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September 2, 2020

September 2, 2020

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग National Human Right

राष्ट्री_मानवाधिकार_आयोग

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भारत में मानवाधिकारों की रक्षा और

उसे बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार सांविधिक निकाय है।

इसकी स्थापना 12 अक्टूबर 1993 को की गयी।

मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 कहता है कि आयोग ” संविधान या अंतरराष्ट्रीय संविदा द्वारा व्यक्ति को दिए गए जीवन, आजादी, समानता और मर्यादा से संबंधित अधिकारों” का रक्षक है।

एनएचआरसी की संरचना-

एनएचआरसी में एक अध्यक्ष और चार सदस्य होते हैं। अध्यक्ष को भारत का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश होना चाहिए। अन्य सदस्य होने चाहिए–

  • (क) एक सदस्य, भारत के सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश या भूतपूर्व न्यायाधीश
  • (ख) एक सदस्य, उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश या भूतपूर्व न्यायाधीश
  • (ग) दो ऐसे सदस्यों की नियुक्ति की जाएगी जिन्हें मानवाधिकार संबंधित मामलों की जानकारी हो या वे इस क्षेत्र में व्यावहारिक अनुभव रखते हों।

इन सदस्यों के अलावा, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग और राष्ट्रीय महिला आयोग पदेन सदस्य के तौर पर काम करते हैं।

राष्ट्रपति छह सदस्यी समिति की अनुशंसा के आधार पर एनएचआरसी के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति करते हैं।

छह सदस्यी समिति में निम्नलिखित लोग होते हैं–

  • (क) प्रधानमंत्री (अध्यक्ष)
  • (ख) गृह मंत्री
  • (ग) लोकसभा अध्यक्ष
  • (घ) लोकसभा में विपक्ष के नेता
  • (ङ) राज्यसभा के उपाध्यक्ष
  • (च) राज्यसभा में विपक्ष के नेता

सुप्रीम कोर्ट या उच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश की नियुक्ति, भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद ही की जा सकती है।

एनएचआरसी के कार्य-

मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अनुसार, एनएचआरसी के कार्य इस प्रकार है–

  • (क) मानवाधिकारों के उल्लंघन या किसी लोक सेवक द्वारा ऐसे उल्लंघन की रोकथाम में लापरवाही के खिलाफ किसी पीड़ित या किसी व्यक्ति द्वारा दायर याचिका की या स्वप्रेरणा से पूछताछ करना।
  • (ख) किसी न्यायालय के समक्ष न्यायालय की अनुमति के साथ मानवाधिकारों के उल्लंघन के किसी भी मामले की सुनवाई में हस्तक्षेप।
  • (ग) कैदियों की स्थिति का अध्ययन करने के लिए किसी भी जेल या नजरबंद स्थान की यात्रा करना और उस पर अनुशंसाएं देना।
  • (घ) मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए प्रदान किए गए सुरक्षा उपायों या तत्कालीन प्रवृत्त किसी कानून के संविधान के तहत की समीक्षा करना और उसके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए उपायों की सिफारिश करना।
  • (ङ) मानवाधिकारों के उपयोग को रोकने वाले आतंकवादी कृत्यों समेत कारकों की समीक्षा करना और उपयुक्त उपचारात्मक उपायों की सिफारिश करना।
  • (च) मानवाधिकार के क्षेत्र में अनुसंधान करना और उसे बढ़ावा देना।
  • (छ) समाज के विभिन्न वर्गों में मानवाधिकार साक्षरता फैलाना और इन अधिकारों के संरक्षण हेतु उपलब्ध सुरक्षा उपायों के बारे में जागरुकता को बढ़ावा देना।
  • (ज) मानवाधिकार के क्षेत्र में काम करने वाले गैर– सरकारी संगठनों और संस्थानों के प्रयासों को प्रोत्साहित करना।
  • (झ) मानवाधिकारों के लिए अनिवार्य समझे जा सकने वाले अन्य कार्यों को करना।

एनएचआरसी की कार्यप्रणाली-

आयोग का मुख्यालय दिल्ली में है। आयोग को अपनी प्रक्रिया को नियंत्रित करने की शक्ति दी गई है। इसे नागरिक अदालत के सभी अधिकार प्राप्त हैं और इसकी कार्यवाही का चरित्र न्यायिक है।

