चोल एवं पल्लव तथा अन्य प्राचीन राजवंश

चोल

प्राचीन भारत मानव के उदय से लेकर दसवीं सदी तक के भारत का इतिहास प्राचीन भारत का इतिहास कहलाता है। प्राचीन भारतीय इतिहास की जानकारी के साधनयों तो भारत के प्राचीन साहित्य तथा दर्शन के संबंध में जानकारी के अनेक साधन उपलब्ध हैं, परन्तु भारत के प्राचीन इतिहास की जानकारी के साधन संतोषप्रद नहीं है।

उनकी न्यूनता के कारण अति प्राचीन भारतीय संस्कृति एवं शासन का क्रमवद्ध इतिहास नहीं मिलता है। फिर भी ऐसे साधन उपलब्ध हैं जिनके अध्ययन एवं सर्वेक्षण से हमें भारत की प्राचीनता की कहानी की जानकारी होती है।

इन साधनों के अध्ययन के बिना अतीत और वर्तमान भारतके निकट के संबंध की जानकारी करना भी असंभव है। प्राचीन भारत के इतिहास की जानकारी के साधनों को दो भागों में बाँटा जा सकता है-

साहित्यिक साधन और पुरातात्विक साधन, जो देशी और विदेशी दोनों हैं।

साहित्यिक साधन दो प्रकार के हैं-:

  • धार्मिक साहित्य और
  • लौकिक साहित्य।

धार्मिक साहित्य भी दो प्रकार के हैं -:

  • ब्राह्मण ग्रन्थ और
  • अब्राह्मण ग्रन्थ।

ब्राह्मण ग्रन्थ दो प्रकार के हैं – श्रुति जिसमें वेद, ब्राह्मण, उपनिषद इत्यादि आते हैं और स्मृति जिसके अन्तर्गतरामायण, महाभारत, पुराण, स्मृतियाँ आदि आती हैं।

लौकिक साहित्य भी चार प्रकार के हैं-  ऐतिहासिक साहित्य, विदेशी विवरण, जीवनी और कल्पना प्रधान तथा गल्प साहित्य।

पुरातात्विक सामग्रियों को तीन भागों में बाँटा जा सकता है –  अभिलेख, मुद्राएं तथा भग्नावशेष स्मारक।

अधोलिखित तालिका इन स्रोत साधनों को अधिक स्पष्ट करती है-?

(क) साहित्यिक साधन

  • धार्मिक साहित्य
  • ब्राह्मण ग्रंथ.
  • श्रुति (वेद ब्राह्मण उपनिषद् वेदांग).
  • स्मृति (रामायण महाभारत पुराण स्मृतियाँ)
  • अब्राह्मण ग्रंथ.
  • लौकिक साहित्य.
  • ऐतिहासिक
  • विदेशी विवरण.
  • जीवनी
  • कल्पना प्रधान तथा गल्प साहित्य

(ख) पुरातात्विक साधन

  • अभिलेख
  • मुद्राएँ.
  • भग्नावशेष स्मारक

चोल वंश ( Chol Dynasty )

नवीं से बारहवीं शताब्दी तक चोल शासकों का राजनैतिक वर्चस्व बना रहा। इन्होंने न सिर्फ एक विशाल साम्राज्य का निर्माण किया बल्कि शक्तिशाली नौसेना भी गठित की, जिससे ब्रहा देशों (श्री लंका आदि) पर भी अपना नियंत्रण स्थापित किया तथा साथ ही साथ उन्होंने हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के समुद्री व्यापार का मार्ग प्रशस्त किया।

चोल साम्राज्य को मध्यकालीन दक्षिण भारतीय इतिहास की चरम परिणीत कहा जा सकता है।

राजनैतिक इतिहास

चोल शासन दक्षिण भारत में पल्लवों के अधीनस्थ सांमतों के रूप में कार्यरत थे। 850 ई. में विजयालय ने तंजौर पर कब्ज़ा कर लिया। इसी ने चोल राजवंश की स्थापना की थी। उसने परकेसरी की उपाधि धारण की। उसने पल्लव एवं पाण्ड्य शासकों के बीच संघर्ष का लाभ उठाकर अपनी स्थिति मजबूत की।

विजयालय के उत्तराधिकारी एवं उसके पुत्र आदित्य प्रथम (887 – 900 ई.) ने पल्लव शासक अपराजित को (890 ई.) युद्ध में हराकर मार डाला। उसी ने पाण्ड्य (मदुरा) और गंग (कलिंग) शासकों को हराकर अपने साम्राज्य को और अधिक सुदृढ़ किया।

इसके उत्तराधिकारी परांतक प्रथम (907 – 953 ई.) ने साम्राज्य विस्तार को और विस्तृत किया तथा 915 ई. में उसने श्रीलंका को सेना को वेल्लूर के युद्ध में पराजित किया। किन्तु इस समय राष्ट्रकूट शासन भी शक्तिशाली थे।

राष्ट्रकूट शासक कृष्ण तृतीय ने 949 ई. में तक्कोलम के युद्ध में चोल सेना को पराजित किया। 953 ई. में परांतक प्रथम की मृत्यु हो गई। राष्ट्रकूट शासक कृष्ण तृतीय की मृत्यु (965 ई.) के उपरांत राष्ट्रकूट साम्राज्य का विघटन होना शुरू हुआ।

चोल शक्ति का पुनः जीर्णीद्धार 985 ई. में राजराज प्रथम (985 से 1014 ) के आधीन आरंभ हुआ। उसके अनेक विजयों के पश्चात एक विशाल साम्राज्य का निर्माण किया।

994 ई. से 1002 के मध्य उसने सैनिक अभियान किये तथा उसने चेर, पाण्ड्य, चालुक्य (पूर्वी एवं पश्चिमी दोनों को) तथा कलिंग के गंग शासकों को पराजित किया। 1004 ई. से 1012 ई. के मध्य नौसैनिक अभियान के क्रम में उसने अनुराधापुर (श्रीलंका) के उत्तरी क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित कर लिया और उसका नाम मुम्मडी चोलमंडलम रखा।

उसने मालदीप पर भी विजय प्राप्त की। इन सभी विजयों की जानकारी तंजौर एवं तिरुवलंगाडु अभिलेखों से प्राप्त हुई है। राजराज प्रथम का उत्तराधिकारी एवं उसका पुत्र राजेन्द्र प्रथम (1014 ई. से 1044 ई.) था।

राजराज प्रथम की विस्तारवादी नीति को आगे बढ़ाते हुए राजेन्द्र प्रथम ने पांड्य और चेर राजवंश का पूर्णत: उन्मूलन करके अपने साम्राज्य में मिला लिया। उसने 1017 ई. में अनुराधापुर के दक्षिणी क्षेत्र को जीतकर इस भाग को पूर्णतः अपने साम्राज्य में मिला लिया।

