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September 3, 2020

September 3, 2020

संघीय न्यायपालिका & राज्य न्यायपालिका Federal Judiciary

संघीय न्यायपालिका & राज्य न्यायपालिका

Federal Judiciary and State Judiciary ( संघीय न्यायपालिका & राज्य न्यायपालिका )

संघीय न्यापालिका ( Federal Judiciary  )

न्यायपालिका सरकार का महत्वपूर्ण अंग है। सरकार का स्वरूप चाहे कोई भी हो, न्यायपालिका की व्यवस्था किसी-न-किसी रूप में अवश्य की जाती है। संघीय शासन प्रणाली में स्वतंत्र तथा निष्पक्ष न्यायपालिका का होना अनिवार्य है

क्योंकि शक्तियों के विभाजन के कारण संघ तथा राज्यों में प्रायः विवाद उत्पन्न होते रहते हैं। इन विवादों का निपटारा करने तथा संविधान की व्याख्या करने के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका का होना आवश्यक है।

भारत में संघीय शासन प्रणाली की व्यवस्था होने के कारण संविधान के अंतर्गत स्वतंत्र न्यायपालिका की व्यवस्था की गई है। भारत में संघात्मक शासन प्रणाली है परंतु संघात्मक सिद्धांतों के अनुसार केंद्र तथा राज्यों में पृथक्-पृथक् न्याय प्रबंध नहीं है बल्कि एकात्मक न्याय प्रणाली की व्यवस्था की गई है।

राज्यों में उच्च न्यायालय एवं अधीनस्थ न्यायालय हैं (अनुच्छेद-233-237)। राज्यों के अधीनस्थ न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध उच्च न्यायालयों में अपील की जातीहै और उच्च न्यायालय के फैसले के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है।

सर्वोच्च न्यायालय ( Supreme Court )

उच्चतम न्यायालय देश का सर्वोच्च न्यायालय है। इसके द्वारा दिये गये निर्णय अंतिम होते है तथा इन निर्णयों के विरुद्ध किसी और न्यायालय में अपील नहीं की जा सकती है।

संविधान के अनुच्छेद 124 से 147 तक के अनुच्छेदों का संबंध सर्वोच्च न्यायालय से है। संविधान के अनुच्छेद 124(1) में सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था की गई है।

1950 से 1973 तक व्यवहार मे यह था कि उच्चतम न्यायालय में वरिष्ठतम न्यायाधीश को बतौर मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया जाता था। इस व्यवस्था का 1973 में तब हनन हुआ जब ए. एन.राय को तीन वरिष्ठतम न्यायाधीश से ऊपर भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया गया।
दोबारा 1977 में एम.यू.बेग को वरिष्ठतम व्यक्ति के ऊपर बतौर मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया।

सरकार के इस निर्णय की स्वतंत्रता को उच्चतम न्यायालय ने दूसरे न्यायाधीश मामले 1993 में कम किया। इसमें उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश को ही भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया जाना चाहिए

संगठन

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(1) के अनुसार प्रारम्भ में सर्वोच्च न्यायालय के लिएएक मुख्य न्यायाधीश तथा सात अन्य न्यायाधीश निश्चित किये गये थे परंतु इसी अनुच्छेद में संसद को न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की शक्ति प्रदान की गई है।

उच्चतम न्यायालय संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों के व्यवहार एवं आचरण की जांच करता है उस संदर्भ में जिसे राष्ट्रपति द्वारा निर्मित किया गया है यदि यह उन्हें दुर्व्यवहार का दोषी पाते हैं तो राष्ट्रपति से उनको हटाने की सिफारिश कर सकता है उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गई सलाह को मानने के लिए राष्ट्रपति बाध्य है

उच्चतम न्यायालय के पास न्यायालय की अवमानना पर दंडित करने का अधिकार है इसमें 6 वर्ष के लिए सामान्य जेल या ₹2000 तक अर्थदंड या दोनों शामिल है 1991 में उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी कि दंड देने की शक्ति ना केवल उच्चतम न्यायालय में नहीं थे बल्कि ऐसा ही अधिकार उच्च न्यायालयों अधीनस्थ न्यायालयों पंचाटों को भी प्राप्त है

