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September 20, 2020

September 20, 2020

Bhakti Movement भक्ति आन्दोलन क्या है??

भक्ति आन्दोलन

भक्ति आन्दोलन

वैसे तो श्वेताश्तर उपनिषद में पहली बार भक्ति का उल्लेख मिलता है। किंतु भक्ति का सर्वप्रथम विस्तृत उलेख श्रीमद् भागवत गीता में है। जहां इसे मोक्ष प्राप्ति का साधन बताया गया है।

मध्य काल में भक्ति आन्दोलन की शुरुआत सर्वप्रथम दक्षिण के अलवार भक्तों द्वारा की गई। दक्षिण भारत से उत्तर भारत में बारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में रामानन्द द्वारा यह आन्दोलन लाया गया।

भक्ति आन्दोलन का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य था- हिन्दू धर्म एवं समाज में सुधार तथा इस्लाम एवं हिन्दू धर्म में समन्वय स्थापित करना। अपने उद्देश्यों में यह आन्दोलन काफ़ी सफल रहा।  इन सन्तों ने भक्ति मार्ग को ईश्वर प्राप्ति का साधन मानते हुए ‘ज्ञान’, ‘भक्ति’ और ‘समन्वय’ को स्थापित करने का प्रयास किया।

इन संतों की प्रवृत्ति सगुण भक्ति की थी।  इन्होंने राम, कृष्ण, शिव, हरि आदि के रूप में आध्यात्मिक व्याख्याएँ प्रस्तुत कीं। 14वीं एवं 15वीं शताब्दी में भक्ति आन्दोलन का नेतृत्व कबीरदास जी के हाथों में था। इस समय रामानन्द, नामदेव, कबीर, नानक, दादू, रविदास (रैदास), तुलसीदास एवं चैतन्य महाप्रभु जैसे संतों के हाथ में इस आन्दोलन की बागडोर थी।

दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन 

भक्ति का आरंभ दक्षिण भारत में 9वी-10वीं शताब्दी के मध्य माना जाता है। दक्षिण में भक्ति आरंभ करने का श्रेय आलवार सन्तो को है। वैष्णो भक्तों को ही दक्षिण में आलवार संत कहा गया। आलवार संतो का संबंध तमिलनाडु से है।  इनके नाम तमिल भाषा में है और इनकी रचनाएं भी तमिल भाषा में प्राप्त होती है।

आलवार संतो के नाम के अंत में “वार” लगता है। जैसे पेरियारवार,नम्मालवार आदि।  सबसे बड़े आलवार संत “नम्मालवार” थे। आलवार संतो में पेरियालवार है, इनके साथ इनकी बेटी ‘आण्डाल’ भी भक्ति करती थी। आण्डाल को दक्षिण भारत की मीरा कहा जाता है।

आलवार संत विष्णु अवतार राम की उपासना करते थे। दक्षिण भारत में वैष्णव अनुयायी ही “आलवार संत” कहलाये वहीं दूसरी ओर शैव उपासक “नयनार” कहलाये।

दक्षिण भारत के संत

शंकराचार्य
रामानुजाचार्य
माधवाचार्य
निंबार्क
अलवार
संत नयनार संत

प्रमुख सम्प्रदाय व परिचय

  • शंकराचार्य – 788 से 820 अद्वैतवाद वैष्णव संप्रदाय व स्मार्त संप्रदाय
  • रामानुजाचार्य – 1140 विशिषष्टाद्वैतवाद श्री संप्रदाय
  • मधवाचार्य – 1238 द्वैतवाद ब्रह्म संप्रदाय
  • निंबार्काचार्य- 1250 द्वैताद्वैतवाद हंस/ सनकादि सम्प्रदाय
  • वल्लभाचार्य – 1479 शुद्धाद्वैतवाद वल्लभ सम्प्रदाय/ पुष्टि मार्ग

शंकराचार्य ( 788- 820 )

शंकराचार्य का जन्म 788 ई. में केरल प्रदेश के ‘कालदी’ नामक ग्राम में नम्बूद्री ब्राह्मण परिवार में हुआ था।  कालदी ग्राम मालाबार में पेरियार नदी के किनारे वन क्षेत्र में स्थित है। कालदी में विद्याधिराज नामक एक प्रसिद्ध विद्वान थे। उनका पुत्र शिवगुरू था। यह परिवार परम्परागत रूप से शंकर का उपासक था।

इन्हीं शिवगुरू के एकलौते पुत्र थे शंकराचार्य।  मात्र 32 वर्ष की उम्र में वे निर्वाण प्राप्त कर ब्रह्मलोक चले गए।  इस छोटी-सी उम्र में ही उन्होंने भारतभर का भ्रमण कर हिंदू समाज को एक सूत्र में पिरोने के लिए चार मठों ही स्थापना की। चार मठ के शंकराचार्य ही हिंदुओं के केंद्रीय आचार्य माने जाते हैं, इन्हीं के अधिन अन्य कई मठ हैं।

चार प्रमुख मठ निम्न हैं:-

  1. वेदान्त ज्ञानमठ, श्रृंगेरी (दक्षिण भारत)।
  2. गोवर्धन मठ, जगन्नाथपुरी (पूर्वी भारत)
  3. शारदा (कालिका) मठ, द्वारका (पश्चिम भारत)
  4. ज्योतिर्पीठ, बद्रिकाश्रम (उत्तर भारत)

शंकराचार्य का दर्शन :

शंकराचार्य के दर्शन को अद्वैत वेदांत का दर्शन कहा जाता है। शंकराचार्य के गुरु दो थे। गौडपादाचार्य के वे प्रशिष्य और गोविंदपादाचार्य के शिष्य कहलाते थे।

शकराचार्य का स्थान विश्व के महान दार्शनिकों में सर्वोच्च माना जाता है। उन्होंने ही इस ब्रह्म वाक्य को प्रचारित किया था कि ‘ब्रह्म ही सत्य है और जगत माया।’ आत्मा की गति मोक्ष में है।

अद्वैत वेदांत अर्थात उपनिषदों के ही प्रमुख सूत्रों के आधार पर स्वयं भगवान बुद्ध ने उपदेश दिए थे। उन्हीं का विस्तार आगे चलकर माध्यमिका एवं विज्ञानवाद में हुआ। इस औपनिषद अद्वैत दर्शन को गौडपादाचार्य ने अपने तरीके से व्यवस्थित रूप दिया जिसका विस्तार शंकराचार्य ने किया इसलिए ही शंकराचार्य को प्रछन्न बौद्ध भी कहा जाता है।

वेद और वेदों के अंतिम भाग अर्थात वेदांत या उपनिषद में वह सभी कुछ है जिससे दुनिया के तमाम तरह का धर्म, विज्ञान और दर्शन निकलता है।

ग्रंथ:

शंकराचार्य ने सुप्रसिद्ध ब्रह्मसूत्र भाष्य के अतिरिक्त ग्यारह उपनिषदों पर तथा गीता पर भाष्यों की रचनाएं की एवं अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथों स्तोत्र-साहित्य का निर्माण कर वैदिक धर्म एवं दर्शन को पुन: प्रतिष्ठित करने के लिए अनेक श्रमण, बौद्ध तथा हिंदू विद्वानों से शास्त्रार्थ कर उन्हें पराजित किया।

इनकी प्रमुख रचनाएं ब्रह्म सूत्र

  • भाष्य गीता
  • भाष्य उपदेश
  • साहसी मरीसापचम

उनकी रचनाएं

  • ज्योतिष पीठ –     बद्रीनाथ उत्तराखंड (विष्णु)
  • गोवर्धन पीठ –      पुरी अयोध्या( बलभद्र सुभद्रा)
  • शारदा पीठ –       द्वारिका गुजरात (कृष्ण)
  • श्रृंगेरी पीठ –        मैसूर कर्नाटक (शिव )
  • कांचीपुरमपीठ –  तमिलनाडु

दसनामी सम्प्रदाय :

शंकराचार्य से सन्यासियों के दसनामी सम्प्रदाय का प्रचलन हुआ। इनके चार प्रमुख शिष्य थे और उन चारों के कुल मिलाकर दस शिष्य हए।इन दसों के नाम से सन्यासियों की दस पद्धतियां विकसित हुई। शंकराचार्य ने चार मठ स्थापित किए थे।

