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September 19, 2020

September 19, 2020

Statutory Development 1857 से पहले वैधानिक विकास

रेग्यूलेटिंग एक्ट (1773 ई.) –

वैधानिक विकास

18 मई, 1773 ई. को लार्ड नार्थ ने कॉमन्स सभा में ईस्ट इंण्डिया कम्पनी रेग्यूलेटिंग बिल प्रस्तुत किया, जिसे कॉमन्स सभा ने 10 जून को और लार्ड सभा ने 19 जून को पास कर दिया। यह 1773 ई. के रेग्यूलेटिंग एक्ट के नाम से प्रसिद्ध है।

इस एक्ट का मुख्य उद्देश्य कम्पनी के संविधान तथा उसके भारतीय प्रशासन में सुधार लाना था।  बंगाल का शासन गवर्नर जनरल तथा चार सदस्यीय परिषद में निहित किया गया। इस परिषद में निर्णय बहुमत द्वारा लिए जाने की भी व्यवस्था की गयी।

इस अधिनियम द्वारा प्रशासक मंडल में वारेन हेस्टिंग्स को गवर्नर जनरल के रूप में तथा क्लैवरिंग, मॉनसन, बरवैल तथा पिफलिप प्रफांसिस को परिषद के सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया।

इन सभी का कार्यकाल पांच वर्ष का था तथा निदेशक बोर्ड की सिफारिश पर केवल ब्रिटिश सम्राट द्वारा ही इन्हें हटाया जा सकता था।

मद्रास तथा बम्बई प्रेसीडेंसियों को बंगाल प्रेसीडेन्सी के अधीन कर दिया गया तथा बंगाल के गवर्नर जनरल को तीनों प्रेसीडेन्सियों का गवर्नर जनरल बना दिया गया। इस प्रकार वारेन हेस्टिंग्स को बंगाल का प्रथम गवर्नर जनरल कहा जाता है और वे लोग सत्ता का उपयोग संयुक्त रूप से करते थे

सपरिषद गवर्नर जनरल को भारतीय प्रशासन के लिए कानून बनाने का अधिकार प्रदान किया गया, किन्तु इन कानूनों को लागू करने से पूर्व निदेशक बोर्ड की अनुमति प्राप्त करना अनिवार्य था।

इस अधिनियम द्वारा बंगाल (कलकत्ता) में एक उच्चतम न्यायालय की स्थापना की गयी।

इसमें एक मुख्य न्यायाधीश तथा तीन अन्य न्यायाधीश थे। सर एलिजा इम्पे को उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) का प्रथम मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया।  

इस न्यायालय को दीवानी, फौजदारी, जल सेना मामलों में व्यापक अधिकार दिया गया।

न्यायालय को यह भी अधिकार था कि वह कम्पनी तथा सम्राट की सेवा में लगे व्यक्तियों के विरुद्ध मामले की सुनवायी कर सकता था।

इस न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध इंग्लैंड स्थित प्रिवी कौंसिल में अपील की जा सकती थी।

संचालक मंडल का कार्यकाल चार वर्ष कर दिया गया तथा अब 500 पौंड के स्थान पर 1000 पौंड के अंशधारियों को संचालक चुनने का अधिकार दिया गया।

इस प्रकार 1773 के एक्ट के द्वारा भारत में कंपनी के कार्यों में ब्रिटिश संसद का हस्तक्षेप व नियंत्रण प्रारंभ हुआ

तथा कम्पनी के शासन के लिए पहली बार एक लिखित संविधान प्रस्तुत किया गया।

बंगाल न्यायालय एक्ट –

रेल्यूलेटिंग एक्ट के दोषों को दूर करने के लिए ब्रिटिश संसद ने मि. बर्क की अध्यक्षता में एक कमेटी नियुक्त की। इस कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर 1781 ई. में ब्रिटिश संसद ने एक एक्ट पास किया, जिसे बंगाल न्यायालय का एक्ट कहा जाता है। इसे संशोधन अधिनियम भी कहते हैं। इस एक्ट का मुख्य उद्देश्य न्यायालय के अधिकार क्षेत्र और शक्तियों के विषय में उत्पन्न अनिश्चितता का अन्त करना था।

एक्ट की प्रमुख धाराएँ-
  • इस एक्ट के अनुसार कम्पनी के कर्मचारियों के सरकारी तौर पर किए गये कार्य काफी सीमा तक सुप्रीम कोर्ट के अधिकार के बाहर कर दिए गए। दूसरे शब्दों में गवर्नर जनरल और उसकी कौंसिल द्वारा किए गए कार्यो पर सर्वोच्च न्यायालय कोई नियंत्रण नहीं रहा।
  • छोटे न्यायालयों के न्याय अधिकारियों के न्याय सम्बन्धी कार्यों पर से सुप्रीम कोर्ट का कण्ट्रोल हटा दिया गया।
  • राजस्व वसूल करने वाले अधिकारियों पर से सुप्रीम कोर्ट का नियंत्रण हटा लिया गया।
  • गवर्नर जनरल तथा उसकी कौंसिल पर से सुप्रीम कोर्ट का नियंत्रण हटा दिया गया। अब सुप्रीम कोर्ट गवर्नर जनरल तथा उसकी कौंसिल के सिर्फ उसी कार्य में हस्तक्षेप कर सकता था, जिससे ब्रिटिश प्रजा को हानि पहुँचती हो।
  • कम्पनी के न्यायालयों के निर्णयों के विरूद्ध गवर्नर जनरल और उसकी कौंसिल को अपील सुनने का अधिकार दे दिया गया।
  • गवर्नर जनरल तथा उसकी परिषद् को सुप्रीम कोर्ट की सम्मत्ति के बिना प्रान्तीय न्यायालयों तथा परिषद् के सम्बन्ध में नियम बनाने का अधिकार दे दिया गया।
  • सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र केवल कलकत्ता वाशिंदों तक सीमित कर दिया गया अर्थात् शेष स्थानों पर रहने वाले भारतीयों के मुकदमें सुनने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट को नहीं था।
  • यह भी कहा गया कि न्याय करते समय भारतीयों की धार्मिक परम्पराओं, रीति-रिवाजो, सामाजिक नियमों और जातीय कानूनों को ध्यान में रखा जाएगा। इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट के लिए मुकदमों के फैसले अंग्रेजी कानून के अनुसार करने की मनाही कर दी गई।
  • यह भी कहा जाता है कि सुप्रीम कोर्ट हिन्दुओ के मुकदमों का हिन्दुओं के कानून के अनुसार और मुसलमानों के मुकदमों का मुसलामनों के कानून के अनुसार फैसला करे।

