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Environment

May 30, 2020

पर्यावरण संबंधी आंदोलन Environmental Movement

खेजड़ली आंदोलन

वृक्षों की अंधाधुंध कटाई के विरुद्ध प्रथम जन आंदोलन का उदय राजस्थान के खेजड़ली ग्राम में जो जोधपुर से 25 किलोमीटर दूर है 1731 में हुआ इस ग्राम व उसके आसपास के क्षेत्र में विश्नोई जाति की बहुलता है इस ग्राम की संस्कृति का आधार 20+9 सूत्र है जिनमें से एक महत्वपूर्ण सूत्र वृक्षों की रक्षा करना है

खेजड़ली ग्राम से जलाने की लकड़ी प्राप्त करने के लिए जोधपुर के तत्कालीन महाराजा द्वारा आदेश दिए गए इस आदेश के तहत वृक्षों के काटे जाने के विरोध में एक साहसी महिला अमृता देवी के नेतृत्व में आंदोलन छेड़ा गया

इस आंदो लन में बिश्नोई समुदाय के 363 सदस्य जो कि अपने प्रिय खेजड़ी के वृक्षों को बचाने के लिए इनसे चिपक गए वृक्षों के साथ ही काट दिए गए इन 363 बिश्नोईयों में अमृता देवी के पति रामोजी तथा उनकी तीन पुत्रियां भी सम्मिलित थी राजस्थान के http://खेजड़ली में वृक्षों की कटाई के विरुद्ध हुए इस आंदो लन को प्राकृतिक वनस्पति के संरक्षण की दिशा में एक चिंगारी कह सकते हैं

वर्तमान में राज्य सरकार ने खेजड़ी वृक्ष को राज्य वृक्ष घोषित कर बिश्नोईयों के बलिदान के सम्मान देने का प्रयास किया है

चिपको आंदोलन

चिपको आंदोलन पर्यावरण आंदो लन

उत्तर प्रदेश में टिहरी गढ़वाल के ग्रामीण क्षेत्र में प्राकृतिक वन संपदा के संरक्षण के लिए 1972 में एक आंदो लन आरंभ हुआ क्योंकि इस आंदो लन के अंतर्गत हैं स्थानीय निवासियों द्वारा वृक्षों से चिपक कर उनके काटे जाने के विरुद्ध एक संघर्ष का आह्वान किया गया था अतः इस आंदो लन को http://चिपको_आंदोलन नाम दिया गया है

वर्तमान चिपको आंदो-लन

वर्तमान स्वरूप में चिपको आंदोलन का प्रारंभ नवसृजित उत्तराखंड राज्य के चमोली जिले के गोपेश्वर नामक नगर की सीमाओं में स्थित मंडल नामक ग्राम में 27 मार्च 1973 को हुआ जब तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा एक खेलकूद की सामग्री बनाने वाली इलाहाबाद की साइमन कंपनी को अंगू के पेड़ काटने की इजाजत दी गई

वहां के स्थानीय निवासियों ने एक रबर में कहा यदि पेड़ काटने के लिए कोई आएगा तो हम पेड़ों से चिपक कर उनकी रक्षा करेंगे चिपको आंदोलन के प्रेरणा वर्तमान में टिहरी आंदोलन के जनक श्री सुंदरलाल बहुगुणा कथा चंडी प्रसाद भट्ट रहे हैं

हिमालय क्षेत्र में वनों की कटाई को रोकने की दिशा में 1972 में प्रथम संगठित आंदोलन चमोली गढ़वाल क्षेत्र की महिला गौरा देवी के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ इनके फल स्वरुप सरकार को अलकनंदा के 1300 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को संवेदनशील घोषित करते हुए 10 वर्षों के लिए वृक्षों की कटाई पर रोक लगानी पड़ी

अतः चिपको आंदोलन जो आज बदलती पारिस्थितिकी है संदर्भ में पर्यावरण की अंतरराष्ट्रीय आवाज बन चुका है चमोली गढ़वाल क्षेत्र की ही देन है

इस प्रकार 1731 की अमृता देवी वह 1972 की गौरा देवी के रूप में चिपको आंदोलन में महिलाओं का योगदान भारत में सर्वोपरि रहा है वह इन्होंने हमारे देश को गौरवान्वित किया है

चिपको आंदोलन के उद्देश्य

  1. वनों की अंधाधुंध कटाई को रोकना
  2. पारिस्थितिकी असंतुलन बनाने रखने के लिए अत्यधिक वृक्षारोपण करना
  3. वनों की कटाई रोकना

वनों के प्रति लोगों में जागरूकता उत्पन्न करने के लिए विशेष सुरक्षा तथा आत्मनिर्भरता हेतु वृक्षों की भूमिका को जन-जन में फैलाने के लिए चिपको आंदोलन कार्यकर्ताओं द्वारा पद यात्राएं की जाती हैं

तथा शिविर लगाए जाते हैं इन शिविरों के माध्यम से ग्रामीणों को वनों व पर्यावरण संरक्षण के महत्व के बारे में बताया जाता है