यह दस संप्रदाय निम्न हैं :

  • 1.गिरि, 2.पर्वत और 3.सागर। इनके ऋषि हैं भृगु ।
  • 4.पुरी, 5.भारती और 6.सरस्वती। इनके ऋषि हैं शांडिल्य।
  • 7.वन और 8.अरण्य के ऋषि हैं काश्यप।
  • 9.तीर्थ और 10. आश्रम के ऋषि अवगत हैं।

रामानुजाचार्य

1017 ई. में रामानुज का जन्म दक्षिण भारत के तिरुकुदूर क्षेत्र में हुआ था। बचपन में उन्होंने कांची में यादव प्रकाश गुरु से वेदों की शिक्षा ली।रामानुजाचार्य आलवन्दार यामुनाचार्य के प्रधान शिष्य थे। गुरु की इच्छानुसार रामानुज ने उनसे तीन काम करने का संकल्प लिया था:-

  1. ब्रह्मसूत्र,
  2. विष्णु सहस्रनाम और
  3. दिव्य प्रबंधनम की टीका लिखना।

उन्होंने गृहस्थ आश्रम त्यागकर श्रीरंगम के यदिराज संन्यासी से संन्यास की दीक्षा ली। मैसूर के श्रीरंगम से चलकर रामानुज शालग्राम नामक स्थान पर रहने लगे।

रामानुज ने उस क्षेत्र में बारह वर्ष तक वैष्णव धर्म का प्रचार किया। फिर उन्होंने वैष्णव धर्म के प्रचार के लिए पूरे देश का भ्रमण किया। 1137 ई. में वे ब्रह्मलीन हो गए।

शंकराचार्य के ‘अद्वैतदर्शन’ के विरोध में दक्षिण में वैष्णव संतों द्वारा 4 मतों की स्थापना की गई, जो निम्नलिखित हैं-:

  1. ‘विशिष्टाद्वैतवाद‘ की स्थापना 12वीं सदी में रामानुजाचार्य ने की।
  2. ‘द्वैतवाद’ की स्थापना 13वीं शताब्दी में मध्वाचार्य ने की।
  3. शुद्धाद्वैतवाद’ की स्थापना 13वीं सदी में विष्णु स्वामी ने की।
  4. ‘द्वैताद्वैवाद’ की स्थापना 13वीं सदी में निम्बार्काचार्य ने की।

मूल ग्रन्थ :

ब्रह्मसूत्र पर भाष्य ‘श्रीभाष्य’ एवं ‘वेदार्थ संग्रह‘।  रामानुज ने वेदांत दर्शन पर आधारित अपना नया दर्शन विशिष्ट द्वैत वेदान्त गढ़ा था।

विशिष्टाद्वैत दर्शन :

रामनुजाचार्य के दर्शन में सत्ता या परमसत् के सम्बन्ध में तीन स्तर माने गए हैं:- ब्रह्म अर्थात ईश्वर, चित् अर्थात आत्म, तथा अचित अर्थात प्रकृति। वस्तुतः ये चित् अर्थात् आत्म तत्त्व तथा अचित् अर्थात् प्रकृति तत्त्व ब्रह्म या ईश्वर से पृथक नहीं है बल्कि ये विशिष्ट रूप से ब्रह्म का ही स्वरूप है एवं ब्रह्म या ईश्वर पर ही आधारित हैं।

यही रामनुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत का सिद्धान्त है। जैसे शरीर एवं आत्मा पृथक नहीं हैं तथा आत्म के उद्देश्य की पूर्ति के लिए शरीर कार्य करता है उसी प्रकार ब्रह्म या ईश्वर से पृथक चित् एवं अचित् तत्त्व का कोई अस्तित्व नहीं हैं वे ब्रह्म या ईश्वर का शरीर हैं तथा ब्रह्म या ईश्वर उनकी आत्मा सदृश्य हैं।

रामानुजाचार्य ने वेदांत के अलावा सातवीं-दसवीं शताब्दी के रहस्यवादी एवं भक्तिमार्गी अलवार सन्तों से भक्ति के दर्शन को तथा दक्षिण के पंचरात्र परम्परा को अपने विचार का आधार बनाया।

भक्ति से तात्पर्य:

रामानुज के अनुसार भक्ति का अर्थ पूजा-पाठ या किर्तन-भजन नहीं बल्कि ध्यान करना या ईश्वर की प्रार्थना करना है। सामाजिक परिप्रेक्ष्य से रामानुजाचार्य ने भक्ति को जाति एवं वर्ग से पृथक तथा सभी के लिए संभव माना है।

निंबार्क (12वीं शताब्दी) 

निंबार्क का जन्म दक्षिण में हुआ। यह तेलुगु ब्राह्मण थे।  यह रामानुज से प्रभावित थे व रामानुज के समकालीन थे तथा वैष्णव संप्रदाय में इन्होंने द्वैताद्वैत दर्शन प्रचलित किया। यह ज्ञातव्य है कि वैष्णवों के प्रमुख चार सम्प्रदायों में निम्बार्क सम्प्रदाय भी एक है। इसको ‘सनकादिक सम्प्रदाय’ भी कहा जाता है।

ऐसा कहा जाता है कि निम्बार्क दक्षिण भारत में गोदावरी नदी के तट पर वैदूर्य पत्तन के निकट (पंडरपुर) अरुणाश्रम में श्री अरुण मुनि की पत्नी श्री जयन्ति देवी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे।

कतिपय विद्वानों के अनुसार द्रविड़ देश में जन्म लेने के कारण निम्बार्क को द्रविड़ाचार्य भी कहा जाता था, द्वैताद्वैतवाद या भेदाभेदवाद के प्रवर्तक आचार्य निम्बार्क के विषय में सामान्यतया यह माना जाता है कि उनका जन्म 1250 ई. में हुआ था। इन्हें भगवान सूर्य का अवतार कहा जाता है। कुछ लोग इनको भगवान के सुदर्शन चक्र का भी अवतार मानते हैं।

ऐसा प्रसिद्ध है कि इनके उपनयन के समय स्वयं देवर्षि नारद ने इन्हें श्री गोपाल-मन्त्री की दीक्षा प्रदान की थी तथा श्रीकृष्णोपासना का उपदेश दिया था। इनके गुरु देवर्षि नारद थे तथा नारद के गुरु श्रीसनकादि थे। इसलिये इनका सम्प्रदाय सनकादि सम्प्रदाय के नाम से प्रसिद्ध है

 निंबार्क का अधिकांश समय वृंदावन में बीता। वे अवतारवाद में विश्वास करते थे।

द्वैताद्वैत को ‘भेदाभेद’ या ‘सनक’ संप्रदाय भी कहते हैं। भेदाभेद से अभिप्राय है कि ईश्वर, आत्मा व जगत तीनों में समानता होते हुए भी परस्पर भिन्नता है। राजस्थान में निंबार्क पीठ अजमेर जिले में सलेमाबाद में है।

निम्बार्काचार्य के सिद्धांत

  • श्री निम्बार्काचार्य ने जीव, माया, जगत आदि का ब्रह्म से द्वैताद्वैत स्थापित किया है। इसलिए इनके मत को द्वैताद्वैतवाद कहा जाता है।
  • राधा को उपास्या के साथ साथ आचार्य मानने की परम्परा का सूत्रपात निम्बार्क ने ही किया है। बाद में श्री हरिव्यास गोस्वामी, श्री हित हरिवंश आदि ने भी श्री राधा को अपना गुरु मानने की परम्परा का निर्वाह किया।

माधवाचार्य ( 13 शताब्दी )

माधवाचार्य ने शंकर और रामानुज दोनों के मतों का विरोध किया। माधवाचार्य का विश्वास द्वेतवाद मे था और यह आत्मा और परमात्मा को प्रथक प्रथक मानते थे। वे लक्ष्मी नारायण के उपासक थे

गुरु नानक( 1469- 1538 ई. )

इनका जन्म 1469ई. में पंजाब के तलवंडी नामक ग्राम में हुआ जो वर्तमान में ननकाना साहब के नाम से जाना जाता है । 1499 ई. में सुल्तानपुर के निकट बई नदी के किनारे उन्हें ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त हुआ । गुरु नानक सिख धर्म के प्रवर्तक थे ।  गुरु नानक की कविताओं वह गीतों का संकलन “आदि ग्रंथ” में किया गया है ।

