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September 18, 2020

September 18, 2020

Governing Policies ब्रिटिश कंपनी की शासन नीतियां भाग 1

ब्रिटिश कंपनी की शासन नीतियां

ब्रिटिश कंपनी

अंग्रेजों की भू राजस्व नीतियां 

अंग्रेजों के आगमन से पूर्व भारत में जो परम्परागत भूमि व्यवस्था कायम थी उसमें भूमि पर किसानों का अधिकार था तथा फसल का एक भाग सरकार को दे दिया जाता था। 1765 में इलाहाबाद की संधि के द्वारा ईस्ट इंडिया कम्पनी ने बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा की दीवानी प्राप्त कर ली।

यद्यपि 1771 तक ईस्ट इंडिया कम्पनी ने भारत में प्रचलित पुरानी भू-राजस्व व्यवस्था को ही जारी रखा किंतु कम्पनी ने भू-राजस्व की दरों में वृद्धि कर दी।  धीरे-धीरे कम्पनी के खर्चे में वृद्धि होने लगी, जिसकी भरपाई के लिये कम्पनी ने भू-राजस्व की दरों को बढ़ाया। ऐसा करना स्वाभाविक भी था क्योंकि भू-राजस्व ही ऐसा माध्यम था जिससे कम्पनी को अधिकाधिक धन प्राप्त हो सकता था।

ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपने आर्थिक व्यय की पूर्ति करने तथा अधिकाधिक धन कमाने के उद्देश्य से भारत की कृषि व्यवस्था में हस्तक्षेप करना प्रारंभ कर दिया तथा कृषि के परम्परागत ढांचे को समाप्त करने का प्रयास किया। यद्यपि क्लाइव तथा उसके उत्तराधिकारियों के समय तक भू-राजस्व पद्धति में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं किया गया तथा इस समय तक भू-राजस्व की वसूली बिचौलियों (जमीदारों या लगान के ठेकेदारों) के माध्यम से ही की जाती रही, किंतु उसके पश्चात कम्पनी द्वारा नये प्रकार के कृषि संबंधों की शुरुआत की गयी।

इसके परिणामस्वरूप कम्पनी ने करों के निर्धारण और वसूली के लिये कई नये प्रकार के भू-राजस्व बंदोबस्त कायम किये।

मुख्य रूप से अंग्रेजों ने भारत में तीन प्रकार की भू-धृति पद्धतियां अपनायीं।
  • जमींदारी
  • रैयतवाड़ी एवं
  • महालवाड़ी।

यद्यपि प्रारंभ में (1772 में) वारेन हेस्टिग्स ने इजारेदारी प्रथा भी प्रारंभ की थी किंतु यह व्यवस्था ज्यादा दिनों तक नहीं चली तथा ब्रिटिश शासनकाल में यही तीन भू-राजस्व व्यवस्थायें हीं प्रभावी रहीं।

जमींदारी प्रथा मुख्यतया बंगाल में ही लागू की गयी थी। तत्पश्चात लागू की गयी जमींदारी या स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था को बंगाल, बिहार, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश के बनारस तथा कर्नाटक के उत्तरी भागों में लागू किया गया।

रैयतवाड़ी पद्धति मद्रास, बम्बई तथा असम के कुछ भागों में लागू की गयी। जबकि महालवाड़ी पद्धति मध्य प्रांत, यू.पी. एवं पंजाब में लागू की गयी। इन विभिन्न भू-राजस्व व्यवस्थाओं का वर्णन इस प्रकार है।

इजारेदारी प्रथा

1772 में वारेन हेस्टिंग्स ने एक नयी भू-राजस्व पद्धति लागू की, जिसे ‘इजारेदारी प्रथा’ के नाम से जाना गया है। इस पद्धति को अपनाने का मुख्य उद्देश्य अधिक भू-राजस्व वसूल करना था। इस व्यवस्था की मुख्य दो विशेषतायें थीं-

इसमें पंचवर्षीय ठेके की व्यवस्था थी तथा सबसे अधिक बोली लगाने वाले को भूमि ठेके पर दी जाती थी। किंतु इस व्यवस्था से कम्पनी को ज्यादा लाभ नहीं हुआ क्योंकि इस व्यवस्था से उसकी वसूली में अस्थिरता आ गयी।

पंचवर्षीय ठेके के इस दोष के कारण 1777 ई. में इसे परिवर्तित कर दिया गया तथा ठेके की अवधि एक वर्ष कर दी गयी अर्थात अब भू-राजस्व की वसूली का ठेका प्रति वर्ष किया जाने लगा। किंतु प्रति वर्ष ठेके की यह व्यवस्था और असफल रही क्योंकि इससे भू-राजस्व की दर तथा वसूल की राशि की मात्रा प्रति वर्ष परिवर्तित होने लगी। इससे कम्पनी को यह अनिश्चितता होती थी कि अगले वर्ष कितना लगान वसूल होगा।

इस व्यवस्था का एक दोष यह भी था कि प्रति वर्ष नये-नये व्यक्ति ठेका लेकर किसानों से अधिक से अधिक भू-राजस्व वसूल करते थे। चूंकि इसमें इजारेदारों (ठेकेदारों या जमींदारों) का भूमि पर अस्थायी स्वामित्व होता था, इसलिये वे भूमि सुधारों में कोई रुचि नहीं लेते थे। उनका मुख्य उद्देश्य अधिक से अधिक लगान वसूल करना होता था।

इसके लिये वे किसानों का उत्पीड़न भी करते थे। ये इजारेदार वसूली की पूरी रकम भी कम्पनी को नहीं देते थे। इस व्यवस्था के कारण किसानों पर अत्यधिक बोझ पड़ा। तथा वे कंगाल होने लगे। यद्यपि यह व्यवस्था काफी दोषपूर्ण थी फिर भी इससे कम्पनी की आय में वृद्धि हुयी।

स्थायी बंदोबस्त

पृष्ठभूमिः- बंगाल की लगान व्यवस्था 1765 से ही कम्पनी के लिये एक समस्या बनी हुयी थी। क्लाइव ने इस व्यवस्था में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं किया तथा उसके काल में वार्षिक लगान व्यवस्था ही जारी रही। बाद में वारेन हेस्टिंग्स ने लगन व्यवस्था में सुधार के लिए इजारेदारी प्रथा लागु की किन्तु इससे समस्या सुलझने के बजाय और उलझ गयी। इस व्यवस्था के दोषपूर्ण प्रावधानों के कारण कृषक बर्बाद होने लगे तथा कृषि का पराभव होने लगा।

1886 में जब लार्ड कार्नवालिस गवर्नर-जनरल बनकर भारत आया उस समय कम्पनी की राजस्व व्यवस्था अस्त-व्यस्त थी तथा उस पर पर्याप्त वाद-विवाद चल रहा था। अतः उसके सम्मुख सबसे प्रमुख कार्य कम्पनी की लगान व्यवस्था में सुधार करना था।

प्रति वर्ष ठेके की व्यवस्था के कारण राजस्व वसूली में आयी अस्थिरता एवं अन्य दोषों के कारण कम्पनी के डायरेक्टरों ने कार्नवालिस को आदेश दिया कि वह सर्वप्रथम लगान व्यवस्था की दुरुस्त करे तथा वार्षिक ठेके की व्यवस्था से उत्पन्न दोषों को दूर करने के लिये जमींदारों से स्थायी समझौता कर ले।

डायरेक्टरों का यही आदेश अंत में स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था का सबसे मुख्य कारण बना। इसके फलस्वरूप भू-राजस्व या लगान के संबंध में जो व्यवस्था की गयी, उसे ‘जमींदारी व्यवस्था’ या ‘इस्तमरारी व्यवस्था’ या ‘स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था’ के नाम से जाना जाता है।

