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September 12, 2020

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सल्तनत काल- गजनवी और गौर वंश Gajnavi and Gaur Dynasty

सल्तनत काल- गजनवी और गौर वंश

977 ई. में अलप्तगीन के दामाद सुबुक्तगीन ने गजनी पर शासन किया। सुबुक्तगीन ने मरने से पहले कई लड़ाइयां लड़ते हुए अपने राज्य की सीमाएं अफगानिस्तान, खुरासान, बल्ख एवं पश्चिमोत्तर भारत तक फैला ली थीं। सुबुक्तगीन की मुत्यु के बाद उसका पुत्र महमूद_गजनवी गजनी की गद्दी पर बैठा। 

गजनवी

महमूद_गजनवी ने बगदाद के खलीफा के आदेशानुसार भारत के अन्य हिस्सों पर आक्रमण करना शुरू किए। उसने भारत पर 1001 से 1026 ई. के बीच 17 बार आक्रमण किए। महमूद गजनवी यमनी वंश का तुर्क सरदार गजनी के शासक सुबुक्तगीन का पुत्र था।

महमूद गज़नवी ये मध्य आशिया का गझनी इस छोटे राज्य का तुर्की सुलतान था। इ.स. के पहले हजार की आखीर के तीस साल और दुसरे हजार के पहले तीस साल (970 से 1030) ये उनके जीवनकाल था। इस्लाम धर्म स्वीकार किये हुये और इराणी (पार्शियन) संस्कृति के प्रभाव के निचे आने-वाले तूर्क के लोगो ने मध्य आशियाई राजनीती में उस समय में वर्चस्व हासील किया था।

महमूद उसमे से एक था। ये सैनिक इ.स. 998 में सुलतान हुआ। समृद्ध भारत की तरफ जल्दी ही उसने अपना फ़ौज घुमायी। 1001 से 1027 इस युग में उसके आक्रमण के सतरा लहरे भारत पर आकर गिरी। पहले पेशा पर और पंजाब परिसर के हिंदू शाही राज्यकर्ताओ के खिलाफ उसने अभियान तैयार की। जयपाल और अगंनपाल इस हिंदुशाही राज्यकर्ताओं ने तुर्की आक्रमण का प्रतिकार किया।

लेकीन महमूद के आगे वो और उनसे हात मिलाने वाले मुलतानी मुस्लिम सत्ताधिश नहीं टिक पाये। हात में आये हुये और हारे हुये जयपाल को मुक्त करने का बड़ा दिल महमूद ने दिखाया। लेकीन जयपाल ने अपमान से ज्यादा आग में जाके मौत का स्वीकार किया। पंजाब – मुलतान प्रदेश महमूद गज़नवी / Mahmud of Ghazni के कब्जे में गया।

उसके बाद उत्तर भारत के बहोत से जगह आक्रमण करके उसने बहोत लूट हासिल की। स्थानेक्ष्वर कनोज, मथुरा यहाँ डाका डालकर उसने शहर और मंदिरों को लुटा। इन सारे आक्रमणों में महमूद के सैनिको पहाड़, सिंधु से गंगा तक नदिया, जंगल, पार करके जाना पड़ा। इंन्सानो की तरह प्रकृति का भी सामना करना पड़ा।

लेकीन पराक्रम और इच्छा शक्ती के बल पर इन सब पर उसने मात की। आखीर में महमूद ने गुजरात के सोमनाथ पर राजस्थान के रास्ते से स्वारी की। प्रभासपट्टण का सोमनाथ मंदीर ये बार ज्योतिर्लिंगों में से एक है। अमिर सोमनाथ के भक्तो की संख्या लाखो में पुजारियों की संख्या हजारों में थी। समुंदर के तट के इस वैभवशाली मंदीर को महमूद ने जी भरकर लूटा। पुरोदितों की प्रार्थना से ये लूट नही रुक पायी।

भारत पर आक्रमण करने बाला प्रथम मुस्लिम मुहम्मद बिन कासिम(अरबी) था जबकि भारत पर आक्रमण करने बाला प्रथम तुर्की मुस्लिम सुबुक्तगीन था।  

अपने भारतीय आक्रमण के समय महमूद_गजनवी ने जिहाद का नारा दिया,साथ ही अपना नाम बुत शिकन रखा।। सर हेनरी इलियट ने महमूद गजनवी के 17 आक्रमण का वर्णन किया है।। वेहकी को इतिहासकार लेन पूल ने पूर्बीपेप्स की उपाधि प्रदान की।