दसवें गुरु गोविंद सिंह जी ने नवें गुरु तेग बहादुर व कबीर की रचनाओं को भी इसमें शामिल किया और इस ग्रंथ को” गुरु ग्रंथ साहिब” कहा गया । आदिग्रंथ साहिब का संकलन 17 वी शताब्दी के प्रथम दशक में हुआ था। इसमें कबीर और बाबा फरीद की उक्तियां है।

दस मुकामी रेख्ता ग्रंथ की रचना की । गुरु नानक ने लंगर प्रथा चलाई । गुरु नानक ने सिकंदर लोदी के काल में सिख धर्म की स्थापना की।लूथर और नानक की तुलना की गई है । प्रसिद्ध वाक्य” कोई हिंदू और मुसलमान नहीं “है। ईश्वर को इन्होंने अकाल पुरुष की संज्ञा दी ।

नानक ” सच्चा सौदा” अर्थात( सत्य की खोज) में अग्रसर रहें । पांचवे गुरु अर्जन देव जी ने गुरु नानक के उपदेशों को आदिग्रंथ में संकलित किया जिसे गुरबानी कहा जाता है। हुजूर साहब का गुरुद्वारा गुरु नानक की याद में बना है जबकि दिल्ली का गुरुद्वारा शीशगंज गुरु तेग बहादुर की याद में बना है ।

मृत्यु:- 1538 ई. में पंजाब के करतारपुर स्थान पर हुई ।

भक्ति आन्दोलन के कारण

-मध्य काल में भक्ति आन्दोलन और सूफ़ी आन्दोलन अपने महत्त्वपूर्ण पड़ाव पर पहुँच गए थे।  इस काल में भक्ति आन्दोलन के सूत्रपात एवं प्रचार-प्रसार के महत्त्वपूर्ण कारण निम्नलिखित थे-

  • मुस्लिम शासकों के बर्बर शासन से कुंठित एवं उनके अत्याचारों से त्रस्त हिन्दू जनता ने ईश्वर की शरण में अपने को अधिक सुरक्षित महसूस कर भक्ति मार्ग का सहारा लिया
  • हिन्दू एवं मुस्लिम जनता के आपस में सामाजिक एवं सांस्कृतिक सम्पर्क से दोनों के मध्य सदभाव,सहानुभूति एवं सहयोग की भावना का विकास हुआ।  इस कारण से भी भक्ति आन्दोलन के विकास में सहयोग मिला।
  • सूफ़ी-सन्तों की उदार एवं सहिष्णुता की भावना तथा एकेश्वरवाद में उनकी प्रबल निष्ठा ने हिन्दुओं को प्रभावित किया जिस कारण से हिन्दू, इस्लाम के सिद्धान्तों के निकट सम्पर्क में आये। इन सबका प्रभाव भक्ति आन्दोलन पर बहुत गहरा पड़ा।
  • हिन्दुओं ने सूफ़ियों की तरह एकेश्वरवाद में विश्वास करते हुए ऊँच-नीच एवं जात-पात का विरोध किया।
  • शंकराचार्य का ज्ञान मार्ग व अद्वैतवाद अब साधारण जनता के लिए बोधगम्य नहीं रह गया था।
  • मंस्लिम शासकों द्वार आये दिन मूर्तियों को नष्ट एवं अपवित्र कर देने के कारण, बिना मूर्ति एवं मंदिर के ईश्वर की अराधना के प्रति लोगों का झुकाव बढ़ा, जिसके लिए उन्हें भक्ति मार्ग का सहारा लेना पड़ा।

आंदोलन की प्रकृति अथवा सिद्धांत

धार्मिक विचारों के बावजूद जनता की एकता को स्वीकार किया एवं जाति प्रथा का विरोध किया  इसी के आलोक में कर्मकांडों मूर्ति पूजा आदि की निंदा की

भक्ति आंदोलन की विशेषता

  • ईश्वर की एकता पर बल
  • भक्ति मार्ग को महत्व आडंबरों अंधविश्वासों तथा कर्मकांडों से दूर रहकर धार्मिक सरलता पर बल दिया
  • जनसाधारण लोक भाषाओं क्षेत्रीय भाषाओं में प्रचार
  • ईश्वर के प्रति आत्मसमर्पण मानवतावादी दृष्टिकोण समाज में व्याप्त जातिवाद ऊंच-नीच जैसे सामाजिक बुराइयों का विरोध

September 20, 2020

Sufi Movement सूफी आंदोलन क्या है??

सूफी आंदोलन

सूफी आंदोलन

जिस प्रकार मध्यकालीन भारत में हिन्दुओं में भक्ति-आन्दोलन प्रारम्भ हुआ, उसी प्रकार मुसलमानों में प्रेम-भक्ति के आधार पर सूफीवाद का उदय हुआ। सूफी शब्द की उत्पत्ति कहाँ से हुई, इस विषय पर विद्वानों में विभिन्न मत है।

कुछ विद्वानों का विचार है कि इस शब्द की उत्पत्ति सफा शब्द से हुई। सफा का अर्थ पवित्र है। मुसलमानों में जो सन्त पवित्रता और त्याग का जीवन बिताते थे, वे सूफी कहलाये। एक विचार यह भी है कि सूफी शब्द की उत्पत्ति सूफा से हुई, जिसका अर्थ है ऊन। मुहम्मद साहब के पश्चात् जो सन्त ऊनी कपड़े पहनकर अपने मत का प्रचार करते थे, वे सूफी कहलाये।

कुछ विद्वानों का विचार है कि सूफी शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द सोफिया से हुई, जिसका अर्थ ज्ञान है।

सूफी वे हैं जिनका संबंध इस्लाम की सादगीयता पवित्रता समानता और उदारता से हैं  सूफी में अल्लाह और संसार से जुड़ी मुख्य दो धाराएं हैं

  • एक वजूदिया धारा
  • दूसरी सउदिया

यह ठीक उसी प्रकार है जैसे हिंदू धर्म में अद्वैतवाद और द्वैतवाद थी, भारतीय परिपेक्ष में जो वजूदिया रहे अधिक उदार रहे उनका झुकाव रहस्यवाद की ओर अधिक रहा उनकी कट्टर इस्लाम के प्रति दूरी बनी रही इसलिए वह इस्लाम का प्रचार नहीं करते थे  सल्तनत काल के अधिकतर सूफी संत इसी विचारधारा के थे 

ठीक इसके विपरीत सऊदिया धारा रुढ़िवादी इस्लाम के अधिक करीब रही इसमें रहस्यवाद पर इतना जोर नहीं दिया गया जितना इस्लाम के प्रचार पर दिया गया

इसका प्रभाव भारत में 14वीं शताब्दी के बाद पढ़ना प्रारंभ हुआ और यह अपने प्रभाव में कभी-कभी शासन नीति को भी प्रभावित करती थी अर्थात 14वीं शताब्दी में किस धारा के लोग अधिक मजबूत रहे क्योंकि इस्लाम का वर्चस्व अधिक था ऐतिहासिक रूप से सूफी धारा का अस्तित्व 8 वीं से 11 वीं शताब्दी के मध्य रहा है यह धारा पश्चिम एशिया अथवा मध्य एशिया से उत्पन्न हुई मानी जाती है 

सूफी मत के विभिन्न सम्प्रदाय

  • सूफी मत आगे चलकर विभिन्न सिलसिलों (सम्प्रदायों) में विभाजित हो गया।
  • इन सम्प्रदायों की निश्चित संख्या के बारे में मतभेद है। इनकी संख्या 175 तक मानी जाती है।
  • अबुल फजल ने आइन में 14 सिलसिलों का उल्लेख किया है।
  • इन सम्प्रदायों में से भारत में प्रमुख रूप से चार सम्प्रदाय- चिश्ती, सुहारावर्दी, कादरी और नक्शबन्दी अधिक प्रसिद्ध हुए।

सूफियों के निवास स्थान ‘खानकाह कहलाते हैं  राज्य नियंत्रण से मुक्त आध्यात्मिक क्षेत्र को सूफी शब्दावली में ‘विलायत’ कहा गया है सूफी संत के उत्तराधिकारी को वलि कहते थे

