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World Geography

August 13, 2020

वायुदाब तथा पवन संचार Air Pressure and Wind

वायुदाब तथा पवन संचार

मौसम के सभी तत्व ( मेघ, वर्षा, आंधी, तूफान तथा पवन आदि) वायुदाब द्वारा नियंत्रित होते हैं समान ऊंचाई पर स्थित दो स्थानों के बीच वायुदाब के परिवर्तन की दर को वायुदाब प्रवणता कहते हैं। वायु के क्षेतिज गति का मूल कारण वायुदाब प्रवणता है

विक्षेप बल ( Deflection force ) – पृथ्वी के अक्षीय गति(rotation) के कारण हवाओं की दिशा में विक्षेप हो जाता है। इस कारण परिवर्तनकारी बल को विक्षेप बल या कोरियालिस बल कहते हैं। इस बल के कारण ही उत्तरी गोलार्ध में सभी हवाएं प्रवणता की दिशा की दाहिनी ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में बाई ओर मुड़ जाती है।

पृथ्वी के धरातल पर क्षेतिज पवनें दाब प्रवणता प्रभाव, घर्षण बल एवं कोरियालिस बल प्रभावों का संयुक्त परिणाम है विषुवत वृत्त के निकट उष्णकटिबंधीय चक्रवात नहीं बनते है क्योकि विषुवत वृत्त पर कोरियालिस बल शून्य होता है और अपने समदाब रेखाओं के समकोण पर बहती है। अतः निम्न दाब क्षेत्र और अधिक गहन होने के बजाए पूरित हो जाती है। यही कारण है कि विषुवत वृत्त के निकट उष्णकटिबंधीय चक्रवात नहीं बनते हैं।

पवन, वायुदाब, कॉरिऑलिस प्रभाव ( Wind, air pressure, coriolis effect )

पवन ( Wind )

पृथ्वी के धरातल पर वायुदाब में क्षैतिज विषमताओं के कारण हवा उच्च वायुदाब क्षेत्र से निम्न वायुदाब क्षेत्र की ओर बहती है. क्षैतिज रूप से इस गतिशील हवा को पवन कहते हैं. ऊर्ध्वाधर दिशा में गतिशील हवा को वायुधारा कहते हैं.

अगर पृथ्वी स्थिर होती और उसका धरातल समतल होता तो पवन उच्च वायुदाब वाले क्षेत्र से सीधे निम्न वायुदाब वाले क्षेत्र की ओर समदाब रेखाओं पर समकोण बनाती हुई चलती. पर वास्तविक स्थिति यह है कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूर्णन कर रही है और उसका धरातल समतल नहीं है. पवन कई कारणों से अपनी दिशा में परिवर्तन करती हुई चलती हैं.

ये कारण हैं- दाब प्रवणता बल, कॉरिऑलिस प्रभाव (Coriolis effect), अभिकेंद्रीय त्वरण और भू-घर्षण.

कॉरिऑलिस प्रभाव ( Coriolis effect ) –

पृथ्वी के घूर्णन के कारण पवनें अपनी मूल दिशा में विक्षेपित हो जाती हैं. इसे कॉरिऑलिस बल कहते हैं. इसका नाम फ्रांसीसी वैज्ञानिक के नाम पर पड़ा है. इन्होने सबसे पहले इस बल के प्रभाव का वर्णन 1835 में किया था.

पवन निम्न प्रकार की होती हैं:

1. प्रचलित पवन ( The prevailing wind )
2. मौसमी पवन ( Seasonal Wind )
3. स्थानीय पवन ( Local Wind )

प्रचलित पवन ( The prevailing wind )

पृथ्वी के विस्तृत क्षेत्र पर एक ही दिशा में वर्ष भर चलने वाली पवन को प्रचलित पवन या स्थायी पवन कहते हैं. स्थायी पवनें एक वायु-भार कटिबन्ध से दूसरे वायु-भार कटिबन्ध की ओर नियमित रूप से चला करती हैं. इसके उदाहरण हैं- पछुआ पवन, व्यापारिक पवन और ध्रुवीय पवन.

(a) पछुआ पवन ( Pachua wind )

दोनों गोलार्द्धो में उपोष्ण उच्च वायुदाब कटिबंधो से उपध्रुवीय निम्न वायुदाब कटिबंधों की ओर चलने वाली स्थायी हवा को, इनकी पश्चिम दिशा के कारण पछुआ पवन कहते हैं. पछुआ पवन का सर्वश्रेष्ठ विकास 40 डिग्री से 65 डिग्री दक्षिण अक्षांशों के मध्य पाया जाता है. यहां के इन अक्षाशों को गरजता चालीसा, प्रचण्ड पचासा और चीखता साठा कहा जाता है. ये सभी नाम नाविकों के दिए हुए हैं.?

(b) व्यापारिक पवन ( Commercial wind )

लगभग 30 डिग्री उत्तरी और दक्षिणी अक्षांशों के क्षेत्रों या उपोष्ण उच्च वायुदाब कटिबंधो से भूमध्य रेखीय निम्न वायुदाब कटिबंधों की ओर दोनों गोलार्द्धों में वर्ष भर निरंतर प्रवाहित होने वाले पवन को व्यापारिक पवन कहा जाता है.

(c) ध्रुवीय पवन ( Polar wind )

ध्रुवीय उच्च वायुदाब की पेटियों से उपध्रुवीय निम्न वायुदाब की पेटियों की ओर प्रवाहित पवन को ध्रुवीय पवन के नाम से जाना जाता है. उत्तरी गोलार्द्ध में इसकी दिशा उत्तर- पूर्व से दक्षिण- पश्चिम की ओर वहीं दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिण- पूर्व से उत्तर- पश्चिम की ओर है.?