इस एक्ट से सुप्रीम कोर्ट के गवर्नर जनरल की कौंसिल तथा छोटे न्यायालयों के साथ चलने वाले झगड़े समाप्त हो गए। भारतीयों को अंग्रेजी कानून के विरूद्ध जो शिकायत थी, वह भी दूर हो गई। संक्षेप में, इस एक्ट ने रेग्युलेटिंग एक्ट के सर्वोच्च न्यायलय से सम्बन्धित दोषों को दूर कर दिया। इसके अतिरिक्त सर्वोच्च न्यायालय की तुलना में गवर्नर जनरल तथा उसकी कौंसिल की स्थिति को दृढ़ बना दिया।

डुण्डास का इण्डियन बिल (अप्रैल 1783) –

30 मई, 1782 ई. को डुण्डास के प्रस्ताव पर ब्रिटिश लोक सभा ने वारेन हेस्टिंग्स प्रशासन की निन्दा की और डायरेक्टरों से उसे वापस बुलाने के लिए कहा। परन्तु संचालक मण्डल ने लोक सभा के आदेश की अवहेलना करते हुए हेस्टिग्स को उसके पद पर बनाए रखा।

कीथ के अनुसार, इस तरह स्पष्ट कर दिया गया कि कम्पनी के डायरेक्टर न तो अपने कर्मचारियों का नियंत्रित कर सकते थे और राज्यों को या कम्पनी को, जबकि कलकत्ता के विरूद्ध होने वाली मद्रास प्रेसीडेन्सी की कार्यवाहियों ने यह सिद्ध कर दिया कि मुख्य प्रेसीडेन्सी सहायक को अपने नियंत्रण में नहीं रखा सकती थी।

कम्पनी के संविधान में सुधार करने के लिए अप्रैल, 1783 में मि. डुण्डास ने एक बिल प्रस्तुत किया, जिसमें निम्नलिखित सुझाव दिए गए थे-

  • सम्राट को कम्पनी के प्रमुख अधिकारियों को वापस बुलाने का अधिकार दिया जाए।
  • कुछ महत्त्वपूर्ण मामलों में गवर्नर जनरल को अपनी कौंसिल के निर्णयों को रद्द करने की शक्ति दी जाए।
  • गवर्नर जनरल और उसकी कौंसिल का प्रादेशिक सरकारों पर नियंत्रण बढ़ा दिया जाए।

चूँकि डुण्डास विरोधी दल का सदस्य था, अतः उसके द्वारा प्रस्तावित वह बिल पास नहीं हो सका। फिर, भी उसका विधेयक इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ कि इसने भारत में संवैधानिक परिवर्तन की आवश्यकता पर जोर दिया और मंत्रिमण्डल को कार्यवाही करने की प्रेरणा दी।

फॉक्स का इण्डिया बिल (नवम्बर, 1783) –

डुण्डास विधेयक ने सरकार को कम्पनी के संविधान में सुधार करने के लिए प्रेरित किया। अतः फॉक्स तथा नौर्थ के संयुक्त मंत्रिमण्डल ने तुरन्त इस प्रश्न को अपने हाथ में लिया। फॉक्स ने भारत में कम्पनी सरकार को अवर्णातीत, शोचनीय, अराजकता तथा गड़बड़ बतलाया। उसने 18 नवम्बर, 1783 ई. को अपना प्रसिद्ध ईस्ट इण्डिया बिल पेश किया, जिसके प्रमुख सुझाव निम्नलिखित थे-

  • कम्पनी की प्रादेशिक सरकार को उसके व्यापारिक हितों से पृथक् कर दिया गया।
  • संचालक मण्डल तथा संचालक मण्डल के स्थान पर सात कमिश्नरों का एक मण्डल लन्दन में स्थापित किया जाए।
  • इस मण्डल को भारतीय प्रदेशों तथा उसके राजस्व का प्रबन्ध करने का पूर्ण अधिकार हो। उसको कम्पनी के समस्त कर्मचारियों को नियुक्त तथा पदच्युत करने की शक्ति भी दी जाए।
  • मण्डल के सदस्यों की नियुक्ति पहली बार संसद के द्वारा की जाए लेकिन बाद में रिक्त होने वाले स्थानों को भरने का अधिकार सम्राट को हो।
  • इन सदस्यों का कार्यकाल चार वर्ष रखा गाय और इस अवधि के दौरान उन्हें संसद के दोनों सदनों में से किसी एक सदन के कहने पर इंग्लैण्ड का सम्राट उन्हें पदच्युत कर सके।
  • इस बोर्ड की बैठकें लन्दन में बुलाए जाए और संसद को इस मण्डल के कार्यों का निरीक्षण करने का अधिकार हो, अर्थात् बोर्ड पर संसद का नियंत्रण स्थापित किया जाए।
  • व्यापार को नियंत्रित करने के लिए व सहायक निदेशकों का एक और मण्डल बनाया जाए।
  • इन सहायक निदेशकों की नियुक्ति भी प्रथम बार संसद द्वारा हो और इसके पश्चात् संचालक मण्डल को उन्हें निर्वाचित करने का अधिकार दिया जाए।
  • इन सहायक निदेशकों को कार्यकाल पाँच वर्ष हो और इस सम्बन्ध में वे भी कमिश्नरों की तरह सुरक्षित हों।
  • विधेयक में एकाधिकार, भेंट तथा रियासतों को ब्रिटिश सेना के मदद को समाप्त करने की व्यवस्था की गई।