सूफी सिलसिला दो वर्गों में विभाजित है

1⃣ बार शरा:- जो इस्लामी विधान शरा को मानते हैं
2⃣ बे शरा:- जोशरा को नहीं मानते हैं

महिला रहस्य वादी रबिया आठंवी सदी और मंसूर बिन हज्जज प्रारंभिक सूफी संत थे मसूर ने अपने को अन्हलक (मैं ईश्वर हूं) घोषित किया

सूफी सन्तों का जीवन और सिद्धान्त-

सूफी सन्त सादगी और पवित्रता का जीवन व्यतीत करते थे। उन्होंने स्वेच्छा से निर्धनता को स्वीकार किया। वे व्यक्तिगत सम्पत्ति को आत्मिक विकास के लिए बाधक समझते थे।

उनके निवास-स्थान आमतौर पर मिट्टी के बने होते थे। यद्यपि इन सन्तों में से अनेकों ने विवाह किया था, परन्तु उन्होंने सादगी का जीवन नहीं त्यागा था। सुल्तान की ओर से, इन संतों को पद और धन, दोनों देने का प्रस्ताव किया जाता था। ये सुल्तानों से अपने लिए कोई पदवी स्वीकार नहीं करते थे, न ही कोई वजीफा ही लेते थे।

जनता जो स्वेच्छा से इन्हें दान करती थी, उसी में ये गुजारा करते थे। कभी-कभी ये संत भूखो मरने लगते थे, परन्तु ऐसी स्थिति में भी राजा या अमीरों से धन की याचना नहीं करते थे।

शेख निजामुद्दीन औलिया के जीवन में कई मौके ऐसे आए जबकि उन्हें रात भर भूखा रहना पड़ा। ऐसे समय में वे कहा करते थे- अब हम खुदा के मेहमान है।

भौतिक इच्छाओं के दमन के लिए ये सन्त उपवास करते थे। उनके कपड़े साधारण होते थे। आमतौर पर उनके कपड़ों पर पैबन्द लगे होते थे, परन्तु ये फटे-पुराने कपड़े पहनकर गरीबी में रहना पसन्द करते थे।

सूफियों में चिश्ती सन्तों का ऐसा विश्वास था कि भावनाओं पर काबू रखना चाहिए। आचार-विचार शुद्ध रखने चाहिए। शेख फरीद सुबह उठकर नमाज पढ़ते थे तथा घण्टों ईश्वर के ध्यान में मौन रहते थे।

निजामुद्दीन औलिया के बारे कहा जाता है कि वे प्रात:काल उठकर नमाज पढ़ते थे और बाद में समाधि चले जाते थे। दोपहर को वे विश्राम करते थे। वे लोगों से मिलते थे और रात्रि के समय नमाज पढ़ते थे तथा ध्यानमग्न हो जाते थे।

सूफी सन्त मन की पवित्रता में विश्वास करते थे। उनका विश्वास था कि मुक्ति (निजाद) प्राप्त करने के लिए मनुष्य का मन बड़ा पवित्र होना चाहिए, क्योंकि ईश्वर शुद्ध मन में ही निवास करता है।

वे ईश्वर-प्राप्ति के अंह को मिटाना आवश्यक समझते थे, क्योंकि अहं रहते व्यक्ति ईश्वर के दर्शन के योग्य नहीं होता। चिश्ती सन्त उदार विचारों के थे। उनके कई रीति-रिवाज ऐसे थे जो हिन्दुओं से मिलते-जुलते थे। उनके प्रमुख सिद्धान्त थे- ईश्वर के प्रति प्रेम और मनुष्य की सेवा।

वे अद्वैतवाद के सिद्धान्त में विश्वास करते थे। इस कारण बहुत से हिन्दू उनके भक्त बन गये। इन सन्तों की सादगी और सरल रहन-सहन के ढंग ने हिन्दुओं को बड़ा प्रभावित किया।

ये सन्त मनुष्य की सेवा को सारी भक्ति से ऊँचा मानते थे। दु:खी, दरिद्रों की सेवा करना वे अपना परम कर्तव्य मानते थे। ये सन्त निजी सम्पत्ति में विश्वास नहीं करते थे और सम्पत्ति का रखना ईश्वर की प्राप्ति में बाधक समझते थे।

शेख कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी से सुल्तान इल्तुतमिश ने अपने महल के समीप ही रहने की प्रार्थना की थी। परन्तु शेख ने इसे स्वीकार नहीं किया। वे शहर के बाहर एक खानकाह में रहने लगे। इल्तुतमिश ने उन्हें शेख-उल-इस्लाम का उच्च पद देना चाहा, परन्तु शेख ने उसे भी अस्वीकार कर दिया।

तब सुल्तान ने इस बडे पद पर माजमुद्दीन सुगरा को नियुक्त किया जो शेख से ईर्ष्या करने लगा। इस पर शेख ने दिल्ली छोड़कर अजमेर जाने का निश्चय किया, परन्तु दिल्ली की जनता के अनुरोध पर उन्होंने अपना यह विचार त्याग दिया।

इसी प्रकार निजामुद्दीन औलिया ने दिल्ली के सुल्तानों के राज्य-काल देखे थे, परन्तु वे इनमें से किसी के भी दरबार में कभी नहीं गये। उन्होंने कुतुबुद्दीन मुबारक शाह के दरबार में उपस्थिति होने के आदेश को भी नहीं माना।

इन सूफी सन्तों ने इस्लाम की कट्टरता को दूर करके उसे उदार बनाने का प्रयत्न किया। इन्होंने हिन्दू और मुसलमानों के बीच की खाई को पाटने का प्रयत्न किया और दोनों धमों के बीच प्रेम और सहिष्णुता की भावना को जागृत किया।

इस प्रकार इन सूफी सन्तों ने समाज की महान् सेवा की।

प्रमुख सिलसिले व परिचय

सूफी अरबी भाषा का शब्द है। जिसका अर्थ चटाईफ है। जो चटाई पर कतार में बैठकर ईश्वर उपासना करते थे उन्हें सूफी संत कहा जाता था।व्यापक अर्थ में सूफी मुस्लिम विचारको, चिंतको का वह वर्ग था, जो सादा जीवन व्यतीत कर आत्म त्याग, परोपकार और तपस्या को प्रमुखता देते थे।

भारत में कुल 4 प्रमुख सिलसिले हैं-

1. चिश्ती सम्प्रदाय-

भारत में चिश्ती सम्प्रदाय सबसे अधिक लोकप्रिय और प्रसिद्ध हुआ। भारत में चिश्ती सम्प्रदाय की स्थापना मुईनुउद्दीन चिश्ती ने की। मुईनुद्दीन चिश्ती 1192 ई. में मुहम्मद गौरी के साथ भारत आये थे। इन्होंने अजमेर को चिश्ती सम्प्रदाय का केन्द्र बनाया। अजमेर से इन्होंने दिल्ली का भी भ्रमण किया।

मुईनुउद्दीन चिश्ती हिन्दू और मुसलमान दोनों में लोकप्रिय थे और दोनों धर्मों में इनके शिष्य थे। इनकी मृत्यु के पश्चात् इनके शिष्यों ने चिश्ती सम्प्रदाय के कार्य को आगे बढ़ाया।

चिश्ती सम्प्रदाय में मुईनउद्दीन चिश्ती के अतिरिक्त जो प्रमुख सन्त हुए, वे थे- ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी, ख्वाजा फरीदउद्दीन मसूद गंज-ए-शिकार, शेख निजामुद्दीन औलिया, शेख नसीर-उद्दीन चिराग-ए-दिल्ली, शेख अब्दुल हक, हजरत अशरफ जहाँगीर, शेख हुसम उद्दीन मानिक पुरी और हजरत गेसू दराज।

शेख मुईनुउद्दीन चिश्ती की अजमेर में समाधि आज भी तीर्थस्थल बना हुआ है, जहाँ प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में मुसलमान और हिन्दू एकत्र होते हैं।मुईनउद्दीन चिश्ती के प्रमुख शिष्य कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी ने चिश्ती सम्प्रदाय को और अधिक विस्तृत बनाया।

