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Economy

May 23, 2020

भारत के प्रमुख आयात India’s major imports

प्रमुख आयात

आवश्यकता के अनुरूप भारत में अनेक वस्तुओं का आयात किया जाता है इन आयतों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है

  1. भारी या अंबारी आयात
  2. गैर भारी या गैर अंबारी आयात

भारी या अंबारी आयात –इस के तीन अंग हैं

  1. पेट्रोलियम रुक्ष एवं उत्पाद
  2. भारी उपभोग वस्तुएं जिसमें अनाज और दालें खाद्य तेल तथा चीनी शामिल किए जाते हैं
  3. अन्य भारी मदे जिसमें उर्वरक लोह है धातुएं रबड़ कागज एवं गत्ता खनिज अयस्क लो हो तथा इस्पात आदि सम्मिलित हैं

गैर भारी या गैर अंबारी आयात — इसके भी मुख्यतः तीन अंग हैं

  1. पूंजीगत मशीनें परिवहन उपकरण आदि
  2. निर्यात से जुड़े आयात जैसे हीरे व कीमती पत्थर रसायन वस्त्र एवं काजू आदि
  3. अन्य अन्य गैर भारी मदेे जैसे प्लास्टिक का सामान व्यवसायिक एवं वैज्ञानिक उपकरण एवं कोयला आदि

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के आयतों की संरचना में काफी परिवर्तन हुआ है नियोजन की प्रक्रिया प्रारंभ होने के समय पूंजीगत वस्तुओं का आयात अधिक नहीं था

भारी मात्रा में विनिर्मित वस्तुओं का आयात होता था परंतु जब नियोजन की प्रक्रिया के दौरान आधारभूत उद्योगों की स्थापना को प्राथमिकता दी गई तो बड़े पैमाने पर पूंजीगत उपकरणों कल पुर्जों तथा मशीनों का आयात करना पड़ा साठ के दशक में जापान सिंगापुर हांगकांग दक्षिण कोरिया ताइवान आदि विकासशील देशों द्वारा अपनाई गई आयात उदारीकरण की नीति की सफलता से प्रेरित होकर भारत ने भी आयात उदारीकरण एवं निर्यात प्रोत्साहन नीति को अपनाना आवश्यक समझा

1990 में सरकार ने उदारीकरण की व्यापक नीति घोषित की तथा आयात नियंत्रण को काफी कम कर दिया जिस से धीरे-धीरे आयात की जाने वाली वस्तुओं की संख्या बढ़ती गई वर्तमान में भारत में आयात की अनेकों मदे हैं।

1 पेट्रोल तेल एवं चिकनाई के पदार्थ

  • इस मद में साफ किया हुआ तथा बिना साफ किया हुआ पेट्रोल मिट्टी का तेल व पेट्रोल की अन्य वस्तुएं आदि को सम्मिलित किया गया है
  • इस मद का हमारे देश के आयातो में सबसे महत्वपूर्ण स्थान है
  • कच्चा तेल मुख्यतः ईरान इराक एवं अरब देशों से आयात किया जाता है
  • जबकि पेट्रोलियम पदार्थों का आयात अमेरिका फ्रांस एवं इटली आदि देशों से किया जाता है
  • यह मध्य भारत के आयतों में सबसे अधिक हिस्सेदारी रखती है कुल आयातो मिस मद का प्रथम स्थान है

2 पूंजीगत माल

  • इस मद में मशीनरी इलेक्ट्रिक एवं इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं परिवहन उपकरण तथा प्रोजेक्ट वस्तुएं आदि सम्मिलित की जाती हैं
  • देश के औद्योगिक एवं परिवहन विकास में इन आयतों की अनिवार्यता रही है जिसके फलस्वरूप यह मत भारतीय आयात के प्रमुख मद है
  • और आयातो में महत्वपूर्ण स्थान रखती है भारत में यह मशीनें मुख्य रूप से ग्रेट ब्रिटेन अमेरिका कनाडा जर्मनी एवं जापान से आयात की जाती हैं
  • भारत के कुल आयातो में इस मद में किए जाने वाले आयातो की हिस्सेदारी दूसरे स्थान पर है

3 अलोह धातुएं

  • अलोह धातुएं भारत के आयात में प्रमुख हिस्सेदारी है
  • यह कुल आयात का लगभग 8.8% है जो भारत के आयातो मैं इस मध्य को महत्वपूर्ण को बतलाता है
  • कुल आयातो मैं इसका तीसरा स्थान है

4 मोती कीमती एवं अर्ध कीमती स्टोंस

  • भारत के आयतों में मोती कीमती एवं अर्ध कीमती स्टोंस ने हाल के वर्षों में अपना प्रमुख स्थान बना लिया है
  • जो कुल आयात का लगभग 6.1% है
  • आयातो में हिस्सेदारी की दृष्टि से इस मद का चौथा स्थान आता है

5 कार्बनिक एवं अकार्बनिक रसायन

  • भारत के आयतों में कार्बनिक एवं अकार्बनिक रसायन का प्रमुख स्थान है
  • वर्ष 2005-06 में इसका आयात 40441 में करोड़ रुपए रहा जो कुल आयात का लगभग 6.1% है
  • आयातो में हिस्सेदारी की दृष्टि से इस मद का चौथा स्थान आता है

6 लोहा व इस्पात

  • भारत में लोहा व इस्पात की मांग अधिक है जबकि इसकी पूर्ति कम है जिसके कारण लोहा एवं इस्पात का आयात किया जाता रहा है लोहा एवं इस्पात भी भारत का प्रमुख आयात है
  • इसका आयात मुख्यतः इंग्लैंड अमेरिका रूस एवं पश्चिमी जर्मनी तथा जापान से किया जाता है

7 खाद्य तेल

  • देश में खाद्य तेलों का उत्पादन उनकी मांग से कम रहने के कारण वर्ष 2005-06 में भारत ने 8961 करोड रुपए के खाद्य तेल का आयात किया
  • यह आयात मुख्य थे अमेरिका रूस तथा कनाडा से किया गया

8 उर्वरक

  • उर्वरक भारत के आयात की प्रमुख मद रही है क्योंकि देश में उर्वरकों की बढ़ती मांग की तुलना में इनका उत्पादन अपर्याप्त रहा है
  • यह आयात मुख्यतः अमेरिका रूस जापान पश्चिमी जर्मनी आदि देशों से किया गया

9 काजू

भारत ने वर्ष 2005-06 में 2089 करोड रुपए के काजू का आयात किया गया जो देश के आयात की मदो में इसकी प्रमुखता को बतलाता है

10 आयात की अन्य वस्तुएं

दवाइयां, व पेपर बोर्ड वैज्ञानिक,प्लास्टिक का सामान,रिजनेट एड सैलूलोस आदि वस्तुएं भी भारत में प्रमुख से आयात की जाती हैं

महत्वपूर्ण प्रशन

1 भारत में प्रमुख आयात कौन-कौन से हैं

2 भारत के आयातो में सबसे अधिक हिस्सेदारी वाली पांच प्रमुख आयात मदों को बताइए

3 आयात की भारी मदे कौन-कौन सी हैं

4 http://आयात की गैर भारी मदे कौन-कौन सी हैं

May 23, 2020

भारत के प्रमुख निर्यात-India’s major exports

प्रमुख निर्यात

स्वतंत्रता के बाद जैसे-जैसे देश की औद्योगिक संरचना में विविधीकरण वह मजबूती आती गई नए निर्यात के अवसर पैदा होते गए इससे जहां तक और निर्यात में कृषि एवं संबंध वस्तुओं का महत्व कम होता गया वहीं दूसरी ओर विनिर्मित वस्तुओं का महत्व बढ़ता गया धीरे-धीरे एक प्रगतिशील औद्योगिक क्षेत्र विकसित होने लगा और निर्यात की जाने वाली वस्तुओं की संख्या में निरंतर वृद्धि होती चली गई भारत के निर्यात ओं को मुख्य रूप से चार श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है