इन सैनिक कार्यवाहियों का उद्देश्य अंशत: यह था कि दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ होने वाले व्यापार पर नियंत्रण स्थापित किया जा सके।कोरोमंडल तट तथा मालाबार दक्षिण- पूर्व एशियाई देशों के साथ भारत के व्यापार के मुख्य केन्द्र थे।

1022 – 23 के बीच उसने बंगाल पर सफल सैनिक अभियान किया और महिपाल को पराजित किया। इसी अवसर पर उसने ‘गंगैकोंडचोलपुरम’ की उपाधि धारण की तथा तंजोर के नजदीक गंगैकोंडचोलपुरम को राजधानी बनाया।

राजेन्द्र प्रथम की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विजय 1025 ई. में श्री विजय की थी। उसने श्री विजय के शासन संग्राम विजयोत्तुंगवर्मन को पराजित कर अपनी संप्रभुता उस पर स्थापित की थी। चोल काल का अगला शासक राजाधिराज (1044 – 52 ) अनेक विद्रोहों और उपद्रवों से परेशान था।

उसने अनुराधापुर (श्रीलंका) में हुए विद्रोह का दमन किया। कोपंन्न के युद्ध में उसने चालुक्य शासन सोमेश्वर को हराकर उसकी शक्ति को कमजोर किया। किंतु इसी युद्ध में उसकी मृत्यु हो गयीं।

इसके पहले अपनी सैनिक सफलताओ के उपलक्ष्य में अश्वमेघ यज्ञ किया और जयगोंडचोल की उपाधि धारण की। राजधिराज का अगला उत्तराधिकारी, उसके भाई राजेन्द्र द्रितीय (1052 – 63 ) ने रणभूमि में ही अपना राज्याभिषेक कराया और युद्ध में सफलता प्राप्त की।

इसके पश्चात वीर राजेन्द्र (1063 – 70 ई.) शासन बना। उसने विक्रमादित्य के साथ अपनी पुत्र का विवाह किया तथा दोनों में मैत्रीपूर्ण संबंध बन गये। वीर राजेन्द्र के उत्तराधिकारी अधिराजेन्द्र को जनता ने उसके राज्यारोहण के पश्चात तुरंत राजगद्दी से हटा दिया।

लगभग 1070 ई. कुलोतुंग प्रथम शासन बना। उसका पिता चालुक्य वंश का शासक (विमलादित्य) था और उसकी माँ चोल राजकुमारी थी। अब चोल और चालुक्य वंश एक हो गये। इसने युद्धनीति त्याग कर जनकल्याणकारी कार्य किया। 1077 ई. में उसने चीन के सम्राट के समक्ष अपना दूत भेजकर व्यापारिक संबंधो को सुदृढ़ बनाने का प्रयास किया। इसके पश्चात के उत्तराधिकारियों में

  • विक्रमचोल (1120 – 35 ई.)
  • कुलोतुंग तृतीय (1135 – 50 ई.)
  • राजराज प्रथम तृतीय (1210 – 50 ई.)
  • राजेन्द्र तृतीय (1250 – 67 ई.) शामिल है।

राजेन्द्र तृतीय (1250 – 67 ई.) की मृत्यु के बाद चोल वंश का इतिहास समाप्त हो गया।

चोल साम्राज्य के पतन का प्रमुख कारण लगातार युद्ध और संघर्ष था जिसने राज्य के आर्थिक और सैनिक संसाधनों का हास किया। परवर्ती चोल शासकों की कमजोरी और नये राज्यों, विशेषकर पांड्य एवं होयसल वंशो के उत्कर्ष और उनके द्वारा चोल राज्य के क्षेत्रों पर आक्रमण ने भी साम्राज्य को बहुत ज्यादा कमजोर किया।

राजस्व प्रशासन

चोल राज्य की आय का प्रमुख साधन भूमिकर था। भूमिकर ग्राम-सभाएं एकत्र करके सरकारी कोष में जमा करती थी। इसके लिए चोल शासकों ने समस्त भूमि की माप करवायी तथा उसकी उत्पादकता के आधार पर कर का निर्धरण किया।

जैसे – राजराज प्रथम और कुलोतुंग प्रथम के समय में क्रमश: एक और दो बार भूमि की माप करायी गयीं थी। कर 1 / 2 से 1 / 4 भाग तक होता था। इसे कड़माप या कड़ीमै (भू- राजस्व) कहते थे। चोल काल में भूमि की 12 से भी अधिक किस्मो का उल्लेख मिलता है ।

प्रत्येक ग्राम तथा नगर में रहने के स्थान, मंदिर, तालाब, कारीगरों के आवास, शमशान आदि सभी प्रकार के करों से मुक्त थे।  पिंडारी (ग्राम्यदेवी) के लिए, बकरों की बलि का स्थान, कुंभकार, स्वर्णकार, लौहकार, रजक, बढ़ई आदि के निवास स्थानों को भी कर मुक्त रखा गया था।

राजस्व विभाग की पंजिका को वरित्योतगकणवक कहा जाता था जिसमें सभी प्रकार की भूमि के विवरण दर्ज किये जाते थे। कृषकों को यह सुविधा थी कि वे भूमिकर नगद अथवा अनाज के रूप में चुका सकते थे चोलों के स्वर्ण सिक्के कलंजु या पोंन कहे जाते थे। अकाल आदि दैवीय आपदाओं के समय भूमि माफ कर दिया जाता था।

दक्षिण भारत में तालाब ही सिंचाई के प्रमुख साधन थे। जिनके रखरखाब की जिम्मेदारी ग्राम सभाओं की होती थी, तालाबों की मरम्मत के लिए एरिआरम नामक कर भी वसूल किया जाता था।लोगों के कर न देने पर दण्ड की व्यवस्था थी। जैसे – पानी में डुबो देने और धूप में खड़ा कर देने का भी उल्लेख मिला है।

उदाहरण के लिए – तंजौर के कुछ ब्राहाण लगान चुकाने में असमर्थ होने पर अपनी जमीने छोड़कर गाँव से भाग गये तथा उनकी जमीने पड़ोस के मंदिरो को बेच दी गयी। बकाये कर पर ब्याज भी लिया जाता था।

केन्द्रीय शक्ति के निर्बल इहोने पर जनता ने विद्रोह किया क्योकि उनसे अन्यायपूर्ण कर वसूल किया जा रहा था जैसे – राजराज तृतीय और कुलोतुंग प्रथम के समय ।

भूमिकर के अतिरिक्त व्यापारिक वस्तुओं, विभिन्न व्यवसाओं , खानों, वनों, उत्सवों आदि पर भी कर लगते थे। राज्य की आय का व्यय अधिकारी तंत्र, निर्माण कार्यो, दान, यज्ञ, महोत्स्व आदि पर होता था। राजस्व विभाग के प्रमुख अधिकारी को वरितोत्गकक कहते थे। जो अपने-अपने अधिकार क्षेत्र के आय-व्यय का हिसाब रखते थे।

