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September 14, 2020

September 14, 2020

Sultanate era-Lodi dynasty लोदी वंश 1451 – 1526 ई.

Sultanate era-Lodi dynasty ( लोदी वंश 1451 – 1526 ई.)

लोदी वंश

बहलोल लोदी(1451-1489 ई)

बहलोल लोदी ने अंतिम सैय्यद शासक आलमशाह को अपदस्थ कर लोदी वंश की स्थापना की। बहलोल लोदी की मुख्य सफलता जौनपुर (1484 ई.) राज्य को दिल्ली सल्तनत में सम्मिलित करने की थी। उसने बहलोली सिक्के जारी किये, जो अकबर से पहले तक उत्तरी भारत में विनिमय के मुख्य साधन बने रहे।

अब्बास खां शेरवानी कहता है कि, “बहलोल लोदी द्वारा दिल्ली की सत्ता हस्तगत करने पर अफगान टिड्डी के झुण्ड की तरह भारत की और चल पड़े।“

सिकंदर लोदी (1489-1517 ई.)

बहलोल लोदी के उपरांत सिकंदर लोदी दिल्ली का सुल्तान बना, जो लोदी वंश का सर्वश्रेष्ठ शासक सिद्ध हुआ सिकंदर लोदी ने 1504 ई. में आगरा नगर की स्थापना की तथा 1506 ई. में इसे अपनी राजधानी बनाया। उसने नाप के लिए एक पैमाना ‘गज-ए-सिकंदरी’ प्रारंभ किया तथा हिन्दुओं पर जजिया कर आरोपित किया।

सिकन्दर लोदी ने मुहर्रम और ताजिया निकालना बंद करा दिया। मस्जिदों को सरकारी संस्थाओं का रूप प्रदान करके उन्हें शिक्षा का केंद्र बनाने का प्रयत्न किया।

सिकंदर लोदी के अनुसार, “यदि मैं अपने एक गुलाम को भी पालकी में बैठा दूं तो मेरे आदेश पर मेरे सभी सरदार उसे अपने कन्धों पर बैठा कर ले जायेंगे।“

सिकंदर लोदी ने एक आयुर्वेदिक ग्रंथ का फारसी में अनुवाद करवाया, जिसका नाम ‘फरहंग-ए-सिकंदरी’ रखा गया। सिकंदर लोदी गुलरूखी के उपनाम से फारसी में कविताएं लिखता था।

इब्राहिम  लोदी (1517-1526 ई.)

सिकंदर लोदी की मृत्यु के बाद उसका पुत्र इब्राहिम  लोदी दिल्ली का सुल्तान बना। इसके शासनकाल में दिल्ली सल्तनत का पतन प्रारंभ हो गया। सभी राज्यों के गवर्नर स्वतंत्र शासकों जैसा व्यवहार करने लगे।

खातोली (वर्तमान कोटा जिले में) के युद्ध (1517-1518 ई.) में मेवाड़ के शासक महाराणा सांगा ने उसे पराजित किया था उसके बाद बाड़ी (धौलपुर) के युद्ध में बुरी तरह पराजित किया| मेवाड़ महाराणा सांगा (संग्राम सिंह) एवं इब्राहीम लोदी के मध्य संघर्ष का मुख्य कारण °मालवा° पर अधिकार करना था|

इब्राहीम लोदी ने बहलोल लोदी के नियमों को पूरी तरह उलट कर राजशाही में कुनबापरस्ती को बिल्कुल नकार दिया था| उमरावों के साथ वह कठोरता से पेश आता था| इस कारण सुल्तान-उमरावों के संबन्ध तनावपूर्ण हो गये| इब्राहीम लोदी के शासन काल मे सुल्तान और अफगान सरदारों का संघर्ष मुख्य घटना थी|

1526 ई. में पानीपत के मैदान में इब्राहिम  लोदी और बाबर के बीच ऐतिहासिक युद्ध हुआ, जिसमे इब्राहिम लोदी की हार हुई। इसे पानीपत के प्रथम युद्ध के नाम से भी जाना जाता है। 