ग्रामीण विकास हेतु चिपको आंदोलन के मुख्य उद्देश्य

  1. व्यवसायिक महत्व वाले वृक्षों की तुलना में पर्यावरणीय महत्व वाले वृक्षों का अधिक रोपण करना
  2. सामाजिक वानिकी तथा कृषि वानिकी का विकास करना
  3. पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने के लिए बड़े बांधों के निर्माण का विरोध करना
  4. आर्थिक विकास के लिए फलदार वृक्षों को उगाना

चिपको आंदोलन की तर्ज पर ही कर्नाटक में यानडुरंग एगडे के नेतृत्व में एपीको आंदोलन प्रारंभ हुआ है कन्नड़ भाषा में एपिको का अर्थ है चिपको

चिपको आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि है जनमानस में वृक्षों के संरक्षण के प्रति चेतना का जागृत होना

सन 1977 में चिपको आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने घोषणा की कि वनों के मुख्य उत्पाद लकड़ी नहीं बल्कि मृदा जल व ऑक्सीजन है टिहरी गढ़वाल क्षेत्र की महिलाओं ने एक नारा दिया है जिसे चिपको नारा कहते हैं यह नारा इस प्रकार है

क्या है जंगल के उपचार ? मिट्टी पानी और बयार
मिट्टी पानी और बयार जिंदाा रहने के आधार

उपसंहार

प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर एम एस स्वामीनाथन के शब्दों में चिपको आंदोलन एक प्रत्यक्ष दर्शन है एक जीवंत विचार है

सुंदरलाल बहुगुणा के अनुसार चिपको केवल हिमालय की समस्या नहीं है वरुण समस्त मानव जाति की समस्याओं का उत्तर है

अतः प्रत्येक व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह अपने आसपास के पेड़ों की रक्षा करें तथा नए वृक्ष लगाकर पर्यावरण समस्याओं को समाधान करने में अपना समस्त योगदान करें पर्यावरण आंदोलन

महत्वपूर्ण प्रश्न

खेजड़ली के बलिदान से संबंधित है

A बाबा आमटे।

B अमृता देवी

C अरुंधति राय

D उपरोक्त सभी

चिपको आंदोलन से संबंधित है

A सुंदरलाल बहुगुणा

ब मेघा पाटकर

c एम एस स्वामीनाथन

D उपरोक्त सभी

पर्यावरण आंदोलन पर्यावरण आंदोलन

May 27, 2020

मानव एवं वन्य जीव विवाद क्या है? Human And Wildlife Conflicts

मनुष्य की गलत धारणाओं के कारण वन्य प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा बढ़ा है इसका प्रत्यक्ष प्रभाव समस्त मानव जगत पर पड़ता है प्राचीन काल में वन्य जीव एवं मानव के बीच मित्रता का संबंध था तथा ऋषि-मनियों के आश्रम में वन्य जीव मुक्त रूप से विचरण करते थे हमारी धार्मिक मान्यताओं मैं भी विभिन्न पेड़ पौधे एवं जीव जंतु पूजनीय थे किंतु मानव सभ्यता के विकास के साथ साथ वन्य जीव एवं मानव के बीच सद्भावना घटने लगी एवं धार्मिक तथा नैतिक मूल्यों में कमी आने लगी जिससे वन्यजवों के अस्तित्व पर संकट उत्पन्न होने लगा वन्य जीवन को नष्ट करने से मानव एवं वन्य जीव जीवन प्रतिस्पर्धा में वृद्धि हुई मानव जहां वन्य जीवन के लिए हानिकारक हुआ है

मानव एवं वन्य जीव

वही वन्यजीवी कहीं-कहीं मानव के लिए खतरा साबित हो रहे हैं मानव व वन्य जीवो में विवाद निम्न इस पर अदाओं के कारण बड़े हैं

  1. आदिवासी समुदाय के साथ वन्य जीवन स्पर्धा
  2. शहरी समुदाय के साथ वन्य जीवन प्रतिस्पर्धा

आदिवासी समुदाय के साथ वन्य जीव प्रतिस्पर्धा

आदिवासी समुदाय अपने संपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वन्य एवं उनके उत्पादों पर सदियों से निर्भर रहते हैं वह इन वन्य संपदा ओं के दोहन के साथ 7 दिन का संरक्षण भी करते थे

पिछले कुछ वर्षों में वन्य जीव संरक्षण के लिए सरकार द्वारा राष्ट्रीय उद्यान व अभयारण्य के लिए सरकार ने वनवासियों को उस क्षेत्र से निष्कासित करना शुरू कर दिया जिसे आदिवासियों के सरकार विद्रोह हुए

उदाहरण के लिए टिहरी बांध से विस्थापित आदिवासियों तथा केरल के आदिवासियों की समस्याएं भी इसी विवाद की खड़ी है

शहरी समुदाय साथ जीवन प्रतिस्पर्धा

वन्यजीव आवास तथा भोजन के लिए एवं मानव समुदाय आवाज कृषि उद्योगों के लिए एक दूसरे के प्रति स्पर्धा में हैं कई बार वन्य जीव अपने भोजन की तलाश में भटकते हुए मानव बस्तियों में चले आते हैं एवं काल ग्रास बन जाते हैं