महमूद_गजनवी के 17 आक्रमण :

  • दूसरे आक्रमण में महमूद ने जयपाल को हराया। जयपाल के पौत्र सुखपाल ने इस्लाम कबूल कर लिया।
  • 4 थे आक्रमण में भटिंडा के शासक आनंदपाल को पराजित किया।
  • 5वें आक्रमण में पंजाब फतह और फिर पंजाब में सुखपाल को नियु‍क्त किया, तब उसे (सुखपाल को) नौशाशाह कहा जाने लगा।
  • 6 ठे और 7 वें आक्रमण में नगरकोट और अलवर राज्य के नारायणपुर पर विजय प्राप्त की। आनंदपाल को हराया, जो वहां से भाग गया। आनंदपाल ने नंदशाह को अपनी नई राजधानी बनाया तो वहां पर भी गजनवी ने आक्रमण किया।
  • 10 वां आक्रमण नंदशाह पर था। उस वक्त वहां का राजा त्रिलोचन पाल था। त्रिलोचनपाल ने वहां से भागकर कश्मीर में शरण ली। नंदशाह पर तुर्कों ने खूब लूटपाट ही नहीं की बल्कि यहां की महिलाओं का हरण भी किया।
  • महमूद ने 11 वां आक्रमण कश्मीर पर किया,
  • जहां का राजा भीमपाल और त्रिलोचन पाल था।

महमूद_गजनवी 

_महमूद गजनवी सुबुक्तगीन का पुत्र था और अपने पिता की मौत के बाद 997 ई. में वह गजनी के सिंहासन पर बैठा ।

महमूद_गजनबी पहला शासक था जिसने सुल्तान की उपाधि धारण की थी । उसे यह उपाधि बगदाद के खलीफा से मिली थी । महमूद गजनबी ने भारत पर 17 बार आक्रमण किया था ।

  • इतिहासकार जाफर ने कहा है कि -महमूद गजनबी के आक्रमण का उद्देश्य इस्लाम का प्रचार नहीं बल्कि धन लूटना था ।
  • महमूद गजनबी के आक्रमण को उसके दरबारी इतिहासकार अल् -उत्बी ने जिहाद माना ।
  • महमूद गजनबी के सिक्कों पर अमीर महमूद अंकित था ।
  • बगदाद के खलीफा अल -कादिर -बिल्लाह ने महमूद को यमीन -उद् -दौला व अमीन -उल् -मिल्लत की उपाधि दी थी ।
  • यमीन -उद् -दौला – साम्राज्य का दाहिनी हाथ ।
  • अमीन -उल् -मिल्लत – मुस्लिमों का रक्षक ।
  • महमूद मुस्लिम राजाओं के खिलाफ भी लड़ा था ।

महमूद ने हिन्दुशाही शासकों के खिलाफ आक्रमण कर संघर्ष आरम्भ किया ।1001 में हिन्दुशाही शासक जयपाल को हराकर महमूद ने उसे बन्दी बना लिया, लेकिन बाद में छोड़ दिया ।

जयपाल के दिल में पराजय का अपमान इतना चुभ गया कि उसने अपने आपको जलती चिता में जला दिया । हिन्दुशाही राजधानी बैहिन्द (पेशावर के करीब )में महमूद व आनन्दपाल के बीच निर्णायक युद्ध हुआ ।महमूद के घुड़सवार धनुर्धरों के हमले ने शत्रुसेना को तितर-बितर कर दिया व जीत महमूद की हुई । महमूद ने स्वयं को बुतशिकन (मुर्तिभंजक )के रूप में भी प्रस्तुत किया ।

महमूद के कुछ आक्रमण 

  1. नगरकौट – 1006 ई.
  2. थानेश्वर – 1012 -13 ई.
  3. मथुरा, कन्नौज पर – 1016 -18 ई.

महमूद ने सबसे साहसिक व प्रबल आक्रमण 1018 में कन्नौज एवं 1025 में सोमनाथ पर किए ।गुजरात पर आक्रमण के समय वहाँ का शासक भीम प्रथम था ।अन्तिम आक्रमण जाटों पर 1027 ई. । महमूद की मौत के सैल्जुकों के शक्तिशाली साम्राज्य की स्थापना हुई ।

September 12, 2020

प्राचीन भारतीय वैज्ञानिक Ancient Indian Scientist

प्राचीन भारतीय वैज्ञानिक

Aryabhata ( आर्यभट्ट )

