के उतरंग के मध्य ललाट बिम्ब में सूर्य की प्रतिमा है। मध्य काल में लगभग 14वीं शताब्दी में शाक्त मंदिर के रूप में परिवर्तित हो गया और यहां शक्ति और वीरता की प्रतीक देवी कालिका माता की उपासना की जाने लगी तभी से यह मंदिर कालिका माता के मंदिर के नाम से जाना जाता है।

तुलजा भवानी मंदिर

यह मंदिर 16वीं सदी में चित्तौड़ के शासक विक्रमादित्य की हत्या कर सत्ता हस्तगत करने वाले बनवीर ने कुंभा महल से पहले स्थित अपनी आराध्य देवी दुर्गा माता को समर्पित इस मंदिर का निर्माण करवाया था। किवंदती के अनुसार बनवीर ने मंदिर बनवाने के लिए, अपने वज़न के बराबर स्वर्ण आभूषण दान दिए थे। इसीलिए इस मंदिर का नाम ’तुलजा मंदिर’ रखा गया।

रतन सिंह पैलेस

शाही परिवार का इस महल में सर्दियों के मौसम में निवास रहा करता था। पर्यटकों को यह पैलेस तथा थोड़ी दूरी पर स्थित झील काफी आकर्षित करते हैं।

राणा कुम्भा पैलेस

सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्मारक राणा कुम्भा पैलेस – अपने ऐतिहासिक महत्व और स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। आज खण्डहर में तब्दील हुए इस महल में भूमिगत तहखाने हैं, जहाँ रानी पद्मिनी के साथ कई रानियों और राजपूत स्त्रियों ने ‘‘जौहर’’ (आत्म बलिदान) किया था।

कुंभ श्याम मंदिर

राणा कुंभा के शासन के दौरान इस मंदिर का निर्माण किया गया था। उस समय की लोकप्रिय इंडो – आर्यन शैली में बने इस मंदिर का अटूट सम्बन्ध, राजकुमार भोजराज की पत्नी कवियित्री ’मीरां बाई’ से रहा है। मीरां बाई को, भगवान कृष्ण की अनन्य भक्त और संगिनी के रूप में सारा जग जानता है।

मीरां बाई मंदिर

इस मंदिर का स्वरूप उत्तर भारतीय शैली में मीरां बाई के पूजा स्थल के रूप में किया गया था। इसकी विविधता, इसकी कोणीय छत है, जिसे दूर से ही देखा जा सकता है। यह मंदिर चार छोटे मंडपों से घिरा है और एक खुले आंगन में बनाया गया है।

भैंसरोडगढ़ फोर्ट

यह भव्य आकर्षक किला, 200 फुट ऊँची सपाट पहाड़ी की चोटी पर, चम्बल और ब्रह्माणी नदियों से घिरा हुआ है। उदयपुर से 235 कि.मी. उत्तर पूर्व तथा कोटा से 50 कि.मी. दक्षिण में यह क़िला बहुत शानदार और समृद्ध है। इस क़िले की सुन्दरता से अभिभूत होकर, ब्रिटिश इतिहासकार जेम्स टॉड ने कहा था कि यदि उन्हें राजस्थान में एक जागीर (संपत्ति) की पेशकश की जाए तो वह ’भैंसरोड गढ़’ को ही चुनेंगे।

उल्लेखनीय इतिहास के अनुसार, इसे सलूम्बर के रावत केसरी सिंह के पुत्र रावत लाल सिंह द्वितीय द्वारा बनवाया गया था। 1783 ई. में मेवाड़ के महाराणा जगत सिंह द्वितीय द्वारा यह क़िला एक जागीर के रूप में लाल सिंह को दिया गया था। कोई सटीक जानकारी न मिलने के कारण, इस क़िले के निर्माण के सम्बन्ध में कुछ सही नहीं कहा जा सकता। हालांकि यह क़िला दूसरी शताब्दी में निर्मित किया गया, ऐसा माना जाता है। कई वंशों के अधीन रहने के बाद ऐसी मान्यता है

कि अलाउद्दीन खिलजी ने भी इस क़िले पर हमला किया था तथा यहाँ के सभी पुराने मंदिर और इमारतों को नष्ट कर दिया था। वर्तमान में इस क़िले को शाही परिवार द्वारा एक शानदार हैरिटेज होटल के रूप में संचालित किया जा रहा है। तीन तरफ नदियों से घिरे तथा अरावली पर्वत माला व घने जंगलों के बीच स्थित इस क़िले की खूबसूरती, देशी व विदेशी पर्यटकों को बहुत आकर्षित करती है।

सांवलिया जी मंदिर

राजस्थान और मध्यप्रदेश के सीमा पर विश्व प्रसिद्ध सांवलिया सेठ का यह मंदिर चित्तोड़गढ़ में मंडफिया में पड़ता है | यहा सांवलिया सेठ के तीन मंदिर है | चित्तौड़गढ़ से करीब 32 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सांवलिया जी का मंदिर राजस्थान में बहुत प्रसिद्ध है।

दौसा के दर्शनीय स्थल ( Tourist places in Dausa)

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चाँद बावड़ी – आभानेरी

राजा चंद्र द्वारा स्थापित, जयपुर-आगरा सड़क पर आभानेरी की चाँद बावड़ी, दौसा ज़िले का मुख्य आकर्षण है। इसका असली नाम ’आभा नगरी’ था, परन्तु आम बोल चाल की भाषा में आभानेरी हो गया। पर्यटन विभाग द्वारा यहाँ प्रत्येक वर्ष सितम्बर-अक्टूबर में ‘आभानेरी महोत्सव’ आयोजित किया जाता है। यह दो दिन चलता है तथा पर्यटकों के मनोरंजन के लिए राजस्थानी खाना तथा लोक कलाकारों द्वारा विभिन्न गीत व नृत्य के कार्यक्रम होते हैं। उत्सव के दौरान गाँव की यात्रा ऊँट सफारी द्वारा कराई जाती है।

हर्षद माता मंदिर – आभानेरी

दौसा से 33 कि.मी. दूर, चाँद बावड़ी परिसर में ही स्थित, यह मंदिर हर्षद माता को समर्पित है। हर्षद माता अर्थात उल्लास की देवी। ऐसी मान्यता है कि देवी हमेशा हँसमुख प्रतीत होती है और भक्तों को खुश रहने का आशीर्वाद प्रदान करती है। देवी के मंदिर की स्थापत्य कला शानदार है।

झाझीरामपुरा

पहाड़ियों और जल स्त्रोतों से भरपूर, झाझीरामपुरा प्राकृतिक तथा आध्यात्मिक रूप से समृद्ध है। दौसा से 45 कि.मी. दूर, बसवा (बांदीकुई) की ओर स्थित है। यह स्थान रूद्र (शिव), बालाजी (हनुमान जी) और अन्य देवी देवताओं के मंदिरों के लिए भी प्रसिद्ध है।

भांडारेज

महाभारत काल में यह स्थान ’भद्रावती’ के नाम से जाना जाता था। जब कच्छवाहा मुखिया दूल्हा राय ने बड़गुर्जर राजा को हराया और भांडारेज को जीत लिया, यह 11वीं शताब्दी की एतिहासिक घटना है। तभी से इसका इतिहास माना जाता है। इसकी प्राचीन सभ्यता यहाँ की मूर्तियाँ, सजावटी जालियाँ, टैराकोटा का सामान, बर्तन आदि को देखकर, इसकी समृद्ध संस्कृति का पता चलता है। जयपुर से लगभग 65 कि.मी. दूर, जयपुर आगरा राजमार्ग पर, दौसा से 10 कि.मी. दूरी पर भांडारेज स्थित है। यहाँ के क़ालीन दूर दूर तक प्रसिद्ध हैं।

लोट्वाड़ा

जयपुर से लगभग 110 कि.मी. दूर यह एक गढ़ है जो कि 17वीं शताब्दी में ठाकुर गंगासिंह द्वारा बनाया गया था। लोट्वाड़ा ग्रामीण पर्यटन का आकर्षण है, जहां की ग्रामीण संस्कृति और लहलहाती फसलें बड़ी सुहानी लगती हैं। वहां तक पहुंचने के लिए आभानेरी से बस द्वारा यात्रा कर सकते हैं।

बांदीकुई

दौसा से लगभग 35 कि.मी. की दूरी पर है। प्रोटेस्टेंट ईसाइयों के लिए रोमन शैली का चर्च मुख्य यहां का आकर्षण है। बांदीकुई रेल्वे के बड़े भाग के लिए भी जाना जाता है जहां कि ब्रिटिश समय के निर्माण एवम् रेल्वे कर्मचारियों के बड़े बड़े घर हैं।

धौलपुर के दर्शनीय स्थल ( Tourist places in Dholpur )

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सिटी पैलेस

इसे धौलपुर महल के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन स्थापत्य कला से परिपूर्ण यह महल, शाही परिवार का निवास स्थान था। पूरा महल लाल बलुआ पत्थर से बना हुआ है तथा प्राचीन इतिहास और भव्यता को दर्शाता है। दक्षिण पूर्व में चंबल के बीहड़ वन और उत्तर पश्चिम में सुंदर आगरा शहर के होने के कारण, सिटी पैलेस में आने वाले पर्यटक, शाही युग की सैर के साथ साथ, प्राकृतिक छटा का भी आनन्द लेते हैं।

शाही बावड़ी

शहर में स्थित, निहालेश्वर मंदिर के पीछे, शाही बावड़ी स्थित है, जो कि सन् 1873 – 1880 के बीच निर्मित की गई थी। यह चार मंज़िला इमारत है तथा पत्थर की नक़्काशी और सुन्दर कलात्मक स्तम्भों के लिए प्रसिद्ध है।

निहाल टावर

राजा निहाल सिंह द्वारा सन् 1880 में शुरू किया गया यह टावर, स्थानीय घंटाघर के रूप में, 1910 के आस पास राजा रामसिंह द्वारा पूरा कराया गया। टाउन हॉल रोड पर बना यह घंटा घर 150 फुट ऊँचा है तथा 120 फुट के क्षेत्र में फैला हुआ है। इसमें 12 समान आकार के द्वार हैं।

शिव मंदिर और चौंसठ योगिनी मंदिर

सबसे पुराने शिव मंदिरों में से एक, चोपरा शिव मंदिर, 19वीं सदी में बनाया गया था। प्रत्येक सोमवार को यहाँ भक्तों की भीड़ नजर आती है, क्योंकि सोमवार का दिन भगवान शिव का माना जाता है। इसकी स्थापत्य कला अनूठी है। मार्च के महीने में महा शिवरात्रि के अवसर पर, तीर्थयात्री दूर दूर से आते हैं तथा मेले में भाग लेते हैं।

