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September 17, 2020

September 17, 2020

Mughal Empire-Akbar मुगल काल-अकबर

मुगल काल-अकबर

अकबर

अकबर मुगल वास्तुकला का वास्तविक जन्मदाता था। इसके निर्माण में अधिकतर लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग हुआ है।

  • जन्मः- 15 अक्टूबर 1542 को अमरकोट के राणा वीरसाल के महल में ।
  • माँ का नाम:– हमीदा बानो बेगम (सिन्ध के पास)
  • 1551 में 9 वर्ष की अवस्था में गजनी की सूबेदारी मिली।
  • राज्याभिषेक:- कलानौर (पंजाब) 14 फरवरी 1556 को
  • संरक्षक:- बैरम खाँ

बैरम खाँ:- यह सिया मतावलम्बी था तथा अकबर के समय वकील के पद पर था। अकबर का संरक्षक भी यह था।

हेमू:- यह सूर शासक आदिल शाह का प्रधानमंत्री था जो वैश्य जाति का था। 24 युद्धों में से 22 को जीतने का इसे श्रेय प्राप्त था। इसी कारण इसे आदिलशाह ने विक्रमादित्य की उपाधि प्रदान की थी। यह मध्य युगीन भारत का पहला और अन्तिम हिन्दू महान शासक हुआ जो दिल्ली की गद्दी पर आरुढ़ हुआ।

पानीपत का द्वितीय युद्ध (5 नवम्बर 1556):-

हेमू के नेतृत्व में अफगान सेना एवं बैरम खाँ के नेतृत्व में मुगल सेना के बीच

बैरम खाँ का प्रभुत्व (1556-60)

पानीपत के द्वितीय युद्ध में बैरम खाँ की विजय के बाद शासन पर उसका अप्रत्यक्ष नियंत्रण हो गया। अपने चार वर्षों के नियंत्रण के बाद उसका पतन हुआ। इस पतन में मुख्य योगदान ’’अतका खेल’’ का था।

अतका खेल:- 

यह एक ऐसे वर्ग का सामूहिक नाम था जिसमें अकबर की धाय मां माहम अनगा, जीजी अनगा, आदम खाँ, राज माता हमीदा बानों बेगम, शमशुद्दीन खाँ, साहाबुद्दीन, मुल्ला मीर मुहम्मद आदि लोग सम्मिलित थे।

इन लोगों ने अकबर को बैरम खाँ के विरूद्ध उकसाना प्रारम्भ किया अकबर भी वैरम खाँ से असंन्तुष्ट था उसने बैरम खाँ के समक्ष तीन प्रस्ताव रखे।

  • राज दरबार में सम्राट के गुप्त मामलों का सलाहकार।
  • काल्पी एवं चन्देरी की सूबेदारी।
  • मक्का की तीर्थ यात्रा।

बैरम खाँ ने तीर्थ यात्रा पर जाने का निश्चय किया जाते समय पाटन नामक स्थान पर मुबारक खाँ नामक एक अफगान युवक ने उसकी हत्या कर दी। अकबर ने बैरम खाँ की विधवा सलीमा बेगम से निकाह कर लिया और उसके चार वर्षीय पुत्र अब्दुल रहीम को संरक्षण प्रदान किया।

1584 में अकबर ने उसे खान खाना की उपाधि प्रदान की। बैरम खाँ के पतन के बाद राज परिवार के सदस्यों का ही शासन पर अप्रत्यक्ष नियन्त्रण हो गया इसीलिए इसे पर्दा शासन कहा जाता है।

पर्दा शासन (1560-62):- इस शासन में अकबर की धाय माँ माहम अनगा उसका पुत्र आधम खाँ, जीजी अनगा, शिहाबुद्दीन अहमद आदि लोगों का प्रभुत्व था।  जब आधम खाँ ने अकबर के प्रधानमंत्री सम्सुद्दीन आतग खाँ की हत्या कर दी तब अकबर ने आधम खाँ को अपने महल से नीचे फेंक दिया और इस तरह पर्दा शासन का अन्त हो गया।

अकबर की विजयें

1. मुगलों की कान्धार विजय

  •  बाबर:- 1522 ई0 में कान्धार विजय की।
  • हुमायुँ:-1545 ई0 में कान्धार विजय की।
  • अकबर:-1595 ई0 में कान्धार विजय की।
  • जहाँगीर:-1621 ई0 में कान्धार हाथ से निकल गया (पहली बार)
  • शाहजहाँ:- 1638 ई0 में पुनः मुगलों के अधीन। 1649 में अन्तिम रूप से निकल गया।

2. मुगलों की दक्षिण विजय

अकबर:- अकबर ने खानदेश, बरार और अहमद नगर के एक भाग को विजित किया। दक्षिण विजय के बाद ही उसने ’’दक्षिण के सम्राट’’ की उपाधि धारण की। अकबर ने सम्पूर्ण उत्तर भारत की भी विजय की केवल मेवाड़ को वह न जीत सका।

अकबर की दक्षिण भारत की विजय दो उद्देश्यों से प्रेरित थी-

  • अखिल भारतीय साम्राज्य की स्थापना।
  • पूर्तगीजों की शक्ति पर नियंन्त्रण।

इसमें अहमद नगर ने 1574 ई0 में बरार को अपने अधीन कर लिया था। अकबर ने दक्षिणी राज्यों को अपनी सत्ता स्वीकार करने के लिए कहा।सर्वप्रथम खान-देश के शासक मीरन बहादुर ने बिना युद्ध किये हुए अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली। अहमद नगर यहाँ की शासिका चाँद बीबी थी। जो बीजापुर के शासक आदिल शाह प्रथम की विधवा थी।

अकबर ने अब्दुल रहीम खानखाना एवं मुराद को अहमद नगर पर विजय के लिए भेजा। 1595 ई0 में दोनों के बीच युद्ध हुआ परन्तु चाँद बीबी की पराजय हुई। अतः चाँदबीबी ने 1596 ई0 में एक सन्धि कर ली। इस सन्धि के अन्तर्गत बरार मुगलों को सौंप दिया गया।

बीजापुर और गोल कुण्डा को यह सन्धि पसन्द नहीं आई। अहमद नगर में भी मलिक अम्बर के नेतृत्व में एक वर्ग इस सन्धि का विरोध कर रहा था। फलस्वरूप अहमद नगर गोलकुण्डा और बीजापुर की सेना ने मिलकर बरार पर आक्रमण कर दिया।

