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September 9, 2020

September 9, 2020

मार्योत्तर काल क्या हे व इसके बारे में जाने?? Mauryottar Period

मार्योत्तर काल Mauryottar Period 

1. यवन

मार्योत्तर काल

मौर्योत्तर काल में भारत पर सबसे पहला विदेशी आक्रमण बैक्ट्रिया के ग्रीको ने किया इन्हें हिंद- यवन या इंडोग्रीक के नाम से जाना जाता है इनके शासकों में मिनांडर सर्वाधिक महत्वपूर्ण रहा है उसकी राजधानी साकाल थी

प्रसिद्ध बौद्ध दार्शनिक नागसेन के साथ मिनांडर (मिलिंद)के द्वारा की गई वाद विवाद का विस्तृत विवरण मिलिंदपन्हो नामक ग्रंथ पर मिलता है इंडो-ग्रीक शासकों ने भारत में सर्वप्रथम सोने के सिक्के तथा लेखयुक्त सिक्के जारी किए थे   विभिन्न ग्रहों के नाम, नक्षत्रों के आधार पर भविष्य बताने की कला, संवत तथा सप्ताह के 7 दिनों का विभाजन यूनानियों ने भारत को सिखाया था

दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण है।

प्रसिद्ध यवन शासक मेनान्डर 

भारत में अपने शासन एवं प्रभाव की जुड़े जमाने वाले यवन शासकों में मेनान्डर का (180 -145 ई. पूर्व ) नाम उल्लेखनीय है  मेनान्डर शक्तिशाली, न्यायपरायण, उदार और सहिष्णु  शासक था मेनान्डर के साम्राज्य का विस्तार उत्तर -पश्चिम सीमा प्रान्त, पंजाब, सौराष्ट्र और सुदूर पश्चिम तक था 

मेनान्डर ने पाटलिपुत्र पर अधिकार करने के उद्देश्य से राजपूताना और उसके बाद मथुरा पर पर तीव्र आक्रमण किया  मेनान्डर ने नागसेन बौद्ध भिक्षु के प्रभाव से बौद्ध धर्म ग्रहण किया था मिलिन्दपण्हो जो बौद्ध भिक्षु नागसेन व मेनान्डर के बीच वार्तालाप से संबंधित ग्रन्थ है इसका चीनी भाषा में अनुवाद (317 -420 ई. )नागसेनसूत्रनाम से हुआ था 

मिलिन्दपण्हो का महत्व बौद्ध धर्म दर्शन, साहित्य तथा इतिहास की दृष्टि से है सीमाप्रान्त में प्राप्त खरोष्ठी भाषा के अभिलेखों में मेनान्डर का नाम मिनद्र मिलता है  मेनान्डर के सिक्के काबुल से दक्षिण भारत तथा पश्चिम से मथुरा, कौशांबी और वाराणसी आदि अनेक अंचलों से मिले हैं 

2. शक

प्रथम शक राजा मौस अथवा मोग था 57 या 58 ई.पू में उज्जैन के एक शासक विक्रमादित्य ने शकों को हराया जिसके उपलक्ष्य मे विक्रम संवत शुरू किया

शक मूलतः एशिया के निवासी थे भारत में सबसे प्रसिद्ध शक शासक रुद्रदामन था वह उज्जैन का क्षत्रप था जूनागढ़ से प्राप्त उन का अभिलेख संस्कृत भाषा का पहला अभिलेख है रुद्रदामन प्रथम ने चंद्रगुप्त मौर्य के समय निर्मित सुदर्शन झील का पुनरुद्धार करवाया था रुद्रदामन के समय दूसरी बार ठीक कराई गयी. तीसरी मरम्मत स्कंदगुप्त के समय में हुयी

3. पहलव (पार्थियन )

पहलव मूर्ति पार्थिया के निवासी थे पहलवो का सर्वाधिक प्रसिद्ध शासक गोंदोफ़र्निस था उस के शासनकाल में ईसाई धर्म -प्रचारक सेंट टॉमस भारत आया था