यद्यपि प्रारंभ में इस व्यवस्था से संबंधित कुछ समस्यायें थीं। जैसे-
  • समझौता किससे किया जाये ? किसान से या जमींदार से।
  • राज्य की पैदावार का कितना भाग लगान के रूप में प्राप्त हो। और यह समझौता कुछ वर्षों के लिये किया जाये या स्थायी रूप से।

प्रारंभ में इन समस्याओं के संबंध में जान शोर, चार्ल्स ग्रांट एवं स्वयं कार्नवालिस में तीव्र मतभेद थे।अतः इन समस्याओं पर पर्याप्त एवं पूर्ण विचार किया गया। अंत में प्रधानमंत्री पिट्, बोर्ड आफ कंट्रोल के सभापति डण्डास, कम्पनी के डायरेक्टर्स, जॉन शोर, चार्ल्स ग्रांट तथा कार्नवालिस की आपसी सहमति से 1790 में जमींदारों के साथ 10 वर्ष के लिये समझौता किया गया, जिसे 22 मार्च 1793 में स्थायी कर दिया गया।

यह व्यवस्था बंगाल, बिहार, उड़ीसा, यू.पी. के बनारस प्रखण्ड तथा उत्तरी कर्नाटक में लागू की गयी। इस व्यवस्था के तहत ब्रिटिश भारत के कुल क्षेत्रफल का लगभग 19 प्रतिशत भाग सम्मिलित था।

विशेषतायें:

इसकी निम्न विशेषतायें थीं-

  • जमीदारों को भूमि का स्थायी मालिक बना दिया गया। भूमि पर उनका अधिकार पैतृक एवं हस्तांतरणीय था। उन्हें उनकी भूमि से तब तक पृथक नहीं किया जा सकता था, जब तक वे अपना निश्चित लगान सरकार को देते रहें।
  • किसानों को मात्र रैयतों का नीचा दर्जा दिया गया तथा उनसे भूमि सम्बन्धी तथा अन्य परम्परागत अधिकारों को छीन लिया गया।
  • जमींदार, भूमि के स्वामी होने के कारण भूमि को खरीद या बेच सकते थे।
  • जमींदार, अपने जीवनकाल में या वसीयत द्वारा अपनी जमींदारी अपने वैध उत्तराधिकारी को दे सकते थे।
  • जमींदारों से लगान सदैव के लिये निश्चित कर दिया गया।
  • सरकार का किसानों से कोई प्रत्यक्ष सम्पर्क नहीं था।
  • जमीदारों को किसानों से वसूल किये गये भू-राजस्व की कुल रकम का 10/11 भाग कम्पनी को देना था तथा 1/11 भाग स्वयं रखना था।
  • तय की गयी रकम से अधिक वसूली करने पर, उसे रखने का अधिकार जमींदारों को दे दिया गया।
  • यदि कोई जमींदार निश्चित तारीख तक, भू-राजस्व की निर्धारित राशि जमा नहीं करता था तो उसकी जमींदारी नीलाम कर दी जाती थी।
  • कम्पनी की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुयी।

उद्देश्यः

कंपनी द्वारा भू-राजस्व की स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था को लागू करने के मुख्य दो उद्देश्य थे–

  • इंग्लैण्ड की तरह, भारत में जमींदारों का एक ऐसा वर्ग तैयार करना, जो अंग्रेजी साम्राज्य के लिये सामाजिक आधार का कार्य कर सके।
  • भारत में कम्पनी के फैलते साम्राज्य के मद्देनजर अंग्रेजों ने महसूस किया कि भारत जैसे विशाल देश पर नियंत्रण बनाये रखने के लिये उनके पास एक ऐसा वर्ग होना चाहिये, जो अंग्रेजी सत्ता को सामाजिक आधार प्रदान कर सके।
  • इसीलिये अंग्रेजों ने जमींदारों का ऐसा वर्ग तैयार किया जो कम्पनी की लूट-खसोट से थोड़ा सा हिस्सा प्राप्त कर संतुष्ट हो जाये तथा कम्पनी को सामाजिक आधार प्रदान करे।
  • कम्पनी की आय में वृद्धि करना। चूंकि भू-राजस्व कम्पनी की आय का अत्यंत प्रमुख साधन था अतः कम्पनी अधिक से राजस्व प्राप्त करना चाहती थी।

स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था के लाभ व हानियां

स्थायी बंदोस्त व्यवस्था के संबंध में इतिह्रासकारों ने अलग-अलग राय प्रकट की है। कुछ इतिह्रासकारों ने इसे साहसी एवं बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य माना है तो कुछ ने इसका तीव्र विरोध किया है-

तुलनात्मक तौर पर इस व्यवस्था से होने वाले लाभ व हानियां इस प्रकार थीं-

लाभ: जमींदारों को-

  • इस व्यवस्था से सबसे अधिक लाभ जमींदारों को ही हुआ। वे स्थायी रूप से भूमि के मालिक बन गये।
  • लगान की एक निश्चित रकम सरकार को देने के पश्चात काफी बड़ी धनराशि जमींदारों को प्राप्त होने लगी।
  • अधिक आय से कालांतर में जमींदार अत्यधिक समृद्ध हो गये तथा वे सुखमय जीवन व्यतीत करने लगे। बहुत से जमींदार तो गांव छोड़कर शहरों में बसे गए।

लाभ: सरकार को

  • जमींदारों के रूप में सरकार को ऐसा वर्ग प्राप्त हो गया, जो हर परिस्थिति में सरकार का साथ देने को तैयार था।
  • जमींदारों के इस वर्ग ने अंग्रेजी सत्ता को सामाजिक आधार प्रदान किया तथा कई अवसरों पर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध किये गये विद्रोहों को कुचलने में सरकार की सहायता की।
  • कालांतर में इन जमींदारों ने अनेक संस्थायें (जैसे-लैंड ओनर एसोसिएशन, लैंड होल्डर्स एसोसिएशन इत्यादि) बनायीं तथा राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष में सरकार के प्रति अपनी अटूट निष्ठा घोषित की।
  • सरकार की आय में अत्यधिक वृद्धि हो गयी।सरकार की आय निश्चित हो गयी, जिससे अपना बजट तैयार करने में उसे आसानी हुयी।
  • सरकार को प्रतिवर्ष राजस्व की दरें तय करने एवं ठेके देने के झंझट से मुक्ति मिल गयी।
  • कम्पनी के कर्मचारियों को लगान व्यवस्था से मुक्ति मिल गयी, जिससे वे कम्पनी के व्यापार की ओर अधिक ध्यान दे सके।
  • उसके प्रशासनिक व्यय में भी कमी आयी तथा प्रशासनिक कुशलता बढ़ी।

अन्य :

  • राजस्व में वृद्धि की संभावनाओं के कारण जमींदारों ने कृषि में स्थायी रूप से रुचि लेनी प्रारंभ कर दी तथा कृषि उत्पादन में वृद्धि के अनेक प्रयास किये। इससे कृषि उत्पादन में वृद्धि हुयी।
  • कृषि में उन्नति होने से व्यापार एवं उद्योग की प्रगति हुयी।
  • जमींदारों से न्याय एवं शांति स्थापित करने की जिम्मेदारी छीन ली गयी, जिससे उनका ध्यान मुख्यतया कृषि के विकास में लगा तथा इससे सूबों की आर्थिक संपन्नता में वृद्धि हुयी।सूबों की आर्थिक संपन्नता से सरकार को लाभ हुआ।

हानियां :