सैन्य शासन

चोल राजाओं ने एक विशाल संगठित सेना का निर्माण किया था। चोल शासन कुशल योद्धा थे और वे व्यक्तिगत रूप से युद्धों में भाग लिया करते थे।  अश्व, गज, रथ एवं पैदल सैनिकों के साथ एक अत्यंत शक्तिशाली नौ सेना थी। इसी नौ सेना की सहायता से उन्होंने श्रीविजय, सिंहल, मालदीप आदि दीपो की विजय की थी।

कुछ सैन्य दल नागरिक कार्यो में भाग लेते थे तथा मंदिरो आदि को दान किया करते थे। सैनिकों को वेतन में राजस्व का एक भाग या भूमि देने की प्रथा थी।

लेखों में बड़पेई (पैदल सैनिक), बिल्लिगल (धनुर्धारी सैनिक), कुडीरेइच्चेवगर (अश्वारोही सैनिक), आनैयाटक कुजीरमललर(गजसेना) आदि का उल्लेख मिला है।

न्याय प्रशासन

न्याय के लिए नियमित न्यायालयों का उल्लेख उनके लेखों में हुआ है जैसे – धर्मासन (राजा का न्यायालय) तथा धर्मासन भटट।

न्यायालय के पंडितो (न्यायाधीश) को धर्मभटट कहा जाता था। जिनके परामर्श से विवादों का निर्णय किया जाता था। दीवानी एवं फौजदारी मामलो में अंतर स्पष्ट नहीं है। नरवध तथा हत्या के लिए दंड व्यवस्था थी कि अपराधी पड़ोस के मंदिर में अखण्डदीप जलवाने का प्रबंध करे।

वस्तुतः यह एक प्रकार का प्रायश्चित था किन्तु मृत्युदंड दिये जाने के भी उदाहरण प्राप्त हुए है। राजद्रोह भयंकर अपराध था, जिसका निर्णय स्वंय राजा द्वारा किया जाता था। इसमें अपराधी को मृत्युदंड के साथ ही साथ उसकी संपत्ति भी जब्त कर लिया जाता था।

13 वीं सदी के चीनी लेखक चाऊ-जू-कुआ ने चोल दंड व्यवस्था के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान की है। ग्रामीण या स्थानीय स्वायत्तता चोलकालीन प्रशासन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता ग्रामीण स्तर पर स्थानीय शासन या स्वायत्तता की व्यवस्था थी।

चोलकालीन अभिलेखों की प्रचुरता के कारण हमें इस साम्राज्य के ग्राम प्रशासन की अधिक जानकारी प्राप्त है। इसके लिए विभिन्न गाँवो में स्थानीय प्रशासन का काम प्रतिनिधि संस्थाओ के माध्यम से संचालित होता था।

अभिलेखों में दो सभाओं का उल्लेख मिलता है – उर, सभा या महासभा।

उर गाँव की आम सभा थी। किसी भी गाँव के वयस्क, पुरुष करदाताओं के द्वारा उर या ग्राम या मेलग्राम का संचालन होता था। सभा या महासभा, अग्रहार कहे जाने वाले ब्राहाणों व गॉवो के वयस्क सदस्यों की सभा थी।

अग्रहार गाँवो में ब्राहाण लोग निवास करते थे और वहां की अधिकांश भूमि लगान मुक्त होती थी तथा इन्हें काफी स्वायत्तता मिली हुई थी। सभा या महासभा के कार्य संचालन के लिए समितियॉ होती थी। वे समितियाँ थी – वरियम और वरियार।

इन समितियों के प्रमुख कार्य होते थे-

  • करों की वसूली, करों को लगाना एवं माफ करना।
  • न्यायिक कार्य, शिक्षा एवं स्वास्थ्य की देखरेख।
  • कृषि का विकास एवं समुचित व्यवस्था करना।
  • मंदिरों की देखरेख इत्यादि।

ग्रामीण प्रतिनिधि सभाओं के अतिरिक्त नगरम नामक प्रतिनिधि सभा की भी चर्चा मिली है जो व्यापारियों के हितों और उनकी गतिविधियों की देख- रेख करती थी। ग्रामीण समिति के संचालन, सदस्यों का चुनाव एवं निष्कासन आदि की जानकारी उत्तरमेरूर के दो अभिलेखों से मिलती है जो क्रमश: 919 ई. एवं 921 ई. के है।

इन अभिलेखों से ज्ञात होता है कि इन सभाओं के प्रतिनिधियों का चुनाव प्रत्येक वर्ष किया जाता था एवं इसके अंतर्गत 1 / 3 सदस्य प्रत्येक वर्ष बदल दिये जाते थे जबकि सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्ष के लिए होता था। प्रत्येक गाँव को 30 वार्डो में बाँटा गया था। चुनाव लड़ने की निम्न योग्यता होनी चाहिए थी-

  • वह उस गाँव का निवासी हो जहाँ से चुनाव लड़ रहा हो।
  • 30 से 70 वर्ष तक उम्र तथा शिक्षित भी हो।
  • वह 1 / 4 वेलि भूमि का मालिक हो।
  • उसका अपना मकान हो।
  • वह वैदिक मंत्रो को ज्ञाता हो।

सदस्यों को कार्यकाल के दौरान हटाने का प्रावधान भी था-

  • यदि किसी सदस्य ने तीन वर्ष तक खर्च का लेखा-जोखा प्रस्तुत नहीं किया हो।
  • किसी अपराध में दोषी पाये जाने पर।
  • किसी भ्रष्टाचार मामलें में संलिप्त पाये जाने पर।

चुनाव किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव होती है। इसकी जानकारी चोल अभिलेखों से मिली है। आधुनिक चुनाव प्रक्रिया के समान ही ग्रामीण शासन के लिए चुनाव क्षेत्रों का विभाजन किया गया था। इतना ही नहीं चुनाव के लिए आवश्यक था, व्यक्ति उसी गाँव का निवासी हो अर्थात ऐसे व्यक्ति का चुनाव किया जाए जिसे स्थानीय परिसिथतियों की जानकारी हो।

सदस्यों को चुनाव लड़ने के लिए भी योग्यता का प्रावधान किया गया था। किसी भी शासन के कुशलतापूर्वक संचालन के लिए यह आवश्यक है कि योग्य एवं अनुभवी लोगों को शासन संचालन की जिम्मेदारी सौंपी जाय। इसके साथ ही यह भी जरुरी है कि अयोग्य लोगों को शासन से बाहर अर्थात भ्र्ष्ट एवं अपराधी लोगों को शासन संचालन से बाहर रखा जाय।