शेरगढ़ क़िला

जोधपुर के महाराजा मालदेव ने शेरगढ़ क़िला, मेवाड़ के शासकों से रक्षा हेतु बनवाया था। 1540 ई. में दिल्ली के शेरशाह सूरी ने इसका पुननिर्माण करवाया तथा अपने नाम पर इसका नाम शेरगढ़ रखा। यह किला धौलपुर के दक्षिण में स्थित है तथा इसमें बड़ी बारीक़ वास्तुशैली से सुसज्जित, नक़्काशीदार छवियाँ, हिन्दू देवी देवताओं की तथा जैन मूर्तियाँ आकर्षण का केन्द्र हैं। जल स्त्रोतों से संरक्षित शेरगढ़ क़िला, एक ऐतिहासिक इमारत है।

मुचकुंड

सूर्यवंशीय साम्राज्य के 24वें शासक, राजा मुचुकुंद के नाम पर इस प्राचीन और पवित्र स्थल का नाम रखा गया। शहर से लगभग 4 कि.मी. की दूरी पर, यह स्थल भगवान राम से पहले, 19वीं पीढ़ी तक, राजा मुचुकुंद के शाही कार्यस्थल के रूप में रहा। प्राचीन धार्मिक साहित्य के अनुसार, राजा मुचुकुंद एक बार गहरी नींद में सोया हुआ था, तभी दैत्य कालयमन ने अचानक उसे उठा लिया। परन्तु एक दैवीय आशीर्वाद से दैत्य जलकर भस्म हो गया। इसी कारण यह प्राचीन पावन तीर्थ स्थल माना जाता है।

शेर शिखर गुरूद्वारा

मुचकुंड के पास, यह गुरूद्वारा, सिख गुरू हरगोविन्द साहिब की धौलपुर यात्रा के कारण, स्थापित किया गया था। शेर शिखर गुरूद्वारा, सिखधर्म में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है तथा ऐतिहासिक महत्व व श्रृद्धा का स्थान रखता है। देश भर से सिख समुदाय के लोग यहाँ पर शीश झुकाने आते हैं।

मुग़ल गार्डन, झोर

मुग़ल सम्राट बाबर के ज़माने में बनाया गया, यह गार्डन, सबसे पुराना मुग़ल गार्डन माना जाता है तथा ’बाग़-ए-नीलोफर’ के रूप में जाना जाता है। वर्तमान में बग़ीचे का मूल स्वरूप नहीं रहा, परन्तु किया गया निर्माण मौजूद है।

दमोह

यह एक सुंदर झरना है, परन्तु गर्मी के मौसम में यह सूख जाता है। सरमथुरा तहसील में, यह आगंतुकों के लिए, जुलाई से सितम्बर तक, बरसात आने के साथ ही बहना शुरू हो जाता है तथा हरियाली के साथ ही, जीव जंतु भी नज़र आने लगते हैं।

तालाब ए शाही

सन् 1617 ई. में यह तालाब के नाम से एक ख़ूबसूरत झील, शहज़ादे शाहजहाँ के लिए शिकारगाह के रूप में बनवाई गई थी। धौलपुर से 27 कि.मी. दूर और बाड़ी से 5 कि.मी. की दूरी पर, यह झील, राजस्थान की ख़ूबसूरत झीलों में से एक है। यहाँ पर सर्दियों के मौसम में कई प्रकार के प्रवासी पक्षी अपने घोंसले बनाने के लिए आते हैं जैसे – पिंटेल, रैड कार्स्टेड पोच, बत्तख़, कबूतर आदि।

वन विहार अभ्यारण्य

धौलपुर के शासकों के मनोरंजन के लिए यह अभ्यारण्य 24 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में बनाया गया था। यह अभ्यारण्य माना जाता है पर्यटकों तथा विशेषकर प्रकृति प्रेमियों के आकर्षण का केन्द्र, यहाँ पाए जाने वाले साँभर, चीतल, नील गाय, जंगली सूअर, भालू, हाईना और तेंदुआ जैसे जीवों के साथ-साथ, विभिन्न वनस्पतियों का भण्डार है।

Dungarpur

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विजय राजराजेश्वर मंदिर

उदय विलास पैलेस

अद्भुत, अभूतपूर्व और उत्कृष्ट संरचना – उदय विलास पैलेस। महाराजा उदयसिंह द्वितीय के नाम पर उदय विलास पैलेस का नाम रखा गया था। बेजोड़ राजपूत वास्तुशिल्प शैली पर आधारित इसका मंत्रमुग्ध करने वाला रेखांकन है, जिसमें छज्जे, मेहराब और झरोखों में विस्तृत चित्रांकन किया गया है। यहां पाए जाने वाले पारेवा नामक स्थानीय नीले ’धूसर’ पत्थर से बनाई गई संुदर कलाकृति झील की ओर मुखरित है। महल को रानीवास, उदय विलास और कृष्ण प्रकाश में विभाजित किया गया है जिसे ’एकथंभिया महल’ भी कहा जाता है। एकथंभिया महल राजपूत वास्तुकला का एक वास्तविक आश्चर्य है जिसमें जटिल मूर्तिस्तम्भ और पट्टिका, अलंकृत छज्जे, जंगला, कोष्ठक वाले झरोखे, मेहराब और संगमरमर में नक़्काशियों की सजावट शामिल है। उदय विलास पैलेस आज एक हैरिटेज होटल के रूप में पर्यटकों को आकर्षित करता है तथा शाही ठाट-बाट का असीम आनन्द देता है।

जूना महल

राजपूती शान का प्रतीक और महल के साथ साथ गढ़ के समान सुदृढ और सुरक्षित है जूना महल। 13वीं शताब्दी में निर्मित जूना महल (ओल्ड पैलेस) एक सात मंज़िला इमारत है। यह एक ऊँची चौकी पर ’पारेवा’ पत्थर से बनाया गया है जो बाहर से एक क़िले के रूप में प्रतीत होता है। शत्रु से रक्षा हेतु यथा संभव गढ़ की प्राचीरों, विशाल दीवारों, संकरे गलियारांे और द्वारों को विराट रूप में योजनाबद्ध तरीक़े से बनाया गया है। अंदरूनी भाग में बने सुंदर भित्ति चित्रों, लघु चित्रों और नाज़ुक काँच और शीशे की सजावट का काम पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देता है। सन् 1818 में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने इसे अपने अधिकार में ले लिया था। यह जगह डूंगरपुर प्रिसंली स्टेट की राजधानी थी।

गैब सागर झील

इस झील के प्राकृतिक वातावरण और कोलाहल से दूर होने के कारण यहाँ बड़ी संख्या में पक्षियों का बसेरा है। रमणीय झील गैप सागर डूंगरपुर का एक प्रमुख आकर्षण है इसके तट पर श्रीनाथ जी का मंदिर समूह है। इस मंदिर परिसर में कई अति सुंदर नक़्काशीदाार मंदिर और एक मूल मंदिर, ’विजय राजराजेश्वर’ मंदिर शामिल है। यहाँ भगवान शिव का मंदिर मूर्तिकारों के कुशल शिल्पकौशल और डूंगरपुर की बेजोड़ शिल्पकला को प्रदर्शित करता है। यहाँ के रमणीय परिवेश और ठण्डी बयार के बीच, झील में खिले हुए कमल के फूल और उन्मुक्त जल क्रीड़ा करते पक्षी मन्त्रमुग्ध करते हैं।

राजकीय पुरातात्विक संग्रहालय

डूंगरपुर के आमझरा गाँव में, जो कि शहर से 32 कि.मी. दूर है, पुरातात्पिक महत्व की सम्पदा को संजोकर रखा गया है इस संग्रहालय में। उत्खनन के दौरान यहाँ पर गुप्तकालीन संस्कृति के अवशेष पाए गए थे। मुख्य रूप से वागड़ क्षेत्र में यह संग्रहालय राजस्थान सरकार, पुरातत्व और संग्रहालय विभाग द्वारा एकत्र की गई मूर्तियों को प्रदर्शित करने के उद्देश्य से स्थापित किया गया था। डूंगरपुर शाही परिवार ने संग्रहालय को भूमि और निजी संग्रह से प्रतिमाओं और अपने ऐतिहासिक महत्वपूर्ण शिलालेखों को देकर इसे स्थापित करने में मदद की। इस संग्रह में 6ठी शताब्दी की कई देवी देवताओं की मूर्तियां, पत्थर के शिलालेख, सिक्के और चित्र शामिल हैं। गाँव में उत्खनन के दौरान प्राप्त ’महिषासुरमर्दिनी देवी’ की मूर्ति अद्भुत है।

बादल महल

यह महल वास्तुकला के जटिल डिज़ाइन के लिए प्रसिद्ध है तथा गैप सागर झील के किनारे स्थित है। पारेवा पत्थर का उपयोग करते हुए बनाया गया बादल महल, डूंगरपुर का एक नायाब महल है। गैप सागर झील पर स्थित यह महल अपने विस्तृत आलेखन और राजपूत और मुगल स्थापत्य शैली की एक मिली जुली संरचना के लिए प्रसिद्ध है। स्मारक में दो चरणों में तीन गुंबद और एक बरामदा महाराज पुंजराज के शासनकाल के दौरान पूरा किया गया था। अवकाश गृह या गैस्ट हाउस के तौर पर इस महल का, राज्य के मेहमानों को ठहराने के लिए इस्तेमाल किया जाता था।

बेणेश्वर मंदिर

सोम व माही नदियों में डुबकी लगाने के बाद, बेणेश्वर मंदिर में भगवान शिव की आराधना करने के लिए भक्तगण समर्पण के भाव से आते हैं। इस अंचल के सर्वाधिक पूजनीय शिवलिंग बेणेश्वर मंदिर में स्थित है।

सोम और माही नदियों के तट पर स्थित पांच फीट ऊँचा ये स्वयंभू शिवलिंग शीर्ष से पांच हिस्सों में बंटा हुआ है। बेणेश्वर मंदिर के पास स्थित विष्णु मंदिर, एक अत्यंत प्रतिष्ठित संत और भगवान विष्णु का अवतार माने जाने वाले ’मावजी’ की बेटी, जनककुंवरी द्वारा 1793 ई. में निर्मित किया गया था।

कहा जाता है कि मंदिर उस स्थान पर निर्मित है जहां मावजी ने भगवान से प्रार्थना करते हुए अपना समय बिताया था। मावजी के दो शिष्य ’अजे’ और ’वाजे’ ने लक्ष्मी नारायण मंदिर का निर्माण किया। यद्यपि ये अन्य देवी देवता हैं, पर लोग उन्हें मावजी, उनकी पत्नी, उनके पुत्र वधू और शिष्य जीवनदास के रूप में पहचानते हैं।

इन मंदिरों के अलावा भगवान ब्रह्मा का मन्दिर भी है। माघ शुक्ल पूर्णिमा (फरवरी) यहाँ, सोम व माही नदियों के संगम पर बड़ा भारी मेला लगता है, जहाँ दूर दूर के गाँवों तथा शहरों से लोग तथा आदिवासी, पवित्र स्नान करने व मंदिर में पूजा करने आते हैं।