संविधान में उच्चतम न्यायालय के विपरीत प्रख्यात न्यायविदों को उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त करने का कोई प्रावधान नहीं है

?अनुच्छेद124 उच्चतम न्यायालय की स्थापना और गठन

?अनुच्छेद 125 न्यायाधीशों के वेतन आदि

?अनुच्छेद 126 कार्यकारी मुख्य न्यायमूर्ति की नियुक्ति

?अनुच्छेद 127 तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति

?अनुच्छेद 128 उच्चतम न्यायालय की बैठकों में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की उपस्थिति

?अनुच्छेद 129 उच्चतम न्यायालय का अभिलेख न्यायालय होना

?अनुच्छेद 130 उच्चतम न्यायालय का स्थान

?अनुच्छेद 131 उच्चतम न्यायालय की आरंभिक अधिकारिता131क[निरसन]

?अनुच्छेद 132 कुछ मामलों में उच्च न्यायालयों से अपीलों में उच्चतम न्यायालय की अपीली अधिकारिता

?अनुच्छेद 133 उच्च न्यायालयों में सिविल विषयों सेसंबंधित अपीलों में उच्चतम न्यायालय की अपीली अधिकारिता

?अनुच्छेद 134 दांडिक विषयों में उच्चतम न्यायालय की अपीली अधिकारिता

?अनुच्छेद 134क उच्चतम न्यायालय में अपील के लिए प्रमाण पत्र

?अनुच्छेद 135 विद्यमान विधि के अधीन फेडरल न्यायालय की अधिकारिता और शक्तियों का उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रयोक्तव्य होना

?अनुच्छेद 136 अपील के लिए उच्चतम न्यायालय की विशेष इजाजत

?अनुच्छेद 137 निर्णयों या आदेशों का उच्चतम न्यायालयों द्वारा पुनर्विलोकन

?अनुच्छेद 138 उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता की वृद्धि

?अनुच्छेद 139 कुछ रिट निकालने की शक्तियों का उच्चतम न्यायालय को प्रदत्त किया जाना

?अनुच्छेद 139क कुछ मामलों का अंतरण

?अनुच्छेद 140 उच्चतम न्यायालय की आनुषंगिक शक्तिया

?अनुच्छेद 141 उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि का सभी न्यायालयों पर आबद्धकर होना

?अनुच्छेद 142 उच्चतम न्यायालय की डिक्रियों और आदेशों का प्रवर्तन और प्रकटीकरण आदि के बारे में आदेश

?अनुच्छेद 143 उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की राष्ट्रपति की शक्ति

?अनुच्छेद 144 सिविल और न्यायिक प्राधिकारियों द्वारा उच्चतम न्यायालय144क[निरसन]

?अनुच्छेद 145 न्यायालय के नियम आदि

?अनुच्छेद 146 उच्चतम न्यायालय के अधिकारी और सेवक तथा व्यय

?अनुच्छेद 147 निर्वाचन आदि

September 3, 2020

स्थानीय स्वायत्त शासन Local Autonomous Government

स्थानीय स्वायत्त शासन

स्थानीय स्वायत्त शासन

‘स्थानीय स्वशासन एक ऐसा शासन है, जो अपने सीमित क्षेत्र में प्रदत्त अधिकारों का उपयोग करता हो।’’ -जी. डी. एच कोल

भारत एक विशाल जनसंख्या वाला लोक तांत्रिक देश है।  लोकतंत्र की मूलभूत मान्यता है कि सर्वोच्च शक्ति जनता में होनी चाहिए । सभी ब्यिकृ इस व्यवस्था से प्रत्यक्षत: जुडंकर शासन कार्य से सम्बद्ध हो सके

इस प्रकार का अवसर स्थानीय स्वशासन ब्यवस्था द्वारा संभव हो सकता है। स्थानीय स्वशासन जनता द्वारा शासन स्थानीय स्वशासन कहलाता है। स्थानीय स्वशासन के दो क्षत्रे है।