लोदियों के साथ-साथ दिल्ली सल्तनत का पतन हो गया। इतिहासकार निमायमतुल्ला के अनुसार, “इब्राहिम  लोदी के अतिरिक्त दिल्ली का कोई भी सुल्तान युद्ध में नहीं मारा गया।“

पानीपत के प्रथम युद्ध के परिणामस्वरूप भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना हुई| बाबर की श्रेष्ठ रणनीति और तोपखाने ने इब्राहीम लोदी को पराजित करने में निर्णायक भूमिका निभाई थी|

September 14, 2020

Sultanate period-Sayyad dynastym सैय्यद वंश

सैय्यद वंश

सैय्यद वंश

तेरहवीं शताब्दी के प्रारंभ में भारत में सल्तनत कालीन शासन की स्थापना हुई।  कुतुबुद्दीन ऐबक 1206 ईस्वी से लेकर इब्राहिम लोदी 1526 ईस्वी तक 32 सुल्तानों ने लगभग 320 वर्ष दिल्ली पर राज्य किया।  इस में सर्वाधिक विस्तृत साम्राज्य अलाउद्दीन खिलजी के काल में था। जबकि सर्वाधिक दीर्घकालीन शासन फिरोज तुगलक का रहा।

इस वंश का आरम्भ तुग़लक़ वंश के अंतिम शासक महमूद तुग़लक की मृत्यु के पश्चात ख़िज़्र ख़ाँ से 1414 ई. में हुआ सैयद वंश (1414-50)- सैयद भी तुर्क ही थे। इस वंश का संस्थापक मुल्तान का प्रान्तपति खिज्रखाँ था।

खिज्र खाँ (1414-21)

1413-1414 ई. के बीच दौलत खां लोदी दिल्ली का सुल्तान बना, परन्तु खिज्र खां ने उसे पराजित कर एक नवीन राजवंश, सैय्यद वंश की नींव डाली खिज्र खां ने मंगोल आक्रमणकारी तैमूर लंग को सहयोग प्रदान किया था और उसकी सेवाओं के बदले तैमूर ने उसे लाहौर, मुल्तान एवं दिपालपुर की सूबेदारी प्रदान की 

इसने सुल्तान की उपाधि न धारण कर रैयत-ए-आला की उपाधि धारण की। इसने तैमूर के चैथे पुत्र शाहरुन के प्रतिनिधि के रूप में शासन किया। फरिश्ता इसे एक न्यायी एवं परोपकारी राजा कहा है। 20 मई 1421 को दिल्ली में उसकी मृत्यु हो गई

मुबारक शाह (1421-34)

मुबारक खां मुबारक शाह के नाम से सिंहासन पर बैठा। इसने यमुना दनी के किनारे 1434 ई0 में मुबारक बा दनामक नगर की स्थापना की इसी के शासन काल में याहियाबिन-अहमद-सरहिन्दी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक तारीखे-मुबारक शाही लिखी।

जिससे फिरोज तुगलक के बाद से लेकर मुबारक शाह तक ही घटनाओं का पता चलता है। अपने नये नगर के निरीक्षण के समय में ही इसके वजीर सरवन-उल-मुल्क ने इसकी हत्या कर दी। इसके बाद इसका भतीजा मुहम्मद बिन खरीद खाँ गद्दी पर बैठा।

मुहम्मदशाह (1434-45)

मुहम्मदशाह मुबारक शाह का भतीजा था। 1445 ई में मुहम्मद शाह की मृत्यु हो गई।

यह विलासी और अयोग्य शासक था। इसके शुरुआत के शासनकाल में वजीर सरवर उल मुल्क का शासन पर पूर्ण प्रभाव रहा।

जिसकी अमीरों ने षडयंत्र के दौरान हत्या कर दी। बाद में कमाल उल मुल्क को वजीर बना जो अधिक योग्य न था।

मुहम्मदबिन खरीदखाँ मुहम्मदशाह के नाम से गद्दी पर बैठा। इसने मुल्तान के सुबेदार वहलोल को खान-ए-खाना की उपाधि दी।