भुवनेश्वर

डूंगरपुर से मात्र 9 किलोमीटर की दूरी पर स्थित भुवनेश्वर पर्वत के ऊपर स्थित है और एक शिव मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर स्वयंभू शिवलिंग के समीप ही बनाया गया है। पहाड़ के ऊपर स्थित एक प्राचीन मठ की भी यात्रा की जा सकती है।

सुरपुर मंदिर

डूंगरपुर से लगभग 3 किलोमीटर दूर ’सुरपुर’ नामक प्राचीन मंदिर गंगदी नदी के किनारे पर स्थित है। मंदिर के आस पास के क्षेत्र में भूलभुलैया, माधवराय मंदिर, हाथियों की आगद और महत्वपूर्ण शिलालेख जैसे अन्य आकर्षण भी हैं।

विजय राजराजेश्वर मंदिर

भगवान शिव और उनकी पत्नी देवी पार्वती को समर्पित ’विजय राजराजेश्वर मंदिर’ गैप सागर झील के तट पर स्थित है। यह अपने समय की उत्कृष्ट वास्तुशिल्प को प्रदर्शित करता है। मंदिर का निर्माण महाराज विजय सिंह द्वारा प्रारम्भ किया गया था एवं जिसे महारावल लक्ष्मणसिंह द्वारा 1923 ई. में पूरा किया गया। दक्षिण प्रवेश द्वार दो मंज़िला है। गर्भ गृह में एक ऊँचा गुबंद है। इसके सामने सभा मंडप है – जो 8 राजसी स्तंभों पर बनाया गया है। इसमें बीस तोरण थे जिनमें से चार अभी भी मौजूद हैं। अन्य सोम नदी में आई बाढ़ के पानी से नष्ट हो गए थे। तीर्थ यात्रियों के द्वारा कई शिलालेख हैं और सबसे पुराना 1493 ईस्वी के अंतर्गत आता है। कई योद्धाओं के अंतिम संस्कार मंदिर के समीप किए गए थे और उनके सम्मान में स्मारक बनाये गये थे। इस मंदिर की बहुत मान्यता है।

श्रीनाथ जी मंदिर

भगवान कृष्ण का यह मंदिर तीन मंजिला कक्ष मंे है, जो यहाँ स्थित तीनों मंदिरों के लिए गोध मंडप, एक सार्वजनिक कक्ष है। 1623 में महाराज पुंजराज ने इस मंदिर का निर्माण कराया। इसका प्रमुख आकर्षण श्री राधिकाजी और गोवर्धननाथ जी की मूर्तियां है। इसी परिसर में श्री बांकेबिहारी जी और श्री रामचन्द्र जी को समर्पित कई मंदिर भी हैं। पर्यटक यहाँ एक गैलेरी देख सकते हैं, जो मुख्य मंदिर में है।

गोध मंडप

गोध मंडप एक तीन मंजिला विशाल सभा मंडप है जो पास स्थित तीनों मंदिरों द्वारा आपसी उपयोग के लिए है। 64 पैरों और 12 खम्भों पर अवस्थित, यह विशाल सभा मंडप देखने योग्य है।

नागफन जी

डूंगरपुर रेल्वे स्टेशन से यह दिगम्बर जैन समुदाय का मंदिर, 35 कि.मी. की दूरी पर है। नागफनजी अपने जैन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है जो न केवल डूंगरपुर के भक्तों को आकर्षित करते हैं बल्कि दूर दूर से यात्रा पर आये पर्यटक भी इसे देखने के लिए लालायित रहते हैं। यह मंदिर देवी पद्मावती, नागफनी पार्श्वनाथ और धरणेन्द्र के प्रतिमाओं के मंदिर हैं। नागफनजी शिवालय जो इस मंदिर के नजदीक स्थित है, यह भी एक पर्यटक आकर्षण है। इस स्थान पर गुरू पूर्णिमा पर विशेष आयोजन होता है।

गलियाकोट

दसवीं शताब्दी में बाब जी मौला सैयदी फख़रूद्दीन साहब का निवास था यहाँ। दाऊदी बोहरा समाज का पवित्र स्थान है ’गलियाकोट दरगाह’। डूंगरपुर से 58 किलोमीटर की दूरी पर माही नदी के किनारे स्थित, गलियाकोट नामक एक गांव है। यह स्थान सैयद फख़रूद्दीन की मज़ार के लिए जाना जाता है। वह एक प्रसिद्ध संत थे जिन्हें उनकी मृत्यु के बाद गांव में ही दफन किया गया था। यह मज़ार श्वेत संगमरमर से बनायी गयी है और उनकी दी हुई शिक्षाएं दीवारों पर सोने के पानी से उत्कीर्ण हैं। गुंबद के अन्दरूनी हिस्से को खूबसूरत स्वर्णपत्रों से सजाया गया है, जबकि पवित्र कुरान की शिक्षाओं को कब्र पर सुनहरे पन्नों में उत्कीर्ण किया गया है। मान्यताओं के अनुसार इस गांव का नाम एक भील मुखिया के नाम पर पड़ा था, जिसने यहाँ राज किया था।

देव सोमनाथ

देवगाँव में स्थित यह मंदिर, अपनी बनावट के लिए प्रसिद्ध है। तीन मंज़िलों में बना यह मंदिर, 150 स्तम्भों पर खड़ा है। देव सोमनाथ के नाम पर 12वीं सदी में बना सोम नदी के किनारे पर एक पुराना और सुंदर शिव मंदिर है। सफेद पत्थर से बने, मंदिर में ऊँचे बुर्ज़ बनाये गये हैं। कोई भी मंदिर से आकाश को देख सकता है। यद्यपि चिनाई में प्रत्येक भाग अपने सही स्थान पर मजबूती से टिकाया गया है, फिर भी यह आभास देता है कि प्रत्येक पत्थर ढह रहा है। मंदिर में 3 निकास हैं, ऐसा प्रतीत होता है कि प्रत्येक गुंबद में एक नक़्काशीदार कमल खिले हैं, जबकि सबसे बड़े गुंबद में तीन कमल खिले हैं। सावन के महीने में यहाँ बड़ी संख्या में दर्शनार्थी आते हैं।

बोरेश्वर

1179 ईस्वी में महाराज सामंत सिंह के शासनकाल में ’बोरेश्वर महादेव’ मंदिर का निर्माण हुआ था। यह सोम नदी के तट पर स्थित है।

क्षेत्रपाल मंदिर

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाला 200 वर्ष पुराना यह मंदिर ’खाडगढ़’ में स्थित है। इस मंदिर की लोकप्रियता भैरव देवी के मंदिर होने के कारण है। इस मंदिर के चारों ओर अन्य छोटे मंदिर हैं, जिनमें देवी गणपति, भगवान शिव, देवी लक्ष्मी और भगवान हनुमान स्थापित हैं।

गंगानगर के दर्शनीय स्थल ( Tourist places in Ganganagar )

बरोर गाँव

इस गाँव में प्रसिद्ध प्राचीन सिंधु घाटी की सभ्यता के अवशेष मिले हैं। यह गाँव अनूपगढ – रामसिंहपुर रोड पर स्थित है। उस समय के समृद्ध जीवन के सबूत-कलाकृतियाँ, कंकाल और खंडहर गाँव के आसपास के क्षेत्र में पाए गए हैं

लैला मजनूं का मज़ार

लैला मजनूं का मज़ार – अनूपगढ़ से 11 कि.मी. बिन्जौर गाँव में लैला मजनू का मज़ार यानी स्मारक स्थित है। एक किंवदंती के अनुसार लैला मजनू सिंध के थे यह ज़िला अब पाकिस्तान में है। लैला के माता पिता व भाई उसके प्रेम के खिलाफ थे, इसलिए उनसे बचने के लिए लैला-मजनू भाग कर यहा आकर बस गए तथा मृत्योपरांत दोनों को एक साथ यहाँ दफनाया गया था। यह मजार एक स्मारक बन गया है जो हमेशा अमर रहने वाले प्रेम का प्रतीक है। लोग इस मजार पर, इस प्रेमी युगल का आशीर्वाद पाने के लिए दूर-दूर से यहाँ आते हैं। प्रतिवर्ष यहाँ एक मेला आयोजित होता है जो मुख्यतः नवविवाहितों और युगलों को आकर्षित करता है।

अनूपगढ़ क़िला

पाकिस्तान की सीमा के निकट अनूपगढ शहर में स्थित अनूपगढ़ किला वर्तमाान में खंडहर है। यद्यपि अपने सुनहरे दिनों में किला एक भव्य रूप में था जो कि भाटी राजपूतों को खाडी में रहने में मदद करता था। क़िले का निर्माण 1689 में अनूपगढ को मुगल संरक्षण में रखने हेतु मुगल राज्यपाल द्वारा किया गया था।

हिंदुमालकोट सीमा

गंगानगर में स्थित हिंदुमालकोट सीमा भारत आौर पाकिस्तान को अलग करती है। बीकानेर के दीवान हिन्दुमल के सम्मान में नामित, और सीमा के पास स्थित यह पर्यटक आकर्षणों में से एक है। सीमा श्री गंगानगर से 25 किमी दूर स्थित है और यह प्रतिदिन 10.00 से 5.30 के बीच पर्यटकों के लिए खुली है।।

बुड्ढ़ा जोहड़ गुरूद्वारा

इस ऐतिहासिक गुरूद्वारे का निर्माण, 1740 में घटी एक महत्वपूर्ण घटना के कारण किया गया जिसमें मस्सा रंगहर के अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में अपवित्रीकरण का दोषी पाए जाने पर सुक्खा सिंह और मेहताब सिंह द्वारा न्याय किया गया था। गंगानगर के डाबला गांव में स्थित यह पूजा स्थल ऐतिहासिक चित्रों और स्मारकों का संग्रह भी है।

पदमपुर

बीकानेर के शाही परिवार के राजकुमार पदम सिंह के नाम पर, इस नगर का नाम रखा गया था। गंगनहर के निर्माण के बाद, यहाँ की उपजाऊ मिट्टी में गेहूँ, बाजरा, गन्ना, दलहन, आदि की अच्छी फसलें होने पर, यह एक कृषि केन्द्र के रूप में माना जाता है। गंगानगर का कीनू (नारंगी जैसा फल) पूरे भारत में मश्हूर है तथा यहां भारी मात्रा में इसकी फसल होती है।

हनुमानगढ के दर्शनीय स्थल ( Tourist places in Hanumangarh )

 भटनेर किला

भटनेर, भट्टी नगर का अपभ्रंश है, तथा उत्तरी सीमा प्रहरी के रूप में विख्यात है। भारत के सबसे पुराने किलों में से एक माना जाने वाला भटनेर किला या हनुमानगढ़ किला घग्घर नदी के तट पर स्थित है।

किले का महत्व इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि अकबर ने आईने-ए-अकबरी में इसका उल्लेख किया है। किले का निर्माण लगभग 17 सौ साल पहले जैसलमेर के राजा भाटी के पुत्र भूपत ने किया था और समय और युद्ध के विनाश का सीना तान के सामना किया था।