इस प्रकार ग्राम सभा प्रशासन की एक महत्वपूर्ण इकाई हुआ करती थी जो स्थानीय स्तर पर कार्यपालक, विधायी एवं न्यायिक प्रकृति को सम्पन्न करती थी। यदि ये संस्थाये अपने दायित्वों का निर्वहन ईमानदारीपूर्वक करती थी तो वह ग्राम सभाओं से परामर्श जरूर लेता रहा होगा।

आरंभ में ये सभाएं बहुत हद तक स्वायत्त थी लेकिन उत्तरकालीन चोलों के समय केन्द्रीय हस्तक्षेप बढ़ाता गया। सामान्यतः आपसी कलह , हिंसा एवं महत्वपूर्ण विवादों की स्थिति में राज्य हस्तक्षेप करता था। कई बार केन्द्रीय कर्मचारियों की उपस्थिति में ही ग्रामीण सभाओं के प्रस्ताव पारित किये जाते थे।

पल्लव वंश ( Pallava Dynasty )

दक्षिण भारत में कृष्णा और गोदावरी नदियों के बीच के प्रदेश में पल्लव वंश के राज्य की स्थापना हुई।  पल्लवों ने कांची या कांजीवरम को अपनी राजधानी बनाया। पल्लव वंश में अनेक राजा हुए। सिंह विष्णु इस राजवंश का संस्थापक था। इसे पोत्तरयण एवं अवनिसिंह भी कहा जाता है।

महेन्द्र वर्मन् प्रथम इस वंश का एक प्रसिद्ध शासक हुआ है जिसने 600 से 630 ई. तक राज्य किया। 

वह एक महान् निर्माता था और उसने विशाल चट्टानों को कटवाकर मन्दिर बनवाये।

उसने महेन्द्रवाड़ी के निकट महेन्द्र कुंड नामक जलाशय का निर्माण कराया।

नरसिंह वर्मा प्रथम- महेन्द्र वर्मन् प्रथम के पश्चात् उसका पुत्र नरसिंह वर्मन् प्रथम सिंहासन पर बैठा। उसने 630 से 668 ई. तक राज्य किया। वह पल्लव वंश का महान् शासक था। उसने काँची की ओर बढ़ते हुए पुलकेशिन द्वितीय के आक्रमण को विफल कर दिया।

उसने अपने सेनापति सिरू तोंड उपनाम परन्जोति के सेनापतित्व में एक विशाल सेना वातापी पर आक्रमण करने के लिए भेजी। इस सेना ने 642 ई. में चालुक्यों की राजधानी वातापी पर आक्रमण किया। पुलकेशिन द्वितीय अपनी राजधानी की रक्षा करते हुआ मारा गया।

वातापी पर नरसिंह वर्मन् प्रथम का अधिकार हो गया। इस विजय की यादगार में नरसिंह वर्मन् कोंड का विरुद धारण किया। चालुक्य साम्राज्य के दक्षिण भाग पर उसका अधिकार हो गया। इस प्रकार उसने अपने पिता की पराजय का बदला लिया।

फिर उसने वातापीकोंड की उपाधि ली। इसके पश्चात् नरसिंह वर्मम् प्रथम ने सिंहल (श्रीलंका) के राजसिंहासन के एक दावेदार मानवम्म की सहायता के लिए दो बार सिंहल-विजय के लिए सेना भेजी।

मानवम्म ने नरसिंह वर्मा प्रथम की उसके युद्धों में सहायता की थी और इसी सहायता के उपहार स्वरूप नरसिंह वर्मन् ने प्रथम मानवम्म को सिंहल का राजसिंहासन प्राप्त करने में सहायता दी। दूसरे अभियान में वर्मन् को सफलता मिली और उसने मानवम्म को सिंहल के सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर दिया।

नरसिंह वर्मन् एक महान् विजेता ही नहीं, एक महान् निर्माता भी था। त्रिचनापली जिले और पुड्डुकोट में अनेक मन्दिरों का निर्माण उसने कराया।  नरसिंह वर्मन प्रथम महामल्ल ने अपने नाम के अनुकूल महाबलिपुरम् अथवा महामल्लपुरम नामक नगर बसाया और धर्मराज रथ के मन्दिरों से सुशोभित किया।

उसके शासनकाल में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग 642 ई. के लगभग कांची आया। पल्लव राज्य और वहाँ के लोगों का वर्णन करता हुआ वह लिखता है- कांची 6 मील की परिधि में है। यहाँ 100 के लगभग बौद्ध मठ हैं जिसमें 10,000 भिक्षु रहते हैं। ये भिक्षु महायान सम्प्रदाय की स्थविर शाखा के अनुयायी हैं।

यहाँ 80 मन्दिर हैं जिनमें अधिकांश जैनियों के हैं- भूमि उर्वर है, नियम से जोती जाती है और प्रभूत अन्न उपजाती है। अनेक प्रकार के फल-फूल होते हैं। बहुमूल्य रत्न और अन्य वस्तुएं यहां उत्पन्न होती हैं। जलवायु उष्ण है और प्रजा साहसी है। लोग सच्चे और ईमानदार हैं। वे विद्या का बड़ा आदर करते हैं।

ह्वेनसांग के विवरण से यह जानकारी मिलती है कि तक्षशिला विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध विद्वान धर्मपाल कांची के ही निवासी थे।

महेन्द्र वर्मन् द्वितीय और परमेश्वर वर्मा प्रथम-

नरसिंह वर्मन् प्रथम के बाद उसका पुत्र महेन्द्र वर्मन् द्वितीय (668-670 ई.) और पौत्र परमेश्वर वर्मन् प्रथम (670-695 ई.) राजा बने। कोई विशेष घटना महेन्द्र वर्मन् के अल्प शासन-काल में नहीं घटी। उसकी मृत्यु के पश्चात् परमेश्वर वर्मन् प्रथम सिंहासनरूढ़ हुआ।

पल्लवों और चालुक्यों में संघर्ष परमेश्वर वर्मन् प्रथम के शासन-काल में चलता रहा। इस संघर्ष के बारे में दोनों पक्षों ने अलग-अलग दावे किये हैं। चालुक्य अभिलेखों के अनुसार चालुक्य नरेश विक्रमादित्य प्रथम ने कांची पर अधिकार कर लिया। परन्तु पल्लव अभिलेखों के अनुसार परमेश्वर वर्मन् प्रथम ने पेरूवलनल्लुर के युद्ध में विक्रमादित्य प्रथम की सेना को पराजित किया

इन परस्पर विरोधी प्रमाणों के आधार पर हम निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि किसी भी पक्ष को निर्णायक विजय प्राप्त नहीं हुई। परमेश्वर वर्मन् प्रथम शिव का उपासक था। अपने राज्य में उसने शिव मन्दिरों का निर्माण कराया।