  1. कृषि कृषि एवं संबंधित उत्पादन
  2. अयस्क एवं खनिज
  3. निर्मित वस्तुएं
  4. अन्य

कृषि एवं संबंधित उत्पाद

इस मद में कॉफी चाय खल तंबाकू काजू गर्म साले चीनी कच्ची रुई चावल मछली एवं मछली से बनी वस्तुएं वनस्पति तेल फल सब्जियां और दालें आदि आते हैं

अयस्क एवं खनिज

इस मद में कच्चे मैग्नीज कच्चा लोहा और अभ्रक आदि शामिल किए जाते हैं

निर्मित वस्तुएं

इस मद में सूती वस्त्र सिले सिलाए कपड़े पटसन की बनी वस्तुएं चमड़ा और जूते हस्तशिल्प रसायन इंजीनियरिंग वस्तुएं और लोहा तथा इस्पात को शामिल किया जाता है

1 इंजीनियरिग वस्तुएं

  • इस मद में लोहे एवं इस्पात इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं और सॉफ्टवेयर सम्मिलित किए जाते हैं
  • योजना काल में औद्योगिकरण के अपनाए गए व्यापक कार्यक्रमों के परिणाम स्वरूप इंजीनियरिंग वस्तुओं के निर्यात में तेजी से वृद्धि हुई जिसके कारण यह मध्य भारत के निर्यात की एक प्रमुख मत बन गई
  • भारत की इंजीनियरिंग वस्तुएं बड़ी मात्रा में दक्षिणी पूर्वी एशिया दक्षिणी अफ्रीका अनेकों विकासशील देशों यूरोप के कुछ देशों तथा रूस को निर्यात की जाती हैं
  • देश के कुल निर्यात ओं में इस मद में किए गए निर्यातकों की भागीदारी का प्रथम स्थान है

2 हस्तशिल्प तथा हीरे जवाहरात

  • भारत के निर्यात ओं में हस्तशिल्प का अपना विशेष महत्व है
  • भारत ने इस मद से वर्ष 2005 6 में 5683 करोड रुपए का निर्यात किया वर्ष 1977 78 तकरीर एवं जवां रात को इस मद में शामिल किया जाता था
  • परंतु बाद में इसे हीरे एवं जवाहरात अलग मत मान लिया गया इस मद में किए गए निर्यात ओं की कुल निर्यात ओं में हिस्सेदारी देखें तो हम पाते हैं कि
  • इसका दूसरा स्थान आता है

3 खनिज तेल एवं पेट्रोलियम उत्पाद

  • इस मद में खनिज तेल पेट्रोलियम उत्पाद जिसमें कोयला भी शामिल किया गया है
  • जो भारत के निर्यात ओ में इस मद की प्रमुखता को बतलाता है
  • इस मद में किए गए निर्यात ओं के कुल निर्यात ओं में हिस्सेदारी का तीसरा स्थान है

4 रसायन एवं संबंधित पदार्थ

  • वर्तमान समय में भारत कई प्रकार के रंग रोगन चंदन अरंडी तेल सोडा आदि रासायनिक पदार्थों का निर्यात करता है
  • भारत द्वारा रसायन एवं संबंधित पदार्थों का निर्यात मुख्य रूप से अमेरिका रूस एवं ब्रिटेन को किया जाता है
  • इस मद में किए गए निर्यातकों की भारत के कुल निर्यात में हिस्सेदारी का क्रम चौथा आता है

5 सूती या निर्मित वस्तुएं तथा सिले सिलाई कपड़े

  • सूती या निर्मित वस्तुएं तथा सिले सिलाई कपड़े की मध्य भारत के निर्यात ओं की एक प्रमुख मदर है हाल के वर्षों में सिले सिलाई कपड़े एक प्रमुख निर्यात कीमत बन गए हैं
  • भारत को विदेशी बाजार में इस मद में निर्यात करने के लिए जापान पाकिस्तान हांगकांग आदि से प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है परंतु फिर भी इस मद में हमारे निर्यात निरंतर बढ़ रहे हैं
  • भारत का कपड़ा अमेरिका रूस अरब अफ्रीका वर्मा श्री लंका सिंगापुर थाईलैंड इंडोनेशिया एवं मलेशिया को निर्यात किया जाता है
  • भारत के निर्यात में इस मद में किए गए निर्यातकों का स्थान पांचवा है

6 चाय एवं कॉफी

  • चाय एवं कॉफी भारत के निर्यात की प्रमुख मद है ब्रिटेन हमारी चाय एवं कॉपी का प्रमुख खरीददार है
  • इसके अतिरिक्त अमेरिका कनाडा सूडान मिश्र एवं जर्मनी को भी इसका निर्यात किया जाता है

7 चमड़ा एवं निर्मित वस्तुएं

  • कच्ची खाली तथा चमड़ा भारतीय निर्यात की एक पारंपरिक एवं प्रमुख मद है
  • योजनाबद्ध विकास की प्रक्रिया के फल स्वरुप चमड़ा निर्मित वस्तुओं का उत्पादन बढ़ा और धीरे-धीरे उनका भी निर्यात होने लगा
  • अमेरिका रूस जापान ब्रिटेन इटली एवं फ्रांस आदि देशों को चमड़ा एवं निर्मित वस्तुएं निर्यात की जाती हैं

8 लौह अयस्क

  • भारत में अच्छी श्रेणी के लोहे अयस्क के भंडार होने के कारण लौह अयस्क एबी देश के प्रमुख निर्यात में अपना स्थान रखता है
  • भारत से कच्चा लोहा जापान कोरिया चीन एवं मध्य पूर्व के देशों को निर्यात किया जाता है

9 मछली एवं मछली निर्मित वस्तुएं

  • मछली एवं मछली निर्मित वस्तुओं के उत्पादन के संदर्भ में भारत में किए गए योजनाबद्ध कार्यक्रमों के परिणाम स्वरूप हाल के वर्षों में इसके उत्पादन में आशातीत वृद्धि हुई है
  • जिसके कारण यह मध्य भारत के निर्यात ओं की प्रमुख मत बन गई है जो भारत के निर्यात ओं में इस मद के महत्व को स्पष्ट करती है
  • मछली एवं मछली निर्मित वस्तुओं के लिए निर्यात के संबंध में जापान हमारा प्रमुख ग्राहक है

10 चावल

प्रमुख निर्यात

  • भारत के निर्यात ओं में चावल का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है
  • वर्ष 2005 06 में भारत ने 6221 करोड रुपए के चावल का निर्यात किया तेल उत्पादक देश हमारे चावल के प्रमुख ग्राहक हैं

11 काजू

  • भारत में काजू का निर्यात हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ा है जिसके कारण का जो भी देश के प्रमुख निर्यात की जाने वाली वस्तुओं की श्रेणी में गिना जाने लगा
  • भारत मुख्यतः अमेरिका रूस जर्मनी कनाडा जापान एवं नीदरलैंड आदि देशों को काजू निर्यात करता है

12 तंबाकू

  • भारत द्वारा किया जाने वाला निर्यात में तंबाकू के महत्व को नकारा नहीं जा सकता अभी भी यह देश के निर्यात के एक प्रमुख मद है
  • भारत संयुक्त राज्य रूस बांग्लादेश एवं जापान को तंबाकू का निर्यात करता है

13 जुट का सामान

  • जूट का कपड़ा जूट के थैले आदि का भी विदेशों को निर्यात किया जाता है
  • यह माल अमेरिका कनाडा आस्ट्रेलिया न्यूजीलैंड मिश्र एवं जापान आदि देशों को निर्यात किया गया
  • यह भारत का पारंपरिक निर्यात है

http://प्रमुखनिर्यात

May 22, 2020

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार क्या है समझाइए ?