फॉक्स विधेयक का संसद में तथा उसके बाहर जोरदार विरोध हुआ। पुन्निया के शब्दो में पार्लियामेन्ट के अन्दर और बाहर दोनों जगह इस विधेयक का मुखर, प्रबल और कटुतापूर्ण विरोध हुआ।  इस विधेयक के दोषों के बारे में रॉबर्ट्सन ने लिखा है, भारत में कम्पनी सरकार को वस्तुतः सात व्यक्तियों के सुपुर्द कर दिया गया था। इससे कमिश्नरों तथा शासक दल को संरक्षण बाँटने का विस्तृत अधिकार मिल जाता। इससे संसद ने भ्रष्ट होने का भी भय था।

यह नये राजनीतिक दायित्व का निर्माण करता। कम्पनी का संविधान चार्टर द्वारा नियमित होता था, परन्तु फॉक्स विधेयक से कम्पनी के चार्टर की पवित्रता नष्ट हो जाती और उसके संविधान के नष्ट हो जाने से अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो जाती।

इंग्लैण्ड नरेश जार्ज तृतीय के व्यक्तिगत हस्तक्षेप के कारण यह विधेयक लार्ड सभा में अस्वीकृत हो गया। रॉबर्ट्सन के शब्दों में विधेयक एक बड़ी समस्या को व्यापक रूप से सुलझाने का निश्छल एवं कूटनीतिक प्रयास था। कीथ ने भी लिखा है, यह विधेयक सम्पूर्ण संविधान को सुधारने का एक प्रबल प्रयत्न था।

1784 ई. का पिट्स इंडिया एक्ट:

रेग्यूलेटिंग एक्ट के दोषों को दूर करने के लिये इस एक्ट को पारित किया गया। इस एक्ट से संबंधित विधेयक ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री पिट द यंगर ने संसद में प्रस्तुत किया तथा 1784 में ब्रिटिश संसद ने इसे पारित कर दिया।

इस एक्ट के प्रमुख उपबंध निम्नानुसार थे-

इसने कंपनी के राजनैतिक और वाणिज्यिक कार्यों को पृथक पृथक कर दिया | इसने निदेशक मंडल को कंपनी के व्यापारिक मामलों की अनुमति तो दी लेकिन राजनैतिक मामलों के प्रबंधन के लिए नियंत्रण बोर्ड (बोर्ड ऑफ़ कण्ट्रोल )नाम से एक नए निकाय का गठन कर दिया |

 इस प्रकार द्वैध शासन व्यवस्था का शुरुआत किया गया नियंत्रण बोर्ड को यह शक्ति थी की वह ब्रिटिश नियंत्रित भारत में सभी नागरिक , सैन्य सरकार व राजस्व गतिविधियों का अधीक्षण व नियंत्रण करे |

इस प्रकार यह अधिनियम दो कारणों से महत्वपूर्ण था –

  • भारत में कंपनी के अधीन क्षेत्रों को पहली बार ब्रिटिश अधिपत्य का क्षेत्र कहा गया
  • ब्रिटिश सरकार को भारत में कंपनी के कार्यों और इसके प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण प्रदान किया गया |

1793 का राजपत्र

कम्पनी के कार्यों एवं संगठन में सुधार के लिए यह चार्टर पारित किया गया। इस चार्टर की प्रमुख विशेषता यह थी कि इसमें पूर्व के अधिनियमों के सभी महत्वपूर्ण प्रावधानों को शामिल किया गया था।  इस अधिनियम की प्रमुख विशेषताएं निम्न थी-

  • कम्पनी के व्यापारिक अधिकारों को अगले 20 वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया।
  • विगत शासकों के व्यक्तिगत नियमों के स्थान पर ब्रिटिश भारत में लिखित विधि-विधानों द्वारा प्रशासन की आधारशिला रखी गयी।
  • इन लिखित विधियों एवं नियमों की व्याख्या न्यायालय द्वारा किया जाना निर्धारित की गयी।
  • गवर्नर जनरल एवं गवर्नरों की परिषदों की सदस्यता की योग्यता के लिए सदस्य को कम-से-कम 12 वर्षों तक भारत में रहने का अनुभव को आवश्यक कर दिया गया।
  • नियंत्रक मंडल के सदस्यों का वेतन अब भारतीय कोष से दिया जाना तय हुआ।

1813 ई. का चार्टर अधिनियम:

अधिनियम की विशेषताएं

  • कंपनी के अधिकार-पत्र को 20 सालों के लिए बढ़ा दिया गया
  • कंपनी के भारत के साथ व्यापार करने के एकाधिकार को छीन लिया गया।लेकिन उसे चीन के साथ व्यापर और पूर्वी देशों के साथ चाय के व्यापार के संबंध में 20 सालों के लिए एकाधिकार प्राप्त रहा
  • कुछ सीमाओं के अधीन सभी ब्रिटिश नागरिकों के लिए भारत के साथ व्यापार खोल दिया गया
  • ईसाई मिशनरियों को भारत में धर्म प्रचार की अनुमति दी गयी।

1833 ई. का चार्टर अधिनियम:

ब्रिटिश भारत के केन्द्रीयकरण की दिशा में यह अधिनियम निर्णायक कदम था | अधिनियम की विशेषताएं

  • कंपनी के व्यापारिक अधिकार पूर्णतः समाप्त कर दिए गए
  • अब कंपनी का कार्य ब्रिटिश सरकार की ओर से मात्र भारत का शासन करना रह गया
  • बंगाल के गवर्नर जरनल को भारत का गवर्नर जनरल कहा जाने लगा
  • जिसमे सभी नागरिक और सैन्य शक्तियां निहित थी |
  • विधि के संहिताकरण के लिए आयोग के गठन का प्रावधान किया गया।इस अधिनियम द्वारा भारत में केन्द्रीकरण का प्रारंभ किया गया, जिसका सबसे प्रबल प्रमाण विधियों को संहिताबद्ध करने के लिए एक आयोग का गठन था। इस आयोग का प्रथम अध्यक्ष लॉर्ड मैकाले नियुक्त किया गया।
  • भारत में दास-प्रथा को गैर-कानूनी घोषित किया गया। फलस्वरूप 1843 में भारत में दास-प्रथा की समाप्ति की घोषणा हुई।