(1) ग्रामीण एवं नगरीय क्षेत्र।

पंचायती राज ग्रामीण व्यवस्था एवं नगरपालिका नगरीय व्यवस्था को कहा जाता है ।

स्थानीय स्वशासन

  1. ग्रामीण क्षेत्र
  2. नगरीय क्षेत्र

ग्रामं पंचायत
जनपद पंचायत
जिला पंचायत

नगर निगम नगर पालिका नगर पंचायत

ग्रामीण स्थानीय

  • स्वशासन भारत में प्राचीन काल से ही भिन्न-भिन्न नामों से पंचायती राज व्यवस्थाअस्तित्व में रही है।
  • स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद गांधी जी के प्रभाव से पंचायती राज व्यवस्था पर ज्यादा जोर दिया गया।
  • 1993 में 73 वां संविधान संशोधन करके पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता देवी गर्इ है।

1. पंचायत व्यवस्था के अंतर्गत सबसे निचले स्तर पर ग्राम पंचायत होगी। इसमें एक या एक से अधिक गाँव शामिल किये जा सकते है।

2. ग्राम पंचायत कर शाक्तियों के सम्बन्ध में राज्य विधान मंडल द्वारा कानून बनाया जायेगा । जिन राज्यों की जनसंख्या 20लाख से कम है वहॉ दो स्तरीय पंचायत (जिला व ग्राम ) का गठन किय जावेगा

3. सभी स्तरों की पंचायतो के सभी सदस्यों का चुनाव ‘वयस्क मताधिकार’ के आधार पर पांच वर्ष के लिए किया जायेगा।

4. ग्राम स्तर के अध्यक्ष का चुनाव प्रत्यक्षत: तथा जनपद व जिला स्तरके अध् यक्ष का चुनाव अप्रत्यक्षरूप से किया जायेगा ।

5. पंचायत के सभी स्तरों पर अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के लिए उनके सख्या के अनुपात में आरक्षण दियाजायेगा ।

6. महिलाओं को 30 प्रतिशत आरक्षण दिया जायेगा ।

7. पांच वर्ष के कार्य काल के पूर्व भी इनका (पंचायतो का) विघटन किया जा सकता है। परन्तु विघटन की दशा में 6 माह के अंतर्गत चुनाव कराना आवश्यकता होगा।

संवैधानिक उपचारों सम्बन्धी मूलाधिकार का प्रावधान अनुच्छेद 32-35 तक किया गया है संविधान के भाग तीन में मूल अधिकारों का वर्णन है.

 यदि मूल अधिकारों का राज्य द्वारा उल्लंघन किया जाता है तो राज्य के विरुद्ध न्याय पाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय में और अनुच्छेद 226 के अधीन उच्च न्यायालय में रिट (writ) याचिका दाखिल करने अधिकार नागरिकों को प्रदान किया गया है.

संविधान में निम्नलिखित आदेशों का उल्लेख (Types of Writs issued by Courts) है –

  • बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)
  • परमादेश रिट (Mandamus)
  • प्रतिषेध रिट (Prohibition)
  • उत्प्रेषण लेख (Writ of Certaiorari)
  • अधिकार पृच्छा (Quo Warranto)

(1) बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)

  • यह रिट (writ) उस अधिकारी (authority) के विरुद्ध दायर किया जाता है जो किसी व्यक्ति को बंदी बनाकर (detained) रखता है.
  • इस रिट (writ) को जारी करके कैद करने वाले अधिकारी को यह निर्देश दिया जाता है कि वह गिरफ्तार व्यक्ति को न्यायालय (court) में पेश करे.
  • इस रिट (writ) का उद्देश्य मूल अधिकार में दिए गए “दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण के अधिकार” का अनुपालन करना है.
  • यह रिट अवैध बंदीकरण के विरुद्ध प्रभावी कानूनी राहत प्रदान करता है.

(2) परमादेश रिट (Mandamus)

  • यह रिट (writ) न्यायालय द्वारा उस समय जारी किया जाता है, जब कोई लोक अधिकारी अपने कर्तव्यों के निर्वहण से इनकार करे और जिसके लिए कोई अन्य विधिक उपचार (कोई कानूनी रास्ता न हो) प्राप्त न हो.
  • इस रिट के द्वारा किसी लोक पद के अधिकारी के अतिरिक्त अधीनस्थ न्यायालय अथवा निगम के अधिकारी को भी यह आदेश दिया जा सकता है कि वह उसे सौंपे गए कर्तव्य का पालन सुनिश्चित करे.