  • इस व्यवस्था से सबसे अधिक हानि किसानों को हुयी। इससे उनके भूमि संबंधी तथा अन्य परम्परागत अधिकार छीन लिये गये तथा वे केवल खेतिहर मजदूर बन कर रह गये।
  • किसानों को जमींदारों के अत्याचारों व शोषण का सामना करना पड़ा तथा वे पूर्णतया जमीदारों की दया पर निर्भर हो गये।
  • वे जमींदार, जो राजस्व वसूली की उगाही में उदार थे, भू-राजस्व की उच्च दरें सरकार को समय पर नहीं अदा कर सके, उन्हें बेरहमी के साथ बेदखल कर दिया गया तथा उनकी जमींदारी नीलाम कर दी गयी।
  • जमीदारों के समृद्ध होने से वे विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत करने लगे। जिससे सामाजिक भ्रष्टाचार में वृद्धि हुयी।
  • स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था ने कालांतर में राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष को भी हानि पहुंचायी। जर्मींदारों का यह वर्ग स्वतंत्रता संघर्ष में अंग्रेज भक्त बना रहा तथा कई अवसरों पर तो उसने राष्ट्रवादियों के विरुद्ध सरकार की मदद भी की।
  • इस व्यवस्था से किसान दिनों-दिन निर्धन होते गये तथा उनमें सरकार तथा जमींदारों के विरुद्ध असंतोष बढ़ने लगा।
  • कालांतर में होने वाले कृषक आंदोलनों में से कुछ के लिये इस असंतोष ने भी योगदान दिया।
  • इस प्रकार इस व्यवस्था ने कुछ कृषक आंदोलनों की पृष्ठभूमि तैयार करने में अप्रत्यक्ष भूमिका निभायी।
  • इस व्यवस्था से सरकार को भी हानि हुयी क्योंकि कृषि उत्पादन में वृद्धि के
  • साथ-साथ उसकी आय में कोई वृद्धि नहीं हुयी तथा उसका सम्पूर्ण लाभ केवल जमींदारों को ही प्राप्त होता रहा।

इस प्रकार स्पष्ट है कि स्थायी बंदोबस्त से सर्वाधिक लाभ जमींदारों को हुआ। यद्यपि सरकार की आय भी बढ़ी किंतु अन्य दृष्टिकोणों से इससे लाभ के स्थान पर हानि अधिक हुयी।  

इसके अतिरिक्त सम्पूर्ण लाभ 15-20 वर्ष या इससे थोड़े अधिक समय के बंदोबस्त द्वारा प्राप्त किये जा सकते थे और इस बंदोबस्त को स्थायी करने की आवश्यकता नहीं थी।

इस प्रकार स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था कुछ समय के लिए भले ही लाभदायक रही हो किन्तु रही हो किंतु इससे कोई दीर्घकालिक लाभ प्राप्त नहीं हुआ।

इसीलिये कुछ स्थानों के अलावा अंग्रेजों ने इस व्यवस्था को भारत के अन्य भागों में लागू नहीं किया। स्वतंत्रता के पश्चात सभी स्थानों से इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया।

भाग 👉👉👉 2

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September 18, 2020

Vijayanagar and Bahmanid बहमनी एवं विजयनगर साम्राज्य

बहमनी_एवं विजयनगर साम्राज्य

बहमनी_साम्राज्य

बहमनी_राज्य की स्थापना दक्षिण भारत में मुहम्मद तुगलक के खिलाफ विद्रोह से हुई ।  1347 ई. में हसन गंगु, अलाउद्दीन बहमनशाह के नाम से गद्दी पर बैठा और दक्षिण में मुस्लिम राज्य की नींव रखी । यह मुस्लिम राज्य भारत में बहमनी राज्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।

बहमनी_राज्य के_शासक

अलाउद्दीन हसन बहमन शाह (1347-1358 ई.)-

मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में  1347 ई. में सरदारों ने हसन गंगु को अबल मुजफ्फर अलाउद्दीन बहमन शाह के नाम से सुल्तान घोषित किया। गुलबर्गा में अपनी राजधानी स्थापित की और उसका नाम अहसनाबाद रखा । इसकी राजभासा मराठी थी।

मुहम्मद शाह प्रथम (1358-1373 ई.) –

वह एक कुशल संगठक था । मुहम्मद शाह प्रथम बहमनी राज्य का महान शासक हुआ । तेलगांना से गोलकुंडा के किले को छीन लिया और 22 लाख रूपये क्षतिपूर्ति की राशि भी वसुल लिया । 1375 ई. में उनका देहान्त हो गया ।

अलाउद्दीन मुहम्मद(मुजाहिदीन) (1373-1378 ई.)

1378 ई. में उसके चाचा दाऊद खां ने उसका वध करवा दिया ।

दाऊद खां (1378 ई)

केवल एक माह तक राज्य किया ।

मुहम्मदशाह द्वितीय (1377 – 1397 ई.) –

वह शान्ति प्रिय व उदार शासक था ।

गयासुद्दीन, शम्सुद्दीन, दाऊद तथा फिरोजशाह-

मुहम्मद शाह की मृत्यु के बाद उसके दो पुत्र गयासुद्दीन तथा शम्सुद्दीन एक एक करके गद्दी पर बैठे । शिहाबुद्दीन अहमद ने अपनी राजधानी गुलबर्गा से हटाकर बीदर में स्थापित की ।इसने बीदर का नया नाम मुहम्मदाबाद रखा ।

महमूद गवाँ ने बीदर एक महाविद्यालय की स्थापना कराई

ताजुद्दीन फिरोज शाह (1397-1422 ई.)-

1397 ई. में ताजुद्दीन फिरोज शाह बहमनी राज्य का सुल्तान था । वह कला प्रेमी तथा साहित्यकार था, जो अनेक भाषाओं का ज्ञाता था । वह विद्वानों का संरक्षक था । इसने विजयनगर से तीन युद्ध किये जिसमे से दो में विजयी रहा। भीमा नदी के तट पर फीरोजाबाद की स्थापना ताज-उद्दीन-फिरोज ने की थी

1417ई0 में रुसी यात्री निकितन बहमनी सम्राज्य की यात्रा पर आया ।इस समय बहमनी राज्य पर ताज-उद्दीन-फिरोज का शासन था

अहमदशाह (1422-1435 ई.)

1422 ई. में फिरोज शाह का भाई अहमद शाह गद्दी पर बैठा। अहमद शाह के समय में गुलबर्गा विद्रोह तथा षड्यन्त्रों का केन्द्र बन गया उसने गुलबर्गा को हटाकर बीदर को अपनी राजधानी बनाया ।

उसने वारंगल पर चढ़ाई कर उसे हस्तगत कर लिया। उसने काकतीय राज्य को भी जीत लिया था । विजयनगर से उसने कर वसूल किया  उसने गुजरात तथा कोंकण के सामन्तों को भी पराजित किया ।

1435 ई. में उसका देहान्त हो गया ।

अलाउद्दीन द्वितीय (1435-1457 ई.)