मनुष्य अपनी जरूरत की पूर्ति के लिए दिन प्रतिदिन वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों पर कुठाराघात करता रहा है बढ़ती हुई जनसंख्या की जट रागनी को शांत करने के लिए कृषि क्षेत्र के विस्तार के कारण वन एवं वन्य जीवन पर दुष्कर परिणाम पढ़ते हैं

आता इन विवादों से बचने एवं जैव विविधता का संरक्षण करने के लिए भारत सरकार ने पहली बार वन्य जीवन कार्य योजना 1983 को संशोधित करके अब नई बनने जीवन कार्य योजना 2002 से 2016 स्वीकृत की है

भारतीय वन्य जीवन बोर्ड जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री हैं वन्य जीव संरक्षण की अनेक योजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी एवं निर्देशन करने वाला शीर्ष सलाहकार निकाय है

वर्तमान में संरक्षित क्षेत्र के अंतर्गत 92 राष्ट्रीय उद्यान और 500 अभ्यारण आते हैं जो देश के सकल भौगोलिक क्षेत्र के 15.67 मिलियन हेक्टेयर भाग पर फैले हैं तथा देश के समस्त भौगोलिक क्षेत्र को यह प्रतिशत पर फैले हैं

May 26, 2020

वन्यजीवों को खतरा क्या क्या है? Threats to Wildlife

सामान्य अर्थ में वन्य जीव जंतुओं के लिए प्रयुक्त होता है जो प्राकृतिक आवास में निवास करते हैं भारत जैव विविधता में से संपन्न राष्ट्र है यहां जलवायु एवं प्राकृतिक विविधता के कारण लगभग 48 हजार पादप एवं लगभग 80 हजार से अधिक जीव जंतुओं की जातियां पाई जाती हैं

वन्यजीवों के विलुप्ती के कारण

इसके विलुप्ती के कारण दो कारक हैं

  1. प्राकृतिक कारक
  2. मानव जनित कारक

प्राकृतिक कारण (Natural Causes)

भूकंप सूखा ज्वालामुखी के फटने से अथवा धरती पर उल्का पिंडों के गिरने से क्षेत्र विशेष में उपलब्ध जातियां नष्ट होकर विलुप्त हुई पृथ्वी पर अनुवांशिकी रूप से भिन्न भिन्न पादपों की कमी से उपलब्ध पादपों में अंतः प्रजनन की क्रिया के कारण जनन क्षमता में कमी आ जाती है इसे अंतः प्रजनन अब नमन कहते हैं

क्रमागत रूप से अंतः प्रजात वंश क्रम में जन्म क्षमता के हास के कारण जातियां विलुप्त हो जाती हैं

मानव जनित कारण (Anthropological Causes)

  1. आवास का हास
  2. प्रदूषण
  3. वनोन्मूलन
  4. जनसंख्या विस्फोट
  5. औद्योगिकीकरण
  6. अन्य कारक जैसे युद्ध बीमारियां विदेशी प्रजातियों का आक्रमण इत्यादि

आवास का हास (Loss of Habitat)

मनुष्य के विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए वनों का विनाश करने से वन्यजीवों के आवास स्थल निरंतर बढ़ते गए मानव ने उद्योगों बांध निर्माण सड़कों एवं रेल मार्गो आवासीय परिसरों इत्यादि बनाने के लिए जंगलों का सफाया करके प्राकृतिक आवासों को सर्वाधिक नुकसान पहुंचाया है

इसके अतिरिक्त कृषि क्षेत्र में अत्याधिक रसायन संश्लेषित उर्वरक पिड़क नास्को के उपयोग से भी वन्य जीव जंतुओं एवं वनस्पतियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है

प्रदूषण ( Pollution)

वन्य जीव

बडे बडे उद्योगों कल कारखानों तथा वाहनों से निकलने वाली विषैली गैसों से वायुमंडल प्रदूषित हो चुका है औद्योगिक अपशिष्ट वाहित मल एवं कचरे ने तालाबों झीलों नदियों एवं समुंद्र को प्रदूषित कर दिया है

जल मृदा एवं वायु के प्रदूषित हो जाने से जीव जंतुओं एवं वनस्पतियों का विनाश तीव्र गति से बड़ा है जंगलों में खनन कार्य अम्लीय वर्षा एवं हरित ग्रह प्रभाव से पृथ्वी पर जैव विविधता पर संकट गहराया है

वनोन्मूलन (Deforestation)

वन हमारे पर्यावरण के फेफड़े हैं क्योंकि वातावरण की शुद्धता के लिए यह प्रमुख भूमिका निभाते हैं अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मानव वनों पर शुरुआत से ही निर्भर रहा है भवन निर्माण इंदन फर्नीचर कागज उद्योग आदि के लिए मानव ने अंधाधुंध गति से वनों का दोहन किया है

राष्ट्रीय वन नीति 1952 के अनुसार भारत से संगत विकास के लिए न्यूनतम 33 प्रतिशत वन आवरण होना चाहिए किंतु वर्तमान में यह मात्र 20% के लगभग ही शेष बचे हैं वन्य जीव संरक्षण के लिए वन आरोपण पर समुचित ध्यान देना वर्तमान समय की महती आवश्यकता है

जनसंख्या विस्फोट (Population Blast)