4. कुषाण

कुषाण यू-ची जनजाति से संबंधित है वे पश्चिमी चीन से भारत आए थे  कनिष्क कुषाण वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक था जिसने 78ई में शक संवत को प्रचलित किया इसने पुरुषपुर (पेशावर) को अपनी राजधानी बनाया मथुरा कनिष्क की द्वितीय राजधानी थी

कश्मीर में कनिष्क ने कनिष्कपुर नामक नगर की स्थापना इसके शासनकाल में चौथी बौद्ध संगीति का आयोजन कुंडल वन कश्मीर में हुआ

मार्योत्तर काल मार्योत्तर काल मार्योत्तर काल

September 9, 2020

वर्धन वंश क्या हे इसके बारे में जाने?? Vardhan Dynasty

वर्धन_वंश

वर्धन वंश

वर्धन वंश की नींव छठी शती के प्रारम्भ में पुष्यभूतिवर्धन ने थानेश्वर में की थी। 

इन्होंने गुप्तों के बाद उत्तर भारत में सबसे विशाल राजवंश की स्थापना की।  

इस वंश का पाँचवा और शक्तिशाली राजा प्रभाकरनवर्धन हुआ था। उसकी उपाधि ‘परम भट्टारक महाराजाधिराज’ थी।

बाणभट्ट द्वारा रचित ‘हर्षचरित’ से पता चलता है कि इस शासक ने सिंध, गुजरात और मालवा पर अधिकार कर लिया था। राजा प्रभाकरवर्धन के दो पुत्र राज्यवर्धन, हर्षवर्धन और एक पुत्री राज्यश्री थी। राज्यश्री का विवाह कन्नौज के मौखरी वंश के शासक गृहवर्मन से हुआ था।

हेनसांग तथा आर्य मंजुश्रीमूलकल्प के अनुसार वर्धन वंश (पुष्यभूति वंश) वैश्य जाति का था। पुष्यभूति वंश में तीन प्रसिद्ध शासक हुए प्रभाकर वर्धन और उसके दो पुत्र राज्यवर्धन और हर्षवर्धन।

हर्षचरित में प्रभाकर वर्धन को हूणहरिणकेसरी कहा है अथार्थ प्रभाकर वर्धन हूण रूपी हिरण के लिए सिंह के समान थे। सर्वप्रथम प्रभाकर वर्धन नहीं इस वंश में हूणों को परास्त किया।

राज्यवर्धन की गौड़ के राजा शशांक ने हत्या कर दी। हर्ष को कुन्तल नामक दूत द्वारा अपने भाई राज्यवर्धन की हत्या का समाचार मिला। हर्षचरित में लिखा है कि हर्ष ने यह प्रतिज्ञा ली कि मैं कुछ दिनों के भीतर ही पृथ्वी को गौड़ विहीन न कर दूं तो पतंगे की जलती हुई चिता में प्रवेश कर अपने प्राण दे दूंगा।

हर्ष का प्रशासन

अधिकारी कार्य

1 अवंति – युद्ध और शांति का अधिकारी,विदेश मंत्री
2.सिंहनाद – सेनापति
3.कुंतल – अश्वसेना का प्रधान
4 स्कंदगुप्त – हस्ति सेना का प्रधान
5 भणडी- प्रधान सचिव

चाट और भाट पुलिस अधिकारी थे हर्ष के प्रशासन व पदाधिकारियों के नाम बंशखेड़ा अभिलेख में मिलते हैं

Q w e r t y u i I o p l k j h g f d sa z x c v b n m m n h c v g h j k u bh g b h

September 9, 2020

सिकन्दर का भारत अभियान Sikandar India Campaign

सिकन्दर का भारत अभियान

सिकन्दर

सिकंदर का जन्म 356 ईस्वी पूर्व में मेसोडोनिया(मकदूनिया) के शासक फिलिप के घर हुआ था मेसोडोनिया(मकदूनिया) के क्षत्रप फिलिप द्वितीय का लड़का तथा अरस्तू का शिष्य सिकन्दर महान ने अपनी विश्व विजय के लिए रणनीति के तहत 20 वर्ष की अल्पायु में ईरान विजय के लिए 330 ईसा पूर्व में निकला और 327 ईसा पूर्व पूर्वी ईरान पर कब्जा कर लिया ।