अहमद शाह के बाद उसका पुत्र अलाउद्दीन द्वितीय सिहासनारूढ़ हुआ ।  उसने कोंकण पर चढ़ाई की, परिणामस्वरूप कोंकण के शासक ने अधीनता स्वीकार कर ली । उसके भाई ने विद्रोह कर रायचूर तथा बीजापुर उससे छीन लिया ।

सुल्तान ने उसे उस विद्रोह के लिए क्षमा कर दिया तथा उसे रायचूर दे दिया । उसके समय में दक्षिणी तथा विदेशी मुसलमानों पर पारस्परिक विरोध आकाश छू रहा था । अलाउद्दीन द्वितीय ने साहस के साथ विजयनगर पर आक्रमण किया तथा उसे कर देने के लिए बाध्य किया ।

हूमायूंशाह(1457-1461 ई.)-

हुमायूं दक्षिण में नीरों के नाम से जाना जाता था । वह विद्वान था, पर निर्दयी तथा क्रूर था । अमीर उसकी क्रूरता से भयभीत रहते थे ।

निजाम शाह (1461-1463 ई.)-

हुमायूं की मृत्यु के समय निजाम शाह आठ वर्ष का था । उसे ही गावान ने गद्दी पर आसीन किया । निजाम की माता उसकी संरक्षिका थी उसने अपने पति द्वारा दण्डित किए गए सारे व्यक्तियों को छोड़ दिया ।

उस पर अवसर देखकर तेलंगाना के शासकों ने चढ़ाई कर दी, पर उसने बुद्धिमानी तथा वीरता से उन्हें खदेड़ दिया । इसी समय उसने गुजरात पर कब्जा कर लिया ।

1463 ई. में निजाम शाह की मृत्यु हो गयी।

मुहम्मद शाह तृतीय (1463-1482 ई.)-

निजाम शाह के निधन के बाद चाचा मुहम्मद शाह तृतीय के नाम से गद्दी पर बैठा । उसने अलना का प्रदेश संगमेश्वरम् राजा से छीन लिया ।विजयनगर तथा उड़ीसा पर भी आक्रमण किया । वहां लूट में हाथियों के साथ अपार धन मिला।

उसके शासनकाल में महमूद गवां के हाथों पूरी शक्ति केन्द्रित थी । महमदू गवां बहमनी राज्य का प्रतिभाशाली प्रधानमन्त्री था । वह पहले मिलानी (ईरान) का रहने वाला था । वह एक व्यापारी के रूप में गुलबर्गा आया था ।

अपनी योग्यता और कुशलता के बल पर वह प्रधानमंत्री के पद तक पहुंच गया । उसने दक्षिण में विदेशी अमीरों के झगड़ों को शान्त किया ।

कलीम उल्लाह बहमनी वंश का अंतिम शासक था

  • बीजापुर राज्य के संस्थापक—युसुफ आदिल शाह(आदिलशाही वंश) ।
  • अहमदनगर—मलिक अहमद(निजामशाही वंश) ।
  • बरार—फतेहउल्लाह इमादशाह (इमादशाही वंश) ।
  • गोलकुण्डा-कुलीकुतुबशाह (कुतुबशाही वंश) ।
  • बीदर—अमीर अली बरीद(बरीदशाही वंश) ।

बहमनी राज्य में कुल 18 शासक हुए, जिन्होंने कुल मिलाकर 175 वर्ष शासन किया ।

बहमनी राज्य के पतन के कारण

1⃣ विलासी शासक- बहमनी_राज्य के शासक प्राय: विलासी थे । वे सुरा सुन्दरी में डूबे रहते थे । विजयनगर के साथ निरन्तर संघर्ष के कारण प्रबन्ध पर विचार करने के लिए उन्हें अवसर नहीं मिला ।

2⃣ दक्षिण भारत तथा विदेशी अमीरों में संघर्ष – इस संघर्ष ने बहमनी राज्य को दुर्बल बना दिया ।

3⃣ धर्मान्धता- सुल्तानों की धर्मान्धता तथा असहिष्णुता के कारण, सामान्य जनता उनसे घृणा करती थी ।

4⃣ महमूद गंवा का वध – महमूद गवां के वध से योग्य तथा ईमानदार कर्मचारी निराश हुए इससे उनकी राजभक्ति में कमी आई । महमूद गवां की हत्या बहमनी राज्य के लिए एक ऐतिहासिक घटना थी, क्योंकि उसकी हत्या के पश्चात् बहमनी राज्य का पतन आरम्भ हो गया ।

5⃣ कमजोर शासक- महमूदशाह कमजोर शासक था । उत्तराधिकारी के सुनिश्चित नियम नहीं थे तथा राजकुमारों के सही प्रशिक्षण की व्यवस्था भी नहीं थी ।

अत: उपर्युक्त कारणों से बहमनी राज्य का पतन हो गया ।

स्थापत्य कला-

  • सुल्तानों ने अपने शासनकाल में अनेक भव्य भवनों का निर्माण करवाया ।
  • गुलबर्गा तथा बीदर के राजमहल, गेसुद राज की कब्र, चार विशाल दरवाजे वाला फिरोज शाह का महल, मुहम्मद आदिल शाह का मकबरा, जामा मस्जिद, बीजापुर की गोल गुम्बद तथा बीजापुर सुल्तानों के मकबरे स्थापत्य कला के उत्कृष्ट नमूने है ।
  • गोल गुम्बद को विश्व के गुम्बदों में श्रेष्ठ माना जाता है ।
  • गोलकुंडा तथा दौलताबाद के किले भी इसी श्रेणी में आते हैं ।
  • इस स्थापत्य कला में हिन्दू, तुर्की, मिस्त्री, र्इरानी तथा अरेबिक कलाओं का सम्मिश्रण है ।

साहित्य संगीत-

बहमनी के सुल्तानों ने साहित्य तथा संगीत को प्रोत्साहित किया। ताजउद्दीन फिरोज शाह स्वयं फारसी, अरबी और तुर्की भाषाओं का विद्वान था उसकी अनेक हिन्दू रानियां भी थी ।

वह प्रत्येक रानी से उसी की भाषा में बोलता था । मुहम्मद शाह तृतीय तथा उसका वजीर महमूद गवां एक विद्वान था । उसने शिक्षा का प्रचार किया । विद्यालय तथा पुस्तकालय खोले । इसके निजी पुस्तकालय में 3000 पुस्तकें थीं ।

उसके दो ग्रंथ अत्यधिक प्रसिद्ध हैं –

  • उरोजात-उन-इंशा
  • दीवाने अश्र

इस काल में प्रादेशिक तथा ऐतिहासिक साहित्य का उन्नयन हुआ ।

क़िले और मस्जिदे:-

बहमनी सुल्तानों ने गाबिलगढ़ और नरनाल में मज़बूत क़िले बनवाये और गुलबर्ग एवं बीदर में कुछ मस्जिदें भी बनवायीं। बहमनी सल्तनत के इतिहास से प्रकट होता है कि हिन्दू आबादी को सामूहिक रूप से किस प्रकार जबरन मुसलमान बनाने का सुल्तानों का प्रयास किस प्रकार विफल हुआ।

बहमनी सल्तनत की अपने पड़ोसी विजयनगर के हिन्दू राज्य से लगातार अनबन चलती रही। विजयनगर राज्य उस समय.तुंगभद्रा नदी.के दक्षिण और कृष्णा नदी के उत्तरी क्षेत्र में फैला हुआ था  और उसकी पश्चिमी सीमा बहमनी राज्य से मिली हुई थी।

विजयनगर राज्य के दो मज़बूत क़िले मुदगल और रायचूर बहमनी सीमा के निकट स्थित थे।  इन क़िलों पर बहमनी सल्तनत और विजयनगर राज्य दोनों दाँत लगाये हुए थे।

इन दोनों राज्यों में धर्म का अन्तर भी था। बहमनी राज्य इस्लामी और विजयनगर राज्य हिन्दू था। बहमनी सल्तनत की स्थापना के बाद ही उन दोनों राज्यों में लड़ाइयाँ शुरू हो गई और वे तब तक चलती रहीं जब तक बहमनी सल्तनत क़ायम रही।

बहमनी सुल्तानों के द्वारा पड़ोसी हिन्दू राज्य को नष्ट करने के सभी प्रयास निष्फल सिद्ध हुए यद्यपि इन युद्धों में अनेक बार बहमनी सुल्तानों की विजय हुई और रायचूर के दोआब पर विजयनगर के राजाओं के मुक़ाबले में बहमनी सुल्तानों का अधिकार अधिक समय तक रहा।