यह केंद्रीय या किसी भी राज्य सरकारी या किसी अन्य अधीनस्थ प्राधिकरण से सूचना की मांग या रिपोर्ट की मांग कर सकता है। हालांकि, मानवाधिकारों के उल्लंघन की शिकायतों की जांच के लिए आयोग के पास अपने खुद के कर्मचारी हैं।

इसे अपने उद्देश्य के लिए किसी भी अधिकारी या केंद्र सरकार या किसी भी राज्य सरकार की जांच एजेंसी की सेवा लेने का अधिकार दिया गया है। आयोग मानवाधिकारों के उल्लंघन से संबंधित सूचना के लिए विभिन्न एनजीओ के साथ सहयोग भी करता है।

आयोग घटना के एक वर्ष के भीतर उस पर गौर कर सकता है। आयोग जांच के दौरान या उसके पूरा हो जाने के बाद निम्नलिखित में से कोई भी कदम उठा सकता हैः

  • यह संबंधित सरकार या प्राधिकरण को पीड़ित को मुआवजा या क्षतिपूर्ति देने की सिफारिश कर सकता है।
  • यह अभियोजन पक्ष के लिए या दोषी लोक सेवक के खिलाफ कार्यवाही
  • शुरु करने के लिए संबंधित सरकार या प्राधिकरण को सिफारिश भेज सकता है।
  • यह संबंधित सरकार या प्राधिकरण को पीड़ित को तत्काल अंतरिम राहत प्रदान करने की सिफारिश कर सकता है।
  • यह अनिवार्य निर्देशों, आदेशों या रिट्स के लिए सुप्रीम कोर्ट या संबंधित उच्च न्यायालय में जा सकता है।

पीड़ितों को न्याय दिलाने हेतु एनएचआरसी को अधिक प्रभावी बनाने के लिए, इसकी प्रभावकारिता और दक्षता को बढ़ाने के लिए, इसे दी गई शक्तियों को बढ़ाया जा सकता है।

आयोग को अंतरिम और तात्कालिक राहत जिसमें पीड़ित को मौद्रिक राहत दिया जाना भी शामिल है, की शक्ति प्रदान की जानी चाहिए  इसके अलावा, मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वालों को दंडित करने की शक्ति भी आयोग के पास होनी चाहिए, यह भविष्य में मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वालों के लिए निवारक के रूप में कार्य कर सकता है।

आयोग के कार्य में सरकार और अन्य प्राधिकरणों का हस्तक्षेप न्यूनतम होना चाहिए, क्योंकि ऐसा होने से आयोग का काम प्रभावित हो सकता है। इसलिए, एनएचआरसी को सशस्त्र बलों के सदस्यों द्वारा मानवाधिकारों से संबंधित मामलों की जांच कराने की शक्ति दी जानी चाहिए।

September 2, 2020

निर्वाचन आयोग Election Commission

निर्वाचन आयोग

निर्वाचन आयोग

संविधान का भाग – 15 निर्वाचन आयोग से संबन्धित है। निर्वाचन आयोग से संबधित भाग – 15 में कुल छः अनुच्छेद (अनु.324-329) है।

भारत में स्वतंत्रत, निष्पक्ष व पारदर्शी शासन के सचांलन हेतू निर्वाचन आयोग की आवश्यता पड़ी।

अनुच्छेद 326 में मताधिकार को प्रयोग करने का अधिकार दिया है।

भारत में निर्वाचन आयोग की स्थापना 25 जनवरी 1951 को की गई। 25 जनवरी राष्ट्रीय मतदाता दिवस है।

  • प्रथम निर्वाचन आयुक्त – सुकुमार सेन थे। मार्च 1950 – 1958
  • देश के एकमात्र महिला मुख्य चुनाव आयुक्त – वी. एस. रमादेवी
  • एकमात्र निर्वाचन आयोग के कार्यवाहक मुख्य चुनाव आयुक्त – श्री मति वी. एस. रमादेवी(26 नवम्बर 1990 से 11 दिसम्बर 1990)।
  • वर्तमान मुख्य निर्वाचन आयुक्त – ओम प्रकाश रावत(22 वें)

निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ती राष्ट्रपति करता है। इनका कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष आयु(जो भी पहले हो) तक होता है।

  • शपथ – तीसरी अनुसुची में।
  • त्यागपत्र – राष्ट्रपति को।

हटाने की प्रक्रिया

निर्वाचन आयुक्तों को राष्ट्रपति द्वारा मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर हटाया जा सकता है।

