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September 6, 2020

September 6, 2020

सम्प्रभुता क्या है??? What is Sovereignty

Sovereignty सम्प्रभुता

सम्प्रभुता

प्रभुसत्ता को अंग्रेजी में (sovereignty) कहते हैं soveregnty शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा के superanus शब्द से हुई है । जिसका अर्थ है सर्वोच्च सत्ता।

जैसा कि डॉ.गारनर मैं संप्रभुता को राज्य का महत्वपूर्ण तत्व माना है । संप्रभुता किसी राज्य की सर्वोच्च सत्ता को कहा जाता है।

संप्रभुता शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग फ्रांसीसी विचारक बोंदा ने 1756 में अपनी पुस्तक six book concerning republicमे किया

अतः इसका उद्भव 16 शताब्दी में माना जाता है।

संप्रभुता के इतिहास पर नजर डालें तो सोलहवीं सदी में बोदा 17 सदी में ग्रेसियस और हाब्स 18 वीं शताब्दी में रूसो

19वीं शताब्दी में ऑस्टिन ने स्पष्ट रूप से इसका प्रतिपादन किया ।

संप्रभुता कीमहत्वपूर्ण परिभाषा

विल्सन -“ प्रभुसत्ता कानूनों का निर्माण करने तथा उन्हें लागू करने वाली प्रतिदिन क्रियाशील सकती है”

लास्की – ” राज्य की प्रभुसत्ता अपने क्षेत्र के भीतर सभी व्यक्तियों एवं समय को आदेश देती है यह उनमें से किसी से आदेश नहीं लेती इसकी इच्छा किसी प्रकार की वैधानिक सीमाओं के अधीन नहीं है””

बोदा –“संप्रभुता नागरिकों और प्रजाजनों पर वह सर्वोच्च शक्ति है जो विधि द्वारा नियंत्रित नहीं है””।

जैसा की विलोबी भी ने कहा है –“संप्रभुता राज्य की सर्वोच्च इच्छा है””!

बरगेस के अनुसार–“” संप्रभुता राज्य के व्यक्तियों और समुदायों पर भौतिक निरंकुश और असीमित शक्ति है”!

रुसो के अनुसार-” सार्वजनिक संकल्प ही संप्रभु है”!

लास्की –“राजनीतिक शास्त्र के लिए यह अस्थाई रूप से लाभदायक होगा यदि संपूर्णता के सिद्धांत को इस से निकाल दिया जाए”

सम्प्रभुता क्या है??? What is Sovereignty सम्प्रभुता

Q w e r t y u i o p a s d f g h j k l m n b v c x z q w e r t y u i o p a s d f g h j k l m n b v c x z z x c v b n m l k j h g f d s a

September 6, 2020

बहुलवाद क्या है व इसके कार्य?? Pluralism

Pluralism बहुलवाद

20 वी शताब्दी में बहुलवाद का उदय सम्प्रभुता के एकलवादी सिद्धान्त के विरूद्ध प्रतिक्रियास्वरूप हुआ। बहुलवाद एक प्रतिकियास्वरूप सिद्धान्त है। बहुलवाद वह सिद्धान्त है जिसके अनुसार समाज मे आज्ञापालन कराने की शक्ति एक ही जगह केंद्रित नही होती,बल्कि वह अनेक समूहों में बिखर जाती है।ये समूह मानव की भिन्न भिन्न आवश्यकताए पूरी करने का दावा करते हैं।

बहुलवाद को विचारधारा के रूप में स्थापित करने का श्रेय जर्मन समाजशास्त्री गीयर्क तथा बिर्टिश विद्वान मेटलेंड को है, जिन्हें आधुनिक राजनीतिक बहुलवाद का जनक कहा जाता है।

सम्प्रभुता के बहुलवादी सिद्धान्त के मुख्य समर्थक लास्की, बार्कर, लिंडसे, क्रेब, डीगवी, मिस फॉलेट आदि है।

बहुलवाद_ इस तथ्य में विश्वास करता है कि मनुष्य के सर्वागीण विकास में सामाजिक स्तर पर विकसित अनेक प्रकार के संघो का अपना विशेष योगदान होता है।ये संघ समान रूप से प्रभावशाली तथा एक दूसरे से स्वतंत्र होते है तथा इनमे कोई भी संघ दूसरों से अधिक महत्वपूर्ण या सर्वोच्च नही होता ।बहुलवादी राज्य को भी अन्य सामाजिक संघो की तरह एक संघ मानते है।

लास्की के शब्दों में- चूँकि समाज का स्वरूप संघीय है, अतः सत्ता का स्वरूप भी संघीय होना चाहिये

एक राजनीतिक मान्यता के रुप में:- समाज में किसी एक मूल्य,साध्य या ध्येय को सर्वोपरि मानकर सब मनुष्यों को उसके अनुरूप ढालने का प्रयत्न उचित नही है,बल्कि भिन्न-2 मूल्यों और हितों के आधार पर स्वायत्त समूहों के गठन की पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिये और सब व्यक्तियों को अपने-2 विवेक के अनुसार इनमें से किसी भी मूल्य या ध्येय के साथ जुड़कर उसे बढावा देने की पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए । यह बहुलवाद_ का दार्शनिक आधार है ।