विजयनगर साम्राज्य (14वीं से 16वीं शताब्दी)

विजयनगर

 1310 ई. के लगभग दक्षिण भारत में मुस्लिम आक्रमणकारियों के आक्रमण प्रारम्भ हुए| मुस्लिम आक्रमणकारी देवगिरि के यादवों, वारंगल के काकातियों, मदुरै के पाण्ड्यों व काम्पिली पर लगातार आक्रमण कर रहे थे|

दिल्ली सल्तनत के खिलजी वंश के शासक अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफूर ने वारंगल पर अधिकार किया| उसके बाद उसने होयसल व यादवों के राज्य पर भी अधिकार किया|

विजयनगर साम्राज्य (1336-1646) मध्यकालीन दक्षिण भारत का एक साम्राज्य था। इसके राजाओं ने 310 वर्ष राज किया,  प्रायः इस नगर को मध्ययुग का प्रथम हिन्दू साम्राज्य माना जाता है।

1334 से 1336 के बीच मुहम्मद बिन तुगलक ने आक्रमण किया व एनगोंडी पर अधिकार किया|  इन परिस्थितियों के बीच हरिहर और बुक्का भाइयों ने 1336 में वर्तमान कर्नाटक में तुंगभद्रा नदी के उत्तर में विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की|  इसे “कर्नाटक साम्राज्य” भी कहा जाता हैं| पुर्तगाली इसे बिसनागा राज्य के नाम से जानते थे

 ये दोनों पूर्व में वारंगल के काकातियों के सामन्त थे|  इनकी प्रारम्भिक राजधानी एनगोंडी थी| बाद में इसकी राजधानी विजयनगर (हम्पी) बनी| इस साम्राज्य की स्थापना में हरिहर व बुक्का ने अपने गुरु माध्वाचार्य विद्यारण्य का सहयोग प्राप्त किया|

उन्होंने 1335 ई. के लगभग विजयनगर शहर (Tha City Of Victory) की स्थापना की| यहाँ उन्होंने अपने गुरु के सम्मान में “पम्पापति मंदिर” बनवाया|

हरिहर प्रथम ने 1343 ई. तक शासन किया| इनके पिता के नाम पर राजवंश का नाम “संगम” पड़ा | 14 वीं शताब्दी में उत्पन्न विजय नगर साम्राज्य को मध्ययुग और आधुनिक औपनिवेशिक काल के बीच का संक्रान्ति-काल कहा जाता है।

इस साम्राज्य पर राजा के रूप में तीन राजवंशों ने राज्य किया :

1. संगम वंश,
2. सालुव वंश,
3. तुलव वंश ।

विजयनगर साम्राज्य का राजनीतिक इतिहास:-

1. संगम वंश (1336 से 1485 र्इ. तक)

  • हरिहर प्रथम (1336 से 1353 र्इ. तक): –
  • बुकाराय (1353 से 1379 र्इ. तक):- 
  • हरिहर द्वितीय (1379 से 1404 र्इ. तक):- 
  • बुक्काराय द्वितीय (1404-06 र्इ.)
  • देवराय प्रथम (1404-10 र्इ.)
  • विजय राय (1410-19र्इ.)
  • देवराय द्वितीय (1419-44 र्इ)
  • मल्लिकार्जुन (1444-65 र्इ.)
  • विरूपाक्ष द्वितीय (1465-65 र्इ.)
  • विरूपाक्ष द्वितीय (1465-85 ई.) एवं प्रौढ देवराय (1485) इस वंश के अन्य शासक थे ।

हरिहर प्रथम (1336 से 1356 ई. तक) –

हरिहर प्रथम ने अपने भाई बुक्काराय के सहयोग से विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की ।  उसने धीरे-धीरे साम्राज्य का विस्तार किया । होयसल वंश के राजा बल्लाल की मृत्यु के बाद उसने उसके राज्य को अपने राज्य में मिला लिया।

1356 ई. में हरिहर की मृत्यु हो गई ।

बुक्काराय (1356 से 1377 ई. तक)-

बुक्काराय ने गद्दी पर बैठते ही राजा की उपाधि धारण की । उसका पूरा समय बहमनी साम्राज्य के साथ संघर्ष में बीता । 1377 ई. को उसकी मृत्यु हुई । वह सहिष्णु तथा उदार शासक था ।

हरिहर द्वितीय (1377 से 1404ई . तक)-

बुक्काराय की मृत्यु के उपरान्त उसका पुत्र हरिहर द्वितीय सिंहासनारूढ़ हुआ तथा साथ ही महाराजाधिराज की पदवी धारण की । इसने कर्इ क्षेत्रों को जीतकर साम्राज्य का विस्तार किया ।

1404 ई. में हरिहर द्वितीय कालकवलित हो गया ।

इसके बाद बुक्काराय द्वितीय (1404-06 ई.) देवराय प्रथम (1406-22 ई.),राम चन्द्र (1422) विजय राय प्रथम (1422 ई.) देवराय द्वितीय (1422-46 ई), मल्लिकार्जुन (1446-65 ई.) विरूपाक्ष द्वितीय (1465-85 ई.)एवं प्रौढ देवराय (1485) इस वंश के अन्य शासक थे ।

सालुव वंश (1486 से 1505 ई. तक)

नरसिंह सालुव (1486 – 1490 ई)-

एक सुयोग्य वीर शासक था । इसने राज्य में शांति की स्थापना की तथा सैनिक शक्ति में वृद्धि की । उसके बाद उसका पुत्र इम्मादि नरसिंह गद्दी पर बैठा।  1505 ई. में सेनापति नरसा नायक ने नरसिंह सालुव के पुत्र को हराकर गद्दी हथिया ली ।

तुलुव वंश (1505 से 1570 ई. तक)-

वीरनरसिंह तुलुव (1505 से 1509 ई. तक)-

1505 ई. में सेनापति नरसा नायक तुलुव की मृत्यु हो गई । उसके पुत्र वीरनर सिंह ने सालुव वंश के अन्तिम शासक की हत्या कर स्वयं गद्दी पर अधिकार कर लिया ।

कृष्णादेव राय तुलव (1509 से 1529 ई. तक)-

वह विजयनगर साम्राज्य का सर्वाधिक महान् शासक माना जाता है । यह वीर और कूटनीतिज्ञ था । इसने बुद्धिमानी से आन्तरिक विद्रोहों का दमन किया तथा उड़ीसा और बहमनी के राज्यों को फिर से अपने अधिकार में कर लिया ।

इसके शासनकाल में साम्राज्य विस्तार के साथ ही साथ कला तथा साहित्य की भी उन्नति हुई । वह स्वयं कवि व ग्रंथों का रचयिता था।

अच्युत राव (1529 से 1542)- कृष्णदेव राय का सौतला भाई ।

वेंकंट प्रथम (1542 से 1542 ई.)- छ: माह शासन किया ।

सदाशिव (1542 से 1570 ई.) – वेंकट का भतीजा था । ताली कोटा (1565) का युद्ध हुआ और विजयनगर की हार हुई ।

विजयनगर राज्य के विरोध में एक सघं का निर्माण किया । इसमें बीजापुर , अहमदनगर, बीदर, बरार की सेनाएं शामिल थी ।

इस राज्य की 1565 ई. में भारी पराजय हुई उसके पश्चात क्षीण रूप में यह और 80 वर्ष चला। राजधानी विजय नगर के अवशेष आधुनिक कर्नाटक राज्य में हम्पी शहर के निकट पाये गये हैं और यह एक विश्व विरासत स्थल है