इस प्रकार इस अधिनियम में एक ऐसी सरकार का निर्माण किया जिसका ब्रिटिश कब्जे वाले संपूर्ण भारतीय क्षेत्र पर पूर्ण नियंत्रण हो | लार्ड विलियम बैंटिक भारत के पहले गवर्नर जनरल थे | इसने मद्रास और बम्बई के गवर्नरों को विधायिका संबंधी शक्ति से वंचित कर दिया |

भारत के गवर्नर जनरल को पूरे ब्रिटिश भारत में विधायिका के असीमित अधिकार प्रदान कर दिए गए | इसके अन्तर्गत पहले बनाए गए कानूनों को नियामक कानून कहा गया और नए कानून के तहत बने कानूनों को एक्ट या अधिनियम कहा गया | भारतीय कानूनों का वर्गीकरण किया गया तथा इस कार्य के लिए विधि आयोग की नियुक्ति की व्यवस्था की गई।

1853 का राजपत्र

1853 का राजपत्र भारतीय शासन (ब्रिटिश कालीन) के इतिहास में अंतिम चार्टर एक्ट था।  यह अधिनियम मुख्यतः भारतीयों की ओर से कम्पनी के शासन की समाप्ति की मांग तथा तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी की रिपोर्ट पर आधारित था।

इसकी प्रमुख विशेषताएं निम्न थी-
  • ब्रिटिश संसद को किसी भी समय कम्पनी के भारतीय शासन को समाप्त करने का अधिकार प्रदान किया गया।
  • कार्यकारिणी परिषद के कानून सदस्य को परिषद का पूर्ण सदस्य का दर्जा प्रदान किया गया।
  • बंगाल के लिए पृथक गवर्नर की नियुक्ति की व्यवस्था की गयी।
  • गवर्नर जनरल को अपनी परिषद के उपाध्यक्ष की नियुक्ति का अधिकार दिया गया।
  • विधायी कार्यों को प्रशासनिक कार्यों से पृथक करने की व्यवस्था की गयी।
  • निदेशक मंडल में सदस्यों की संख्या 24 से घटाकर 18 कर दी गयी।
  • कम्पनी के कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए प्रतियोगी परीक्षा की व्यवस्था की गयी।
  • भारतीय विधि आयोग की रिपोर्ट पर विचार करने के लिए इंग्लैंड में विधि आयोग के गठन का प्रावधान किया गया।

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September 19, 2020

British Power बंगाल में ब्रिटिश शक्ति की स्थापना

बंगाल में ब्रिटिश शक्ति की स्थापना

बंगाल

मुगलकालीन बंगाल में आधुनिक पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश, बिहार और उड़ीसा शामिल थे। बंगाल में डच, अंग्रेज व फ्रांसीसियों ने व्यापारिक कोठीयां स्थापित की थी जिनमें हुगली सर्वाधिक महत्वपूर्ण थी। 1651 ईस्वी में शाहशुजा से अनुमति लेकर इस इंडिया कंपनी ने बंगाल में हुगली में अपने प्रथम कारखाने की स्थापना की।

1670-17०० ईसवी के बीच बंगाल में अनधिकृत अंग्रेज व्यापारियों जिन्हें इंटरलाॅपर्स कहा जाता था,ने कंपनी नियंत्रण से मुक्त होकर व्यापार किया जो अंग्रेज और मुगलों के बीच संघर्ष का कारण बना।

जॉब चारनाक नामक एक अंग्रेज ने कालिकाता, गोविंदपुर और सूतानाती को मिलाकर आधुनिक कलकत्ता की नींव डाली। कोलकाता में 1700 ई. में फोर्ट विलियम की स्थापना की गई। फोर्ट विलियम का प्रथम गवर्नर चार्ल्स आयर को बनाया गया। इसी समय बंगाल को मद्रास से स्वतंत्र कर अलग प्रेसीडेंसी बना दिया गया।

बंगाल के नवाब

मुर्शीद कुली खां (1717 ई. से 1727 ई.)

बंगाल प्रांत, मुग़ल कालीन भारत का सबसे समृद्ध प्रांत था। औरंगजेब ने मुर्शीद कुली खाँ को बंगाल का दीवान नियुक्त किया था, लेकिन 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुग़ल साम्राज्य की कमजोरी का लाभ उठाकर 1717 ई. में इसने स्वयं स्वतंत्र घोषित कर दिया।

1717 ई. में मुग़ल सम्राट फर्रूखसियर ने एक फरमान द्वारा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल में व्यापार करने की रियायत दे दीं। इस फरमान द्वारा बंगाल में 3000 रु. वार्षिक कर अदा करने पर कंपनी को उसके समस्त व्यापार में सीमा शुल्क से मुक्त कर दिया गया। साथ ही कोलकाता के आसपास के 38 गांवों को खरीदने का अधिकार मिल गया।

फरूखसियर का यह फरमान अंग्रेजो के लिए तो मील का पत्थर साबित हुआ लेकिन बंगाल के नवाबों के लिए यह सिरदर्द बन गया।

अंग्रेजो ने इस विशेषाधिकार का दुरुपयोग शुरु किया, तो मुर्शीद कुली खाँ ने इसका विरोध किया। मुर्शीद कुली खाँ ने फरूखसियर द्वारा दिए गए फरमान का बंगाल में स्वतंत्र प्रयोग नियंत्रित करने का प्रयत्न किया। मुर्शीद कुली खाँ ने बंगाल की राजधानी को ढाका से मुर्शिदाबाद स्थानांतरित किया।