अबुल फजल और मुराद की सेना से इनका युद्ध हुआ। चाँद बीबी ने पुनः सन्धि की बात-चीत प्रारम्भ की उस पर दगाबाजी का आरोप लगाकर मार डाला गया। अहमद नगर के एक भाग पर मुगलों का आधिपत्य हो गया लेकिन इसका एक बड़ा भाग मलिक अम्बर के अधीन बना रहा।इस तरह अहमद नगर की पूर्ण विजय न की जा सकी।

जहाँगीर:- जहाँगीर के काल की सबसे प्रमुख घटना 1615 ई0 में मेवाड़ की विजय थी। परन्तु उसकी के समय में 1621 ई0 में कान्धार मुगल राज्य से बाहर चला गया।

शाहजहाँ:- शाहजहाँ ने 1633 ई0 में अहमद नगर की विजय की। 1638 में उसने पुनः कान्धार की भी विजय की परन्तु कान्धार अन्तिम रूप से 1649 ई0 में उसी के शासन काल में बाहर निकल गया।

औरंगजेब:-1686 ई0 में बीजापुर और 1687 ई0 में गोल कुण्डा की विजय की।

3. अकबर की उत्तर भारत की विजयें

1. मालवा:-

  • शासक:- बाजबहादुर
  • मुगल सेनापति:- आधम खाँ और पीर मोहम्मद
  • यह अकबर की पहली विजय थी।

2. गोड़वाना विजय –

  • शासक:-रानी दुर्गावती ( महोबा की चन्देल राज कुमार )
  • मुगल सेनापति:– आसफ खाँ
  • गोड़वाना राज्य की शासिका महोबा की चन्देल राजकुमारी रानी दुर्गावती थी। यह अपने अल्प वयस्क पुत्र वीर नारायण की संरक्षिका थी अकबर ने गोड़वाना विजय करने के बाद चन्द्रशाह को यह राज्य वापस कर दिया। गोडवाना की राजधानी चैरागढ़ थी।

3. राजस्थान विजय:-

आमेर (1562):-

  • शासक:-भारमल
  • आमेर ने स्वेच्छा से अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली यह पहला राजपूताना राज्य था जिसने अकबर के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किया। भारमल ने अपनी पुत्री जोधाबाई का विवाह अकबर के साथ कर दिया। जिससे जहाँगीर उत्पन्न हुआ।
  • अकबर ने भारमल के दत्तक पुत्र भगवान दास एवं पौत्र मानसिंह को उच्च मनसब प्रदान किये।

मेड़ता विजय (1562):-

  • शासक:-जयमल
  • मुगल नेतृत्व: सरफुद्दीन

रणथम्भौर विजय (1569)

मेवाड़ (1568)

  • शासक:-उदय सिंह
  • मुगल नेतृत्व-अकबर
  • मेवाड़ पर आक्रमण का नेतृत्व स्वयं अकबर ने किया। उदयसिंह ने किले की सुरक्षा का भार अपने दो सेनापतियों जयमल एवं फत्ता (फतेह सिंह) को सौंपकर समीप की पहाडियों में चला गया।
  • अकबर ने मेवाड़ आक्रमण के दौरान 30,000 राजपूतों का कत्ल करवा दिया। इस कलंक को मिटाने के लिए उसने आगरा के किले के दरवाजे पर जयमल एवं फत्ता की वीरता की स्मृति में उनकी प्रस्तर मूर्तियां स्थापित करवाई।
  • उदयसिंह के बाद महाराणा प्रताप ने अकबर का विरोध जारी रखा। अकबर ने अपने दो सेनापतियों मानसिंह एवं आसफ खाँ को भेजा। फलस्वरूप हल्दी घाटी का प्रसिद्ध युद्ध हुआ।
  • शासक:-सुरजन राय
  • मुगल नेतृत्व -अकबर एवं भगवान दास

कालिंजर विजय (1569)

  • शासक:– रामचन्द्र
  • मुगल नेतृत्व:- मजनू खाँ काकशाह

मारवाड़, बीकानेर और जैसलमेर (1570):–

  • इन तीनों राज्यों के शासकों ने स्वेच्छा से अकबर की स्वाधीनता स्वीकार कर ली। मारवाड़ के शासक पहले चन्द्र सेन एवं फिर मोटाराजा उदयसिंह, बीकानेर के कल्याण मल और जैसलमेर के शासक रावल हरराय थे।
  • नोट:- आमेर, बीकानेर, मारवाड और जैसलमेर की रियासतों ने अकबर के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये।

हल्दी घाटी का युद्ध (18 जून 1576):-

  • महाराणा प्रताप एवं मानसिंह एवं आसफ खाँ की मिली जुली सेना के बीच। यह युद्ध अरावली घाटी के पास एक घाटी में लड़ा गया चूँकि यहाँ की भूमि पीली थी इसी कारण इसे हल्दी घाटी के नाम से जाना जाता है।
  • यद्यपि यह युद्ध राणा प्रताप के पक्ष में नहीं रहा परन्तु मानसिंह इसे पूरी तरह नही जीत सका। राणा प्रताप चावंड नामक स्थान पर चले गये और उसे अपनी राजधानी बनाया। वहीं पर धनुष प्रत्यंचा चढ़ाते समय चोट लगने के कारण 1597 ई0 में उनकी मृत्यु हो गई उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र अमर सिंह ने युद्ध जारी रखा। इस तरह अकबर मेवाड़ की पूर्ण विजय न कर सका।

गुजरात विजय (1572-84)

  • शासकः-मुजफ्फर खाँ तृतीय
  • प्रारम्भ में अकबर ने स्वयं गुजरात विजय का नेतृत्व किया। गुजरात पर अधिकार करने के बाद अकबर ने मिर्जा अजीज कोका को गुजरात का गर्वनर नियुक्त कर स्वयं वापस आ गया।
  • इसी बीच उसे सूचना मिली कि गुजरात के मुहम्मद हुसैन मिर्जा ने विद्रोह कर दिया है। अकबर ने बहुत तीव्र गति से आकर 1573 ई0 में इस विद्रोह को कुचल दिया। अकबर के इस तीव्र अभियान के बारे में स्मिथ ने लिखा है-कि यह ’’संसार के इतिहास का सर्वाधिक द्रुत गामी आक्रमण था’’
  • गुजरात में ही अकबर सर्वप्रथम पुर्तगालियों से मिला और कैम्बे में समुद्र को देखा।
  • अकबर के वापस लौटने पर वहाँ पुनः विद्रोह हो गया इस विद्रोह को कुचलने का कार्य 1584 ई0 में अब्दुल रहीम ने किया। इसी समय अकबर ने उसे खान-खाना की उपाधि प्रदान की।

बिहार एवं बंगाल विजय (1574-76)

  • शासक:– दाऊद
  • मुगल नेतृत्व- मुनीम खाँ

काबुल विजय (1581)