मौसमी पवन ( Seasonal Wind )

मौसम या समय के परिवर्तन के साथ जिन पवनों की दिशा बदल जाती है उन्हें मौसमी पवन कहा जाता है. जैसे- मॉनसूनी पवन, स्थल समीर और समुद्री समीर.

स्थानीय पवन ( Local Wind )

गर्म हवाएं एवं प्रवाह क्षेत्र ( Hot air and flow area )

चिनुक ( Chinuk ) –  यह संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में रॉकी पर्वत श्रेणी के पूर्वी ढाल के साथ चलने वाला गर्म या शुष्क पवन है. यह पवन रॉकी पर्वत के पूर्व के पशुपालकों के लिए बड़ा ही लाभदायक है.

फॉन ( Phon ) –  यह आल्पस पर्वत के उत्तरी ढाल से नीचे उतरने वाली गर्म और शुष्क हवा है. इसका सर्वाधिक प्रभाव स्विट्जरलैंड में होता है. इसके प्रभाव से अंगूर जल्दी पक जाते हैं.

 हरमट्टन ( Harampton ) – यह सहारा रेगिस्तान में उत्तर- पूरब दिशा में चलने वाली गर्म और शुष्क हवा है. यह पवन सहारा से गिनी तट की ओर बहती है.

सिरॉको ( Siraco ) – यह सहारा मरुस्थल से भूमध्य सागर की ओर बहने वाली गर्म हवा है. इसके अन्य स्थानीय नाम भी हैं. जैसे- मिस्र में इसे खमसिन, लीबिया में गिबिली, ट्यूनिशिया में चिली, मैड्रिया में लेस्ट, इटली में सिरॉको और स्पेन में लेबेक कहते हैं.

सिमूम (Simum )

 यह अरब रेगिस्तान में बहने वाली गर्म और शुष्क हवा है.

ब्लैक रोलर (Black roller )-  यह उत्तरी अमेरिका के विशाल मैदान में दक्षिणी- पश्चिमी या उत्तरी पश्चिमी में तेज धूल भरी चलने वाली आंधी है.

ब्रिक फील्डर ( Brick Fielder )- यह ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया प्रांत में चलने वाली गर्म और शुष्क हवा है.

नारवेस्टर ( Narvester )– यह न्यूजीलैंड में उच्च पर्वतों से उतरने वाली गर्म और शुष्क हवा है.

शामल ( Shamal )- यह इराक और फारस का खाड़ी में चलने वाली गर्म और शुष्क हवा है.

साण्टा आना – यह दक्षिणी कैलीफोर्निया में साण्टा आना घाटी से चलने वाली गर्म और शुष्क भरी धूल आंधी है.

कोयमबैंग( Coimbang ) –  यह जावा इण्डोनेशिया में बहने वाली गर्म हवा है. यह तम्बाकू की खेती को काफी नुकसान पहुंचाती है.

जेट-प्रवाह (Jet Streams) –  क्षोभमंडल की ऊपरी परत में बहुत तीव्र गति से चलने वाले संकरे, नलिकाकार और विसर्पी पवन प्रवाह को जेट- प्रवाह कहते हैं. यह 6 से 12 किमी की ऊंचाई पर पश्चिम से पूर्व की ओर प्रवाहित होता है. यह दोनों गोलार्द्धों में पाया जाता है.

  • खसमिन:- मिस्र के उत्तरी भाग
  • बर्ग:-पश्चिम अफ्रीका
  • जोंड़ा:- ऍंडीज के मैदानी भाग
  • सैंटाएना :-कैलिफोर्निया
  • हबूब:- उत्तरी सूडान

ठंडी हवाएं- प्रवाहित क्षेत्र ( Cool wind and flowing area )

  • मिस्ट्रल :-फ्रांस एवं रोन घाटी
  • बोरा:- एड्रियाटिक सागर
  • बुरान:- रूस मध्य एशिया
  • नार्दर:- U.S.A.
  • ब्लिजर्ड :-ध्रुवीय क्षेत्र
  • लेवेंटर:- स्पेन
  • बाइस:- फ़्रांस
  • पुर्गा:- रूसी टुंड्रा प्रदेश
  • पेम्पेरों:- अर्जेंटीना, चीली एवं उरुग्वे
  • ग्रेगाले:- भूमध्यसागरीय मध्यवर्ती क्षेत्र
  • जूरन:- जूरा पर्वत (स्विट्ज़रलैंड)
  • पापागायो:- मेक्सिको तट
  • दक्षिणी बर्स्टर:- न्यू साउथ वेल्स (ऑस्ट्रेलिया)
  • पोन्नत:- कोर्सिका तट फ्रांस

कुछ अन्य गर्म हवाएं ( Some other hot winds )

          नाम           स्थान

  • ट्रैमोण्टेन = मध्य यूरोप
  • अयाला = फ्रांस
  • वर्गस = दक्षिण अफ्रीका
  • सुखोवे = रूस और कजाखस्तान
  • बाग्यो = फिलीपींस द्वीप- समूह
  • गारिच = दक्षिण पूर्वी ईरान
  • लू = उत्तर भारत
  • सोलैनो = दक्षिण पूर्वी स्पेन
  • सामून = ईरान

पवनो के बारे में कुछ तथ्य

1 फोहन- यूरोप के आल्प्स पर्वत से गर्म हवा
ट्रिक फोन आसी

2 हरमट्टन- उत्तरी अफ्रीका के गिन्नी की खाड़ी में गर्म हवा इसे डॉक्टर भी कहते है
ट्रिक हरफुल डॉक्टर

3 मिस्ट्रल- फ्रांस में चलने वाली ठंडी पवन
ट्रिक मिस्टर फ्रांस

फेरल का नियम ( Ferrel law )