भारत जैसे विकासशील देशों तथा अल्पविकसित राष्ट्रों की प्रमुख समस्या जनसंख्या विस्फोट है यह प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष दोनों रूपों से जैव विविधता में कमी के लिए जिम्मेदार है आधुनिक चिकित्सा सेवाओं के कारण मृत्यु दर में कमी तथा उच्च जन्म दर के कारण जनसंख्या में अत्यधिक वृद्धि हुई है

वर्ष 2001 के जनसंख्या के अनुसार भारत में जनसंख्या घनत्व 324 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है इस प्रकार मानव अपनी आवासीय परिसरों के लिए वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों को नष्ट करता जा रहा है जो कि जैव विविधता के लिए दुष्कर साबित हो रहा है

औद्योगिकीकरण (Industrialization)

बड़े-बड़े कल कारखानों एवं उद्योगों से प्रतिवर्ष लाखों टन औद्योगिक कचरा विषैले पदार्थ एवं अपशिष्ट हमारे वातावरण में त्यागी जा रहे हैं खनन उद्योग चर्म उद्योगों सीमेंट उद्योग पैट्रोलियम रिफायनरी आणविक बिजली करो इत्यादि से अत्यधिक जहरीले अपशिष्ट हमारे जल मृदा एवं वायु को निरंतर दूषित कर रहे हैं

वायु में उत्सर्जित इन गैसों के कारण ओजोन क्षरण अम्लीय वर्षा हरित गृह प्रभाव जलवायु परिवर्तन इत्यादि गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं जिनके कारण समस्त पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो रहे हैं इनका दुष्परिणाम यह है कि कई क्षेत्र विषैली प्रजातियां विलुप्त हो रही है

अन्य कारण ( Other Causes)

उपरोक्त कारणों के अलावा अन्य कारण जैसे विभिन्न राष्ट्रों के मध्य युद्ध एवं सैन्य अभियानों विदेश जातियों के आक्रमण विभिन्न प्रकार की बीमारियों आदि के कारण विजय विविधता प्रभावित हुई है खाड़ी युद्ध के दौरान तेल के कुओं में आग लगने के कारण मध्य एशिया में भी कई पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हुए हैं

हाल ही में वर्ल्ड फ्लू बीमारी के कारण कुक्कुट प्रजातियां एवं अन्य प्रजातियां प्रभावित हुई थी इसके अलावा हमारे देश में विदेशी प्रजातियां जैसे यूकेलिप्टस आर्जीमोन मैक्सी कान्हा जलकुंभी विदेशी बबूल इत्यादि बादलों के कारण यहां की मूल वनस्पति भी अत्यधिक प्रभावित हुई है

अवैध शिकार (Poaching)

वन्यजीवों के संकटग्रस्त एवं विलुप्त होने का एक अन्य मुख्य कारण वन्यजीवों का अवैध शिकार है मानव सदियों से अपने भोजन पदार्थ के रूप में जानवरों का शिकार करता रहा है भोजन के अतिरिक्त मानव जानवरों से सौंदर्य प्रसाधन प्राप्त करने चमड़े की वस्तुएं बनाने फर उन आदि के लिए वन्य जीवों का शिकार करता है

वर्षा पूर्व जहां हिमालय क्षेत्र थार रेगिस्तान उत्तर भारत का मैदान दक्षिण पठारी प्रदेश वन्यजीवों की विलुप्त संपदा से भरे पड़े थे वही वर्तमान स्थिति यह है कि वन्य जीव केवल राष्ट्रीय उद्यानों एवं अभयारण्यों में ही सिमट कर रह गए हैं

अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में अत्याधिक कीमत मिलने के कारण भी http://वन्यजीवों का अनाधिकृत शिकार किया जाता है

हाथी का शिकार हाथी दांत के लिए शेर बाघ आदि का शिकार उनकी खाल हड्डी नाखूनों के लिए मगरमच्छ कछुआ कोबरा आदि का शिकार उनकी खाल के लिए कस्तूरी मिर्ग का शिकार कस्तूरी प्राप्त करने के लिए किया जाता है इनके उत्पादन से कई तरह की दवाइयां इत्र इत्यादि बनाए जाते हैं

May 25, 2020

ओजोन परत का क्षरण क्या है ? Ozone Layer Depletion

ओजोन परत क्या है-O3

ओजोन ऑक्सीजन का ही एक दूसरा अपररूप है परमाणु संख्या 2 से ऑक्सीजन स्थाई रूप में होती है किंतु ओजोन में 3 परमाणु होते हैं अतः यह अपेक्षाकृत कम स्थाई होती है

यह वायुमंडल के समताप मंडल में पृथ्वी की सतह से 30 किलोमीटर की ऊंचाई पर एक सघन वह लगभग 20 किलोमीटर मोटाई का एक गहरा होता है

यह गैस गुरुत्वाकर्षण बल के कारण एक परत के रूप में पृथ्वी के चारों ओर तनी रहती है

इसी ओजोन परत के कारण पृथ्वी को विलक्षण ग्रह होने का दर्जा मिलता है

  • समताप मंडलिय ओजोन लगातार उत्पन्न और नष्ट हो रही है वायुमंडल में इसका निर्माण एक स्वभाविक प्राकृतिक क्रिया है
  • जब सूर्य की किरणें वायुमंडल की ऊपरी सतह से टकराती हैं तो उच्च ऊर्जा विकिरण से आणविक ऑक्सीजन का कुछ भाग ऑक्सीजन परमाणु से मिलकर ओजोन मैं बदल जाता है
  • ऐसा वायुमंडल में विद्युत अपघटन वह मोटर वाहनों के विद्युत स्पार्क से भी होता है