वैज्ञानिक

ये पांचवीं सदी के गणितज्ञ, खगोलशास्त्री, ज्योतिषी और भौतिक विज्ञानी थे। 23 वर्ष की उम्र में इन्होंने आर्यभट्टिया (Aryabhattiya) की रचना की, जो उनके समय के गणित का सार है।

सबसे पहली बार उन्होंने ही पाई (pi) का मान 3.1416 निकाला था। इन्होंने बताया कि शून्य केवल अंक नहीं बल्कि एक प्रतीक और अवधारणा है। वास्तव में शून्य के आविष्कार ने आर्यभट्ट को पृथ्वी और चंद्रमा के बीच सटीक दूरी पता लगाने में सक्षम बनाया था और शून्य की खोज से नकारात्मक अंकों के नए आयाम सामने आए।

इसके अलावा आर्यभट्ट ने विज्ञान के क्षेत्र में, खास तौर पर खगोलशास्त्र में बहुत योगदान दिया और इस वजह से खगोलशास्त्र के पिता के तौर पर जाने जाते हैं। जैसा कि हम सब जानते हैं कि प्राचीन भारत में, खोगलशास्त्र विज्ञान बहुत उन्नत था। खगोल नालंदा, जहाँ आर्यभट्ट ने पढ़ाई की थी, में बना प्रसिद्ध खगोल वैधशाला थी।

उन्होंने लोकप्रिय मत – हमारा ग्रह पृथ्वी ‘अचल’ यानि अगतिमान है, को भी खारिज कर दिया था। आर्यभट्ट ने अपने सिद्धांत में कहाँ कि “पृथ्वी गोल है और अपनी धुरी पर परिक्रमाकरती है।”

उन्होंने सूर्य का पूर्व से पश्चिम की ओर जाते दिखने की बात को भी उदाहरण के माध्यम से गलत साबित किया। जैसे जब कोई व्यक्ति नाव से यात्रा करता है, तो तट पर लगे वृक्ष दूसरी दिशा में चलते हुए दिखाई पड़ते हैं।

सूर्य एवं चंद्र ग्रहण की वैज्ञानिक व्याख्या भी उन्होंने की थी। तो, अब हम जानते हैं कि भारत द्वारा कक्षा में भेजे गए पहले उपग्रह का नाम क्यों आर्यभट्ट रखा गया था।

Mahavaracharya ( महावीराचार्य )

क्या यह अदभुत नहीं है कि जैन साहित्य में गणित का विस्तृत वर्णन मिलता है। (500 ई.पू. – 100 ई.पू.)। जैन गुरू द्विघात समीकरणों को हल
करना जानते थे। बेहद रोचक ढंग से उन्होंने भिन्न, बीजगणितीय समीकरण, श्रृंखला, सेट सिद्धांत, लघुगणक और घातांकों का भी वर्णन किया है।

महावीराचार्य 8वीं सदी के भारतीय गणितज्ञ (जैन) थे। ये गुलबर्गा के रहने वाले थे जिन्होंने बताया था कि नकारात्मक अंक का वर्गमूल नहीं होता। 850 ई.वीं में, जैन गुरु महावीराचार्य ने गणित सार संग्रह की रचना की थी। वर्तमान समय में अंकगणित पर लिखा गया यह पहला पाठ्य पुस्तक है।

पवालुरी संगन्ना ने सार संग्रह गणितम नाम से इसका तेलुगु में अनुवाद किया था। इन्होंने दी गई संख्याओं का लघुत्तमसमापवर्त (एलसीएम– लीस्ट कॉमन मल्टिपल) निकालने का तरीका भी बताया था। दुनिया में जॉन नेपियर ने एलसीएम को हल करने का तरीका बताया लेकिन भारतीय इसे पहले से ही जानते थे।

इन्होंने अंकगणितीय अनुक्रम के वर्ग की श्रृंखला के जोड़ और दीर्घवृत्त (ellipse) के क्षेत्रफल एवं परिधि के लिए प्रयोगसिद्ध नियम भी दिए। महान राष्ट्रकूट राजा अमोघवर्षा नरुपतुंगा ने इन्हें संरक्षण दिया था।

अद्भुत बात यह है कि अपने समय में उन्होंने समभुज, समद्विबाहु त्रिकोण, विषमकोण, वृत्त और अर्द्धवृत्त के कुछ नियम बताए थे और साथ ही चक्रीय चतुर्भुज के किनारों और विकर्ण के लिए समीकरण भी दिए थे।

Varahamihir ( वराहमिहिर )