अलाउद्दीन आलमशाह (1445-50)

यह मुहम्मदशाह का पुत्र था। इसके समय में यह कहावत चल पड़ी थी कि शाह-ए-आलम का राज्य दिल्ली से पालम तक। 

यह सैयद शासकों में सबसे अयोग्य था। इसका अपने वजीर हमीद खां से विवाद हो गया। जिस कारण हमीद खां ने बहलोल लोदी को आमंत्रित किया। इसने स्वेच्छा से अपने पद का त्याग किया था। बहलोल लोदी नें 1451 ई मे कुटिल नीति से दिल्ली पर अधिकार कर लिया। इसी के बाद बहलोल लोदी ने एक नये वंश लोदी वंश की नींव डाली।

इस प्रकार सैयद वंश का पतन होकर एक नये लोदी राजवंश का उदय हुआ। 37 वर्षों के शासन काल में सैयद वंश के शासकों ने कोई भी उल्लेखनीय कार्य नहीं किया।

Sayyad Dynastym Important Facts 

  • सैय्यद वंश में किसने रेयत ए आला की उपाधि धारण की – खिज्र खाँ।
  • तैमूर लंग भारत से जाते वक्त खिज्र खाँ को कहा कि शासक नियुक्त किया– लाहौर, मुल्तान,दीपालपुर का सूबेदार
  • खिज्र खाँ ने अपने सिक्कों पर किस वंश के सुल्तानों का नाम खुदबाया- तुगलक वंश।
  • मुबारक शाह के शासन काल के विषय मे जानकारी किस ग्रथं में मिलती है- तारीख ए मुबारकशाही या विन अहमद सरहिंदी।
  • मुहम्मदशाह ने खुश होकर बहलोल को कौन सी उपाधि दी- खान ए जहां ओर खान ए खाना

September 14, 2020

सल्तनत काल- तुगलक वंश Tughlaq Dynasty

सल्तनत काल- तुगलक वंश

तुगलक वंश

ग़यासुद्दीन ने एक नये वंश अर्थात् तुग़लक़ वंश की स्थापना की जिसने 1412 तक राज किया। इस वंश में तीन योग्य शासक हुए। ग़यासुद्दीन, उसका पुत्र मुहम्मद बिन तुग़लक़ (1324-51) और उसका उत्तराधिकारी फ़िरोज शाह तुग़लक़ (1351-87)।

इनमें से पहले दो शासकों का अधिकार क़रीब-क़रीब पूरे देश पर था।

गयासुद्दीन तुगलक (गाजी मालिक) (1320-25)-

तुगलक वंश का संस्थापक। तुगलक गाजी गयासुद्दीन तुगलक के नाम से 1320 ई में दिल्ली का सुल्तान बना। वह मुबारक शाह खिलजी के शासन काल में उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत का गवर्नर था गयासुद्दीन तुगलक दिल्ली का प्रथम सुल्तान जिसने अपने नाम के साथ गाजी (काफिरों का वध करने वाला) शब्द जोड़ा। गयासुद्दीन तुगलक नहर निर्माण करवाने वाला प्रथम दिल्ली सुल्तान था।

निजामुद्दीन ओलिया प्रसिद्ध सूफी संत थे गयासुद्दीन तुगलक द्वारा दंड देने की धमकी देने पर कहा था “दिल्ली अभी बहुत दूर है।”

जिसने 1320-25 ई तक शासन किया। यह एक विद्वान शासक था। इसने लगान के रूप में उपज का 1/10 भाग तक लेने का आदेश दिया।किसी स्वागत समारोह के लिए निर्मित एक भवन के गिरने से 1325 ई में उसकी मत्यु हो गई।.

प्रारंभिक कठिनाइयाँ :-

गयासुद्दीन के सिंहासन पर बैठने के साथ ही उसके सामने निम्नलिखित कठिनाइयाँ आई.