O2——- O+O = PARMANU

O+O2 —– O3 OZONE

ओजोन परत का महत्व

  • ओजोन परत हमारे लिए एक रक्षा कवच का कार्य करती है इसका मुख्य कार्य सूर्य के प्रकाश में उपस्थित हानिकारक पराबैंगनी किरणें को अवशोषित कर पृथ्वी पर पहुंचने से रोक ना है
  • तथा यहां पर रहने वाले जीवो की रक्षा करना है सीधे शब्दों में कहें तो यह फिल्टर का कार्य करती है तथा पृथ्वी के तापमान नियमन में सहायता करती है

ओजोन छिद्र (ozone Hole)

ओजोन

जिसे हम ओजोन छिद्र के नाम से जानते हैं वह वस्तुतः कोई छिद्र नहीं है बल्कि समताप मंडल में उपस्थित ओजोन की सघन व मोटी पर्थ का छीन होना या पतला होना है इसे ओजोन परत छरण या ओजोन छिद्र कहते हैं

सर्वप्रथम 1985 में अंटार्कटिका ध्रुव पर ओजोन स्तर की मोटाई में कमी दिखाई दी एक सर्वेक्षण के अनुसार 1977 से 1984 के मध्य ओजोन में 40% कमी पाई गई

ओजोन परत को छीन के नुकसान

  • ओजोन परत को छीन कर के उसकी मोटाई को कम करने वाले मुख्य कारक मानवीय कारण है
  • वैज्ञानिकों के अनुसार मानव की विभिन्न गतिविधियां एवं क्रियाकलाप जोकि प्रदूषण को बढ़ा रही हैं
  • ओजोन गैस की कमी का मुख्य कारण है आपके लिए यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि दैनिक उपयोग में आने वाले कुछ ऐसे उपकरण हैं
  • जिनकी Ozone लेयर को नष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका है

जैसे फ्रिज एयर कंडीशनर रूम हीटर परफ्यूम हेयर स्प्रे फॉर्म को पैक करने वाली सामग्री आदि क्योंकि इन उत्पादों को बनाने में एचबीएफसी व सीएफसी गैसों का प्रयोग किया जाता है

  • द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वैज्ञानिकों ने केमिकल्स का एक ऐसा समूह खोजा था
  • जो काफी देर तक ठंडा प्रभाव देता था इस ग्रुप के रसायनों को क्लोरोफ्लोरोकार्बंस नाम दिया गया
  • दूसरा ग्रुप था एलॉन्स जो फायर प्रोटेक्शन या अग्निशमन जहाजों वायुयानो एवं कंप्यूटर कंट्रोल के रूप में काम आता है

तीसरा समूह हाइड्रोफ्लोरोकार्बंस का है जो मुख्यतः रेफ्रिजरेशन फॉम ब्लोइंग वेसीएफसी की जगह प्रयुक्त होता है

  • सीएफसी (CFC) गैस बहुत स्थाई होती हैं यह वी में 25 से 50 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंच जाती हैं
  • वहां पर उपस्थित पराबैंगनी किरणें इसमें से मुक्त क्लोरीन या ब्रोमीन अलग कर देती हैं
  • यह मुक्त मूलक Ozone से क्रिया कर उसे O2 परमाणु में विभक्त कर देता है
  • सीएफसी का एक अनु अकेला ही Ozone के कई हजार अणुओं को खत्म कर सकता है
  • इस प्रकार Ozone परत का छह होता है

ओजोन परत छय के दुष्प्रभाव और इससे प्रभावित होता जनजीवन

  • Ozone परत सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों के लिए फिल्टर का काम करती है
  • इस तरह पृथ्वी पर जीवन को सुरक्षित रखती है लेकिन Ozone लेयर में ऑल हो जाने से हानिकारक पराबैंगनी किरणें सीधे पृथ्वी पर पहुंच रही हैं
  • जिससे ग्लोबल वार्मिंग के साथ-साथ स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं जैसे

मोतियाबिंद त्वचा का कैंसर अल्सर ब्रोक आईटी अस्थमा आदि बीमारियां बढ़ रही हैं

तथा प्रतिरोधक क्षमता में कमी आ जाती है

ओजोन परत की सुरक्षा के उपाय

  • Ozone भारत की हानि के ज्ञान के बाद 1985 में वियना सम्मेलन वे 1987 में कनाडा के मांट्रियल में एक अंतरराष्ट्रीय समझौता पारित किया गया
  • जिस पर लगभग सभी देशों ने हस्ताक्षर किए गए इसमें सीएफसी के उत्पादन और खपत को समाप्त करने तथा इनके विकल्प की खोज करने का निश्चय किया गया
  • किंतु कुछ खामियों के चलते पूरी तरह ऐसा नहीं हो पाया है लंदन सम्मेलन 1990 में विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को सीएफसी रहित तकनीकी वह धन उपलब्ध कराने की बात हुई
  • 1992 में कोपेनहेगन सम्मेलन में निर्णय लिया गया कि जहां तक सही हो सभी देश http://ओजोन मैत्री कारक पदार्थों के उपयोग को बढ़ाकर सीएफसी का उपयोग समाप्त करेंगे