इन्होंने जल विज्ञान, भूविज्ञान, गणित और पारिस्थितिकी के क्षेत्र में महान योगदान दिए। ये पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने दावा किया था कि दीमक और पौधे भूमिगत जल की उपस्थिति के संकेतक हो सकते हैं। दरअसल इन्होंने दीमकों (ऐसे कीड़े जो लकड़ी को बर्बाद कर देते हैं) के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी थी कि अपने घर की नमी बनाए रखने के लिए पानी लाने हेतु ये काफी गहराई में पानी के स्तर की सतह तक चले जाते हैं।

अपने बृहत्संहिता में इन्होंने भूकंप बादल सिद्धांत दिया जिसने विज्ञान जगत को अपनी ओर आकर्षित किया था। आर्यभट्ट और वराहमिहिर द्वारा ज्योतिष को विज्ञान के प्रकाश के तौर पर बेहद व्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत किया गया था। विक्रमादित्य के दरबार के नौ रत्नों में से एक वराहमिहिर भी थे।

वराहमिहिर द्वारा की जाने वाली भविष्यवाणियां इतनी सटीक होती थीं कि राजा विक्रमादित्य ने उन्हें ‘वराह’ की उपाधि से सम्मानित किया था।
विज्ञान के इतिहास में सबसे पहली बार इन्होंने ही दावा किया था कि कोई “बल” है जो गोलाकार पृथ्वी के वस्तुओं को आपस में बांधे रखता है। और अब इसे गुरुत्वाकर्षण कहते हैं।

इन्होंने यह भी कहा था कि चंद्रमा और ग्रह अपनी खुद की रौशनी से नहीं बल्कि सूर्य की रौशनी की वजह से चमकते हैं। इनके गणितीय कार्य में त्रिकोणमितीय सूत्रों की खोज भी शामिल थी। इसके अलावा, ये पहले गणितज्ञ थे जिन्होंने एक ऐसे संस्करण की खोज की थी जिसे आज की तारीख में पास्कल का त्रिकोण कहा जाता है। ये द्विपद गुणांक की गणना किया करते थे।

Charak ( चरक )

इन्हें प्राचीन भारतीय चिकित्साविज्ञान का पिता भी कहा जाता है। राजा कनिष्क के दरबार में ये राज वैद्य (शाही डॉक्टर) थे।

चिकित्सा पर इनकी उल्लेखनीय किताब है चरक संहिता। इसमें इन्होंने रोगों के विभिन्न विवरण के साथ उनके कारणों की पहचान एवं उपचार के तरीके बताए हैं।
पाचन, चयापचय और प्रतिरक्षा के बारे में बताने वाले ये पहले व्यक्ति थे।
इन्हें आनुवंशिकी की मूल बातें भी पता थीं।

Patanjali ( महर्षि पतंजलि )

इन्हें योग के पिता के तौर पर जाना जाता है। इन्होंने योग के 195 सूत्रों का संकलन किया था योग को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करने वाले ये पहले व्यक्ति थे।

पतंजलि के योग सूत्र में, ओम को भगवान के प्रतीक के तौर पर बोला जाता है। इन्होंने ओम को लौकिक ध्वनि बताया था। इन्होंने चिकित्सा पर किए काम को एक पुस्तक में संकलित किया और पाणिनी के व्याकरण पर इनके काम को महाभाष्य के नाम से जाना जाता है।

माना जाता है कि ये एक निबंधकार थे जिन्होंने प्राचीन भारतीय चिकित्सा प्रणाली यानि आयुर्वेद पर लिखा था। यहाँ तक की भारत के शास्त्रीय नर्तक उन्हें बुलावा भेजते और उनका सम्मान करते थे। ऐसा माना जाता है कि पतंजलि की जीव समाधि तिरुपट्टूर ब्रह्मपुरेश्वर मंदिर में है।

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September 12, 2020

प्राचीन भारत के साहित्य Religious literature source

प्राचीन भारत के साहित्य

धार्मिक साहित्य स्रोत

साहित्य

धार्मिक साहित्य के अन्तर्गत ब्राह्मण तथा ब्राह्मणेत्तर साहित्य की चर्चा की जाती है।

ब्राह्मण ग्रन्थों में – 

वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, पुराण, स्मृति ग्रन्थ आते हैं। ब्राह्मणेत्तर ग्रन्थों में जैन तथा बौद्ध ग्रन्थों को सम्मिलित किया जाता है।
ब्राह्मण धर्म ग्रंथ  –