1726 ई. में मुर्शीद कुली खाँ की मृत्यु के बाद उसके दामाद शुजाउद्दीन ने 1727 से 1739 तक बंगाल पर शासन किया। 1739 में शुजाउद्दीन की मृत्यु के बाद सरफराज खां ने सत्ता हथिया ली।

अलीवर्दी_खां

अलीवर्दी खां, सरफराज खां को गिरिया के युद्ध में पराजित कर 1740 में बंगाल का नवाब बना।

अली वर्दी खां ने यूरोपियों की तुलना मधुमक्खियों से की थी

और कहा था यदि उन्हें छेड़ा न जाए तो वे शहद देंगी और यदि छेड़ा जाए तो वे काट-काट कर मार डालेंगी।

सिराजु द्दौला

सिराजुद्दौला के शासनकाल में बंगाल अंग्रेजों और फ्रांसीसियों की आपसी प्रतिद्वंदिता के कारण अशांत था।

फरूखसियर द्वारा प्रदान किये विशेष अधिकार फरमान का, कम्पनी के कर्मचारियों द्वारा दुरूपयोग से सिराजुद्दौला अंग्रेजों से नाराज था। इसके अतिरिक्त अंग्रेजों और फ्रांसीसियों ने बंगाल में स्थान-स्थान पर किलेबंदी शुरू कर दी थी।

सिराजुद्दौला ने अंग्रेजो और फ्रांसीसियों को तत्काल किलेबंदी रोकने का आदेश दिया।

फ्रांसीसियों ने तो नवाब का आदेश मानकर किलेबंदी का काम रोक दिया किन्तु अंग्रेजो ने ऐसा नहीं किया। परिणामस्वरूप सिराजुद्दौला ने कासिम बाजार स्थित अंग्रेजो के किले पर आक्रमण कर उन्हें आत्मसमर्पण के लिए बाध्य किया।

20 जून, 1756 को फोर्ट विलियम ने आत्मसमर्पण कर दिया कुछ शहर छोड कर फुल्टा द्वीप भाग गए। कहा जाता है कि 146 अंग्रेजों को 18 फुट लंबे तथा 14 फुट 10 इंच चौड़े एक कमरे मेँ बंद कर दिया गया था, जिसमें से सिर्फ 23 अंग्रेज ही बच पाए थे। जून, 1756 में घटी यह घटना इतिहास में ब्लैक होल के नाम से विख्यात है।

जनवरी 1757 में राबर्ट क्लाइव और एडमिरल वाटसन ने कोलकाता पर पुनः अधिकार कर लिया। फरवरी 1757 में अंग्रेजो और सिराजुद्दौला के बीच कोलकाता में एक संधि हुई, जिसे अलीनगर की संधि के नाम से जाना जाता है। इस संधि द्वारा अंग्रेजो ने बंगाल में किलेबंदी और सिक्के ढालने की अनुमति प्राप्त की। अलीनगर की संधि द्वारा अंग्रेज और आक्रामक हो गए।

मार्च 1757 में अंग्रेजो ने फ़्रांसिसी क्षेत्र चंद्रनगर पर कब्जा कर लिया। अंग्रेजो ने सिराजुद्दौला के विरुद्ध एक षड्यंत्र रचा जिसमें सिराजुद्दौला के सेनापति मीरजाफर को बंगाल का नवाब बनाने का आश्वासन देकर शामिल किया गया था। अंग्रेजो की गतिविधियो से नाराज होकर सिराजुद्दौला युद्ध की तैयारी करने लगा।

23 जून 1757 को अंग्रेजो और सिराजुद्दौला की सेनाओं के बीच प्लासी नामक स्थान पर एक भीषण युद्ध हुआ, जिसमें सिराजुद्दौला की हार हुई।प्लासी के युद्ध में सिराजुद्दौला की सेना का नेतृत्व मीर जाफर, लतीफ खां, राय दुर्लभ, मीर मदान और मोहन लाल कर रहे थे।

इसमें मीरजाफर और राय दुर्लभ अंग्रेजो से मिले हुए थे। प्लासी के युद्ध में सिराजुद्दौला को बंदी बनाकर बाद में गोली मार दी गई।

मीर जाफर (1757 ई. से 1760 ई.)

प्लासी के युद्ध में विजय के बाद अंग्रेजो ने मीरजाफर को बंगाल का नवाब बनाया। नवाब बनने के बाद मीर जाफर ने पुरस्कार स्वरूप अंग्रेजो को 24 परगना की जमींदारी प्रदान की। साथ ही कंपनी को बंगाल, बिहार, और उड़ीसा में मुक्त व्यापार करने का अधिकार प्रदान किया।

कालांतर में मीर जाफर के अंग्रेजो से संबंध खराब हो गए। इसका कारण प्रशासनिक कार्यों में अंग्रेजो का बढ़ता हस्तक्षेप था। अंग्रेजों की लूटपाट से तंग आकर मीर जाफर ने अक्टूबर 1760 में अपने दामाद मीर कासिम के पक्ष में सिंहासन त्याग दिया।

मीर कासिम (1760 ई. से 1763 ई.)

मीर कासिम ने नवाब बनने के बाद अंग्रेजो को मिदनापुर, बर्दवान तथा चटगांव के तीन जिले सौंप दिए। मीर कासिम ने राजधानी को मुर्शिदाबाद से मुंगेर स्थानांतरित कर दिया। फरुखसियर के 1717 के फरमान के अनुसार कंपनी को पारगमन शुल्क से मुक्त कर दिया गया था। इस तरह की छूट कंपनी के कर्मचारियों के लिए नहीँ थी।

कंपनी के कर्मचारियों द्वारा इस फरमान का दुरुपयोग किया जा रहा था। मीर कासिम ने क्रुद्ध होकर भारतीय व्यापारियों के लिए भी चुंगी समाप्त कर दी। 1763 में मीर कासिम और अंग्रेजो के बीच कई युद्ध हुए, जिसमें अंततः पराजित हुआ और भाग गया।

मीर जाफर (1763 ई. से 1765 ई.)