महत्वपूर्ण प्रश्न

1 सीएफसी क्या होते हैं

2 सीएफसी के मुख्य स्रोत क्या होते हैं

May 24, 2020

वैश्विक ताप वृद्धि क्या है? Global Warming

वैश्विक ताप वृद्धि

मनुष्य द्वारा किए गए प्रकृति से छेड़छाड़ अतीव औद्योगिकीकरण एवं प्रत्येक क्षेत्र में बढ़ रहे प्रदूषण के कारण पृथ्वी के तापमान में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है विश्व का औसतन तापमान पिछले कई वर्षों से तेजी से बढ़ा है यदि तापमान की वृद्धि दर ऐसी ही रही तो अगले 100 वर्षों में पृथ्वी का तापमान 3 से 5 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा पृथ्वी का तापमान बढ़ने का प्रमुख कारण जलवायु परिवर्तन है

ग्लोबल वार्मिंग के मुख्य कारण

  1. हरित हरित गृह प्रभाव
  2. हरित गृह गैस
  3. मानव क्रियाकलापों का योगदान

हरित गृह प्रभाव ठंडे प्रदेशों में गर्मी बनाए रखने के कारण एक वरदान है परंतु अब इसमें प्रत्येक क्षण हरित गृह गैसों के जुड़ने से तापमान में वृद्धि होती जा रही है यहां पर बढ़ती हुई हरित गृह गैस से जैसे (CO2 ch4 एन ओ सीएफसी o3 जलवाष्प एवं अन्य गेसे)

ग्लोबल वार्मिंग में 24% तक उत्तरदाई है इसके अतिरिक्त विश्व तापमान में बढ़ोतरी के लिए मानव के क्रियाकलाप भी शामिल है जो समय के साथ-साथ विकास से भी जुड़े हैं और उनके ए दूरदर्शिता पूर्ण प्रक्रियाओं से भी इसका असर बढ़ता है

औद्योगिकीकरण एवं शहरी विकास के लिए जो प्रमुख आधार है वह है ऊर्जा उत्पादन ऊर्जा उत्पादन चाहे नाभिकीय या तापीय हो दोनों ही प्रक्रिया में तापीय एवं वायु प्रदूषण अधिक फेलता है इसका ताप वृद्धि में 49% तक का योगदान होता है

सूर्य समस्त वातावरण को प्रकाश व ताप देता है सूर्य की सतह का तापमान 5800 डिग्री कैल्शियम है एवं इससे 0.4 से 1.0 मीटर की तरंग धैर्य की दृश्य किरणें निकलती हैं अंतरिक्ष में अन्य तारों के समान सूर्य के आकार में परिवर्तन के कारण तरंग धैर्य भी परिवर्तित हो रही है जिसके कारण तापमान में वृद्धि हो रही है

ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव

तापमान में वृद्धि के कारण हिमनद पिघल रहे हैं एशिया में हिमालय एवं यूरोप के अल्पाइन के तो कुछ भाग 50% तक कम हो गए हैं भारत के प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक गंगोत्री उद्गम स्थल प्रत्येक वर्ष पीछे खिसक रहा है अब तो ध्रुवों पर घास जैसी वनस्पति भी दिखाई देने लगी है ध्रुवों पर ताप यह वृद्धि के कारण एवं हिंदुओं के पिघलने से वहां की जैविक संपदा समाप्ति की ओर है

हिमनद ओके पिघलने से शरद ऋतु भी धीरे धीरे कर जिससे मौसम चक्र गड़बड़ा रहा है इससे विभिन्न फसल चक्र और जीव-जंतुओं का जीवन चक्र भी परिवर्तित हो रहा है इस कारण बर्फीले पहाड़ बंजर होते जा रहे हैं जिसका प्रभाव पर्यटन पर भी पड़ रहा है

हिमनद ओके पिघलने के कारण जिन नदियों में वर्ष भर जल का प्रवाह बना रहता था वह अब बरसाती नदियों में बदल चुकी हैं उस कारण नदियों के पानी पर आधारित खेती या या या यातायात में पूर्ति आसानी से नहीं हो पा रही है एवं वहां के सामाजिक तथा आर्थिक वातावरण बदल रहे हैं इसके साथ नदियों में पानी नहीं रहने से उन पर आधारित बिजली घर को समान रूप से आवश्यक पानी नहीं मिलता है

इसके साथ ही वहां के पेयजल में भी प्रदूषण की मात्रा बढ़ रही है जिससे वहां के निवासियों में संक्रमित रोग के फैलने का भय रहता है

तापीय वृद्धि के कारण नम भूमि क्षेत्र कच्छ वनस्पति एवं प्रवाल प्रवाल भित्ति यों के समाप्त होने का खतरा बढ़ रहा है ताप में वृद्धि के कारण वनस्पति एवं प्राणी जगत के जीवन चक्र पर असर पड़ रहा है जिसे पारिस्थितिक तंत्र भी असर पड़ता है