तैमूर और पृथ्वीराज चौहान सहित कई साहसी शासकों ने किले पर कब्जा करने की कोशिश की, लेकिन यह ऐसी ताकत थी कि सदियों से कोई भी इस क़िले को नहीं जीत पा रहा था। अंत में, वर्ष 1805 में, बीकानेर के राजा सूरत सिंह ने भाटी राजाओं को पराजित किया और क़िले पर क़ब्जा कर लिया।

क़िले के कई दृढ ़ और शानदार द्वार हैं। यहां पर भगवान शिव और भगवान हनुमान को समर्पित मंदिर हैं। इसके ऊँचे दालान तथा दरबार तक घोड़ांे के जाने के लिए संकडे़ रास्ते बने हुए हैं।

श्री गोगा जी मंदिर

इस मंदिर को हिन्दू तथा मुस्लिम दोनों सम्प्रदाय के लोग मानते हैं। हिन्दू गोगाजी को गोगा जी देवता तथा मुस्लिम इन्हें गोगा पीर कहते हैं। हनुमानगढ़ से लगभग 120 किलोमीटर दूर, श्री गोगाजी का मंदिर स्थित है। किंवदंती प्रचलित है कि गोगाजी एक महान योद्धा थे जो आध्यात्मिक शक्तियों को प्राप्त करते थे उन्हें नागों के भगवान भी कहा जाता है। मंदिर के स्थापत्य में मुस्लिम और हिन्दू शैली का समन्वय एक प्रमुख विशेषता है। मंदिर अद्भुत नक्काशियों के साथ चित्रित है जिसमें अश्व की पीठ पर हाथ में बरछा लिए हुए गोगाजी की एक सुन्दर प्रतिमा, जिसमें उनकी गर्दन के चारों और एक नाग है। सभी धर्मों के लोग, विशेष रूप से गोगामेड़ी पर्व के दौरान मंदिर में जाते हैं। यहाँ प्रतिवर्ष भादवा शुक्लपक्ष की नवमी (जुलाई – अगस्त) को मेला लगता है, जिसमें भक्त लोग पीले वस्त्र पहनकर, मीलों दूर से दण्डवत करते हुए आते हैं।

गोगामेड़ी का दृश्य

गोगामेड़ी का दृश्य हनुमानगढ़ में स्थित गोगामड़ी गांव धार्मिक महत्व रखता है। श्री गोगाजी की स्मृति में आयोजित गोगामेड़ी मेला, ’गोगामेड़ी महोत्सव’ के दौरान स्थानीय लोगों और पर्यटकों को समान रूप से आकर्षित करता है। गोगामेड़ी का विशाल दृश्य फोटोग्राफी के लिए वास्तव में एक आश्चर्यजनक और प्रेरणादायक समां प्रस्तुत करता है।

काली बंगा

सिंधु नदी की घाटी पर बना यह क्षेत्र पुरातत्व सम्पदाओं को प्रदर्शित करता है। तहसील पीलीपंगा में, कालीबंगा एक प्राचीन व ऐतिहासिक स्थल है। कहते हैं कि 4500 वर्ष पूर्व यहाँ सरस्वती नदी के किनारे हड़प्पा कालीन सभ्यता फल फूल रही थी। पुरातत्व प्रेमियों के लिए महत्वपूर्ण स्थान कालीबंगा सिन्धु घाटी सभ्यता के अवशेषों की प्राप्ति स्थल के कारण प्रसिद्ध है। ये अवशेष 2500 वर्ष ईसा पूर्व के हड़प्पा और पूर्व हड़प्पा युग से संबंधित हैं। कालीबंगा में खुदाई से हड़प्पाकालीन सील, मानव कंकाल, अज्ञात स्क्रिप्ट तांबे की चूंड़ियाँ, मोती, सिक्के, टेराकोटा और सीप के खिलौने मिले हैं। यहां 1983 में स्थापित एक पुरातत्व संग्रहालय भी है, जिसे 1961-1969 के दौरान हड़प्पा स्थल पर खुदाई से निकले अवशेषों के लिए निर्मित किया गया था। यहां संग्रहालय में तीन दीर्घाएं हैं जिनमें एक दीर्घा ’पूर्व हड़प्पा काल’ और शेष दो दीर्घाएं हड़प्पा काल की कलाकृतियों के लिए समर्पित हैं।

माता भद्रकाली मंदिर

हनुमानगढ़ से 7 कि.मी. की दूरी पर माता भद्रकाली का मंदिर घग्घर नदी के तट पर स्थित है। देवी मंदिर देवी दुर्गा के कई अवतारों में से एक को समर्पित है। बीकानेर के छठे महाराजा राम सिंह के द्वारा निर्मित, इस मंदिर में पूरी तरह लाल पत्थर से बनी एक प्रतिमा स्थित है। मंदिर पूरे सप्ताह जनता के लिए खुला है। चैत्र व अश्विन के नवरात्रों में यहाँ बड़ी धूमधाम रहती है।

जयपुर के दर्शनीय स्थल ( Tourist places in Jaipur )

पूर्व का पेरिस, गुलाबी नगर तथा सी.वी. रमन के शब्दों मे रगश्री के द्रीप (Island of Glory) के नाम से प्रसिद्ध था। जयपुर की स्थापना – 18 नवम्बर,1727 को। शासक-: कछवाहा नरेश सवाई जयसिंह-|| द्रारा 9 खेड़ो का अधिग्रहण कर के किया गया।

  • प्रमुख वास्तुकार :- श्री विधाधर चक्रवर्ती एवं आनंदराम मिस्त्री।
  • सलाहकार :- मिर्जा इस्माइल थे।
  • नगर की नींव:- पं. जगन्नाथ सम्राट के ज्योतिष ज्ञान के आधार पर लगवायी थी।
  • बसावट:- ‘द एल्ट स्टडट एर्लग’ जर्मनी शहर के आधार पर।
  • पूरा शहर चोपड़ पैटर्न ( 9 आड़ी रेखाओ व 9सीधी रेखाओ) पर अनेक वर्गाकार मे हैं।
  • प्रिंस अल्बर्ट के आगमन पर जयपुर शहर को गुलाबी रंग मे रंगवाने का श्रेय सम्राट रामसिंह -|| 1835-80) को हैं।

नाहरगढ़ की वादियों मे तैयार होगा ‘ इंटरनेशनल गार्डन’, नाहरगढ़ वन्यजीव क्षेत्र राज्य क पहला इटरनेशनल गार्डन बनेगा। विभाग ने मसोदा तैयार कर.के 63 वर्ग km.क्षेत्र मे (जनवरी 2016)मे

नाहरगढ़ का किला:

‘ सुदर्शनगढ़ ‘ के नाम से जाना जाता हैं।

  • निर्माण:- 9 महल युक्त 1734ई.सवाई जयसिंह-||ने।
  • वर्तमान रुप :-1868ई. सवाई रामसिंह द्रारा प्रदान किया।
  • अरावली पर्वतमाला पर यह दुर्ग जयपुर के मुकुट के समान है।
  • सवाई माधोसिंह -|| ने अपनी 9 पासवानों के नाम पर 9 एक जैसे महल बनाये।
  • बगरु प्रिन्ट :- जयपुर से 30 किलोमीटर छपाई के लिए।

जयगढ़ का किला:- इसका निर्माण सवाई जयसिंह-1 -1726 ई. तथा मिर्जा राजा जयसिंह ने करवाया। तोप ढालने का कारखाना व जयबाण तोप ( एशिया की सबसे बड़ी तोप हैं। 22 मील।

गोविद देवजी का मंदिर:- 1735ई. सवाई जयसिंह।

कुण्डा:- पर्यटन के लिए हाथी गांव स्थापना।

आमेर:- 

नाम अम्बरीश ऋषि के नाम पड़ा। इसे अम्बरीशपुर या अम्बर भी कहा जाता हैं। जयपुर से 10 km. यह कछवाहा वंश की राजधानी के रूप में प्रसिद्ध हैं। आमेर दुर्ग को विश्व विरासत सूची मे 21 जून 2013 को यूनेस्कों ने राज.के छ जिलों के साथ गिरी दुर्ग को भी विशव सूची मे शामिल किया।काकिलदेव ने 1036 ई.मे आमेर के मीणा शासक भुट्टो से दुर्ग छीन लिया।

महाराजा मानसिहं के काल मे अनेक निर्माण हुए। 1707ई. मे सम्राट बहादुर शाह प्रथम ने हस्तगत कर के नाम ‘ मोमिनाबाद ‘ रखा था।सांयकाल यहां पर ‘ लाइट एण्ड साउण्ड शो चलता’ हैं।

गणेशपोल:- आमेर का विशव प्रसिद्ध प्रवेश द्रार हैं।

  • निर्माण:- (1700-1743 ) 50 फीट ऊँचा 50 फीट चौड़ा मिर्जा राजा जयसिंह।
  • सुहाग (सौभाग्य) मंदिर:- गणेशपोल की छत पर।

आमेर का महल:- मावठा झील के पास। शीशमहल :-‘ दीवाने खास ‘ नाम से प्रसिद्ध आमेर स्थिति जयमंदिर। महाकवि बिहारी ने इन्हें ‘ दर्पण धाम’ कहा। शिलादेवी का मंदिर यह आमेर के महल मे शिलादेवी कि प्रसिद्ध महल हैं।

जगत शिरोमणी मंदिर:- यह वैष्णव मंदिर कनकावती ने अपने पुत्र जगतसिंह की याद मे।

सिलोरा:- देश का पहला आधुनिक व अंतरराष्ट्रीय टैक्सटाइल पार्क हैं। 

सिटी पैलेस(चन्द्रमहल) चाँदी के पात्र विश्व के सबसे बडे़ विश्व प्रसिद्ध हैं।

आरायश:- भितिचित्रो के लिए। स्थानीय भाषा मे ‘ आलागीला/मोराकसी’ कहा गया था।

शीतलामाता का मेला:- चाकसू तहसील शील डूँगरी पास।

गैटोर:- नाहरगढ़ तलहटी मे स्थिति जयपुर के दिवंगत राजाओं संगमरमर छतरियों के लिए।

राजेश्वर मंदिर:- आम जनता के लिए शिवरात्रि को ही खुलता।

हवामहल:- 

1799ई. 5 मंजिला सवाई प्रतापसिंह। इमारत को लालचन्द कारीगर ने बनाया। राजकीय संग्रहालय मे परिवर्तित।

  • जयपुर शैली:- सजावट के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • सिसोदिया रानी का महल एवं बाग:-जयसिंह द्रितीय की महारानी ने 1799ई. मे।
  • पोथीखाना:- निजी पुस्तकालया एवं चित्रकला।
  • कोटपुतली:- भारत का सबसे बड़ा दुग्ध पैकिंग स्टेशन।