ग्रामीण रोजगार (Rural Employment)

जनता शासन के पतन के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में http://रोजगार वृद्धि तथा गरीबी निवारण का यह कार्यक्रम काम के बदले अनाज की कमियों को दूर करने के लिए श्रीमती इंदिरा गांधी ने शुरू किया

छठी योजना में 1834 करार रुपए व्यय कर 177.5 करोड़ मानव दिवसों का रोजगार बढ़ाया गया

सातवीं योजना के 4 वर्षों 1986 से 89 में 3600 करोड रुपए व्यय कर लगभग 148 करोड मानव दिवसों का http://रोजगार सृजन किया गया

जो लक्ष्य से अधिक था ग्रामीण क्षेत्रों में

वृक्षारोपण,तालाब,पेयजल व सिंचाई के कुआं भूमि व जल संरक्षण

नई भूमि को खेती के लायक बनाने सड़क व स्कूल निर्माण आदि कार्यक्रम संपन्न किए गए

अप्रैल 1989 से इस कार्यक्रम तथा RLEGP कार्यक्रम को जवाहर रोजगार योजना में मिला दिया गया

ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारंटी कार्यक्रम (Rural Landless Employment Guarantee Programme-RLEGP

यह कार्यक्रम 1983 से प्रारंभ किया गया था इसके मुख्य उद्देश्य इस प्रकार रखे गए 1 भूमिहीनों के लिए http://रोजगार के अवसर बढ़ाना

ताकि प्रत्येक भूमिहीन श्रमिक परिवार में कम से कम एक व्यक्ति को वर्ष में 100 दिन तक काम मिल सके 2

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत आधार प्रदान करने के लिए टिकाऊ परिसंपत्तियों का निर्माण करना

यह कार्यक्रम पूर्णतया केंद्रीय सहायता प्राप्त कार्यक्रम था 1985 से 89 तक के 4 वर्षों में इस कार्य पर 2412 करोड रुपए व्यय हुए और

कुल 115 करोड मानव दिवस http://रोजगार उत्पन्न किया गया

जवाहर ग्राम समृद्धि योजना ( Jawahar Smridhi Yojana- JGSY)

  • जवाहर रोजगार योजना अप्रैल 1989 से प्रारंभ की गई तथा
  • जवाहर ग्राम समृद्धि योजना नवीन रूप से एक अप्रैल 1999 से प्रारंभ की गई सितंबर 2001 से इसे संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना में मिला दिया
  • गया इस योजना का मौलिक उद्देश्य गांव में मांग आधारित सामुदायिक असरचना का सृजन करना है
  • जिसमें टिकाऊ सामुदायिक एवं सामाजिक परिसंपत्तियों का सृजन सम्मिलित है
  • इसका प्रथम उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगार एवं अल्प बेरोजगार व्यक्तियों के लिए लाभकारी रोजगार अवसरों का सृजन करना भी है
  • इस योजना को दिल्ली और चंडीगढ़ को छोड़ समग्र देश के सभी ग्राम पंचायतों में लागू किया गया।

सूखा राहत क्षेत्र कार्यक्रम (Drought Prone Area Programme- DPAP)

  • सूखे की संभावना वाले चुनिंदा क्षेत्रों में यह राष्ट्रीय कार्यक्रम 1973 में प्रारंभ किया गया
  • कार्यक्रम का उद्देश्य इन क्षेत्रों में भूमि जल एवं अन्य प्राकृतिक संसाधनों का अनुकूलतम विकास करके पर्यावरण संतुलन को बहाल करना है
  • यह कार्यक्रम ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा चलाए जा रहा है
  • योजना आयोग के सदस्य डॉक्टर जयंत पाटिल की अध्यक्षता में सूखा क्षेत्रों के लिए 25 वर्षीय भावी योजना तैयार करने के निमित्त
  • एक उच्च शक्ति प्राप्त समिति का गठन किया गया

न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम (Minimum Needs Programme-MNP)

  • यह कार्यक्रम भी अप्रत्यक्ष रूप से गरीबी दूर करने में सहायक है
  • क्योंकि इसके अंतर्गत ग्रामीण सड़कें पेयजल विद्युतीकरण आदि कार्य संपादन करने में गरीबों को रोजगार एवं आय के अवसर मिलते हैं

20 सूत्री कार्यक्रम (20 Point Programme- TPD)

  • ”गरीबी हटाओ” नारे के अंतर्गत वर्ष 1975 से 20 सूत्री कार्यक्रम क्रियान्वित किया जा रहा है
  • यह भी गरीबी निवारण का एक महत्वपूर्ण अंग है और इसमें गरीबी मिटाने के कई तत्वों का समावेश है

नेहरू रोजगार योजना (Nehru Rojgar Yojana- NRY)

  • नगरीय क्षेत्रों में गरीबी उन्मूलन की इस योजना का श्रीगणेश अक्टूबर 1989 में किया गया
  • इस योजना को संशोधित कर इसमें प्रशिक्षण रोजगार तथा गरीबों को लाभान्वित करने की व्यवस्था है
  • इसके कार्यक्रमों में जहां 1991 से 92 में 1.59 लाख गरीब परिवारों को लाभान्वित किया गया
  • वहां 1994 से 95 में 1.25 लाख गरीब परिवार लाभान्वित हुए आठवीं योजना में लगभग 615 लाख मानव दिवसों का रोजगार दिया गया
  • इस योजना को अब “स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना” में मिला दिया गया

शिक्षित बेरोजगार युवक स्वरोजगार योजना ( Scheme of self Employment for Education Unemployment Youth- SEEUY)

  • ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में बेरोजगार शिक्षित युवाओं को लाभप्रद स्वरोजगार प्रदान करने के उद्देश्य से यह योजना 1983 से 84 में लागू की गई
  • इस योजना के अंतर्गत बैंकों से ऋण उपलब्ध कराकर बेरोजगारी युवकों को स्वरोजगार के लिए प्रेरित किया जाता है
  • बैंक ऋण का 25% केंद्र सरकार द्वारा अनुदान दिया जाता है
  • 1994 से 95 से ही इस योजना को नई प्रधानमंत्री रोजगार योजना में मिला दिया गया

प्रधानमंत्री रोजगार योजना (Prime Minster Rojgar Yojana- PMRY)

  • यह योजना गरीबी निवारण तथा स्वरोजगार की योजना है
  • जो 1993-94 से लागू की गई 1993-94 में इस योजना के अंतर्गत 32 हजार लोगों को लाभान्वित किया गया
  • जबकि आठवीं योजना के अंत तक लगभग 10 लाख शिक्षित बेरोजगार युवकों को रोजगार प्रदान करने का लक्ष्य था
  • 1997-98 में 3.1 लाख को रोजगार दिया गया
  • इस योजना में इसी वर्ष से चालू शिक्षित बेरोजगार युवक स्वरोजगार योजना को भी समन्वित कर लिया गया
  • इसमें 18-35 वर्ष के आयु वर्ग के प्रत्याशियों को प्रोजेक्ट लागत के 5% के साधन स्वयं जुटाने होंगे
  • जबकि केंद्रीय सरकार को अनुदान 15% तथा अधिकतम 7500 रुपए तथा बैंक ऋण की राशि अधिकतम एक लाख रुपए तक हो सकेगी

रोजगार आश्वासन योजना (Employment Assurance Scheme- EAS)

  • यह योजना भी 1993 94 में घोषित की गई है तथा इसे देश के 1752 पिछड़े विकास खंडों में लागू किया गया था
  • अब इसमें 3206 पिछड़े विकासखंड शामिल हैं
  • इस योजना के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों के रोजगार चाहने वाले गरीबों को वर्ष में प्रति व्यक्ति 100 दिनों का एक कुशल श्रम रोजगार प्रदान करने का प्रावधान है
  • इस योजना की वित्त व्यवस्था केंद्र तथा राज्य सरकारें 80:20 प्रतिशत के अनुपात में करेंगी।