देवराज प्रथम के समय इटली के यात्री निकोलोकोण्टी (1421ई) को विजयनगर आया था । अरब यात्री अब्दुल रज्जाक देवराय द्वितीय के शासनकाल 1443 ई. में आया था, जिसके विवरणों से विजय नगर राज्य के इतिहास के बारे में पता चलता है।

अब्दुल रज्जाक के तत्कालीन राजनीतिक स्थितियों का वर्णन करते हुये लिखा है- ‘‘यदि जो कुछ कहा जाता है वह सत्य है जो वर्तमान राजवंश के राज्य में तीन सौ बन्दरगाह हैं, जिनमें प्रत्येक कालिकट के बराबर है, राज्य तीन मास 8 यात्रा की दूरी तक फैला है, देश की अधिकांश जनता खेती करती है । जमीन उपजाऊ है, प्राय: सैनिको की संख्या 11 लाख होती है ।’’

उनका बहमनी सुल्तानों के साथ लम्बा संघर्ष हुआ । विरूपाक्ष की अयोग्यता का लाभ उठाकर नरसिंह सालुव ने नये राजवंश की स्थापना की 

पुतगालियोंं का आगमन:-

सल्तनत काल में ही यूरोप के साथ व्यापारिक संबंध कायम हो चुका था 1453 र्इ. में कुस्तुन्तुनिया पर तुर्को का अधिकार हो जाने के बाद यूरोपीय व्यापारियों को आर्थिक नुकसान होने लगा ।

पुरातात्त्विक खोज से इस साम्राज्य की शक्ति तथा धन-सम्पदा का पता चलता है। हिंदू संस्कृति के इतिहास में विजयनगर राज्य का महत्वपूर्ण स्थान रहा।

विजयनगर की सेना में मुसलमान सैनिक तथा सेनापति कार्य करते रहे, विजयनगर के शासक गण राज्य के सात अंगों में कोष को ही प्रधान समझते थे।

  • उन्होंने भूमि की पैमाइश कराई और बंजर तथा सिंचाइ वाली भूमि पर पृथक्-पृथक्कर बैठाए।
  • चुंगी, राजकीय भेंट, आर्थिक दंड तथा आयात पर निर्धारित कर उनके अन्य आय के साधन थे।

भारतीय साहित्य के इतिहास में विजयनगर राज्य का उल्लेख अमर है

  • तुंगभद्रा की घाटी में ब्राह्मण, जैन तथा शैव धर्म प्रचारकों ने कन्नड भाषा को अपनाया जिसमें रामायण,महाभारत तथा भागवत की रचना की गई।
  • इसी युग में कुमार व्यास का आविर्भाव हुआ।

विजयनगर का वास्तुशिल्प:-

  • इस साम्राज्य के विरासत के तौर पर हमें संपूर्ण दक्षिण भारत में स्मारक मिलते हैंजिनमें सबसे प्रसिद्ध हम्पी के हैं।
  • दक्षिण भारत में प्रचलित मंदिर निर्माण की अनेक शैलियाँ इस साम्राज्य ने संकलित की और विजयनगरीय स्थापत्य कला प्रदान की

साम्राज्य विस्तार:-

विजयनगर की स्थापना के साथ ही हरिहर तथा बुक्का के सामने कई कठिनाईयां थीं। वारंगल का शासक का पाया नायक तथा उसका मित्र प्रोलय वेम और वीर बल्लाल तृतीय उसके विरोधी थे।

देवगिरि का सूबेदार कुतलुगखाँ भी विजयनगर के स्वतंत्र अस्तित्व को नष्ट करना चाहता थे

सांस्कृतिक विकास

संस्कृति किसी समाज में गहराई तक व्याप्त गुणों के समग्र रूप का नाम है, जो उस समाज के सोचने, विचारने, कार्य करने, खाने-पीने, बोलने,नृत्य,गायन,साहित्य,कला,वास्तु आदि में परिलक्षित होती है।[

संस्कृति का वर्तमान रूप किसी समाज के दीर्घ काल तक अपनायी गयी पद्धतियों का परिणाम होता है। संस्कृति’ शब्द संस्कृत भाषा की धातु‘कृ’ (करना) से बना है।

 इस धातु से तीन शब्द बनते हैं ‘प्रकृति’ (मूल स्थिति), ‘संस्कृति’ (परिष्कृत स्थिति) और ‘विकृति’ (अवनति स्थिति)। जब ‘प्रकृत’ या कच्चा माल परिष्कृत किया जाता है तो यह संस्कृत हो जाता है और जब यह बिगड़ जाता है तो ‘विकृत’ हो जाता है।

अंग्रेजी में संस्कृति के लिये ‘कल्चर’ शब्द प्रयोग किया जाता है जो लैटिन भाषा के ‘कल्ट या कल्टस’ से लिया गया है जिसका अर्थ है जोतना,

संस्कृति का शब्दार्थ है -उत्तम या सुधरी हुई स्थिति

मनुष्य स्वभावतः प्रगतिशील प्राणी है। यह बुद्धि के प्रयोग से अपने चारों ओर की प्राकृतिक परिस्थिति को निरन्तर सुधारता और उन्नत करता रहता है।

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September 18, 2020

Mughal Period-Babur Humayun मुगल साम्राज्य- बाबर हुमायूँ

मुगल साम्राज्य बाबर हुमायूँ

मुगल शब्द ग्रीक शब्द डवदह से बना है जिसका अर्थ है बहादुर, मुगल शासक पादशाह की उपाधि धारण करते थे। पाद का अर्थ है मूल और शाह का अर्थ है स्वामी अर्थात ऐसा शक्तिशाली राजा अथवा स्वामी जिसे अन्य कोई अपदस्थ नही कर सकता। मुगल राज्य का संस्थापक यद्यपि _बाबर माना जाता है परन्तु इसका वास्तविक संस्थापक वस्तुतः अकबर था।

मुग़ल साम्राज्य की शुरुवात 1526 में हुयी, जिसने 18 शताब्दी के शुरुवात तक भारतीय उप महाद्वीप में राज्य किया था।जो 19 वी शताब्दी के मध्य तक लगभग समाप्त हो गया था। मुग़ल साम्राज्य तुर्क-मंगोल पीढी के तैनुर वंशी थे।

मुग़ल साम्राज्य  ( Mughal Empire ) ने 1700 के आसपास अपनी ताकत को बढ़ाते हुए भारतीय महाद्वीपों के लगभग सभी भागो को अपने साम्राज्य के निचे कर लिया था।

बाबर (1526-1530.)

बाबर

बाबर_भारत में मुगल साम्राज्य का संस्थापक था_बाबर का जन्म 14 फरवरी 1483 को मध्य एशिया के छोटे से गांव फरगाना (अफगानिस्तान में) में हुआ। जिसका पूरा नाम ज़हिर उद-दिन मुहम्मद बाबर था_बाबर का पिता उमर शेख मिर्जा फरगना का शासक था तथा उसकी मां का नाम कुतलुग निगार खानम था।

बाबर_पितृ पक्ष की ओर से तैमूर (तुर्क) का पांचवा वंशज था तथा मां की ओर से में चंगेज खां (मंगोल) का 14 वां वंशज था।

अतः बाबर_में तुर्को और मंगोलों दोनों के रक्त का मिश्रण था। परिवार चगताई तुर्क, परन्तु_बाबर अपने को मंगोल ही मानता था उसने अपनी आत्मकथा_बाबर नामा में लिखा है चूंकि वह माँ के ज्यादा करीब था इसीलिए उसे मंगोल के वंश से जोड़ा जाना चाहिए

उसने तुर्की मूल के चगताई वंश का शासन स्थापित किया। जिसका नाम चंगेज खां के द्वितीय पुत्र के नाम पर पड़ा।