ईसरलाट,बस्सी, जंतर-मंतर, गणेश मंदिर, रामनिवास बाग,मुबारक महल, गंधों का मेला, अल्बर्ट हाॅल संग्रहालय, जमुवा रामगढ़ अभयारण्य, रामगढ़ बाँध,आदि।

कानोता बाँध:- राजस्थान का सर्वाधिक मछली उत्पादक बाँध।

गलता,मोती डूँगरी, जगन्नाथ धाम गोनेर, चूलगिरी, चौमुँहागढ, जलमहल झील, बैराठ, कनक वृदांवन, संगीत कला, जवाहर.कला केन्द्र, बिडला मंदिर आदि जयपुर मे प्रसिद्ध हैं।

बिड़ला प्लेनिटोरियम:-17 मार्च, 1989 को जयपुर मे स्थापित था।

अलवर के दर्शनीय स्थल

  • स्थापना:- 1770ई.राव प्रतापसिंह ने।
  • इनमे विनय विलास,सफदरजंग, नीमराणा दुर्ग दृश्य हैं।

सिलीसेढ़ झील:- अलवर से 16 km.दूर है इसको राजस्थान का ‘ नंदनकानन ‘ कहा जाता हैं। झील के किनारे महाराजा विनयसिंह ने रानी शीला की अद्भुत महल बनाया। वर्तमान मे होटल लेक पैलेस हैं।

पाण्डुपोल:- सरिस्का के दक्षिण मे पूर्व मे स्थिति इस पर पाण्डुओ ने अज्ञातवास 10वर्ष बिताये।

मूसीमहारानी की छतरी:- अस्सी खम्भों वाली इस छतरी का निर्माण 1815 ई.मे विनयसिंह ने करवाया।

भर्तृहरि:- उज्जैन के राजा व महान् योगी भर्तृृहरि की तपोस्थली अलवर से 345 km.हैं इसे कनफटे नाथों का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है।

सरिस्का अभयारण्य:- अलवर से 35किलोमीटर दूर-जयपुर राजमार्ग फर सरिस्का गाँव स्थिति हैं। 1990 मे राष्ट्रीय उद्दान घोषित किया गया। हरे कबूतरों के लिए प्रसिद्ध हैं। 27अगस्त,1982 को बाघ परियोजना के अंतर्गत शामिल किया।

बाला दुर्ग, कांकणबाड़ी का किला, नीलकण्ठ, जयसंमद,भिवाड़ी, रथ यात्रा सब अलवर मे पर्यटन के स्थल है।

बाड़मेर के दर्शनीय स्थल ( Tourist places in Jaipur )

कपड़ो पर रंगीन छापो के लिए विख्यात इस नगर की स्थापना 13 वीं सदी मे परमार राजा धरणीधर के पुत्र बाहादा राव नेकी थी। भीमाजी रत्नावत ने विक्रम संवत् 1642 मे वर्त्तमान बाड़मेर को बसाया।

सिवाना दुर्ग:- जालोर से 30 km. दूर स्थित सिवाना मे राजा राजभोज के पुत्र श्री वीरनारायण द्रारा वि.सं.1011 मे छप्पन की पहाड़ियों मे निर्मित यह दुर्ग प्रसिद्ध हैं

कपालेश्वर महादेव का मंदिर:- बाड़मेर जिले के चौहटन की विशाल पहाडी के बीच स्यित हैं।13वी शताब्दी मे निर्मित किया गया था।

गरीबनाथ का मंदिर:-इसकी स्थापना व़िसं. 900 मे कोमनाथ ने की। राजस्थान का खजुराहो किराडू ।

पंचभदा् झील.:- इस झील से उतम किस्म के नमक का उत्पादन किया जाता हैं। यहां स्थित 5 प्राचीन मंदिरों मे सोमेश्वर, शिव, विष्णु व ब्रह्मा मंदिर प्रसिद्ध हैं।

नागणेची माता का मंदिर, आलमजी का धोरा,जसोल, कनाना/कानन गैर मेला, किलोण आदि दर्शनीय स्थल हैं। यह ‘ घोडों का तीर्थ स्थल ‘ के उपनाम से प्रसिद्ध स्थल हैं।

दर्शनीय स्थल दर्शनीय स्थल दर्शनीय स्थल दर्शनीय स्थल दर्शनीय स्थल दर्शनीय स्थल दर्शनीय स्थल दर्शनीय स्थल दर्शनीय स्थल दर्शनीय स्थल दर्शनीय स्थल दर्शनीय स्थल दर्शनीय स्थल दर्शनीय स्थल दर्शनीय स्थल दर्शनीय स्थल दर्शनीय स्थल दर्शनीय स्थल दर्शनीय स्थल दर्शनीय स्थल

September 25, 2020

लोक संगीत कोन कोन से हे?? Rajasthan Folk music

लोक संगीत

लोक संगीत

भारत संगीत गायन शैलियां

1. ध्रुपद गायन शैली ( Dhrupad singing style )

  • जनक – ग्वालियर के शासक मानसिंह तोमर को माना जाता है।
  • महान संगीतज्ञ बैजू बावरा मानसिंह के दरबार में था।
  • संगीत सामदेव का विषय है।
  • कालान्तर में ध्रुपद गायन शैली चार खण्डों अथवा चार वाणियां विभक्त हुई।

(अ) गोहरवाणी ( Gorawani )

  • उत्पत्ति- जयपुर
  • जनक- तानसेन

(ब) डागुर वाणी ( Dagur vani )

  • उत्पत्ति- जयपुर
  • जनक – बृजनंद डागर

(स) खण्डार वाणी ( Khandar Vani )

  • उत्पत्ति – उनियारा (टोंक)
  • जनक- समोखन सिंह

(द) नौहरवाणी जयपुर ( Navhwani Jaipur )

  • जनक- श्रीचंद नोहर

2. ख्याल गायन शैली ( Kayal singing style )

  • ख्याल फारसी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है कल्पना अथवा विचार
  • जनक- अमीर खुसरो जो अलाउद्दीन खिलजी के दरबार में था।
  • खुसरो को कव्वाली का जनक माना जाता है।
  • कुछ इतिहास -कार जोनपुर (महाराष्ट्र) के शासक शाहसरकी को ख्याल गायन श्शैली का जनक मानते है।

3. माण्ड गायन शैली ( Mand Singing style )

10 वीं 11 वीं शताब्दी में जैसलमेर क्षेत्र माण्ड क्षेत्र कहलाता था। अतः यहां विकसित गायन शैली माण्ड गायन शैली कहलाई। एक श्रृंगार प्रधान गायन शैली है।

प्रमुख गायिकाएं

  • अल्ला-जिल्हा बाई (बीकानेर) – केसरिया बालम आवो नही पधारो म्हारे देश।
  • गवरी देवी (पाली) भैरवी युक्त मांड गायकी में प्रसिद्ध
  • गवरी देवी (बीकानेर) जोधपुर निवासी सादी मांड गायिका।
  • मांगी बाई (उदयपुर) राजस्थान का राज्य गीत प्रथम बार गाया।
  • जमिला बानो (जोधपुर)
  • बन्नों बेगम (जयपुर) प्रसिद्ध नृतकी “गोहरजान” की पुत्री है। 

4. मांगणियार गायन शैली ( Manganiyar Vocal Style )

राजस्थान के पश्चिमी क्षेत्र विशेषकर जैसलमेर तथा बाड़मेर की प्रमुख जाति मांगणियार जिसका मुख्य पैसा गायन तथा वादन है।

  • मांगणियार जाति मूलतः सिन्ध प्रान्त की है तथा यह मुस्लिम जाति है।
  • प्रमुख वाद्य यंत्र कमायचा तथा खड़ताल है।
  • कमायचा तत् वाद्य है।
  • इस गायन शैली में 6 रंग व 36 रागिनियों का प्रयोग होता है।
  • प्रमुख गायक 1 सदीक खां मांगणियार (प्रसिद्ध खड़ताल वादक) 2 साकर खां मांगणियार (प्रसिद्ध कम्रायण वादक)

5. लंगा गायन शैली ( Langa vocal style )

  • लंगा जाति का निवास स्थान जैसलमेर-बाडमेर जिलों में है।
  • बडवणा गांव (बाड़मेर) ” लंगों का गांव” कहलाता है।
  • यह जाति मुख्यतः राजपूतों के यहां वंशावलियों का बखान करती है।
  • प्रमुख वाद्य यत्र कमायचा तथा सारंगी है।
  • प्रसिद्ध गायकार 1 अलाउद्दीन खां लंगा 2 करीम खां लंगा 

6. तालबंधी गायन शैली ( Melodious singing style )

  • औरंगजेब के समय विस्थापित किए गए कलाकारों के द्वारा राज्य के सवाईमाधोपुर जिले में विकसित शैली है।
  • इस गायन शैली के अन्तर्गत प्राचीन कवियों की पदावलियों को हारमोनियम तथा तबला वाद्य यंत्रों के साथ सगत के रूप में गाया जाता है।
  • वर्तमान में यह पूर्वी क्षेत्र में लोकप्रिय है।

7. हवेली संगीत गायन शैली ( Mansion music singing style )

  • प्रधान केन्द्र नाथद्वारा (राजसमंद) है।
  • औरंगजेब के समय बंद कमरों में विकसित गायन शैली।

प्रसिद्ध घराने

1. जयपुर घराना ( Jaipur Gharana )

  • संस्थापक – मनरंग (भूपत खां)
  • संगीतज्ञ – मोहम्मद अली खां कोठी वाले
  • घराना ख्याल गायन शैली का प्रयोग करता है।

2. सैनिया घराना जयपुर ( Sainia Gharana Jaipur )

  • इसे सितारियों का घराना भी कहते है।
  • प्रसिद्ध संगीतज्ञ – सितारवादक – अमृत सैन
  • संस्थापक- सूरतसैन (तानसेन का पुत्र)
  • यह घराना गोहरवाणी का प्रयोग करता है।

3. मेवाती घराना ( Mewati Gharana )

  • संस्थापक – नजीर खां (जोधपुर के शासक जसवंत सिंह के दरबार में था )
  • प्रसिद्ध संगीतज्ञ – पं. जसराज

4. डागर घराना ( Dagar Gharana )

  • संस्थापक – बहराम खां डागर (जयपुर शासक रामसिंह के दरबार में था।)
  • यह घराना डागुरवाणी का प्रयोग करता है।
  • जहीरूद्दीन डागर व फैयाजुद्दीन डागर जुगलबंदी के लिए जाने जाते है।

5. पटियाला घराना ( Patiala Gharana )

  • संस्थापक -फतेह अली तथा अली बख्श खां
  • प्रसिद्ध संगीतज्ञ- पाकिस्तानी गजल गायक- गुलाम अली

6. अन्तरोली घराना ( Antroli Gharana )

  • संस्थापक -साहिब खां
  • यह घराना खण्डार वाणी प्रयोग करता है।
  • प्रसिद्ध संगीतज्ञ – मान तौल खां/रूलाने वाले फकीर