अनुच्छेद 234(5) के अनुसार मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसक पद से उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर ही हटाया जायेगा जिस रीती से और जिन आधारों पर उच्च्तम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है।

इसकी प्रक्रिया अनुच्छेद 124(4) के अनुसार होगी।(कार्यकाल से पूर्व हटाने का प्रावधान न्यायाधिशों के समान । निर्वाचन आयोग के सभी फैसले बहुमत से लिये जाते है।

निर्वाचन आयोग के कार्य एवं शक्तियां

  • स्थानिय शासन को छोड़कर सभी चुनाव को सम्पन्न करना।
  • मतदाता पहचान पत्र तैयार करवाना।
    अनुच्छेद 325 मतदाता सुची में जाती लिंग धर्म के आधार पर नाम जोड़ने में भेदभाव नहीं करना।
  • आचार संहिता का पालन करवाना।
  • सदस्यों की सदस्यता से सम्बधित राष्ट्रपति को सलाह देना।
  • परिसीमन – चुनाव क्षेत्रों का परिसिमन करना।
    वर्तमान में चैथा परिसीमन आयोग कार्यरत है इसके अध्यक्ष न्यायमुर्ती कुलदीप सिंह है।
  • राजनैतिक दलों को मान्यता प्राप्त करना।

चुनाव चिन्हों का आवंटन करना

निर्वाचन आयोग ने चुनाव चिन्ह आंवटन एवं सरंक्षण अधिनियम 1968(संशोधित 2005) के अनुसार राष्ट्रीय दल हेतु निम्न आवश्यक शर्ते है।

  • यदि कोई दल लोकसभा चुनाव में लोकसभा की कम से कम 11 अथवा कुल सीटों की 2 प्रतिशत सीटे 3 राज्यों से प्राप्त कर ले तो वह राष्ट्रीय दल का दर्जा प्राप्त कर लेगा।
  • यदि कोई दल लाकसभा की कम से कम 4 सीट और डाले गये कुल वैद्य मतों के 6 प्रतिशत मत (कम से कम 4 राज्यों से ) प्राप्त कर ले तो भी वह दल राष्ट्रीय दल का दर्जा प्राप्त कर लेगा।

प्रारम्भ में निर्वाचन आयोग एक सदस्यीय था। प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समय पहली बार 1989 में निर्वाचन_आयोग को त्रिसदस्यीय बनाया गया।

1990 में वी. पी. सिंह सरकार द्वारा पुनः एक सदस्यीय कर दिया गया।

1993 से निर्वाचन आयोग त्रिसदस्यीय है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त परिसीमन आयोग का पदेन सदस्य होता है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त व दो अन्य निर्वाचन आयुक्तों के समान शक्तियां होती हैं

तथा उनके वेतन भत्ते और दूसरी अनुलाभ भी एक समान होते हैं जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान होते हैं

ऐसी स्थिति में जब मुख्य निर्वाचन आयुक्त व दो अन्य निर्वाचन आयुक्तों के बीच विचारों में मतभेद होता है तो आयोग बहुमत के आधार पर निर्णय करता है 

चुनाव क्षेत्रों का सीमांकन या परिसीमन 10 वर्षीय जनगणना के पश्चात् किया जा सकता है। परिसीमन आयोग की रिपोर्ट को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती ।

मताधिकार का उल्लेख अनुच्छेद 326 में है। मूल संविधान में मतदाता का न्यूनतम आयु 21 वर्ष थी।

प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समय मतदाता की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की गयी।

61 वें संविधान संशोधन(1988) द्वारा मतदाता की न्युनतम आयु 18 वर्ष की गयी। प्रथम लोकसभा चुनाव 1951-52 हुए।

राष्ट्रीय स्तर के दल के प्रावधान

आम लोकसभा और विधानसभा के चुनाव में किसी राजनैतिक दलों द्वारा कुल वैद्य मतों का 6 प्रतिशत प्राप्त करना। अथवा एक या अधिक चार राज्यों में 4 लाकसभा की 6 सीट प्राप्त करना। या

कुंल लोकसभा की सीटों का 2 प्रतिशत या न्युनतम 11 सीट प्राप्त करना।

राज्यस्तरीय दल के प्रावधान

आम विधानसभा के चुनाव में कुल वैद्य मतों का छः प्रतिशत प्राप्त करना या उस राज्य की कुल विधानसभा सीटों का 3 प्रतिशत या न्युनतम 4 सीट प्राप्त करना।