काकी सुल्तान इल्तुतमिश के समकालीन थे। इल्तुतमिश उनका बड़ा सम्मान करता था। उसने इन्हें शेख उल इस्लाम का उच्च पद देने का प्रस्ताव किया, परन्तु इन्होंने सुल्तान से किसी भी प्रकार का पद और सम्मान लेना स्वीकार नहीं किया।

काकी के उत्तराधिकारी ख्वाजा फरीद उद्दीन मसूद गंजे शिकार माया-मोह से कोसो दूर रहते थे। वह अत्यन्त सादगी और संयम का जीवन व्यतीत करते थे। 93 वर्ष की आयु में 1265 ई. में उनका देहान्त हो गया। निजामुद्दीन ओलिया बाबा फरीद के शिष्य थे। 

उनके कार्य को उनके प्रसिद्ध होनहार शिष्य निजामुद्दीन औलिया ने आगे बढ़ाया। शेख निजामुद्दीन औलिया ने अपने मत का केन्द्र दिल्ली को बनाया और बहुत अधिक प्रसिद्धि प्राप्त की। “महबूब ए इलाही” निजामुद्दीन ओलिया को कहा जाता था

शेख निजामुद्दीन औलिया ने सात सुल्तानों का शासन काल देखा था। वे किसी भी सुल्तान के दरबार में उपस्थित नहीं हुए। सुल्तान ग्यासुउद्दीन तुगलक उनकी लेाकप्रियता और उनके बढ़ते प्रभाव से ईर्ष्या करता था।

सुल्तान का पुत्र जूना खाँ (मुहम्मद तुगलक) भी उनका शिष्य बन गया था। महान् कवि और लेखक अमीर खुसरो औलिया के शिष्य थे। शेख निजामुउद्दीन औलिया के शिष्यों ने उनके कार्यों को आगे बढ़ाया और चिश्ती सम्प्रदाय ने भारत में बड़ी लोकप्रियता अर्जित की।

अन्य सूफी सम्प्रदायों की अपेक्षा चिश्ती सम्प्रदाय भारत में सबसे अधिक लोकप्रिय हुआ।

इसकी लोकप्रियता के निम्नलिखित कारण थे-

  • सूफी चिश्ती सन्तों ने अपने को जनसाधारण से जोड़ा। वे गरीबों, असहायों के सहायक थे। उन्होंने सांसारिक प्रलोभनों से अपने को बहुत दूर रखा। दिल्ली के सुल्तानों द्वारा प्रदान किये जाने वाले किसी भी पद, प्रलोभन को ठुकरा दिया। इस प्रकार वे दरिद्र के सबसे सच्चे हितैषी सिद्ध हुए।
  • सूफी चिश्ती सन्त आडम्बर से कोसों दूर थे। उन्होंने स्वेच्छा से निर्धनता को अपनाया।  वे घास-फूस की झोपडियों अथवा मिट्टी के मकानों में रहते थे। उनकी आवश्यकता बहुत सीमित थी। सादा जीवन उच्च विचार उनका आदर्श था।
  • उनके इस आदर्श त्यागमय जीवन का जनता पर सीधा प्रभाव पड़ा। सूफी सन्तों का जीवन, सीधा, सादा और नियमित था। जिन बातों का वे उपदेश करते थे, उन पर स्वयं भी अमल करते थे। ऐसे सन्तों के जीवन से जनता प्रेरणा लेती थी।

  • सूफी सन्तों ने धार्मिक आधार पर कोई भेद-भाव नहीं किया। उन्होंने भाईचारे की भावना पर जोर दिया। इनकी धार्मिक उदारता से हिन्दू भी प्रभावित हुए।
  • डॉ. निजामी के शब्दों में- चिश्तियों ने भारत में अपने सिलसिलों के विकास की प्रारम्भिक अवस्थाओं में हिन्दू प्रथाओं और रिवाजों को अपना लिया था। इस कारण हिन्दू और मुसलमान दोनों ही ने चिश्ती सन्तों से प्रेरणा और दिशा निर्देशन प्राप्त किया।
  • ख्वाजा मुईनुउद्दीन चिश्ती के एक हिन्दू शिष्य रामदेव भी थे। चिश्ती सन्तों ने अपने मत का प्रचार करने के लिए जन साधारण की भाषा का प्रयोग किया। इस कारण इनके उपदेशों का आम जनता पर सीधा प्रभाव पड़ा।

  • चिश्ती सन्तों ने अपने को इस्लाम की कट्टरता से दूर रखा। इस्लाम में संगीत का निषेध है, परन्तु सूफी सन्तों ने अपनी पूजा-अर्चना एवं प्रचार में संगीत का खुलकर प्रयोग किया।
  • चिश्ती सन्त व्यवहारिक थे। गृहस्थ जीवन में भी इन्होंने जनसाधारण को साधना का मार्ग दिखाने का प्रयास किया। ईश्वर प्राप्ति के लिए घर का त्याग आवश्यक नहीं है, इस बात का प्रचार करते हुए, इन सन्तों ने पलायनवादी दृष्टिकोण छोड़ने को कहा।
  • जनता के बीच में रहते हुए, उसकी तकलीफों का अनुभव करते हुए इन्होंने उसके कल्याण के लिए अपने प्रयास जारी रखे। चिश्ती सन्त भक्ति में लीन रहते थे।
  • शेख निजामुद्दीन औलिया के अनुसार ईश्वर भक्ति दो प्रकार की है- (1) लाजमी (2) मुताद्दी (प्रचारित)।
  • प्रथम के अन्तर्गत खुदा की इबादत, उपवास, हज इत्यादि आते हैं और दूसरी के अन्तर्गत गरीब दीन दुखियों और असहाय लोगों की सहायता।दरिद्र नारायण की सेवा ही ईश्वर भक्ति का दूसरा रूप है। अपने इस दृष्टिकोण के कारण ही चिश्ती सन्त जनता में लोकप्रिय हुए।

2. सुहरावर्दी सिलसिला –

शेख शहाबुद्दीन सुहरावर्दी इसके प्रवर्तक थे। उन्होंने अपने शिष्यों को भारत जाकर उनके उपदेशों, सिद्धान्तों का प्रचार करने की प्रेरणा दी।उनके शिष्यों ने भारत में अपना प्रचार केन्द्र सिन्ध को बनाया। शेख हमीदुद्दीन नागौरी तथा शेख बहाउद्दीन जकारिया ने इस सम्प्रदाय के विचारों का बड़ा प्रचार किया।

उन्होंने मुल्तान में अपनी खानकाह स्थापित की। जकारिया के पुत्र शर्दुद्दीन आरिफ उनके उत्तराधिकारी बने तथा उनके एक अन्य शिष्य सैयद जलालुद्दीन सुर्ख ने उच्छ में एक केन्द्र की स्थापना की।

सैयद जलालुउद्दीन के तीन पुत्र हुए- सैयद अहमद कबीर, सैयद वहाउद्दीन, सैयद मोहम्मद।

शेख शर्दउद्दीन के पुत्र शेख रुकुनुद्दीन ने सुहरावर्दी सिलसिले को काफी प्रसिद्धि अर्जित कराई। उनकी तुलना चिश्ती सन्त निजामुद्दीन औलिया से की जा सकती है।

सुहरावर्दी सम्प्रदाय के सन्तों का जीवन-

चिश्ती सन्तों के विपरीत सुहारावर्दी सन्त सम्पन्नता का जीवन बिताते थे। वे दिल्ली के सुल्तानों और अमीरों से दान प्राप्त करने में संकोच नहीं करते थे।

शेख वहाउद्दीन जकारिया ने बहुत दौलत एकत्र की। ये सन्त सरकारी पद भी प्राप्त करने में कोई शर्म महसूस नहीं करते थे। वे अपने शिष्यों से भी उपहार स्वीकार करते थे।

सुहरावर्दी सन्त लम्बे उपवासों और भूखे रहकर शरीर शुद्धि में यकीन नहीं करते थे। ये सन्त अपने समय की राजनीति में भी भाग लेते थे। इनकी खानकाह बड़ी होती थी और धन सम्पत्ति से परिपूर्ण होती थी।

इन खानकाहों को सुल्तान से धन और जागीरें प्राप्त होती थी। इससे इन सन्तों को नियमित आय प्राप्त होती थी।  इन खानकाहों में कई हॉल होते थे। इन खानकहों में कुछ भक्तजन स्थायी रूप से रहते थे और कुछ अस्थायी तौर पर आते जाते रहते थे।