बाबर_अपने पिता की मृत्यु के बाद 11 वर्ष की आयु में 1494 ईसवी में फरगना की गद्दी पर बैठा। 1496 ईस्वी में_बाबर ने समरकंद को जीतने का असफल प्रयास किया। समरकंद तैमूर की राजधानी थी।

1497 ईस्वी में बाबर_ने समरकंद को जीता लेकिन शीघ्र ही समरकंद व फरगना दोनों बाबर के हाथ से निकल गए। 1504ई में बाबर ने काबुल पर अधिकार कर लिया। 1507 ईस्वी में पूर्वजों द्वारा प्रयुक्त मिर्जा की उपाधि त्याग कर बादशाह की उपाधि धारण की।

बाबर ने 1511 में समरकंद के साथ बुखारा व खुरासान को जीता। किंतु मई 1512 ईसवी में कुल-ए-मलिक के युद्ध में ओबेदुल्ला खान से पराजित होने पर समरकंद बाबर के हाथों से पुणे निकल गया।

परन्तु अफगानिस्तान में वह अपने साम्राज्य को स्थायी न रख सका अतः उसने भारत पर आक्रमण करने का निश्चय किया। बाबर ने उस्ताद अली कुली नामक एक तुर्क तोपची को तोपखाने का अध्यक्ष बनाया। भारत में मुस्तफा खां नामक तोप विशेषज्ञ की सेवाएं ली।

भारत पर आक्रमण:–

बाबर ने भारत पर कुल पाँच आक्रमण किये इसका पांचवा आक्रमण पानीपत के युद्ध में परिवर्तित हो गया इन आक्रमणों का मूल उद्देश्य धन की प्राप्ति था।

  • प्रथम आक्रमण (1519):- उत्तर पश्चिम में बाजौर और भेरा के दुर्ग पर।
  • द्वितीय आक्रमण (1519)-पेशावर पर
  • तृतीय आक्रमण (1520)-बाजौर और भेरा
  • चतुर्थ आक्रमण (1524)-लाहौर पर

अपने चौथे अभियान के समय इसे पंजाब के सरदार दौलत खाँ लोदी का नियन्त्रण मिला। इसके अतिरिक्त इब्राहिम लोदी के चाचा आलम खाँ और कहा जाता है कि राणा सांगा का भी उसे निमन्त्रण प्राप्त हुआ।

फलस्वरूप वह अपने पांचवे अभियान के दौरान वह दिल्ली तक चढ़ आया इस प्रकार पानीपत का प्रथम युद्ध हुआ।

1. पानीपत का प्रथम युद्ध (21 अप्रैल 1526)

21 अप्रैल 1526 ईस्वी में बाबर तथा इब्राहिम लोदी के मध्य पानीपत का प्रथम युद्ध हुआ था इस युद्ध में विजय प्राप्त करके बाबर ने भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना की थी।

बाबर ने इस युद्ध में तुलगमा युद्ध नीति एवं तोपखाने का प्रयोग किया उसके दो प्रसिद्ध तोपची उस्ताद अली और मुस्तफा थे। बाबर ने अपने विजय का श्रेय अपने दोनों तोपचियों को दिया और अपनी विजय के उपलक्ष में उसने काबूल निवासियों को एक-एक चाँदी के सिक्के उपहार में दिये इसी उदारता के कारण उसे कलन्दर की उपाधि दी गई।

2. खानवा का युद्ध (17 मार्च 1527)

16 मार्च 1527 ईसवी में बाबर तथा राणा सांगा के मध्य खानवा (भरतपुर) का युद्ध हुआ राणा सांगा प्राप्त हुआ।

राणा सांगा की सेना इब्राहिम लोदी से अधिक शक्तिशाली थी। बाबर के सैनिक राणा सांगा की सेना देखकर भयभीत हो गये। सैनिकों के उत्साह को बढ़ाने के लिए उसने शराब पीने और बेंचने पर प्रतिबन्ध लगा दिया।

मुसलमानों से तमगा कर न लेने की घोषणा की तथा जेहाद का नारा दिया। इस युद्ध को बाबर ने (जिहाद) धर्म युद्ध की संज्ञा दी। युद्ध में जीतने के बाद उसने गाजी की उपाधि धारण की। राणा सांगा के सामन्तों ने ही उसे जहर दे दिया। भारत में मुगल प्रभु सत्ता की स्थापना खानवा के युद्ध से ही मानी जाती है।

3. चन्देरी का युद्ध (29 जनवरी 1528):-

 28 जनवरी 1528 को बाबर व मारवाड़ के शासक मेदिनीराय के मध्य चंदेरी का युद्ध हुआ। युद्ध में बाबर विजय हुआ।

4. घाघरा का युद्ध (6 मई 1529):-

6 मई 1529 ईस्वी में महमूद लोदी और नुसरत शाह की संयुक्त सेना में बाबर के बीच घाघरा का युद्ध लड़ा गया बाबर विजय हुआ।

बाबर_आगरा में बीमार पड़ा तथा 27 दिसम्बर 1530 ई0 को आगरा में ही उसकी मृत्यु हो गई। उसके शव को आगरा के आराम बाग में रखा गया जिसे बाद में ले जाकर काबुल में दफना दिया गया। बाबर का मकबरा काबुल में है जिससे उसके पुत्र हुमायूं ने बनवाया था। बाबर ने तुर्की भाषा में अपनी आत्मकथा बाबरनामा लिखी।

बाबर_ने फारसी भाषा में कविताओं का संग्रह लिखा जिससे मुबाईयां कहा जाता है। बाबर को ’मुबइयान’ नामक पद्य शैली का भी जन्मदाता माना जाता है। बाबर बहुत बड़ा दानी था इसलिए उसे कलंदर कहा जाता है। बाबर ने मुसलमानों को तमगा नामक कर से मुक्त किया।

बाबर_का अन्य उपलब्धियां:-

  • बाबर_संस्कृत लैटिन, फारसी, तुर्की, भाषाओं का ज्ञाता था।
  • उसने अपनी आत्मकथा, बाबर नामा चगुताई तुर्क में लिखी, इस पुस्तक का सर्वप्रथम फारसी में अनुवाद अब्दुल रहीम खान खाना ने किया।
  • इसका सर्वप्रथम अंग्रेजी में अनुवाद 1826 ई0 में लीडेन एवं एर्सकिन ने किया।
  • इसका पुनः अंग्रेजी में अनुवाद फारसी भाषा से 1905 मिसेज बेवरीज ने किया।

Mughal Period-Babur Important Question- 

  • मुगल किसके वंश से संबंधित थे – तुर्की के चुगताई वंश
  • बाबर_के वंशजों की राजधानी कहां थी –समरकंद
  • बाबर_ने काबुल पर कब कब्जा किया –1504 ई.
  • बाबर_ने बादशाह की उपाधि कब धारण की –1507 ई.
  • मुगल वंश की नींव किसने रखी –बाबर
  • मुगलवंश की नींव रखने से पहले बाबर कहां का शासक था –फरगना
  • बाबर_का पूरा नाम क्या था -जहीरुद्दीन बाबर
  • बाबर का जन्म कब और कहां हुआ था-24 फरवरी 1483 ई. में फरगना में ।
  • बाबर_भारत पर पहला आक्रमण किसे विरुद्ध किया था –युसुफजाइयों के विरुद्ध (1519 ई.)
  • बाबर_का पहला महत्वपूर्ण आक्रमण कब माना जाता है –1526 ई.