नरसिंह वर्मन् द्वितीय और परमेश्वर वर्मन् द्वितीय-

परमेश्वर वर्मन् प्रथम के बाद उसका पुत्र नरसिंह वर्मन् द्वितीय (695-722 ई.) राजा बना। उसका शासन-काल शांतिमय था। निर्माण कार्य पर अपने शांतिमय शासन-काल में उसने जोर दिया। उसने कांची में कैलाशनाथ मन्दिर का निर्माण कराया। कांची में ही उसने ऐरावतेश्वर मन्दिर तथा महाबलिपुरम् में तथाकथित शोर मन्दिर का निर्माण कराया।

उसके अभिलेख इन मन्दिरों में उत्कीर्ण हैं। नरसिंह वर्मन् द्वितीय विद्वानों का आश्रयदाता था। उसने अनेक उपाधियाँ धारण की-जैसे राजसिंह, आगय प्रिय, शिव चूडामणि, शंकर भक्त तथा वाद्यविद्याधर। नरसिंह वर्मन् द्वितीय के बाद उसका पुत्र परमेश्वर वर्मन् द्वितीय (722-730 ई.) शासक बना। उसका चालुक्यों से युद्ध छिड़ गया।

नन्दी वर्मन् द्वितीय- पल्लव वंश का नन्दी वर्मन् द्वितीय महत्वपूर्ण शासक था।

वह 730 ई. में सिंहासन पर बैठा और उसने लगभग 65 वर्ष तक राज्य किया। उसके काल में चालुक्य-पल्लव संघर्ष तीव्र हो गया। 740 ई. में चालुक्य राजा विक्रमादित्य द्वितीय ने नन्दी वर्मन् द्वितीय को पराजित किया और कांची पर अधिकार कर लिया। लेकिन पल्लवों ने काँची पर पुन: अधिकार कर लिया। नन्दी वर्मन् द्वितीय को पाण्ड्यों और राष्ट्रकूटों से भी युद्ध करना पड़ा।

राष्ट्रकूट राजा दन्तिदुर्ग ने कांची पर अधिकार कर लिया, परन्तु बाद में दोनों में सन्धि हो गई और दन्तिदुर्ग ने अपनी पुत्री रेवा का विवाह नन्दी वर्मन् द्वितीय के साथ कर दिया। नंदीवर्मन् का शासन-काल यद्यपि संघर्षों, अभियानों, आक्रमणों में बिता था परन्तु उसने निर्माण कायों में भी रूचि ली।

उसने अपनी राजधानी कांची में मुक्तेश्वर ओर बैकुन्ठ-पेरूमल मन्दिरों का निर्माण कराया। नन्दी वर्मन् द्वितीय स्वयं विद्वान्, कवि और विद्वानों का आश्रयदाता था। उसके शासन-काल में प्रसिद्द विद्वान एवं वैष्णव संत त्रिरूमन्गईम अलवार हुए।

दन्तिवर्मन और उसके उत्तराधिकारी-

नंदी वर्मन द्वितीय के पश्चात् उका पुत्र दन्तिवर्मन राजा बना। यह उसकी राष्ट्रकूट रानी रेवा से उत्पन्न पुत्र था। इस विवाह के फलस्वरूप यद्यपि राष्ट्रकूटों और पल्लवों में सम्बन्ध स्थापित हो चुके थे, फिर भी ध्रुव, निरूपम तथा गोविन्द तृतीय नामक राष्ट्रकूट राजाओं ने कांची पर आक्रमण किये।

804 ई. के लगभग गोविन्द तृतीय ने कांची पर आक्रमण करके दन्ति वर्मन् को पराजित किया। दन्ति वर्मन् को पाण्ड्यों से भी युद्ध करना पड़ा। उसके उत्तराधिकारी नन्दी और नृपतुंगवर्मन को भी पाण्ड्यों से लोहा लेना पड़ा।

पल्लव राजाओं को चोलों से भी युद्ध करने पडे। 855 ई. के लगभग चोल राजा आदित्य प्रथम ने अन्तिम पल्लव राजा अपराजित वर्मन् को पराजित करके कांची पर अधिकार कर लिया और पल्लव राज्य का अन्त हो गया।

Other Ancient Dynasties ( अन्य प्राचीन राजवंश )

सिसोदिया

गेहलोत मांगलिया या सिसोदिया एक राजपूत राजवंश है, जिसका राजस्थान के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है। यह सूर्य वंशी राजपूत थे। सिसोदिया राजवंश में कई वीर शासक हुए हैं।’ गुहिल’ या ‘गेहलोत’ ‘गुहिलपुत्र’ शब्द का अपभ्रष्ट रूप है।

कुछ विद्वान उन्हें मूलत:ब्राह्मण मानते हैं, किंतु वे स्वयं अपने को सूर्यवंशी क्षत्रिय कहते हैं जिसकी पुष्टि पृथ्वीराज विजय काव्य से होती है। मेवाड़ के दक्षिणी-पश्चिमी भाग से उनके सबसे प्राचीन अभिलेख मिले है।

अत: वहीं से मेवाड़ के अन्य भागों में उनकी विस्तार हुआ होगा। गुह के बाद भोज, महेंद्रनाथ, शील ओर अपराजित गद्दी पर बैठे। कई विद्वान शील या शीलादित्य को ही बप्पा मानते हैं।

अपराजित के बाद महेंद्रभट और उसके बाद कालभोज राजा हुए। गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने काल भोज को चित्तौड़ दुर्ग का विजेता बप्पा माना है। किंतु यह निश्चित करना कठिन है कि वास्तव में बप्पा कौन था। कालभोज के पुत्र खोम्माण के समय अरब आक्रान्ता मेवाड़ तक पहुंचे।

अरब आक्रांताओं को पीछे हटाने वाले इन राजा को देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर ने बप्पा मानने का सुझाव दिया है। राजस्थान के दक्षिण – पश्चिम भाग पर गुहिलों का शाषन था। “नैणसी री ख्यात” में गुहिलों की 24 शाखाओं का वर्णन मिलता है जिनमें मेवाड़, बागड़ और प्रताप शाखा ज्यादा प्रसिद्ध हुई।

गुहिल राजवंश की स्थापना गुहिल ने 566 ई० में की। गुहिल के वंशज नागादित्य को 727 ई० में भीलों ने मार डाला। “रावल राजवंश का संस्थापक।” नागादित्य के पुत्र कालभोज ने 727 ई० में गुहिल राजवंश की कमान संभाली।

बप्पा रावल उसकी उपाधि थी। इसकी तिन उपादिऔर हे हिन्दू सूर्य,राज गुरु,चकव

समर सिंह का एकपुत्र रतन सिंह मेवाड राज्य का उत्तराधिकारी हुआ और दूसरा पुत्र कुम्भकरण नेपाल चला गया। नेपाल के राज वंश के शासक कुम्भकरण के ही वंशज हैं।