यात्री भी इन खानकाहों में आकर रात के समय रह सकते थे। खानकाह धार्मिक गतिविधियों का केन्द्र बिन्दु होती थी। यहाँ के रहने वालों से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे भाईचारे से रहते हुए ईश्वर प्रार्थना में लीन रहे और पवित्र जीवन बितायें।

3. कादिरी सिलसिला –

कादिरी सम्प्रदाय के प्रवर्तक बगदाद के शेख अब्दुल कादिर जिलानी (1077-1166 ई.) थे।  भारत में इस सम्प्रदाय का प्रचार मख्दूम मुहम्मद जिलानी और शाह नियामतुल्ला ने किया।  सैयद बन्दगी मुहम्मद ने 1482 ई. में सिन्ध को इस सम्प्रदाय का प्रचार केन्द्र बनाया।

वहाँ से कालान्तर में यह सम्प्रदाय कश्मीर, पंजाब, बंगाल और बिहार तक फैला। इस सम्प्रदाय के अनुयायी संगीत के विरोधी थे।

4. नक्शबन्दी सिलसिला –

तुर्किस्तान के ख्वाजा वहाअलदीन नक्शबन्द इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक थे। यह सम्प्रदाय भारत में 16वीं शताब्दी में ख्वाजा मुहम्मद शाकी गिल्लाह वैरंग द्वारा आया।

इस सम्प्रदाय के सन्तों ने इस्लाम की कट्टरता का विरोध किया। सन्तों ने धार्मिक आडम्बरों का विरोध किया और सादा सच्चा जीवन जीने का उपदेश दिया।

इस सम्प्रदाय का दृष्टिकोण बुद्धिवादी होने के कारण यह सम्प्रदाय जन साधारण को अपनी ओर बड़ी संख्या में आकर्षित न कर सका।

फिरदौसी – सुहरावर्दी सिलसिला की ही एक शाखा थी। जिसका कार्य क्षेत्र बिहार था इस सिलसिले को शेख शरीफउद्दीन याहया ने लोकप्रिय बनाया याहया ख्वाजा निजामुद्दीन के शिष्य थे

सत्तारी सिलसिला – इसकी स्थापना शेख अब्दुल्लाह सत्तारी की।इन्होंने खुदा के साथ सीधे संपर्क का दावा किया।  इसका मुख्य केंद्र बिहार था।

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September 20, 2020

Uttar Mughal Period New Dynasty उत्तर मुगलकालीन नये राजवंश

उतर मुगलकालीन नये राजवंश

अवध ( Awadh )

उत्तर मुगलकालीन

अवध के स्वतंत्र राज्य के संस्थापक सआदत खां बुराहनुल्मुल्क था। 1722 ई. में मुग़ल बादशाह मुहमदशाह द्वारा फारस के शिया सआदत खां को अवध का सूबेदार बनाये जाने के बाद अवध सूबे को स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया गया।

सआदत खां ने सैय्यद बंधुओं को हटाने में सहयोग दिया। बादशाह ने सआदत खां को नादिरशाह के साथ वार्ता के लिए नियुक्त किया ताकि वह एक बड़ी रकम के भुगतान के एवज में अपने देश लौट जाये और शहर को तबाह करने से उसे रोका जा सके।  लेकिन जब नादिरशाह को उस रकम का भुगतान नहीं किया गया तो उसका परिणाम दिल्ली की जनता को नरसंहार के रूप में भुगतना पड़ा। सआदत खां ने भी शर्म और अपमान के कारण आत्महत्या कर ली ।

सआदत खां के बाद अवध का अगला नवाब सफदरजंग बना जिसे मुग़ल साम्राज्य का वजीर भी नियुक्त किया गया था। उसका पुत्र शुजाउद्दौला उसका उत्तराधिकारी बना। अवध ने एक शक्तिशाली सेना का गठन किया जिसमे मुस्लिमों के साथ साथ हिन्दू ,नागा,सन्यासी भी शामिल थे।

अवध के शासक का प्राधिकार दिल्ली के पूर्व में स्थित रूहेलखंड क्षेत्र तक था। उत्तर –पश्चिमी सीमान्त की पर्वत श्रंखलाओं से बड़ी संख्या में अफ़ग़ान ,जिन्हें रोहिल्ला कहा जाता था ,वहाँ आकर बस गए थे।

अवध के नवाबों का विवरण निम्नलिखित है-

सआदत खां बुरहान-उल-मुल्क (1722-1739 ई ): इन्होने 1722 ई. में अवध की स्वायत्त राज्य के रूप में स्थापना की उसे मुग़ल बादशाह मुहम्मदशाह द्वारा गवर्नर नियुक्त किया गया था । उसने नादिरशाह के आक्रमण के समय साम्राज्य की गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अंततः इज्ज़त और सम्मान की खातिर आत्महत्या कर ली।

सफ़दर जंग अब्दुल मंसूर (1739-1754 ई ): वह सआदत खां का दामाद था जिसने 1748 ई. में अहमदशाह अब्दाली के विरुद्ध मानपुर के युद्ध में भाग लिया था।

शुजाउद्दौला (1754-1775 ई ): वह सफदरजंग का पुत्र और अहमदशाह अब्दाली का सहयोगी था। उसने अंग्रेजों के सहयोग से रोहिल्लों को हराकर 1755 ई. में रूहेलखंड को अपने साम्राज्य में मिला लिया था।

आसफ-उद-दौला: 

वह लखनऊ की संस्कृति को प्रोत्साहित करने और इमामबाड़ा तथा रूमी दरवाजा जैसी ऐतिहासिक इमारतें बनवाने के लिए प्रसिद्ध है। उसने 1755 ई. में अंग्रेजों के साथ फ़ैजाबाद की संधि की।

वाजिद अली शाह :  वह अवध का अंतिम नवाब था जिसे अख्तरप्रिया और जान-ए-आलम नाम से जाना जाता है। उसके समय में ही ब्रिटिश गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी द्वारा अवध को कुशासन के आधार पर ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया था। वह शास्त्रीय संगीत और नृत्य का शौक़ीन था जिसने कालका-बिंदा जैसे कलाकार भाइयों को अपने दरबार में शरण दी थी।

अवध अपनी उपजाऊ भूमि के कारण के हमेशा से आकर्षण का केंद्र रहा है ।अंग्रेजों ने भी अपने स्वार्थ के लिए इसकी उपजाऊ भूमि का दोहन किया। इसीलिए अंग्रेजों ने 1856 ई. में इसे अपने साम्राज्य में मिला लिया।

रुहेले एवं बंगश पठान

स्वतंत्र रूहेलखंड राज्य की स्थापना वीर दाउद तथा आलिमुहम्मद खांने ने की थी। रूहेल सरदार नजीबुद्दौला अफगान शासक अहमदशाह अब्दाली का विश्वासपात्र था। रूहेलखण्ड के कुछ दूर पूरब में मुहम्मद खां बंगश नामक एक वीर अफगान ने फरुखाबाद की जागीर को एक स्वतंत्र राज्य बना लिया।

मैसूर ( Mysore )

दक्षिण भारत में हैदराबाद के समीप हैदर अली नामक एक वीर योद्धा , जिसने अपना जीवन एक घुड़सवार के रूप में प्रारम्भ किया था, के आधीन जिस महत्वपूर्ण सत्ता का उदय हुआ, वह मैसूर था। 18वीं शताब्दी में मैसूर पर वाडियार वंश का शासन था। इस वंश के उस समय के अंतिम शासक चिक्का कृष्णराज द्वितीय के शासनकाल में शासन की वास्तविक शक्ति दो मंत्रियों देवराज व नंजराज के हाथों में थी।

हैदरअली के युद्ध कौशल से प्रभावित होकर नंजराज ने हैदर को डिंडीगुल के किले का फौजदार नियुक्त किया। फ्रांसीसियों की सहायता से हैदरअली ने डिंडीगुल में एक आधुनिक शास्त्रागार की स्थापना की। 1761 में हैदर ने नंजराज व देवराज को सत्ता से अलग कर दिया तथा स्वयं मैसूर का वास्तविक शासक बन बैठा।