मीर कासिम के बाद एक बार फिर मीरजाफर बंगाल के सिंहासन पर बैठा। मीर जाफर ने अंग्रेजो की सेना के रखरखाव के लिए बर्दवान, मिदनापुर और चटगांव प्रदान किए तथा बंगाल में उन्मुक्त व्यापार का अधिकार दिया।

1764 में मीरजाफर ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला और मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय को मिलाकर बक्सर नामक स्थान पर अंग्रेजो से युद्ध किया इस युद्ध में अंग्रेजो की विजय हुई।

बक्सर के युद्ध के बाद बंगाल के गवर्नर लार्ड क्लाइव ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला तथा मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय के साथ इलाहाबाद की संधि की। इलाहाबाद की संधि द्वारा मुग़ल सम्राट को कड़ा और इलाहाबाद का क्षेत्र मिला। मुग़ल सम्राट ने कंपनी को बंगाल बिहार की दीवानी का अधिकार दिया।

कंपनी ने उसके बदले 26 लाख रूपये मुग़ल सम्राट को देना स्वीकार किया। शुजाउद्दौला द्वारा कंपनी को युद्ध हर्जाने के रुप में 50 लाख रुपए चुकाने के बाद उसके क्षेत्र पर अधिकार कर लिया गया।

5 फरवरी 1765 को मीर जाफर की मृत्यु के बाद उसके पुत्र नाजीमुद्दौला को बंगाल के नवाब बनाया गया।

द्वैध शासन (1765 ई. से 1772 ई.)

अंग्रेजों ने बंगाल में 1765 में द्वैध शासन की शुरुआत की, जो लगभग 1772 ई. तक चला। लियो कार्टिस को द्वैध शासन का जनक माना जाता है। द्वैध शासन के समय बंगाल से 1760-67 के बीच 2,24,67,500 रुपए की वसूली की गई।

इससे पूर्व राजस्व की वसूली मात्र 80 लाख थी। शासन के समय बंगाल में 1770 ई. में भयंकर अकाल पड़ा, जिसमें करीब एक करोड़ लोगों की भुखमरी के कारण मृत्यु हो गई। 1772 ई. में कोर्ट डायरेक्टर्स ने बंगाल में द्वैध शासन प्रणाली को समाप्त करके प्रशासन का उत्तरदायित्व अपने अधिकार में लेने का आदेश जारी किया।

बंगाल का अंतिम नवाब मुबारक उद्दौला (1770 से 1775) था।

स्मरणीय तथ्य

  • बंगाल में अंग्रेजी व्यापार की मुख्य वस्तुएं थीं – रेशम, सूती कपड़े, शोरा और चीनी।
  • 1757 में कलकत्ता को जीतने के बाद सिराजुद्दौला ने उसका नाम अलीनगर रख दिया था।
  • 1765-1772 तक बंगाल में चले द्वैध शासन को बंगाल के गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स ने समाप्त किया।
  • द्वैध शासन के समय कंपनी ने दीवानी कार्यों के लिए राजा सिताब राय को बिहार तथा मोहम्मद रजा खाँ को बंगाल का नवाब दीवान नियुक्त किया।
  • प्लासी के युद्ध में अंग्रेजो का सेनापति क्लाइव तथा नवाब का सेनापति मीरजाफर थे।
  • फरवरी 1760 में क्लाइव कुछ महीने के लिए गवर्नर का दायित्व हॉलवेल को सौंप कर इंग्लैण्ड वापस चला गया।
  •  हॉलवेल ने मीरजाफर को पदच्युत करने की योजना बनाई।
  • अल्फ्रेड लायल के अनुसार, “प्लासी में क्लाइव की सफलता ने बंगाल में युद्ध तथा राजनीति का एक अत्यंत विस्तृत क्षेत्र अंग्रेजों के लिए खोल दिया।“
  • मुर्शिदाबाद में मीर जाफर को कर्नल क्लाइव का गीदड़ कहा जाता था।
  • मीर जाफर के काल में ‘अंग्रेजो ने बांटो और राज करो’ की नीति को जन्म देते हुए एक गुट को दूसरे गुट से लड़ाने की शुरुआत की।
  • बक्सर के युद्ध में अंग्रेजी सेना का नेतृत्व हेक्टर मुनरो ने किया।
  • पी. ई. रोबर्ट्स ने बक्सर के युद्ध के बारे में कहा था कि, “प्लासी की अपेक्षा बक्सर को भारत में अंग्रेजी प्रभुता की जन्मभूमि मानना कहीं उपयुक्त है।”

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September 19, 2020

Governing Policies ब्रिटिश कंपनी की शासन नीतियां भाग 2

रैयतवाड़ी व्यवस्था

ब्रिटिश कंपनी

स्थायी बंदोबस्त के पश्चात, ब्रिटिश सरकार ने भू-राजस्व की एक नयी पद्धति अपनायी, जिसे रैयतवाड़ी बंदोबस्त कहा जाता है। मद्रास के तत्कालीन गवर्नर (1820-27) टॉमस मुनरो द्वारा 1820 में प्रारंभ की गयी इस व्यवस्था को मद्रास, बम्बई एवं असम के कुछ भागों लागू किया गया।

बम्बई में इस व्यवस्था को लागू करने में बंबई के तत्कालीन गवर्नर (1819-27) एल्फिन्सटन ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। भू-राजस्व की इस व्यवस्था में सरकार ने रैयतों अर्थात किसानों से सीधा बंदोबस्त किया। अब रैयतों को भूमि के मालिकाना हक तथा कब्जादारी अधिकार दे दिये गये तथा वे सीधे या व्यक्तिगत रूप से स्वयं सरकार को लगान अदा करने के लिये उत्तरदायी थे।