7. अला दीया घराना ( Ala Diya Gharana )

  • संस्थापक – अलादीया खां
  • यह घराना खण्डार वाणी व गोहरवाणी का प्रयोग करता है।
  • यह जयपुर घराने की उपशाखा है।
  • प्रसिद्ध गायिका – श्री मति किशौरी रविन्द्र अमोणकर

8. बीनकर घराना ( Beenakar Gharana )

  • संस्थापक – रज्जब अली बीनकर
  • रामसिंह-द्वितीय का दरबारी व्यक्ति है।

9. दिल्ली घराना ( Delhi Gharana )

  • संस्थापक- सदारंग
  • यह घराना ख्याल गायन शैली का प्रयोग करता है।
  • ख्याल गायन शैली को प्रसिद्धी दिलाने का श्रेय सदारंग को दिया जाता है।

10. किराना घराना ( Kirana Gharana )

  • यह मूलत – माहाराष्ट्र का घराना है।*
  • प्रसिद्ध संगीतज्ञ- 1. गंगुबाई हंगल 2. रोशनआरा बेगम 3. पं. भीमसेन जोशी (भारत रत्न 2008में)

राजस्थान भाषा साहित्य अकादमी की स्थापना1983 ई. में की गई। राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान की स्थापना सन्1950 ई. में जोधपुर में की गई। सन् 2002 में उस्ताद किशन महाराज, जाकिर हुसैन (दोनों तबला वादक) किशौरी रविन्द्र अमोणकर को पदम भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

ग्रंथ एंव उनकी रचना ( Texts and their composition )

  • नाट्यशास्त्र-भरतमुनि
  • वृहद्देशी-मतंगदेव
  • राग तरंगिणी-लोचन

मान कुतूहल-राजा मानसिंह तोमर

राग माला ,राग मंजरी, नर्तन निर्णय, सदाक चंदोदय -पुण्डरिक विट्ठल

संगीत दर्पण- पंडित दामोदर मिश्र

  • राग दर्पण -फकीरुल्ला
  • संगीत पारिजात-अहोबल

सरस्वती कंठाभरण ,चंद्र प्रकाश-राजा भोज

संगीतराज, संगीत मीमांसा, रसिकप्रिया( गीत गोविंद की टीका) सुड प्रबंध – महाराणा कुम्भा

राग चंद्रिका-भट्ट द्वारका नाथ

  • राग रचनाकार -राधा कृष्ण(सवाई प्रताप सिंह के काल मे )
  • स्वर सागर -उस्ताद चाँद खां

श्रृंगार हार -राणा हम्मीर (रणथम्भोर)

  • ?संगीत रत्नावली-सोमपाल
  • ?संगीत सागर-गणपत भारती
  • राधा गोविंद संगीत सार- बृजपाल भट्ट
  • संगीत राग कल्पद्रुम कृष्णानंद व्यास( मेवाड़)
  • स्वर मेल कलानिधि- रामा मात्य
  • “द इंडियन सॉन्ग ऑफ सोंग्स”- एडविन अरनोल्ड ( यह गीतगोविंद का अंग्रेजी रूपांतरण है)
  • नगमाते आसफी- मोहम्मद रजा
  • संगीत बालबोध-पंडित V. D. पलुस्कर
  • संगीतानुपराग -बीकानेर महाराजा
  • संगीत विनोद -राव अनूप सिंह

अनूप संगीत विलास ,अनूप संगीत रत्नाकर, अनूपाकुंश ,अनुपराग सागर,अनूप रागमाला -महाराजा अनूप सिंह के दरबारी संगीतज्ञ भाव भट्ट

लक्ष्य संगीत ,भातखंडे ,संगीत शास्त्र ,क्रमिक पुस्तक मलिका, अभिनव राग मंजरी हिंदुस्तानी संगीत पद्धति- पंडित विष्णु नारायण भातखंडे

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September 25, 2020

राजस्थान के पर्व कोन कोन से है??Rajasthan Festival

राजस्थान के पर्व

पर्व

हिंदुओं के त्योहार ( Festivals of Hindus )

  • तीज राजस्थान की स्त्रियों का सर्व प्रिय त्यौहार है तीज प्रतिवर्ष 2 बार आती है
  • बड़ी तीज भाद्र कृष्ण तृतीया
  • छोटी तीज श्रवण शुक्ला तृतीया छोटी तीज ही अधिक प्रसिद्ध है तीज के 1 दिन पूर्व सिंजारा का पर्व मनाया जाता है ।
  • नाग पंचमी सावन कृष्णा पंचमी को नाग पूजा की जाती है घर के दरवाजे के दोनों और गोबर से नाग का चित्र अंकित किया जाता है ।
  • रक्षाबंधन श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाता है बहन भाई को राखी बांधती है।
  • उपछठ भाद्र कृष्ण षष्ठी में कुंवारी कन्याओं के लिए उबछठ का त्यौहार आता है कुंवारी कन्याएं दिनभर खड़ी रहती है खाना नहीं खाती चंद्रमा के दर्शन के बाद भोजन करती है ।
  • हिंडोला उत्सव श्रावण व भादो के महीने में मनाया जाता है राम और कृष्ण की मूर्तियों को झूले पर बिठाकर झुलाते हैं ।
  • 6 श्राद्ध पक्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक श्राद्ध पक्ष मनाया जाता है ।

  • जन्माष्टमी यह त्यौहार भाद्रपद की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है इस दिन कृष्ण भगवान का जन्म हुआ था।
  • गणेश चतुर्थी भाद्रपद शुक्ला चतुर्थी को मनाया जाता है गुरु शिष्य एक दूसरे का पूजन करते हैं सवाई माधोपुर में गणेश जी का मेला भरता है
  • 9 भाद्र कृष्ण नवमी को गोगानवमी का त्यौहार मनाया जाता है ।
  • 10 नवरात्रा मां दुर्गा के नवरात्र वर्ष में दो बार मनाए जाते अश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक तथा चैत्र मास में शुक्ल एकम से नवमी तक।
  • 11 दशहरा अश्विन शुक्ला दशमी को विजयदशमी दशहरा त्यौहार मनाते हैं ।
  • 12 करवा चौथ कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को करवा चौथ का व्रत स्त्रियां मनाती है अपने पति की लंबी आयु हेतु व्रत करती है चंद्रमा के दर्शन कर भोजन करती है ।
  • 13 दीपावली कार्तिक कृष्ण अमावस्या को संपूर्ण देश में दीपावली पर्व मनाया जाता है।
  • 14 गोवर्धन पूजा इसे अन्नकूट पूजा भी कहते हैं दीपावली के दूसरे दिन शाम को गोबर का गोवर्धन बनाकर पूजा की जाती है ।
  • 15 कार्तिक पूर्णिमा कार्तिक पूर्णिमा को नदियों तालाबों में लोग स्नान करते हैं कोलायत बीकानेर चंद्रभागा झालरापाटन पुष्कर अजमेर की झीलों में हजारों लोग स्नान करते हैं इस दिन भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार हुआ था सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक का जन्म दिन भी इसी तिथि को हुआ था सिख लोग भी कार्तिक पूर्णिमा दिवस धूमधाम से मनाते हैं ।

  • 16 मकर सक्रांति 14 जनवरी को सूर्य के मकर राशि में प्रवेश पर मकर सक्रांति पर्व मनाया जाता है नदी और जलाशयों में लोग स्नान करते हैं और अनेक स्थानों पर पतंग उड़ाई जाती है तिल के बने व्यंजन का दान किया जाता है।
  • 17 बसंत पंचमी माघ शुक्ल पंचमी को बसंत पंचमी मनाई जाती है।
  • 18 फाल्गुन कृष्ण तेरस को शिवरात्रि का त्यौहार मनाया जाता है ।
  • 19 होली फाल्गुन मास की पूर्णिमा को पूरे देश में होली का त्यौहार मनाया जाता है होली के दिन होली का दहन व दूसरे दिन फ़ाग खेलने की प्रथा है महावीर जी में लठमार होली बाड़मेर में पत्थर मार होली आदिवासी अंचल में भगोरिया खेला जाता है भिनाय अजमेर में 2 दिन एक दूसरे पर कोड़े बरसाते होली खेलते हैं ।
  • 20 शीतलाष्टमी चैत्र कृष्ण अष्टमी को मनाया जाता है इस दिन बासी भोजन का भोग लगता है इसे बासोड़ा भी कहते हैं।
  • 21 घुड़ला त्यौहार चैत्र कृष्णाष्टमी को घुड़ला त्यौहार मनाते हैं छेद किए हुए घड़े में दीपक रखकर गीत गाती हुई स्त्रियां घर लौटती है ।
  • 22 गणगौर चैत्र शुक्ल तृतीया को पार्वती के गोने का सूचक यह त्योहार होली के लगभग 15 दिन बाद मनाया जाता है विवाहित स्त्रियां अपने सुहाग के अमर होने वह अपने भाई के चिरायु होने का वर मांगती है अविवाहित कुंवारिया अपने भाई के लिए सुंदर स्त्री वह अपने लिए सुंदर वर मांगती है ।

  • 23 रामनवमी चैत्र शुक्ल नवमी को श्री रामचंद्र जी का जन्म दिवस मनाया जाता है।
  • 24 अक्षय तृतीया इसे आखा तीज भी कहते हैं यह वैशाख मास की शुक्ल तृतीया को मनाया जाता है इस दिन किसान सात अन्न व हल बैल की पूजा करते हैं।
  • 25.हरियाली अमावस- यह त्योहार श्रावण अमावश्या को मनाया जाता है इस दिन ब्राह्मणो को भोजन करने और कल्प वृक्ष की पूजा करने की परम्परा है राज्य के अजमेर ज़िले के मांगलियावास में कल्प वृक्ष मेला भरता है

ईसाईयों के त्यौहार ( Festivals of Christians )

  • 1 क्रिसमस डे ( Christmas Day ) – 25 दिसंबर को ईसा मसीह का जन्म दिवस के रूप में मनाते हैं ।
  • गुड फ्राइडे ईसा मसीह की शहादत के रुप में मनाया जाता है।
  • ईस्टर ईसा मसीह के पुनर्जन्म के उपलक्ष में यह दिवस मनाया जाता है ।

मुस्लिम पर्व ( Muslim festival )

  • ईद उल फितर रमजान माह के रोजे रखने के बाद रमजान की समाप्ति पर शव्वाल माह की पहली तारीख को चांद देख कर ईद उल फितर मीठी ईद के रूप में मनाते हैं ।
  • ईद उल जुहा कुर्बानी पर्व के रूप में मनाते हैं बकरा ईद भी कहते हैं ।
  • मुहर्रम हुसैन इमाम की बलिदान की याद में मनाते हैं इस दिन उपवास रखते और ताजिए निकालते हैं ।
  • बारवफ़ात मोहम्मद साहब के जन्म की याद में श्रद्धा पूर्वक यह पर्व मनाते हैं खीर व चावल चावल पका कर गरीबों में बांटते हैं ।
  • शबे बरात सावन माह की 14वी तारीख को मनाया जाता है मोहम्मद साहब को मुक्ति प्राप्त हुई थी ।