स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना ( Swarna Jayanti Sahari Rojgar Yojana- SJSRY)

  • स्वतंत्रता के स्वर्ण जयंती वर्ष में केंद्र सरकार ने शहरी क्षेत्रों में निर्धनता निवारण की एक नई योजना प्रारंभ की गई।
  • स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना के नाम से प्रारंभ की गई यह योजना 1 दिसंबर 1997 से लागू की गई ।
  • इस योजना में शहरी क्षेत्रों में पहले से कार्यान्वित की जा रही तीन योजनाओं नेहरू रोजगार योजना
  • निर्धनों के लिए शहरी बुनियादी सेवाएं तथा प्रधानमंत्री की समन्वित शहरी गरीबी उन्मूलन योजना को शामिल किया गया।
  • इन योजनाओं के तहत चल रहे कार्यों का 30 नवंबर 1997 तक पूरा करने के निर्देश सभी राज्यों को दे दिए गए थे ।
  • नई प्रारंभ की गई स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना का उद्देश्य शहरी निर्धनों को स्वरोजगार
  • उपक्रम स्थापित करने हेतु वित्तीय सहायता प्रदान तथा से वेतन रोजगार सृजन हेतु उत्पादक परिसंपत्तियों का निर्माण करना है ।
  • स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना के लिए धन की व्यवस्था केंद्र तथा राज्यों के मध्य 75:25 के अनुपात में की गई इस योजना की दो विशेषता में है

(A) शहरी स्वरोजगार कार्यक्रम (Urban Self Employment Programme-YSEP)

(B) शहरी मजदूरी रोजगार कार्यक्रम (Urban Employment Programme – YSEP)-इसके तीन अलग-अलग भाग हैं

१ प्रत्येक शहरी गरीब लाभार्थी को लाभप्रद स्वरोजगार उद्यम लगाने के लिए सहायता

  • २ शहरी गरीब महिलाओं के समूह को लाभप्रद स्वरोजगार उद्यम लगाने के लिए सहायता देना
  • इस योजना को शहरी क्षेत्रों में महिलाओं और बच्चों की विकास योजना कहा जाता है
  • ३ लाभार्थियों संभावित लाभार्थियों और शहरी रोजगार कार्यक्रम से संबंध अन्य व्यक्तियों को व्यवसायिक और उद्यम मूलक कौशल के उन्नयन के लिए प्रशिक्षण देना
  • यह कार्यक्रम भारत के लगभग सभी शहरी नगरों पर लागू होगा तथा
  • इसे शहरी गरीब समूह पर विशेष ध्यान देते हुए समग्र नगर आधार पर कार्यान्वित किया जाएगा

काम के बदले अनाज कार्यक्रम (Food for Work Programme)

ग्रामीण विकास मंत्रालय ने जनवरी 2001 में सूखा प्रभावित राज्यों के ग्रामीण इलाकों में काम के बदले अनाज कार्यक्रम शुरू किया

यह कार्यक्रम रोजगार गारंटी योजना के तहत शुरू किया गया बाद में इस योजना का विस्तार कर इसके केरल और बिहार के बाढ़ भारी वर्षा प्रभावित क्षेत्रों में भी लागू किया गया

इस कार्यक्रम के तहत अतिरिक्त संसाधन के तौर पर अनाज गेहूं और चावल के निशुल्क आवंटन की व्यवस्था है

1 अप्रैल 2002 से कार्यक्रम को समाप्त कर दिया गया था

किंतु इसे संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना के विशेष घटक के तौर वर्ष 2002-03 में जारी रखा गया

ग्रामीण रोजगार सृजन कार्यक्रम (Rural Employment Generation Programme)

1955 में ग्रामीण इलाकों एवं छोटे शहरों में स्वरोजगार के अवसर पैदा करने के उद्देश्य से शुरू किया गया

कार्यक्रम खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग द्वारा कार्यान्वित किया जा रहा है

आरंभ से 31 मई 2004 तक 1 दशमलव 86 लाख परियोजनाओं के वित्तपोषण से 22.75 लाख नौकरी अवसर राजित किए जा चुके हैं

10वीं योजना में 25 लाख रोजगार सृजन का लक्ष्य है

इंदिरा आवास योजना

1999-2000 में शुरू की गई है योजना गरीबों के लिए मुफ्त में मकानों के निर्माण की प्रमुख योजना

वाल्मिकी अंबेडकर आवास योजना

दिसंबर 2001 में शुरू की गई है योजना गंदी बस्तियों में रहने वालों के लिए घरों के निर्माण और उन्नयन को शो साध्य बनाती है

31 दिसंबर 2004 तक भारत सरकार ने 753 करोड रुपए और इतनी ही राशि राज्य सरकारों द्वारा वह कर 3.5 लाख आवासों एवं 49.3 हजार टॉयलेट सीटों का निर्माण किया गया

रोजगार

अंत्योदय अन्न योजना

दिसंबर 2000 में शुरू की गई इस योजना के अंतर्गत

गरीबी परिवार को ₹2 प्रति किलोग्राम गेहूं तथा ₹3 प्रति किलोग्राम दर पर चावल अत्यधिक सब्सिडी प्राप्त दर पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से उपलब्ध कराया जाता है

खाद्यान्न की मात्रा जो प्रारंभ में 25 किलोग्राम प्रति महा थी उसे एक अप्रैल 2002 से बढ़ाकर 35 किलोग्राम प्रति परिवार प्रति माह कर दिया है

आरंभ में यह योजना एक करोड़ बीपीएल परिवारों के लिए थी

जून 2003 में इसका विस्तार कर इसे 50 लाख बीपीएल परिवार और शामिल किए

1 अगस्त 2004 से 50 लाख बीपीएल परिवार और शामिल किए जाने से अब

यह योजना दो करोड़ बीपीएल परिवारों को लाभान्वित कर रही है

प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना (PMGY)

  • यह सुनिश्चित करने के लिए कि आर्थिक सुधारों के लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचे ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन स्तर के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक
  • तथा आर्थिक आधारभूत ढांचे के पांच तत्वों की पहचान की गई है वह मुख्यतः हैं
  • स्वास्थ्य
  • शिक्षा
  • पेयजल
  • आवास
  • सड़कें

इस योजना के तहत 1 प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना तथा

2 ग्रामीण आवास कार्यक्रम को शामिल किया गया है

ग्रामीण सड़कों द्वारा गांव को जोड़ने का उद्देश्य ने केवल देश के ग्रामीण विकास में सहायक है

बल्कि इसे गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम में एक प्रभावी घटक स्वीकार किया गया है

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना 25 दिसंबर 2000 से प्रारंभ की गई

May 22, 2020

भारत में निर्धनता के प्रमुख लक्षण Main Cause of Poverty in India

निर्धनता (Poverty)

देश में भारतीय योजना आयोग के मतानुसार निर्धनता के दो कारण अल्प विकास एवं ऐसा मानता है

कुछ लोग निर्धनता के कारणों में बेरोजगारी निम्न उत्पादकता जनसंख्या में विस्फोटक बृद्धि प्राकृतिक प्रकोप पूंजी की कमी प्रेसिकट उत्पादन में धीमी गति से वृद्धि निर्धनों द्वारा खाद्यान्नों के लिए दी जाने वाली कीमतों में वृद्धि कार्यशील जूतों का असमान वितरण अत्यधिक सामाजिक पिछड़ापन तथा सामाजिक बाधाओं का समावेश करते हैं

संक्षेप में भारत में व्यापक गरीबी के प्रमुख कारण इस प्रकार है

1 अल्प विकास

  1. भारत प्राकृतिक साधनों की दृष्टि से संपन्न है किंतु अल्प विकास के कारण उन साधनों का पर्याप्त विदोहन ने होने से उत्पादन आए रोजगार तथा उपभोग का स्तर बहुत नीचा है
  2. और गरीबी का बोलबाला है स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद योजनाबद्ध विकास से भारत स्वयं इस्फुर्ट अर्थव्यवस्था में पहुंच गया है
  3. फिर भी विकास की गति जनसंख्या की विस्फोटक वृद्धि के कारण धीमी है