हैदरअली ने मैसूर स्थित चामुंडेश्वरी देवी मंदिर के लिए दान दिया था, साथ ही अपने सिक्कों पर शिव, पार्वती, विष्णु इत्यादि की आकृति अंकित करवाई।

प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767-69)

हैदरअली के शीघ्र उदय ने स्वभावतः अंग्रेजों, निजाम और मराठों की ईष्या को उभार डाला। इसके साथ-साथ हैदर की फ्रांसीसियों से बढ़ती निकटता तथा अंग्रेजों की आक्रामक नीति ने भी इस युद्ध के लिए आवश्यक मनोदशा के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

हैदर ने कूटनीति से निजाम व मराठों को अपने पक्ष में करके कर्नाटक पर आक्रमण कर दिया। थोड़े उतार-चढ़ाव के साथ डेढ़ साल तक चले इस युद्ध में अंततः हैदरअली विजयी रहा। फलतः अंग्रेजों को हैदर की शर्तों पर एक अपमानजनक संधि करने को बाध्य होना पड़ा जिसे ‘मद्रास की संधि’ (1769) कहते है।

इसके अनुसार अंग्रेजों ने हैदर को किसी दुसरी शक्ति द्वारा आक्रांत होने पर सहायता का वचन दिया।

द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780-84)

तत्कालीन परिस्थितियों के अंतर्गत हैदर पुनः (कर्नाटक के प्रथम युद्ध की भांति) निजाम व मराठों के साथ त्रिगुट बनाने में सफल रहा तथा कर्नल वेली के नेतृत्व वाली अंग्रेजी सेना को पराजित कर दिया। 

लेकिन अंग्रेजों द्वारा निजाम व मराठों को अपने पक्ष में कर लेने के पश्चात् हैदर अंग्रेज जनरल आयरकूट के नेतृत्व वाली सेना से पोर्तोनोवा के युद्ध में पराजित हुआ एवं घायल हो गया जिससे कुछ दिनों पश्चात् उसकी मृत्यु हो गई। हैदर के पुत्र टीपू ने संघर्ष जारी रखा तथा ब्रिगेडीयर मैथ्यूज को पराजित कर सेना सहित बंदी बना लिया।

1784 में दोनों पक्षों के बीच मंगलौर की संधि से युद्ध समाप्त हुआ। भारतीय शक्तियों में हैदर अली पहला व्यक्ति था जिसने अंग्रेजों को पराजित किया।

टीपू सुल्तान

टीपू सुल्तान 1782 में मैसूर का शासक बना। टीपू को उर्दू, अरबी, फारसी, कन्नड़ इत्यादि भाषाएँ ज्ञात थी। टीपू एक प्रगतिशील विचारधारा वाला शासक था। इसने मापतौल के आधुनिक पैमाने अपनाएं, साथ ही आधुनिक कैलेंडर को लागू किया। टीपू ने सिक्का ढलाई की नई तकनीक अपनाई।

उसने अपने पिता हैदर अली की ही भांति अपने सिक्कों पर हिन्दू संवत् तथा हिन्दू देवी-देवताओं के चित्र अंकित करवाए। टीपू अपनी प्रशासनिक व्यवस्था में पाश्चात्य गुणों को शामिल करने वाला भारत का प्रथम शासक था। टीपू ने अरब, काबुल, मारीशस इत्यादि देशों से मैत्रीसम्बंध स्थापित करने हेतु अपने दूतमंडल वहाँ भेजे।

टीपू ने व्यापार की संवृद्धि के लिए अपने गुमास्तों की नियुक्ति कई देशों में की। इसने नौसेना के सशक्तिकरण हेतु मोलिदाबाद व मंगलौर में पोत निर्माण केंद्र स्थापित किये।

तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790-92)

मद्रास व मंगलौर की संधियाँ युद्ध का तात्कालिक किन्तु अस्थाई समाधान मात्र थीं। दोनों ही पक्षों की महत्वकांक्षाएँ ज्यों की त्यों बनी हुई थी।1790 में कार्नवालिस ने टीपू पर अंग्रेजों के खिलाफ फ्रांसीसियों से गुप्त समझौता करने तथा ब्रिटिश संरक्षित त्रावणकोर राज्य पर हमला करने का आरोप लगाकर युद्ध छेड़ दिया।

टीपू अंग्रेज, मराठों व निजाम की संयुक्तसेना से पराजित हो गया तथा अंग्रेजों से संधि करने को बाध्य हुआ।श्रीरंगपट्टनम की इस संधि (1792) के अनुसार टीपू अपना आधा राज्य तथा तीन करोड़ रूपये अंग्रेजों को देने को बाध्य हुआ।

चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799)

इस युद्ध का कारण था लार्ड वेलेजली द्वारा भेजे सहायक संधि के प्रस्ताव का टीपू द्वारा अस्वीकार कर दिया जाना। इस युद्ध में अंग्रेजों की सेना का नेतृत्व जनरल हैरिस,कर्नल वेलेजली तथा स्टुअर्ट ने किया। टीपू श्रीरंगपट्टनम दुर्ग के द्वार पर लड़ता मारा गया।

इस विजय के पश्चात् अंग्रेजों ने मैसूर राज्य का एक बड़ा भाग अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया तथा शेष मैसूर राज्य को वाडियार वंश के एक दो वर्षीय बालक कृष्णराज को राजा बनाकर अपने संरक्षण में ले लिया तथा मैसूर पर सहायक संधि आरोपित कर दी।

पंजाब / सिक्ख ( Punjab / Sikh )

सिक्ख धर्म की स्थापना सोलहवी शताब्दी के आरम्भ में गुरुनानक द्वारा की गई थी। गुरु नानक का जन्म 15 अप्रैल, 1469 को पश्चिमी पंजाब के एक गाँव तलवंडी में हुआ था। इन्होने कर्मकांड एवं अवतारवाद का विरोध किया तथा धर्मप्रचार के लिए सांगतो की स्थापना की।

गुरुअंगद (लेहना)- इन्हें गुरुनानक ने अपना उत्तराधिकारी बनाया था। इन्होने नानक द्वारा प्रारम्भ लंगर व्यवस्था को स्थायी बना दिया। इन्होने गुरुमुखी लिपि की शुरुआत की।

गुरुअमरदास- इन्होने सिक्ख सम्प्रदाय को एक संगठित रूप दिया। बादशाह अकबर इनमे मिलने स्वयं गोइंदवाल गया तथा इनकी पुत्री बीबीभानी के नाम कुछ जमीन दी। इन्होने हिन्दुओ और सिक्खों के विवाह को पृथक करने के लिए ‘लवन पद्धति’ शुरू की।

गुरुरामदास- अकबर ने इन्हें 500बीघा जमीन दी जिस पर इन्होने अमृतसर नगर की स्थापना की। इन्होंने गुरु के पद को पैतृक बना दिया।

गुरु अर्जुन देव-

 1604 में इन्होने आदिग्रंथ की रचना की। इन्होने सूफीसंत मियाँमीर द्वारा अमृतसर में हरविंदर साहब की नींव डलवायी। कालांतर में महाराज रणजीत सिंह द्वारा स्वर्ण जड़वाने के बाद अंग्रेजो द्वारा इसे स्वर्ण मंदिर नाम दिया गया। इन्होने अनिवार्य अध्यात्मिक कर (सिक्खों से) लेना प्रारम्भ किया। शहजादा खुसरो (जहाँगीर के खिलाफ विद्रोह करने वाले) का समर्थन करने के कारण जहाँगीर ने इनको मृत्युदंड दे दिया।

गुरुहरगोविन्द- इन्होने सिक्खों में सैन्य भावना पैदा की तथा उन्हें मांस खाने की अनुमति दी। इन्होने अमृतसर की किलेबंदी करवाई तथा उसमे अकाल तख़्त की स्थापना की। बाज प्रकरण पर इनका शाहजहाँ से संघर्ष हुआ।

गुरुहरराय- इन्होने सामूगढ़ के युद्ध में पराजित हुए दाराशिकोह की मदद की थी।

गुरुहरकिशन- इन्होने अपना जीवन दिल्ली में महामारी से पीड़ित लोगों की सेवा में बिताया। इनकी मृत्यु चेचक से हुई।