मालवा के परमार

परमार वंश का संस्थापक उपेंद्र (कृष्णराज) था इस वंश का प्रथम स्वतंत्र शासक सियक हर्ष (श्रीहर्ष ) था  हर्ष ने महामांडलिक चूड़ामणि महाराजाधिराज की उपाधि धारण की परमारों की प्रारंभिक राजधानी उज्जैन थी कालांतर में धार ( भोज द्वारा) राजधानी बनी

सीयक के पुत्र मंजू व सिंधुराज थे, राजा मुंज (वाक्पति मुंज)सीयक का दत्तक पुत्र-उत्पल राज के नाम से भी प्रसिद्ध है मुंज ने राष्ट्रकूटों की तरह श्रीवल्लभ व अमोघवर्ष की उपाधि धारण की

राजा सिंधुराज

नवसाहसांकचरित के रचयिता पद्मगुप्त सिंधुराज के दरबारी कवि थे  राजा भोज प्रथम सिंधुराज का पुत्र इस वंश का सबसे महत्वपूर्ण शासक अपनी विद्वता के कारण कविराज नाम से प्रसिद्ध

भोज चिकित्सा शास्त्र ,खगोल शास्त्र ,धर्म ,व्याकरण ,स्थापत्य शास्त्र आदि पर लगभग 23 ग्रंथ लिखे

समरांगण सूत्रधार, सरस्वती कंठाभरण ,आयुर्वेद सर्वस्व, व्यवहार समुच्चय, नाममालिका आदि प्रमुख रचनाएं है

भोज ने एक सरस्वती मंदिर (भोजशाला) एवं संस्कृत विश्वविद्यालय बनवाया,

भोज ने चालुक्य नरेश विक्रमादित्य चतुर्थ को पराजित किया कलचुरी नरेश गांगेयदेव को हराकर कान्यकुब्ज पर अधिकार किया

विल्हण विक्रमांकदेवचरित में उल्लेख किया कि चालुक्य राजा सोमेश्वर द्वितीय ने भोज को हराकर राजधानी धार को तहस-नहस किया भोजपुर शहर की स्थापना की उदयपुर प्रशस्ति में भोज को पृथ्वी का अधिकारी कहा गया है

भोज का सेनापति जैन कुल चंद्र था, भोजेश्वर मंदिर मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में भोजपुर में बेतवा नदी के किनारे बनवाया शिव मंदिर यहां 22 फीट ऊंचा शिवलिंग है जो दुनिया का सबसे ऊंचा और विशालतम शिवलिंग है भोजेश्वर मंदिर को पूर्व का सोमनाथ भी कहते हैं

पार्वती की गुफा भोजेश्वर मंदिर के पश्चिम की तरफ चट्टान को काटकर बनाई गई, आचार्य मानतुंग की समाधि भोजपुर में जैन आचार्य मानतुंग की समाधि है आचार्य मानतुंग ने राजा भोज के समय भक्तामर स्त्रोत की रचना की

माल्हकदेव अंतिम परमार शासक थे जिन्हें अलाउद्दीन खिलजी ने हराकर मालवा को दिल्ली सल्तनत में मिला दिया, मुंज ने मुंजसागर तालाब बनवाया था, मुंज ने चालुक्य शासक तैलप द्वितीय को 6 बार पराजित किया लेकिन सातवीं बार युद्ध में पराजित हुआ और मारा गया

परमारों की कई शाखाएं राजपूताना में शासन कर रही थी जिनमें प्रमुख है

  • आबू (चंद्रावती व अर्बुद) के परमार
  • बागड़ (बांसवाड़ा) के परमार
  • जालौर (जाबालि )के परमार
  • किराडू के परमार

ऐतिहासिक स्त्रोत

मालवा के परमार वंश के इतिहास की जानकारी निम्न स्रोतों से मिलती है

  • पदमा गुप्त का नवसाहसांकचरित
  • मेरुतुंग की प्रबंध चिंतामणि
  • उदय दित्य की उदयपुर प्रशस्ति, उदयेश्वर मंदिर ,विदिशा ,मध्य प्रदेश
  • लक्ष्मणदेव की नागपुर प्रशस्ति
  • चिंतामणि सारकिका दशा वाला
  • भोज के बांसवाड़ा व बेतवा अभिलेख
  • भोजप्रबंध – बल्लाल

10 वीं शताब्दी के गणितज्ञ हलायुध इन्हीं के दरबार में थे हलायुध मृतसंजीवनी की रचना की

  • आबू के परमार
  • संस्थापक धूम राज
  • परंतु इस वंश की वंशावली उत्पल राज से प्रारंभ होती है
  • राजधानी चंद्रावती थी

इस वंश में सिंधुराज प्रतापी शासक हुआ जो मरू मंडल का महाराजा कहलाता था 1002 के दान पात्र से पता चलता है कि आबू पर धरनीवराह का अधिकार हो गया धंधुक परवर्ती काल में यहां परमार शासक धंधुक गुजरात के सोलंकी शासक भीमदेव से युद्ध हुआ जिसमें विमल शाह (भीमदेव का दंड पति ) ने दोनों के मध्य समझौता करवाया उसके बाद भीमदेव ने विमल शाह को आबू का दंड पति नियुक्त कर दिया

विमल शाह ने वहां रहते हुए 1031 में देलवाड़ा के प्रसिद्ध विमलशाही मंदिर (भगवान आदिनाथ का जैन मंदिर) का निर्माण करवाया धारा वर्ष आबू के परमारो में धारा वर्ष सर्वाधिक प्रतापी शासक था  धारावर्ष के छोटे भाई प्रहलादन ने पालनपुर नगर बसाया तथा पार्थ पराक्रम व्यायोग नामक नाटक की रचना की

कीर्ति कौमुदी ग्रंथ की रचना धारावर्ष के कवि सोमेश्वर ने की धारावर्ष का पुत्र व उत्तराधिकारी सोमसिंह का सोलंकियों के साथ युद्ध हुआ सोमसिहं के मंत्री तेजपाल ने देलवाड़ा में भगवान नेमिनाथ का जैन मंदिर बनाया जिसे लूणवशाही मंदिर या वास्तुपाल – तेजपाल मंदिर कहते हैं

1311 ईस्वी के आसपास जालोर के चौहान शासक राव लुंबा ने परमारों से चंद्रावती छीन ली तभी से आबू से परमाणु का शासन समाप्त हो गया बागड़ के परमार राजस्थान के दक्षिणी भाग को वागड़ कहते हैं दसवीं से बारहवीं सदी में परमारों का शासन विद्यमान था इसकी राजधानी आरथुना थी

इस वंश के शासकों में धनिक कंक देव, सत्यराज ,मंडलिक, चामुंड राज ,विजय राज प्रमुख शासक इस शाखा का अंतिम शासक संभवता विजय राज था 1178 में गुहिल सामंत सिंह ने बागड़ पर पर अधिकार कर परमारों के शासन का अंत कर दिया