इस व्यवस्था ने किसानों के भू-स्वामित्व की स्थापना की। इस प्रथा में जमींदारों के स्थान पर किसानों को भूमि का स्वामी बना दिया गया। इस प्रणाली के अंतर्गत रैयतों से अलग-अलग समझौता कर लिया जाता था तथा भू-राजस्व का निर्धारण वास्तविक उपज की मात्रा पर न करके भूमि के क्षेत्रफल के आधार पर किया जाता था ।

सरकार द्वारा इस व्यवस्था को लागू करने का उद्देश्य, बिचौलियों (जमीदारों) के वर्ग को समाप्त करना था। क्योंकि स्थायी बंदोबस्त में निश्चित राशि से अधिक वसूल की गयी सारी रकम जर्मींदारों द्वारा हड़प ली जाती थी तथा सरकार की आय में कोई वृद्धि नहीं होती थी। अतः आय में वृद्धि करने के लिये ही सरकार ने इस व्यवस्था को लागू किया ताकि वह बिचौलियों द्वारा रखी जाने वाली राशि को खुद हड़प सके। दूसरे शब्दों में इस व्यवस्था द्वारा सरकार स्थायी बंदोबस्त के दोषों को दूर करना चाहती थी।

इस व्यवस्था के अंतर्गत 51 प्रतिशत भूमि आयी। कम्पनी के अधिकारी भी इस व्यवस्था को लागू करने के पक्ष में थे क्योंकि उनका मानना था कि दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम भारत में इतने बड़े जमींदार नहीं है कि उनसे स्थायी बंदोबस्त किया जा सके। इसलिये इन क्षेत्रों में रैयतवाड़ी व्यवस्था ही सबसे उपयुक्त है।

हालांकि इस व्यवस्था के बारे में यह तर्क दिया गया कि यह व्यवस्था भारतीय कृषकों एवं भारतीय कृषि के अनुरूप है किंतु वास्तविकता इससे बिल्कुल भिन्न थी।

व्यावहारिक रूप में यह व्यवस्था जमींदारी व्यवस्था से किसी भी प्रकार कम हानिकारक नहीं थी। इसने ग्रामीण समाज की सामूहिक स्वामित्व की अवधारणा को समाप्त कर दिया तथा जमींदारों का स्थान स्वयं ब्रिटिश सरकार ने ले लिया।

सरकार ने अधिकाधिक राजस्व वसूलने के लिये मनमाने ढंग से भू-राजस्व का निर्धारण किया तथा किसानों को बलपूर्वक खेत जोतने को बाध्य किया। रैयतवाड़ी व्यवस्था के अन्य दोष भी थे। इस व्यवस्था के तहत किसान का भूमि पर तब तक ही स्वामित्व रहता था, जब तक कि वह लगान की राशि सरकार को निश्चित समय के भीतर अदा करता रहे अन्यथा उसे भूमि से बेदखल कर दिया जाता था।

अधिकांश क्षेत्रों में लगान की दर अधिक थी अतः प्राकृतिक विपदा या अन्य किसी भी प्रकार की कठिनाई आने पर किसान लगान अदा नहीं कर पाता था तथा उसे अपनी भूमि से हाथ धोना पड़ता था। इसके अलावा किसानों को लगान वसूलने वाले कर्मचारियों के दुर्व्यवहार का सामना भी करना पड़ता था।

महालवाडी पद्धति

लार्ड हेस्टिंग्स के काल में ब्रिटिश सरकार ने भू-राजस्व की वसूली के लिये भू-राजस्व व्यवस्था का संशोधित रूप लागू किया, जिसे महालवाड़ी बंदोबस्त कहा गया। यह व्यवस्था मध्य प्रांत, यू.पी. (आगरा) एवं पंजाब में लागू की गयी तथा इस व्यवस्था के अंतर्गत 30 प्रतिशत भूमि आयी।

इस व्यवस्था में भू-राजस्व का बंदोबस्त एक पूरे गांव या महाल में जमींदारों या उन प्रधानों के साथ किया गया, जो सामूहिक रूप से पूरे गांव या महाल के प्रमुख होने का दावा करते थे। यद्यपि सैद्धांतिक रूप से भूमि पूरे गांव या महाल की मानी जाती थी किंतु व्यावहारिक रूप में किसान महाल की भूमि को आपस में विभाजित कर लेते थे तथा लगान, महाल के प्रमुख के पास जमा कर देते थे।

तदुपरांत ये महाल-प्रमुख, लगान को सरकार के पास जमा करते थे। मुखिया या महाल प्रमुख को यह अधिकार था कि वह लगान अदा न करने वाले किसान को उसकी भूमि से बेदखल कर सकता था। इस व्यवस्था में लगान का निर्धारण महाल या सम्पूर्ण गांव के उत्पादन के आधार पर किया जाता था।

महालवाड़ी बंदोबस्त का सबसे प्रमुख दोष यह था कि इसने महाल के मुखिया या प्रधान को अत्यधिक शक्तिशाली बना दिया। किसानों को भूमि से बेदखल कर देने के अधिकार से उनकी शक्ति अत्यधिक बढ़ गयी तथा वे यदाकदा मुखियाओं द्वारा इस अधिकार का दुरुपयोग किया जाने लगा।

इस व्यवस्था का दूसरा दोष यह था कि इससे सरकार एवं किसानों के प्रत्यक्ष संबंध बिल्कुल समाप्त हो गये। इस प्रकार अंग्रेजों द्वारा भारत में भू-राजस्व वसूलने की विभिन्न पद्धतियों को अपनाया गया।

इन पद्धतियों को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग समय पर लागू किया गया। किंतु इन सभी प्रयासों के पीछे अंग्रेजों का मूल उद्देश्य अधिक से अधिक भू-राजस्व को हड़प कर अपनी आय में वृद्धि करना था तथा किसानों की भलाई से उनका कोई संबंध नहीं था।

इसके कारण धीरे-धीरे भारतीय कृषक वर्ग कंगाल होने लगा तथा भारतीय कृषि बर्बाद हो गयी।