पवन सदा उच्च दाब से निम्न दाब की तरफ चलती है लेकिन पृथ्वी के घूर्णन से उत्पन्न कॅरिआलिस बल के कारण ये पवन सीधी नही चलती बल्कि उत्तरी गोलार्ध में पवन अपने दाहिनी तरफ व दक्षिणी गोलार्ध में पवन अपने बायीं तरफ विक्षेपित हो जाती है यह नियम फ्रांसीसी वैज्ञानिक फेरल ने दिया था।

Air Pressure and Wind important facts

  • कैटाबेटिक(अवरोही) पवन – उच्च पठारों एवं हिम क्षेत्रों से घाटी में बहने वाली ठंडी वायु को अवरोही पढ़ने कहते हैं।
  • दक्षिणी दोलन –  पश्चिमी तथा पूर्वी प्रशांत महासागर में वायुदाब की स्थितियों में बदलाव को ही दक्षिणी दोलन कहा जाता है।
  • मौसम विज्ञान में जेट स्ट्रीम हवाओं की खोज एक नवीन युग के प्रादुर्भाव का घोतक है-?
  • जेट स्ट्रीम की खोज – द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिकी बमवर्षक बी- 29 युद्धक विमानों द्वारा जापान की ओर उड़ान भरते समय शोभमंडल में।
  • जेट धाराओं का सर्वाधिक औसत वेग – धरातल पर स्थित उपोxxष्णकटिबंधीय क्षेत्र के ऊपर होता है।
  • व्यापारीक तथा पछुआ हवाओं के बीच विभाजन का कार्य – अश्व अक्षांश या उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटियां
  • पूरवा हवाओं की दिशा – उत्तरी गोलार्ध में उत्तरी पूर्व तथा दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिणी पूर्व
  • दक्षिणी गोलार्ध मेक इन हवाओं को गरजती चालीसा, भयंकर पचासा एवं चीखता साठा की उपमा दी गई है- पछुआ पवन को
  • शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति – पछुवा पवन के ध्रुवीय वाताग्र पर
  • 24 घंटे के अंदर दो बार दिशा परिवर्तित करने वाले मानसून हवाओं को संज्ञा दी – स्थलीय तथा सागरीय समीर।
  • सागरीय समीर सर्वाधिक समय सक्रिय रहता है-  1:00 से 2:00 बजे अपराहन
  • वायुदाब का सर्वप्रथम अध्ययन किया- आटोपन गेरिक ने
  • सर्वाधिक वायुदाब– साइबेरिया के इर्कुटास्क
  • न्यूनतम वायुदाब – मारियाना द्वीप के पश्चिम में
  • वायुदाब घटने की सामान्य दर – 10 मी की ऊंचाई पर 1 MB
  • वायुमंडलीय दाब को दर्शाया जाता है  – समदाब रेखाओ(आइसोबार) द्वारा

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August 13, 2020

भू आकृति विज्ञान क्या हे Geomorphology

भू-आकृति विज्ञान का परिचय ( Introduction to Geomorphology ) :-

भू- आकृति विज्ञान शब्द अंग्रेजी भाषा के शब्द geomorphology का हिन्दी पर्याय है, जिसकी उत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द geo- earth (पृथ्वी), morphi- form (रूप) तथा logos- discourse (वर्णन) से मिलकर बना है। इसका भावार्थ है- ‘स्थलरूपों का अध्ययन’।
इसके अंतर्गत ग्लोब के स्थलमण्डल के उच्चावचों, उनके निर्माणक प्रक्रमों तथा उनका मानव के साथ अन्तर्सम्बंधों का अध्ययन किया जाता है।

यद्यपि इसका प्रारम्भिक अध्ययन ग्रीक, युनान, मिस्र आदि में 500 ई. पू. प्रारम्भ हो गया था तथापि इसका आधुनकि रूप एवं विधितंत्रात्मक अध्ययन 20 वी शदी में ही विकसित हो सका।

इसका प्रारम्भ सन् 1945 ई. आर. ई. हार्टन द्वारा जलीय उत्पत्ति वाली अपवाह बेसिन की आकारमितिक विशेषताओं के विश्लेषण में मात्रात्मक विधियों के साथ ही हुआ है।

भू आकृति

परिभाषा ( definition):-

वारसेस्टर के अनुसार- ” भू- आकृति विज्ञान पृथ्वी के उच्चवचों का व्याख्यात्मक वर्णन है।” (Geomorphology is the interpretive description of the relief features,)

थार्नबरी के अनुसार- “भू- आकृति विज्ञान स्थलरूपों का विज्ञान है परन्तु इसमें अन्त: सागरीय रूपों को भी सम्मिलित किया जाता है।”

स्ट्रालर के अनुसार:- “भू- आकृति विज्ञान सभी प्रकार के स्थलरूपों के उत्पत्ति तथा उनके व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध विकास की व्याख्या करता है तथा यह भौतिक भूगोल का एक प्रमुख अंग है।”

ए. एल. ब्लूम के अनुसार:- ” भू- आकृति विज्ञान स्थलाकृतियों तथा उन्हें परिवर्तित करने वाले प्रक्रमों का क्रमबद्द वर्णन एवं विश्लेषण किया करता है।

विषय क्षेत्र:-

पृथ्वी पर तीन प्रकार के उच्चावच पाये जाते हैं-
1- प्रथम श्रेणी उच्चावच:- इसके अन्तर्गत महाद्वीप एवं महासागरीय बेसिन को शामिल किया जाता है।
2- द्वितीय श्रेणी के उच्चावच:- पर्वत, पठार, मैदान तथा झील आदि द्वितीय श्रेणी के उच्चावच हैं।
3- तृतीय श्रेणी उच्चावच:- सरिता, सागरीय जल, भूमिगत जल, पवन, हिमनद आदि के कारण उत्पन्न स्थलाकृतियों को तृतीय श्रेणी उच्चावच कहते हैं।