  •  दिल्ली सल्तनत व सुल्तान की प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करना
  • अधिकांश दरबारियों में धन लोलुपता विलासिता व अकर्मण्यता आ गयी थी उसे दूर करना
  • खिलजी सरदारों के अत्यधिक धन वितरण से शाही खजाना खाली हो गया था

इसके अतिरिक्त सबसे विकट समस्या सूबेदारों व अधीनस्थ शासकों को दिल्ली की अधीनता में रखने की थी

गयासुद्दीनकी प्रशासनिक व्यवस्था

  • गयासुद्दीन ने उदारता व कठोरता की समन्वयवादी नीति अपनाई  
  • जिसे बरनी ने “रस्मोमियान” या मध्यम पंथी नीति कहा
  • गयासुद्दीन ने स्वयं कहा कि, ” मै सभी क्षेत्रों में मध्यम मार्ग के लिए जन्मा हूँ.”
  • गयासुद्दीन ने अमीरों को पद देने में वंशानुगतता के साथ साथ योग्यता को भी आधार बनाया उसने अलाउद्दीन द्वारा छीनी गयी जागीरें पुनः लौटा दी.. गयासुद्दीन ने भूराजस्व व्यवस्था में सुधार किए जिसका मुख्य उद्देश्य किसानो की स्थिति में सुधारव कृषि योग्य भूमि में वृद्धि करना था
  • उसने अलाउद्दीन द्वारा लागू मसाहत के तरीके को बदल कर हुक्म-ए-हासिल (गल्ला बटाई) , नस्क /कनकूत प्रथा नीति अपनाई
  • इस प्रणाली में भूमि कर को कम कर 1/3 कर दिया गया तथा भू राजस्व में एक बार में 1/11 से1/10 तक की ही वृद्धि करने के आदेश दिए

मोहम्मद बिन तुगलक (1325- 1351 ई)-

1325 ई में गियासुदीन की मृत्यु के बाद उसका पुत्र जौना खां मुहम्मद-बिन- तुगलक की उपाधि धारण कर दिल्ली का सुल्तान बनकर गद्दी पर बैठा।  इसका शासन काल 1325 से 1351 ई तक रहा इसने खुतबा पर से खलीफा का नाम बाहर कर दिया, इसे गयासुद्दीन तुगलक ने उलूग खां की उपाधि दी थी।

यह हिंदूओ के होली के त्यौहार में भाग लेता था। इसने नई राजधानी देवगिरी का नया नाम दोलताबाद रखा 1329 ई में मुहम्मद बिन तुगलक ने प्रतीकात्मक/सांकेतिक मुद्रा जारी करने का निर्णय लिया। इसने तांबे एवं कांसे की मुद्रा जारी की

इसने 1326 ई में राज्य में आय व्रद्धि करने के उद्देश्य से दोआब में कर व्रद्धि की और कृषि विस्तार के उद्देश से ‘दीवाने-ए-कोही’ नामक विभाग खोला जिसका प्रधान ‘अमीर-ए-कोही’ होता था।

इसी के शासनकाल में 1336 ई में हरिहर एवं बुक्का नामक दो भाइयों ने विजय नगर सामराज्य की स्थापना की

1338 ई में बंगाल स्वतंत्र हो गया देवगिरी के आसपास के क्षेत्र में 1347 ई में हसन गंगू के नेतृत्व में ‘बहमनी सामराज्य’ की नीव पड़ी मोहम्मद तुगलक द्वारा जारी सिक्कों पर “अल-सुल्तान-जिल्ली- अल्लाह” खुदा रहता था

मोहम्मद बिन तुगलक ने ‘जहांपनाह नगर’ एवं ‘आदिलबाद’ के दुर्ग का निर्माण करवाया 1329 ई में सांकेतिक मुद्रा चलाई। इसने तांबे और कांसे के सिक्के जारी किए परंतु लोग इस प्रयोग को समझ ना सके।

लोगों ने जाली सिक्के बनाने शुरू कर दिए। व्यापारियों ने तांबे के सिक्के लेने से इंकार कर दिया। निराश होकर सुल्तान ने सांकेतिक मुद्रा बंद कर दी

20 मार्च 1351 ई को थट्टा के निकट बुखार हो जाने से मुहम्मद तुगलक की मृत्यु हो गई

मोहम्मद बिन तुगलक को इन नामों से भी जाना जाता है। (उपनाम)