(3) प्रतिषेध रिट (Prohibition)-

  • यह रिट (writ) किसी उच्चतर न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालयों के विरुद्ध जारी की जाती है.
  • इस रिट (writ) को जारी करके अधीनस्थ न्यायालयों को अपनी अधिकारिता के बाहर कार्य करने से रोका जाता है.
  • इस रिट के द्वारा अधीनस्थ न्यायालय को किसी मामले में तुरंत कार्रवाई करने तथा की गई कार्रवाई की सूचना उपलब्ध कराने का आदेश दिया जाता है.

(4) उत्प्रेषण लेख (Writ of Certiorari)-

  • यह रिट (writ) भी अधीनस्थ न्यायालयों (sub-ordinate courts) के विरुद्ध जारी किया जाता है.
  • इस रिट (writ) को जारी करके अधीनस्थ न्यायालयों को यह निर्देश दिया जाता है कि वे अपने पास संचित मुकदमे के निर्णय लेने के लिए उस मुकदमे को वरिष्ठ न्यायालय अथवा उच्चतर न्यायालय को भेजें.
  • उत्प्रेषण लेख का मतलब उच्चतर न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालय में चल रहे किसी मुक़दमे के प्रलेख (documents) की समीक्षा (review) मात्र है, इसका तात्पर्य यह नहीं है कि उच्चतर न्यायालय अधीनस्थ न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध ही हो.

(5) अधिकार पृच्छा (Quo Warranto)

  •  इस रिट (writ) को उस व्यक्ति के विरुद्ध जारी किया जाता है जो किसी ऐसे लोक पद (public post) को धारण करता है जिसे धारण करने का अधिकार उसे प्राप्त नहीं है.
  • इस रिट (writ) द्वारा न्यायालय लोकपद पर किसी व्यक्ति के दावे की वैधता की जाँच करता है.
  • यदि उसका दावा निराधार (not well-founded) है तो वह उसे पद से निष्कासन कर देता है.
  • इस रिट के माध्यम से किसी लोक पदधारी को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आदेश देने से रोका जाता है.

स्थानीय स्वायत्त शासन स्थानीय स्वायत्त शासन स्थानीय स्वायत्त शासन

September 3, 2020

आपातकाल & जनहित याचिका Emergency Provision and Public

आपातकाल & जनहित याचिका )

आपातकालीन प्रावधान (Emergency Provisions)

संविधान के भाग 18 में अनुच्छेद 352 से 360 तक आपातकालीन प्रावधान उल्लिखित हैं|

ये प्रावधान केंद्र को किसी भी असामान्य स्थिति से प्रभावी रूप से निपटने में सक्षम बनाते हैं|

संविधान में इन प्रावधानों को जोड़ने का उद्देश्य देश की संप्रभुता, एकता, अखण्डता, लोकतांत्रिक राजनैतिक व्यवस्था तथा संविधान की सुरक्षा करना है|

आपातकालीन स्थिति में केंद्र सरकार सर्वशक्तिमान हो जाता हैं तथा सभी राज्य, केंद्र के पूर्ण नियंत्रण में आ जाते हैं|

संविधान में तीन प्रकार के आपातकाल

  • युद्ध, बाह्य आक्रमण और सशस्त्र विद्रोह के कारण आपातकाल (अनुच्छेद 352), को “राष्ट्रीय आपातकाल” के नाम से जाना जाता है| किंतु संविधान ने इस प्रकार के आपातकाल के लिए “आपातकाल की घोषणा” वाक्य का प्रयोग किया है|
  • राज्यों में संवैधानिक तन्त्र की विफलता के कारण आपातकाल को राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) के नाम से जाना जाता है| इसे दो अन्य नामों से भी जाना जाता है––राज्य आपातकाल अथवा संवैधानिक आपातकाल| किन्तु संविधान ने इस स्थिति के लिए आपातकाल शब्द का प्रयोग नहीं किया है|
  • भारत की वित्तीय स्थायित्व अथवा साख के खतरे के कारण अधिरोपित आपातकाल, वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360) कहा जाता है|