2 आर्थिक असमानता

  1. भारत में व्याप्त निर्धनता के लिए आर्थिक असमानता भी देश में महत्वपूर्ण कारण है
  2. देश में जो भी विकास हुआ उसका अधिकांश लाभ समृद्ध वर्ग को मिला है
  3. धनी और निर्धनों के मध्य खाई और गहरी हो गई है यद्यपि पिछले कुछ दशकों से 20 सूत्री कार्यक्रम पिछड़े को पहले समन्वित ग्रामीण विकास कार्य अनुसूचित जाति एवं जनजाति विकास कार्यक्रमों और गरीबी निवारण कार्यक्रमों से आए की निर्धनता ऐसा मानता को कम करके निर्धनता को कम किया गया है
  4. फिर भी धन एवं संपत्ति की समानता अवसर की समानता प्रादेशिक एवं क्षेत्रीय असमानता में निर्धनता बढ़ाने में सहयोग दिया है

3 जनसंख्या में विस्फोटक वृद्धि

  1. भारत की जनसंख्या में 2.5% वार्षिक वृद्धि दर से विस्फोटक वृद्धि ने विकास को बहा दिया है
  2. जनसंख्या में इतनी ऊंची दर से वृद्धि और गरीबों के बड़े परिवार ने उन्हें और अधिक गरीब बनाया है
  3. प्रति व्यक्ति आय एवं उपभोग स्तर बहुत नीचा है यही कारण है
  4. कि लोगों को न्यूनतम जीवन स्तर भी उपलब्ध नहीं हो पाने से वह निर्धनता की रेखा के नीचे जीवन जी रहे हैं

4 बेरोजगारी एवं अर्द्ध बेकारी

  1. भारत में भी बेरोजगारी एवं अर्ध बेकारी प्रमुख कारण है
  2. योजनाबद्ध विकास के अंतर्गत नए रोजगार के लगभग 21.5 करोड अतिरिक्त अवसर बढ़ने के बावजूद देश में निरंतर बढ़ती बेकारी एवं अर्ध बेकारी ने गरीबी को बढ़ाया है
  3. जहां पहली योजना के अंत में रोजगार ओं की संख्या 53लाख थी वहां पांचवी योजना के अंत में बेरोजगारों की संख्या 2.94 करोड़ पहुंच गई
  4. 2000-01 के अंत तक पंजीकृत बेरोजगारों की संख्या भी लगभग चार करोड़ पहुंच गई थी
  5. 2005-06 तक इसके बढ़कर 6.5 करोड़ होने की अनुमान है ऐसी स्थिति में निर्धनता का बढ़ना एवं बने रहना स्वाभाविक है

5 उत्पादन के निम्न प्रौद्योगिकी

  1. भारत में उत्पादन की परंपरागत और निम्न प्रौद्योगिकी का वर्चस्व भी निर्धनता के लिए उत्तरदाई है
  2. नवीन एवं आधुनिकतम तकनीक के अभाव में उत्पादन और आय में धीमी गति से वृद्धि लोगों को निर्धन बनाए रखने के लिए काफी है
  3. यद्यपि अब योजनाबद्ध विकास के अंतर्गत आधुनिक प्रौद्योगिकी को बढ़ावा दिया जा रहा है
  4. किंतु पूंजी विनियोग में कमी श्रमिकों के विरोध तथा विदेशी विनिमय संकट के साथ-साथ कुशल एवं प्रशिक्षक श्रम की कमी इसमें बाधा है

6 पूंजी निर्माण की धीमी गति

  1. देश में पूंजी के अभाव में देश में औद्योगिकीकरण तेजी से नहीं हो पाया और नहीं उत्पादन की नवीन प्रौद्योगिकी को बल मिला उत्पादन के नीचे स्तर आए और रोजगार की कमी ने बच्चों को हतोत्साहित किया है
  2. और पूंजी निर्माण न होने से गरीबी पुख्ता हुई है यद्यपि पिछले तीन दशकों में आर्थिक विकास ने पूंजी निर्माण की गति तेज की है

7 प्रति व्यक्ति निम्न आय एवं निम्न उपयोग स्तर

  1. निर्धनता का मापदंड आय एवं उपभोग का वांछित न्यूनतम स्तर से भी कम होना है
  2. भारत में बेकारी निम्न उत्पादन एवं राष्ट्रीय आय के निम्न स्तर के कारण प्रति व्यक्ति आय कम है
  3. और परिणामस्वरूप देश में कई लोग वंचित न्यूनतम उपभोग स्तर से भी वंचित हैं यही कारण है
  4. कि जहां 1960 61 मैं लगभग 19 करोड व्यक्ति निर्धनता के रेखा से नीचे थे
  5. वहां 1980 में उनकी संख्या बढ़कर 31.7 करोड़ हो गई है सातवीं योजना के आरंभ में भी 97.3 करोड व्यक्ति निर्धनता की रेखा से नीचे माने गए थे
  6. अब भी लगभग 26 करोड व्यक्ति निर्धनता के रेखा से नीचे हैं

8 बढ़ती मुद्रास्फीति एवं आवश्यक वस्तुओं की अपर्याप्त

  1. भारत में बढ़ती महंगाई और आवश्यक वस्तुओं की पूर्ति में कमी से भी गरीबी को बढ़ावा मिला है
  2. आज आदमी अपनी समिति आए से अपने वांछित न्यूनतम जीवन स्तर को भी प्राप्त करने में असमर्थ है
  3. 1960 के मुकाबले औद्योगिक श्रम उपभोग सूचकांक अक्टूबर 1988 पहुंच गया था
  4. यही नहीं 1970-71 के आधार वर्ष में से 20 सामान्य थोक मूल्यों का सूचकांक लगभग चार गुना है
  5. आजकल डालो खाद्य तेलों आदि में भी भारी तेजी का रुख स्थिर आय वाले लोगों को गरीबी के गर्त में धकेल रहा है
  6. देश में खाद्य तेलों डालो शक्कर जैसी अनिवार्य वस्तुओं की उपलब्धता कम होने से जीवन स्तर में गिरावट रही है

9 सामाजिक बाधाएं

भारत में सामाजिक रूढ़िवादिता एवं धार्मिक अंधविश्वास ने कई कुरीतियों को जन्म दिया है

  • विवाह उत्सव मृत्यु भोज आदि कार्यों पर अनुपा तक फिजूलखर्ची ने भारतीय ग्रामीण जनसंख्या को रिंग रस्ता में डुबोया है
  • बच्चों के जन्म को भगवान की देन मानने से जनसंख्या में विस्फोटक वृद्धि हुई है
  • जातिवाद भाग्यवादी ताने लोगों को अकर्मण्य ने बनाया है
  • संयुक्त परिवार प्रथा ने व्यक्तिवाद को हतोत्साहित कर उन्हें पर आश्रित बनाने में योग दिया है
  • श्रम की गतिशीलता में कमी तथा कार्य कुशलता का नीचे स्तर भारत में निर्धनता को बढ़ाने में सहायक रहे हैं
  • धीरे-धीरे शिक्षा के प्रसार सामाजिक उत्थान एवं बढ़ती जागरूकता से लोग दरिद्रता के कुचक्र से बाहर निकल रहे हैं

10 सामाजिक सेवाओं का अभाव

  • भारत में सार्वजनिक वस्तुओं तथा सेवाओं का वितरण अपर्याप्त है
  • जिसके कारण लोग यह सेवाएं तथा वस्तुएं अधिक मूल्य पर निजी वितरकों से क्रय करते हैं
  • फल स्वरुप इनकी आय का एक बड़ा भाग चिकित्सा पेयजल सफाई शिक्षा आदि के क्रय में चला जाता है
  • तथा यह लोग निर्धन ही बने रहते हैं