  • शैतान का साथी
  • उलूग खां
  • जूना खां
  • सुल्तान ए कामिल
  • सुल्तान ए आदिल
  • पागल सुल्तान
  • अपने युग का अरस्तु

मुहम्मद बिन तुगलक की योजनाए 

  • 1 दोआब में कर वृद्धि – 1326 ई.
  • 2 राजधानी परिवर्तन – 1327 ई.
  • 3 मंगोल आक्रमण -1328 ई.
  • 4 सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन – 1329 ई.
  • 5 खुरासान विजय योजना – 1337 ई.

ये सभी योजनाएं असफल रही।

एलफिंस्टन पहला इतिहासकार जिसने मोहम्मद तुगलक में पागलपन का कुछ अंश पाया।  

राजधानी परिवर्तन – 1326-27 ई में मोहम्मद बिन तुगलक ने अपनी संपूर्ण प्रजा को दिल्ली से देवगिरी स्थानांतरित किया यह मोहम्मद तुगलक की सर्वाधिक विवादस्पद योजना थी।

सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन 1329 30 ईस्वी में मोहम्मद तुगलक में चांदी के सिक्के के स्थान पर कहां से के सिक्के ढलवाए और आदेश जारी किया कि उनका मूल्य चांदी के सिक्कों के बराबर माना जाए।

इब्नबतूता- मोरक्को निवासी 1333 ईस्वी में मोहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में भारत आया। मोहम्मद तुगलक ने उसे दिल्ली का प्रमुख काजी बनाया, 1342 में सुल्तान के राजदूत के रूप में चीन गया।

मोहम्मद तुगलक अकाल पीड़ितों को सहायता देने वाला दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था, वह प्रथम सुल्तान था जिसने अकाल संहिता बनाई। मुहम्मद बिन तुगलक ने जैन आचार्य जिन प्रभ सुरी को संरक्षण प्रदान किया

दीवान ए कोही – मोहम्मद बिन तुगलक द्वारा स्थापित कृषि विभाग।

फिरोजशाह तुगलक (1351-88) फिरोज तुगलक का काल वजीराबाद का स्वर्णकाल था। फिरोजशाह तुगलक को खलीफा का नायाब, सल्तनत काल का अकबर के उपनाम से भी जाना जाता है।

मिस्र की खलीफा से दो बार मान्यता पत्र प्राप्त करने वाला प्रथम मध्यकालीन सुल्तान फिरोजशाह तुगलक था।

बरीद ए मुमालिक – सूचनादाता और गुप्तचर विभाग का प्रमुख होता था। जो माल या अन्य सूचनाएं सुल्तान तक पहुचाता था।

तुगलककालीन इमारतें

तुगलक स्थापत्य की प्रमुख विशेषता ढलवा दीवारें हैं इसे सलामी कहा जाता है

इसमें इमारते मजबूत और ठोस बनती थी परन्तु फिरोज द्वारा बनवायी इमारतों में सलामी का प्रयोग नही मिलता।

तुगलक अपनी इमारतों में मंहगा लाल बलुआ पत्थर का इस्तेमाल नही करते थे

बल्कि वे सस्ते-मटमैले पत्थर का प्रयोग करते थे। इसको तरासना आसान काम न था।

इसी कारण तुगलक कालीन इमारतों में बहुत कम अलंकरण मिलता है लेकिन फिरोज तुगलक की सभी इमारतों में अलंकरण के लिए कमल का प्रयोग हुआ है। प्रमुख इमारतों का वर्णन निम्नलिखित है-
1. तुगलकाबाद:- गयासुद्दीन तुगलक द्वारा दिल्ली के समीप स्थापित एक नया नगर यहीं पर एक दुर्ग 56 कोट का निर्माण किया गया।
2. गयासुद्दीन का मकबरा:- इसका निर्माण गयासुद्दीन तुगलक द्वारा दिल्ली में किया गया।
3. बेगम पुरी मस्जिद:– दिल्ली में मुहम्मद तुगलक द्वारा निर्मित।
4. आदिलबाद का किला:- मु0 तुगलक द्वारा दिल्ली के निकट।
5. जहाँपनाह:- मुहम्मद तुगलक द्वारा दिल्ली के निकट स्थापित नवीन नगर।
6. स्वर्गद्वारी:- कन्नौज के निकट गंगा तट पर मुहम्मद तुगलक द्वारा बनवाया गया नवीन नगर जहाँ मुहम्मद तुगलक ने दुर्भिक्ष के समय में ढाई वर्षों तक निवास किया।