  • शासकः- मिर्जा हकीम (अकबर का सौतेला भाई)
  • मुगल नेतृत्व- अकबर एवं मान सिंह
  • काबुल विजय के बाद अकबर ने मिर्जा की बहन वख्तुननिशा बेगम को वहाँ का गर्वनर बनाया परन्तु बाद में काबुल को, मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया। तब राजा मान सिंह को वहाँ का गर्वनर बनाया गया।

कश्मीर विजय (1585-86)

  • शासक:- यूसुफ खाँ
  • मुगल नेतृत्व-भगवानदास एवं कासिम खाँ।

सिन्ध विजय (1591)

  • शासक:- जानीबेग
  • मुगल नेतृत्व -अब्दुल रहीम खान खाना

उड़ीसा विजय (1590-92)

  • शासक:– निसार खाँ
  • मुगल नेतृत्व – मानसिंह

ब्लूचिस्तान विजय (1595)

  • शासकः- पन्नी अफगान
  • मुगल नेतृत्व- मीर मासूम

कान्धार विजय (1595):-

  • कान्धार के शासक मुजफ्फर हुसैन मिर्जा ने स्वेच्छा से मुगल सरदार साहबेग को कान्धार सौंपकर स्वयं अकबर का मनसबदार बन गया।
  • इस प्रकार मेवाड़ को छोड़कर सम्पूर्ण उत्तर भारत अकबर के अधीन आ गया।

असीरगढ़ की विजय (1601)

  • शासक:- मीरन बहादुर
  • असीरगढ़ की विजय अकबर की अन्तिम विजय थी।
  • अकबर ने अपने दक्षिण राज्यों खानदेश-बरार और अहमद नगर की सूबेदारी अपने पुत्र दानियाल को प्रदान की तथा स्वयं दक्षिण के सम्राट की उपाधि धारण की।

प्रमुख विद्रोह

उजबेगों का विद्रोह:–

  • उजबेग अफगानिस्तान से सम्बन्धित थे। 1564 ई0 में मालवा के अब्दुल्ला खाँ ने विद्रोह किया परन्तु इसे कुचल दिया गया।
  • 1565 ई0 में जौनपुर के खान जमान एवं उसके भाई बहादुर खाँ ने विद्रोह किया इसे भी कुचल दिया गया।

मिर्जा वर्ग का विद्रोह:-

  • मिर्जा लोग अकबर के रिश्तेदार थे। इब्राहिम मिर्जा, मुहम्मद हुसेन मिर्जा आदि ने विद्रोह किया।
  • इसे 1573 ई0 तक समाप्त कर दिया गया।

बंगाल एवं बिहार में विद्राह:-

  • 1580 ई0 में बंगाल में बाबा खाँ काकराल ने विद्रोह किया जबकि बिहार में मुहम्मद मासूम काबुली ने विद्रोह किया।
  • 1581 तक इन विद्रोहों को समाप्त कर दिया गया।

अफगान ब्लूचियों का विद्रोह (1585):–

  • इसी विद्रोह में बीरबल की मृत्यु हो गई। तब इस विद्राहे को कुचलने का कार्य टोडरमल एवं मानसिंह ने किया।

सलीम का विद्रोह (1602):-

  • अकबर के पुत्र सलीम ने विद्रोह कर दिया उसने वीर सिंह बुन्देल खाँ द्वारा 1602 ई0 में अबुल फजल की हत्या करवा दी।

1605 में अकबर की मृत्यु पेचिश से हो गई। सिकन्दरिया में अकबर को दफना दिया गया।

अकबर के पुत्र

  • 1. हसन
  • 2. हुसैन ( बचपन में मर गये )
  • 3. सलीम
  • 4. मुराद
  • 5. दानियाल ( मदिरापान के कारण मर गया )

इसके काल के प्रमुख निर्माण निम्नलिखित है-

1. हुमायूँ का मकबरा: (ताजमहल का पूर्वगामी):- अकबर के काल की सर्वप्रथम इमारत हुमायूँ का मकबरा है। इसका निर्माण हुमायूँ की पत्नी हाजी बेगम द्वारा करवाया गया। यह दीन-पनाह के ठीक बाहर स्थित है। इसका वास्तुकार फारस का मीरन मिर्जा गियास था।

इसमें मुख्य कक्ष के अतिरिक्त चार अन्य कक्ष भी हैं। जिसमें बाद में कई शहजदों एवं शहजादियों को दफनाया गया था ,जैसे-दाराशिकोह, रफी उद्दरजात, रफी उद्दौला, बहादुर शाह जफर के दो पत्र आदि। हुमायूँ के मकबरे में एक दोहरा गुम्बद है। इसे ताजमहल का पूर्वगामी कहा जाता है क्योंकि यह पूर्णतः संगमरमर से निर्मित है।

अकबर कालीन इमारतों को दो भागों में बांटा जा सकता है।

1. लाल किले की इमारतें:- आगरे का लाल किला अकबर द्वारा बनवाया गया पहला किला था इसकी समानता मान सिंह द्वारा बनवाये गये ग्वालियर के किले से है। इसके अन्तर्गत प्रमुख इमारत जहाँगीरी महल है। यह स्थापत्य से प्रभावित है। इसके अन्दर की दूसरी इमारत अकबरी महल है।

2. फतेहपुर सीकरी:- अपनी गुजरात विजय के बाद अकबर ने फतेहपुर सीकरी का निर्माण प्रारम्भ किया इसके निर्माण का श्रेय बहाउद्दीन को जाता है। फतेहपुर सीकरी की अधिकांश इमारते लाल बलुआ पत्थर से बनी हैं परन्तु कुछ इमारतों में संगमरमर का भी प्रयोग हुआ है। आइने अकबरी में अबुल-फजल ने लिखा है कि ’’सम्राट अपनी कल्पना में जिस वास्तु-कला की संकल्पना करता है उसको वह इमारत निर्माण में असली रूप प्रदान करता है’’।

फतेहपुर सीकरी की प्रमुख इमारतें निम्नलिखित हैं-

• जोधाबाई_का_महल:-

यह फतेहपुर_सीकरी की सबसे बड़ी इमारत है जो हिन्दू स्थापत्य से प्रभावित है।
• पंचमहल या हवा महल:–

यह बौद्ध विहारों से प्रभावित है।
• मरियम महल:- इसमें भित्ति चित्र प्राप्त हुए हैं।
• जामा मस्जिद:– यह फतेहपुर सीकरी की सबसे सुन्दर इमारत है। इसमें संगमरमर का भी प्रयोग हुआ है। प्रसिद्ध कलाविद फंग्र्यूसन ने इसे पत्थर में रुमानी कथा कहा है। अकबर ने दीन-ए-इलाही की घोषणा यहीं से की थी।