वैश्विक ताप वृद्धि के समाधान

CO2,CH4,CFC,NO  जैसी गैसों की उत्पत्ति एवं प्रयोग की मात्रा कम की जाए

वैश्विक ताप

औद्योगिक क्षेत्रों में ऐसे संयंत्र लगाए जाएं जिससे हानिकारक उत्पादों की मात्रा विघटित हो सके या उपयोगी पदार्थों में परिवर्तित हो जाए उदाहरण द्वारा हाइड्रोकार्बन एरोमेटिक योगीको में विघटित कर दिए जाते हैं

वनों के विनाश को रोका जाए एवं कृषि योग्य भूमि को बढ़ाया जाए

ईंधन एवं प्रकाश के लिए गैर परंपरागत स्रोतों जैसे पवन एवं सौर ऊर्जा को काम में लिया जाए

जीवाश्म ईंधन जैसे कोयला पेट्रोलियम पदार्थ आदि का उपयोग नियंत्रित रूप से किया जाना चाहिए

जनसंख्या वृद्धि की दर कम होनी चाहिए वैश्विक ताप

महत्वपूर्ण प्रश्न

1 वैश्विक ताप वृद्धि के लिए http://उत्तरदाई प्रमुख गैसें कौन सी हैं

2 ग्लोबल वार्मिंग के मुख्य कारण क्या हैं

May 24, 2020

हरित गृह प्रभाव क्या है Green House Effect

हरित ग्रह प्रभाव

हरित ग्रह प्रभाव एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसमें कुछ गैस से जिन्हें हरित गृह गैस से कहते हैं पृथ्वी से परावर्तित होने वाली उस्मा को अवशोषित कर लेती हैं

यह ऊष्मा पृथ्वी के तापमान मैं जीवित रहने लायक गर्मी बनाए रखती हैं अब यह प्रश्न है कि हरित गृह गैस क्या है इसे समझने के लिए हरित ग्रह के बारे में समझना होगा

हरित गृह प्रभाव क्या होता है

  • हरितगृह कांच की बनी संरचना होती है ठंडे प्रदेशों में बहुत कम अवधि के लिए सूर्य का प्रकाश उपलब्ध होता है
  • इस अवधि में सौर ऊर्जा प्रकाश के रूप में हरित ग्रह के कांच में होकर प्रवेश करती है
  • तथा पेड़ पौधों के द्वारा होने वाले खाद्य श्रंखला में सहायक होती है
  • प्रकृति के नियम अनुसार प्रकाश ऊर्जा ताप ऊर्जा में परिवर्तित होकर अवरक्त किरणों के रूप में हरितगृह के कांच से बाहर निकालने का प्रयास करती हैं
  • लेकिन हरितगृह में उपस्थित कार्बन डाइऑक्साइड के कारण इस तरह से बाहर निकलने में असमर्थ रहती हैं
  • यह ताप ऊर्जा हरितगृह में गर्मी बनाए रखती है जो पेड़ पौधों के लिए ठंडे मौसम में आवश्यक है
  • इससे सर्दी होने के फलस्वरूप भी वनस्पति वृद्धि करती है

हरित गृह प्रभाव

इसी प्रकार सौर ऊर्जा http://वायुमंडल को भेदकर पृथ्वी पर आकर उसे गर्म करती है और साय काल में अवरक्त किरणों के रूप में वापस लौटती हैं

सामान्य परिस्थितियों में सूर्य के चारों ओर से घेरे हुए छोभ मंडल हरितगृह में स्थित कांच की तरह से कार्य करता है

  • छोभ मंडल में एकत्रित इन अवरक्त किरणों को वापस नहीं जाने देता है
  • तथा पृथ्वी पर तापीय ऊर्जा के संतुलन को बनाए रखता है
  • मानवीय गतिविधियों एवं अति औद्योगिकीकरण के कारण कुछ जैसे-जैसे कार्बन डाइऑक्साइड मीथेन नाइट्रस ऑक्साइड क्लोरोफ्लोरोकार्बन का उत्सर्जन अधिक मात्रा में होने लगा है
  • जिससे वायुमंडल में इनका जमाव बढ़ता जा रहा है यह जमाव एक ऐसे कांच के पर्दे की तरह कार्य कर रहा है जिससे होकर सौर ऊर्जा विकिरण पृथ्वी पर आ तो सकती हैं
  • लेकिन परावर्तित होकर वापस नहीं जा सकती इस कारण पृथ्वी का तापमान धीरे-धीरे बढ़ रहा है इसे ही हरित गृह प्रभाव कहते हैं
  • इस प्रभाव का नामकरण सर्वप्रथम 1827 में जे फुरियार ने किया था

महत्वपूर्ण प्रश्न

मुख्य ग्रीन हाउस गैसों के नाम बताइए?

CO2 का ग्रीन हाउस प्रभाव में क्या योगदान है?