7. बरह खम्भा:- यह मुहम्मद तुगलक के समय में सामन्तों के निवास के समय में बनवाई गई इमारत थी। इस ईमारत की प्रमुख विशेषता सुरक्षा तथा गुप्त निवास है।
8. सथपलाह बाघ और विजाई मण्डल:- ये दोनों दौलताबाद की इमारतें थी जिसका निर्माण मुहम्मद तुगलक ने करवाया था।

फ़िरोज शाह तुग़लक़ (1351-87):- 

मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु के बाद उसका चचेरा भाई फिरोज शाह तुगलक दिल्ली की गद्दी पर बैठा प्रशासन के मामले में फिरोज का दृष्टिकोण सस्ती लोकप्रियता हासिल करना था।

उसने दण्ड संहिता को संशोधित करके दण्डों को अधिक मानवीय बनाया तथा सुल्तान को भेंट देने की प्रथा को समाप्त कर दिया।उसने कर प्रणाली को धार्मिक स्वरूप प्रदान किया।

उसने पहले से प्रचलित कम से कम 23 करों को समाप्त कर दिया और इस्लामी शरीयत कानून द्वारा अनुमति प्राप्त केवल चार करों-खराज, जकात, जजिया और खम्स को आरोपित किया।

फिरोज ने सिंध में सैनिक अभियान किया जिसमे वह असफल रहा। फिरोज तुगलक पहला सुल्तान था,

जिसने राज्य की आमदनी का ब्यौरा तैयार करवाया।

फिरोज तुगलक का आदर्श वाक्य था- ‘खजाना बड़ा होने से अच्छा है लोगों का कल्याण। दुःखी हृदयों से अच्छा का खाली खजाना।“

फिरोज ने कर्मचारियों को कार्य के बदले में जागीरें दीं।

उसने जागीरदारी प्रथा और भूमि को ठेके पर दिया जाना शुरू किया।

इसके समय में सर्वप्रथम दीवान-ए-विजारत विभाग में भवन निर्माण की योजना प्रस्तुत की जाती थी

फिरोज ने अपने भवनों का निर्माण मलिक गाजी और अब्दुल हक की देख-रेख में करवाया। 

प्रसिद्ध विधि इतिहासकार फरिश्ता फिरोज तुगलक को 200 नगरों 20 महलों 30 पाठशालाओं 40 मस्जिदों 100 अस्पतालों 100 स्नानगृहों 150 पुलों और 5 मकबरों के निर्माण का श्रेय देता है।

फिरोज तुगलक ऐसा सुल्तान था, जिसने सार्वजानिक निर्माण कार्य को प्रमुखता दी।

उसने पांच बड़ी नहरों का निर्माण करवाया तथा ‘दीवान-ए-खैरात’ नमक विभाग को प्रमुखता दी।

जो अनाथ मुस्लिम स्त्रियों तथा विधवाओं को सहायता प्रदान करता था।

मुस्लिम बेरोजगारों के लिए उसने ‘दफ्तर-ए-रोजगार’ नामक विभाग की स्थापना की। फिरोज ने फतेहाबाद, हिसार, फिरोजपुर, जौनपुर तथा फिरोजाबाद की स्थापना की।

फिरोज तुगलक दिल्ली के सुल्तानों में पहला सुल्तान था, जिसने इस्लाम के कनोंओं और उलेमा वर्ग को राज्य शासन में प्रधानता दी। फिरोज ने हिन्दू ब्राह्मणों पर भी जजिया कर आरोपित किया।