बुलन्द दरवाजा:-

 जामा मस्जिद के दक्षिण में बुलन्द दरवाजा स्थित है। इसका निर्माण गुजरात विजय के उपलक्ष्य में किया गया इसकी ऊंचाई दक्षिण विजय के बाद बढ़ा दी गई। इस प्रकार यह गुजरात एवं दक्षिण विजय का प्रतीक है। इसे फतेहपुर सीकरी का गौरव कहा जाता है। जमीन तल से यह 176 फीट ऊंचा है। अकबर के काल मे बुलंद दरबाजा का निर्माण पीले बलुआ पत्थर से हुआ था। 

शेख सलीम चिश्ती का मकबरा:- जामा मस्जिद के प्रांगड़ में स्थित है जहाँगीर ने इसे बाद में पूर्णतः संगमरमर से निर्मित कर दिया।

इस्लाम शाह की कब्र

दीवाने खास:- यही अकबर का इबादत खाना है। जहाँ प्रत्येक गुरुवार को चर्चा होती थी।

अकबर द्वारा निर्मित किले

1. आगरा का किला
2. लाहौर का किला
3. इलाहाबाद का किला:- सर्वाधिक बड़ा
4. अजमेर का किला
5. अटक का किला

अकबर का मकबरा- अकबर का मकबरा सिकंदराबाद मे है जिसका नाम अकबर ने बहिस्ताबाद रखा था। इसकी प्रमुख विशेषता गुम्बद का अभाव है। यह बौद्ध विहारों से प्रभावित है। इस मकबरे का निर्माण कार्य अकबर के समय में ही प्रारम्भ हुआ परन्तु यह पूर्ण जहाँगीर के समय में हुआ।

अकबर के समय के महत्व पूर्ण अधिकारी वकील के कार्यो को चार विभागों में बाटा गया➡

  1. दिवान
  2. मीरवख्शी
  3. मीरसमा
  4. सदर ए सुदूर।

अकबर की भू-राजस्व नीति:-

मुग़ल शासकों में अकबर ने ही सर्वप्रथम भूमि या भूमि कर व्यवस्था को संगठित करने का प्रयास किया। उसने शेरशाह सूरी की राजस्व व्यवस्था को प्रारम्भ में अपनाया। शेरशाह द्वारा भू-राजस्व हेतु अपनायी जाने वाली पद्धति ‘राई’ का प्रयोग अकबर ने भी राजस्व दरों के प्रयोग के लिए किया। अकबर ने शेरशाह की तरह भूमि की नाप-जोख करवाकर, भूमि को उत्पादकता के आधार पर एक-तिहाई भाग लगान के रूप में निश्चित किया था।

बैरम ख़ाँ के प्रभाव से मुक्त होने पर अकबर ने भू-राजस्व व्यवस्था के पुनः निर्धारण हेतु 1570-1571 ई. में मुज़फ्फर ख़ाँ तुरबाती एवं राजा टोडरमल को अर्थमंत्री के पद पर नियुक्त किया। उसने वास्तविक आंकड़ों के आधार पर भू-राजस्व का ‘जमा-हाल हासिल’ नामक नवीन लेखा तैयार करवाया।

गुजरात को जीतने के बाद 1573 ई. में अकबर ने पूरे उत्तर भारत में ‘करोड़ी’ नाम के अधिकारी की नियुक्ति की। उसे अपने क्षेत्र से एक करोड़ दाम वसूल करना होता था। ‘करोड़ी’ की सहायता के लिए ‘आमिल’ नियुक्त किये गए। ये क़ानूनगों द्वारा बताये गये आंकड़े की भी जाँच करते थे। वास्तविक उत्पादन, स्थानीय क़ीमतें, उत्पादकता आदि पर उनकी सूचना के आधार पर अकबर ने 1580 ई. में ‘दहसाला’ नाम की नवीन प्रणाली को प्रारम्भ किया।

टोडरमल का बन्दोबस्त

अकबर के शासनकाल के 1571 ई. से 1580 ई. (10 वर्षों) के आंकड़ों के आधार पर भू-राजस्व का औसत निकालकर ‘आइन-ए-दहसाला’ लागू किया गया। इस प्रणाली के अन्तर्गत राजा टोडरमल ने अलग-अलग फ़सलों पर नक़द के रूप में वसूल किये जाने वाला लगान का 1571 से ई. के मध्य क़रीब 10 वर्ष का औसत निकालकर, उस औसत का एक-तिहाई भू-राजस्व के रूप में निश्चित किया।

कालान्तर में इस प्रणाली में सुधार के अन्तर्गत न केवल ‘स्थानीय क़ीमतों’ को आधार बनाया गया, बल्कि कृषि उत्पादन वाले परगनों को विभिन्न कर हलकों में बांटा गया। अब किसान को भू-राजस्व स्थानीय क़ीमत एवं स्थानीय उत्पादन के अनुसार देना होता था ‘आइने दहसाला’ व्यवस्था को ‘टोडरमल बन्दोबस्त’ भी कहा जाता था।

इस व्यवस्था के अन्तर्गत भूमि की पैमाइश हेतु उसे 4 भागों में विभाजित किया गया-

  1. पोलज भूमि – इस भूमि पर नियमित रूप से खेती होती थी।
  2. परती भूमि – यह भूमि उर्वरा-शक्ति प्राप्त करने हेतु एक या दो वर्ष तक परती पड़ी रहती थी।
  3. छच्छर या चाचर भूमि – ऐसी भूमि, जिस पर लगभग तीन या चार वर्षों तक खेती नहीं की जाती थी।
  4. बंजर भूमि – निकृष्ट कोटि की भूमि, जिसे लगभग 5 वर्षों तक काश्त के प्रयोग में लाया गया हो।लगान खेती के लिए प्रयुक्त भूमि पर ही वसूला जाता था।

आइन-ए-दहसाला मुग़ल साम्राज्य में बादशाह अकबर के शासन काल में राजा टोडरमल द्वारा स्थापित की गई भू-राजस्व व्यवस्था की पद्धति थी।

भूमि की नाप का प्रचलन:-

लगान निर्धारण से पूर्व भूमि की माप कराई जाती थी। अकबर ने अपने शासन काल के 31वें वर्ष लगभग 1587 ई. में भूमि की पैमाइश हेतु पुरानी मानक ईकाई सन की रस्सी से निर्मित ‘सिकन्दरी गज़’ के स्थान पर ‘इलाही गज़’ का प्रयोग आरम्भ किया।