गुरुतेग बहादुर- इन्होने औरंगजेब की कट्टर धार्मिक नीतियों का विरोध किया। औरंगजेब ने इन्हें दिल्ली बुलाकर इस्लाम धर्म स्वीकार करने को कहा तथा इनकार करने पर इनकी हत्या करवा दी।

गुरुगोविन्द सिंह-

 ये सिक्खों के दसवें और अन्तिम गुरु थे। इनका जन्म पटना में हुआ था। इन्होने आनंदपुर की स्थापना कर वही अपनी गद्दी स्थापित की। इन्होने पाहुल प्रथा शुरू की। इस पंथ में दीक्षित व्यक्तियों को खालसा कहा जाता था। इन्होनें प्रत्येक सिक्खों को पंचकार धारण करने का आदेश दिया। चंदीदिवर एवं कृष्ण अवतार नामक पुस्तकों की रचना गुरु गोविन्द सिंह ने की। इनकी आत्मकथा का नाम विचित्रनाटक है। आनंदगढ़, लौहगढ़, फतेहपुर एवं केशगढ़ के किलों के निर्माण का श्रेय इन्ही को है।

गुरु गोविन्द सिंह के समय हुए कई युद्धों के दौरान आदि ग्रन्थ गायब हो गया अतः इन्होने पुनः उसका संकलन करवाया फलतः आदि ग्रन्थ को ‘दशम बादशाह का ग्रन्थ’ भी कहा जाता है। गुरु गोविंद सिंह ने अपनी मृत्यु से पहले गद्दी को समाप्त कर दिया। इनकी समाधि के कारण नादेड़(महाराष्ट्र) गुरुद्वारा पवित्र माना जाता है।

बंदा बहादुर- गुरु गोविन्द सिंह के पश्चात् सिक्खों का नेतृत्व बंद बहादुर ने संभाला। यह जम्मू का रहने वाला था। इसके बचपन का नाम लक्ष्मण था। इसे सिक्खों का पहला राजनीतिक नेता माना जाता था। 1716 में फर्रुखसियर के आदेश पर इसकी हत्या कर दी गई। सिक्खों ने 1716 में देग, तेग एवं फतह लेख युक्त चाँदी के सिक्के जारी किये, ये पंजाब में सिक्ख संप्रभुता की प्रथम उद्घोषणा मानी जाती है।

रणजीत सिंह- 

 आधुनिक पंजाब के निर्माण का श्रेय रणजीत सिंह को जाता है। ये सुकरचकिया मिसल के प्रमुख महासिंह के पुत्र थे अफगानिस्तान के शासक जमानशाह ने रणजीत सिंह राजा की पदवी दी तथा इन्हें लाहौर की सुबेदारी भी सौपी। 1809 में रणजीत सिंह व अंग्रेजों के बीच अमृतसर की संधि हुई जिसके द्वारा सतलज नदी दोनों राज्यों की सीमा मान ली गई।

1809 में रणजीत सिंह अपने भाई द्वारा अपदस्थ किये गए शाहशुजा को पुनः सत्तासीन करने में बहुत मदद की थी। शाहशुजा ने ही विश्व प्रसिद्द ‘कोहिनूर हीरा’ भेट किया था जिसे पहले नादिरशाह लूट कर ले गया था। रणजीत सिंह सदैव खालसा के नाम पर कार्य करते थे तथा अपनी सरकार को ‘सरकार-ए-खालसा’ जी कहते थे ।

इन्होंने गुरु नानक एवं गुरुगोविन्द सिंह के नाम पर सिक्के चलवाये।  रणजीत सिंह भारतीय सेनाओं के दुर्बल पक्ष को समझते हुए कम्पनी के नमूने पर विदेशी कमाण्डरों की सहायता से एक कुशल, अनुशासित व सुसंगठित सेना का गठन किया। इसे ‘फौजे-ए-आईन’ कहा जाता है।

रणजीत सिंह ने लाहौर में एक तोप खाना खोला। रणजीत सिंह का उतराधिकारी खड्ग सिंह हुआ। इसके पश्चात् क्रमशः नौनिहाल सिंह एवं शेर सिंह ने शासन किया। शेर सिंह की हत्या हो जाने पर 1843 में महाराजा रणजीत सिंह का अल्पवयस्क पुत्र दिलीपसिंह महारानी जिंदल कौर के संरक्षण में सिंहासन पर बैठा।

1845 में अंग्रेजों ने पंजाब पर आक्रमण कर दिया। फलतः प्रथम आंग्ल सिक्ख युद्ध का प्रारम्भ हुआ। युद्ध में सिक्खों की पराजय हुई तथा इन्हें लाहौर की संधि व भेरोंवाल की संधि (1846) के लिए बाध्य होना पड़ा।

संधि के बदले अंग्रेजों ने दिलीप सिंह को महाराज, रानी जिंदल को संरक्षिका तथा युद्ध में अंग्रेजों की मदद करने वाले सिक्ख सेना के सेनापति लाल सिंह को वजीर के रूप में मान्यता प्रदान की। साथ ही कश्मीर गुलाब सिंह को बेच दिया।

पंजाब को ब्रिटिश प्रभाव से मुक्त करने तथा खालसा शक्ति को पुनः प्रतिष्ठित करने के लिए 1848 में पुनः विद्रोह हो गया इसे ‘द्वितीय आंग्लसिक्ख युद्ध’ के नाम से जाना जाता है। जिसमे 1849 के गुजरात के युद्ध में चार्ल्स नेपियर के नेतृत्व वाली अंग्रेजी सेना ने सिक्ख सेना को बुरी तरह पराजित किया। गुजरात का युद्ध ‘तोपों के युद्ध’ के नाम से जाना जाता है।

29 मार्च, 1849 को सिक्ख राज्य को अंग्रेजी राज्य में मिला लिया गया। अंग्रेजों द्वारा दिलीप सिंह को शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंग्लैण्ड भेज दिया गया, जहाँ बाद में उन्होंने ईसाई धर्म ग्रहण कर लिया। दिलीप सिंह का निधन 23 अक्टूबर,1893 को पेरिस में हुआ।

हैदराबाद ( Hyderabad )

हैदराबाद के स्वतंत्र आसफजाही वंश की स्थापना चिनकिलिच खां निजामुलमुल्क ने 1724 में की थी। इसे मुग़ल बादशाह मुहम्मदशाह ने दक्कन का सूबेदार नियुक्त किया था।

1724 में स्वतंत्र हैदराबाद राज्य की स्थापना के पश्चात मुग़ल बादशाह मुहम्मदशाह ने इसे आसफजाह की उपाधि प्रदान की। शकुरखेडा के युद्ध में चिनकिलिच खां ने मुग़ल सूबेदार मुबरिजखां को पराजित किया।

चिनकिलिच खां की मृत्यु के बाद हैदराबाद का पतन प्रारंभ को गया और अंततः हैदराबाद भारत का पहला ऐसा राज्य बना जिसने वेलेजली की सहायता संधि के अनतर्गत एक आश्रित सेना रखना स्वीकार किया। यहॉं सन् 1724 से सन् 1948 तक ऩिजाम शाही या आसफजाही का शासन था।

निजाम शासकों के नाम इस प्रकार हैं-

  • निजामुलमुल्क चिनकिलिच खान(प्रथम निजाम) (1724- 48)
  • नासिर जंग(1748- 50)
  •  मुजफ्फर जंग(1750-51)
  • सलावत जंग (1751 – 62)
  • निजाम अली(द्वितीय निजाम) (1760 – 1803)
  • सिकन्दर जहां (तृतीय निजाम) (1803 – 29)
  • नासीर – उद-दौला (चतुर्थ निजाम) (1829-1857)
  • अफज-उद-दौला(पांचवा निजाम) ( 1857-69)
  • महबत अली खान(छठवां निजाम) ( 1869- 1911)
  • उस्मान अली खान (सातवां निजाम) (1911-1948)

इस ऩिजाम आसफिया खानदान को दक्कन पर दो सौ साल तक हुकूमत करने का अवसर मिला। मीर उस्मान अली खॉं (सातवां ऩिजाम) ने सन् 1911 से 1948 तक आसफजाही वंश के अंतिम शासक के रूप में शासन चलाया।

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