राजस्थान राज्य निर्वाचन आयोग

राज्य निर्वाचन आयोग का गठन संविधान के 73 वें और 74 वें संविधान संशोधन के फलस्वरूप किया गया । राज्य निर्वाचन_आयोग को पंचायत राज संस्थाओं व स्थानीय निकायों के चुनाव का संवैधानिक दायित्व सौंपा गया।

राजस्थान पंचायत राज अधिनियम 1994 की धारा 120 के अनुसार निर्वाचन_आयोग के कर्तव्यों का पालन किसी उप निर्वाचन आयुक्त या राज्य निर्वाचन आयुक्त करेगा।

राजस्थान राज्य निर्वाचन_आयोग का प्रथम आयुक्त अमर सिंह राठौड़ थे।

निर्वाचन आयुक्त राज्य निर्वाचन_आयोग का सर्वोच्च पद होता है। राजस्थान राज्य निर्वाचन आयुक्त का कार्यकाल 6 वर्ष या 62 वर्ष जो भी पहले हो

September 2, 2020

राजनीतिक दल Indian Political Parties

राजनीतिक दल

राजनीतिक दल

देश के मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दल 

भारत में कांग्रेस की स्थापना लॉर्ड डफरिन के दिमाग की उपज थी लॉर्ड डफरिन ने ही कांग्रेस को पागलों की सभा ,बचकाना तथा बाबूओ की संसद कहा था

कांग्रेस का सामान्य अर्थ लोगों का समूह होता है जिसका सर्वप्रथम प्रयोग USA में हुआ था कांग्रेस की स्थापना 28 दिसंबर 1885 में मुंबई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय में दोपहर 2:00 बजे 72 प्रतिनिधियों के साथ हुई

दादा भाई नौरोजी को ही भारत का वयोवृद्ध पुरुष कहा जाता है यह प्रथम भारतीय जिसने ब्रिटेन की संसद में चुना गया दादाभाई नौरोजी ने पहली बार “पावर्टी एंड अन ब्रिटिश रूल इन इंडिया” नामक पुस्तक में धन निष्कासन का सिद्धांत दिया और पहली बार में राष्ट्रीय आय की थी थी गणना की थी

कांग्रेस के 1896 के कोलकाता अधिवेशन में पहली बार राष्ट्रीय गीत को गाया जिसके अध्यक्ष वहीं तुल्ला सहानी थे राष्ट्रीय गीत को 65 सेकंड में गाया जाता है 1996 में राष्ट्रीय गीत का शताब्दी वर्ष मनाया गया

स्वराज्य शब्द स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा दिया गया लेकिन स्वराज्य शब्द का सार्वजनिक रूप से प्रयोग करने वाला प्रथम महापुरुष लोकमान्य तिलक थे

1916 के लखनऊ अधिवेशन में पहली बार मुस्लिम लीग व कांग्रेस में समझौता हुआ जिसकी अध्यक्ष अंबिका चरण थी, इसी अधिवेशन के तहत गरम दल और नरम दल का एकीकरण हुआ

एनी बेसेंट आयरलैंड की थी इसीलिए इन्हें आयरन लेडी गौमाता वसंत कहा जाता है, 1917 के कोलकाता अधिवेशन की अध्यक्षता एनी बेसेंट ने की थी यह प्रथम महिला कांग्रेस अध्यक्ष थी इसी अधिवेशन में तिरंगे झंडे को पहली बार राष्ट्रीय ध्वज के रूप में मान्यता दी गई

 1924 के कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता महात्मा गांधी ने (पहली व आखरी बार) बेलगांव में कि इसी अधिवेशन में पहली बार हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया गया

1925 के कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता सरोजिनी नायडू द्वारा की गई यह प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष थी इसी अधिवेशन में पहली बार झंडा गीत विजयी विश्व तिरंगा प्यारा गाया गया जिसके लेखक श्यामलाल पार्षद थे

भारत की कोकिला सरोजिनी नायडू को स्वर कोकिला लता मंगेशकर को कहते हैं तो भारत में क्रांति मां मैडम भीकाजी को कहते हैं

1936 का कांग्रेस अधिवेशन फैजपुर(यूपी) में हुआ जो कांग्रेस का गांव में आयोजित एकमात्र अधिवेशन था जिसकी अध्यक्षता पंडित जवाहरलाल नेहरू ने किस अधिवेशन में पहली बार संविधान सभा के गठन की मांग की गई