भू-आकृति विज्ञान के विषयक्षेत्र के अन्तर्गत उपर्युक्त तीन प्रकार के स्थलरूपों को शामिल किया जाता है

  1. व्यावहारिक भू आकृति 
  2. विज्ञान, 
  3. पर्यावरण भू आकृति विज्ञान 

भू आकृति विज्ञान की 19वीं सदी में स्वतंत्र शाखा के रुप में स्थापित होते हैं उसका विषय क्षेत्र बढ़ता गया वर्तमान समय में इसका अध्ययन व्यवहारिक दृष्टिकोण से भी किया जाता है

सन 1980 के दशक में प्रगतिशील इस विषय का प्रारंभिक स्वरूप भौतिक पर्यावरण की सतही सरंचना को स्पष्ट कर इसके अध्ययन को मानव जीवन के लिए उपयोगी बनाने हेतु क्रमिक व सैद्धांतिक पर बल दिया गया

19वीं शताब्दी के प्रारंभ में प्रसिद्ध अमेरिकन भू आकृति वैज्ञानिक पावेल डटन गिल्बर्ट आदि ने संयुक्त राज्य अमेरिका सरकार के अधीन पश्चिमी क्षेत्र के विकास हेतु सर्वेक्षण कार्य कर रहे थे  

इसी प्रकार हर्टन आधुनिक मात्रात्मक भू-आकृति विज्ञान का संस्थापक माना जाता है 1930 में उत्पन्न धुलिय तूफान की स्थिति उत्पन्न होने पर मृदा संरक्षण की दशा में कार्य करने वाले विद्वान थे

 इन सभी विद्वानों ने समग्र रूप से भू आकृति विज्ञान के व्यावहारिक पक्ष को विकसित करने का सराहनीय कार्य किया

पृथ्वी की उत्पत्ति व भूगार्भिक इतिहास (Earth’s origins and geological history)

पृथ्वी की उत्पत्ति के सम्बन्ध में सर्वप्रथम तर्कपूर्ण परिकल्पना का प्रतिपादन फ्रांसीसी वैज्ञानिक कास्त-ए-बफन द्वारा 1749 ई. में किया गया। पृथ्वी एवं अन्य ग्रहों की उत्पत्ति के सन्दर्भ में 2 प्रकार की संकल्पनाएं दी गयीं-

  1. अद्वैतवादी परिकल्पना
  2. द्वैतवादी परिकल्पना

अद्वैतवादी परिकल्पना में कांट की गैसीय परिकल्पना तथा लाप्लास की निहारिका परिकल्पना का वर्णन किया गया है। द्वैतवादी संकल्पना में चैम्बरलिन व् मोल्टन की ग्रहाणु परिकल्पना, जेम्स जींस (1919 ई.) व जेफ्रीज (1921 ई.) की ज्वारीय परिकल्पना के बारे में बताया गया है।

पृथ्वी का भूगर्भिक इतिहास (Earth’s geologic history)

रेडियो सक्रिय पदार्थों के अध्ययन के द्वारा पृथ्वी की आयु की सबसे विश्वसनीय व्याख्या नहीं हो सकी है। इन पदार्थों के अध्ययन के आधर पर पियरे क्यूरी एवं रदरफोर्ड ने पृथ्वी की आयु को 2-3 अरब वर्ष अनुमानित की है।

आदी कल्प की चट्टानों में ग्रेनाइट तथा नीस की प्रधानता है। इन शैलों में जीवाश्मों का पुर्णतः आभाव है।

इनमें सोना तथा लोहा पाया जाता है, भारत में प्री-कैम्ब्रियन कल में अरावली पर्वत व् धारवाड़ चट्टानों का निर्माण हुआ था।

प्राचीनतम अवसादी शैलों एवं विन्ध्याचल पर्वतमाला का निर्माण कैम्ब्रियन काल में हुआ। अप्लेशियन पर्वतमाला का निर्माण आर्डोविसियन काल में हुआ। 

पर्मियन युग में हर्सीनियन पर्वतीकरण हुए जिनसे स्पेनिश मेसेटा, वोस्जेस, ब्लैक फारेस्ट, अल्लवाई, विएनशान जैसे पर्वत निर्मित हुए।

ट्रियासिक काल को रेंगने वाले जीवों का काल कहा जाता है, गोंडवाना लैण्ड भूखंड का विभाजन इसी कल में हुआ, जिससे अक्रिका, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी भारत तथा दक्षिणी अमेरिका के ठोस स्थल बने। 

कृटेशियन काल में एंजियोस्पर्म पौधों का विकास प्रारंभ हुआ। इसी काल में भारत के पठारी भागों में लावा का दरारी उदभेदन हुआ। सनोजोइक काल को टर्शियरी युग भी कहा जाता है।

भूगर्भ की प्रमुख असम्बद्धताएं असम्बद्धताएं स्थिति (लगभग) गहराई (किमी.) कोनार्ड असम्बद्धतावाह्य एवं आतंरिक भूपटल के मध्य-मोहो असम्बद्धताभूपटल एवं मेंटल के मध्य30-35रेपेटी असम्बद्धतावाह्य एवं आतंरिक मेंटल के मध्य700 गुटेबर्ग-बाइचर्टमेंटल एवं कोर के मध्य2900 लेहमैन असम्बद्धता आतंरिक तथा वाह्य कोर के मध्य 500

पृथ्वी की विभिन्न परतों का संघटन एवं भौतिक गुण परतें सापेक्षिक घनत्व गहराई तत्व भौतिक गुण