May 23, 2020

जलवायु परिवर्तन क्या है ? Climate Changes

जलवायु परिवर्तन

हमारी पृथ्वी को चारों तरफ से गिरी हुई वायु की परत को वायुमंडल कहते हैं इस वायुमंडल में होने वाले प्रतिदिन के परिवर्तन को जलवायु कहते हैं

तापमान, दाब नमिंग वर्षा सूर्य का प्रकाश, बादल तथा वायु का प्रभाव मौसम तथा जलवायु को प्रभावित करते हैं

किसी भी स्थान की जलवायु उस की समुद्र तल से ऊंचाई अक्षांश समुद्र से दूरी तथा अन्य स्थानीय भौगोलिक कारणों (Geographical Factors) से प्रभावित होती है

सभी परिवर्तन वायुमंडल की छोभ मंडल (Troposphere) स्तर में होते हैं जोकि समताप मंडल (Stratosphere) से गिरी होती है

  • किसी भी स्थान के मौसम के लिए तापमान तथा अवक्षेपण (Precipitation) बहुत महत्वपूर्ण होते हैं
  • बहुत दिनों से यही समझा जाता रहा है की वायु प्रदूषण स्थानीय जलवायु विशेषकर वर्षा को ही प्रमाणित कर सकते हैं
  • पर अब वैज्ञानिकों ने यह अध्ययन किया है कि विश्व जलवायु पर भी वायु प्रदूषण के संभावित प्रभाव हैं
  • वर्तमान में मानव की बढ़ती बिपाशा व प्रकृति के अंधाधुंध दोहन से प्रदूषण उत्पन्न हो रहा है
  • जैसा कि वायु प्रदूषण जल प्रदूषण ध्वनि प्रदूषण ताप प्रदूषण एवं नाभिकीय प्रदूषण आदि के कारण वातावरण दूषित होता जा रहा है
  • जिसका एक सबसे बड़ा दुष्प्रभाव जलवायु परिवर्तन के रूप में सामने आया है

जलवायु

आज जलवायु चक्र पूरी तरह से गड़बड़ा गया है प्रकृति अपना नियमित चक्र बनाए रखने में असमर्थ सिद्ध हो रही है

जल चक्र में परिवर्तन होने से सर्वाधिक गर्मी वाले प्रदेशों में वर्षा या बाढ़ का प्रकोप देखने को मिल रहा है एवं अधिक वर्षा वाले स्थानों पर सूखा पड़ रहा है

जलवायु में परिवर्तन से अतिवृष्टि अनावृष्टि चक्रवात तूफान आदि आस्क में घटनाओं में वृद्धि होती है

जिसका प्रभाव मानव के आवास परिवहन ऊर्जा स्रोत स्वास्थ्य आदि सभी पर पड़ता है

कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी यदि आने वाले वर्षों में गर्मी 8 महीने हो या वर्षा वर्षा के मौसम में नए होकर सर्दियों के समय हो वर्तमान में विश्व के कई भागों में ग्रीष्म ऋतु की अवधि और अधिकतम तापमान में वृद्धि हो रही है

  • औद्योगिकीकरण के कारण उत्पन्न ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा में वृद्धि हो रही पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है
  • क्योंकि यह ताप के लिए अवरोधक का कार्य करती है
  • इसके प्रभाव पृथ्वी के अलग-अलग भागों में भिन्न-भिन्न किंतु सभी हानिकारक है

जलवायु में अप्राकृतिक परिवर्तनों से जैसे CO2 गैस की मात्रा में वृद्धि से कृषि उत्पादन ओं में 10 से 30 प्रतिशत की कमी हो सकती है वनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है

जलवायु परिवर्तन की घटनाओं से पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystems) पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा जो वनस्पति व जीव इस परिवर्तन को नहीं सह पाएंगे समाप्त हो जाएंगे इससे जैव विविधता को खतरा पैदा होगा

  • जल चक्र भी इससे प्रभावित होगा तापमान परिवर्तन से ध्रुवों पर स्थित बर्फ के पिघलने का खतरा बढ़ जाएगा
  • जिस से समुद्र तल की ऊंचाई बढ़ेगी और आसपास के तटीय क्षेत्रों के डूबने देने या खारे पन आदि का खतरा बढ़ेगा

विश्व

इस कारण विश्व राष्ट्र संघ (UNO) ने यह पाया कि विश्व का तापमान धीरे-धीरे बढ़ रहा है यदि मानव जनित प्रदूषण नियंत्रित नहीं किया गया तो सन 2100 ताकि यह है 3.5 डिग्री सेल्शियम बढ़ जाएगा

एलनीनो भी जलवायु संबंधित परिवर्तनों का ही प्रभाव है जिसमें शीतोष्ण प्रशांत समुंद्र क्षेत्र के वायुमंडल में हलचल होती है

1997- 98 में होने वाले एलनीनो ने से विश्व में लगभग 24000 लोगों की मौत हुई वह 340 लाख अमेरिकी डॉलर की क्षति हुई

अब जरूरत है कि संपूर्ण विश्व सम्मिलित रूप से प्रयास कर प्रदूषण को नियंत्रित करें जिससे जलवायु में अवांछित परिवर्तन में हो बहुत समय से यही समझा जाता रहा है

की विभिन्न प्रकार के प्रदूषण खासतौर से वायु प्रदूषण स्थानीय जलवायु विशेषकर वर्षा को ही प्रभावित कर सकते हैं

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