May 22, 2020

भारत में बेरोजगारी का स्वरूप? nature of unemployment in India

1 संरचनात्मक बेरोजगारी Structural unemployment

सामाजिक आर्थिक एवं तकनीकी विकास के परिणाम स्वरूप उद्योगों का विस्तार होता है जबकि कुछ अन्य उद्योग धीरे-धीरे संकुचित होते जाते हैं

यदि भौगोलिक एवं तकनीकी दृष्टि से सर में पूर्णता गतिशील हो तो संकुचित होने वाले उद्योगों के श्रमिक नए उद्योगों में ख पाए जा सकते हैं परंतु वास्तव में श्रम इन दृश्यों से पूर्णता गतिशील नहीं होता

जिसके कारण कुछ http://बेरोजगारी उत्पन्न होती है औद्योगिक जगत में इस प्रकार के संरचनात्मक परिवर्तनों के परिणाम स्वरूप उत्पन्न होने वाली बेरोजगारी संरचनात्मक बेरोजगारी कहलाती है

2 छिपी हुई बेरोजगारी Disguised unemployment

इसके अंतर्गत श्रमिक बाहर से तो काम पर लगे हुए प्रतीत होते हैं किंतु वास्तव में उन श्रमिकों की उस कार्य में आवश्यकता नहीं होती अर्थात उनकी सीमांत उत्पत्ति सुनने या नहीं के बराबर होती है

वास्तव में यदि उन श्रमिकों को उस कार्य से निकाल दिया जाए तो कुल उत्पादन पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता

भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि तथा उद्योगों में जनसंख्या के भारी दबाव में रोजगार अवसरों के अभाव में छिपी हुई http://बेरोजगारी चरम सीमा पर है इसको अदृश्य बेकारी भी कहते हैं

3 खुली बेरोजगारी Open Unemployment

इससे तात्पर्य उस बेरोजगारी से है जिसके अंतर्गत श्रमिकों को बिना किसी कामकाज के रहना पड़ता है उन्हें थोड़ा बहुत भी काम नहीं मिलता है

भारत में बहुत से श्रमिक गांव से शहरों की तरफ काम प्राप्त करने के लिए जाते हैं किंतु काम उपलब्ध न होने के कारण वहां बेरोजगार पड़े रहते हैं

इसके अंतर्गत मुख्यतः शिक्षित बेरोजगार तथा साधारण बेरोजगार श्रमिकों को सम्मिलित किया जाता है

4 चक्रीय बेरोजगारी Cyclical unemployment

पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में जब मांग और पूर्ति में असंतुलन से तेजी से मंदी का कुचक्र बेकारी का कारण बनता है तो कई लोग बेकार हो जाते हैं तो वह चक्रीय बेकारी है

मंदी काल में वस्तुओं के भावों में कमी तथा उत्पादन अधिक कैसे बेकारी का तांडव नृत्य होता है 1930 की आर्थिक मंदी या युद्ध तत्कालीन मंदी आदि चक्रीय http://बेरोजगारी के उदाहरण हैं

5 मौसमी बेरोजगारी Seasonal unemployment

इसके अंतर्गत किसी विशेष मौसम या अवधि में प्रति वर्ष उत्पन्न होने वाली बेरोजगारी को सम्मिलित किया जाता है

भारत में रवि और खरीफ की फसलों के बीच की अवधि में मानसून ने आने तक किसानों को बेकार बैठना पड़ता है इस प्रकार चीनी गुड़ आदि उद्योगों में काम केवल मौसम में होता है बाद में बेकार बैठना पड़ता है

लघु एवं कुटीर उद्योगों के पतन से मौसमी बेरोजगारी अधिक कष्टप्रद हुई है सिंचाई के साधनों के विकास बहु फसल योजना तथा राहत कार्यों आदि से समस्या पर कुछ काबू पाया जा सकता है

6 शहरी बेरोजगारी Urban unemployment

शहरी क्षेत्र में प्राय खुले किस्म की बेरोजगारी पाई जाती है इसमें औद्योगिक बेरोजगारी तथा शिक्षित http://बेरोजगारी को सम्मिलित किया जाता है

7 ग्रामीण बेरोजगारी Rural unemployment

इसे कृषि गत बेरोजगारी भी कहा जाता है भारत में ग्रामीण बेरोजगारी एक प्रमुख समस्या बनी हुई है इस प्रकार की बेरोजगारी के सही आंकड़े भी उपलब्ध नहीं है

8 औद्योगिक अथवा तकनीकी बेरोजगारी (Industrial or technological unemployment)

उत्पादन कार्य में विज्ञान और तकनीकी ज्ञान के विस्तार से जब सुधरी तथा स्वचालित मशीनों का प्रयोग होता है तो दो प्रकार से बेकारी बढ़ती है

पहले जो लोग नई मशीनों को चलाने में अयोग्य होते हैं उन्हें काम से हाथ धोना पड़ता है तथा दूसरे स्वचालित मशीनों में श्रमिकों की कम आवश्यकता पड़ती है

कृषि में भी वैज्ञानिक तरीकों से बेकारी की अधिक संभावना बढ़ती है भारत में कृषि तथा उद्योग दोनों में तकनीकी बेरोजगारी का क्षेत्र व्यापक है और

इसलिए उद्योगों में नवीनीकरण विवेकी करण वैज्ञानिक की करण की गति धीमी है ताकि विवेकी कारण बिना आंसुओं के संभव हो सके

बेरोजगारी

9 अस्थाई बेकारी (Sudden unemployment)

बाजार की दशा में परिवर्तन होने से उत्पन्न बेरोजगारी के घटनात्मक बेरोजगारी कहते हैं बाजार की मांग देश में उपलब्ध साधनों पर निर्भर करती है इनकी उपलब्धता में परिवर्तन हो जाने पर मांग पक्ष प्रभावित होता है

कभी-कभी किसी व्यापारिक अथवा औद्योगिक इकाइयां समूचे उद्योग पर अचानक संकट से उद्योग बंद हो जाते हैं तो उसमें नियोजित व्यक्ति जब तक दूसरी जगह काम पर नहीं लग जा पाते अस्थाई रूप से अचानक बेरोजगार हो जाते हैं

ठीक इसी प्रकार कृषि पर आधारित धंधे अकाल से थोड़े समय के लिए ठप हो जाते हैं तो यह बेकार है आस्थाई तथा आत्मिक कही जाती है

इस प्रकार कच्चे माल के अभाव विद्युत शक्ति के अभाव या मशीनों की टूट-फूट हो जाने से भी कुछ समय के लिए कारखाने बंद कर दिए जाते हैं

10 शिक्षित तथा अशिक्षित बेरोजगारी (Educated and uneducated unemployment)

  • जब देश में शिक्षित वर्ग में बेकारी होती है तो उस शिक्षित बेरोज -गारी कहा जाता है
  • और जब अशिक्षित ओं की इच्छा तथा योग्यता होने पर भी वर्तमान वेतन दर रोजगार उपलब्ध नहीं होता है तो ऐसे क्षित बेरोज-गारी कहा जाता है
  • भारत में शिक्षित बेकारी के दो स्वरूप है सामान्य शिक्षा प्राप्त बेकार ओं की संख्या अधिक है
  • जबकि तकनीकी तथा वैज्ञानिक शिक्षा प्राप्त लोगों की बेकारी कम है
  • जब शिक्षित हो में ही बेकारी है तो अशिक्षित की बेकारी तो उनकी पूर्ति बहुत अधिक और मांग कम होने से चरम सीमा पर है यही कारण है
  • कि शिक्षकों में छिपी हुई तथा अदृश्य बेरोजगारी का बोलबाला है