  1. बहरी सियाल 2.75-2.901. महाद्वीप के नीचे ६० किमी. तक
  2. 2. अटलांटिक महासागर के नीचे 29 किमी तक
  3. 3. प्रशांत महासागर के नीचे अत्यल्प गहराई तक

मुख्य रूप से सिलिका और अल्युमिनियम तथा अन्य तत्व ऑक्सीजन, पोटैशियम, मैग्नीशियम ठोस भीतरी

  1. सियाल परत4.751. 60 किमी. गहराई तक
  2.  60-1200 किमी. गहराई तक

मुख्यतः सिलिका, मैग्नीशियम, कैल्सियम, अल्युमिनियम, पोटैशियम, सोडियमप्लास्टिक नुमामिश्रित परत4.75-5.0, सीमा की उपरी अर्द्ध ठोस तथा निचली ठोस परत का मिश्रण1200-2900 किमी.ऑक्सीजन, सिलिका मैग्नीशियम, लोहे का भरी मिश्रण तथा निकिलप्लास्टिक नुमाकेन्द्रक7.8-11.02900-6378निकिल तथा लोहाठोस या तरल

उत्तर भारत के विशाल मैदान की उत्पत्ति नवजीवी महाकल्प में हुई। पृथ्वी पर उड़ने वाले पक्षियों का आगमन प्लीस्टोसीन काल में हुआ तथा मानव एवं स्तनपायी जीव इसी कल में विकसित हुए।

1921 में अल्फ्रेड वेगनर ने सम्पूर्ण विश्व की जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी समस्या को सुलझाने के लिए अपना महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत प्रस्तुत किया।

इन्होंने प्रमाणों के आधार पर यह मान लिया कि कार्बोनिफेरस युग तक सम्पूर्ण महाद्वीप एक में मिले हुए थे, जिसे इन्होंने पैन्जिया नाम दिया।

1926 में हैरी हेस ने प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत प्रस्तुत किया। भू-पटल और उसके नीचे की अनुपटल को सम्मिलित रूप से स्थल खंड कहलाते हैं।

7 बड़ी एवं 20 छोटी भू-प्लेटों में विभक्त हैं। पृथ्वी के स्थलमंडल की मुख्य प्लेटें इस प्रकार हैं-

  1. यूरेशियन प्लेट
  2. इन्डियन प्लेट
  3. अफ़्रीकी प्लेट
  4. अमेरिकी प्लेट
  5. अंटार्कटिक प्लेट

अफ्रीका की ग्रेट रिफ्ट वैली अपसारी विवर्तनिकी का अच्छा उदाहरण है। अभिसारी विवार्त्मिकी से अन्तःसाgरीय खण्ड एवं गर्त उत्पन्न होते हैं।

अभिसारी विवर्तनिकी से प्लेटों पर विनाशात्मक भूकम्पों की बाहुल्यता रहती है।

पृथ्वी की आतंरिक संरचना ( Internal structure of the earth )

भूपर्पटी ( Earth’s crust )

यह पृथ्वी के आयतन का 0.5% घेरे हुए है।  मेंटल भूपर्पटी के नीचे है और पृथ्वी के आयतन का 83% भाग घेरे हुए है। सियाल ऊपर की भूपर्पटी है

पृथ्वी का सबसे उपरी भाग रासायनिक बनावट एल्युमिनियम अवसादी एवं ग्रेनाइट चट्टानों की प्रधानता है।

महाद्वीप की रचना सियाल में मानी जाती है। सीमा – मेंटल

सिलिकन (Si) और मैग्नीशियम (Mg) तत्वों की प्रधानता

इसी परत से ज्वालामुखी विस्फोट के समय लावा बाहर आता है। मेंटल भूपटल के मध्य असम्बद्ध सतह है, जिसकी खोज ए. मोहलोविस ने की थी। इसे मोहलोविस असंबद्धता कहते हैं।

निफे – कोर ( Niffe – core )

पृथ्वी का केन्द्रीय भाग है। इसकी रचना निकेल और लोहे से हुई है।

पृथ्वी का कोर भाग ठोस है, कोर भाग पर आच्छादित परते अर्द्ध-ठोस या प्लास्टिक अवस्था में हैं। एस्थेनोस्फीयर विशेष परत न होकर मेंटल का ही भाग है।

अन्तरम या क्रोड पृथ्वी का सबसे आंतरिक भाग है, जो मेंटल के नीचे पृथ्वी के केंद्र तक पाया जाता है। इसे बेरीस्फीयर भी कहा जाता है।

चट्टान ( Rock )

धरातल से 16 किमी. की गहराई तक 95% भूपर्पटी चट्टानों से निर्मित है। लगभग 2000 विभिन्न खनिजों में 12 खनिज ऐसे हैं, जिन्हें चत्त्तन बनाने वाले खनिज कहते हैं।

इनमें सिलिकेट सबसे महत्वपूर्ण है। पृथ्वी की सतह का निर्माण करने वाले सभी पदार्थ चट्टान या शैल कहलाते हैं।

आग्नेय शैल-

को प्राथमिक चट्टान व् ज्वालामुखी चट्टान भी कहते हैं। आग्नेय शैलों में लोहा, मैग्नीशियम युक्त सिलिकेट खनिज अधिक होते हैं।

आग्नेय शैलों में पाए जाने वाले खनिज हैं- चिम्ब्कीय खनिज, निकेल, तांबा, सीसा, जस्ता, सोना, हीरा तथा प्लैटिनम।

बेसाल्ट चट्टान के क्षरण से काली मिट्टी का निर्माण होता है, जिसे रेगुर कहते हैं।

आग्नेय चट्टानों में जीवाश्म नहीं पाए जाते हैं। बेसोलिथ सबसे बड़े आतंरिक चट्टानी पिंड हैं।