पूर्वी ईरान को जीतने के बाद सिकन्दर ने अफगानिस्तान पर चढ़ाई की और उसे जीता तथा कंधार में सिकन्दरिया नामक नगर की स्थापना की । अगले वर्ष अपनी विशाल सेना लेकर काबुल की घाटी में आ पहुंचा ।यहाँ उसने अपनी सेना को दो भागों में बाँट दिया ।स्वयं सिकन्दर विभक्त सेना के एक भाग के साथ बल्ख (बैक्ट्रिया )तक जा पहुंचा तथा उन सभी एरिया को जीता ।सेना के दूसरे भाग का नेतृत्व अपना सेनापति हेफिस्तियान और परिडिक्स के नेतृत्व में सिंध पर विजय करने के लिए भेजा ।

326 ईसा पूर्व बैक्ट्रिया से वह भारत विजय के अभियान पर निकला और काबुल होते हुए हिन्दुकुश पर्वत को पारकर सिन्धु नदी के तट पर पहुँचा ।यहाँ पर उसने सेना को दो भाग में बाट दिया ।स्वयं विभक्त सेना के एक भाग को लेकर सर्वप्रथम पर्वतीय जाति अश्वक /अश्मक पर आक्रमण किया ।इस आक्रमण में सिकन्दर घायल हुए प्रतिशोध उसने वहाँ जजनसंहार किया ।अश्वक राजा के मरने के बाद रानी ने मोर्चा संभाला और उसकी देखा-देखी में पर्वतीय स्त्रियां लड़ाई में कूद पड़ी ।कई दिनों के विस्तारपूर्वक प्रतिरोध के बाद अस्सक की राजधानी मसग का पतन हो गया ।

यूनानी लेखक ‘ अस्सक ‘के सुदृढ दुर्ग आरनास प्रकार कब्जे को सिकन्दर के भारतीय अभियान का सबसे बड़ा करिश्मा बताते हैं

सिकंदर ने अपने विश्व विजय की योजना के अंतर्गत 326 ईसवी पूर्व में भारत पर आक्रमण किया था  इस समय भारत के पश्चिमोत्तर भारत की स्थिति 28 राज्यों में विभाजित थी ( पुरु, अभिसार, पूर्वी व पश्चिमी गांधार, कंठ, सौभती, मालव, क्षुद्रक, अंबष्ट, भद्र, ग्लौगनिकाय आदि )

इरानियों के माध्यम से यूनानियों को भारत की अपार सम्पदा की जानकारी हुई जिसकी परिणति सिकन्दर के आक्रमण में हुई । भारत पर सिकन्दर का आक्रमण दूसरा विदेशी व पहला यूरोपीय आक्रमण था ।

तक्षशिला के शासक आम्भी ने बिना लड़े आत्मसमर्पण कर दिया व सिकंदर को सहयोग दिया। आंम्भी के अलावा शशीगुप्त पुशकरावती एवं संजय नामक राजाओं ने भी सिकंदर का साथ दिया।

सबसे पहले 326 ई पू में सिकंदर एवं पोरस के बीच झेलम नदी के किनारे भीषण युद्ध हुआ जिसमें पोरस की हार हुई इस युद्ध को वितस्ता का युद्ध या हाईडेस्पीज का युद्ध के नाम से जाना जाता है तथा इस युद्ध में सिकंदर पोरस की वीरता से प्रभावित होकर उसने उसका राज्य वापस दे दिया था पोरस का राज्य झेलम और चिनाब नदियों के बीच था

सिकंदर के सामने जब पोरस को बंदी बनाकर लाया गया तो सिकंदर ने पूछा कि पोरस अपने साथ कैसा बर्ताव चाहते हो तो पोरस ने जवाब दिया “जैसा एक राजा दूसरे राजा के साथ करता है”।  सिकंदर ने इस उत्तर से खुश होकर पोरस का राज्य लौटा दिया।