जनहित याचिका ( Public Interest Litigation )

जनहित याचिका का अभिप्राय यह है कि पीड़ित व्यक्तियों के बदले अन्य व्यक्ति और संगठन न्याय की मांग कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में, यदि कोई व्यक्ति पीड़ित है परंतु उसमें न्यायालय में न्याय के लिए जाने की क्षमता नहीं है वैसी स्थिति में अन्य व्यक्तियों तथा स्वैच्छिक संगठनों की यह अधिकार है कि वे पीड़ित व्यक्ति के बदले न्याय के लिए न्यायालय में याचिका पेश कर सकते हैं।

यह व्यवस्था देश के आर्थिक एवं सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए उपलब्ध कराई गई है जिससे उन्हें न्याय मिल सके। उदाहरण के लिए, बंधुआ मजदूरों के लिए जनहित याचिका वरदान साबित हुई है। इतना ही नहीं देश की आम समस्याओं, जैसे- भ्रष्टाचार, को लेकर भी जनहित याचिका ने ऐतिहासिक निर्णय दिलवाया है।

जनहित को लेकर कोई भी व्यक्ति न्यायालय में मुकदमा दायर कर सकता है।

न्यायविदों ने अखबारी खबरों के आधार पर भी जनहित याचिका को स्वीकार किया है और अपने महत्वपूर्ण निर्णय दिये हैं।

जनहित वाद की विकास यात्रा न्यायिक सक्रियता से जुड़ी हुई है। न्यायिक सक्रियता कहीं तकनीकी रूप में सामने आती है और कहीं सामाजिक सक्रियता के रूप में सामने आती है।

न्यायाधीश किसी भी वर्ग का क्यों न हो, जब उसके सामने जनहित सम्बन्धी मामले आते है तो वह उसके प्रति आंख मूंदकर नहीं रह सकता।

जनहित याचिका के इतिहास में अमेरिका में गिडन बनाम राइट केस जनहित याचिका संबंधी प्रथम मामला था जो कि वहां 1876 में विधिक सहायता उपलब्ध कराने के संबंध में दायर किया गया था।

इस मामले में श्री गिडन ने अमरीकन सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपना हस्तलिखित पत्र पेश करके याचना की कि फ्लोरिडा ट्रायल कोर्ट ने अन्वीक्षा में उसकी प्रतिरक्षा के लिए कोई अधिवक्ता नियुक्त करने से मना कर दिया।

सर्वोच्च न्यायालय के सभी 9 न्यायाधीशों ने एकमत से याची को अपने केस की पैरवी के लिए अधिवक्ता की नियुक्ति किए जाने हेतु परमादेश जारी किया तथा यह मानकर इतिहास बनाया कि ऐसे मामलों में साधारण व सुपरिचित न्यायिक प्रक्रिया की पालना कराया जाना अनिवार्य नहीं है। जनहित याचिका के इतिहास में न्यायालय का यह निर्णय सामाजिक न्याय के क्षेत्र में मील का पत्थर माना जाता है।

भारत में जनहित याचिका को न्यायाधीश पी.एन. भगवती एवं वी.के. कृष्णा अय्यर ने 1970 के उत्तरार्द्ध में प्रारम्भ किया जिसे न्यायाधीश जे.एस. वर्मा, वैकटचेलैया एवं कुलदीप सिंह ने आगे बढ़ाया।

न्यायाधीश पी.एन. भगवती ने यहां तक कहा था कि कोई व्यक्ति जनहित याचिका एक साधारण पोस्टकार्ड द्वारा भी सर्वोच्च न्यायालय में दायर कर सकता है।

जनहित याचिका का पहला प्रमुख मुकदमा 1979 में बिहार केस में कारागार और विचाराधीन कैदियों की अमानवीय परिस्थितियों से संबंधित था। यह एक अधिवक्ता द्वारा एक राष्ट्रीय दैनिक में छपे एक खबर, जिसमें बिहार के जेलों में बन्द हजारों विचाराधीन कैदियों का हाल वर्णित था, के आधार पर दायर किया गया था।

जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 32 व हाईकोर्ट में अनुच्छेद 226 के तहत दायर की जा सकती है।