 प्राचीन काल से ही भारत के धर्म प्रधान देश होने के कारण यहां प्रायः तीन धार्मिक धारायें- वैदिक, जैन एवं बौद्ध प्रवाहित हुईं। वैदिक धर्म ग्रन्थ को ब्राह्मण धर्म ग्रन्थ भी कहा जाता है।

ब्राह्मण धर्म – 

ग्रंथ के अन्तर्गत वेद, उपनिषद्, महाकाव्य तथा स्मृति ग्रंथों को शामिल किया जाता है।

वेद

वेद एक महत्त्वपूर्ण ब्राह्मण धर्म-ग्रंथ है। वेद शब्द का अर्थ ‘ज्ञान‘ महतज्ञान अर्थात ‘पवित्र एवं आध्यात्मिक ज्ञान‘ है। यह शब्द संस्कृत के ‘विद्‘ धातु से बना है जिसका अर्थ है जानना। वेदों के संकलनकर्ता ‘कृष्ण द्वैपायन’ थे। कृष्ण द्वैपायन को वेदों के पृथक्करण-व्यास के कारण ‘वेदव्यास’ की संज्ञा प्राप्त हुई।

वेदों से ही हमें आर्यो के विषय में प्रारम्भिक जानकारी मिलती है। कुछ लोग वेदों को अपौरुषेय अर्थात दैवकृत मानते हैं। वेदों की कुल संख्या चार है-

  • ऋग्वेद- यह ऋचाओं का संग्रह है।
  • सामवेद- यह ऋचाओं का संग्रह है।
  • यजुर्वेद- इसमें यागानुष्ठान के लिए विनियोग वाक्यों का समावेश है।
  • अथर्ववेद- यह तंत्र-मंत्रों का संग्रह है।

उपनिषद

उपनिषदों की कुल संख्या 108 है। भारत का प्रसिद्ध आदर्श वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ मुण्डोपनिषद से लिया गया है। उपनिषद गद्य और पद्य दोनों में हैं, जिसमें प्रश्न, माण्डूक्य, केन, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक और कौषीतकि उपनिषद गद्य में हैं तथा केन, ईश, कठ और श्वेताश्वतर उपनिषद पद्य में हैं।

वेदांग

वेदांग शब्द से अभिप्राय है- ‘जिसके द्वारा किसी वस्तु के स्वरूप को समझने में सहायता मिले’। वेदांगो की कुल संख्या 6 है, जो इस प्रकार है-

  1. शिक्षा
  2. कल्प
  3. व्याकरण
  4. निरूक्त
  5. छन्द
  6. ज्योतिष

धर्मशास्त्र

ब्राह्मण ग्रन्थों में धर्मशास्त्र का महत्त्वपूर्ण स्थान है। धर्मशास्त्र में चार साहित्य आते हैं-

  1. धर्म सूत्र
  2. स्मृति,
  3. टीका
  4. निबन्ध

स्मृतियाँ

स्मृतियों को ‘धर्म शास्त्र’ भी कहा जाता है।’स्मृतियों का उदय सूत्रों को बाद हुआ। मनुष्य के पूरे जीवन से सम्बधित अनेक क्रिया-कलापों के बारे में असंख्य विधि-निषेधों की जानकारी इन स्मृतियों से मिलती है।

सम्भवतः मनुस्मृति (लगभग 200 ई.पूर्व. से 100 ई. मध्य) एवं याज्ञवल्क्य स्मृति सबसे प्राचीन हैं। उस समय के अन्य महत्त्वपूर्ण स्मृतिकार थे- नारद, पराशर, बृहस्पति, कात्यायन, गौतम, संवर्त, हरीत, अंगिरा आदि, जिनका समय सम्भवतः 100 ई. से लेकर 600 ई. तक था। मनुस्मृति से

उस समय केभारत के बारे में राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक जानकारी मिलती है। 

नारद स्मृति से गुप्त वंश के संदर्भ में जानकारी मिलती है। मेधातिथि, मारुचि, कुल्लूक भट्ट, गोविन्दराज आदि टीकाकारों ने ‘मनुस्मृति’ पर, जबकि विश्वरूप, अपरार्क, विज्ञानेश्वर आदि ने ‘याज्ञवल्क्य स्मृति’ पर भाष्य लिखे हैं।

महाकाव्य

‘रामायण’ एवं ‘महाभारत’, भारत के दो सर्वाधिक प्राचीन महाकाव्य हैं।  महाकाव्यों का रचनाकाल चौथी शती ई.पू. से चौथी शती ई. के मध्य माना गया है।