11 अल्प रोजगार

  • इसके अंतर्गत ऐसे श्रमिक आते हैं जिनको थोड़ा बहुत काम मिलता है और
  • जिनके द्वारा वह कुछ अंशों तक उत्पादन में योगदान देते हैं किंतु इनके अपनी क्षमता अनुसार काम नहीं मिलता या पूरा काम नहीं मिलता
  • इसमें कृषि में लगे श्रमिक भी आते हैं जिन्हें करने के लिए कम काम मिलता है
  • भारत में अल्प रोजगार के दो स्वरूप हैं दृश्य और अदृश्य

दृश्य

  • दृश्य अल्प रोजगार को मापा जा सकता है यह सुस्त मौसम में कृषि एवं कृषि आधारित उद्योगों में पाया जाता है
  • इसका विशेष प्रभाव गांव में व रोजगार प्राप्त महिलाओं में देखा जाता है
  • इसका आधार समय होता है अर्थात काम की अवधि कम होती है

अदृश्य

  • अदृश्य अल्प रोजगार का प्रत्यक्ष रूप से माप नहीं हो सकता यह स्वरोजगार में लगे व्यक्तियों में वर्ष भर पाया जा सकता है
  • और अपर्याप्त काम है के कारण यह अल्प उत्पादकता व अल्फा मदनी के रूप में प्रकट होते हैं
  • ऐसे व्यक्ति अपनी आय बढ़ाने के लिए अतिरिक्त काम या वैकल्पिक काम करना चाहते हैं

May 21, 2020

भारतीय अर्थव्यवस्था की आधारभूत विशेषताएं क्या हैं?

1 विशाल एवं विस्तृत अर्थव्यवस्था A Great Economy

  • भारतीय अर्थव्यवस्था विशाल अर्थव्यवस्था है
  • जो विश्व के उत्तरी गोलार्ध में 8.4′ डिग्री से 37.6 अक्षांश
  • तथा 68.17′ डिग्री से 97.2 पूर्वी देशांतर के बीच में फैली हुई है
  • ओखा से अरुणाचल तथा कश्मीर से कन्याकुमारी तक
  • पहले भारत का क्षेत्रफल 32.900000 वर्ग किलोमीटर तथा जनसंख्या 125 करोड़ से अधिक है
  • क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का विश्व में सातवां तथा जनसंख्या की दृष्टि से दूसरा स्थान है यह इसकी विशालता का परिचायक है

2 विकासशील अर्थव्यवस्था Developing Economy

  • भारतीय अर्थव्यवस्था पिछड़ी किंतु विकासशील अर्थव्यवस्था है
  • अर्थव्यवस्था में आर्थिक पिछड़ापन एवं दरिद्रता है
  • पूंजी निर्माण की गति धीमी व्यापक बेरोजगारी तकनीकी ज्ञान का अभाव जनसंख्या का अत्यधिक बार और भुखमरी आदि के समापन के लिए
  • योजनाबद्ध विकास द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था अब निरंतर आर्थिक विकास की ओर अग्रसर हो रही है
  • औद्योगिकरण कृषि विकास परिवहन एवं संचार के विकास से विकास का मार्ग प्रशस्त हो रहा है

3 कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था

  • भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था है जिसमें कृषि राष्ट्रीय आय का प्रमुख स्रोत रोजगार का आधार
  • जीवन यापन का प्रमुख साधन ही नहीं वरन औद्योगिक की कच्चे माल का स्रोत एवं निर्मित माल का बाजार भी है
  • दो हजार तीन चार में सम को के अनुसार 1993 94 की कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद का लगभग
  • 22.1 प्रतिशत भाग कृषि तथा संबंधित क्षेत्र से प्राप्त होता है
  • जो 64% जनसंख्या के रोजगार एवं जीवन यापन का आधार है
  • उद्योगों के लिए कच्चा माल गन्ना पटसन तिलहन खाद्यान्न सब कृषि से ही प्राप्त होते हैं

4 औद्योगिक पिछड़ापन एवं असंतुलित विकास

  • भारतीय अर्थव्यवस्था में विकसित देशों की तुलना में काफी औद्योगिक पिछड़ापन है
  • उद्योगों से राष्ट्रीय आय का 26% भाग प्राप्त होता है और उन में कार्यशील जनसंख्या के लगभग 15% भाग को रोजगार प्राप्त हो है
  • यही नहीं उद्योगों में उपभोग उद्योगों की प्रधानता रही है
  • पूंजीगत एवं आधारभूत उद्योगों की प्रगति धीमी रही है
  • यद्यपि योजनाबद्ध विकास के अंतर्गत लोह इस्पात मशीन निर्माण भारी रसायन विद्युत आदि उद्योगों का विकास हुआ है
  • फिर भी वह नगण्य है औद्योगिक करण में काफी क्षेत्रीय विषमता है
  • जहां एक और पश्चिम बंगाल बिहार महाराष्ट्र गुजरात एवं तमिलनाडु औद्योगिक दृष्टि से विकसित है
  • वहां दूसरी ओर आसाम उड़ीसा जम्मू और कश्मीर तथा राजस्थान काफी पिछड़े हुए हैं
  • असंतुलित औद्योगिक विकास का ढांचा औद्योगिक पिछड़ेपन का कारण है
  • लघु एवं कुटीर उद्योग भी काफी पिछड़े हुए हैं औद्योगिक क्षेत्र की औसत वार्षिक वृद्धि दर 9वी योजना काल में 4.5% थी
  • जो कि लक्षित दर 8.7% से बहुत कम थी
  • वर्ष 2006 में अग्रिम अनुमानों के अनुसार यह दर 9% है

5 जनसंख्या में विस्फोटक वृद्धि

  • भारत में जनसंख्या अधिक है जिससे जनसंख्या का भार निरंतर बढ़ता जा रहा है
  • भारत में विश्व की 16.87% जनसंख्या है किंतु क्षेत्रफल है 2.4 प्रतिशत ही जनसंख्या की दृष्टि से भारत का विश्व है
  • जनसंख्या की वार्षिक वृद्धि दर 1.0% है प्रतिवर्ष 24 करोड बच्चे जन्म लेते हैं
  • और हर वर्ष एक नए आस्ट्रेलिया का निर्माण होता है
  • इसी तीव्र वृद्धि के कारण जहां 1951 में भारत की जनसंख्या 36 करोड़ थी
  • वह बढ़कर मार्च 2011 को 125 करोड़ से अधिक हो गई है तथा अब 125 करोड़ से अधिक है
  • इस विस्फोटक वृद्धि से अनेक सामाजिक एवं आर्थिक समस्याएं उत्पन्न हुई हैं

6 व्यापक बेकारी एवं अर्ध बेकारी

  • भारतीय अर्थव्यवस्था में आर्थिक विकास एवं तीव्र जनसंख्या वृद्धि से भारतीय अर्थव्यवस्था में बेकारी एवं अर्थ बेकारी निरंतर बढ़ रही है
  • प्रथम योजना के शुरू में बेरोजगारों की ओर 4500000 थी जिसके अब बढ़कर 65 करोड होने की संभावना है
  • जबकि विभिन्न योजनाओं में लगभग 245 करोड अतिरिक्त लोगों को रोजगार प्रदान किया गया है
  • कृषि क्षेत्र में बड़े पैमाने पर आज बेकारी मौसमी बेकारी एवं छिपी हुई बेकारी की समस्या विकट है