यू.एस.ए. इदाहो बेसोलिथ, प. कनाडा का कोस्ट रेंज बेथोलिया मूलतः ग्रेनाइट के बने हैं। आग्नेय शैल – द्रवित मैग्मा के जमने के जमने से –

उदाहरण भारत का दक्कन पठार (दक्कन ट्रैप) ग्रेनाइट, बेसाल्ट आदि इसके उदाहरण हैं।अत्यधिक कठोर व् भारी।

अवसादी चट्टानों- 

में क्षैतिज रूप से जमने वाले मैग्मा को सिल कहा जाता है। अवसादी चट्टानी प्रदेश में लम्बवत रूप से लगने वाला मैग्मा डाइक कहा कहलाता है।

खनिज तेल अवसादी शैलों के अंतर्गत आता है। वायु निर्मित शैलों में लोयस प्रमुख हैं, जबकि हिमानीकृत शैलों में मोरेन प्रमुख है।

नाइस का उपयोग इमारती पत्थर के रूप में होता है। क्वार्टजाइट का प्रयोग कांच बनाने में किया जाता है।

विखंडित ठोस पदार्थों के निक्षेपण से या जीव जंतुओं और पेड़- पौधों के जमाव से।

उदाहरण- चुना पत्थर, बलुआ पत्थर, सेलखड़ी, डोलोमाइट, कोयला, पीट आदि। जीवाश्म पाए जाते हैं। कठोर व भारी

कायांतरित शैल-  

अत्यधिक ताप व् दबाव के कारण आग्नेय या अवसादी के रूप परिवर्तन से।

उदाहरण- नाइस, क्वार्टजाइट, संगमरमर, प्लेट, ग्रेफाइट। जीवाश्म नहीं पाए जाते हैं। कम कठोर व कम भारी

भ्रंशन- 

दो भ्रंशों के बीच धंसी हुई भूमि को भ्रंश घाटी कहा गया है, यह लम्बी, संकरी और गहरी हुआ करती है।

जर्मन भाषा में इसे गैब्रन कहते है। वास्जेस और ब्लैक फारेस्ट नामक पर्वतों के बीच यूरोप की प्रसिद्द भ्रंश घाटी है,

जिसमे राइन नदी प्रवाहित होती है। एशिया स्थित जार्डन की प्रसिद्ध भ्रंशघाटी समुद्र तल से भी नीची है।

मृत सागर नामक झील भ्रंश घाटी में स्थित है। संसार की सबसे लम्बी भ्रंश घाटी जार्डन घाटी से आरम्भ होकर लाल सागर और पूर्वी अफ्रीका की जाम्बेजी नदी तक विस्तृत है।

असम की ब्रह्मपुत्र घाटी रैम्प घाटी का उदाहरण है, जो हिमालय पर्वत और असम पठार के मध्य स्थित है।

यूरोप का हार्स, ब्लैक फारेस्ट और बास्जेज भ्रंशोत्थ पर्वत के उदाहरण हैं।

Geomorphology important facts 

  • डाइक – दीवार के समान खड़ी आग्नेय चट्टान।
  • पृथ्वी के स्थलमंडल का लगभग ¾ भाग अवसादी शैलों से ढका है।
  • पवन द्वारा दूर तक ढोए महीन बालू के कणों से निर्मित अवसादी चट्टान का अच्छा उदाहरण लोएस है, जो उत्तर-पश्चिम चीन में पाया जाता है।
  • हिमानी द्वारा निर्मित अवसादी चट्टान का उदाहरण है- गोलाश्म मृत्तिका।
  • सेंधा नमक, जिप्सम तथा शोरा , रासायनिक विधि से बनी अवसादी चट्टानों के उदाहरण हैं।
  • धरातल के एक भाग का अपनी समीपी सतह से उठ जाने को उत्थान या उभार कहते हैं।
  • भारत में कच्छ खाड़ी की लगभग 24 किमी. भूमि ऊपर उठ गयी है। यह भूमि अल्ला बांध के नाम से प्रसिद्ध है।
  • धरातल के एक भाग का अपने समीपी सतह से नीचे धंस जाना निमज्जन कहलाता है।
  • अलास्का, कनाडा और ग्रीनलैंड के किनारे डूबी हुई घटिया पाई जाती हैं एवं गंगा के डेल्टाई भाग में भी कोयले की तहें समुद्रतल से अधिक गहराई पर मिलती हैं।
  • हिमालय आल्पस आदि पर्वतों से अधिक्षिप्त वलन प्रकार के ग्रीवा खंड मिलते हैं। ग्रीवा खंड भूपटल पर जटिल संरचना का परिचायक है।
  • भू आकृति विज्ञान के विषयों का विकास क्रम जारी रहा तथा प्राचीन काल से अध्ययन होता आ रहा है
  • व्यवस्थित क्रम 18वीं शताब्दी के अंत में आरंभ हुआ जब जेम्स हटन ने 1785 में रॉयल ज्योग्राफिकल सोसाइटी ऑफ एडिनबर्ग ने अपना शोध पत्र पढ़ा था

  • इन्होंने एकरूपतावाद के सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए बताया कि वर्तमान भूत की कुंजी है
  • चार्ल्स लॉयल हटन के एकरूपतावाद के महान व्याख्याता रहे हैं इसकी विस्तृत विवेचना अपनी पुस्तकें प्रिंसिपल ऑफ जियोलॉजी में की थी
  • हटन महोदय ने ही सर्वप्रथम पृथ्वी के इतिहास में चक्रीय अवस्था का प्रतिपादन किया थाइसी कारण यह कहा जाता है कि न तो आदि का पता है और ना ही अंत का भविष्य
  •  हटन को भू आकृति विज्ञान का जन्मदाता माना जाता है
  • डी कार पेंटर हिमानी सिद्धांत का प्रतिपादन किया था
  • सर्वप्रथम डेविस महोदय ने भू संतुलन नाम दिया था