राजनीतिक बहुलवाद:- बहुलवाद_ समाज ऐसा समाज है जिसमें शक्ति एवं सत्ता एक ही जगह केन्द्रित नही होती है,बल्कि सामाजिक जीवन के अनेक केन्द्रों में फ़ैली हुई होती है ।

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September 6, 2020

सरकार के अंग क्या क्या है ??Government’s Part

कार्यपालिका, व्यवस्थापिका एवं न्यायपालिका

सरकार के अंग

व्यवस्थापिका

सरकार राज्य का एक अनिवार्य तत्व है।सरकार के रूप में ही राज्य एवं उसकी प्रभुत्व शक्ति को मूर्त रूप मिलता है। इसे राज्य की आत्मा कहा जाता है। सरकार राज्य का वह यन्त्र है जिसके ऊपर राज्य के कानून बनाने ,उन्हें क्रियान्वित करने तथा उसकी व्याख्या करने का दायित्व है।

गार्नर का कथन है- “सरकार एक ऐसा संगठन है जिसके द्वारा राज्य अपनी इच्छा को प्रकट करता है, अपने आदेशो को जारी करता है तथा अपने कार्यो को करता है ।”

  • कानून बनाना –व्यवस्थापिका
  • कानून को लागू करना–कार्यपालिका
  • कानून की व्याख्या करना–न्यायपालिका

सरकार के कार्यो का यह विभाजन शक्ति-पृथ्थकरण सिद्धान्त के आधार पर किया गया है। शक्ति-पृथ्थकरण का आधार संरचनात्मक है।व्यवस्थापिका को राष्ट्र का दर्पण,जन इच्छा का मूर्त रूप, शिकायतों की समिति कहा है। इंग्लैंड और भारत मे व्यवस्थापिका को संसद कहा जाता है।

जापान में डायट, अमेरिका में कांग्रेस, चीन में राष्ट्रीय जनवादी कांग्रेस, स्विट्जरलैंड में राष्ट्रीय सभा कहा जाता है।

व्यवस्थापिका के कार्य व शक्तियां

  • कानून का निर्माण
  • कार्यपालिका पर नियंत्रण
  • वित्त पर नियंत्रण
  • न्यायिक कार्य
  • निर्वाचन सम्बंधित कार्य
  • संविधान में संशोधन करना
  • विदेश नीति पर नियंत्रण
  • सार्वजनिक शिकायतों की अभिव्यक्ति का मंच

न्यापालिका 

भारत में उच्च न्यायालय संस्था का सर्वप्रथम गठन सन 1862 में हुआ जब कलकत्ता, बम्बई, मद्रास उच्च न्यायालयों की स्थापना हुई। सन 1866 में चौथे उच्च न्यायालय की स्थापना इलाहाबाद में हुई।

भारत के संविधान में प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय की व्यवस्था की गई है लेकिन 7 वें संशोधन अधिनियम अधिनियम 1956 में संसद को अधिकार दिया गया कि वह दो या दो से अधिक राज्यों एवं एक संघ राज्य क्षेत्र के लिए एक साझा उच्च न्यायालय की स्थापना कर सकती है।

इस समय देश में 24 उच्च न्यायालय हैं ( सन 2013 में तीन उत्तर पूर्वी राज्यों मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा मैं अलग उच्च न्यायालयों की स्थापना के कारण है इनकी संख्या 24 हो गई )। इनमें से तीन साझा उच्च न्यायालय हैं। केवल दिल्ली ऐसा संघ राज्य क्षेत्र है जिसका अपना उच्च न्यायालय ( 1966 से ) है। दिल्ली के अलावा अन्य संघ राज्य क्षेत्र विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों के न्यायिक क्षेत्र में आते हैं। ?

संसद एक उच्च न्यायालय के न्यायिक क्षेत्र का विस्तार, किसी संघ राज्य क्षेत्र में कर सकती है अथवा किसी संघ राज्य क्षेत्र को एक उच्च न्यायालय के न्यायिक क्षेत्र से बाहर कर सकती है।

संविधान के भाग 6 में अनुच्छेद 214 से 231 तक न्यायालयों के गठन, स्वतंत्रता, न्यायिक क्षेत्र, शक्तियां, प्रक्रिया आदि के बारे में बताया गया है।

उच्च न्यायालय से सम्बंधित अनुच्छेद (अनुच्छेद 214- 232) 

  • अनु. 214- राज्यों के लिए उच्च न्यायालय
  • अनु. 215- उच्च न्यायालय अभिलेखों के न्यायालय के रूप में
  • अनु. 216- उच्च न्यायालय का गठन
  • अनू. 217- उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद के लिए नियुक्ति तथा दशाएं
  • अनु. 218- उच्च न्यायालय में उच्चतम न्यायालय से संबंधित कतिपय प्रावधानों का लागू होना
  • अनु. 219- उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का शपथ ग्रहण
  • अनु. 220- स्थायी न्यायाधीश बहाल होने के बाद प्रैक्टिस पर प्रतिबंध
  • अनु. 221- न्यायाधीशों का वेतन इत्यादि
  • अनु. 222- किसी न्यायाधीश का एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरण
  • अनु. 223- कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति
  • अनुच्छेद 224- अतिरिक्त एवं कार्यवाहक न्यायाधीशों की नियुक्ति