जैन समाज के प्रमुख पर्व ( festivals of Jain )

जैन पर्वों का संबंध लौकिक जगत से न होकर आत्मा से है आत्मशुद्धि जैन पर्व की पहली विशेषता है

  • 1. दशलक्षण पर्व- यह पर्व प्रतिवर्ष चैत्र भाद्रपद में माघ माह की शुक्ल पंचमी से पूर्णिमा तक मनाया जाता है यह पर्व किसी व्यक्ति से संबंधित न होकर आत्मा के गुणों से संबंधित है
  • 2. पर्युषण पर्व- यह जैन धर्म का महापर्व कहलाता है पर्युषण का अर्थ है निकट बसना, दिगंबर परंपरा में इस पर्व का नाम दसलक्षण के साथ जुड़ा हुआ है जिसका प्रारंभ भाद्र शुक्ल पंचमी से होता है और समापन चतुर्दशी को
    श्वेतांबर परंपरा में इस पर्व क प्रारंभ भाद्रपद कृष्ण 12 से होता है समापन भाद्रपद शुक्ल पंचमी को होता है अंतिम दिन संवत्सरी पर्व मनाया जाता है जैन समाज के लोग अपनी गलतियों के लिए क्षमा याचना करते हैं
  • 3. ऋषभ जयंती- चैत्र कृष्ण नवमी को, जैन समाज के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव जी का जन्म
  • 4. महावीर जयंती- चैत्र शुक्ल त्रयोदशी, चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर जी का जन्म, श्री महावीर जी करौली में इस दिन विशाल मेला भरता है
  • 5. सुगंध दशमी पर्व- भाद्रपद शुक्ल दशमी, जैन मंदिरों में सुगंधित द्रव्यों द्वारा सुगंध कर के यह पर्व मनाया जाता है
  • 6. रोट तीज- भाद्रपद शुक्ल तृतीया को
  • 7. पड़वा ढोक- दिगंबर जैन समाज का क्षमा याचना पर्व, आश्विन कृष्ण एकम को

प्रमुख उर्स ( Major Urs )

1. ख्वाजा साहब का उर्स :

  • अजमेर में
  • ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में 1 रज्जब से 6 रज्जब तक भरने वाला उर्स
  • यह मुसलमानों का राजस्थानों में सबसे बड़ा उर्स/मेला माना जाता है।

2. गलियाकोट का उर्स :

  • डूंगरपुर जिले में माही नदी के निकट गलियाकोट मे
  • गलियाकोट दाउदी बोहरों का एक प्रमुख तीर्थ स्थल है
  • यहाँ फकरुद्दीन पीर की मजार पर प्रतिवर्ष उर्स आयोजित किया जाता है।

3. तारकीन का उर्स :

  • नागौर में
  • काजी हमीदुद्दीन नागौरी की दरगाह पर उर्स भरता है।
  • यह राजस्थान का दूसरा बडा उर्स माना जाता है।

4. नरहड़ की दरगाह :

  • नरहड़ (झुंझुनू) में
  • हजरत हाजिब शक्कर बादशाह की दरगाह जो की शक्कर पीर की दरगाह के नाम से भी प्रसिद्ध है।
  • कृष्ण जन्म अष्टमी के दिन मेला भरता है।

September 24, 2020

राजस्थान के लोक नाट्य Rajasthan Folk drama

राजस्थान के लोक नाट्य

लोक नाट्यो में ‘तुर्रा कलंगी’ कम से कम 500 साल.पुराना हैं। मेवाड़ के दो पीर संतो ने जिनके नाम शाहअली और तुक्कनगीर थे ‘ तुर्राकलंगी ‘की रचना की। बीकानेर की ‘रम्मत’ की अपनी न्यारी ही विशेषता ह

लोक नाट्य

1. ख्याल:-

नाटक मे जहाँ देखना और सुनना दोनों प्रधान होते है वहां ख्याल मे केवल सुनना प्रधान होता हैं। 18 वीं शताब्दी के प्रारम्भ से ही राजस्थान में लोक नाट्यों के नियमित रुप से सम्पन्न होने के प्रमाण मिलते हैं। इन्हें ख्याल कहा जाता था। इन ख्यालों की विषय-वस्तु पौराणिक या किसी पुराख्यान से जुड़ी होती है।

इनमें ऐतिहासिक तत्व भी होते हैं तथा उस जमाने के लोकप्रिय वीराख्यान आदि होते हैं।  भौगोलिक अन्तर के कारण इन ख्यालों ने भी परिस्थिति के अनुसार अलग-अलग रुप ग्रहण कर लिए। इन ख्यालों के खास है, कुचामनी ख्याल, शेखावटी ख्याल, माँची ख्याल तथा हाथरसी ख्याल।

ये सभी ख्याल बोलियों में ही अलग नहीं है। बल्कि इनमें शैलीगत भिन्नता भी है। जहाँ कुछ ख्यालों में संगीत की महत्ता भी है दूसरों में नाटक, नृत्य और गीतों का प्राधान्य है।  गीत प्राय: लोकगीतों पर आधारित है या शास्रीय संगीत पर। लोकगीतों एवं शास्रीय संगीत का भेद ख्याल को गाने वाले विशेष नाट्यकार पर ही आधारित होता है।

अगर लोकनाट्यकार शास्रीय संगीत का जानकार है तो वह ख्याल संगीत प्रधान होगा। यदि खिलाड़ी अभिनेता नृत्य का जानकार हुआ तो ख्याल नृत्य प्रधान होगा।

कुचामनी ख्याल –

विख्यात लोक नाट्यकार लच्छीराम द्वारा इसका प्रर्वतन किया गया इसने प्रचलित ख्याल परम्परा में अपनी शैली का समावेश किया। इस शैली की विशेषताएँ निम्नलिखित है –

  • अ) इसका रुप आपेरा जैसा है।
  • ब) गीत (लोकगीतों) की प्रधानता है।
  • स) लय के अनुसार ही नृत्य के कदमों की ताल बंधी है।
  • द) खुले मंच (ओपन एयर) में इसे सम्पन्न किया जाता है।

इसकी कुछ अन्य विशेषताएँ भी है। यथा –

  • (1) सरल भाषा
  • (2) सीधी बोधगम्य लोकप्रिय धुनों का प्रयोग
  • (3) अभिनय की कुछ सूक्ष्म भावभिव्यक्तियाँ।
  • (4) सामाजिक व्यंग्य पर आधारित कथावस्तु का चुनाव।

लच्छीराम – खुद एक अच्छे नर्तक और लेखक थे। उन्होंने 10 ख्यालों की रचना की, जिनमें चाँदी नीलगिरी, राव रिड़मल तथा मीरा मंगल मुख्य है। उनके पास अपनी खुद की नृत्य मण्डली थी, जो वह पेशेवर नृत्य के लिए भी उपयोग करते थे।

  • ? स्री चरित्र का अभिनय पुरुष पात्र ही करते हैं।
  • ? ख्याल में संगत के लिए ढोल वादक, शहनाई वादक व सारंगी वादक मुख्य रुप से सहयोगी होते हैं।
  • ? गीत बहुत ऊँचे स्वर में गाये जाते हैं और इन्हें प्राय: नृतक ही गाते हैं।
  • ? इन दिनों ख्याल शैली के प्रमुख प्रर्वतक उगमराज खिलाड़ी है।

शेखावटी ख्याल-

नानूराम इस शैली के मुख्य खिलाड़ी रहे। शेखावाटी के कुछ ख्याल-

(1) हीरराझाँ
(2) हरीशचन्द्र
(3) भर्तृहरि
(4) जयदेव कलाली
(5) ढोला मरवड़
(6) आल्हादेव।

नानूराम चिड़ावा के निवासी थे, और मुसलमान थे। किन्तु सभी जाति के लोग उनका बडा सम्मान करते थे। अपनी कला के लिए वे आज भी सभी सम्प्रदायों में याद किए जाते है। उनके योग्यतम शिष्यों में दूलिया राणा का नाम लिया जाता है, जो उपर्युक्त सभी ख्याल अपने भतीजे के साथ खेला करते हैं।

विशेषताएं

  • अच्छा पद संचालन
  • पूर्ण सम्प्रेषित हो सके उस शैली, भाषा और मुद्रा में गीत गायन
  • वाद्यवृन्द की उचित संगत, जिनमें प्राय: हारमोनियम, सारंगी, शहनाई, बाँसुरी, नक्कारा तथा ढोलक का प्रयोग करते हैं।

दुलिया राणा की मृत्यु के बाद उनके पुत्र सोहन लाल तथा पोते बन्सी बनारसी आज तक भी साल में आठ महीनों तक इन ख्यालों का अखाड़ा लगाते हैं।

जयपुरी ख्याल –

यद्यपि सभी ख्यालों की प्रकृति मिलती-जुलती है, परन्तु जयपुर ख्याल की कुछ अपनी विशेषता है जो इस प्रकार है-

  • स्री पात्रों की भूमिका भी स्रियाँ निभाती हैं।
  • जयपुर ख्याल में नए प्रयोगों की महती संभावनाएँ हैं।
  • यह शैली रुढ़ नहीं है। मुक्त है तथा लचीली है।
  • इसमें अखबारों, कविता, संगीत, नृत्य तथा गान व अभिनय का सुंदर समानुपातिक समावेश है।

इस शैली के कुछ लोकप्रिय ख्याल निम्नांकित है –

(1) जोगी-जोगन
(2) कान-गूजरी
(3) मियाँ-बीबी
(4) पठान
(5) रसीली तम्बोलन।

तुर्रा कलंगी ख्याल-

मेवाड़ के शाह अली और तुकनगीर नाम के दो संत पीरों ने 400 वर्ष पहले इसकी रचना की और इसे यह नाम दिया।

  • तुर्रा को महादेव “शिव’ और “कलंगी’ को “पार्वती’ का प्रतीक माना जाता है।
  • तुकनगीर “तुर्रा’ के पक्षकार थे तथा शाह अली “कलंगी’ के।
  • इन दोनों खिलाड़ियों ने “तुर्राकलंगी’ के माध्यम से “शिवशक्ति’ के विचारों को लोक जीवन तक पहुँचाया।
  • इनके प्रचार का मुख्य माध्यम काव्यमय सरंचनाएँ थी, जिन्हें लोक समाज में “दंगल’ के नाम से जाना जाता है।
  •  ये “दंगल’ जब भी आयोजित होते हैं, तो दोनों पक्षों के खिलाड़ियों को बुलाया जाता है और फिर इनमें पहर-दर-पहर काव्यात्मक संवाद होते हैं।
  • “तुर्रा कलंगी’ का ख्याल बहुत लोकप्रिय हुआ है और यह सम्पूर्ण राजस्थान में खेला जाता है। इसका विस्तार मध्यप्रदेश तक भी है।
  • “तुर्रा कलंगी’ सम्बन्धी सबसे पहले केले गए ख्याल का नाम “तुर्रा कलंगी का ख्याल’  था।
  • तुर्रा कलंगी के शेष चरित्र प्राय: वही होते हैं जो अन्य ख्यालों के होते हैं।