यह गज़ लगभग 41 अंगुल या 33 इंच के बराबर होता था। वह ‘तनब’ तम्बू की रस्सी एवं ‘जरीब’ लोहे की कड़ियों से जुड़ी हुई बाँस द्वारा निर्मित होती थी। शाहजहाँ के काल में दो नई नापों का प्रचलन हुआ।

बीघा-ए-इलाहीदिरा-ए-शाहजहाँनी (बीघा-ए-दफ़्तरी)

औरंगज़ेब के शासन काल में ‘दिरा-ए-शाहजहाँनी’ का प्रयोग बंद हो गया था, परन्तु ‘बीघा-ए-इलाही’ का प्रयोग मुग़लसाम्राज्य के अंत तक चलता रहा।

जाब्ती प्रथा

अकबर के शासन काल में 15वें वर्ष लगभग 1570-1571 ई. में टोडरमल ने खालसा भूमि पर भू-राजस्व की नवीन प्रणाली, जिसका नाम ‘जाब्ती’ था, को प्रारम्भ किया। इस प्रणाली में भूमि की पैमाइश एवं खेतों की मूल वास्तविक पैदावार को आंकने के आधार पर कर की दरों को निर्धारित किया जाता था।

यह प्रणाली बिहार, लाहौर, इलाहाबाद, मुल्तान, दिल्ली, अवध, मालवा एवं गुजरात में प्रचलित थी। इसमें कर निर्धारण की दो श्रेणी थी, एक को ‘तखशीस’ कर निर्धारण कहते थे और दूसरे को ‘तहसील’ व ‘वास्तविक वसूली’ कहते थे। लगान निर्धारण के समय राजस्व अधिकारी द्वारा लिखे गये पत्र को ‘पट्टा’, ‘कौल’ या ‘कौलकरार’ कहा जाता था।

उपर्युक्त प्रणाली के अन्तर्गत उपज के रूप में निर्धारित भू-राजस्व को नक़दी के रूप में वसूल करने के लिए विभिन्न फ़सलों के क्षेत्रीय आधार पर नक़दी भू-राजस्व अनुसूची (दस्तूरूल अमल) तैयार की जाती थी। मुग़ल काल में ‘खुम्स’ नामक कर समाप्त हो गया था, क्योंकि मुग़ल सैनिक वेतनभोगी होते थे। इस प्रकार उन्हें लूट की सम्पत्ति का कोई हिस्सा नहीं मिलता था।

मुग़ल सम्राटों को अधीनस्थ राजाओं तथा मनसबदारों द्वारा समय-समय पर दिये जाने वाले एक निश्चित राजस्व को ‘पेशकश’ कहा जाता था। औरंगजेब ने आज्ञा दी थी, कि नक़द पेशकश को ‘नज़र’ कहा जाय तथा सम्राट द्वारा शाहज़ादों को दिये गये उपहार को ‘नियाज’ एवं अमीर के उपहार को ‘निसार’ कहा जाय।

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September 17, 2020

Mughal Empire Shahjahan मुग़ल वंश- शाहजहाँ

मुग़ल वंश- शाहजहाँ

शाहजहाँ

  • जन्म:-1592 लाहौर में
  • माँ का नाम:-जगत गोसाईं
  • विवाह:-1612 ई0 में आसफ खाँ की पुत्री अरजुमन्द बानो बेगम उर्फ मुमताज महल से। यह नूरजहाँ की भतीजी थी। मुमताज महल की उपाधि मलिका-ए-जमानी।

दक्षिण अभियान की सफलता के बाद 1617 में खुर्रम को शाहजहाँ की उपाधि प्रदान की गई। शाहजहाँ का राज्याभिषेक 1628 ई0 में आगरा में। राज्याभिषेक के बाद ’’अबुल मुजफ्फर शहाबुद्दीन मुहम्मद शाहिब किस ए सानी’’ की उपाधि धारण की।

Shah Jahan Major Revolt ( शाहजहाँ प्रमुख विद्रोह )

शाहजहाँ के समय के प्रमुख विद्रोह निम्नलिखित हैं-

1. बुन्देल खण्ड का विद्रोह (1628-36):- इस विद्रोह का नेतृत्व जूझार सिंह बुन्देला ने किया। औरंगजेब ने ही इस विद्रोह को दबाया।

2. खाने जहाँ लोदी का विद्रोह (1628 से 31)-  खाने जहाँ लोदी अफगान सरदार था इसे मालवा की सूबेदारी दी गई थी परन्तु इसने विद्रोह कर दिया बाद में यह अहमद नगर के शासक मुर्तजा निजाम शाह के दरबार में पहुँचा।

शाहजहाँ के दक्षिण पहुँचने पर यह उत्तर पश्चिम भाग गया अन्त में बांदा जिले के सिहोदा नामक स्थान पर माधव सिंह द्वारा इसकी हत्या कर दी गई।

3. पुर्तगालियों से संघर्ष (1632):– पुर्तगालियों के बढ़ते प्रभाव को समाप्त करने के उद्देश्य से 1632 ई0 में उसके महत्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र हुगली पर अधिकार कर लिया गया।

4. अहमद नगर की विजय (1633):- इस समय अहमद नगर का शासक मूर्तजा खाँ था। इस प्रकार शाहजहाँ के समय तक खानदेश बरार और अहमद नगर मुगलों के अधीन आ गया।

औरंगजेब को दक्षिण का सूबेदार बनाया गया। जहाँ वह 1636 से 44 के बीच आठ वर्षों तक रहा। उसने दक्षिण के प्रदेशों को चार सूबों में विभाजित किया। तथा इसकी राजधानी औरंगाबाद बनाई।

  • खानदेश -राजधानी -बुरहानपुर
  • बरार -राजधानी -एलिच पुर
  • तेलंगाना -राजधानी -नान्देर
  • अहमद नगर -राजधानी -अहमद नगर

औरंगजेब दुबारा दक्षिण का सूबेदार 1652 से 57 के बीच रहा तब उसने मुर्शीद कुली खाँ के सहयोग से एक नई भू-राजस्व व्यवस्था लागू की।

Shahjahan Important Events ( महत्वपूर्ण घटनायें ):-

  • गोलकुण्डा के प्रधान मंत्री मीर जुमला जिसका वास्तविक नाम मुहम्मद सैय्यद था और जो एक पार्शी व्यापारी था ने शाहजहाँ को कोहिनूर हीरा भेंट किया।
  • शाहजहाँ के समय में कान्धार हमेशा के लिए 1649 ई0 में मुगल साम्राज्य से निकल गया। इस समय यहाँ का शासक शाह अब्बास द्वितीय था।
  • शाहजहाँ के समय में 1630-32 ई0 में दक्खन और गुजरात में अकाल पड़ा इसका वर्णन वर्नियर एवं पीटर मुंडी ने किया है। पीटर मुडी एक अंग्रेज व्यापारी था जो अकाल के समय आया था अकाल के बाद शाहजहाँ ने भू-राजस्व को कम कर दिया।