1938 के हीरापुर अधिवेशन की अध्यक्षता सुभाष चंद्र बोस ने की सुभाष चंद्र बोस को नेताजी की उपाधि एडोल्फ हिटलर ने दी

मौलाना अबुल कलाम कांग्रेस के सबसे युवा अध्यक्ष और लगातार सबसे अधिक समय तक कांग्रेस के अध्यक्ष रहे भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री बने इसी कारण इन्हीं के जन्मदिन पर शिक्षा दिवस( 11 नवंबर )मनाया जाता है

दादाभाई नौरोजी वह पंडित जवाहरलाल नेहरु ने ही कांग्रेस की अध्यक्षता सर्वाधिक तीन-तीन बार की थी कांग्रेस के सर्वाधिक 10 अधिवेशन कोलकाता में हुए

कांग्रेस का दूसरा विभाजन 1978 में (पहला 1969 में )पहला विभाजन इंदिरा कांग्रेस और दूसरा ब्रह्मानंद रेड्डी कांग्रेस के नाम से हुआ

राजनीति दल स्वैच्छिक संगठन अथवा लोगों के वह संगठित समूह होते हैं जिनका दृष्टिकोण समान होता है तथा जो संविधान के प्रावधानों के अनुसार देश को आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने की कोशिश करते हैं।

वर्तमान लोकतांत्रिक राज्यों में चार प्रकार के राजनीतिक दल होते हैं।

  • प्रतिक्रियावादी राजनीतिक दल– वे दल जो पुरानी सामाजिक आर्थिक तथा राजनीतिक संस्थाओं से चिपके रहना चाहते हैं।
  • रूढ़िवादी दल– वे दल जो यथा स्थिति वाद को महत्व देते हैं।
  • उदारवादी दल– जिन दलों का लक्ष्य विद्यमान संस्थाओं में सुधार करना है।
  • सुधारवादी दल– जिन दलों का उद्देश्य मौजूद व्यवस्था को बदल कर नई व्यवस्था स्थापित करना होता है।

दलीय व्यवस्था

  • एक दलीय व्यवस्था
  • द्विदलीय व्यवस्था।
  • बहुदलीय व्यवस्था।

“राष्ट्रीय दलों के रूप में मान्यता के लिए दशाएं”

1. यदि वह दल लोकसभा अथवा विधानसभा के आम चुनाव में 4 अथवा अधिक राज्यों में वैध मतों का 6% मत प्राप्त करता है तथा इसके साथ वह किसी राज्य या राज्यों में लोकसभा में 4 सीट प्राप्त करता है।

2. यदि कोई दल लोकसभा में 2% स्थान जीतता है तथा यह सदस्य तीन विभिन्न राज्यों से चुने जाते हैं।

3. यदि कोई दल कम से कम 4 राज्यों में राज्य स्तरीय दल के रूप में मान्यता प्राप्त हो।

राज्य स्तरीय दलों की मान्यता के लिए दशाएं_

1. यदि उस दल ने राज्य की विधानसभा के आम चुनाव में उस राज्य से हुए कुल वैध मतों का 6% प्राप्त किया हो तथा इसके अतिरिक्त उसने संबंधित राज्य में 2 स्थान प्राप्त किए हो।

2. यदि वह दल राज्य की लोकसभा के लिए हुए आम चुनाव में उस राज्य से हुए कुल वैध मतों का 6% प्राप्त करता है तथा इसके अतिरिक्त उसने संबंधित राज्य में लोकसभा की कम से कम 1 सीट जीती हो।

3. यदि उस दल ने राज्य की विधानसभा की कुल स्थानों का 3% या 3 सीटें जो भी ज्यादा हो प्राप्त किए हो।

4. यदि प्रत्येक 25 सीटों में से उस दल ने लोकसभा की कम से कम 1 सीट जीती हो या लोकसभा के चुनाव में उससे संबंधित राज्य में उसे विभाजन से कम से कम इतनी सीटें प्राप्त की हो।

5. यदि यह राज्य में लोकसभा के लिए हुए आम चुनाव में अथवा विधानसभा चुनाव में कुल वैध मतों का 8% है प्राप्त कर लेता है यह शर्त वर्ष 2011 से जोड़ी गई है।