निसा के गणतांत्रिक राज्य ने बिना युद्ध के ही सिकंदर की अधीनता स्वीकार कर ली व अपने को यूनानियों का वंशज बताया।

सिकंदर के यूनानी सेना ने कुछ महामारी एवं प्राकृतिक आपदाओं को देखते हुए व्यास नदी के आगे जाने से इंकार कर के विद्रोह कर दिया था इस समय मगध नंद वंश के राजा धनानंद के अधीन था और सेना के विद्रोह को देखते हुए सिकंदर को वापस लौटना पड़ा

कोनोस नामक सेनापति के सुझाव पर सिकंदर ने वापस लौटने का निर्णय लिया।  सिकंदर ने वापस लौटने से पूर्व यूनानी देवताओं की स्मृति में व्यास नदी के तट पर विजय सीमा अंकित करने के लिए 12 विशाल वेदियां स्थापित की तथा उनकी विधिवत पूजा की। सिकंदर भारतीय दार्शनिक कालानास को अपने साथ ले गया। मेगस्थनीज के अनुसार मंडनिस नामक दार्शनिक ने सिकंदर को अपने ज्ञान से प्रभावित किया

सिकंदर ने 2 नगरों की स्थापना की थी पहला नगर निकैया (विजयनगर) अपनी जीत के उपलक्ष में तथा झेलम नदी के तट पर दूसरा नगर अपने प्रिय घोड़े बुकफेला नाम पर बसाया। सिकंदर ने विजित भारतीयों का क्षत्रप अपने सेनापति फिलिप को बनाया। लौटते समय 323 ईसापूर्व बेबीलोन में सिकंदर का मस्तिष्क ज्वर के कारण निधन हो गया

सिकन्दर अकेला इतिहास पुरूष है जिसका जन्म, मरण व दफन तीन अलग – अलग महादेशों में हुआ ।

जन्म – मकदूनिया -यूरोप -356 ईसा पूर्व
मरण – बेबीलोनिया -एशिया -323 ईसा पूर्व
दफन – अफ्रीका – सिकन्दरिया -323 ईसा पूर्व

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय स्रोतों में सिकंदर के आक्रमण का कोई उल्लेख नहीं मिलता है।

? सिकंदर के आक्रमण का भारत पर प्रभाव ?

1⃣ इसके आक्रमण से भारत में राजनीतिक एकता की स्थापना हुई जिसके अंतर्गत पश्चिमोत्तर उत्तर भारत के छोटे छोटे राज्य का विलय हो गया और 3 प्रांतों का गठन हुआ

2⃣ भारतीय इतिहास के तिथिक्रम में सहायता मिली क्योंकि यूनानी साथ इतिहासकारों ने सिकंदर के आक्रमण की सही तिथि दी थी

3⃣ भारत में यूनानी राज्यों की स्थापना हुई इसके अंतर्गत पश्चिमी पंजाब सिंध आदि सीमावर्ती प्रदेशों में सम्मिलित हुए

4⃣ भारत और यूनान के बीच व्यापारिक मार्ग खुल गया इस आक्रमण से 1 जलमार्ग तथा 3 स्थलमार्ग खुले

5⃣ यूनानी इतिहासकारों ने भारत का भौगोलिक विवरण बनाया

6⃣ शासन व्यवस्था में क्षत्रप शासन प्रणाली की स्थापना हुई

7⃣ भारत में यूनानी प्रभाव वाले उलूक शैली के सिक्कों का ज्ञान बढ़ा भारत में यूनानी शैली की मूर्तियों का निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ

8⃣ पुस्तक, कलम, फलक, सुरंग यवनिक आदि संस्कृत भाषा का शामिल किए गए

9⃣ चिकित्सा पद्धति यूनानियों से सीखने को मिली जो बहुत कारगर साबित हुई

? यूनानी ज्योतिष के ज्ञाता थे उनसे राशिचक्र, होरोस्कोप का ज्ञान, रोमक एवं पोलीस सिद्धांतों का ज्ञान सीखने को मिला