फ़िरोज का साम्राज्य उनसे छोटा अवश्य था, पर फिर भी अलाउद्दीन ख़िलजी के साम्राज्य से छोटा नहीं था।

फ़िरोज की मृत्यु के बाद दिल्ली सल्तनत का विघटन हो गया और उत्तर भारत छोटे-छोटे राज्यों में बंट गया।

यद्यपि तुग़लक़ 1412 तक शासन करत रहे, तथापि 1399 में तैमूर द्वारा दिल्ली पर आक्रमण के साथ ही तुग़लक़ साम्राज्य का अंत माना जाना चाहिए

डॉ. आर. सी. मजूमदार के अनुसार, “फिरोज इस युग का सबसे धर्मान्ध और इस क्षेत्र में सिकंदर लोदी तथा औरंगजेब का अनुज था।“

हेनरी इलियट तथा एलिफिंस्टन ने फिरोज को ‘सल्तनत युग का अकबर’ कहा है। फिरोज को मध्यकालीन भारत का पहला ‘कल्याणकारी निरंकुश शासक’ कहा जाता है।

फिरोज तुगलक की 1388 ई. में मृत्यु में के बाद तुगलक वंश तथा दिल्ली सल्तनत का पतन आरंभ हो गया। 

तुगलक वंश के पतन का मुख्य कारण फिरोजशाह के उत्तराधिकारियों की अयोग्यता थी। इसके बाद कई शासक हुए लेकिन वे सभी शासन के अयोग्य थे।

तुगलक वंश का अंतिम शासक नसिरुद्दीन महमूद शाह(1394- 1412) था।  1398 ई. में इसके शासन काल में मंगोल शासक तैमूर लंग का आक्रमण हुआ।

फिरोज तुगलक के समय में प्रमुख निर्माण कार्य निम्नलिखित है।

1. कोटला फिरोजशाह:- दिल्ली में कोटला फिरोजशाह दुर्ग का निर्माण फिरोज तुगलक ने करवाया।

दुर्ग के अन्दर निर्मित जामा मस्जिद के सामने अशोक का टोपरा गाँव से लाया गया स्तम्भ गड़ा है।
2. कुश्क-ए-शिकार:– यह मुख्यतः शिकार के लिए बनवाया गया भवन था इसका एक अन्य नाम शाहनुमा मिलता है।

इसी भवन के सामने अशोक का दूसरा स्तम्भ लेख दिल्ली-मेरठ स्तम्भ लेख गड़ा है।
3. फिरोज शाह का मकबरा:– इसका निर्माण फिरोज तुगलक ने करवाया। यह एक वर्गाकार इमारत है।
4. खाने जहाँ-तिलंगानी का मकबरा:- खानेजहाँ एक तेलंग ब्राहमण था। वह फिरोज का प्रधानमंत्री भी था।

यह मकबरा भारत का पहला अष्टकोणी मकबरा हे। इस मकबरे में लाल पत्थर एवं सफेद संगमरमर का प्रयोग हुआ है।

इस मकबरे की तुलना येरुसलम में निर्मित उमर के मस्जिद से की जाती है। वैसे अण्टकोणी मकबरे लोदी काल की प्रमुख विशिष्टता है।
5. खिड़की मस्जिद:- यह मस्जिद खानेजहाँ द्वारा जहाँपनाह नगर में बनवाया गया। यह वर्गाकार है।
6. काली मस्जिद:- यह दो मंजिली मस्जिद है। इसमें अर्द्ध वृत्तीय मेहराबों का प्रयोग हुआ है।
7. कलम-मस्जिद:- यह मस्जिद शाहजहाँबाद में स्थित है।

कबीरुद्दीन औलिया का मकबरा या लाल गुम्बद

दिल्ली में स्थित इस मकबरे का निर्माण गयासुद्दीन द्वितीय समय में प्रारम्भ हुआ परन्तु यह नासिरुद्दीन मोहम्मद के समय में पूरा हुआ। इसे लाल गुम्बद भी कहा जाता है।

तुगलक वंश तुगलक वंश तुगलक वंश तुगलक वंश तुगलक वंश