War of Succession ( उत्तराधिकार का युद्ध ):–

शाहजहाँ के कुल चार पुत्र थे- दारा, शुजा, औरंगजेब एवं मुराद, उसकी तीन पुत्रियां थी, जहाँआरा, रोशन आरा एवं गौहन आरा।

इस समय शुजा बंगाल का सूबेदार, औरंगजेब दक्षिण का सूबेदार और मुराद गुजरात का सूबेदार था। उसकी पुत्री जहाँआरा ने दारा का पक्ष लिया, रोशन आरा ने औरंगजेब का और गौहन आरा ने मुराद का।

उत्तराधिकार के महत्वपूर्ण युद्ध ( Shah Jahan War of Succession ) –

प्रथम युद्ध –बहादुरपुर में (24 फरवरी 1658) यह युद्ध शाहशुजा एवं दारा के लड़के शुलेमान शिकोह के बीच हुआ।

द्वितीय युद्ध-धरमत का युद्ध (25 अप्रैल 1658):- उज्जैन के पास यह युद्ध दारा द्वारा भेजी गई सेना (जसवंत सिंह एवं कासिम खाँ) एवं औरंगजेब तथा मुराद के मिली जुली सेना के बीच। इसमें औरंगजेब की विजय हुई। इस विजय के उपलक्ष्य में औरंगजेब ने फतेहाबाद नामक नगर की स्थापना की।

तीसरा युद्ध –सामूगढ़ का युद्ध-आगरा के पास (8 जून 1658):- दारा एवं औरंगजेब के बीच इस युद्ध में दारा की पराजय हुई यह एक निर्णायक युद्ध था इसी के बाद औरंगजेब ने 31 जुलाई 1658 को आगरा में अपना राज्याभिषेक किया।

चतुर्थ युद्ध-खजवा का युद्ध (1659):- इलाहाबाद के निकट औरंगजेब ने शुजा को पराजित किया।

पांचवा युद्ध-दौराई का युद्ध (अप्रैल 1659):- अजमेर के पास दारा अन्तिम रूप से पराजित।

जून 1659 में औरंगजेब ने दूसरी बार राज्याभिषेक दौराई के युद्ध में सफलता के बाद दिल्ली में किया।

Shahjahan Architecture ( शाहजहाँ स्थापत्य कला )

मुग़ल स्थापत्य कला के इतिहास में शाहजहाँ का शासन काल सर्वाधिक महत्वपूर्ण साबित हुआ। इस मुग़ल कालावधि में भारतीय वास्तुकला अपने चरमोत्कर्ष को प्राप्त हुई।

शाहजहाँ के शासन काल को अगर स्वर्ण युग कह कर पुकारा जाता है तो इसमें उसके द्वारा निर्मित भवनों का सर्वाधिक योगदान है।

शाहजहाँ_को उसकी इसी कला के प्रति अगाध प्रेम होने के कारण निर्माताओं का राजकुमार कहा जाता है।

शाहजहाँ_की देख रेख और उसके संरक्षण में आगरा, लाहौर, दिल्ली, काबुल, कश्मीर, अजमेर, कंधार, अहमदाबाद आदि अनेक स्थानों में सफ़ेद संगमरमर के महल,मस्जिद,मंडप,मकबरें आदि का निर्माण किया गया।

शाहजहाँ_ने आगरा तथा लाहौर में अकबर के द्वारा लाल पत्थरों से निर्मित अनेक भवनों को नष्ट करवा कर उनके स्थान पर सफ़ेद संगमरमर के भवनों का निर्माण करवाया। आगरे के किले में सम्राट ने दीवाने आम, दीवाने खास, खास महल, शीश महल, मोती मस्जिद, मुसम्मन बुर्ज तथा अनेक बनावटों का निर्माण करवाया।

दीवाने खास की सुन्दरता इसमें दोहरे खम्भों और सजावटों के कारण है। मुस्समन बुर्ज किले की लम्बी चोड़ी दीवार पर अप्सरा कुञ्ज के सामान शोभायमान है। मोती मस्जिद की कारीगरी मुग़ल कालीन स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है।

1638 ई. में दिल्ली में सम्राट ने एक नये दुर्ग का निर्माण करवाया जो दिल्ली के लाल किले के नाम से प्रसिद्ध है। उसके भीतर एक नगर बसाया गया जिसका नाम शाहजहांनाबाद रखा गया।

दिल्ली के लाल किले के भीतर सफ़ेद संगमरमर की सुंदर इमारतें बनवाई गयी जिनमे मोती महल, हीरा महल, रंग महल , दीवाने आम , दीवाने खास आदि उल्लेखनीय है।

लाल किले में शाहजहाँ ने संगीत भवन अनेक दफ्तर या बाज़ार भी बनवाये। हर महल के सामने फूलों की क्यारियां एवं फव्वारे निर्मित किये गए। जिस से उनकी सुन्दरता में चार चाँद लग गये।

सरे महल, जाली, खम्भों ,मेहराबों और चित्रों से सुसज्जित है। इन महलो के फर्श संगमरमर के बने हुए है। लाल किले में स्थित भवनों में रंग महल की शोभा अति न्यारी है। इसमें सुंदर फव्वारों की भी व्यवस्था की गयी। शाहजहाँ के द्वारा इसकी एक दीवार पर खुदवाया गया यह वाक्य ” अगर धरती पर कही स्वर्ग एवं आनंद है तो वह यहीं है”। बिलकुल सत्य प्रतीत होता है।

शाहजहाँ ने लाहौर के किले में 40 खम्भों का दीवाने आम, मुसलमान बुर्ज, शीश महल, ख्वाबगाह आदि का निर्माण करवाया। शाहजहाँ ने शाहजहांनाबाद में प्रसिद्ध जामा मस्जिद का निर्माण करवाया। यह मस्जिद अपनी विशालता एवं सुन्दरता के लिए प्रसिद्ध है। किन्तु कला की दृष्टि से उत्कृष्ट नही है।

शाहजहाँ द्वारा निर्मित ताजमहल सर्वाधिक विख्यात व महत्वपूर्ण समझा जाता है। कहा जाता है इसका निर्माण 1631 ई. से लेकर 1653 ई. तक हुआ। इस प्रकार ताजमहल निर्माण में 22 वर्ष व 9 करोड रूपये लगे।  संभवत ताजमहल की योजना उस्ताद अहमद लाहोरी द्वारा तैयार की गयी तथा इसके निर्माण हेतु देश विदेश से कारीगर नियुक्त किये गए।