ब्रिटिश शासन का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

1 अनौद्योगीकरण – भारतीय हस्तशिल्प का ह्रास

अंग्रेजी माल का भारतीय बाजार में आने से भारतीय हस्तशिल्प का भारत में ह्रास हुआ ,जबकि कारखानों के खुलने से यूरोपीय बाजार में भारतीय हस्तशिल्प को नुकसान हुआ | भारत में अनेक शहरों का पतन तथा भारतीय शिल्पियों का गांव की तरफ पलायन का मुख्य कारण अनौद्योगीकरण ही था |

भारतीय दस्तकारों ने अपने परंपरागत व्यवसाय को त्याग दिया व गांव में जाकर खेती करने लगे | भारत एक सम्पूर्ण निर्यातक देश से सम्पूर्ण आयतक देश बन गया |

2 कृषकों की बढ़ती हुई दरिद्रता ( कारण )

  • जमींदारों के द्वारा शोषण |
  • जमीन की उर्वरता बढ़ाने में सरकार द्वारा प्रयाप्त कदम न उठाया जाना|
  • ऋण के लिए सूदखोरो पर निर्भरता |
  • अकाल व अन्य प्राकृतिक आपदा |

3 पुराने जमींदारों की तबाही तथा नई जमींदारी व्यवस्था का उदय —

नए जमींदार अपने हितों को देखते हुए अंग्रेजों के साथ रहे और किसानों से कभी भी उनके सम्बन्ध अच्छे नही रहे |

4 कृषि में स्थिरता एवं उसकी बर्बादी —

  • किसानों में धन, तकनीक व कृषि से सम्बंधित शिक्षा का अभाव था |
  • जिसके कारण भारतीय कृषि का धीरे धीरे पतन होने लगा व उत्पादकता में कमीं आने लगी |

5 भारतीय कृषि का वाणिज्यीकरण

वाणिज्यीकरण और विशेषीकरण को कई कारणों ने प्रोत्साहित किया जैसे मुद्रा अर्थव्यवस्था का प्रसार ,रूढ़ि और परंपरा के स्थान पर संविदा और प्रतियोगिता ,एकीकृत राष्ट्रीय बाजार का अभ्युदय,देशी एवं विदेशी व्यपार में वृद्धि ,रेलवे एवं संचार साधनों से राष्ट्रीय मंडी का विकास एवं अंग्रेजी पूंजी के आगमन से विदेशी व्यापार में वृद्धि |

भारतीय कृषि पर वाणिज्यीकरण का प्रभाव—

  • कुछ विशेष प्रकार के फसलों का उत्पादन राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए होने लगा |
  • भूमि कर अत्यधिक होने के कारण किसान इसे अदा करने में असमर्थ था और मजबूरन उसे वाणिज्यिक फसलों का उत्पादन करना पड़ता था |
  • कृषि मूल्यों पर विदेशी उतार चढ़ाव का भी प्रभाव पड़ने लगा |

6 आधुनिक उद्योगों का विकास

19 वीं शताब्दी में भारत में बड़े पैमाने पर आधुनिक उद्योगों की स्थापना की गई , जिसके फलस्वरूप देश में मशीनी युग प्रारम्भ हुआ | भारत में पहली सफल सूती वस्त्र मिल 1853 में कवासजी नानाभाई ने बम्बई में स्थापित की और पहली जूट मिल 1855 में रिशरा में स्थापित किया गया |आधुनिक उद्योगों का विकास मुख्यतः विदेशियों के द्वारा किया गया |

विदेशियों का भारत में निवेश करने के मुख्य कारण थे —
  • भारत में सस्ते श्रम की उपलब्धता|
  • कच्चे एवं तैयार माल की उपलब्धता|
  • भारत एवम उनके पडोसी देशों में बाजार की उपलब्धता|
  • पूंजी निवेश की अनुकूल दशाएं|
  • नौकरशाहियों के द्वारा उद्योगपतियों को समर्थन देने की दृढ इच्छाशक्ति|
  • कुछ वस्तुओं के आयात के लाभप्रद अवसर|

7 आर्थिक निकास —

भारतीय उत्पाद का वह हिस्सा , जो जनता के उपभोग के लिए उपलब्ध नहीं था तथा राजनितिक कारणों से जिसका प्रवाह इंग्लैंड की ओर हो रहा था ,जिसके बदले में भारत को कुछ भी प्राप्त नहीं होता था ,उसे ही आर्थिक निकास कहा गया 

दादा भाई नौरोजी ने सर्वप्रथम अपनी पुस्तक ‘पावर्टी एंड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया’ में आर्थिक निकास की अवधारणा प्रस्तुत की |

आर्थिक निकास के तत्व —

  • अंग्रेज प्रशासनिक एवं सैनिक अधिकारियों के वेतन |
  • भारत के द्वारा विदेशों से लिए गए ऋण का ब्याज|
  • नागरिक एवं सैन्य विभाग के लिए विदेशों से खरीदी गई वस्तुएं|
  • नौवहन कंपनियों को की गई अदायगी तथा विदेशी बैंकों तथा बीमा कंपनियों को दिया गया धन|
  • गृह व्यय तथा ईस्ट इंडिया कंपनी के भागीदारों का लाभांश|

8 अकाल एवं गरीबी

प्राकृतिक विपदाओं ने भी किसानों को गरीब बनाया | अकाल के दिनों में चारे के आभाव में पशुओं की मृत्यु हो जाती थी |पशुओं व संसाधनों के आभाव में कई बार किसान खेती ही नही कर पाते थे |

औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था की राष्ट्रवादी आलोचना —
  • औपनिवेशिक शोषण के कारण ही भारत दिनोंदिन निर्धन होता जा रहा है|
  • गरीबी की समस्यां और निर्धनता में वृद्धि हो रही थी |
  • ब्रिटिश शासन की व्यपार,वित्त ,आधारभूत विकास तथा व्यय की नीतियां साम्राज्यवादी हितों के अनुरूप है |
  • भारतीय शोषण को रोकने एवं भारत की स्वतंत्र अर्थव्यवस्था को विकसित करने की मांग की गई |

भाग 👉👉👉 1

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