निम्नलिखित विशिष्ट बातें इसकी उल्लेखनीय है –

  • इसकी प्रकृति गैर व्यावसायिक की है।
  • इसमें रंगमंच की भरपूर सजावट की जाती है।
  • नृत्य की कदम ताल सरल होती है।
  • लयात्सम गायन जो, कविता के बोल जैसा ही होता है।
  • यही एक ऐसा लोकनाट्य है जिसमें दर्शक अधिक भाग लेते थे।

“तुर्रा कलंगी’ के मुख्य केन्द्र है, घोसूण्डा, चित्तौड़, निम्बाहेड़ा तथा नीमच (मध्य प्रदेश) इन स्थानों में “तुर्रा कलंगी’ के सर्वश्रेष्ठ कलाकार दिए हैं।जैसे चेतराम, घोसूण्डा का हमीद बेग एवं संवादों, पायल ताराचन्द तथा ठाकुर ओंकार सिंह आदि। इन तुर्राकलंगी खिलाड़ियों में “सोनी जयदयाल’ बहुत ही विख्यात एवं प्रतिभाशाली था।

अलीबक्शी ख्याल:- इनका सबसे पहला ख्याल कृष्णलीला जो ख्याल शैली के नाट्यो मे सर्वश्रेष्ठ समझा गया।

कन्हैया दंगल ख्याल:- इनका विस्तार सवाईमाधोपुर, टोंक, दौसा, करोली, भरतपुर के गांवो मे देखा गया हैं।

रम्मत :- रम्मत का अभिप्राय खेल हैं रम्मत बीकानेर, जैसलमेर, पोकरण और फलोदी क्षेत्र मे होती हैं।

तमाशा: –तमाशा जयपुर की परम्परागत लोक नाट्य शैली हैं।

गंधर्व नाट्य:- मारव़ाड के निवासी गंधर्व पेशेवर नृत्यकार होते है।

सवारी नाट्य :- सवारी अथवा जुलूस के रुप मे होता हैं।

माच के ख्याल 

दंगली नाट्य

बैटकी -नाट्य 

चारबैत

2 लीला:-

  • लोक नाट्य का एक बहु प्रचलित रुप जिसकी कथा पुराणों या पुराख्यालो से ली जाती हैं।
  • रासलीला: -रासलीला श्री कृष्ण के जीवन-चरित्र पर आधारित हैं।
  • रामलीला: -यह भगवान श्रीराम के जीवन गाथा पर.आधारित लोक नाट्य हैं।
  • रामत:-
  • सनकादिकों की लीलाएँ:-
  • रासधारी:-

3. स्वांग :-

  • लोक नाट्यो के रुपों मे एक परम्परा ‘ स्वांग’ भी हैं शाब्दिक अर्थ हैं – किसी विशेष, एतिहासिक, पौराणिक, लोक प्रसिद्ध या समाज मे विख्यात चरित्र ।
  • बहरुपिये/भाण्ड: -सपूर्ण राजस्थान मे बरुपिये मिलते है।
  • कला का सबसे नामी कलाकार ‘ केलवा का परशुराम भाण्ड’ हैं। भीलवाड़ा के ‘ जानकीलाल भाण्ड थे।

4 नौटंकी

  • नौटंकी का शाब्दिक अर्थ है नाटक का अभिनय करना।

5 नृत्य नाट्य

  • गवरी (राई):- भीलो द्रारा भाद्रपद माह के प्रारंभ से आशिवन शुक्ला एकादशी तक गवरी उत्सव मे किया जाता हैं।
  • भवाई:- एक मान्यता के अनुसार भवाई नृत्य नाट्य करने वाली जाति की उत्पति अजमेर (केकडी )के ‘नागोजी जाट ‘ ने की थी।

6.पारसी थियेटर:- 

  • इस शताब्दी के प्राथमिक चरण मे हमारे देश मे एक नये ही किस्म की रंगमंचीय कला का विकास हुआ, जिसका नाम ‘ पारसी थियेटर’ ,था
  • राजस्थान मे प्रथम पारसी थियेटर की स्थापना जयपुर मे ‘ रामप्रकाश थियेटर के नाम से महाराजा रामसिंह द्रितीय ने 1878मे की थी।
  • वे इस परम्पुरा का 1993 ई तक निर्वाह करते रहे।

September 24, 2020

राजस्थान के प्रमुख संगीतज्ञ Rajasthan Chief Musicians

राजस्थान के प्रमुख संगीतज्ञ

संगीतज्ञ

1. सवाई प्रताप सिंह – जयपुर नरेश सवाई प्रताप सिंह संगीत एवं चित्रकला के प्रकांड विद्वान और आश्रयदाता थे इन्होंने संगीत का विशाल सम्मेलन करवाकर संगीत के प्रसिद्ध ग्रंथ राधा गोविंद संगीत सार की रचना करवाई जिसके लेखन में इनके राजकवि देवर्षि बृजपाल भट्ट का महत्वपूर्ण योगदान रहा  इनके दरबार में 22 प्रसिद्ध संगीतज्ञ एवं विद्वानों की मंडली गंधर्व बाईसी थी

2. महाराजा अनूप सिंह- बीकानेर के शासक जो स्वयं एक विद्या अनुरागी तथा विद्वान संगीतज्ञ थे प्रसिद्ध संगीतज्ञ भाव भट्ट इन्हीं के दरबार में था

3. पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर- यह महाराष्ट्र के थे इन्होंने संगीत पर कई महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे तथा संगीत को जन-जन तक पहुंचाया

4. पंडित विष्णु नारायण भातखंडे -प्रसिद्ध संगीत सुधारक एवं प्रचारक इनका जन्म 1830 में हुआ

5. पंडित उदय शंकर– उदयपुर में जन्मे श्री उदय शंकर प्रख्यात कथकली नर्तक रहे हैं

6. पंडित रविशंकर.- मैहर के बाबा उस्ताद अलाउद्दीन खां के प्रमुख शिष्य प्रख्यात नृत्यकार पंडित उदय शंकर के अनुज पंडित रविशंकर वर्तमान में विश्व के शीर्षस्थ सितार वादक है उन्होंने भारतीय संगीत को विदेशों तक लोकप्रिय बनाया है इन्हें अमेरिका का प्रसिद्ध संगीत पुरस्कार ग्रैमी पुरस्कार मिल चुका है

7. पंडित विश्व मोहन भट्ट– 

जयपुर के विश्व प्रसिद्ध सितार वादक जिन्हें 1994 में स्पेनिश गिटार वादक के साथ जुगलबंदी कर कॉन्पैक्ट डिस्क प्रसिद्ध ग्रैमी पुरस्कार मिला उन्होंने एक नई राग गौरीम्मा का सृजन किया पंडित विश्व मोहन भट्ट ने पश्चिमी गिटार में 14 तार जोड़ कर इसे मोहन वीणा का रूप दिया जो वीणा सरोज एवं सितार का समिश्रण है इनके बड़े भ्राता पंडित शशि मोहन भट्ट भी प्रसिद्ध सितार वादक थे जिनका वर्ष 2001 में जयपुर में निधन हो गया

8. जहीरुद्दीन फैयाज उद्दीन डागर– प्रसिद्ध ध्रुपद गायक जिन्होंने द्रुपद में जुगलबंदी की परंपरा स्थापित की और द्रुपद को नया रूप दिया
जियाउद्दीन का पदम भूषण रहीमुद्दीन डागर सभी इसी घराने के हैं

9. बन्नो बेगम– जयपुर की प्रसिद्ध गायिका जो जयपुर की प्रसिद्ध गायिका व नर्तकी गौहर जान की पुत्री हैं

10. अमीर खुसरो– इसका जन्म उत्तर प्रदेश में 1253 ईस्वी में हुआ था खुसरो अलाउद्दीन खिलजी के दरबारी संगीतज्ञ थे इन्होंने इरानी और भारतीय संगीत शैलियों के संबंध से हिंदुस्तानी संगीत प्रारंभ किया तथा गायन की एक नई शैली कव्वाली विकसित की

11. राजा मानसिंह तोमर– ग्वालियर के शासक जो स्वयं भी एक अच्छे विद्वान और संगीतज्ञ थे उन्होंने बैजू बावरा के सहयोग से ध्रुपद गायन को परिष्कृत रूप प्रदान कर उसका पुनरुद्धार किया

12. तानसेन– मुगल बादशाह अकबर के नवरत्नों में एक तानसेन भारत के अब तक के सबसे विद्वान संगीतज्ञ हुए हैं यह द्रुपद की गौहरवाणी के सर्वाधिक ज्ञाता थे

13. बैजू बावरा —ग्वालियर के शासक मानसिंह तोमर की दरबारी संगीतज्ञ तथा तानसेन समकालीन बैजू बावरा द्रुपद के सिद्धहस्त गायक थे

14. अल्लाह जिलाई बाई राजस्थान की सबसे प्रसिद्ध गायिका मानी जाती है जो कि बीकानेर ज़िले से है।

राजस्थान_का_संगीत 

राजस्थान_के प्रमुख_संगीत के  जोधपुर ,जयपुर ,जैसलमेर तथा उदयपुर  माने जाते हैं।  ऐसा ही संगीत नज़दीक राष्ट्र पाकिस्तान (सिंध) में भी सुनने को मिलता है।

राजस्थान_में संगीत अलग-अलग जातियों के हिसाब से है , जिसमें ये जातियां आती है -लांगा ,सपेरा , मांगणीयरभोपा और जोगी यहां संगीतकारों के दो परम्परागत कक्षाएं है एक लांगा और और दूसरी मांगणीयर।

राजस्थान_में पारम्परिक संगीत में महिलाओं बका गाना जो हुत प्रसिद्ध है जो कि (पणीहारी) नाम से है।  इनके अलावा विभिन्न जातियों के संगीतकार अलग-अलग तरीकों से गायन करते हैं। सपेरा बीन बजाकर सांप को नचाता है तो  भोपा जो फड़ में गायन करता है।

राजस्थान_के संगीत में लोकदेवताओं पर भी काफी गीत गाये गए हैं। जिसमें मुख्य रूप से पाबूजी ,बाबा रामदेव जी तेजाजी इत्यादि लोकदेवाताओं पर भजन गाये जाते है। ढोली समुदाय के लोग ब्याह शादियों में अपना संगीत प्रस्तुत करते है साथ ही समुदाय के लोग विशेषरूप से माजीसा के भजन करते हैं।

राजस्थान_मानसून के आने पर भी कई प्रकार के गाने गाये जाते है जीरा ,पुदीना ,सांगरी इत्यादि पर गीत गाये जा रहे हैं।