सोलंकी वंश 

गुजरात में अन्हिलवाड (पाटन) नामक स्थान पर पहले प्रतिहार साम्राज्य का अधिकार था, परन्तु राजनैतिक प्रभुता के लिए राष्ट्रकूटों और प्रतिहारों में जो पारस्परिक संघर्ष हुआ उससे लाभ उठाकर मूलराज-प्रथम ने दसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में (942 ई.) अपना एक स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिया और अन्हिलवाड को अपने राज्य की राजधानी बनाया।

मूलराज सोलंकी-

 मूलराज सोलंकी ने अपने एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना कर लेने के बाद इसकी सीमाओं के विस्तार का भी प्रयत्न किया।उसने शीघ्र ही कच्छ देश और सोराष्ट्र के पूर्वी भाग पर अपना अधिकार जमा लिया।

परन्तु उसे अपने प्रबल पड़ोसियों की शक्ति का भी सामना करना पड़ा। उसने कई आक्रमणों का सामना किया और अधिकतर में उसे पराजय ही प्राप्त हुई फिर भी उसने अपने राजकुल का, जिसका कि वह स्वयं प्रतिष्ठापक था, नाश नहीं होने दिया।

उसकी मृत्यु के समय सोलंकियों का राज्य पूर्व और दक्षिण में साबरमती तक फैला हुआ था। जोधपुर राज्य का संचार भी उत्तर में इसमें सम्मिलित था। मूलराज की मृत्यु रणस्थल में विग्रहराज-द्वितीय के हाथों से हुई। मूलराज के पुत्र चामुण्डराज ने धारा नगरी के परमार नरेश सिन्धुराज को पराजित किया। चामुण्डराज का पौत्र भीमदेव-प्रथम (1022) सोलंकी राजकुल का एक विख्यात नरेश था।

भीमदेव-प्रथम- 

भीमदेव-प्रथम के शासन-काल के प्रारम्भिक वर्षों में महमूद ने उसके राज्य पर आक्रमण किया था।  भीम ने उसके आक्रमण का मुकाबला करने का निश्चय किया। परन्तु एकाएक उसके ऊपर मुस्लिम आक्रमणकारी का आतंक छा गया और वह रणभूमि छोड़कर भाग गया।

महमूद ने सोमनाथ के मन्दिर को खूब लूटा-खसोटा और वह अतुल सम्पत्ति लादकर अपने देश ले गया। महमूद द्वारा भगवान सोमनाथ के मन्दिर के तुड़वा दिये जाने पर भीमदेव ने उसका पुनर्निर्माण कराया। महमूद के लौट जाने पर भीमदेव ने फिर से अपनी शक्ति का संगठन किया। पहले उसने आबू के परमार राजा को हराया।

भीम ने परमार-नरेश के पतन में अपना योगदान दिया। इस कार्य में भीम ने लक्ष्मीकर्ण कलचुरि से सहायता प्राप्त की थी परन्तु उन दोनों की मैत्री अधिक समय तक टिक न सकी। दोनों में परस्पर लड़ाई छिड़ गई जिसमें लक्ष्मीकर्ण की हार हो गई।

माना जाता है कि भीम प्रथम ने भीमेश्वर देव तथा मट्टारिका के मंदिरों का निर्माण करवाया। उसके सेनानायक विमल ने माउंट आबू पर एक प्रसिद्ध जैन मंदिर का निर्माण करवाया। यह विमल वसही के नाम से जाना जाता है।

भीमदेव के उपरान्त कर्णदेव हलवाड के राजसिंहासन पर समासीन हुआ। कर्ण ने 1064 से लेकर 1094 तक शासन किया। कर्ण का शासन-काल शान्तिपूर्ण कार्यों के लिए विख्यात है। उसने अनेक मन्दिरों (कर्णेश्वर मंदिर) का निर्माण कराया, उसके समय में उसके ही नाम से एक नगर की स्थापना की गई।

उसने कवि विल्हण को राजाश्रय प्रदान किया। कर्ण को परमार राजा उदयादित्य ने युद्ध में पराजित किया। कर्ण ने कर्ण सागर झील का भी निर्माण करवाया था।

जयसिंह सिद्धराज-

 कर्ण का पुत्र जयसिंह सिद्धराज अपने वंश का प्रतापी और विख्यात राजा था। अपनी रणवाहिनी को उसने चारों दिशाओं में घुमाया और लगभग सर्वत्र विजय पायी। अपनी विजयों से उसने अपने पड़ोसियों को आतंकित कर दिया। उसने सोराष्ट्र के आभीर सरदार को युद्ध में पराजित करके उस राज्य को अपने साम्राज्य में मिला लिया।

जयसिंह ने बारह वर्षों तक मालवा से युद्ध किया और नरवर्मन तथा यशोवर्मन दोनों को सिंहासन-च्युत् करके उनके राज्य पर अधिकार कर लिया।

नद्दुल और शाकम्भरी दोनों स्थानों के चाहमान नरेशों ने उसके आगे आत्म-समर्पण कर दिया और उसके सामन्त के रूप में अपने राज्यों का शासन करते रहे।

जयसिंह ने यशकर्ण कलचुरि और गोविन्दचन्द्र गहड़वाल से मैत्री-सम्बन्ध स्थापित किया। 

उसने चन्देल राज्य पर भी आक्रमण किया और कालिंजर तथा महोबा तक आगे बढ़ गया।

 चन्देल नरेश मदनवर्मन को बाध्य होकर जयसिंह के साथ सन्धि करनी पड़ी और इस सन्धि के फलस्वरूप उसने सोलंकी राज्य को भिलसा का प्रदेश दिया।

जयसिंह ने चालुक्य नृपति विक्रमादित्य-षष्ठ पर भी विजय प्राप्त की। कहा जाता है कि सिन्ध के अरबों के विरुद्ध युद्ध में भी जयसिंह को सफलता प्राप्त हुई थी। 

उसके अभिलेखों के प्राप्ति-स्थानों से विदित होता है कि गुजरात, काठियावाड, कच्छ, मालवा और दक्षिणी राजपूताना उसके राज्य में सम्मिलित थे।

जयसिंह ने 1113-14 ई. में एक नया सम्वत् चलाया। राजा भोज की भांति यद्यपि सोलंकी नरेश जयसिंह का भी समय अधिकतर युद्ध में व्यतीत हुआ

तथापि भोज की ही तरह उसने भी विद्या को प्रश्रय प्रदान किया।

ज्योतिष, न्याय और पुराण के अध्ययन के लिए जयसिंह ने शिक्षण संस्थायें खुलवाई। उसकी राजसभा में प्रसिद्ध जैन लेखक महापण्डित हेमचन्द्र रहते थे जिनके अनेक ग्रन्थ, उनके मस्तिष्क और विचार-शक्ति की उर्वरता को व्यक्त करते हैं।