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August 13, 2020

वायुमंडल का संगठन एवं संरचना Atmosphere Structure

वायुमंडल का संगठन एवं संरचना ( Atmosphere Structure )

वायुमंडल विभिन्न प्रकार के गैसों का मिश्रण है वायु पृथ्वी के द्रव्यमान का अभिन्न भाग है

तथा इसके कुल द्रव्यमान का 99% पृथ्वी की सतह से 32 किलोमीटर की ऊंचाई तक है वायु रंगीन तथा गंधहीन होती है

तथा जब यह पवन की तरह बहती है तभी हम इसे महसूस कर सकते हैं

वैज्ञानिक के अनुसार शुरूआत मे पृथ्वी से हिलियम व हाइड्रोजन जैसी बहुत ही हल्की गैसो के अलग हो जाने से वायुमंडल का निर्माण हुआ होगा 

जलवायु शास्त्र के वैज्ञानिक क्रिचफिल्ड के अनुसार वर्तमान वायुमंडल 50 करोड़ पुराना हे

वायुमंडल का संगठन

वायुमंडल में जलवाष्प और धूल कणों से बना है वायुमंडल की ऊपरी परतों में गैसों का अनुपात इस प्रकार बदलता है

जैसे कि 120 किलोमीटर की ऊंचाई पर ऑक्सीजन की मात्रा नगण्य हो जाती है

इसी प्रकार कार्बन डाइऑक्साइड वह जलवाष्प पृथ्वी की सतह पर 90 किलो मीटर की ऊंचाई तक ही पाए जाते हैं

गैस ( Gas )

 कार्बन डाइऑक्साइड – मौसम विज्ञान की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण गैस है क्योंकि यह सौर विकिरण के लिए पारदर्शी है लेकिन पार्थिव विकिरण के लिए अपारदर्शी है

यह सौर विकिरण के एक अंश को सोख लेती है तथा इसके कुछ भाग को पृथ्वी की सतह की ओर प्रतिबंधित कर देती है यह ग्रीन हाउस प्रभाव के लिए पूरी तरह उत्तरदाई है

दूसरी गैसों का आयतन स्थिर है जबकि पिछले कुछ दशकों में मुख्यतः जीवाश्म ईंधन को जलाए जाने के कारण कार्बन डाइऑक्साइड के आयतन में लगातार वृद्धि हो रही है किसने हवा के ताप को भी बढ़ा दिया है

ओझोन – वायु मंडल का दूसरा महत्वपूर्ण घटक है जो पृथ्वी की सतह से 10 से 50 किलोमीटर की ऊंचाई के बीच पाया जाता है

यह फिल्टर की तरह कार्य करता है तथा सूर्य से निकलने वाली पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर उनको पृथ्वी की सतह पर पहुंचने से रोकता है

जलवाष्प ( Water Vapour )

जलवायु वायुमंडल में उपस्थित ऐसी परिवर्तनीय गैस है जो ऊंचाई के साथ घटती जाती है गर्म तथा आद्र उष्ण कटिबंध में यह हवा के आयतन का 4% होता है

जबकि ध्रुव जैसे ठंडे, व रेगिस्तान जैसे शुष्क प्रदेशों में यह हवा के आयतन के 1% भाग से भी कम होती है

विषुववृत्त से ध्रुव की तरह जलवाष्प की मात्रा कम हो जाती है यह सूर्य से निकलने वाले ताप के कुछ भाग को अवशोषित करती हैं

तथा पृथ्वी से निकलने वाले ताप को संग्रहित करती है इस प्रकार यह एक कंबल की तरह कार्य करती है तथा पृथ्वी को ना अधिक गर्म तथा ना अधिक ठंडा होने देती है

यह जलवाष्प वायु को स्थिर और अस्थिर होने में योगदान देती है

धूलकण ( Dust Particle )

वायुमंडल में छोटे-छोटे ठोस कणों को भी रखने की क्षमता होती है यह छोटे कर्ण जैसे समुद्री नमक मिट्टी धुआ की कालिमा राख पराग धूल तथा उल्काओं के टूटे हुएकण से निकलती है 

 धूल व नमक के कारण आद्रता ग्राही केंद्र की तरह कार्य करते हैं  जिसके चारों ओर जल वाष्प संघनित होकर मेघों का निर्माण करती है

वायुमंडल की संरचना

वायुमंडल अलग-अलग घनत्व तथा तापमान वाली विभिन्न परतों का बना होता है तापमान की स्थिति के अनुसार वायुमंडल को 5 भागों में बांटा गया क्षोभमंडल, समताप मंडल, मध्य मंडल, बाह्यमंडल , बहिर्मंडल

1 क्षोभमण्डल – ये वायुमण्डल की सबसे निचली परत हे, जो पृथ्वी से 14 कि. मी तक मानी जाती हे
2 समताप मण्डल – इसकी शुरूआत क्षोभमण्डल से होती हे जो 30 कि. मी तक मानी जाती है  
3 मध्य मण्डल – यह 30 कि. मी से होकर 60 कि.मी की ऊँचाई पर स्थित हे इसे ओजोन मण्डल भी कहा जाता हे
4 ताप मण्डल  – मध्य मण्डल के बाद वायुमण्डलीय घनत्व कम हो जाता हे Iयहा से तापमान बढ़ने लगता हे 
5 बर्हिमण्डल – यह वायुमंडल की सबसे ऊपरी परत हेI इसकी ऊँचाई 600 से 1000 किमी तक मानी जाती है  इसके पश्चात अंतरिक्ष प्रारम्भ हो जाता है