पर्सी ब्राउन के मत में ताजमहल का निर्माण प्रायः मुसलमान शिल्पकारो द्वारा ही हुआ था किन्तु इसकी चित्रकारी सामान्यत: हिन्दू कलाकारों के द्वारा की गयी थीऔर पित्रादुरा जैसी कठिन पच्चीकारी कन्नौज के हिन्दू कलाकारों को सौंपी गयी।

ताज की रूपरेखा प्रधान रूप से फ़ारसी ही है, किन्तु कुछ अंश में हिन्दू शिल्प कला तथा हिन्दू साजो सज्जा का सम्मिश्रण भी हम पाते है। फिर भी इसके डिजाइन को पूर्णत: मौलिक नहीं खा जा सकता। अनुमानत: यह बीजापुर के सुल्तानों के द्वारा निर्मित मकबरों एवं शेरशाह के मकबरे से बहुत अधिक प्रभावित है।

शाहजहाँ के समय चित्रकला ( Painting at Shahjahan )

शाहजहाँ के समय चित्रकला में वह सजीवता नहीं है जो जहाँगीर के समय थी। इसमें अलंकरण पर बहुत बल दिया गया है और रंगों के बदले सोने की सजावट पर अधिक बल दिया गया है और औरंगजेब के समय तो चित्रकला का अवसान ही हो गया।

Dara Shikoh ( दारा शिकोह ):-

उपाधि- शाहबुलन्द इकबाल

दारा शिकोह शाहजहाँ का सबसे योग्य पुत्र था। वह अरबी फारसी एवं संस्कृत का विद्वान था। वह कादरी उप नाम से कविता भी लिखता था।उसके पास चित्रों का एक मुरक्का (एलबम) था। उसकी दो पुस्तकें-

  • शफीनात-अल-औलिया (यह सूफी सिद्धान्तों पर आधारित थी)
  • मजमुल-बहरीन (इसका अर्थ है दो समुद्रों का मिलन)

यह हिन्दू और मुस्लिम दो धर्मों के मिलन से सम्बन्धित थी। इसके अतिरिक्त 52 उपनिषदों का अनुवाद सिर्र-ए- अकबर अथवा सिर्र-ए-असरार के नाम से किया गया। दारा शिकोह ने भगवत गीता एवं योग वशिष्ठ का भी फारसी में अनुवाद करवाया।

दौराई के युद्ध में औरंगजेब से पराजय के बाद यह उत्तर-पश्चिम भाग गया तथा एक अफगानी जीवन खाँ के यहाँ शरण ली। उसने धोखा देकर इसे बहादुर खाँ के हवाले कर दिया जो उसे दिल्ली ले जाकर औरंगजेब को सौंप दिया। औरंगजेब ने दारा पर इस्लाम धर्म की अवहेलना का आरोप लगाया। उसे गधे पर बिठाकर दिल्ली में घुमाया गया।

इस दृश्य का चश्मदीन गवाह बर्नीयर था। बाद में दारा को फाँसी दे गई। उसे हुमायूँ को कब्र के गुम्बज के नीचे एक तहखाने में गाड़ दिया गया।

औरंगजेब ने सितम्बर 1658 में शाहजहाँ को आगरे के किले में कैद कर दिया। जहाँ 1666 ई0 में 74 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हो गई।शाहजहाँ जहाँगीर से अच्छा गायक था।

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September 17, 2020

Mughal Empire Jahangir मुगल काल- जहाँगीर

जहाँगीर (1605-27)

जहाँगीर

  • जन्म:-फतेहपुर सीकरी में स्थित शेख सलीम चिश्ती की कुटिया में।
  • माँ का नाम:-जोधा बाई
  • गुरु का नाम:-अब्दुल रहीम खान- खाना
  • बचपन:-सलीम ( अकबर इसे शेखू बाबा कहकर पुकारता था )
  • विवाह:- आमेर के राजा भगवानदास की पुत्री मानबाई से इससे पुत्र खुसरो उत्पन्न हुआ। मानबाई की मृत्यु अफीम खाने से हुई।
  • अन्य विवाह:– मारवाड़ के राजा उदयसिंह की पुत्री जगत गोसाई से, इसी से शाहजहाँ उत्पन्न हुआ।
  • शाही-ए-जमाल इससे परवेज उत्पन्न हुआ। अन्य पुत्र शहरयार एक रखैल से उत्पन्न पुत्र था।

जहाँगीर पुत्र

  1. खुसरो:- इसे अर्जुनदेव का समर्थन प्राप्त था।
  2. परवेज:- इसे महावत खाँ का समर्थन था।
  3. खुर्रम:- इसे जहाँगीर का समर्थन था।
  4. शहरयार:- इसे नूरजहाँ का समर्थन था।
  5. जहाँदार

Jahangir Coronation ( जहाँगीर राज्याभिषेक )

 आगरा में, जहाँगीर ने गद्दी पर बैठने के बाद एक न्याय की जंजीर लगवाई तथा 12 राजाज्ञा जारी की, अलतमगा नामक कर की वसूली पर प्रतिबन्ध लगा दिया।

सम्पत्ति उत्तराधिकारी के अभाव में समस्त सम्पत्ति सार्वजनिक निर्माण कार्य पर खर्च किया जायेगा। शराब एवं अन्य मादक पदार्थों की बिक्री एवं निर्माण पर प्रतिबन्ध लगा दिया। जहाँगीर ने तम्बाकू पर प्रतिबन्ध लगा दिया। तम्बाकू पूर्तगीज जहाँगीर के काल में भारत लाये थे।

कोई भी जागीदार बिना आज्ञा के विवाह नही करेगा। सप्ताह के दो दिन गुरुवार (जहाँगीर के राज्याभिषेक का दिन) एवं रविवार (अकबर का जन्म दिन) को पशु हत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया।

Rebellion of Jahangir Time ( जहांगीर के समय के विद्रोह )

1. खुसरो का विद्रोह (1606):-

खुसरो जहाँगीर का सबसे बड़ा पुत्र था। इसने 1606 में विद्रोह कर दिया इसे शिख गुरु अर्जुनदेव का समर्थन भी प्राप्त था। अर्जुन देव को खुसरो को समर्थन देने के कारण फाँसी दे दी गई। खुसरों को जालंधर के निकट भैरावल नामक स्थान पर पराजित किया गया।

खुर्रम ने अपने दक्षिण अभियान के समय खुसरो को अपने साथ ले जाकर हत्या कर दी बाद में इसका शव इलाहाबाद में लाकर दफना दिया गया।