7 अर्थव्यवस्था की दोहरी प्रकृति

  • भारतीय अर्थव्यवस्था की मुख्य विशेषता है कि इसके विभिन्न क्षेत्रों में दोहरा स्वरूप देखने को मिलता है
  • एक और अर्थव्यवस्था का व्रत ग्रामीण क्षेत्र पर चढ़ा रूढ़िवादी अनपढ़ एवं आधुनिक सभ्यता से परे लगता है
  • वहां दूसरी और छोटे-छोटे विकसित समृद्ध शिक्षित एवं आधुनिक लगता है
  • जहां ग्रामीण क्षेत्रों में बैलगाड़ी खच्चर एवं उठे तो शहरों में रेल मोटर एवं वायु यान जैसी तकनीकी सुविधाएं हैं
  • जहां एक और बड़े पैमाने के 20 साल आधुनिक कारखाने हैं
  • तो दूसरी और लघु एवं कुटीर उद्योगों की प्रधानता है
  • एक और धनी एवं विश्व जीवन है तो दूसरी और आर्थिक दरिद्रता भुखमरी एवं बेकारी है
  • कुछ लोग अधिक खाने से मरते हैं तो अधिकांश लोग अभावों से मरते हैं

8 पूंजी निर्माण की धीमी गति

  • आर्थिक दरिद्रता और निम्न आय के कारण अर्थव्यवस्था में बचत एवं विनियोग का स्तर नीचा रहता है
  • जहां विकसित देशों में पूंजी निर्माण की दर 25% से 35% है
  • वहां भारत में पूंजी निर्माण की समायोजित दर 1950-51 में 8.7% थी जो 2003-04 मैं बढ़कर 26.3% हो गई है

9 निर्धनता का दुष्चक्र

http://भारतीय अर्थव्यवस्था निर्धनता एवं गरीबी के कुछ चक्कर में फंसी हुई है जब तक यह खुद चक्कर नहीं तोड़े जाते निर्धनता निरंतर बनी रहेगी जहां एक और आर्थिक पिछड़ेपन के कारण उत्पादन आए एवं रोजगार का स्तर नीचा है

  • वहां दूसरी और निम्न आय एवं रोजगार के कारण उपभोग बचत एवं पूंजी निर्माण के निम्न स्तर से आर्थिक पिछड़ापन है
  • इस प्रकार के दुष्चक्र को तोड़ने के लिए भीषण प्रहार की जरूरत है

10 बाजार की अपूर्णताएं

अर्ध विकसित देशों की तरह भारत में भी वक्त बाजार की कई अपूर्णता ओं के दर्शन होते हैं

जैसे उत्पादन के साधनों की गतिशीलता बाजार की परिस्थितियों की अज्ञानता मूल्यों की वेलोसिता विशिष्ट कर्ण का अभाव तथा बेरोजगार ढांचा अपर्याप्त मांग संकुचित बाजार कठोर आर्थिक एवं सामाजिक ढांचा इससे साधनों का सर्वोत्तम उपयोग एवं अधिकतम उत्पादन संभव नहीं हो पाता है

कभी-कभी तो आर्थिक साधनों का दुरुपयोग भी हो जाता है मुद्रा बाजार असंगठित होने से वित्तीय साधनों का अभाव है

भारतीय अर्थव्यवस्था

11 नियोजित एवं विकासशील मिश्रित अर्थव्यवस्था

http://भारतीय अर्थव्यवस्था जहां एक और योजनाबद्ध तरीके से विकासशील है वहां दूसरी और इसमें समाजवाद और पूंजीवाद का अजीब समन्वय है

अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रों के साथ-साथ संयुक्त एवं सहकारी क्षेत्रों का भी समावेश किया गया है यह सभी अलग-अलग क्षेत्रों में कार्य करते हुए समग्र विकास के लिए प्रत्याशी लाएं पिछले 56 वर्षों के योजनाबद्ध विकास से भारतीय मिश्रित अर्थव्यवस्था तेजी से विकास के मार्ग पर अग्रसर हो रही है

वर्ष 2003 4 के अंत तक 1993 94 की कीमतों पर राष्ट्रीय उत्पादन लगभग 8 गुना तथा प्रति व्यक्ति आज गुनी हो गई है

12 भारतीय अर्थव्यवस्था की मानसून पर निर्भरता

भारतीय कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था की समृद्धि बहुत कुछ मानसून पर निर्भर करती है क्योंकि सिंचाई के साधनों के अभाव में कृषि उत्पादन में वृद्धि अनुकूल मानसून से ही संभव होती है अच्छी फसलों से कृषि में रोजगार और आय बढ़ती है कृषि आधारित उद्योगों को कच्चा माल मिलता है उनके निर्मित माल की खपत संभव होती है व्यापार पनपता है संचार साधनों में गति आती है और अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में खुशहाली एवं संपन्नता का मार्ग प्रशस्त होता है जबकि मानसून की प्रतिकूलता एवं असफलता से कृषि के साथ-साथ व्यापार एवं औद्योगिक क्षेत्र भी चौपट हो जाता है सभी क्षेत्रों में रोजगार एवं विनियोग में कमी से निराशा गरीबी बेकारी एवं भुखमरी से अकाल आम बात है

13 आधुनिक तकनीकी ज्ञान की कमी

http://भारतीय अर्थव्यवस्था अभी भी बड़े पैमाने पर रूढ़िवादी एवं भाग्यवादी सामाजिक ढांचे में डाली हुई है जिसमें अनेक कुरीतियां मृत्यु भोज बाल विवाह फिजूलखर्ची संयुक्त परिवार प्रथा पर्दा प्रथा आदि व्याप्त है प्रगतिशील दृष्टिकोण के अभाव में विकास के प्रति रुचि नगण्य है अब शिक्षा के प्रसार से सामाजिक एवं राजनीतिक चेतना जागृत हुई है फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों में चेतना की कमी है

14 क्षेत्रीय विषमताए

देश में योजनाओं के क्रियान्वयन से क्षेत्रीय विषमता घटने के स्थान पर बढ़ी हैं जहां एक और पंजाब हरियाणा पश्चिम बंगाल महाराष्ट्र तथा गुजरात में आर्थिक समृद्धि तेजी से बढ़ी है वहीं दूसरी ओर राजस्थान आसाम जम्मू कश्मीर एवं उड़ीसा विकसित क्षेत्रों के मुकाबले काफी पिछड़ गए हैं

15 मुद्रा स्पीति एवं बढ़ते मूल्य

भारत में योजनाबद्ध विकास के साथ-साथ मुद्रास्फीत का प्रभाव बढ़ा है और मूल्यों में निरंतर वृद्धि हुई है विकास योजनाओं में बड़े पैमाने पर ही नार्थ प्रबंधन सुरक्षा पर बढ़ते वह और मांग के मुकाबले पूर्ति की धीमी गति के कारण भारत में पिछले 30 वर्षों में मूल्यों में लगभग 6 गुना वृद्धि हुई है

16 निम्न जीवन स्तर

भारतीय जनता का जीवन स्तर विकसित देशों के मुकाबले में काफी नीचा है देश की 26% जनसंख्या निर्धनता रेखा के नीचे है औसत भारतीयों को 2000 कैलोरी भोजन मिलता है जबकि जीवन के लिए 3000 कैलोरी अनिवार्य है 2003 04 में औसतन प्रति भारतीयों को प्रतिदिन 436 ग्राम खाद्यान्न एवं दाले प्रतिवर्ष किलोग्राम खाद्य तेल 16.5 किलोग्राम चीनी तथा 37 मीटर कपड़ा मिलता है जो सुखी जीवन के लिए अपर्याप्त है

17 विनिमय व्यवस्था का सीमित होना

देशों में उत्पादन विनिमय के लिए किया जाता है भारत के विश्व के अन्य 6 देशों में अधिकांश व्यक्ति विशेष रुप से कृषक स्वयं के उपयोग की चिंता पहले करते हैं यही कारण है कि खाद्यान्नों के उत्पादन का एक बटे तीन भाग बाजार में बिकने आता है गैर कृषि क्षेत्र में शामिल व्यक्तियों में से अधिकांश व्यक्ति ग्रामीण उद्योगों में कार्यरत हैं जो कृषकों की जरूरतों पूरी करते हैं गांव में इन सेवाओं के बदले मुद्रा के स्थान पर कृषि पदार्थ प्राप्त होते हैं