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August 13, 2020

सूर्य ताप व पृथ्वी का उष्मा बजट Sunlight and earth’s heat budget

सूर्यताप व पृथ्वी का उष्मा बजट ( Sunlight and earth’s heat budget)

 पृथ्वी सूर्य से ऊर्जा प्राप्त करके उसे अंतरिक्ष में विकृत कर देती है, इसी कारण ना तो पृथ्वी ज्यादा गर्म और और ना ज्यादा ठंडी होती है, पृथ्वी के प्रत्येक भाग पर ताप की मात्रा अलग-अलग होती है और इसी वजह वायुमंडल के दाब में भिन्नता पाई जाती है इसी कारण पवनों के द्वारा ताप का स्थानांतरण एक स्थान से दूसरे स्थान पर होता है 

 पृथ्वी की सतह पर प्राप्त होने वाली ऊर्जा का अधिकतम भाग लघु तरंग धैर्य के रूप में आता है  पृथ्वी को प्राप्त होने वाली ऊर्जा को “आगामी सौर विकिरण या छोटे रूप में”, सूर्य तप कहते हैं वायुमंडल की सतह पर प्राप्त होने वाली ऊर्जा प्रतिवर्ष थोड़ी परिवर्तित होती है  यही कारण है पृथ्वी व सूर्य के बीच दूरी के लिए

सूर्य के चारों ओर परिक्रमा के दौरान पृथ्वी से सूर्य की दूरी, इस स्थिति को” अपसौर “का जाता है

पृथ्वी की सतह पर सूर्यताप में भिन्नता

सूर्य ताप की तीव्रता की मात्रा में प्रतिदिन हर मौसम और प्रतिवर्ष परिवर्तन होता है

सूर्यताप में होने वाले कारक

1.अक्षांशीय वितरण
2.समुद्र तल से ऊंचाई
3.समुद्र तट से दूरी
4.समुद्री धाराएं
5.प्रचलित पवनें
6.धरातल की प्रकृति
7.भूमि का ढाल
8.वर्षा एवं बादल

पृथ्वी का अक्ष सूर्य के चारों ओर परिक्रमा की समतल कक्षा में 66 पॉइंट 5 डिग्री का कोण बनाता है जो विभिन्न अक्षांशों पर प्राप्त होने वाले सूर्यताप की मात्रा को बहुत प्रभावित करता है I

तापमान का प्रतिलोमन या व्युत्क्रमण

 सामान्य स्थिति में ऊंचाई बढ़ने के साथ-साथ तापमान घटता है। परंतु कुछ विशेष परिस्थितियों में ऊंचाई बढ़ने के साथ-साथ तापमान घटने के स्थान पर बढ़ने लग जाता है। इसे ही “तापमान का व्युत्क्रमण” कहते हैं।??

कारक- स्वच्छ आकाश, लंबी रातें, शांत वायु, शुष्क वायु, हिम आदि की परिस्थितियां प्रमुख कारक है।??

वायु की निचली परतों से ऊष्मा का हास विकिरण द्वारा तेज गति से होता है, परंतु ऊपर की वायु का विकिरण द्वारा ऊष्मा का हास तुलनात्मक रुप से कम गति से होता है। अतः निचली वायु की परतें ठंडी और ऊपरी वायु की परतें अपेक्षाकृत गरम रहती है। यह परिस्थितियां पर्वतीय घाटियों में शीत ऋतु की रात्रि में अधिक देखने को मिलता है। इसीलिए वहां बस्तियां घाटियों पर ना होकर पर्वती ढलान पर होती हैं।

पृथ्वी का ऊष्मा बजट

पृथ्वी ना तो ऊष्मा को संचय करती है और ना ही हा,  पृथ्वी तापमान को स्थिर रखती है संभवत ऐसा तभी होता है, जब सूर्य विकिरण द्वारा सूर्य ताप (ऊर्जा का छोटा रूप) के रूप में प्राप्त ऊष्मा व पार्थिव विकिरण द्वारा अंतरिक्ष में संचरित ताप बराबर हो 

सूर्यताप /पार्थिव विकिरण= अंतरिक्ष में संचालित ताप 

ऊर्जा वायुमंडल से गुजरते हुए आती है तो ऊर्जा का कुछ अंश परावर्तित, प्रकीणित व अवशोषित हो जाती है  इस सौर विकिरण की इस परावर्तित मात्रा को पृथ्वी का “एल्बिडो” कहते हैं 

पृथ्वी पर ऊर्जा का स्रोत सूर्य है जिसकी पृथ्वी से औसत दूरी 15 करोड किलोमीटर  है। सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक पहुंचने में 8 मिनट 20 सेकंड का समय लगाता है। सूर्य की किरणें इस दूरी को 300000 किलोमीटर प्रति सेकंड की दर से तय करती है।

सूर्य ताप

  • सूर्य की बाहरी सतह  6000 डिग्री सेल्सियस का तापमान रहता है। सूर्य में लगातार ऊर्जा बनने की प्रक्रिया नाभिकीय संलयन  द्वारा प्राप्त होती है। सूर्य से हमारी पृथ्वी तक लघु तरंगों के रुप में ऊर्जा पहुंचती है।
  • पृथ्वी सौर विकिरण का मात्र 2 अरब वां हिस्सा ही प्राप्त कर पाता है। पृथ्वी पर पहुंचने वाली  सौर्य विकिरण सूर्यताप  कहलाती है। पृथ्वी का धरातल 2 Cal/Cm2/min. दर से ऊर्जा प्राप्त करता है। इसे सौर स्थिरांक भी कहते हैं।

यही सौर विकिरण हमारी पृथ्वी का औसत तापमान 15 डिग्री सेल्सियस बरकरार रखती हैं। सूर्य ताप का मापन  पाइरेलियो मीटर (Pyrheliometer) द्वारा किया जाता है।

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