जयसिंह स्वयं कट्टर शैव था, परन्तु उसका धार्मिक दृष्टिकोण राजा भोज की भांति जिज्ञासा-प्रधान था। जयसिंह विभिन्न धमाँ के आचायों के बीच धार्मिक विषयों पर विचार-विमर्श के लिए सम्मेलनों का आयोजन करता था। अकबर की धार्मिक विचारधारा का यह पुर्वाभास था।

जयसिंह ने अपने राज्य में अनेक मन्दिरों का निर्माण कराया। स्वयं शैव होते हुए भी उसने जैन पण्डित हेमचन्द्र को अपनी राजसभा में स्थान दिया। जयसिंह ने अवन्तिनाथ और सिद्धराज विरुद धारण किये। उसने सिद्धपुर में रूद्रमहाकाल मंदिर बनवाया। लगभग 1143 ई. में जयसिंह का देहान्त हो गया।

कुमारपाल- 

जयसिंह के उपरान्त उसके दूर के एक सम्बन्धी कुमारपाल ने उसके राज्य पर अधिकार कर लिया, क्योंकि जयसिंह के कोई पुत्र नहीं था। शाकम्भरी के चाहमानों को कुमारपाल ने पराजित किया और आबू के परमारों को दबाया। कोंकण के राजा मल्लिकार्जुन को भी उसने हराया था।

कुमारपाल का नाम जैन धर्म के इतिहास में काफी प्रसिद्ध है जैन ग्रन्थों में लिखा है कि आचार्य हेमचन्द्र के सशक्त धर्म-निरूपण से प्रभावित होकर कुमारपाल ने जैन मत ग्रहण कर लिया। उसने अपने राज्य भर में अहिंसा के सिद्धान्तों के परिपालन के लिए कठोर आज्ञायें निकलवा दीं। उसने ब्राह्मणों को इस बात के लिए बाध्य किया कि वे पशुबलि-प्रधान यज्ञों का परित्याग कर दें।

राज्य भर में कुमारपाल ने कसाइयों की दुकानों पर ताला लगवा दिया। संन्यासियों को मृगचर्म मिलना बन्द हो गया क्योंकि पशुओं का आखेट करना राजकीय कानून की दृष्टि से अवैध ठहरा दिया गया था। गिरनार पर्वत के निकट शिकारियों के समुदाय भूखों मरने लगे। राज्य भर में मनोरंजन के लिए पशुओं की लड़ाइयों को निषिद्ध ठहरा दिया गया।

जुआ और सुरा-सेवन पर कठोर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। जैन ग्रन्थों में कुमारपाल के अहिंसापालन-सम्बन्धी आदेशों के विषय में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। फिर भी उसके जैन मतानुयायी होने में संदेह का कोई कारण नहीं दिखलाई पड़ता।

जैन धर्म का अनुयायी होने पर भी कुमारपाल ने अपने पूर्वजों की शिवोपासना-सम्बन्धी मनोवृत्ति का त्याग नहीं किया। उसने सोमनाथ के प्रसिद्ध मन्दिर का जीर्णोद्धार कराया। उत्कीर्ण लेखों में कुमारपाल को शैव कहा गया है। 1171 ई. में कुमारपाल का देहान्त हो गया।

अजयपाल- कुमारपाल के बाद अजयपाल गुजरात का शासक हुआ जिसने अपने राज्य में जैन मत के विरुद्ध एक प्रतिक्रियात्मक नीति का प्रचार किया। उसने जैन मन्दिर को विध्वस्त कराना शुरू किया। कहा जाता है कि उसने महापण्डित हेमचन्द्र के प्रिय शिष्य और प्रसिद्ध जैन लेखक रामचन्द्र का वध करा दिया था।

किन्तु उसकी इस धार्मिक असहिष्णुता और संकीर्णता का प्रभाव अच्छा नहीं पड़ा। 1176 ई. में प्रतिहार नरेश वयजलदेव ने अजयपाल की हत्या कर दी। अजयपाल के पश्चात् मूलराज-द्वितीय ने कुछ समय तक शासन किया।

भीमदेव द्वितीय – 

1178 ई. में भीमदेव-द्वितीय राजा हुआ जिसने राज्यारोहण के वर्ष ही गोर के मुहम्मद को युद्ध में हराया। सन् 1195 में भीमदेव-द्वितीय ने कुतुबुद्दीन ऐबक से युद्ध किया और उसे इतनी गहरी पराजय दी कि मुस्लिम सेनानायक को अजमेर तक पीछे धकेल दिया।

परन्तु दूसरे वर्ष (1197 ई.) में अन्हिलवाड़ा पर मुसलमानों का अधिकार हो गया। किन्तु कुतुबुद्दीन का गुजरात पर स्थायी रूप से अधिकार नहीं स्थापित हो सका। भीमदेव-द्वितीय ने एक लम्बे समय, लगभग साठ वर्षों तक शासन किया।

मुसलमानों के जो आक्रमण उसके समय में हुए उससे उसके राज्य की स्थिति काफी डावांडोल हो गई और प्रान्तीय शासकों ने अपनी स्वतन्त्रता घोषित करने का अवसर ताकना आरम्भ किया।

अन्हिलवाड़ के राज्य की स्थिति इस समय इतनी गिरी हुई थी कि इसका शीघ्र विनष्ट हो जाना अवश्यवम्भावी प्रतीत हो रहा था। राज्य के बड़े-बड़े अधिकारियों और कुछ मन्त्रियों की नीयत भी दूषित हो गई।

परन्तु अर्णोराज नामक एक बघेल ने राज्य को पूर्ण विनाश से बचा लिया। उसके सुयोग्य पुत्र लवण प्रसाद ने अपने पिता के नाम को जारी रखा और शासन-संचालन का सारा कार्य अपने ही कन्धों पर वहन किया। उसने आन्तरिक विद्रोहों से राज्य की रक्षा की और बाहरी आक्रमणों का सफलतापूर्वक सामना किया।

इस प्रकार अन्हिलवाड का राज्य अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा करता हुआ अलाउद्दीन खिलजी के पूर्व तक बना रहा। तेरहवीं शताब्दी के अन्त में इस महत्त्वाकांक्षी मुस्लिम शासक ने अपने दो सेनापतियों उलुग खां और नुसरत खां की अध्यक्षता में एक विशाल सेना भेजी जिसे देखकर कर्ण, जो इस समय का शासक था, भाग गया।

गुजरात के राज्य पर मुसलमानों का अधिकार हो गया। जैन आचार्य मेरुतुंग के ग्रन्थ प्रबोधचिन्तामणि से गुजरात के प्राचीन इतिहास के विषय में काफी महत्त्वपूर्ण सूचनायें प्राप्त होती हैं।

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