  • बाबर_के पिता का क्या नाम था –उमरशेख मिर्जा
  • कुतलुगनिगार खानम किसकी माता का नाम था –बाबर
  • पानीपथ की पहली लड़ाई किसके बीच हुई थी -इब्राहिम लोदी और बाबर
  • पानीपथ की पहली लड़ाई कब लड़ी गई -1526 ई.
  • इब्राहिम लोदी को हराकर बाबर ने किस वंश की नींव रखी -मुगल
  • खानवा का युद्ध कब और किसके बीच हुआ –1527 ई. में राणा सांगा और बाबर के बीच ।
  • बाबर और मेदिनीराय के बीच हुआ युद्ध किस नाम से जाना जाता है –चंदेरी का युद्ध (1528ई.)
  • घाघरा के युद्ध में बाबर ने किसे पराजित किया था –महमूद लोदी (इब्राहिम लोदी का भाई)
  • बाबर ने किस भाषा में अपनी आत्मकथा लिखी –तुर्की
  • बाबर की आत्मकथा को किस नाम से जाना जाता है –तुजुक-ए-बाबरी (बाबरनामा)
  • किस युद्ध में बाबर ने तोपखाना का इस्तेमाल किया था –पानीपथ का प्रथम युद्ध
  • बाबर ने युद्ध की कौन सी नई नीति अपनाई –तुलुगमा
  • उस्ताद अली और मुस्तफा बाबर के क्या थे –तोपची
  • बाबर की मृत्यु कहां हुई –आगरा ।
  • उदारता के कारण बाबर को किस नाम से जाना जाता है –कलंदर
  • बाबर के अलावा कौन से मुगल शासक के मकबरे भारत से बाहर बने हैं –जहांगीर और बहादुरशाह जफर

हुमायूँ (1530-56)

हुमायूँ

  • माँ का नाम:- माहिम बेगम
  • जन्म:- काबुल में
  • बाबर के चार पुत्र थे हुमायूँ, कामरान, अस्करी एवं हिन्दाल।

हुमायूँ ने कामरान को काबुल, कान्धार एवं पंजाब की सुबेदारी की। अस्करी को सम्हल की एवं हिन्दाल को अलवर की सुबेदारी प्रदान की।

हुमायूँ की विजयें

1. कालिंजर अभियान:- 1531 यहाँ के शासक प्रताप रुद्र देव ने हुमायूँ से सन्धि कर ली।

2. दोराहा का युद्ध (1532):- लखनऊ के पास सई नदी के किनारे हुआ और महमूद लोदी के बीच, महमूद लोदी पराजित हुआ।

3. चुनार का युद्ध (1532):- चुनार शेरखाँ के कब्जे में था। हुमायूँ ने शेरखाँ को पराजित किया अन्ततः दोनों के बीच एक समझौता हो गया।
शेर खाँ ने अपने पुत्र कुतुब खाँ को हुमायूँ के पास रखना स्वीकार कर लिया परन्तु शेरखाँ की शक्ति को न कुचलना हुमायूँ की बहुत बड़ी भूल थी।

अपनी इस विजय की खुशी में हुमायूँ ने 1533 ई0 में दिल्ली में दीन पनाह नामक नगर बसाया और अपनी राजधानी वहीं स्थानान्तरित कर ली।

4. गुजरात से युद्ध (1535-1536):- इस समय गुजरात का शासक बहादुर शाह था। उसने मालवा को अपने अधिकार में कर लिया तथा 1534 ई0 में चित्तौड़ के शासक विक्रमादित्य पर अभियान किया।

एक क्विंदन्ती के अनुसार विक्रमादित्य की माता कर्णवती ने हुमायूँ के पास अपने राज्य की सुरक्षा के लिए राखी भेजा। बहादुर शाह के पास टर्की का एक कुशल तोपची रुमी खाँ की सेवाएं थी।

बहादुर शाह और हुमायूँ के बीच के युद्ध में बहादुर शाह पराजित हुआ और भागकर माण्डू चला गया। बाद में बहादुर शाह की मृत्यु समुद्र में डूबने से हो गई।

5. शेरखाँ से युद्ध

  • 1. चौसा का युद्ध (26 जून 1539):- गंगा नदी के तट पर चौसा नामक स्थान पर हुमायूँ और शेरशाह के बीच युद्ध हुआ। निजाम नामक भिश्ती की सहायता से किसी तरह हुमायूँ की जान बच पाई शेरखाँ ने अपनी इस विजय के उपलक्ष्य में शेर शाह की उपाधि धारण की।
  • 2. बिलग्राम का युद्ध, अथवा कन्नौज या गंगा का युद्ध (17 मई 1540):- युद्ध में हुमायूँ शेरशाह से अन्तिम रूप से पराजित हो गया।शेरशाह ने आगरा एवं दिल्ली पर कब्जा कर लिया। हुमायूँ भागकर सिन्ध पहुँचा जहाँ वह 15 वर्षों तक रहा। यहीं पर उसने हमीदा बेगम से निकाह किया जिससे अकबर उत्पन्न हुआ। सिन्ध से हुमायूँ काबुल चला गया और उसे अपनी अस्थायी राजधानी बनाया।

हुमायूँ द्वारा पुनः गद्दी की प्राप्ति:- हुमायूँ ने 1555 ई0 में लाहौर पर कब्जा कर लिया उसके बाद अफगानों से उसका मच्छीवारा का प्रसिद्ध युद्ध हुआ।

मच्छीवारा का युद्ध (15 मई 1555 ई0):- यह स्थान सतलज नदी के किनारे स्थित था, हुमायूँ एवं अफगान सरदार नसीब खाँ के बीच युद्ध हुआ। सम्पूर्ण पंजाब मुगलों के अधीन आ गया।

सरहिन्द का युद्ध (22 जून 1555):- अफगान सेनापति सुल्तान सिकन्दर सूर एवं मुगल सेनापति बैरम खाँ के बीच युद्ध। मुगलों को विजय प्राप्ति हुई। इस प्रकार 23 जुलाई 1555 ई0 को हुमायूँ दिल्ली की गद्दी पर पुनः आसीन हुआ।

जनवरी 1556 ई0 में दीनपनाह भवन में अपने पुस्तकालय की सीढियों से गिरने के कारण उसकी मृत्यु हो गई।

लेनपूल ने लिखा है ’’वैसे हुमायूँ का अर्थ है भाग्यवान परन्तु वह जिन्दगी भर लड़खड़ाता रहा और लड़खड़ाते ही उसकी मृत्यु हो गई’’

हुमायूँ की असफलता के कारण:-

हुमायूँ की असफलता का मूल कारण उसकी चारित्रिक दुर्बलता थी हलांकि प्रसिद्ध इतिहासकार डाॅ0 सतीस चन्द्र अफगानों की शक्ति का सही आकलन न कर पाना उसके पतन का प्रमुख कारण मानते है।

अन्य उपलब्धियां

  • हुमायूँ_ज्योतिष में बहुत विश्वास करता था इसीलिए उसने सप्ताह के सातों दिन सात रंग के कपड़े पहनने के नियम बनाये-जैसे-शनिवार को काला, रविवार को पीला एवं सोमवार को सफेद।
  • हुमायूँ_समकालीन सूफीसन्त शेख मुहम्मद गौस ( सत्तारी सिलसिला का शिष्य था ) यह उनके बड़े भाई शेख बहलोल का भी शिष्य था।
  • हुमायूँ को ही भारत में चित्रकला की शुरुआत करने का श्रेय दिया जाता है। इसने अपनी अस्थायी राजधानी काबुल में फारस के दो चित्रकारों मीर सैय्यद अली एवं ख्वाजा अब्दुल समद को आमन्त्रित किया बाद में इन्हें अपने साथ भारत ले आया।
  • फारसी में इसका काब्य संग्रह दीवान नाम से जाना जाता है।

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