2. महावत खाँ का विद्रोह (1626):–

महावत खाँ शहजादा परवेज को समर्थन देता था। इसने झेलम के तट पर 1626 ई0 में जहाँगीर और नूरजहाँ को बन्दी बना लिया। परन्तु बाद में नूरजहाँ ने अपनी बुद्धिमत्ता से स्वयं को आजाद करवा लिया।

Jahangir Victory ( जहांगीर प्रमुख विजयें ):-

1. मेवाड़ विजय (1615):-

मेवाड़ की गद्दी पर राणा प्रताप की मृत्यु के बाद अमरसिंह शासक बनता है। जहाँगीर ने मेवाड़ विजय की। अमरसिंह से एक समझौता हो गया जिसके प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित थे-

  1. राजपूत महिलाओं से विवाह न करने की शर्त।
  2. चित्तौड़ के किले की मरम्मत न कराने की शर्त।
  3. अमरसिंह को व्यक्तिगत रूप से दरबार में हाजिर न होने की शर्त।

2. कान्धार:-

  •  1621-22 ई0 में शाह अब्बास के समय में कान्धार मुगल क्षेत्र से निकल गया।
  • शाहजहाँ ने कान्धार जाने से मना कर दिया क्योंकि वह समझना था कि उसके जाने पर नूरजहाँ का दरबार में आधिपत्य स्थापित हो जायेगा।

3. अहमद नगर की विजय:-

  • अकबर अहमद नगर की सम्पूर्ण विजय न कर सका था। इसका एक बड़ा भाग मलिक-अम्बर के अधीन था।
  • जहाँगीर ने 1616 ई0 में खुर्रम के अहमद नगर की विजय के लिए भेजा। दोनों पक्षों में एक समझौता हो गया। जहाँगीर ने खुर्रम को इसी विजय के उपलक्ष्य में शाहजहाँ की उपाधि प्रदान की।

Jahangir Architecture ( जहांगीर वास्तुकला )

जहाँगीर के शासन काल में एतमादूद्दौला का मकबरा बनाया गया । एतमादूद्दौला के मकबरे की ख्याति इसमें संगमरमर के ऊपर पच्चीकारी के कारण है। यह सफ़ेद संगमरमर का बना हुआ है और इसमें कीमती पत्थर भी लगे हूए है। इस मकबरे का निर्माण नूरजहाँ ने करवाया।

यह प्रथम ऐसी ईमारत है (मुग़ल काल) जो पूर्ण रूप से बेदाग़ सफ़ेद संगमरमर से निर्मित है। सर्वप्रथम इस ईमारत में पित्रादूरा नाम का जड़ाऊ काम किया। जडावत के कार्य का एक पहले का नमूना उदयपुर के गोलमंडल मंदिर में पाया जाता है। मकबरे के अन्दर निर्मित एतमादूद्दौला एवं उसकी पत्नी की कब्रे पीले रंग के कीमती पत्थर से निर्मित है।

सिकंदरे में अकबर के मकबरे का निर्माण कार्य यद्यपि अकबर के योजना के अनुरूप उसी के शासन काल में प्रारंभ किया गया। इसका समापन 1613ई. में जहाँगीर की देख रेख में हुआ।

यह मकबरा चार बाग़ पद्धति के उद्यान में स्थित है। वर्गाकार योजना का यह मकबरा पांच तल ऊंचा है जिसका प्रत्येक तल क्रमश: छोटा होकर इसे पिरामिड नुमा आकर देता है। अकबर की कब्र भवन से चारो और से घिरी है तथा ये ईंट और चुने के गारे से बनी है। उपरी मंजिल सफ़ेद संगमरमर तथा अन्य सम्पूर्ण मकबरा लाल बलुआ पत्थर का बना है। यह मकबरा 119 एकड में फैला हुआ है।

ओरंगजेब के समय में जाट शासक राजा राम के नेतृत्व में जाटों ने अकबर की कब्र खोदकर इसकी अस्थियों को अग्नि में समर्पित कर दिया एवं मकबरे को नुकसान भी पहुँचाया।

जहाँगीर के शासन काल में अन्य उल्लेखनीय भवन लाहौर के निकट शाहदरा में स्थित उसका मकबरा है जिसका नक्शा व योजना उसने खुद तैयार किया था। इस मकबरे के ऊपर संगमरमर का एक मंडप था जिसे सिक्खों ने उतार लिया था। समाधि के भीतरी हिस्सों में संगमरमर की पच्चीकारी तथा चिकने और रंगीन सुंदर पलस्तरो का प्रयोग किया गया है।

नूरजहाँ

नूरजहाँ

  • वास्तविक नाम – मेहरुन्निसा
  • पिता का नाम: मिर्जा गयास बेग
  • माता का नाम: अस्मत बेगम
  • विवाह: अली-कुली बेग के साथ
  • जहाँगीर से विवाह -1611 ई0

जहाँगीर ने इसे पहले नूर महल एवं फिर नूरजहाँ की उपाधि प्रदान की। 1613 ई0 में पट्ट महसी एवं बादशाह बेगम की उपाधि दी। नूरजहाँ फारस की थी इसने राज दरबार में अपना एक गुट बना लिया जो नूरजहाँ गुट के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

नूरजहाँ गुट:- नूरजहाँ ने दरबार में अपना प्रभाव बढ़ा लिया और इसने एक गुट बना लिया। इस गुट में- 1. नूरजहाँ 2. आसफ खाँ 3. अस्मत बेगम 4. मिर्जा गयास वेग 5. शाहजहाँ सम्मिलित थे।

इस गुट में शहरयार शामिल नही था। नूरजहाँ अपनी पहली पुत्री लाडली बेगम का विवाह जहाँगीर के पुत्र शहरयार से करना चाहती थी तब इस गुट में मतभेद उत्पन्न हो गया और शाहजहाँ इससे अलग हो गया।

इत्र का आविष्कार:-

गुलाब से इत्र निकालने का आविष्कार अस्मत बेगम ने किया था। उसी के बाद नूरजहाँ ने भी इस कला को सीख लिया।

Jahangir’s death ( जहाँगीर की मृत्यु ):–

जहाँगीर 1627 ई0 में कश्मीर गया। लौटते समय राजौरी के निकट उसे दमे का दौड़ा पड़ा। 7 नवम्बर 1627 ई0 को भीमबार नामक स्थान पर जहाँगीर की मृत्यु हो गई।  इसे शहादरा में रावी नदी के तट पर दफना दिया गया। नूरजहाँ की भी मृत्यु लाहौर में ही हुई। जहाँगीर एक गायक भी था।

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